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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 5
वाटिका-भंग और रावण की सभा
अनुमति फल खाने की थी, पेड़ भी टूटे। फिर राक्षसों के दल आये, मेघनाद आया, ब्रह्मास्त्र चला, और बँधे हुए हनुमान ने रावण की सभा में खड़े होकर अपनी बात कही।
अशोक वाटिका में अभी-अभी एक अनुमति दी गयी है। सीता ने हनुमान से कहा है कि जाइये, राम के चरण हृदय में रखकर मीठे फल खा लीजिये। अनुमति मिलते ही वे सिर नवाकर चल देते हैं। आगे का आधा काम अनुमति के भीतर है, आधा बाहर। फल खाना भीतर की बात थी, पेड़ तोड़ना बाहर की।
यहीं से वह हिस्सा खुलता है जिसमें एक अकेला दूत लंका की पूरी व्यवस्था को बारी-बारी से अपने सामने बुला लेता है। पहले बाग़ के रखवाले, फिर रावण के भेजे योद्धाओं का दल, फिर अक्षयकुमार, फिर मेघनाद। अक्षयकुमार तक हर बार वही होता है। फिर एक ऐसा अस्त्र चलता है जिसके सामने हनुमान हारते नहीं, उसे मान लेते हैं। तुलसीदास यह अन्तर खोलकर रखते हैं, और पूरा प्रसंग इसी पर टिका है। बँधकर वे रावण की सभा तक पहुँचते हैं, और वहाँ बोलते हैं।
उजड़ा बाग, बँधा दूत
- हनुमान: पवन के पुत्र, राम के दूत, जो बाग़ उजाड़ते हैं और सभा में विनती करते हैं।
- रावण: जो हँसता भी है, पुत्र का शोक भी करता है, और सीख नहीं लेता।
- अक्षयकुमार: रावण का पुत्र, जो असंख्य योद्धाओं को साथ लेकर आता है।
- मेघनाद: रावण का पुत्र, अतुलनीय योद्धा, जिसे तुलसी यहाँ इन्द्र को जीतनेवाला कहते हैं। उसे हनुमान को बाँधकर लाने का आदेश मिलता है।
- बाग़ के रखवाले और राक्षस: जो लड़ते हैं, और जो बचकर रावण के पास पुकार करने लौटते हैं।
- देवता और दिक्पाल: सभा में हाथ जोड़े खड़े, डर से रावण की भौं ताकते हुए।
- शिव और पार्वती: जिनके बीच यह कथा कही जा रही है। शिव ही बन्धन का भेद खोलते हैं।
- सीता: जिन्हें, पोद्दार की टीका के अनुसार, सिर नवाकर हनुमान बाग़ की ओर चलते हैं, और जिन्हें लौटाने की माँग वे सभा में रखते हैं।
- राम: जिनका बल हनुमान सभा के बीच खड़े होकर गिनाते हैं।
सिर नवाकर, बाग में
प्रसंग अनुमति के पालन से शुरू होता है, और ज़रा सी देर में उससे आगे निकल जाता है।
पहले चार काम एक के बाद एक होते हैं: सिर नवाकर चले, बाग़ में घुसे, फल खाये, और पेड़ तोड़ने लगे। अनुमति तीसरे काम तक की थी। चौथा किसी आदेश से नहीं, भीतर से आया।
बाग़ सूना नहीं था, बहुत से योद्धा रखवाली पर थे। उनका हाल तुलसी झट से कह देते हैं: कुछ मारे गये, कुछ ने जाकर रावण से पुकार की। आगे के दलों का भी यही ढाँचा रहेगा, कुछ वहीं रह जायेंगे और कुछ ख़बर लेकर लौटेंगे, तभी तो बात रावण तक पहुँचेगी।
आगे तुलसी ख़ुद नहीं बताते, रखवालों से कहलवाते हैं: हे नाथ, एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली, फल खाये, पेड़ उखाड़ डाले, और रखवालों को मसल-मसलकर ज़मीन पर डाल दिया। लंका को इस दूत का पहला परिचय हारे हुए पहरेदारों के मुँह से मिलता है।
रावण के भेजे हुए योद्धा
सुनकर रावण का पहला उत्तर संख्या है।
उसने बहुत से योद्धा भेजे। इसमें कोई योजना नहीं, केवल गिनती है। उन्हें देखकर हनुमान गरजे। वे हटे नहीं, छिपे नहीं, घात नहीं लगायी। जिस बाग़ में वे चुपके से आये थे, उसमें अब आवाज़ देकर खड़े हैं।
फिर पल भर में सारा युद्ध हो जाता है: उन्होंने सब राक्षस मार डाले, और कुछ अधमरे चिल्लाते हुए लौटे। तुलसी इन अधमरों को बचा रहने देते हैं, क्योंकि कोई न बचे तो लंका को पता कैसे चले।
अक्षयकुमार, और धूल में मिला हुआ दल
अब रावण अपना पुत्र भेजता है, और साथ में सेना।
फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा, और वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। हनुमान का पहला काम यहाँ मारना नहीं है। उसे आते देखकर उन्होंने एक वृक्ष हाथ में लेकर ललकारा। ललकार पहले, प्रहार बाद में, और आगे सभा में यही दूत कहेगा कि जिन्होंने उसे मारा, उन्हीं को उसने मारा।
फिर उसे मारकर हनुमान ने बड़े ज़ोर से गर्जना की। रावण का पुत्र गिर चुका है।
सेना का हिसाब तीन क्रियाओं में है: कुछ मारे गये, कुछ मसल दिये गये, और कुछ को पकड़-पकड़कर धूल में मिला दिया गया। बचे हुए लौटकर इस बार केवल ख़बर नहीं, एक आकलन लाते हैं: हे प्रभु, बंदर बहुत ही बलवान है। अब यह बात लंका ख़ुद मान रही है।
मारना नहीं, बाँध लाना
पुत्र के मारे जाने की ख़बर सुनकर रावण जो आदेश देता है, वही इस प्रसंग को मोड़ देता है।
पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हुआ और उसने बलवान मेघनाद को भेजा। यहाँ तक सब अपेक्षित है। आगे का आदेश नहीं।
हे पुत्र, मारियेगा नहीं, उसे बाँध लाइयेगा, देखा जाय कि यह बंदर कहाँ का है। जिस पिता का एक बेटा अभी मारा गया है, वह वध का नहीं, पूछताछ का आदेश दे रहा है। रावण जानना चाहता है।
तुलसी इस पर कुछ नहीं कहते। पर पाठक देखता है कि रावण ने अपने ही हाथ से वह द्वार खोल दिया है जिससे होकर राम का दूत उसकी सभा तक आयेगा और वहाँ बोलेगा।
दो गजराज भिड़ गये
मेघनाद के आने पर तुलसी दोनों पक्षों को बराबर का तौल देते हैं, फिर भी परिणाम वही निकलता है।
इन्द्र को जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला, भाई की मृत्यु सुनकर क्रोध से भरा। हनुमान ने भी देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है, और वे कटकटाकर गरजे और दौड़े। तुलसी मेघनाद को क्रोध देते हैं, और हनुमान को सामनेवाले की सही पहचान।
पहला प्रहार व्यक्ति पर नहीं, सवारी पर होता है। एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़कर उन्होंने मेघनाद को बिना रथ का कर दिया। साथ आये बड़े-बड़े योद्धाओं के लिये कोई अस्त्र नहीं उठाया, पकड़-पकड़कर अपने ही अंगों से उन्हें मसल दिया। यह याद रखने लायक़ है, क्योंकि सभा में जब पूछा जायेगा कि किसके बल पर, तब वे अपने देह का नाम नहीं लेंगे।
उन सबको मारकर वे फिर मेघनाद से भिड़े, मानो दो गजराज भिड़ गये हों। यह उपमा दोनों को एक ऊँचाई पर रखती है। हारनेवाले का अपमान इस प्रसंग में कहीं नहीं।
फिर हनुमान एक घूँसा मारकर पेड़ पर जा चढ़े, और मेघनाद को क्षण भर के लिये मूर्च्छा आ गयी। उन्होंने पीछा नहीं किया, ऊपर चढ़ गये। जो अवसर था, वह छोड़ दिया।
उठकर मेघनाद ने बहुत माया रची। तुलसी बात यहीं बन्द कर देते हैं: पवन के पुत्र उससे जीते नहीं जाते, न बल से, न छल से। इसके बाद ब्रह्मास्त्र आता है, क्योंकि बाक़ी सब चुक चुका है।
ब्रह्मास्त्र के सामने एक विचार
अब वह क्षण आता है जिस पर पूरा प्रसंग टिका है। अस्त्र का सन्धान पल भर का है, बाक़ी हनुमान के मन में बीतता है।
मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया, और तभी हनुमान ने मन में विचार किया। युद्ध रुक जाता है, एक विचार चलने लगता है। जिस क्षण में कोई सोचता नहीं, तुलसी ने उसी में सोचने की जगह बना दी।
विचार पूरा लिखा है: यदि मैं ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता, तो उसकी अपार महिमा मिट जायेगी। यहाँ तौल हनुमान की जान, उनकी प्रतिष्ठा, यहाँ तक कि उनके काम की भी नहीं हो रही। तौल ब्रह्मास्त्र की महिमा की है।
मानना यहाँ स्वीकार करना है। यह हार का नहीं, आदर का शब्द है। हारनेवाला मानता नहीं, उस पर बीतती है। यहाँ उल्टा है। बाण चल चुका है, और उसका असर होगा या नहीं, यह निर्णय उसके हाथ में है जिस पर वह चला है। और वे निर्णय अस्त्र के पक्ष में करते हैं।
इसका अर्थ यह भी है कि आगे का सारा बन्धन, सारी सभा और सारा अपमान हनुमान की सहमति से आ रहा है। ब्रह्मा का अस्त्र किसी पर निष्फल हो जाये तो संसार में उसका नाम घटेगा। उस नाम को बचाने की क़ीमत वे अपने देह से चुका रहे हैं।
जिसने अपने को बँधवाया
निर्णय के बाद भी तुलसी उनका बल ओझल नहीं होने देते। और ठीक वहीं कथा कहनेवाले शिव ख़ुद आगे आते हैं। वे पार्वती से एक प्रश्न पूछते हैं, जिसका उत्तर पूछने में ही रखा है।
मेघनाद ने हनुमान को ब्रह्मबाण मारा। पोद्दार की टीका खोलती है कि बाण लगते ही वे पेड़ से नीचे गिर पड़े, पर गिरते समय भी उन्होंने बहुत सी सेना मार डाली। गिरना और मारना साथ-साथ चल रहे हैं।
मेघनाद ने जब देखा कि वे मूर्च्छित हो गये हैं, तब उन्हें नागपाश से बाँधकर ले गया। बाँधना बेहोशी के बाद हुआ, होश में नहीं। तुलसी यह अन्तर छोड़ते नहीं।
शिव कहते हैं: हे पार्वती, सुनिये, जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य जन्म और मरण का बन्धन काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? पोद्दार इसे प्रश्न ही रहने देते हैं, क्योंकि उत्तर सुननेवाले के भीतर बन चुका होता है।
फिर वह बात जो इस बन्धन का ताला खोल देती है: राम के काम के लिये हनुमान ने ख़ुद अपने को बँधवा लिया। वे बँधे नहीं, उन्होंने अपने को बँधवाया। बाँधनेवाला मेघनाद था, बँधवानेवाले हनुमान हैं। रस्सी उसके हाथ में है, निर्णय इनका है।
रावण की सभा, और साँपों के बीच गरुड़
अब दृश्य बदलता है। बन्दी को सभा में लाया जा रहा है, और सभा उसे देखने उमड़ पड़ी है।
बंदर का बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और तमाशा देखने सब सभा में आ गये।
पर अगले ही क्षण देखनेवाले और दिखाये जानेवाले की जगह बदल जाती है: हनुमान ने जाकर रावण की सभा देखी। जिसे देखने सब आये थे, वही देख रहा है। तुलसी उस सभा की शोभा घटाते नहीं, कहते हैं कि उसका ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। बड़ाई मान ली गयी है, तभी आगे की बात का मोल है।
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े, नम्र और भयभीत, रावण की भौं ताक रहे हैं। पोद्दार जोड़ते हैं कि वे उसका रुख देख रहे हैं। किसी को नहीं पता कि अगले क्षण क्या चाहा जायेगा, इसलिये सबकी नज़र उसके चेहरे पर है।
उसी सभा के बीच एक बँधा हुआ बंदर खड़ा है। उसके मन में यह प्रताप देखकर ज़रा भी डर नहीं, जैसे साँपों के समूह के बीच गरुड़ निडर रहता है। सारा दरबार साँपों का झुंड हो गया और बन्दी गरुड़। नागपाश से बँधे दूत के लिये इससे सटीक उपमा नहीं हो सकती थी।
अब रावण के भीतर दो चीज़ें एक के बाद एक आती हैं। हनुमान को देखकर वह दुर्वचन कहता हुआ ख़ूब हँसा, फिर पुत्र के वध की याद आयी और हृदय में विषाद उठा। हँसी पहले, शोक बाद में, और दोनों पास-पास। सभा का स्वामी अपने ही भीतर दो टुकड़ों में बँटा है।
रावण का प्रश्न
अब पूछताछ शुरू होती है, और रावण का प्रश्न ही उसके गले पड़ता है।
रावण पूछता है कि यह बंदर कौन है, और किसके बल पर उसने वन उजाड़कर नष्ट कर डाला। वह बल का स्रोत जानना चाहता है, और थोड़ी देर में उसे स्रोत इतने विस्तार से बताया जायेगा कि वह सुनना बन्द करना चाहेगा।
फिर वह अपना नाम बीच में रखता है: क्या इसने कभी उसका नाम कानों से नहीं सुना? यह प्रश्न नहीं, अपना परिचय है। और तुरन्त वह ख़ुद मान लेता है कि सामनेवाला डरा हुआ नहीं। वह उसे मूर्ख कहकर कहता है कि यह तो बहुत निडर दिखता है। दूसरे की निर्भयता पर टिप्पणी करना अपनी खीझ ही है।
आख़िरी दो प्रश्न धमकी बन जाते हैं: किस अपराध पर राक्षसों को मारा, और क्या इसे प्राण जाने का डर नहीं? इस पूरी पूछताछ में सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। उसने बंदर के बारे में पूछा, अपने नाम के बारे में, अपने राक्षसों के बारे में। उत्तर में उसे किसी और के बारे में सुनना पड़ेगा।
जिनका बल पाकर माया रचती है
हनुमान का उत्तर यहाँ से शुरू होता है, और देर तक उसमें राम का नाम नहीं आता। पहले काम गिनाये जाते हैं, नाम बाद में।
हे रावण, सुनिये: जिनका बल पाकर माया सारे ब्रह्माण्डों की रचना करती है। रावण ने बल के बारे में पूछा था, उत्तर उसी शब्द से शुरू होकर वहाँ तक जाता है जहाँ से सृष्टि निकलती है।
फिर तीन बड़े नाम, और तीनों का बल उधार का: जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु और शिव सृष्टि रचते, पालते और मिटाते हैं। और जिनके बल से हज़ार फनोंवाले शेष पर्वतों और वनों सहित सारा ब्रह्माण्ड सिर पर धरे हैं। यह सब रावण के अपने दरबार में, उसी से कहा जा रहा है।
यहाँ तक दर्शन था, अब इतिहास आता है: जो देवताओं की रक्षा के लिये तरह-तरह के देह धारण करते हैं। और उसी साँस में हनुमान भरी सभा में वह बात कह देते हैं जिसे कहकर लौटा नहीं जा सकता: वे आप जैसे मूर्खों को शिक्षा देनेवाले हैं। शिष्य कौन है, यह सभा का स्वामी ख़ुद समझ रहा है।
फिर वह धनुष आता है जिसे, जनक के भाटों के कहे अनुसार, रावण ख़ुद देखकर चुपके से चला गया था। जिन्होंने शिव का कठोर धनुष तोड़ा और उसी के साथ राजाओं का गर्व चूर कर दिया। और अन्त में वह सूची जिसके नाम रावण के अपने संसार के हैं: जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि को मारा, जो सब अतुलनीय बलवान थे। इनमें पहले तीन आपस में भाई थे, और बालि से उसकी मित्रता थी। हनुमान गिनती नहीं गिना रहे, रावण के अपने नक़्शे से नाम काट रहे हैं।
मैं उन्हीं का दूत हूँ
अब वह बात आती है जिसमें पूरा उत्तर एक गाँठ में बँध जाता है।
पहले हनुमान रावण की विजय छीनते नहीं, मानते हैं। वे उसकी क़ीमत बता देते हैं: जिनके लेशमात्र बल से आपने सारा चराचर जगत जीत लिया। विजय सच्ची है, पर उधार की। लेशमात्र यानी लेश का भी लेश। रावण की सारी दिग्विजय एक कण से चली है, और वह कण भी उसका अपना नहीं था।
फिर क्रम देखिये: मैं उन्हीं का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को आप हर लाये हैं। पहले सम्बन्ध, फिर मैं, और तुरन्त वह अपराध। इस पूरी बात में हनुमान अपने बारे में बस इतना कहते हैं कि मैं उन्हीं का दूत हूँ। जिस दूत से पूछा गया था कि किसके बल पर, उसने एक बार भी अपने बल का नाम नहीं लिया।
सहस्रबाहु और बालि की याद
इसके बाद हनुमान जो कहते हैं, वह सुनने में प्रशंसा है और भीतर से कुछ और।
मैं आपकी प्रभुता ख़ूब जानता हूँ: सहस्रबाहु से आपकी लड़ाई हुई थी, और बालि से लड़कर आपने यश पाया था। दोनों में रावण का क्या हाल हुआ था, यह मानस आगे लंकाकाण्ड में अंगद के मुँह से इसी सभा में कहलवाता है। हनुमान ने एक भी बुरा शब्द नहीं कहा, बस दो पुरानी घटनाएँ याद दिला दीं।
पोद्दार इन वचनों को मार्मिक कहते हैं, और रावण ने हँसकर बात टाल दी। जिसके पास उत्तर होता है वह उत्तर देता है, जिसके पास नहीं होता वह हँसकर बात मोड़ देता है। इस पूरे संवाद में तुलसी ने रावण को एक भी तर्क नहीं दिया: केवल हँसी, दुर्वचन, और भीतर एक विषाद।
भूख लगी थी, इसलिये फल खाये
अब हनुमान अपने ऊपर लगे आरोपों का हिसाब देते हैं, और यह हिसाब बहुत सीधा है।
हे स्वामी, भूख लगी थी, इसलिये फल खाये, और वानर स्वभाव से पेड़ तोड़े। कोई बहाना नहीं, कोई ऊँचा कारण नहीं गढ़ा गया। सभा के बीच खड़ा दूत मान रहा है कि उसका एक काम केवल उसके स्वभाव से हुआ, किसी नीति से नहीं। यह सच्चाई किसी चतुराई से भारी पड़ती है।
फिर मारकाट का उत्तर, और वह एक सर्वमान्य बात से शुरू होता है: देह सबको परम प्रिय है। जब कुमार्ग पर चलनेवाले राक्षस मुझे मारने लगे, तो जिन्होंने मुझे मारा, उन्हें मैंने भी मारा। आक्रमण पहले उधर से हुआ, वाक्य इतना ही कहता है।
अब शिव ने पार्वती से जो बात कही थी, वह सभा के बीच हनुमान ख़ुद दोहराते हैं: उसके ऊपर आपके पुत्र ने मुझे बाँध लिया। पर मुझे बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं। यह भरी सभा में, रस्सियों में बँधे खड़े होकर, उन राक्षसों के सामने कहा जा रहा है जो यही तमाशा देखने दौड़े आये हैं।
कारण साथ ही है: मैं तो अपने प्रभु का काम करना चाहता हूँ। बन्धन अपमान तब होता है जब वह किसी को उसके काम से रोके। यह बन्धन रोक नहीं रहा, पहुँचा रहा है।
हाथ जोड़कर, एक सीख
अब एक मोड़ आता है। बँधा हुआ दूत सफ़ाई देना छोड़कर सलाह देने लगता है।
हे रावण, हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनिये। जो नागपाश में बँधा है, वही हाथ जोड़ रहा है। और हनुमान अपनी रिहाई माँग ही नहीं रहे। इस पूरे भाषण में अपने लिये उन्होंने एक शब्द नहीं माँगा।
पहली सलाह कुल की है: अपने कुल का विचार करके देखिये, जिसे पोद्दार पवित्र कुल कहते हैं, और आगे इसी कुल का नाम भी आयेगा। दूसरी सलाह इससे बड़ी है: भ्रम छोड़कर भक्तों का भय हरनेवाले भगवान को भजिये।
फिर डर की सारी सीढ़ियाँ एक साथ: जो काल देवताओं, राक्षसों और सारे चराचर को खा जाता है, वह भी जिनके डर से बहुत डरता है। रावण ने थोड़ी देर पहले पूछा था कि क्या प्राण जाने का डर नहीं। उत्तर में उसे बताया जा रहा है कि प्राण लेनेवाला ख़ुद किससे डरता है।
और तुरन्त माँग: उनसे कभी वैर न कीजिये, और मेरे कहने से सीता को दे दीजिये। समुद्र लाँघा गया, लंका देखी गयी, वाटिका उजड़ी, सेनाएँ गिरीं, बन्धन हुआ, सभा हुई, और माँग एक वाक्य में रखी गयी।
शरण गये हुए का अपराध भुला दिया जाता है
माँग रखते ही हनुमान वह बात कहते हैं जो माँग से बड़ी है: अपराध के बाद भी रास्ता बन्द नहीं है।
हनुमान राम को शरणागतों का रक्षक, दया का समुद्र, और खर का शत्रु कहते हैं। खर का नाम थोड़ी ही देर पहले मारे गये लोगों की सूची में आया था। अब वही नाम दया का पता बनकर लौटता है। जिसने मारा है, उसी के पास जाने को कहा जा रहा है।
शर्त एक ही है: शरण में जाने पर राम आपका अपराध भुलाकर आपको रख लेंगे। अपराध मिटाने की नहीं, भुला देने की बात है। सभा के बीच, नागपाश में बँधा एक दूत लंका के स्वामी को क्षमा का रास्ता दिखा रहा है।
निर्मल चन्द्रमा में कलंक मत बनिये
इसके बाद का प्रस्ताव असाधारण है। रावण से सिंहासन छोड़ने को नहीं कहा गया।
राम के चरणकमल हृदय में धारण कीजिये, और लंका का अचल राज्य कीजिये। राज्य छीना नहीं जा रहा, अचल किया जा रहा है। हनुमान हृदय में जगह माँग रहे हैं, सिंहासन नहीं।
फिर कुल की बात एक चित्र बनती है: ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चन्द्रमा जैसा है, उस चन्द्रमा में आप कलंक मत बनिये। यह पुलस्त्य के पौत्र से कही गयी बात है। उजाला पहले से आकाश में है, उसमें कुछ जोड़ने को नहीं कहा जा रहा, बस दाग़ न बनने को।
बिना वस्त्र की सज्जा, और बिना स्रोत की नदी
अब दो उपमाएँ आती हैं, जो वही बात कहती हैं जो कही जा चुकी है, पर ऐसे कि मन में बैठ जाये।
राम नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद और मोह छोड़कर विचार करके देखिये। फिर रावण को देवताओं का शत्रु कहकर उपमा: सब गहनों से सजी सुन्दर स्त्री भी वस्त्रों के बिना शोभा नहीं पाती। गहने सब हैं, फिर भी कमी वहीं है जहाँ ढकना ज़रूरी था। रावण के पास वैभव की कमी नहीं, और हनुमान ठीक इसी कमी पर उँगली रखते हैं।
दूसरी उपमा सम्पत्ति की है: राम से विमुख व्यक्ति की सम्पत्ति और प्रभुता रहते हुए भी चली जाती है, उसका पाना न पाने के बराबर है। जैसे जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं, वे वर्षा बीतते ही सूख जाती हैं। पोद्दार खोलते हैं कि ऐसी नदियों को केवल बरसात का आसरा होता है। बरसात में वे नदी ही लगती हैं, और लंका इस समय अपनी बरसात के बीच में है।
प्रण रोपकर कही गयी बात
अन्त में हनुमान अपनी बात पर प्रतिज्ञा लगाते हैं, और सीख को एक निमन्त्रण पर छोड़ देते हैं।
हे रावण, सुनिये, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ: राम से विमुख को बचानेवाला कोई नहीं। यह प्रतिज्ञा प्रण गाड़ देना है, और जो बात गाड़ दी गयी वह हटेगी नहीं।
फिर वे उन्हीं नामों को लौटा लाते हैं जिनसे उत्तर शुरू हुआ था: हज़ारों शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं बचा सकते। शुरू में इन्हीं तीनों का बल उधार का बताया गया था, अब वही हज़ार-हज़ार होकर भी रक्षा नहीं कर सकते। तर्क का घेरा पूरा हुआ।
फिर अन्तिम बात: मोह जिसकी जड़ है और जो बहुत पीड़ा देता है, ऐसे अँधेरे अभिमान को छोड़ दीजिये। पोद्दार ऐसे अभिमान को अज्ञान से जन्मा बताते हैं। अन्त में न धमकी है, न शर्त: कृपा के समुद्र राम को भजिये।
प्रसंग इसी निमन्त्रण पर रुक जाता है। सीख दे दी गयी, और उसका लिया जाना देनेवाले के हाथ में नहीं होता। दूत ने माँग रखी, कारण गिनाये, क्षमा का रास्ता बताया, कुल की याद दिलायी, और अन्त में भजन का निमन्त्रण दिया। आगे जो होगा, वह सुननेवाले का किया होगा।
दशा और काम का भेद
इस पूरे प्रसंग में हनुमान एक बार भी हारे नहीं। रखवाले हारे, दल हारा, अक्षयकुमार गिरा, मेघनाद का रथ टूटा, उसकी माया नहीं चली। एक ही जगह वे गिरते हैं, और वह जगह उन्होंने स्वयं चुनी है। तुलसी लिखते हैं कि वे विचार करके माने। और जिसे बचाने के लिये माने, वह उनकी अपनी कोई चीज़ नहीं, ब्रह्मा के अस्त्र की महिमा थी। दूसरे की प्रतिष्ठा के लिये उन्होंने अपना देह बँधवा दिया, और प्रसंग का बाक़ी सब इसी से निकलता है।
दूसरी बात रस्सी और हाथ की है। सभा में देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े खड़े हैं, और उनके हाथ डर से जुड़े हैं। उसी सभा में नागपाश में बँधा एक बन्दी अपनी ओर से हाथ जोड़कर कहता है कि विनती करता हूँ। सभा में एक ही है जिसने हाथ अपनी मर्ज़ी से जोड़े हैं, और वह वही है जिसे बाँधकर लाया गया है।
तीसरी बात वह है जिसे कोई भी अपने साथ ले जा सकता है: बाँधे जाने की लज्जा नहीं, क्योंकि काम अपने प्रभु का है। यहाँ दो चीज़ें अलग कर दी गयी हैं जिन्हें हम अक्सर एक मान लेते हैं, अपनी दशा और अपना काम। दशा वह है जो हमारे साथ की जाती है, काम वह जो हम करते हैं। रस्सी दशा को छू सकती है, काम को नहीं। और जिस सभा में यह कहा गया, वहाँ सुननेवाले के पास सब कुछ था, सिवाय इसे सुन लेने के।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 18 से दोहा 23, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।