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रामचरितमानस के सात सोपानों में सुन्दरकाण्ड अकेला ऐसा है जिसमें नायक राम नहीं, हनुमान हैं। साठ दोहों का यह काण्ड घरों में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाता है, और केवल श्रद्धा के कारण नहीं। इसकी कथा तेज़ चलती है, संवाद छोटे और नुकीले हैं, और इसकी कई पंक्तियाँ आगे चलकर मुहावरे बन गयीं।
यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। उसकी हिन्दी कथा गीता प्रेस के पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के सहारे लिखी गयी है। पहली बार पढ़ रहे हों तो अशोक वाटिका या लंकादहन से शुरू कीजिए।

प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए
- समुद्र-लंघनदोहा 1 से 2
मैनाक को हाथ से छूकर विश्राम से इनकार। फिर बीच आकाश में देवताओं की भेजी सुरसा, योजनों में बढ़ता उसका मुख, और उसके सामने हनुमान का अचानक बहुत छोटा हो जाना। - लंका-प्रवेश और विभीषणदोहा 3 से 7
सोने का परकोटा, द्वार पर खड़ी लंकिनी, एक घूँसा, और नगर के भीतर विभीषण का घर, जिसके आँगन में नई तुलसी लगी थी। - अशोक वाटिकादोहा 8 से 11
लंका के भीतर एक बाग़ है जहाँ रावण तलवार खींचकर खड़ा होता है। उसके सामने बैठी स्त्री एक तिनके की आड़ करके उत्तर देती हैं। - मुद्रिका और संदेशदोहा 12 से 17
जिस रात सीता आग माँग रही थीं, ऊपर से राम की अँगूठी गिरी। उस अँगूठी से भरोसे तक की बात तुलसीदास धीरे-धीरे कहते हैं। - वाटिका-भंग और रावण की सभादोहा 18 से 23
अनुमति फल खाने की थी, पेड़ भी टूटे। फिर राक्षसों के दल आये, मेघनाद आया, ब्रह्मास्त्र चला, और बँधे हुए हनुमान ने रावण की सभा में खड़े होकर अपनी बात कही। - लंकादहनदोहा 24 से 27
पूँछ में बाँधी गयी आग, उनचास पवन, और जलते नगर में विभीषण का वह एक घर जिसे आग ने छुआ तक नहीं। - एक चूड़ामणि, और वह बात जो बिना कहे ही भली थीदोहा 28 से 34
मधुवन उजड़ा, सुग्रीव समझ गये कि काम हो गया। स्फटिक शिला पर बैठे राम ने वह प्रश्न पूछा जिसके उत्तर में हनुमान ने सीता के आँसुओं की बात कही। - एक लात, और वह छाती जो खुली रहीदोहा 35 से 49
रावण की भरी सभा में विभीषण ने वही कहा जो हित का था, बदले में लात खायी। समुद्र के इस पार राम ने उन्हें गले लगाकर शरण दी। - सेतु और सागरदोहा 50 से 60
लक्ष्मण कहते थे समुद्र सुखा दीजिये, राम तीन दिन कुश पर बैठकर विनती करते रहे। अन्त में समुद्र ने ख़ुद अपने ऊपर पुल बँधने का उपाय बताया।
यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं
इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है, पर दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। इन पन्नों पर जो कहा गया है, वह तुलसी का कहा हुआ है।
बड़ाई से इनकार
सुन्दरकाण्ड की सबसे बड़ी सीख उसके सबसे शान्त हिस्से में है। हनुमान लंका जलाकर सीधे नहीं लौटते। पूँछ बुझाकर और छोटा रूप धरकर पहले सीता के सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। और जब राम उनसे कहते हैं कि आपके समान उपकारी कोई नहीं, तो वे इतना ही कहते हैं कि इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं।
आधार: श्रीरामचरितमानस, पञ्चम सोपान (सुन्दरकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।