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अंग 552

अंग
552
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख माइआ मोहु है नामि न लगो पिआरु ॥
कूड़ु कमावै कूड़ु संग्रहै कूड़ु करे आहारु ॥
बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंते होइ सभु छारु ॥
करम धरम सुच संजम करहि अंतरि लोभु विकारु ॥
नानक जि मनमुखु कमावै सु थाइ ना पवै दरगहि होइ खुआरु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मनमुख का माया में मोह है (इस करके) नाम में उसका प्यार नहीं बनता। वह (माया रूपी) झूठ कमाता।झूठ एकत्र करता है और झूठ को ही अपनी खुराक बनाता है (भाव।जिंदगी का आसरा समझता है)। (मन के अधीन हुए मनुष्य) विष रूपी माया धन को इकट्ठा कर करके खपते मरते हैं।जबकि आखिर में वह सारा धन राख हो जाता है (भाव।राख की तरह व्यर्थ हो जाता है) वे अपनी और से (आत्मिक काम भी करते हैं) कर्म-धर्म-पवित्रता के साधन व और संयम (भी) करते हैं (पर) उनके हृदय में लोभ व विकार (ही) रहता है। हे नानक ! मन के अधीन हुआ मनुष्य जो कुछ (भी) करता है वह कबूल नहीं होता और प्रभू की हजूरी में वह ख्वार होता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे खाणी आपे बाणी आपे खंड वरभंड करे ॥
आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥
आपि लहाए करे जिसु किरपा जिस नो गुरमुखि करे हरे ॥
आपे भउजलु आपि है बोहिथा आपे खेवटु आपि तरे ॥
आपे करे कराए करता अवरु न दूजा तुझै सरे ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू स्वयं ही खाणियां।बोलियां।खण्ड व ब्रहमण्ड बनाता है। स्वयं ही समुंद्र व सागर है और उसने स्वयं ही इस में (सिफत सालाह रूपी) रत्न छुपा के रखे हैं; जिस पर कृपा करता है और जिसको सतिगुरू के सन्मुख करता है।उसे स्वयं ही वह रत्न प्राप्त करवा देता है। प्रभू खुद ही (संसार) समुंद्र है।खुद ही जहाज है।स्वयं ही मल्लाह है और स्वयं ही तैरता है। स्वयं ही सब कुछ करता कराता है।हे प्रभू ! आपके जैसा दूसरा कोई नहीं। 9।
सलोक मः 3 ॥
सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चितु लाइ ॥
नामु पदारथु पाईऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥
जनम मरन दुखु कटीऐ हउमै ममता जाइ ॥
उतम पदवी पाईऐ सचे रहै समाइ ॥
नानक पूरबि जिन कउ लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अगर मनुष्य मन टिका के सतिगुरू की (बताए हुए) कर्म करे।तो वह सेवा जरूर फल देती है, नाम धन मिल जाता है और चिंता मुक्त (प्रभू) हृदय में आ बसता है। अहंकार ममता दूर हो जाती है।और ये सारी उम्र का दुख काटा जाता है। (हजूरी में) बड़ा रुतबा मिलता है।मनुष्य सच्चे हरी में समाया रहता है।(पर। सतिगुरू का मिलना कोई आसान बात नहीं); हे नानक ! शुरू से ही (किए हुए अच्छे कर्मों के अनुसार) जिनके हृदय में (अच्छे संस्कार) उकरे हुए हैं।उन्हें ही सतिगुरू आ मिलता है (भाव।वही सतिगुरू को पहचान लेते हैं)। 1।
मः 3 ॥
नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥
गुरमुखि होवै सु पारि पवै जिना अंदरि सचा सोइ ॥
नामु सम॑ाले नामु संग्रहै नामे ही पति होइ ॥
नानक सतिगुरु पाइआ करमि परापति होइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ सतिगुरू (प्रभू के) नाम में भीगा हुआ होता है और कलियुग (के जीवों के उद्धार) के लिए जहाज बनता है; जो मनुष्य गुरुमुख बन जाता है एवं जिसके हृदय में सच्चा परमात्मा निवास करता है, वह संसार सागर से पार हो जाता है। (क्योंकि) वह नाम को संभालता है और नाम-धन इकट्ठा करता है (हरी की दरगाह में) आदर भी नाम से ही मिलता है। हे नानक ! सतिगुरू को मिल के प्रभू की मेहर से ही (भाव।बख्शिश के पात्र बनने से ही) नाम की प्राप्ति होती है। 2।
पउड़ी ॥
आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥
आपे ठाकुरु सेवकु आपे आपे ही पाप खंडनु ॥
आपे सभि घट भोगवै सुआमी आपे ही सभु अंजनु ॥
आपि बिबेकु आपि सभु बेता आपे गुरमुखि भंजनु ॥
जनु नानकु सालाहि न रजै तुधु करते तू हरि सुखदाता वडनु ॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू स्वामी स्वयं ही पारस है।स्वयं ही लोहा है और उसने स्वयं ही (उससे) सोना बनाया है। खुद ही ठाकुर है।खुद ही सेवक है और खुद ही पाप दूर करने वाला है। सारे शरीरों में खुद ही व्यापक हो के मायावी पदार्थ भोगता है और सारी माया भी खुद ही है। खुद ही बिबेक (भाव।ज्ञान) है।खुद ही सारे (विवेक) को जानने वाला है और खुद ही सतिगुरू के सन्मुख हो के (माया के बँधन) तोड़ने वाला है। 10।
सलोकु मः 4 ॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे ठवर न पावही मरि जंमहि आवहि जाहि ॥
बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मनि आइ ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअहि मुहि कालै उठि जाहि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4। सतिगुरू की बताई हुई कार किए बिना जितने भी कर्म जीव करते हैं वे उनके लिए बँधन बनते हैं (भाव।वह कर्म और भी ज्यादा माया के मोह में फंसाते हैं) सतिगुरू की सेवा के बिना और कोई आसरा जीवों को नहीं मिलता (और इसलिए) पैदा होते मरते रहते हैं। गुरू के बताए हुए सिमरन से टूट के मनुष्य और ही फीके बोल बोलता है।इसके हृदय में नाम नहीं बसता; (इसका नतीजा ये निकलता है कि) हे नानक ! सतिगुरू की सेवा के बिना जीव (को जैसे) जमपुरी में (बधे की) मार पड़ती है और (चलने के वक्त) संसार से मुकालिख़ कमा के जाते हैं। 1।
मः 3 ॥
इकि सतिगुर की सेवा करहि चाकरी हरि नामे लगै पिआरु ॥
नानक जनमु सवारनि आपणा कुल का करनि उधारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3। कई मनुष्य सतिगुरू की बताई हुई सिमरन की कार करते हैं और उनका प्रभू के नाम में प्यार बन जाता है। हे नानक ! वे अपना मानस जनम सवार लेते हैं और अपनी कुल का भी उद्धार कर लेते हैं। 2।
पउड़ी ॥
आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥
आपे पिता माता है आपे आपे बालक करे सिआणे ॥
इक थै पड़ि बुझै सभु आपे इक थै आपे करे इआणे ॥
इकना अंदरि महलि बुलाए जा आपि तेरै मनि सचे भाणे ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू स्वयं ही पाठशाला है।स्वयं ही अध्यापक है।और स्वयं ही छात्र पढ़ने के लिए लाता है। खुद ही माँ-बाप है और खुद ही बालकों को समझदार करता है; एक जगह सब कुछ पढ़ के खुद ही समझता है।और एक जगह खुद ही बालकों को अंजान बना देता है। हे सच्चे हरी ! जब खुद आपके मन को अच्छा लगता है तो आप (इनमें से) े किसी एक को अपने महल में धुर अंदर बुला लेता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मनमुख का माया में मोह है (इस करके) नाम में उसका प्यार नहीं बनता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।