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अंग 540

अंग
540
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक हरि जपि सुखु पाइआ मेरी जिंदुड़ीए सभि दूख निवारणहारो राम ॥1॥
सा रसना धनु धंनु है मेरी जिंदुड़ीए गुण गावै हरि प्रभ केरे राम ॥
ते स्रवन भले सोभनीक हहि मेरी जिंदुड़ीए हरि कीरतनु सुणहि हरि तेरे राम ॥
सो सीसु भला पवित्र पावनु है मेरी जिंदुड़ीए जो जाइ लगै गुर पैरे राम ॥
गुर विटहु नानकु वारिआ मेरी जिंदुड़ीए जिनि हरि हरि नामु चितेरे राम ॥2॥
ते नेत्र भले परवाणु हहि मेरी जिंदुड़ीए जो साधू सतिगुरु देखहि राम ॥
ते हसत पुनीत पवित्र हहि मेरी जिंदुड़ीए जो हरि जसु हरि हरि लेखहि राम ॥
तिसु जन के पग नित पूजीअहि मेरी जिंदुड़ीए जो मारगि धरम चलेसहि राम ॥
नानकु तिन विटहु वारिआ मेरी जिंदुड़ीए हरि सुणि हरि नामु मनेसहि राम ॥3॥
धरति पातालु आकासु है मेरी जिंदुड़ीए सभ हरि हरि नामु धिआवै राम ॥
पउणु पाणी बैसंतरो मेरी जिंदुड़ीए नित हरि हरि हरि जसु गावै राम ॥
वणु त्रिणु सभु आकारु है मेरी जिंदुड़ीए मुखि हरि हरि नामु धिआवै राम ॥
नानक ते हरि दरि पैन॑ाइआ मेरी जिंदुड़ीए जो गुरमुखि भगति मनु लावै राम ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! परमात्मा का नाम जप के सुख मिल जाता है।हरि-नाम सारे दुख दूर करने की समर्था वाला है। 1। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! वह जीभ भाग्यशाली है।मुबारक है।जो (सदा) परमात्मा के गुण गाती रहती है। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! वे कान सुंदर हैं अच्छे हैं जो आपका कीर्तन सुनते रहते हैं। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! वह सिर भाग्यशाली है पवित्र है।जो गुरू के चरनों में आ लगता है। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! नानक (उस) गुरू से कुर्बान जाता है जिस ने (नानक को) परमात्मा का नाम याद कराया है। 2। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! वे आँखें भली हैं सफल हैं जो गुरू के दर्शन करती रहती हैं। वे हाथ पवित्र हैं जो परमात्मा की सिफत-सालाह लिखते रहते हैं। हे मेरी सोहणी जिंदे ! उस मनुष्य के (वह) पैर सदा पूजे जाते हैं जो (पैर) धर्म के राह पर चलते रहते हैं। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! नानक उन (भाग्यशाली) मनुष्यों से कुर्बान जाता है जो परमात्मा का नाम सुन के नाम को मानते हैं (जीवन का आधार बना लेते हैं)। 3। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! धरती।पाताल।आकाश- हरेक ही परमात्मा का नाम सिमर रहा है। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! हवा।पानी।आग- हरेक तत्व भी परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा रहा है। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! जंगल।घास।ये सारा दिखता संसार – अपने मुँह से हरेक ही परमात्मा का नाम जप रहा है। हे नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! जो जो जीव गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति में अपना मन जोड़ते हैं।वे सारे परमात्मा के दर पर सम्मानित किए जाते हैं। 4। 4।
बिहागड़ा महला 4 ॥
जिन हरि हरि नामु न चेतिओ मेरी जिंदुड़ीए ते मनमुख मूड़ इआणे राम ॥
जो मोहि माइआ चितु लाइदे मेरी जिंदुड़ीए से अंति गए पछुताणे राम ॥
हरि दरगह ढोई ना लहनि॑ मेरी जिंदुड़ीए जो मनमुख पापि लुभाणे राम ॥
जन नानक गुर मिलि उबरे मेरी जिंदुड़ीए हरि जपि हरि नामि समाणे राम ॥1॥
सभि जाइ मिलहु सतिगुरू कउ मेरी जिंदुड़ीए जो हरि हरि नामु द्रिड़ावै राम ॥
हरि जपदिआ खिनु ढिल न कीजई मेरी जिंदुड़ीए मतु कि जापै साहु आवै कि न आवै राम ॥
सा वेला सो मूरतु सा घड़ी सो मुहतु सफलु है मेरी जिंदुड़ीए जितु हरि मेरा चिति आवै राम ॥
जन नानक नामु धिआइआ मेरी जिंदुड़ीए जमकंकरु नेड़ि न आवै राम ॥2॥
हरि वेखै सुणै नित सभु किछु मेरी जिंदुड़ीए सो डरै जिनि पाप कमते राम ॥
जिसु अंतरु हिरदा सुधु है मेरी जिंदुड़ीए तिनि जनि सभि डर सुटि घते राम ॥
हरि निरभउ नामि पतीजिआ मेरी जिंदुड़ीए सभि झख मारनु दुसट कुपते राम ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 4 ॥ हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! जिन मनुष्यों ने (कभी) परमात्मा का नाम याद नहीं किया।वह अपने ही मन के पीछे चलने वाले मनुष्य मूर्ख व अंजान हैं। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! जो मनुष्य माया के मोह में अपना मन जोड़े रखते हैं वह आखिरी समय में (यहाँ से) हाथ मलते हुए जाते हैं। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! अपने ही मन के पीछे चलने वाले जो मनुष्य (सदा) पाप कर्म में फंसे रहते हैं वे परमात्मा की दरगाह में आसरा प्राप्त नहीं कर सकते। हे दास नानक ! (कह) हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! गुरू को मिल के (अति भाग्यशाली मनुष्य संसार समुंद्र में डूबने से) बच जाते हैं (क्योंकि वे) परमात्मा का नाम जप जप के परमात्मा के नाम में ही मगन रहते हैं। 1। हे मेरी सोहणी जिंदे ! (कह) हे भाई ! सभी जा के गुरू को मिल लो क्योंकि वह (गुरू) परमात्मा का नाम हृदय में पक्का कर देता है। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! परमात्मा का नाम जपते हुए रक्ती भर भी देर नहीं करनी चाहिए।क्या पता ! अगला श्वास लिया जाय कि ना लिया जाए। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! वह वक्त भाग्यशाली है।वह घड़ी भाग्य भरपूर है।वह समय भाग्यशाली है।जिस समय प्यारा परमात्मा चित्त में आ बसता है। हे दास नानक ! (कह) हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम (हर समय) सिमरा है।जम दूत उसके नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर उसको छू नहीं सकता।उसे आत्मिक मौत नहीं आती)। 2। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! (जो काम हम करते हैं।जो बोल हम बोलते हैं) परमात्मा वह सब कुछ सदा देखता रहता है।जिस मनुष्य ने (सारी उम्र) पाप कमाए होते हैं।वह डरता है। (पर) हे मेरी सोहणी जिंदे ! जिस (मनुष्य) का अंदरूनी हृदय पवित्र है।उस मनुष्य ने सारे डर उतार दिए होते हैं। जो मनुष्य निर्भय परमात्मा के नाम में पतीज जाता है।(कामादिक) सारे झगड़ालू वैरी बेशक रहें झख मारते (उस मनुष्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकते)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! परमात्मा का नाम जप के सुख मिल जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।