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अंग 550

अंग
550
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अनदिनु सहसा कदे न चूकै बिनु सबदै दुखु पाए ॥
कामु क्रोधु लोभु अंतरि सबला नित धंधा करत विहाए ॥
चरण कर देखत सुणि थके दिह मुके नेड़ै आए ॥
सचा नामु न लगो मीठा जितु नामि नव निधि पाए ॥
जीवतु मरै मरै फुनि जीवै तां मोखंतरु पाए ॥
धुरि करमु न पाइओ पराणी विणु करमा किआ पाए ॥
गुर का सबदु समालि तू मूड़े गति मति सबदे पाए ॥
नानक सतिगुरु तद ही पाए जां विचहु आपु गवाए ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (जिस कारण) हर रोज किसी भी वक्त उसकी चिंता दूर नहीं होती।(और वह) शबद (का आसरा लिए) बिना दुख पाता है। मूर्ख के हृदय में काम।क्रोध और लोभ प्रबल है।और सदा धंधे करते हुए उम्र गुजरती है। पैर।हाथ।(आँखें) देख-देख के और (कान) सुन-सुन के थक गए हैं।(उम्र के) दिन गुजर गए हैं।(मरने के दिन नजदीक आ गए हैं)। जिस नाम के माध्यम से नौ निधियाँ प्राप्त हो जाएं वह सच्चा नाम (मूर्ख को) अच्छा नहीं लगता। (लगे भी कैसे।) (संसार में) कार-व्यवहार करता हुआ (जो।संसार से) मुर्दा हो जाए (इस तरह) मर के फिर (हरी की याद में) पुनर्जीवित (चैतन्य) हो।तो ही मुक्ति का भेद मिलता है। पर जिस मनुष्य को धुर से ही परमात्मा की कृपा नसीब ना हुई हो।वह (पिछले अच्छे संस्कारों वाले) कामों के बिना (अब बंदगी वाले संस्कार) कैसे पाए। हे मूर्ख ! सतिगुरू के शबद को (हृदय में) सम्भाल (क्योंकि) ऊँची आत्मिक अवस्था और भली मति शबद से ही मिलती है। (पर) हे नानक ! सतिगुरू भी तभी मिलता है जब मनुष्य हृदय में से अहंकार दूर करता है। 2।
पउड़ी ॥
जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥
हरि सुखदाता सभना गला का तिस नो धिआइदिआ किव निमख घड़ी मुहु मोड़ीऐ ॥
जिनि हरि धिआइआ तिस नो सरब कलिआण होए नित संत जना की संगति जाइ बहीऐ मुहु जोड़ीऐ ॥
सभि दुख भुख रोग गए हरि सेवक के सभि जन के बंधन तोड़ीऐ ॥
हरि किरपा ते होआ हरि भगतु हरि भगत जना कै मुहि डिठै जगतु तरिआ सभु लोड़ीऐ ॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य के हृदय में प्यारा प्रभू निवास करे।उसे किसी बात की चिंता नहीं रह जातीं प्रभू हर किस्म के सुख देने वाला है।उसका सिमरन किए बिना एक छिन भर भी नहीं रहना चाहिए। जिस मनुष्य ने हरी को सिमरा है।उसे सारे सुख प्राप्त होते हैं।(इस वास्ते) सदा साध-संगति में ही बैठना चाहिए और (प्रभू के गुणों के बारे में) विचार करनी चाहिए। हरी के भक्त के सारे कलेश।भूख व रोग दूर हो जाते हैं।और सारे बंधन टूट जाते हैं। (क्योंकि) हरी का भक्त हरी की अपनी कृपा से बनता है।चाहिए तो ये कि हरी के भक्तों के दर्शन करके (भाव।उनकी संगति में रह के) सारा संसार ही तैर जाए (पर।अफसोस।संसार इस राह पर चलता ही नहीं)। 4।
सलोक मः 3 ॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का सुआउ न पाइआ ॥
नानक रसना सबदि रसाइ जिनि हरि हरि मंनि वसाइआ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ जिस जीभ ने हरी (के नाम) का स्वाद नहीं चखा।वह जीभ जल जाए (भाव।वह जीभ किसी काम की नहीं); हे नानक ! वह जीभ गुरू के शबद में रस जाती है जिस (जीभ) ने परमात्मा मन में बसाया है।
मः 3 ॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का नाउ विसारिआ ॥
नानक गुरमुखि रसना हरि जपै हरि कै नाइ पिआरिआ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ जिस जीभ ने हरी का नाम विसारा है।वह जीभ जल जाए। हे नानक ! (दरअसल) सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य की जीभ (ही) हरी का नाम जपती है हरी के नाम से प्यार करती है। 2।
पउड़ी ॥
हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥
हरि आपे वेखै विगसै आपे जितु भावै तितु लाए ॥
हरि इकना मारगि पाए आपे हरि इकना उझड़ि पाए ॥
हरि सचा साहिबु सचु तपावसु करि वेखै चलत सबाए ॥
गुर परसादि कहै जनु नानकु हरि सचे के गुण गाए ॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू खुद ही ठाकुर।खुद ही सेवक और भक्त है।स्वयं ही करता है और स्वयं (जीवों से) करवाता है। खुद ही देखता है।खुद ही प्रसन्न होता है।जिधर चाहता है उधर (जीवों को) लगाता है। इन्हें खुद ही सीधे रास्ते पर डालता है।और इनको खुद ही गलत राह पर चला देता है। हरी सच्चा मालिक है।उसका न्याय भी अभॅुल है।वह स्वयं ही सारे तमाशे करके देख रहा है। दास नानक कहता है कि सतिगुरू की मेहर से (ही मनुष्य ऐसे) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के गुण गाता है। 5।
सलोक मः 3 ॥
दरवेसी को जाणसी विरला को दरवेसु ॥
जे घरि घरि हंढै मंगदा धिगु जीवणु धिगु वेसु ॥
जे आसा अंदेसा तजि रहै गुरमुखि भिखिआ नाउ ॥
तिस के चरन पखालीअहि नानक हउ बलिहारै जाउ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ कोई विरला फ़कीर ही फकीरी (के आदर्श) को समझता है। (फ़कीर हो के) अगर घर घर माँगता फिरे।तो उसके जीने को धिक्कार है और उसके (फकीरी) भेष को भी धिक्कार है। अगर (दरवेश हो के) आशा और चिंता को त्याग दे तो सतिगुरू के सन्मुख रह के नाम की भिक्षा मांगे।तो। हे नानक ! मैं उससे सदके हूँ।उसके चरण धोने चाहिए। 1।
मः 3 ॥
नानक तरवरु एकु फलु दुइ पंखेरू आहि ॥
आवत जात न दीसही ना पर पंखी ताहि ॥
बहु रंगी रस भोगिआ सबदि रहै निरबाणु ॥
हरि रसि फलि राते नानका करमि सचा नीसाणु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हे नानक ! (संसार एक) वृक्ष (के समान है।इस वृक्ष) पर (माया के मोह रूपी) एक फल (लगा हुआ है)।(इस पेड़ पर ही) दो (किस्म के।गुरमुख और मनमुख) पक्षी (बैठे) हैं। इन पक्षियों के पंख नहीं हैं और वे आते-जाते दिखते भी नहीं (भाव।ये पता नहीं चलता कि ये जीव पक्षी कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं)। बहुत सारे तो रंग (-तमाशें में स्वाद लेने) वाले हैं (जो) रसों के भोग में (गलतान) हैं और निर्वाण (पक्षी) शबद में (लीन) रहते हैं। हे नानक ! हरी की कृपा से (जिनके माथे पर) सच्चा निशान है।वे नाम के रस (रूपी) फल (के स्वाद) में मस्त हैं। 2।
पउड़ी ॥
आपे धरती आपे है राहकु आपि जंमाइ पीसावै ॥
आपि पकावै आपि भांडे देइ परोसै आपे ही बहि खावै ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू स्वयं ही जमीन है स्वयं ही उसे जोतने वाला है।स्वयं ही (अन्न) उगाता है और स्वयं ही पिसवाता है। खुद पकाता है और खुद ही बर्तन दे के परोसता है और खुद ही बैठ के खाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जिस कारण) हर रोज किसी भी वक्त उसकी चिंता दूर नहीं होती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।