Lulla Family

वाटिका-भंग और रावण की सभा

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · वाटिका-भंग और रावण की सभा

वाटिका-भंग और रावण की सभा

अनुमति फल तक की थी, और पेड़ भी टूटे। फिर दल आये, मेघनाद आया, ब्रह्मास्त्र आया, और बँधा हुआ दूत लंका की सभा में खड़ा होकर बोला।

अशोक की उस वाटिका में अभी अभी एक अनुमति दी गयी है। जिन्हें खोजने के लिये समुद्र लाँघा गया था, उन्होंने अपने खोजी से कह दिया है कि जाइये, रघुपति के चरण हृदय में रखकर मीठे फल खा लीजिये। अनुमति मिलते ही वह वानर सिर नवाता है और चल देता है। आगे जो होता है, उसका पहला आधा अनुमति के भीतर है और दूसरा आधा अनुमति के बाहर। फल खाये गये, यह भीतर की बात थी। पेड़ टूटने लगे, यह बाहर की।

और यहीं से सुन्दरकाण्ड का वह हिस्सा खुलता है जिसमें एक अकेला दूत लंका की पूरी व्यवस्था को बारी बारी से अपने सामने बुला लेता है। पहले बाग के रखवाले, फिर रावण के भेजे हुए योद्धाओं का दल, फिर अक्षयकुमार, फिर मेघनाद। हर बार वही होता है जो पहली बार हुआ था। और फिर एक ऐसा अस्त्र चलता है जिसके सामने हनुमान हारते नहीं, हार मान लेते हैं। यह अन्तर तुलसीदास ने छिपाया नहीं है, दोहे में खोलकर रख दिया है, और उसी अन्तर पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है। बँधकर वे रावण की सभा तक पहुँचते हैं, और वहाँ पहुँचकर बोलते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • हनुमान: पवनसुत, प्रभंजन के पुत्र। राम के दूत, जो बाग उजाड़ते हैं और सभा में विनती करते हैं।
  • रावण: लंकेश, दसमुख, दससीसा, दसकंठ। जो हँसता भी है, पुत्रशोक भी करता है, और सीख नहीं लेता।
  • अक्षयकुमार: रावण का पुत्र, असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर आता है।
  • मेघनाद: इंद्रजित, अतुलनीय योद्धा। जिसे बाँधकर लाने का आदेश मिलता है।
  • बाग के रखवाले और निशाचर: जो लड़ते हैं, और जो बचकर पुकार करने लौटते हैं।
  • देवता और दिक्पाल: सभा में हाथ जोड़े खड़े, रावण की भौं ताकते हुए।
  • शिव और भवानी: यह कथा जिनके बीच कही जा रही है, और जो बन्धन का भेद खोल देते हैं।
  • जानकी: इस प्रसंग में उपस्थित नहीं, पर जिनका नाम लेकर दूत अपनी माँग रखता है।
  • श्रीराम: जिनके बल का हिसाब हनुमान सभा के बीच खड़े होकर गिनाते हैं।

सिर नवाकर, बाग में

प्रसंग अनुमति के पालन से शुरू होता है, और तीन ही शब्दों में उससे आगे निकल जाता है।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा । फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे । कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
नाथ एक आवा कपि भारी । तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥

चौपाई १, २

पहली पंक्ति में चार काम हैं और चारों एक के बाद एक रखे गये हैं। चलेउ नाइ सिरु, सिर नवाकर चले। पैठेउ बागा, बाग में घुस गये। फल खाएसि, फल खाये। और फिर तरु तोरैं लागा, वृक्ष तोड़ने लगे। पोद्दारजी की टीका इसी क्रम में खोलती है। ध्यान दीजिये कि अनुमति तीसरे काम तक की थी। चौथा काम किसी आदेश से नहीं आया, वह भीतर से आया।

और वहाँ बाग सूना नहीं था। रहे तहाँ बहु भट रखवारे, बहुत से योद्धा रखवाली पर थे। उनके साथ जो हुआ उसे तुलसी आधी पंक्ति में निपटा देते हैं: कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे। कुछ मारे गये, कुछ पुकार करने चले गये। इस आधी पंक्ति में इस पूरे प्रसंग का ढाँचा रखा हुआ है। हर दल के दो हिस्से होंगे, एक जो वहीं रह जाएगा और एक जो ख़बर लेकर लौटेगा। और ख़बर लौटती रहेगी, तभी तो रावण तक बात पहुँचेगी।

दूसरी चौपाई में तुलसी एक सुन्दर काम करते हैं। वे हमें बताते नहीं कि क्या हुआ, वे रखवालों से कहलवाते हैं। नाथ एक आवा कपि भारी, हे नाथ, एक बड़ा भारी बंदर आया है। फिर गिनती शुरू होती है और बढ़ती जाती है: असोक बाटिका उजारी, फिर खाएसि फल अरु बिटप उपारे, और अन्त में रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे। लंका की सभा को इस दूत का पहला परिचय इसी तरह मिलता है, किसी के देखे हुए रूप में नहीं, हारे हुए पहरेदारों के मुँह से।

रावण के भेजे हुए योद्धा

सुनने के बाद रावण का पहला उत्तर संख्या है।

सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे । गए पुकारत कछु अधमारे॥

चौपाई ३

सुनि रावन पठए भट नाना। बहुत से योद्धा भेजे गये। इसमें कोई योजना नहीं है, केवल मात्रा है। और उधर से जो उत्तर आता है वह भी एक ही शब्द का है: तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना। उन्हें देखकर हनुमान गरजे। वे हटे नहीं, छिपे नहीं, घात नहीं लगायी। जिस बाग में वे चोरी से आये थे, उसी बाग में अब वे आवाज़ देकर खड़े हैं।

इसके बाद की आधी पंक्ति में सारा युद्ध समा जाता है। सब रजनीचर कपि संघारे, सब राक्षस मार डाले गये। और फिर वही पुराना बँटवारा दोहराया जाता है: गए पुकारत कछु अधमारे। जो अधमरे थे वे चिल्लाते हुए गये। तुलसी इन अधमरों को हर बार बचा लेते हैं, और इसका कारण कथा का है। यदि कोई न बचे तो लंका को पता कैसे चले। दूत का काम आधा यही है कि उसका किया हुआ दरबार तक पहुँचे।

अक्षयकुमार, और धूल में मिला हुआ दल

अब रावण अपना पुत्र भेजता है, और साथ में सेना।

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा । चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८॥

चौपाई ४ और दोहा १८

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा, फिर उसने अक्षयकुमार को भेजा। चला संग लै सुभट अपारा, वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। और यहाँ हनुमान का पहला काम मारना नहीं है। आवत देखि बिटप गहि तर्जा, आते हुए देखकर उन्होंने एक वृक्ष हाथ में लेकर ललकारा। ललकार पहले, प्रहार बाद में। यह छोटी सी बात तुलसी ने जान बूझकर रखी है, क्योंकि आगे सभा में यही दूत कहेगा कि उसने पहले किसी पर हाथ नहीं उठाया।

ताहि निपाति महाधुनि गर्जा, उसे मारकर बड़े ज़ोर से गर्जना की। पोद्दारजी महाधुनि को बड़े जोर की ध्वनि कहकर खोलते हैं। रावण का पुत्र गिर चुका है और वह समाचार भी उसी गर्जना में लंका तक भेज दिया गया है।

दोहा अठारह में तुलसी सेना का हिसाब तीन क्रियाओं में देते हैं, और तीनों अलग अलग हैं। कछु मारेसि, कुछ मारे गये। कछु मर्देसि, कुछ मसल दिये गये। कछु मिलएसि धरि धूरि, और कुछ को पकड़ पकड़कर धूल में मिला दिया गया। फिर वही बचे हुए लोग, और उनके मुँह में इस बार केवल ख़बर नहीं, एक आकलन है: प्रभु मर्कट बल भूरि। हे प्रभु, बंदर बहुत ही बलवान है। अब यह लंका की अपनी जाँच है, बाहर का दावा नहीं।

सार: अनुमति फल तक की थी। फल खाये गये और वृक्ष भी टूटे। रखवाले लड़े, कुछ मारे गये और कुछ पुकार लेकर लौटे। रावण ने पहले योद्धाओं का दल भेजा, फिर अपना पुत्र अक्षयकुमार। दोनों बार वही परिणाम आया, और तीसरी बार लौटने वालों के मुँह से लंका ने स्वयं मान लिया कि इस वानर का बल बहुत बड़ा है।

मारना नहीं, बाँध लाना

पुत्र के मारे जाने की ख़बर सुनकर रावण जो आदेश देता है, वह इस पूरे प्रसंग को मोड़ देने वाला आदेश है।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

चौपाई १

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पुत्रवध सुनकर लंकेश क्रोधित हुआ, और उसने बलवान मेघनाद को भेजा। यहाँ तक सब अपेक्षित है। अगली पंक्ति अपेक्षित नहीं है।

मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। हे पुत्र, मारना नहीं, उसे बाँध लाना। और कारण भी वह स्वयं बता देता है: देखिअ कपिहि कहाँ कर आही, उस बंदर को देखा जाय कि कहाँ का है। जिस पिता का बेटा अभी अभी मारा गया है, वह वध का आदेश नहीं दे रहा, वह जिज्ञासा का आदेश दे रहा है। रावण जानना चाहता है। यह उसके भीतर बचा हुआ राजा है, और यही उसके काम आता भी नहीं।

तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते, पर पाठक को दिखता है कि रावण ने अपने हाथ से वह द्वार खोल दिया है जिससे होकर राम का सन्देश उसकी सभा तक आएगा। यदि आदेश मारने का होता तो यह कथा वाटिका में ही समाप्त हो जाती। आदेश बाँधने का हुआ, इसलिये आगे एक सभा होगी और उस सभा में एक दूत बोलेगा।

दो गजराज भिड़ गये

मेघनाद के आने पर तुलसी दोनों पक्षों को बराबर का तौल देते हैं, और फिर भी परिणाम एक ही निकलता है।

चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई॥
उठि बहोरि कीन्ह्सि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

चौपाई २ से ५

चला इंद्रजित अतुलित जोधा, इंद्र को जीतने वाला अतुलनीय योद्धा चला। उसके चलने का कारण भी दिया गया है: बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा, भाई का मारा जाना सुनकर क्रोध उपजा। और उधर हनुमान का आकलन भी बदलता है: कपि देखा दारुन भट आवा। अबकी बार जो आया है वह भयानक योद्धा है। तुलसी दोनों को एक दूसरे की क़ीमत पहचानने देते हैं, तभी लड़ाई बनती है।

पहला प्रहार व्यक्ति पर नहीं होता, सवारी पर होता है। अति बिसाल तरु एक उपारा, एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया, और बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा, लंकेश के पुत्र को बिना रथ का कर दिया। और साथ आये महाभटों के लिये कोई अस्त्र नहीं उठाया गया: गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा। पकड़ पकड़कर अपने ही अंगों से उन्हें मसल दिया। यह वाक्य याद रखने लायक़ है, क्योंकि सभा में जब उनसे पूछा जाएगा कि किसके बल पर, तब उत्तर में वे अपनी देह का नाम नहीं लेंगे।

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा, उन सबको मारकर फिर मेघनाद से भिड़े। और यहाँ तुलसी वह उपमा देते हैं जो दोनों को एक ही ऊँचाई पर बिठा देती है: भिरे जुगल मानहुँ गजराजा। मानो दो गजराज भिड़ गये हों। हारने वाले का अपमान इस प्रसंग में कहीं नहीं है।

फिर एक घूँसा पड़ता है और उसके बाद जो होता है वह विचित्र है। मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई, घूँसा मारकर वे वृक्ष पर जा चढ़े, और ताहि एक छन मुरुछा आई, उसे क्षण भर के लिये मूर्च्छा आ गयी। मारकर पीछा नहीं किया गया, ऊपर चढ़ जाया गया। जो अवसर था वह छोड़ दिया गया।

उठकर मेघनाद वह करता है जो उसका सबसे बड़ा हथियार है। बहु माया, बहुत माया रची। और उत्तर में तुलसी एक पंक्ति लिखकर पूरा प्रश्न बन्द कर देते हैं: जीति न जाइ प्रभंजन जाया। पवन के पुत्र जीते नहीं जाते। बल से नहीं, छल से भी नहीं। इसी पंक्ति के बाद ब्रह्मास्त्र आता है, और आना ही था, क्योंकि बाक़ी सब चुक चुका है।

सार: रावण ने मेघनाद को इस आदेश के साथ भेजा कि मारना नहीं, बाँधकर लाना है, क्योंकि वह जानना चाहता था कि यह वानर कहाँ का है। मेघनाद का रथ टूटा, उसके साथ के योद्धा मसल दिये गये, उसे घूँसा पड़ा और मूर्च्छा आयी। उठकर उसने माया रची, और उससे भी बात नहीं बनी।

ब्रह्मास्त्र के सामने एक विचार

अब वह दोहा आता है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है। ध्यान दीजिये कि इसमें प्रहार आधी पंक्ति में है और शेष तीन चौथाई पंक्तियाँ हनुमान के मन में बीतती हैं।

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ १९॥

दोहा १९

तेहि साँधा, उसने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया। और उसी साँस में: कपि मन कीन्ह बिचार, वानर ने मन में विचार किया। युद्ध रुक जाता है और एक विचार चलने लगता है। यह तुलसी की सबसे बड़ी चतुराई है। जिस क्षण में कोई सोचता नहीं, उसी क्षण में उन्होंने सोचने की जगह बना दी।

और विचार क्या है, यह भी पूरा का पूरा लिखा हुआ है: जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार। यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी। इस पंक्ति में तौल जिस चीज़ की हो रही है वह हनुमान की जान नहीं है, हनुमान की प्रतिष्ठा नहीं है, यहाँ तक कि उनका काम भी नहीं है। तौल ब्रह्मास्त्र की महिमा की हो रही है।

शब्द पर ठहरिये। तुलसी ने मानउँ लिखा है। मानना, स्वीकार कर लेना। यह हार का शब्द नहीं है, यह आदर का शब्द है। हारने वाला मानता नहीं, हारने वाले पर बीतती है। यहाँ जो हो रहा है वह उल्टा है। बाण चल चुका है और उसका प्रभाव होगा या नहीं, यह निर्णय जिस पर बाण चला है उसके हाथ में है। और वह निर्णय वे अस्त्र के पक्ष में करते हैं।

इसका अर्थ यह भी है कि यह सारा बन्धन, यह सारी सभा, यह सारा अपमान जो आगे आने वाला है, वह हनुमान की सहमति से आ रहा है। जिसे हम पकड़ा जाना कहते, तुलसी उसे एक और सेवा बना देते हैं। ब्रह्मा का अस्त्र यदि किसी पर चलकर निष्फल हो जाए तो संसार में उसका नाम घट जाएगा। उस नाम को बचाने की क़ीमत अपनी देह से चुकायी जा रही है।

जिसने अपने को बँधवाया

निर्णय के बाद भी तुलसी उनका बल आँखों से ओझल नहीं होने देते। और उसके तुरन्त बाद, ठीक उसी जगह, कथा का कहने वाला स्वयं आगे आ जाता है। यह प्रसंग शिव भवानी को सुना रहे हैं, और वे रुककर एक प्रश्न पूछते हैं जिसका उत्तर पूछने में ही रख दिया गया है।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

चौपाई १, २

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा, उसने हनुमान को ब्रह्मबाण मारा। और फिर वह आधी पंक्ति जो सब बता देती है: बार कटकु संघारा। पोद्दारजी खोलते हैं कि बाण लगते ही वे वृक्ष से नीचे गिर पड़े, परन्तु गिरते समय भी बहुत सी सेना मार डाली। गिरना और मारना एक साथ चल रहे हैं। जिस देह को अस्त्र ने ले लिया है, वही देह रास्ते में सेना को निपटाती जा रही है।

इसके बाद मेघनाद जो करता है, उसमें भी एक शर्त है: तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ, जब उसने देखा कि वानर मूर्च्छित हो गये हैं, तब नागपास बाँधेसि लै गयऊ, नागपाश से बाँधकर ले गया। बाँधने का काम बेहोशी के बाद हुआ, होश में नहीं। तुलसी यह अन्तर छोड़ते नहीं।

सुनहु भवानी, हे भवानी, सुनिये। जासु नाम जपि, जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य जन्म और मरण का बन्धन काट डालते हैं। और फिर प्रश्न: तासु दूत कि बंध तरु आवा। उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? पोद्दारजी इसे प्रश्न के रूप में ही रखते हैं, उत्तर नहीं देते, क्योंकि उत्तर सुनने वाले के भीतर बन चुका होता है।

और तब वह पंक्ति आती है जो इस प्रसंग का ताला खोल देती है: प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा। प्रभु के कार्य के लिये हनुमान ने स्वयं अपने को बँधा लिया। शब्द बँधा नहीं है, बँधावा है। यह करवाने वाली क्रिया है। बाँधने वाला मेघनाद था, बँधवाने वाले हनुमान हैं। रस्सी उसके हाथ में है और निर्णय इनका है।

सार: मेघनाद के ब्रह्मास्त्र के सामने हनुमान ने मन में यह विचार करके कि न मानने से उस अस्त्र की अपार महिमा मिट जाएगी, उसे मान लिया। गिरते समय भी उन्होंने सेना संहारी। नागपाश में बाँधकर वे ले जाये गये, और तुलसी वहीं कह देते हैं कि प्रभु के काम के लिये उन्होंने अपने को बँधवाया।

दसमुख की सभा, और सर्पों के बीच गरुड़

अब दृश्य बदलता है। बन्दी को सभा में लाया जा रहा है, और सभा उसे देखने के लिये उमड़ पड़ी है।

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥ २०॥

चौपाई ३, ४ और दोहा २०

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए, बंदर का बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े, और कौतुक लागि सभाँ सब आए, तमाशा देखने के लिये सब सभा में आ गये। पोद्दारजी कौतुक को तमाशा कहकर खोलते हैं। पूरी लंका एक दिखावे के लिये जमा है।

पर अगली ही पंक्ति में तुलसी देखने वाले और दिखाये जाने वाले की अदला बदली कर देते हैं। दसमुख सभा दीखि कपि जाई, हनुमान ने जाकर रावण की सभा देखी। जिसे देखने के लिये सब आये थे, वही देख रहा है। और तुलसी उस सभा की शोभा घटाते भी नहीं: कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई, उसकी अत्यन्त प्रभुता कही नहीं जाती। बड़ाई मान ली गयी है, तभी आगे की बात का मोल है।

फिर वह चित्र आता है जिसमें रावण का सारा प्रताप एक साथ दिख जाता है। कर जोरें सुर दिसिप बिनीता, देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े नम्रता के साथ खड़े हैं। और वे कर क्या रहे हैं: भृकुटि बिलोकत सकल सभीता। भयभीत होकर सब उसकी भौंह ताक रहे हैं। पोद्दारजी जोड़ते हैं कि वे उसका रुख देख रहे हैं। इस सभा में किसी को यह नहीं पता कि अगले क्षण क्या चाहा जाएगा, इसलिये सब उसके चेहरे पर टिके हैं।

और उसी सभा के बीच एक बँधा हुआ वानर खड़ा है जिस पर यह सब बेअसर है: देखि प्रताप न कपि मन संका। फिर उपमा आती है, और वह उपमा बन्धन की बात ही भुला देती है: जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका। जैसे साँपों के समूह के बीच गरुड़ निःशंक रहते हैं। सारा दरबार साँपों का समूह हो गया और बन्दी गरुड़ हो गया। नागपाश से बाँधे गये दूत के लिये इससे सटीक उपमा और कोई नहीं हो सकती थी।

दोहा बीस में रावण के भीतर दो चीज़ें एक के बाद एक आती हैं। पहले कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद, उसे देखकर दशानन दुर्वचन कहता हुआ ख़ूब हँसा। और फिर सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद, पुत्रवध का स्मरण आया और हृदय में विषाद उपजा। हँसी पहले है और शोक बाद में, और दोनों एक ही दोहे में हैं। जो आदमी इस सभा का स्वामी है, वह अपने ही भीतर दो टुकड़ों में बँटा हुआ है।

सार: बन्दी को देखने के लिये पूरी लंका सभा में आ गयी, पर देखने का काम बन्दी ने किया। सभा में देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े रावण की भौं ताक रहे थे, और उस प्रताप के बीच हनुमान के मन में डर नहीं आया, जैसे सर्पों के बीच गरुड़ को नहीं आता। रावण पहले हँसा और फिर पुत्र की याद करके दुखी हुआ।

लंकेश का प्रश्न

अब पूछताछ शुरू होती है, और रावण जो प्रश्न पूछता है वही उसके गले पड़ता है।

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥

चौपाई १, २

कह लंकेस कवन तैं कीसा, लंकापति ने पूछा कि यह वानर कौन है। और फिर असली प्रश्न: केहि कें बल घालेहि बन खीसा, किसके बल पर वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला। यह प्रश्न पूरे प्रसंग का केन्द्र है। रावण बल का स्रोत जानना चाहता है, और थोड़ी देर में उसे स्रोत बताया भी जाएगा, इतने विस्तार से कि वह सुनना बन्द करना चाहेगा।

फिर वह अपना नाम बीच में रखता है: की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। क्या कभी मुझे कानों से नहीं सुना। यह प्रश्न नहीं है, यह परिचय है। और उसके तुरन्त बाद वह स्वयं स्वीकार कर लेता है कि सामने वाला डरा हुआ नहीं है: देखउँ अति असंक सठ तोही। दूसरे की निर्भयता पर टिप्पणी करना अपनी खीझ का ही दूसरा नाम है।

अन्तिम दो प्रश्न धमकी बन जाते हैं। मारे निसिचर केहिं अपराधा, किस अपराध पर राक्षसों को मारा। और कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा, जिसमें वह पूछता है कि क्या प्राण जाने का कोई भय नहीं है। ध्यान दीजिये कि इस पूरी पूछताछ में रावण ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि सीता कहाँ हैं या यह दूत किसका है। उसने अपने बारे में पूछा है, अपने नाम के बारे में, अपने राक्षसों के बारे में, अपने भय के बारे में। उत्तर में उसे किसी और के बारे में सुनना पड़ेगा।

जिनका बल पाकर माया रचती है

हनुमान का उत्तर यहाँ से शुरू होता है, और कई पंक्तियों तक उसमें राम का नाम नहीं आता। पहले केवल काम गिनाये जाते हैं, नाम सबसे अन्त में रखा जाता है।

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बल साली॥

चौपाई २ से ५

सुनु रावन, हे रावण, सुनिये। और फिर पहला परिचय: ब्रह्मांड निकाया। जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के समूहों की रचना करती है। रावण ने बल के बारे में पूछा था। उत्तर उसी शब्द से शुरू होता है और वहाँ तक चला जाता है जहाँ से सृष्टि निकलती है।

फिर तीन बड़े नाम आते हैं और तीनों को उधार का बल दे दिया जाता है: जाकें बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिनके बल से सृजन, पालन और संहार करते हैं। और सम्बोधन देखिये, यह सब सीधे दससीसा को कहा जा रहा है, दशशीश को, उसके अपने दरबार में। फिर शेषजी आते हैं: जा बल सीस धरत सहसानन, जिनके बल से सहस्र फणों वाले शेष पर्वत और वन सहित सारे ब्रह्माण्ड को सिर पर धारण करते हैं।

यहाँ तक यह दर्शन था। अगली पंक्ति में यह इतिहास बन जाता है। धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता, जो देवताओं की रक्षा के लिये नाना प्रकार की देह धारण करते हैं। और उसी पंक्ति के दूसरे आधे में एक वाक्य है जो सभा में खड़े होकर कहा गया है, और जिसे कहने के बाद लौटा नहीं जा सकता। पोद्दारजी उसे खोलते हैं कि वे ऐसे मूर्खों को शिक्षा देने वाले हैं। बन्दी शिक्षक की बात कर रहा है और शिष्य कौन है, यह सिंहासन पर बैठा हुआ आदमी स्वयं समझ रहा है।

फिर वह धनुष आता है जिसे लंका भी जानती है: हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा, जिन्होंने शिव के कठोर धनुष को तोड़ा, और तेहि समेत नृप दल मद गंजा, उसी के साथ राजाओं के समूह का गर्व चूर कर दिया। और अन्त में वह सूची जो रावण के लिये सबसे भारी है: खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि, बधे सकल अतुलित बल साली, सब के सब अतुलनीय बलवान थे। इस सूची में दो उसके अपने थे और एक वह था जिससे उसकी मित्रता थी। हनुमान गिनती नहीं गिना रहे, रावण के अपने नक़्शे में से नाम काट रहे हैं।

तासु दूत मैं

अब वह दोहा आता है जिसमें पूरा उत्तर एक गाँठ में बँध जाता है।

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१॥

दोहा २१

पहली पंक्ति में हनुमान रावण की विजय छीनते नहीं, उसे स्वीकार करते हैं और साथ में उसकी क़ीमत भी बता देते हैं: जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। जिनके लेशमात्र बल से आपने समस्त चराचर जगत को जीत लिया। विजय सच्ची है, पर वह उधार की है। लवलेस शब्द पर ठहरिये, लेश का भी लेश। लंकापति की सारी दिग्विजय एक कण से चली है, और वह कण भी उसका अपना नहीं था।

और दूसरी पंक्ति में वाक्य का क्रम देखिये: तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि। पहले सम्बन्ध, फिर मैं, और फिर तुरन्त वह अपराध जिसकी बात करने ही वे आये हैं, कि जिनकी प्रिय पत्नी को हर लाये हैं। इस पूरे दोहे में हनुमान अपने बारे में केवल दो शब्द कहते हैं, तासु दूत मैं। बाक़ी सब किसी और का है। जिस दूत से पूछा गया था कि किसके बल पर, उसने अपने बल का एक बार भी नाम नहीं लिया।

सार: रावण ने पूछा कि किसके बल पर यह सब किया। उत्तर में हनुमान ने माया, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शेष, शिव का धनुष, और खर, दूषण, त्रिशिरा तथा बालि का वध गिनाया, और अन्त में कहा कि जिनके लेशमात्र बल से आपने संसार जीता, और जिनकी पत्नी हर लायी गयी है, मैं उन्हीं का दूत हूँ।

सहस्रबाहु और बालि की याद

इसके बाद हनुमान जो कहते हैं, वह सुनने में प्रशंसा है और अन्दर से कुछ और है।

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥

चौपाई १

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई, मैं आपकी प्रभुता को ख़ूब जानता हूँ। और उस जानकारी के दो प्रमाण दिये जाते हैं: सहसबाहु सन परी लराई, सहस्रबाहु से लड़ाई हुई थी, और समर बालि सन करि जसु पावा, बालि से युद्ध करके यश पाया था। दोनों घटनाएँ लंका की स्मृति में हैं और दोनों में रावण की क्या गति हुई थी, यह सभा में बैठा हर आदमी जानता है। हनुमान ने एक भी बुरा शब्द नहीं कहा। उन्होंने केवल दो तारीख़ें याद दिला दीं।

पोद्दारजी इन वचनों को मार्मिक कहते हैं, और रावण का उत्तर भी वहीं लिखा है: सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा। हनुमान के वचन सुनकर उसने हँसकर बात टाल दी। यह हार का सबसे साफ़ चिह्न है। जिसके पास उत्तर होता है वह उत्तर देता है, जिसके पास नहीं होता वह हँसकर बात दूसरी ओर मोड़ देता है। तुलसी ने रावण को इस पूरे संवाद में एक भी तर्क नहीं दिया, केवल हँसी दी है, दुर्वचन दिये हैं, और भीतर एक विषाद दिया है।

भूख लगी थी, इसलिये फल खाये

अब हनुमान अपने ऊपर लगे आरोपों का हिसाब देते हैं, और यह हिसाब आश्चर्यजनक रूप से सीधा है।

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥

चौपाई २, ३

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा, हे स्वामी, भूख लगी थी, इसलिये फल खाये। इसमें कोई बहाना नहीं है। और वृक्षों के लिये भी कोई ऊँचा कारण नहीं गढ़ा जाता: कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा, वानर स्वभाव के कारण पेड़ तोड़े। सभा के बीच खड़ा एक दूत यह मान रहा है कि उसका एक काम केवल उसकी जाति के स्वभाव से हुआ था, किसी नीति से नहीं। यह सच्चाई किसी चतुराई से भारी पड़ती है।

फिर मारकाट का उत्तर आता है, और वह एक सर्वमान्य बात से शुरू होता है: सब कें देह परम प्रिय स्वामी। देह सबको परम प्रिय है। पहले नियम, फिर अपनी बात। पोद्दारजी आगे जोड़ते हैं कि कुमार्ग पर चलने वाले राक्षस जब मारने लगे, तब जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। आक्रमण पहले उधर से हुआ, यह वाक्य यही कहता है और इससे अधिक कुछ नहीं कहता।

और अब वह पंक्ति जो दोहा उन्नीस के निर्णय को सभा के बीच दोहरा देती है, इस बार स्वयं हनुमान के मुँह से। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे, उसके ऊपर आपके पुत्र ने मुझे बाँध लिया। और फिर: मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। मुझे बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। सोचिये कि यह कहाँ कहा जा रहा है। भरी सभा में, रस्सियों में, उस आदमी के सामने जो इसी दृश्य का तमाशा देखने के लिये सबको बुला लाया है। और जिसके लिये यह सब सजाया गया था, वही कह रहा है कि इसमें लज्जा की कोई बात नहीं।

कारण भी साथ ही है: निज प्रभु कर काजा, मैं तो अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ। जहाँ काम बड़ा हो, वहाँ अपनी दशा का हिसाब अलग से नहीं लगाया जाता। बन्धन अपमान तब होता है जब वह किसी को उसके काम से रोक दे। यह बन्धन रोक नहीं रहा, पहुँचा रहा है।

हाथ जोड़कर, एक सीख

और अब वह मोड़ आता है जिसकी इस सभा में किसी को अपेक्षा नहीं थी। बँधा हुआ दूत सफ़ाई देना छोड़कर सलाह देने लगता है।

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै॥

चौपाई ४, ५

बिनती करउँ जोरि कर रावन। हे रावण, हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। जिन हाथों में नागपाश है, वही हाथ जोड़े जा रहे हैं। और माँग यह है: सुनहु मान तजि मोर सिखावन, अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनिये। यहाँ एक बात ध्यान देने की है। हनुमान अपने बन्धन का सौदा नहीं कर रहे। वे अपनी रिहाई माँग ही नहीं रहे। इस पूरे भाषण में अपने लिये उन्होंने एक शब्द भी नहीं माँगा।

पहली सलाह वंश की है: देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी, अपने कुल का विचार करके देखिये। रावण ब्राह्मण कुल का है और यह बात सभा में सबको मालूम है। आगे इसी कुल का नाम भी लिया जाएगा। दूसरी सलाह इससे बड़ी है: भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी, भ्रम छोड़कर भक्तों का भय हरने वाले को भजिये।

फिर एक ऐसी उपमा आती है जो डर की सारी सीढ़ियाँ एक साथ चढ़ जाती है। जो सुर असुर चराचर खाई, जो देवताओं, राक्षसों और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल। और उसके बारे में: जाकें डर अति काल डेराई। जिनके डर से वह काल भी अत्यन्त डरता है। रावण ने अभी थोड़ी देर पहले पूछा था कि क्या प्राण जाने का भय नहीं है। उत्तर में उसे यह बताया जा रहा है कि प्राण लेने वाला स्वयं किससे डरता है।

और उसके तुरन्त बाद वह आधी पंक्ति आती है जिसके लिये यह सारी यात्रा हुई थी। तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै, उनसे कभी वैर न कीजिये, और मोरे कहें जानकी दीजै, मेरे कहने से जानकी को दे दीजिये। दूतकर्म का पूरा सार यही आधी पंक्ति है। समुद्र लाँघा गया, लंका देखी गयी, वाटिका उजड़ी, सेनाएँ गिरीं, बन्धन हुआ, सभा हुई, और जो कहना था वह आठ शब्दों में कहा गया।

शरण गये हुए का अपराध भुला दिया जाता है

माँग रखने के तुरन्त बाद हनुमान वह बात कहते हैं जो माँग से बड़ी है, कि अपराध के बाद भी रास्ता बन्द नहीं है।

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२॥

दोहा २२

पहली पंक्ति तीन नामों से बनी है और तीनों चुने हुए हैं। प्रनतपाल, शरणागतों के रक्षक। फिर करुणा के समुद्र। और फिर खरारि, खर के शत्रु। ध्यान दीजिये कि खर का नाम अभी कुछ ही पंक्तियाँ पहले मारे गये लोगों की सूची में आया था। अब वही नाम दया का पता बनकर लौट रहा है। जिसने मारा है, उसी के पास जाने को कहा जा रहा है।

और दूसरी पंक्ति में शर्त केवल एक है: गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि। शरण में जाने पर प्रभु आपका अपराध भुलाकर रख लेंगे। अपराध मिटाने की बात नहीं है, भुलाने की बात है। जो हुआ वह हुआ, और उसके बावजूद जगह बनी हुई है। सभा के बीच, नागपाश में, लंका के स्वामी को क्षमा की पेशकश की जा रही है, और पेशकश करने वाले के पास देने को इस समय अपनी देह तक नहीं है।

सार: अपने ऊपर लगे आरोपों का उत्तर देकर हनुमान ने सलाह देना शुरू किया। हाथ जोड़कर उन्होंने कहा कि अभिमान छोड़िये, अपने कुल का विचार कीजिये, जिनसे काल भी डरता है उनसे वैर मत कीजिये, और जानकी को लौटा दीजिये। साथ में यह भी कहा कि शरण में जाने पर वह अपराध भुला दिया जाएगा।

निर्मल चन्द्रमा में कलंक मत बनिये

इसके बाद जो प्रस्ताव रखा जाता है, वह असाधारण है। इसमें रावण से सिंहासन छोड़ने को नहीं कहा गया।

राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

चौपाई १

राम चरन पंकज उर धरहू, राम के चरणकमलों को हृदय में धारण कीजिये, और लंका अचल राजु तुम्ह करहू, लंका का अचल राज्य कीजिये। ध्यान दीजिये कि यहाँ राज्य छीना नहीं जा रहा, उसे अचल कर दिया जा रहा है। हनुमान जो माँग रहे हैं वह हृदय की जगह है, सिंहासन की नहीं।

और फिर वह उपमा आती है जो कुल की बात को एक चित्र में बदल देती है। रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका, ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। और उसके बाद विनती: तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका, उस चन्द्रमा में कलंक मत बनिये। यह एक पौत्र से कही गयी बात है। उसके वंश का उजाला पहले से आकाश में है, उसमें कुछ जोड़ने को नहीं कहा जा रहा। केवल यह कहा जा रहा है कि उसमें दाग़ न बनिये।

बिना वस्त्र की सज्जा, और बिना स्रोत की नदी

अब दो उपमाएँ आती हैं, और दोनों उसी बात को कहती हैं जो अब तक कही जा चुकी है, पर ऐसी भाषा में कि वह घर कर जाए।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी । सब भूषन भूषित बर नारी॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

चौपाई २, ३

राम नाम बिनु गिरा न सोहा, राम नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती। और उसे मान लेने का तरीक़ा भी बता दिया जाता है: देखु बिचारि त्यागि मद मोहा, मद और मोह छोड़कर विचार करके देखिये। तर्क नहीं, विचार। फिर उपमा: बसन हीन नहिं सोह सुरारी, हे देवताओं के शत्रु, सब गहनों से सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी वस्त्रों के बिना शोभा नहीं पाती। गहने सब मौजूद हैं और फिर भी कमी वहीं रह जाती है जहाँ ढकना ज़रूरी था। रावण के पास वैभव की कोई कमी नहीं है, और हनुमान ठीक इसी कमी की ओर उँगली रख रहे हैं।

दूसरी उपमा सम्पत्ति के बारे में है। राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई, राम से विमुख व्यक्ति की सम्पत्ति और प्रभुता रहती हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के बराबर है। और इसका चित्र: सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं, जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है, बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं, वे वर्षा बीतते ही सूख जाती हैं। पोद्दारजी खोलते हैं कि ऐसी नदियों को केवल बरसात का सहारा होता है। बरसात के दिनों में वे नदी ही लगती हैं। लंका इस समय अपनी बरसात के बीच में है।

प्रण रोपकर कही गयी बात

अन्त में हनुमान अपनी बात पर प्रतिज्ञा लगा देते हैं, और फिर सीख को एक निमन्त्रण पर छोड़ देते हैं।

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३॥

चौपाई ४ और दोहा २३

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी, हे दशकंठ, सुनिये, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ। प्रण रोपना एक किसान का शब्द है, गाड़ देना। जो बात गाड़ दी गयी वह अब हटेगी नहीं। और बात यह है: बिमुख राम त्राता नहिं कोपी, राम से विमुख को बचाने वाला कोई नहीं है।

अगली पंक्ति में वे उन्हीं नामों को लौटा लाते हैं जिनसे उन्होंने अपना उत्तर शुरू किया था: संकर सहस बिष्नु अज तोही। हज़ारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं बचा सकते। शुरू में इन्हीं तीनों का बल उधार का बताया गया था। अब वही तीनों, हज़ार हज़ार होकर भी, रक्षा नहीं कर सकते। तर्क का घेरा पूरा हो गया।

और फिर प्रसंग का अन्तिम दोहा। मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान, मोह जिसका मूल है, जो बहुत पीड़ा देता है, ऐसे तमरूप अभिमान का त्याग कर दीजिये। पोद्दारजी तम को अज्ञान के अर्थ में खोलते हैं। और अन्तिम आधी पंक्ति में कोई धमकी नहीं है, कोई शर्त नहीं है: भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान

यह प्रसंग यहीं रुक जाता है, इसी निमन्त्रण पर। सीख दे दी गयी है, और सीख का लिया जाना सीख देने वाले के हाथ में कभी नहीं होता। दूत अपना पूरा काम कर चुका है। उसने माँग रखी, कारण गिनाये, क्षमा का रास्ता बताया, कुल की याद दिलायी, और अन्त में भजन का निमन्त्रण दे दिया। इसके आगे जो होगा वह सुनने वाले का किया हुआ होगा।

सार: हनुमान ने प्रतिज्ञा करके कहा कि राम से विमुख का कोई रक्षक नहीं, हज़ारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी नहीं। फिर उन्होंने मोह से उपजे अभिमान को छोड़ने और कृपा के समुद्र राम को भजने का निमन्त्रण दिया, और प्रसंग उसी निमन्त्रण पर समाप्त हो जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में हनुमान एक बार भी हारे नहीं। रखवाले हारे, दल हारा, अक्षयकुमार गिरा, मेघनाद का रथ टूटा, उसकी माया चली नहीं। एक ही जगह है जहाँ वे गिरते हैं, और वह जगह उन्होंने स्वयं चुनी है। तुलसी ने इसे अनुमान पर नहीं छोड़ा, दोहे में लिख दिया कि वे विचार करके माने। और जिस चीज़ को बचाने के लिये माने, वह उनकी अपनी कोई चीज़ नहीं थी। वह ब्रह्मा के अस्त्र की महिमा थी। दूसरे की प्रतिष्ठा के लिये अपनी देह बँधवा देना, सुन्दरकाण्ड में यह अकेला ऐसा निर्णय है जिसमें बल का कोई प्रदर्शन नहीं है और फिर भी वही सबसे बड़ा है।

दूसरी बात रस्सी और हाथ की है। सभा में जो दृश्य बना है उसे ठीक से देखिये। एक ओर सिंहासन है, चारों ओर देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े खड़े हैं, और उनके हाथ डर से जुड़े हैं। बीच में एक बन्दी खड़ा है जिसके हाथ पहले से बँधे हुए हैं, और वह उन्हीं बँधे हाथों को अपनी ओर से जोड़कर कहता है कि विनती करता हूँ। सभा में एक ही आदमी है जिसने हाथ अपनी मर्ज़ी से जोड़े हैं, और वह वही है जिसे बाँधकर लाया गया है। तुलसी ने इस उलटफेर पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं किया।

और तीसरी बात उस आधी पंक्ति की है जिसे इस प्रसंग से कोई भी अपने साथ ले जा सकता है। बाँधे जाने की लज्जा नहीं है, क्योंकि काम अपने प्रभु का है। यहाँ दो चीज़ें अलग कर दी गयी हैं जिन्हें हम अक्सर एक मानकर चलते हैं, अपनी दशा और अपना काम। दशा वह है जो हमारे साथ की जाती है, काम वह है जो हम करते हैं। रस्सी दशा को छू सकती है, काम को नहीं। जिस दिन यह भेद समझ में आ जाए, उस दिन बहुत सी रस्सियाँ अपने आप ढीली पड़ जाती हैं। और जिस सभा में यह भेद कहा गया, वहाँ सुनने वाले के पास सब कुछ था, सिवाय इसे सुन लेने के।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा १८ से दोहा २३, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English