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अंग 549

अंग
549
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख मूलहु भुलाइअनु विचि लबु लोभु अहंकारु ॥
झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करै वीचारु ॥
सुधि मति करतै हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥
दितै कितै न संतोखीअनि अंतरि त्रिसना बहुतु अग्यानु अंधारु ॥
नानक मनमुखा नालहु तुटीआ भली जिना माइआ मोहि पिआरु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मन के पीछे चलने वाले मनुष्य प्रभू को बिसरे हुए हैं।क्योंकि उनके अंदर लब-लोभ और अहंकार है। उनका हरेक दिन (लब-लोभ आदि संबंधी) झगड़ा करते गुजरता है।वे गुरू के शबद में विचार नहीं करते। करतार ने उन मनमुखों की होश और अक्ल खो ली है वे निरे विकार भरे वचन ही बोलते हैं। वे किसी भी दाति के मिलने पर तृप्त नहीं होते क्योंकि उनके मन में बहुत तृष्णा अज्ञान व अंधेरा है। हे नानक ! (ऐसे) मनुष्यों से संबंध टूटा हुआ ही भला है (कोई नाता ना ही रहे तो ठीक है)।क्योंकि उनका प्यार तो माया के मोह में है। 1।
मः 3 ॥
तिन॑ भउ संसा किआ करे जिन सतिगुरु सिरि करतारु ॥
धुरि तिन की पैज रखदा आपे रखणहारु ॥
मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥
नानक सुखदाता सेविआ आपे परखणहारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3। जिनके सिर पर प्रभू और गुरू है (अर्थात।जो प्रभू और गुरू को अपना रखवाला समझते हैं)।डर और चिंता उनका क्या बिगाड़ सकती है। रक्षा करने वाला प्रभू स्वयं हमेशा से उनकी लाज रखता आया है। सच्चे शबद के द्वारा विचार करके और हरी प्रीतम को मिल के सुख पाते हैं। हे नानक ! जो सुखदाता प्रभू खुद ही (सबकी) परख करने वाला है उसकी वह सेवा करते हैं।2।
पउड़ी ॥
जीअ जंत सभि तेरिआ तू सभना रासि ॥
जिस नो तू देहि तिसु सभु किछु मिलै कोई होरु सरीकु नाही तुधु पासि ॥
तू इको दाता सभस दा हरि पहि अरदासि ॥
जिस दी तुधु भावै तिस दी तू मंनि लैहि सो जनु साबासि ॥
सभु तेरा चोजु वरतदा दुखु सुखु तुधु पासि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे हरी ! सारे जीव-जन्तु आपके हैं।आप सबका खजाना है। जिस मनुष्य को आप (अपने नाम की) दाति बख्शता है।उसे (जैसे) हरेक वस्तु मिल जाती है (क्योंकि रोकने वाला) और कोई आपका शरीक आपके पास नहीं। आप एक ही सबका दाता है (इसलिए।) हे हरी ! (सब जीवों की) आपके ही आगे विनती होती है; जिसकी विनती आपको ठीक लगे। आप उसकी प्रवान कर लेता है और उस मनुष्य को शाबाश मिलती है। ये सारा आपका ही करिश्मा बरत रहा है।(सबका) दुख व सुख (का तरला) आपके पास ही होता है। 2।
सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि सचै भावदे दरि सचै सचिआर ॥
साजन मनि आनंदु है गुर का सबदु वीचार ॥
अंतरि सबदु वसाइआ दुखु कटिआ चानणु कीआ करतारि ॥
नानक रखणहारा रखसी आपणी किरपा धारि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सच्चे प्रभू को प्यारे लगते हैं और सच्चे दर पर वह व्यापारी (समझे जाते हैं); सतिगुरू के शबद को विचारने वाले उन सज्जनों के मन (सदा) पुल्कित रहते हैं; सतिगुरू का शबद उनके हृदय में बसा है (इसलिए) सृजनहार ने उनका दुख काट दिया है और उनका हृदय प्रकाशित कर दिया है। हे नानक ! रक्षा करने वाला प्रभू अपनी मेहर से उनकी सदा रक्षा करता है। 1।
मः 3 ॥
गुर की सेवा चाकरी भै रचि कार कमाइ ॥
जेहा सेवै तेहो होवै जे चलै तिसै रजाइ ॥
नानक सभु किछु आपि है अवरु न दूजी जाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ अगर मनुष्य (प्रभू के) डर में रह के गुरू की बताई हुई सेवा चाकरी करे और उसी प्रभू की रजा में चले तो उस प्रभू जैसा ही हो जाता है जिसे वह सिमरता है।फिर। हे नानक ! (ऐसे मनुष्यों को) सब जगह प्रभू ही प्रभू दिखता है।(उसके बिना) कोई और नहीं दिखता।और ना ही किसी और (आसरे की) जगह दिखती है। 2।
पउड़ी ॥
तेरी वडिआई तूहै जाणदा तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तुधु जेवडु होरु सरीकु होवै ता आखीऐ तुधु जेवडु तूहै होई ॥
जिनि तू सेविआ तिनि सुखु पाइआ होरु तिस दी रीस करे किआ कोई ॥
तू भंनण घड़ण समरथु दातारु हहि तुधु अगै मंगण नो हथ जोड़ि खली सभ होई ॥
तुधु जेवडु दातारु मै कोई नदरि न आवई तुधु सभसै नो दानु दिता खंडी वरभंडी पाताली पुरई सभ लोई ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। आप कितना बड़ा है, ये आप खुद ही जानता है।क्योंकि आपके जितना और कोई नहीं। अगर आपके जितना और कोई शरीक हैं (उसे देख के) तब ही बता सकते हैं (कि आप कितना बड़ा है) (पर) आपके जितना आप खुद ही है। जिस मनुष्य ने आपको सिमरा है उस ने सुख पाया है।कोई अन्य मनुष्य उसकी क्या बराबरी कर सकता है। शरीरों को नाश भी आप स्वयं ही कर सकता है और बना भी आप स्वयं ही सकता है।सब दातें भी बख्शने वाला है सारी सृष्टि आपके आगे दातें मांगने के लिए हाथ जोड़ के खड़ी हुई है। मुझे आपके जितना और कोई दानी नजर नहीं आता।खण्डों।ब्रहमण्डों।पातालों।पुरियों।सारे (चौदह ही) लोकों में तूने ही सब जीवों पर कृपा की हुई है। 3।
सलोक मः 3 ॥
मनि परतीति न आईआ सहजि न लगो भाउ ॥
सबदै सादु न पाइओ मनहठि किआ गुण गाइ ॥
नानक आइआ सो परवाणु है जि गुरमुखि सचि समाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। अगर मन में (हरी के अस्तित्व की) प्रीति ना आई।और सहज अडोलता में प्यार ना बना (ठहराव ना आया)। अगर शबद का रस ना मिला।तो मन के हठ से सिफत सालाह करने का भी क्या लाभ। हे नानक ! (संसार में) पैदा हुआ वह जीव मुबारक है जो सतिगुरू के सन्मुख रहके सच में लीन हो जाए। 1।
मः 3 ॥
आपणा आपु न पछाणै मूड़ा अवरा आखि दुखाए ॥
मुंढै दी खसलति न गईआ अंधे विछुड़ि चोटा खाए ॥
सतिगुर कै भै भंनि न घड़िओ रहै अंकि समाए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ मूर्ख मनुष्य अपने आप की पहिचान नहीं करता और औरों को कह,कह के दुखी करता रहता है। (सतिगुरू के दर पर पहुँच के भी) अंधे की मूलभूत (दूसरों को दुखी करने वाली) आदत नहीं जाती।और (वह हरी से) विछुड़ के दुख सहता है। मूर्ख मनुष्य सतिगुरू के भय में रह के मन (के पिछले बुरे संस्कारों) को तोड़ के (नए हरी सिमरन वाले संस्कार) नहीं घड़ता।(ऐसे कर्म नहीं करता कि वह) (प्रभू की) गोद में समाया रहे।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मन के पीछे चलने वाले मनुष्य प्रभू को बिसरे हुए हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।