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अंग 551

अंग
551
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥
आपे संगति सदि बहालै आपे विदा करावै ॥
जिस नो किरपालु होवै हरि आपे तिस नो हुकमु मनावै ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: खुद ही जल देता है और छिंगा भी खुद देता है और खुद ही चुल्ली करवाता है। हरी खुद ही संगति को बुला के बैठाता है और खुद ही विदा करता है। जिस पर प्रभू स्वयं दयालु होता है उसको अपनी रजा (मीठी करके) मनवाता है। 6।
सलोक मः 3 ॥
करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥
ममता मोहु सु बंधना पुत्र कलत्र सु धंधु ॥
जह देखा तह जेवरी माइआ का सनबंधु ॥
नानक सचे नाम बिनु वरतणि वरतै अंधु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (कर्म काण्ड के) कर्म-धर्म सारे बँधन (का रूप ही) हैं और अच्छे-बुरे काम भी (संसार से) जोड़ के रखने का वसीला हैं (अर्थात।कर्म-काण्ड व पाप-पुंन करने से जनम-मरन से गति नहीं हो सकती)। ममता और मोह भी बँधन ही है।पुत्र और स्त्री- (इनका प्यार भी) कष्ट का कारण है। जिधर देखता हूँ उधर ही माया के मोह (रूपी) जंजीर है। हे नानक ! सच्चे नाम के बिना अंधा मनुष्य (माया के) व्यवहार को ही बरतता है। 1।
मः 4 ॥
अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥
बंधन तोड़ै सचि वसै अगिआनु अधेरा जाइ ॥
सभु किछु देखै तिसै का जिनि कीआ तनु साजि ॥
नानक सरणि करतार की करता राखै लाज ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 4 ॥ अंधे मनुष्य को प्रकाश तब ही होता है जब (प्रभू की) रजा में उस को सतिगुरू मिल जाए (क्योंकि सतिगुरू के मिलने से) वह (माया के) बँधन तोड़ लेता है। सच्चे हरी में लीन हो जाता है और उसका अज्ञान (रूपी) अंधकार दूर हो जाता है। जिसने शरीर बना के पैदा किया है।(सतिगुरू के मिलने से) मनुष्य सब कुछ उसी का ही समझता है।और। हे नानक ! वह मनुष्य सृजनहार की शरण पड़ता है और सृजनहार उसकी लाज रखता है (भाव।उसे विकारों से बचा लेता है)। 2।
पउड़ी ॥
जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥
तदहु किआ को लेवै किआ को देवै जां अवरु न दूजा कीआ ॥
फिरि आपे जगतु उपाइआ करतै दानु सभना कउ दीआ ॥
आपे सेव बणाईअनु गुरमुखि आपे अंम्रितु पीआ ॥
आपि निरंकार आकारु है आपे आपे करै सु थीआ ॥7॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जब प्रभू ने खुद बैठ के रचना रची तब उसने किसी दूसरे सेवक से सलाह नहीं ली थी। जब कोई और दूसरा पैदा ही नहीं किया।तो किसी ने किसी के पास से लेना ही क्या था और देना क्या था।(भाव।कोई ऐसा था ही नहीं जो परमात्मा को सलाह दे सकता)। फिर हरी ने खुद संसार को पैदा किया और सब जीवों को रोज़ी दी। गुरू के माध्यम से सिमरन की जुगति प्रभू ने खुद ही बनाई है और खुद ही उसने (नाम-रूपी) अमृत पीया। प्रभू खुद ही आकार से रहित है और खुद ही आकार वाला (साकार) है।जो वह खुद करता है वही होता है। 7।
सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥
सदा अनंदि गावहि गुण साचे अरधि उरधि उरि धारि ॥
अंतरि प्रीतमु वसिआ धुरि करमु लिखिआ करतारि ॥
नानक आपि मिलाइअनु आपे किरपा धारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य हर समय सहज अवस्था में लिव जोड़ के (भाव।सदा एकाग्रचित्त रहके) सदा सच्चे प्रभू को सिमरते हैं। और ऊपर-नीचे हर जगह व्यापक हरी को हृदय में परो के चढ़दीकला में (रह के) सदा सच्चे की सिफत सालाह करते हैं। धुर से ही करतार ने (उनके लिए) बख्शिशों (का फुरमान) लिख दिया है (इसलिए) उनके हृदय में प्यारा प्रभू बसता है। हे नानक ! उस प्रभू ने स्वयं ही कृपा करके उन्हें अपने में मिला लिया है। 1।
मः 3 ॥
कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥
विणु करमै किनै न पाइओ भउकि मुए बिललाइ ॥
गुर कै सबदि मनु तनु भिजै आपि वसै मनि आइ ॥
नानक नदरी पाईऐ आपे लए मिलाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3। (जब तक सतिगुरू के शबद द्वारा हृदय ना भीगे और प्रभू की बख्शिश का भागी ना बने।तब तक) (चाहे) हर वक्त सदा गुण गाता रहे।(इस तरह) कहते हुए हाथ नहीं आता। मेहर के बिना किसी को नहीं मिला।कई रोते-कुरलाते मर-खप गए हैं। सतिगुरू के शबद से ही मन और तन भीगता है और प्रभू हृदय में बसता है। हे नानक ! प्रभू अपनी कृपा-दृष्टि से ही मिलता है।वह स्वयं ही (जीव को) अपने साथ मिलाता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥
आपे ही बहि पूजे करता आपि परपंचु करीजै ॥
आपि परविरति आपि निरविरती आपे अकथु कथीजै ॥
आपे पुंनु सभु आपि कराए आपि अलिपतु वरतीजै ॥
आपे सुखु दुखु देवै करता आपे बखस करीजै ॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। सारे वेद-पुराण व शास्त्र प्रभू स्वयं ही रचने वाला है।खुद ही इनकी कथा करता है और खुद ही (सुन के) प्रसन्न होता है। हरी स्वयं ही बैठ के (पुराण आदिक मतानुसार) पूजा करता है और स्वयं ही (अन्य) पसारा पसारता है। खुद ही संसार में खचित हो रहा है और खुद ही इससे किनारा किए बैठा है और कथन से परे अपना आप खुद ही बयान करता है। पुंन भी आप ही करवाता है।फिर (पाप) पुंन से निर्लिप भी आप ही वरतता है। आप ही प्रभू सुख-दुख देता है और आप ही मेहर करता है। 8।
सलोक मः 3 ॥
सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥
गुर कै भै केते निसतरे भै विचि निरभउ पाइ ॥
मनु कठोरु सबदि भेदि तूं सांति वसै मनि आइ ॥
सांती विचि कार कमावणी सा खसमु पाए थाइ ॥
नानक कामि क्रोधि किनै न पाइओ पुछहु गिआनी जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे शेख ! हृदय में से हठ त्याग दे।ये पागलपन दूर कर और सतिगुरू का डर हृदय में बसा (भाव।अदब में आ) सतिगुरू के अदब में रहके कितने ही पार हो गए।(कितनों ने ही) भय में रह के निर्भय प्रभू को पा लिया। (हे शेख !) अपने कठोर मन को (मन।जो हठ के कारण कठोर है) सतिगुरू के शबद से भेद दे ता कि आपके मन में शांति और ठंड आ के बसे। फिर इस में (भजन बंदगी वाली) जो कार करेगा।मालिक उसे कबूल करेगा। हे नानक ! किसी ज्ञान वाले को जा के पूछ ले।काम और क्रोध (आदि विकारों) के अधीन होने से किसी को भी ईश्वर नहीं मिलता। 1।
मः 3 ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “खुद ही जल देता है और छिंगा भी खुद देता है और खुद ही चुल्ली करवाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।