आपे संगति सदि बहालै आपे विदा करावै ॥
जिस नो किरपालु होवै हरि आपे तिस नो हुकमु मनावै ॥6॥
करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥
ममता मोहु सु बंधना पुत्र कलत्र सु धंधु ॥
जह देखा तह जेवरी माइआ का सनबंधु ॥
नानक सचे नाम बिनु वरतणि वरतै अंधु ॥1॥
अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥
बंधन तोड़ै सचि वसै अगिआनु अधेरा जाइ ॥
सभु किछु देखै तिसै का जिनि कीआ तनु साजि ॥
नानक सरणि करतार की करता राखै लाज ॥2॥
जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥
तदहु किआ को लेवै किआ को देवै जां अवरु न दूजा कीआ ॥
फिरि आपे जगतु उपाइआ करतै दानु सभना कउ दीआ ॥
आपे सेव बणाईअनु गुरमुखि आपे अंम्रितु पीआ ॥
आपि निरंकार आकारु है आपे आपे करै सु थीआ ॥7॥
गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥
सदा अनंदि गावहि गुण साचे अरधि उरधि उरि धारि ॥
अंतरि प्रीतमु वसिआ धुरि करमु लिखिआ करतारि ॥
नानक आपि मिलाइअनु आपे किरपा धारि ॥1॥
कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥
विणु करमै किनै न पाइओ भउकि मुए बिललाइ ॥
गुर कै सबदि मनु तनु भिजै आपि वसै मनि आइ ॥
नानक नदरी पाईऐ आपे लए मिलाइ ॥2॥
आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥
आपे ही बहि पूजे करता आपि परपंचु करीजै ॥
आपि परविरति आपि निरविरती आपे अकथु कथीजै ॥
आपे पुंनु सभु आपि कराए आपि अलिपतु वरतीजै ॥
आपे सुखु दुखु देवै करता आपे बखस करीजै ॥8॥
सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥
गुर कै भै केते निसतरे भै विचि निरभउ पाइ ॥
मनु कठोरु सबदि भेदि तूं सांति वसै मनि आइ ॥
सांती विचि कार कमावणी सा खसमु पाए थाइ ॥
नानक कामि क्रोधि किनै न पाइओ पुछहु गिआनी जाइ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “खुद ही जल देता है और छिंगा भी खुद देता है और खुद ही चुल्ली करवाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।