गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥
नानक एथै कमावै सो मिलै अगै पाए जाइ ॥1॥
धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ ॥
दमि दमि सदा समालदा दंमु न बिरथा जाइ ॥
जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ ॥
नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥2॥
आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥
आपे रूप दिखालदा आपे लाइ धिआनां ॥
आपे मोनी वरतदा आपे कथै गिआनां ॥
कउड़ा किसै न लगई सभना ही भाना ॥
उसतति बरनि न सकीऐ सद सद कुरबाना ॥19॥
कली अंदरि नानका जिंनां दा अउतारु ॥
पुतु जिनूरा धीअ जिंनूरी जोरू जिंना दा सिकदारु ॥1॥
हिंदू मूले भूले अखुटी जांही ॥
नारदि कहिआ सि पूज करांही ॥ अंधे गुंगे अंध अंधारु ॥
पाथरु ले पूजहि मुगध गवार ॥
ओहि जा आपि डुबे तुम कहा तरणहारु ॥2॥
सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥
भगत रते रंगि एक कै पूरा वेसाहु ॥
अंम्रितु भोजनु नामु हरि रजि रजि जन खाहु ॥
सभि पदारथ पाईअनि सिमरणु सचु लाहु ॥
संत पिआरे पारब्रहम नानक हरि अगम अगाहु ॥20॥
सभु किछु हुकमे आवदा सभु किछु हुकमे जाइ ॥
जे को मूरखु आपहु जाणै अंधा अंधु कमाइ ॥
नानक हुकमु को गुरमुखि बुझै जिस नो किरपा करे रजाइ ॥1॥
सो जोगी जुगति सो पाए जिस नो गुरमुखि नामु परापति होइ ॥
तिसु जोगी की नगरी सभु को वसै भेखी जोगु न होइ ॥
नानक ऐसा विरला को जोगी जिसु घटि परगटु होइ ॥2॥
आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥
आपे सूखमु भालीऐ आपे पासारु ॥
आपि इकाती होइ रहै आपे वड परवारु ॥
नानकु मंगै दानु हरि संता रेनारु ॥
होरु दातारु न सुझई तू देवणहारु ॥21॥1॥ सुधु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।