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अंग 553

अंग
553
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Bhai Mardana
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिना आपे गुरमुखि दे वडिआई से जन सची दरगहि जाणे ॥11॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: जिन गुरमुखों को आप खुद आदर देता है।वह सच्ची दरगाह में प्रगट हैं जाते हैं। 11।
सलोकु मरदाना 1 ॥
कलि कलवाली कामु मदु मनूआ पीवणहारु ॥
क्रोध कटोरी मोहि भरी पीलावा अहंकारु ॥
मजलस कूड़े लब की पी पी होइ खुआरु ॥
करणी लाहणि सतु गुड़ु सचु सरा करि सारु ॥
गुण मंडे करि सीलु घिउ सरमु मासु आहारु ॥
गुरमुखि पाईऐ नानका खाधै जाहि बिकार ॥1॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक मरदाना 1॥ कलियुगी स्वभाव (जैसे) (शराब निकालने वाली) मट्टी है; काम (मानो) शराब है और इसको पीने वाला (मनुष्य का) मन है। मोह से भरी हुई क्रोध की (जैसे) कटोरी है और अहंकार (जैसे) पिलाने वाला है। झूठ और लालच की (मानो) मजलिस है (जिसमें बैठ के) मन (काम की शराब को) पी पी के ख्वार होता है। (पर इसके उलट।हे मनुष्य ! आप) सद् कर्मों को (शराब निकालने वाली) लाहण।सच के बोलों को गुड़ बना और सच्चे नाम को शराब बना। गुणों को रोटी।शील स्वभाव को घी और शर्म को मास– (ये सारी) खुराक बना। हे नानक ! ये ख़ुराक सतिगुरू के सन्मुख होने से मिलती है और इसके खाने से सारे विकार दूर हो जाते हैं। 1।
मरदाना 1 ॥
काइआ लाहणि आपु मदु मजलस त्रिसना धातु ॥
मनसा कटोरी कूड़ि भरी पीलाए जमकालु ॥
इतु मदि पीतै नानका बहुते खटीअहि बिकार ॥
गिआनु गुड़ु सालाह मंडे भउ मासु आहारु ॥
नानक इहु भोजनु सचु है सचु नामु आधारु ॥2॥
कांयां लाहणि आपु मदु अंम्रित तिस की धार ॥
सतसंगति सिउ मेलापु होइ लिव कटोरी अंम्रित भरी पी पी कटहि बिकार ॥3॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: मरदाना 1 ॥ शरीर जैसे (शराब निकालने वाली सामग्री समेत) मट्टी है।अहंकार शराब।और तृष्णा में भटकना (जैसे) महफिल है। झूठ से भरी हुई वासना (मानो) कटोरी है और जम काल (जैसे) पिलाता है। हे नानक ! इस शराब के पीने से बहुत सारे विकार कमाए जाते हैं (भाव।अहंकार।तृष्णा झूठ आदि के कारण विकार ही विकार पैदा हो रहे हैं)। प्रभू का ज्ञान (जैसे) गुड़ हो।सिफत सालाह रोटियां।(प्रभू का) भय माँस – ये खुराक हो। हे नानक ! ये भोजन सच्चा है।क्योंकि सच्चा नाम ही (जिंदगी का) आसरा हो सकता है। 2। (अगर) शरीर मट्टी हो।स्वै का पहचान शराब और उसकी धार (भाव।जिसकी धार) अमर करने वाली हो। सत्संगति से मेल हो (भाव।मजलिस सत्संगति की हो)।अमृत (नाम) की भरी हुई चिंतन (रूपी) कटोरी हो।(तो ही मनुष्य) (इस शराब को) पी-पी के सारे विकार-पाप दूर करते हैं। 3॥
पउड़ी ॥
आपे सुरि नर गण गंधरबा आपे खट दरसन की बाणी ॥
आपे सिव संकर महेसा आपे गुरमुखि अकथ कहाणी ॥
आपे जोगी आपे भोगी आपे संनिआसी फिरै बिबाणी ॥
आपै नालि गोसटि आपि उपदेसै आपे सुघड़ु सरूपु सिआणी ॥
आपणा चोजु करि वेखै आपे आपे सभना जीआ का है जाणी ॥12॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू खुद ही देवता।मनुष्य।(शिव जी के) गण।गंधर्व (देवताओं के रागी)।और खुद ही छे दर्शनों की बोली (बनाने वाला) है। खुद ही शिव।शंकर और महेश (का कर्ता) है।खुद ही गुरू के सन्मुख हो के अपने अकथ स्वरूप की महिमाएं (करता है)। खुद ही योग साधना करने वाला है।खुद ही भोगों में प्रवृक्त है और खुद ही जोगी बन के उजाड़ों में फिरता है। खुद ही अपने साथ चर्चा करता है।खुद ही उपदेश करता है।खुद ही सद्-बुद्धि वाला सुंदर स्वरूप वाला है। अपने करिश्में करके खुद ही देखता है और खुद ही सारे जीवों के दिलों की जानने वाला है। 12।
सलोकु मः 3 ॥
एहा संधिआ परवाणु है जितु हरि प्रभु मेरा चिति आवै ॥
हरि सिउ प्रीति ऊपजै माइआ मोहु जलावै ॥
गुर परसादी दुबिधा मरै मनूआ असथिरु संधिआ करे वीचारु ॥
नानक संधिआ करै मनमुखी जीउ न टिकै मरि जंमै होइ खुआरु ॥1॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ वही संध्या कबूल है जिस से प्यारा प्रभू हृदय में बस जाए। प्रभू से प्यार पैदा हो जाए और माया का मोह जल जाए। सतिगुरू की कृपा से जिस मनुष्य की दुविधा दूर हो।मन ठहर जाए।वह संध्या की (सच्ची) विचार करता है। हे नानक ! मनमुख संध्या करता है।(पर) उसका मन नहीं टिकता (इस वास्ते) वह पैदा होता व मरता है और ख्वार होता है। 1।
मः 3 ॥
प्रिउ प्रिउ करती सभु जगु फिरी मेरी पिआस न जाइ ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ मेरी पिआस गई पिरु पाइआ घरि आइ ॥2॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ ‘प्यारा प्यारा’ कूकती मैं सारा संसार फिरती रही।पर मेरी प्यास दूर नहीं हुई। हे नानक ! सतिगुरू को मिल के मेरी प्यास बुझ गई है।घर में आ के प्यारा पति मिल गया है। 2।
पउड़ी ॥
आपे तंतु परम तंतु सभु आपे आपे ठाकुरु दासु भइआ ॥
आपे दस अठ वरन उपाइअनु आपि ब्रहमु आपि राजु लइआ ॥
आपे मारे आपे छोडै आपे बखसे करे दइआ ॥
आपि अभुलु न भुलै कब ही सभु सचु तपावसु सचु थिआ ॥
आपे जिना बुझाए गुरमुखि तिन अंदरहु दूजा भरमु गइआ ॥13॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ छोटी तार (भाव।जीव) बड़ी तार (भाव।परमेश्वर) – सब कुछ प्रभू खुद ही है।खुद ही ठाकुर और खुद ही दास है। प्रभू ने खुद ही अठारह वर्ण बनाए।खुद ही ब्रहम है और खुद ही (सृष्टि का) राज उसने लिया है। (जीवों को) वह खुद ही मारता है खुद ही छोड़ता है।खुद ही बख्शता है और खुद ही मेहर करता है। प्रभू स्वयं अभॅुल है।कभी भूलता नहीं।उसका इन्साफ भी निरोल सच है। सतिगुरू के द्वारा जिनको स्वयं समझा देता है उनके हृदय में से माया की भटकना दूर हो जाती है। 13।
सलोकु मः 5 ॥
हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥
जिनि कीती तिसै न जाणई नानक फिटु अलूणी देह ॥1॥
भाई मरदाना गुरु नानक के अभिन्न साथी थे, रबाब बजाने वाले, धर्म से मुसलमान। पैदल यात्राओं में नानक के साथ-साथ चलते रहे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जो मनुष्य साध-संगति में हरी का नाम नहीं सिमरते।उनके शरीर पर राख पड़ती है (भाव।उनके शरीर धिक्कारे जाते हैं)। हे नानक ! प्रेम से विहीन उस शरीर को धिक्कार है।जो उस प्रभू को नहीं पहचानता जिसने उसको बनाया है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन गुरमुखों को आप खुद आदर देता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।