झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करै वीचारु ॥
सुधि मति करतै हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥
दितै कितै न संतोखीअनि अंतरि त्रिसना बहुतु अग्यानु अंधारु ॥
नानक मनमुखा नालहु तुटीआ भली जिना माइआ मोहि पिआरु ॥1॥
तिन॑ भउ संसा किआ करे जिन सतिगुरु सिरि करतारु ॥
धुरि तिन की पैज रखदा आपे रखणहारु ॥
मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥
नानक सुखदाता सेविआ आपे परखणहारु ॥2॥
जीअ जंत सभि तेरिआ तू सभना रासि ॥
जिस नो तू देहि तिसु सभु किछु मिलै कोई होरु सरीकु नाही तुधु पासि ॥
तू इको दाता सभस दा हरि पहि अरदासि ॥
जिस दी तुधु भावै तिस दी तू मंनि लैहि सो जनु साबासि ॥
सभु तेरा चोजु वरतदा दुखु सुखु तुधु पासि ॥2॥
गुरमुखि सचै भावदे दरि सचै सचिआर ॥
साजन मनि आनंदु है गुर का सबदु वीचार ॥
अंतरि सबदु वसाइआ दुखु कटिआ चानणु कीआ करतारि ॥
नानक रखणहारा रखसी आपणी किरपा धारि ॥1॥
गुर की सेवा चाकरी भै रचि कार कमाइ ॥
जेहा सेवै तेहो होवै जे चलै तिसै रजाइ ॥
नानक सभु किछु आपि है अवरु न दूजी जाइ ॥2॥
तेरी वडिआई तूहै जाणदा तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तुधु जेवडु होरु सरीकु होवै ता आखीऐ तुधु जेवडु तूहै होई ॥
जिनि तू सेविआ तिनि सुखु पाइआ होरु तिस दी रीस करे किआ कोई ॥
तू भंनण घड़ण समरथु दातारु हहि तुधु अगै मंगण नो हथ जोड़ि खली सभ होई ॥
तुधु जेवडु दातारु मै कोई नदरि न आवई तुधु सभसै नो दानु दिता खंडी वरभंडी पाताली पुरई सभ लोई ॥3॥
मनि परतीति न आईआ सहजि न लगो भाउ ॥
सबदै सादु न पाइओ मनहठि किआ गुण गाइ ॥
नानक आइआ सो परवाणु है जि गुरमुखि सचि समाइ ॥1॥
आपणा आपु न पछाणै मूड़ा अवरा आखि दुखाए ॥
मुंढै दी खसलति न गईआ अंधे विछुड़ि चोटा खाए ॥
सतिगुर कै भै भंनि न घड़िओ रहै अंकि समाए ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मन के पीछे चलने वाले मनुष्य प्रभू को बिसरे हुए हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।