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अंग 556

अंग
556
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिचरु विचि दंमु है तिचरु न चेतई कि करेगु अगै जाइ ॥
गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥
नानक एथै कमावै सो मिलै अगै पाए जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जब तक शरीर में दम है।प्रभू को याद नहीं करता; (संसारी जीव अहंकार में रह के कभी नहीं सोचता कि) आगे दरगाह में जा के क्या हाल होंगे। जो मनुष्य समझदार होता है वह सचेत रहता है और अज्ञानी मनुष्य अज्ञानता का ही काम करता है। हे नानक ! मानस जनम में जो कुछ मनुष्य कमाई करता है।वही मिलती है।परलोक में जा के भी वही मिलती है। 1।
मः 3 ॥
धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ ॥
दमि दमि सदा समालदा दंमु न बिरथा जाइ ॥
जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ ॥
नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मः 3 ॥ धुर से ही प्रभू का हुकम चला कि सतिगुरू के बिना प्रभू का सिमरन नहीं किया जा सकता; सतिगुरू के मिलने पर प्रभू मनुष्य के हृदय में बस जाता है और मनुष्य सदा उसमें बिरती जोड़े रखता है; श्वास-श्वास उसको चेता करता है। एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जाता; (इस तरह उसका) पैदा होने मरने का डर खत्म हो जाता है और उसको (असल मानस) जीवन का दर्जा मिल जाता है। हे नानक ! प्रभू ये मर्तबा (भाव।जीवन पदवी) उस मनुष्य को देता है जिस पर अपनी रजा में मेहर करता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥
आपे रूप दिखालदा आपे लाइ धिआनां ॥
आपे मोनी वरतदा आपे कथै गिआनां ॥
कउड़ा किसै न लगई सभना ही भाना ॥
उसतति बरनि न सकीऐ सद सद कुरबाना ॥19॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू खुद ही समझदार है।खुद ही चतुर है और खुद ही नायक है। खुद ही (अपने) रूप दिखलाता है और खुद ही बिरती जोड़ता है। खुद ही मौनधारी है और खुद ही ज्ञान की बातें करने वाला है। किसी को कड़वा नहीं लगता (किसी को किसी रंग में।किसी को किसी रंग में) सभी को प्यारा लगता है। ऐसे प्रभू से मैं सदके हूँ।उसके गुण बयान नहीं किए जा सकते। 19।
सलोक मः 1 ॥
कली अंदरि नानका जिंनां दा अउतारु ॥
पुतु जिनूरा धीअ जिंनूरी जोरू जिंना दा सिकदारु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! कलयुग में (विकारी जीवन में) रहने वाले (मनुष्य नहीं) भूतने पैदा हुए है। पुत्र भूतना। बेटी भूतनी और स्त्री (सारे) भूतनियों की सिरदार है (भाव।नाम से वंचित सब जीव भूतने हैं)। 1।
मः 1 ॥
हिंदू मूले भूले अखुटी जांही ॥
नारदि कहिआ सि पूज करांही ॥ अंधे गुंगे अंध अंधारु ॥
पाथरु ले पूजहि मुगध गवार ॥
ओहि जा आपि डुबे तुम कहा तरणहारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हिन्दू बिल्कुल ही भटके हुए टूटते जा रहे हैं। जो नारद ने कहा वही पूजा करते हैं। इन अंधे-गूंगों के लिए घुप-अंधेरा छाया हुआ है (भाव।ना ये सही रास्ता देख रहे हें ना ही मुँह से प्रभू के गुण गाते हैं)। ये मूर्ख गवार पत्थर ले के पूज रहे हैं। (हे भाई ! जिन पत्थरों को पूजते हो) जब वे खुद (पानी में) डूब जाते हैं (तो उनको पूज के) आप (संसार-समुंद्र से) कैसे तैर सकते हैं।
पउड़ी ॥
सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥
भगत रते रंगि एक कै पूरा वेसाहु ॥
अंम्रितु भोजनु नामु हरि रजि रजि जन खाहु ॥
सभि पदारथ पाईअनि सिमरणु सचु लाहु ॥
संत पिआरे पारब्रहम नानक हरि अगम अगाहु ॥20॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! आप सच्चा शाहु है और सब कुछ आपके अख्तियार में है। भजन करने वाले दास एक हरी के (नाम के) रंग में रंगे हुए हैं और उस पर उन्हें पूरा भरोसा है। वह दास प्रभू का नाम (रूपी) अमर करने वाला भोजन जी भर के खाते हैं। सारे पदार्थ उनको मिलते हैं।वह नाम सिमरन (रूपी) सच्चा लाभ कमाते हैं। हे नानक ! (बात इस तरह खत्म होती है कि) जो पारब्रहम पहुँच से परे है और अगाध है।भजन करने वाले दास उसके प्यारे हैं। 20।
सलोक मः 3 ॥
सभु किछु हुकमे आवदा सभु किछु हुकमे जाइ ॥
जे को मूरखु आपहु जाणै अंधा अंधु कमाइ ॥
नानक हुकमु को गुरमुखि बुझै जिस नो किरपा करे रजाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हरेक चीज हुकम में ही आती है और हुकम में ही चली जाती है। जो कोई मूर्ख अपने आप को (कुछ बड़ा) समझ लेता है।वह अंधा अंधों वाला काम करता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर अपनी रजा में प्रभू कृपा करता है।वह कोई विरला गुरमुख हुकम की पहचान करता है। 1।
मः 3 ॥
सो जोगी जुगति सो पाए जिस नो गुरमुखि नामु परापति होइ ॥
तिसु जोगी की नगरी सभु को वसै भेखी जोगु न होइ ॥
नानक ऐसा विरला को जोगी जिसु घटि परगटु होइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मनुष्य को सतिगुरू के सन्मुख हो के नाम की प्राप्ति होती है।वह सच्चा योगी है।और (जोग की) जाच उसको आई है। उस जोगी के शरीर (रूप) नगर में हरेक (गुण) बसता है।(निरे) भेष से (ईश्वर से) मेल नहीं होता। हे नानक ! जिसके हृदय में प्रभू प्रत्यक्ष हो जाता है।इस तरह का कोई दुर्लभ जोगी होता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥
आपे सूखमु भालीऐ आपे पासारु ॥
आपि इकाती होइ रहै आपे वड परवारु ॥
नानकु मंगै दानु हरि संता रेनारु ॥
होरु दातारु न सुझई तू देवणहारु ॥21॥1॥ सुधु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। उसने स्वयं ही जीवों को पैदा किया है और खुद ही (उनका) आसरा (बनता) है। खुद ही हरी सूक्षम रूप में है और खुद ही (संसार का) परपंच (रूप) है। खुद ही अकेला हो रहता है और खुद ही बड़े परिवार वाला है। हे हरी ! नानक आपके संत-जनों की धूड़ (रूपी) दान माँगता है। आप ही देने वाला है।कोई और दाता मुझे नजर नहीं आता। 21। 1।सुधु।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।