रामचरितमानस के सात सोपानों में सुन्दरकाण्ड अकेला ऐसा है जिसमें नायक राम नहीं, हनुमान हैं। साठ दोहों का यह काण्ड घरों में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाता है, और इसकी वजह सिर्फ़ श्रद्धा नहीं है: इसमें कथा तेज़ चलती है, संवाद छोटे और नुकीले हैं, और बीच-बीच में तुलसीदास वे पंक्तियाँ रख देते हैं जो आगे चलकर मुहावरे बन गयीं।
यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। मूल चौपाई और दोहा जैसे गीता प्रेस के पाठ में छपे हैं, वैसे ही दिये गये हैं, और उनके साथ वह कथा है जो उन्हें खोलती है। पहली बार पढ़ रहे हों तो अशोक वाटिका या लंकादहन से शुरू कीजिए।
प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए
- समुद्र-लंघनदोहा १ से २
एक हाथ का स्पर्श और विश्राम से इनकार, बीच आकाश में देवताओं की भेजी हुई एक परीक्षा, योजनों में बढ़ता हुआ मुख, और उसके सामने अचानक बहुत छोटी हो गई एक देह। - लंका-प्रवेश और विभीषणदोहा ३ से ७
सोने का परकोटा, द्वार पर खड़ी लंकिनी, एक घूँसा, और उस पूरे नगर में वह अकेला घर जिसके आँगन में नई तुलसी लगी थी। - अशोक वाटिकादोहा ८ से ११
लंका के बीचोंबीच एक बाग़ है जहाँ रावण तलवार खींचकर खड़ा होता है, और उसके सामने बैठी स्त्री एक तिनके की आड़ करके उत्तर देती हैं। - मुद्रिका और संदेशदोहा १२ से १७
जिस रात जानकी आग माँग रही थीं, ऊपर से एक अँगूठी गिरी, और उस अँगूठी से लेकर भरोसे तक का रास्ता तुलसीदास पूरी सावधानी से तय कराते हैं। - वाटिका-भंग और रावण की सभादोहा १८ से २३
अनुमति फल तक की थी, और पेड़ भी टूटे। फिर दल आये, मेघनाद आया, ब्रह्मास्त्र आया, और बँधा हुआ दूत लंका की सभा में खड़ा होकर बोला। - लंकादहनदोहा २४ से २७
पूँछ में बाँधी गयी आग, उनचास पवन, और उसी जलते हुए नगर के बीच खड़ा वह एक घर जिसे आग ने छुआ तक नहीं। - एक चूड़ामणि, और वह बात जो बिना कहे ही भली थीदोहा २८ से ३४
मधुवन उजड़ा, सुग्रीव समझ गये, और स्फटिक शिला पर बैठे प्रभु ने वह प्रश्न पूछा जिसका उत्तर हनुमान ने आँसुओं में डूबकर दिया - एक लात, और वह छाती जो खुली रहीदोहा ३५ से ४९
रावण की भरी सभा में विभीषण ने वही कहा जो हित का था, बदले में चरण का प्रहार पाया, और समुद्र के इस पार उन्हें वह छाती मिली जिसका द्वार शरणागत के लिये कभी बन्द नहीं होता - सेतु और सागरदोहा ५० से ६०
लक्ष्मण कहते थे समुद्र सुखा दीजिये, राम तीन दिन कुश पर बैठे रहे, और अन्त में पानी ने ख़ुद अपने बँधने का उपाय बताया।
यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं
इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है, और दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं होगा। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। जहाँ यहाँ कुछ कहा गया है, वह तुलसी का कहा हुआ है।
और अन्त में, अपनी ओर
सुन्दरकाण्ड की सबसे बड़ी सीख उसके सबसे शान्त हिस्से में है। हनुमान लंका जलाकर लौटते नहीं, लौटकर पहले जानकी जी के सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। और जब राम उनसे कहते हैं कि तुम्हारे समान उपकारी कोई नहीं, तो वे इतना ही कहते हैं कि इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं।
आधार: श्रीरामचरितमानस, पञ्चम सोपान (सुन्दरकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण; हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।