रागु बिहागड़ा चउपदे महला 5 घरु 2 ॥
दूतन संगरीआ ॥
भुइअंगनि बसरीआ ॥
अनिक उपरीआ ॥1॥
तउ मै हरि हरि करीआ ॥
तउ सुख सहजरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
मिथन मोहरीआ ॥ अन कउ मेरीआ ॥
विचि घूमन घिरीआ ॥2॥
सगल बटरीआ ॥
बिरख इक तरीआ ॥
बहु बंधहि परीआ ॥3॥
थिरु साध सफरीआ ॥
जह कीरतनु हरीआ ॥
नानक सरनरीआ ॥4॥1॥
रागु बिहागड़ा महला 9 ॥
हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥
जोगी जती तपी पचि हारे अरु बहु लोग सिआने ॥1॥ रहाउ ॥
छिन महि राउ रंक कउ करई राउ रंक करि डारे ॥
रीते भरे भरे सखनावै यह ता को बिवहारे ॥1॥
अपनी माइआ आपि पसारी आपहि देखनहारा ॥
नाना रूपु धरे बहु रंगी सभ ते रहै निआरा ॥2॥
अगनत अपारु अलख निरंजन जिह सभ जगु भरमाइओ ॥
सगल भरम तजि नानक प्राणी चरनि ताहि चितु लाइओ ॥3॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ मेरी जिंदुड़ीए गुरमुखि नामु अमोले राम ॥
हरि रसि बीधा हरि मनु पिआरा मनु हरि रसि नामि झकोले राम ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।