एक चूड़ामणि, और वह बात जो बिना कहे ही भली थी
अशोक वाटिका की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि समुद्र के ऊपर एक गर्जना उठी। लंका के कँगूरों पर खड़े पहरेदारों ने वह आवाज़ सुनी, और जो सुनी सो सह न सके। जिस नगर ने अभी-अभी अपनी छतें जलती देखी थीं, उसी नगर में उस ध्वनि से राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर पड़े। यह किसी शस्त्र का काम नहीं था। यह केवल एक विदा लेते हुए दूत का स्वर था, जो जाते-जाते बता गया कि जिसे अजेय समझा जा रहा था वह अब अजेय नहीं रहा।
और समुद्र के दूसरे किनारे पर, जहाँ वानरों की एक टोली दिन गिनते-गिनते थक चुकी थी, उसी क्षण एक दूसरी आवाज़ पहुँची। किलकिला। हर्ष की वह पुकार जो शब्दों से पहले आती है और शब्दों से ज़्यादा कहती है। उस एक ध्वनि ने बता दिया कि खोज पूरी हो गयी। आगे का सारा प्रसंग उसी एक ध्वनि के फैलते जाने की कथा है, समुद्र तट से मधुवन तक, मधुवन से सुग्रीव की सभा तक, और सभा से उस स्फटिक शिला तक जहाँ दो भाई बैठे थे और बड़े भाई के भीतर एक प्रश्न महीनों से पक रहा था।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- हनुमान, पवनपुत्र, जो लंका से लौट रहे हैं और जिनके मुख पर वह प्रसन्नता है जिसे देखकर औरों को अपना नया जन्म लगता है।
- श्रीराम, जो स्फटिक शिला पर बैठे हैं, जिनका पहला प्रश्न विजय के बारे में नहीं है।
- लक्ष्मण, जो उसी शिला पर बड़े भाई के साथ हैं।
- जानकी, जो इस प्रसंग में उपस्थित नहीं हैं और फिर भी पूरा प्रसंग उन्हीं का है, उनकी चूड़ामणि और उनके कहलाये हुए वचनों के रूप में।
- सुग्रीव, कपिराज, जो मधुवन उजड़ने की शिकायत को सफलता का प्रमाण पढ़ लेते हैं।
- अंगद, युवराज, जिनकी सम्मति से मधुवन में हाथ पड़ता है।
- जाम्बवान, जो राम के सामने हनुमान की करनी का साक्ष्य देते हैं और अपना जन्म सफल मानते हैं।
- मधुवन के रखवाले, जिनकी शिकायत ही इस अध्याय का पहला समाचार बनती है।
- शिव और पार्वती, जिनके बीच यह पूरी कथा कही जा रही है, और जो बीच में एक बार स्वयं प्रेम में डूब जाते हैं।
समुद्र के इस पार
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २८ की चौपाई १
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥
चलते समय की वह गर्जना लंका के लिये एक सूचना थी और वानरों के लिये एक निमंत्रण। समुद्र लाँघकर हनुमान इस पार आये और आते ही वानरों को किलकिला सुना दिया। ध्यान दीजिये कि तुलसी यहाँ यह नहीं कहते कि उन्होंने समाचार सुनाया। पहले ध्वनि आती है, फिर वृत्तान्त। जिसने प्रतीक्षा की हो उसके लिये यही क्रम ठीक भी है, क्योंकि प्रतीक्षा में पड़ा हुआ मन ब्योरे से पहले संकेत पकड़ता है।
और वानरों ने संकेत पकड़ भी लिया। उन्होंने हनुमान को देखा और उन्हें अपना नया जन्म मिल गया। यह तुलसी का बहुत सधा हुआ शब्द है। नया जन्म उसी को मिलता है जो भीतर से मर चुका हो, और ये वानर सचमुच मर चुके थे। इनके सामने दो ही रास्ते बचे थे, या तो सीता का पता लगे या लौटकर सुग्रीव के सामने अपनी असफलता रखें, जिसका दण्ड इन्हें मालूम था।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २८ की चौपाई २ और ३
मिले सकल अति भए सुखारी । तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
प्रमाण हनुमान के मुख पर लिखा था। मुख प्रसन्न, शरीर में तेज, और इन दोनों को जोड़कर वानरों ने वह वाक्य पढ़ लिया जो अभी बोला भी नहीं गया था, कि ये रामचन्द्र का काम कर आये हैं। इसके बाद जो मिलन हुआ उसके लिये तुलसी एक ही उपमा देते हैं और वह उपमा पूरे प्रसंग का ताप बता देती है। तड़पती हुई मछली को जल मिल गया। मछली जल के बिना जीवित नहीं रहती, थोड़ी देर तड़पती है और फिर समाप्त हो जाती है। इन वानरों की दशा ठीक वही थी।
फिर सब हर्ष में भरकर रघुनाथ की ओर चले, रास्ते भर नये-नये वृत्तान्त पूछते और कहते हुए। यह छोटी सी पंक्ति बड़ी सजीव है। एक ही अभियान से लौटे हुए साथी जब साथ चलते हैं तो यही करते हैं, हर कोई अपनी देखी हुई बात कहता है और दूसरे की सुनी हुई बात पूछता है, और कथा रास्ते में ही बीस बार कही और सुनी जा चुकी होती है।
मधुवन उजड़ा
रास्ते में मधुवन पड़ा। यह सुग्रीव का सुरक्षित उपवन था, राजकीय सम्पत्ति, जिसमें बिना अनुमति हाथ डालना अपराध था। वानरों ने भीतर घुसकर अंगद की सम्मति से मधुर फल खाये। रखवाले बरजने आये, और उन्हें उत्तर घूँसों में मिला।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २८ की चौपाई ४ और दोहा २८
रखवारे जब बरजन लागे । मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ २८॥
यहाँ जो हुआ उसे अनुशासनहीनता कहकर छोड़ देना सरल है, पर तुलसी इसे उस तरह नहीं रखते। यह उन लोगों का उल्लास है जो अभी-अभी मृत्यु के मुँह से लौटे हैं। महीनों की भूख, समुद्र के किनारे का उपवास, प्राण देने का निश्चय, और अचानक यह समाचार कि काम हो गया। ऐसे में हाथ अपने आप बढ़ जाता है। और अंगद की सम्मति का उल्लेख भी अकारण नहीं है। युवराज यदि साथ है तो यह लूट नहीं रही, यह उत्सव हो गया।
रखवाले भागकर सुग्रीव के पास पहुँचे और पुकार मचायी कि युवराज वन उजाड़ रहे हैं। यह शिकायत थी। सुग्रीव ने इसे शिकायत की तरह सुना ही नहीं। उन्होंने सुना और हर्षित हो गये, क्योंकि उन्होंने उसी वाक्य के भीतर से दूसरा वाक्य पढ़ लिया, कि वानर प्रभु का कार्य कर आये हैं।
सार: लौटती हुई सेना का पहला समाचार शब्दों में नहीं आया। वह एक ध्वनि में आया, फिर एक चेहरे पर, और अन्त में एक शिकायत के भीतर छिपकर आया। जो सुनना जानता है, उसे समाचार हर रूप में मिल जाता है।
सुग्रीव का अनुमान
सुग्रीव का यह अनुमान इस प्रसंग की सबसे चतुर पंक्ति है, और सबसे स्नेहिल भी। वे मन ही मन एक तर्क करते हैं, जिसमें राजा कम और साथी अधिक बोल रहा है।
जौं न होति सीता सुधि पाई । मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २९ की चौपाई १
यदि सीता की खबर न मिली होती तो क्या ये मधुवन के फल खा पाते? भय से सूखे हुए गले से फल नहीं उतरते। जिस दल पर असफलता का बोझ हो, वह चोरी करके उत्सव नहीं मनाता, वह चुपचाप सिर झुकाये लौटता है। सो यह उजाड़ ही प्रमाण है। राजा इस प्रकार मन में विचार कर ही रहे थे कि वानर अपने पूरे समाज के साथ आ पहुँचे।
आकर सबने चरणों में सिर नवाया और कपिराज बड़े प्रेम से सबसे मिले। उन्होंने कुशल पूछी और उत्तर वही मिला जो इस पूरे काण्ड में बार-बार मिलता है, कि आपके चरणों के दर्शन से सब कुशल है, और राम की कृपा से कार्य में विशेष सफलता हुई। फिर वह वाक्य आया जिसे कहने में वानरों ने एक क्षण की भी देर नहीं की।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २९ की चौपाई ३
हे नाथ, काम हनुमान ने किया और सब वानरों के प्राण बचा लिये। यह वाक्य सारे दल की ओर से कहा गया है, किसी एक की प्रशंसा के लिये नहीं बल्कि एक तथ्य की तरह। और यह कहने वाले वही लोग हैं जो कुछ दिन पहले समुद्र तट पर प्राण त्यागने का निश्चय कर चुके थे। सुनते ही सुग्रीव फिर से हनुमान से मिले, दोबारा गले लगे, और फिर सब वानरों को साथ लेकर रघुनाथ के पास चले।
स्फटिक शिला पर वह भेंट
अब वह दृश्य आता है जिसकी ओर पूरा सुन्दरकाण्ड चल रहा था। राम ने दूर से वानरों को आते देखा, और देखते ही समझ गये कि ये कार्य किये हुए लौट रहे हैं। चाल से पता चल जाता है। जो खाली हाथ लौटता है वह धीरे आता है और आँख नहीं मिलाता।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई । परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा २९ की चौपाई ४ और दोहा २९
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ २९॥
दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे और सारे वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े। इसके बाद तुलसी एक शब्द रखते हैं जिस पर रुकना चाहिये, करुना पुंज। करुणा का ढेर। यह वह क्षण है जब प्रभु सबसे प्रेमपूर्वक गले लगकर मिले, एक-एक से, और कुशल पूछी। जिनकी अपनी पत्नी का पता अभी-अभी मिला है, वे पहले दूसरों की कुशल पूछ रहे हैं।
और वानरों का उत्तर वही रहा। हे नाथ, आपके चरणकमलों के दर्शन पा लिये, अब कुशल है। इस उत्तर में एक बात छिपी है। ये लोग महीनों से इसी भय में थे कि लौटकर क्या मुँह दिखायेंगे। अब मुँह दिखाने का अवसर मिल गया है, सो शेष सब कुशल है।
सार: राम का हर्ष विजय का हर्ष नहीं है। जो पहले कुशल पूछे और बाद में समाचार, उसके लिये समाचार लाने वाले समाचार से बड़े हैं।
जाम्बवान की साक्षी
वृत्तान्त हनुमान ने स्वयं नहीं सुनाया। यह इस प्रसंग की सबसे सूक्ष्म रचना है। जिसने किया वह चुप है, और कहने के लिये जाम्बवान आगे आते हैं, जो वृद्ध हैं, अनुभवी हैं, और जिनकी बात पर किसी को सन्देह नहीं हो सकता।
जाम्बवान पहले वह कहते हैं जो एक बूढ़े की दृष्टि ही कह सकती है। हे रघुनाथ, सुनिये, जिस पर आप दया करते हैं उसे सदा कल्याण है और निरन्तर कुशल है, देवता, मनुष्य और मुनि सब उस पर प्रसन्न रहते हैं। वही विजयी होता है, वही विनयी होता है, वही गुणों का समुद्र बन जाता है, और उसी का सुन्दर यश तीनों लोकों में फैलता है।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३० की चौपाई २ और ३
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
यह कहकर जाम्बवान अपनी बात अपने ऊपर ले आते हैं। प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ, और आज हमारा जन्म सफल हो गया। एक वृद्ध का जन्म सफल होना बड़ी बात है, क्योंकि उसके पीछे बहुत सारा जीवन पड़ा होता है जिसे वह तौलकर यह कह रहा है।
और फिर वह वाक्य, जिससे बड़ी प्रशंसा हिन्दी में शायद ही कभी लिखी गयी हो। हे नाथ, पवनपुत्र ने जो करनी की, उसका हज़ार मुखों से भी वर्णन नहीं हो सकता। कहने वाला स्वयं हार मान रहा है और इसी हार में वर्णन पूरा हो जाता है। इसके बाद जाम्बवान ने हनुमान के सुन्दर चरित रघुनाथ को सुनाये, एक-एक करके, समुद्र लाँघने से लेकर लंका जलाने तक।
राम का पहला प्रश्न
वे सारे चरित सुनकर कृपानिधि के मन को बहुत अच्छे लगे। और तब उन्होंने वह किया जो एक स्वामी नहीं करता, एक आत्मीय करता है। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान को फिर से हृदय से लगा लिया।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३० की चौपाई ४
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥
अब ध्यान दीजिये कि गले लगाने के बाद उन्होंने क्या पूछा। लंका कितनी बड़ी है, यह नहीं पूछा। रावण की सेना कितनी है, यह नहीं पूछा। किले की दीवार कितनी ऊँची है, कहाँ से टूट सकती है, समुद्र कैसे पार होगा, इनमें से कुछ नहीं पूछा। उन्होंने पूछा, हे तात, कहिये, जानकी किस प्रकार रहती हैं और अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती हैं।
इस प्रश्न में एक भय छिपा हुआ है जिसे राम ने किसी और के सामने नहीं खोला। वे जानते हैं कि जिस स्त्री से वियोग हुए इतने महीने बीत गये, वह जीवित किस बल पर है। यह पूछना कि वे रहती कैसे हैं, वस्तुतः यह पूछना है कि वे टिकी किस सहारे हैं। और इस प्रश्न का एक शब्द और भी सुनने योग्य है, तात। यह सम्बोधन बड़े के लिये नहीं, अपने बच्चे के लिये होता है। जिससे सबसे कठिन बात पूछनी हो, उसे पहले सबसे कोमल नाम से पुकारा जाता है।
नाम पाहरू, ध्यान कपाट
उत्तर में हनुमान ने जो कहा, वह इस काण्ड का सबसे प्रसिद्ध दोहा है और सम्भवतः पूरे मानस के सबसे सघन दोहों में से एक।
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३०
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ ३०॥
इसे एक छोटे से घर के चित्र की तरह पढ़िये, जिसमें एक प्राण बन्द हैं और बाहर निकलना चाहते हैं। आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, सो द्वार पर पहरेदार खड़ा है। आपका ध्यान ही किवाड़ है, सो द्वार बन्द है। और नेत्र अपने चरणों पर लगे हुए हैं, सो उस किवाड़ में ताला भी पड़ा है। अब बताइये, प्राण जायँ तो किस मार्ग से जायँ।
पूरा उत्तर एक ही रूपक में कह दिया गया और उसमें एक भी शब्द व्यर्थ नहीं गया। राम ने पूछा था कि वे अपने प्राणों की रक्षा किस प्रकार करती हैं, और हनुमान ने उत्तर यह दिया कि रक्षा वे नहीं करतीं, रक्षा आप ही करते हैं, आपका नाम और आपका ध्यान। इस उत्तर से राम को यह भी पता चल गया कि जानकी ने अपने जीवन का भार किस पर डाल रखा है।
सार: राम का पहला प्रश्न विजय का नहीं, कुशल का था। और हनुमान का उत्तर सूचना का नहीं, अवस्था का था। नाम पहरेदार है, ध्यान किवाड़ है, चरणों पर टिके नेत्र ताला हैं, और इसीलिये वे अब तक जीवित हैं।
चूड़ामणि और जानकी के वचन
इसके बाद हनुमान ने वह वस्तु निकाली जिसे वे समुद्र के इस पार तक सँभालकर लाये थे। चलते समय जानकी ने उन्हें अपनी चूड़ामणि उतारकर दी थी। रघुनाथ ने उसे लिया और लेते ही हृदय से लगा लिया।
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३१ की चौपाई १ और २
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥
फिर हनुमान ने कहा कि हे नाथ, दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी ने मुझसे कुछ वचन कहे थे। और यहाँ से आगे जो बोलता है वह हनुमान का कण्ठ है पर वचन जानकी के हैं, शब्द दर शब्द, जैसे उन्हें दिये गये थे।
पहला वचन यह था कि छोटे भाई सहित प्रभु के चरण पकड़ना। सन्देश की शुरुआत ही प्रणाम से होती है, और उसमें लक्ष्मण भी साथ हैं। फिर स्मरण कराना कि आप दीनबन्धु हैं और शरणागत के दुःख हरने वाले हैं। फिर कहना कि मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। इन तीनों वाक्यों के बाद ही वह प्रश्न आता है जिसके लिये सारी भूमिका बाँधी गयी थी, कि फिर किस अपराध से मुझे त्याग दिया गया।
यह प्रश्न शिकायत नहीं है, यद्यपि सुनने में शिकायत जैसा लगता है। यह उस व्यक्ति का प्रश्न है जिसने दोष अपने भीतर खोजने का निश्चय कर लिया हो। जो सचमुच उलाहना देता है वह पूछता है कि आपने ऐसा क्यों किया। जानकी पूछती हैं कि मुझसे क्या अपराध हुआ। दोनों प्रश्नों की दिशा उलटी है।
विरह की अगिनि
और फिर वे स्वयं ही अपना एक अवगुण मान लेती हैं, जैसे कोई अपने ऊपर स्वयं ही दोषारोपण करके दूसरे को निर्दोष कर देता हो।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३१ की चौपाई ३ और ४
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
एक दोष मैं अपना मानती हूँ, कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। पर हे नाथ, यह भी मेरा अपराध नहीं, यह नेत्रों का अपराध है, जो निकलते हुए प्राणों को हठ करके रोक लेते हैं।
अब आगे का चित्र देखिये, जो मानस के सबसे कसे हुए चित्रों में गिना जाता है। विरह आग है। शरीर रूई है। और श्वास हवा है। आग, रूई और हवा, तीनों एक साथ हों तो शरीर क्षण भर में जलकर समाप्त हो जाना चाहिये। पर नहीं जलता। क्यों नहीं जलता, इसका कारण भी उसी चौपाई में है। नेत्र अपने हित के लिये जल बरसाते रहते हैं। वे रूई को भिगोये रखते हैं, और इसलिये विरह की आग से देह जलने नहीं पाती।
नेत्रों का हित क्या है, यह भी समझ लीजिये। नेत्र चाहते हैं कि यह देह बची रहे ताकि एक बार फिर वह रूप देखने को मिले। सो आँसू करुणा से नहीं बह रहे, वे एक लोभ से बह रहे हैं, और उसी लोभ ने जानकी को जीवित रखा है। ऊपर के दोहे में जो नेत्र ताला बनकर प्राणों को रोक रहे थे, यहाँ वही नेत्र जल बरसाकर देह को बचा रहे हैं। दोनों चित्र एक ही बात के दो पहलू हैं।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला
यहाँ तक कहकर हनुमान रुक जाते हैं। और जिस प्रकार रुकते हैं, वह इस पूरे प्रसंग की सबसे संवेदनशील पंक्ति है।
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३१ की चौपाई ५ और दोहा ३१
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१॥
सीता की विपत्ति बहुत बड़ी है, हे दीनदयालु, वह बिना कही ही भली है। कहने से आपको क्लेश ही अधिक होगा। दूत का यह निर्णय अपने आप में एक सेवा है। जिसने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है, वह जानता है कि सब कुछ कह देना सदा कर्तव्य नहीं होता। जो सुनने वाले को तोड़ दे और जिससे कुछ बदले भी नहीं, उसे रोक लेना भी एक प्रकार की करुणा है।
पर रोककर वे चुप नहीं बैठते। तुरन्त वही कहते हैं जो काम का है। हे करुणानिधान, उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है, इसलिये शीघ्र चलिये और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर उन्हें ले आइये। वर्णन रोक दिया और आग्रह बढ़ा दिया। दुःख का ब्योरा नहीं दिया, दुःख की माप दे दी, कि वहाँ समय किस गति से चल रहा है।
सार: जानकी का सन्देश उलाहना नहीं था, अपने ही ऊपर लिया हुआ दोष था। और हनुमान का वर्णन पूरा नहीं हुआ, जानबूझकर नहीं हुआ। दूत ने वहीं रोक दिया जहाँ आगे कहना केवल पीड़ा देता।
प्रभु के नयनों में जल
सीता का दुःख सुनकर जो हुआ उसे तुलसी एक पंक्ति में रख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। सुख के धाम कहे जाने वाले प्रभु के कमल जैसे नेत्रों में जल भर आया।
बचन कायँ मन मम गति जाही । सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३२ की चौपाई १ और २
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई॥
और तब वे बोले, जो मन, वचन और शरीर से केवल मेरे ही आश्रय में है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है। यह वाक्य एक साथ दो काम करता है। ऊपर से यह जानकी के लिये आश्वासन है, कि जो मेरी है उस पर विपत्ति का नाम भी नहीं चढ़ सकता। और भीतर से यह अपने ही आँसुओं पर एक पर्दा है, क्योंकि आँख भर आने के तुरन्त बाद ही यह कहा जा रहा है।
हनुमान ने इस बात को पकड़ लिया और वहीं से आगे बढ़ा दिया। हे प्रभो, विपत्ति तो वही है जब आपका भजन और स्मरण न हो। इसके आगे राक्षसों की बात ही कितनी है। आप शत्रु को जीतकर जानकी को ले आयेंगे।
देखिये कि सेवक ने स्वामी के वाक्य को कैसे पूरा किया। राम ने कहा कि मेरे आश्रित को विपत्ति नहीं होती, और हनुमान ने उसकी परिभाषा दे दी, कि विपत्ति वस्तुतः है क्या। न धन का जाना विपत्ति है, न बन्दी होना, न वन में रहना। विपत्ति केवल एक है, स्मरण का छूट जाना। और यह परिभाषा उस व्यक्ति के मुँह से आ रही है जो अभी-अभी उस नगर से लौटा है जहाँ बन्दी रहने की सबसे कठोर दशा उसने अपनी आँखों से देखी है।
सुनु कपि, तोहि समान उपकारी नहिं कोउ
अब वह प्रसंग आता है जिसके आगे सारी स्तुतियाँ छोटी पड़ जाती हैं, क्योंकि यहाँ स्तुति करने वाला स्वयं राम हैं।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी । नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३२ की चौपाई ३ और ४ तथा दोहा ३२
प्रति उपकार करौं का तोरा । सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ ३२॥
सुनिये, आपके समान मेरा उपकारी कोई शरीरधारी नहीं है, न देवता, न मनुष्य, न मुनि। मैं बदले में उपकार क्या करूँ, मेरा मन भी आपके सामने नहीं हो पाता। और फिर, हे पुत्र, मैंने मन में खूब विचार करके देख लिया कि मैं आपसे उऋण नहीं हो सकता।
यह वाक्य ठहरकर पढ़ने योग्य है। जिसके पास तीनों लोक हैं, वह कह रहा है कि मेरे पास लौटाने को कुछ नहीं। ऋण चुकाने की बात वहाँ होती है जहाँ लेन-देन हो, और प्रेम में लेन-देन नहीं होता, इसीलिये वहाँ उऋण होना असम्भव है। राम यह कहकर हनुमान को अपने से ऊपर नहीं रख रहे, वे उस सेवा को मूल्य से बाहर कर रहे हैं।
और इसके बाद जो चित्र है वह शब्दों से अधिक कहता है। देवताओं के रक्षक बार-बार हनुमान की ओर देख रहे हैं, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है। जिसे देखने से तृप्ति नहीं हो रही, उसे बार-बार देखा जा रहा है। स्वामी सेवक को इस दृष्टि से देखे, यह इस काण्ड की सबसे बड़ी पूँजी है।
प्रभु के वचन सुनकर और उनका प्रसन्न मुख तथा पुलकित अंग देखकर हनुमान हर्ष से भर उठे, और प्रेम में विकल होकर चरणों में गिर पड़े, यही पुकारते हुए कि हे भगवन्, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। सोचिये, रक्षा किससे। शत्रु से नहीं। इस स्तुति से, जिसे सह पाना सेवक के लिये सबसे कठिन काम है।
सार: राम ने हनुमान को उपकारी कहा और स्वयं को उऋण न हो सकने वाला बताया। और हनुमान ने उस बड़ाई से बचने के लिये चरण पकड़ लिये। जहाँ स्वामी ऋणी होना स्वीकार करे और सेवक बड़ाई से भागे, वहीं भक्ति पूरी होती है।
चरणों में डूबा हुआ वह प्रेम
राम बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, पर प्रेम में डूबे हुए हनुमान को उठना सुहाता ही नहीं। और उसी बीच वह दृश्य बनता है जिस पर कथा कहने वाले स्वयं रुक जाते हैं। प्रभु का कर-कमल हनुमान के सिर पर है।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३३ की चौपाई १ और २
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा । कर गहि परम निकट बैठावा॥
यहाँ तुलसी एक परत और खोल देते हैं। यह सारी कथा शिव पार्वती को सुना रहे हैं, और उस दशा का स्मरण करते ही शिव स्वयं प्रेम में मग्न हो गये। कथा कहने वाला कथा के भीतर डूब गया और कुछ देर के लिये वाणी रुक गयी। फिर मन को सँभालकर शंकर ने आगे की अत्यन्त सुन्दर कथा कही।
आगे यह हुआ कि प्रभु ने हनुमान को उठाकर हृदय से लगाया, फिर हाथ पकड़कर अपने अत्यन्त निकट बैठा लिया। चरणों से उठाकर गले लगाना, फिर गले से हटाकर पास बैठा लेना, इस क्रम में दूरी घटती चली जाती है। जिसे सेवक पद पर पड़ा रहना पसन्द था, उसे स्वामी बराबर में बिठा रहे हैं।
साखामृग की बड़ाई
पास बिठाकर राम ने वह पूछा जो अब तक नहीं पूछा गया था। लंका के जलने की बात।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३३ की चौपाई ३ से ५ तथा दोहा ३३
साखामृग कै बड़ि मनुसाई । साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा । निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥
सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥ ३३॥
कहिये, रावण से सुरक्षित लंका और उसका वह बड़ा बाँका किला, वह जला कैसे। प्रश्न में ही प्रशंसा भरी हुई है, क्योंकि पूछने वाला जानता है कि वह किला कैसा था। हनुमान ने प्रभु को प्रसन्न जाना और उत्तर में जो वचन बोले, तुलसी उन्हें एक विशेषण देते हैं, अभिमान से रहित।
बन्दर का बस इतना ही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। यह उत्तर सुनकर पहले हँसी आती है, फिर ठहरकर देखिये तो यह हँसी अपने ही ऊपर है। पूरे काण्ड की सबसे बड़ी छलाँग लगाने वाला अपनी जाति के स्वभाव की सबसे मामूली बात गिना रहा है। और उसके बाद वे अपनी करनी को एक ही साँस में गिन जाते हैं, समुद्र लाँघा, सोने का नगर जलाया, राक्षसों को मारा, वन उजाड़ दिया।
यह गिनती इसलिये नहीं है कि श्रेय लिया जाये। यह गिनती इसलिये है कि अगली पंक्ति में उसे पूरा का पूरा लौटा दिया जाये। वह सब आपका प्रताप है, हे रघुनाथ, उसमें मेरी बड़ाई कुछ भी नहीं। जिसने किया वह कह रहा है कि किया मैंने नहीं। और यही कारण है कि इस काण्ड में उनका नाम सबसे ऊपर रह गया।
हे प्रभु, जिस पर आप अनुकूल हों उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं। आपके प्रभाव से रूई भी बड़वानल को जला सकती है। यह उपमा उलटी है और जानबूझकर उलटी है। नियम से आग रूई को जलाती है। पर यदि आपकी कृपा हो तो रूई समुद्र की उस आग को जला दे जिसे बुझाना किसी के वश में नहीं। लंका का जलना ठीक ऐसा ही था। एक वानर ने वह नगर जलाया जिसे तीनों लोक नहीं छू सकते थे।
और यह उपमा उसी रूई को फिर उठा लाती है जो थोड़ी देर पहले जानकी के वचनों में आयी थी। वहाँ रूई शरीर थी जो विरह की आग में जल नहीं पाती। यहाँ रूई सेवक है जो प्रभु के प्रताप से समुद्र की आग जला देता है। एक ही वस्तु, दो जगह, और दोनों जगह नियम टूटता हुआ।
सार: जिसने लंका जलायी उसने अपनी करनी को एक डाल से दूसरी डाल पर कूदना कहा। श्रेय लौटा देने से काम छोटा नहीं हुआ, करने वाला बड़ा हो गया।
अनपायनी भक्ति
अब पूछने का अवसर हनुमान के पास था। स्वामी स्वयं कह चुके हैं कि मैं उऋण नहीं हो सकता, प्रसन्न हैं, पास बिठाये हुए हैं। ऐसे क्षण में जो माँगा जाता है, वही मन की असली माँग होती है।
नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३४ की चौपाई १ और २
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
हे नाथ, अत्यन्त सुख देने वाली अपनी अनपायनी भक्ति कृपा करके दीजिये। अनपायनी, अर्थात् जो कभी घटे नहीं, छूटे नहीं, जिसका नाश न हो। न राज्य माँगा, न बल, न कोई वरदान जो युद्ध में काम आये। जो पहले से पास था, वही माँगा, इस विनती के साथ कि वह कभी छूटने न पाये।
और हनुमान की उस अत्यन्त सरल वाणी को सुनकर प्रभु ने कहा, एवमस्तु। ऐसा ही हो। तुलसी यहाँ बीच में एक सम्बोधन रख देते हैं, हे भवानी, और हमें फिर याद दिला देते हैं कि यह सब कैलास पर कहा जा रहा है, और कहने वाले शिव हैं जो अभी-अभी इसी प्रसंग में स्वयं डूब चुके थे।
फिर एक बात कही जाती है जो पाठक के लिये है, कथा के पात्रों के लिये नहीं। हे उमा, जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी कोई बात सुहाती ही नहीं। और यह स्वामी तथा सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, उसने रघुनाथ के चरणों की भक्ति पा ली।
यह पंक्ति इस पूरे प्रसंग पर मुहर लगा देती है। जो अभी-अभी पढ़ा गया, वह केवल वृत्तान्त नहीं था। पूछना और उत्तर देना, बड़ाई करना और बड़ाई लौटा देना, ऋणी होना और उऋण न हो पाना, यही वह संवाद है जिसे हृदय में उतार लेना अपने आप में भक्ति पा लेना है।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे
प्रभु के वचन सुनकर सारा वानर समाज जय-जयकार कर उठा। कृपालु की जय, आनन्दकन्द की जय। और उसी उल्लास के बीच राम ने कपिराज सुग्रीव को बुलाकर वह वाक्य कहा जिसकी प्रतीक्षा सुन्दरकाण्ड आरम्भ से कर रहा था।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
सुन्दरकाण्ड · दोहा ३४ की चौपाई ३ और ४ तथा दोहा ३४
अब बिलंबु केहि कारन कीजे । तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ ३४॥
चलने की तैयारी कीजिये। अब विलम्ब किस कारण किया जाय, वानरों को तुरन्त आज्ञा दीजिये। जो अभी तक समाचार का प्रसंग था, वह एक वाक्य में अभियान बन गया। दूत लौट आया, समाचार मिल गया, चिह्न मिल गया, सन्देश मिल गया। अब आगे केवल एक काम शेष है।
ऊपर आकाश में देवता यह तैयारी देख रहे थे। उन्होंने बहुत सारे फूल बरसाये और हर्षित होकर अपने-अपने लोकों को चले गये। देवताओं का लौट जाना यहाँ एक संकेत है। जिनका काम प्रतीक्षा करना था, उनकी प्रतीक्षा पूरी हो गयी, क्योंकि जिस दिन के लिये उन्होंने राम को धरती पर बुलाया था वह दिन अब तय हो चुका है।
और अन्तिम दोहे में वह दृश्य खुलता है जिससे आगे का काण्ड चलेगा। सुग्रीव ने शीघ्र ही बुलावा भेजा, सेनापतियों के समूह आ गये, और अनेक रंगों के वानर तथा भालुओं के झुंड इकट्ठे होने लगे, जिनके बल की कोई तुलना नहीं। सुन्दरकाण्ड एक अकेले दूत की छलाँग से आरम्भ हुआ था और एक पूरी सेना के जुटने पर समाप्त हो रहा है।
सार: माँगने का अवसर मिला तो हनुमान ने वही माँगा जो पहले से पास था, इस शर्त के साथ कि वह कभी घटे नहीं। और उसी क्षण समाचार का प्रसंग समाप्त होकर प्रस्थान का प्रसंग आरम्भ हो गया।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरे प्रसंग में सबसे देर तक साथ रहने वाली बात वह नहीं है जो कही गयी, वह है जो कहने से रोक ली गयी। हनुमान ने सीता की विपत्ति का पूरा ब्योरा नहीं दिया, और उन्होंने इसका कारण भी नहीं छिपाया, कि वह बिना कही ही भली है। जो समाचार लेकर आते हैं वे प्रायः यह भूल जाते हैं कि समाचार देना और चोट पहुँचाना दो अलग काम हैं। जितना कहने से कुछ बदलता हो उतना कहना कर्तव्य है। उससे आगे का शेष केवल अपने को सच्चा सिद्ध करना है।
दूसरी बात उस प्रश्न में है जो राम ने सबसे पहले पूछा। सामने विजय का पूरा वृत्तान्त रखा हुआ था, लंका जल चुकी थी, राक्षस मारे जा चुके थे, और उन्होंने पूछा कि वे रहती कैसे हैं। जिसे पहले किसका ध्यान आता है, इसी से यह तय होता है कि उसके भीतर सबसे ऊपर कौन है। और जिसने उत्तर दिया उसने भी सूचना नहीं दी, अवस्था बतायी, कि प्राण किस पहरे में, किस किवाड़ के पीछे और किस ताले में बन्द हैं।
और तीसरी बात, जो हमें सबसे अधिक अपनी ओर खींचती है। जिसने समुद्र लाँघा, नगर जलाया और सेना को नया जन्म दिया, उसने अपनी करनी का पूरा हिसाब चार शब्दों में लौटा दिया, कि इसमें मेरी बड़ाई कुछ भी नहीं। और जब पुरस्कार माँगने का अवसर आया तो उसने वही माँगा जो उसके पास पहले से था, केवल यह जोड़कर कि वह कभी घटे नहीं। जो काम कर चुकने के बाद श्रेय छोड़ देता है, उसका नाम लोग सबसे देर तक लेते हैं। यह इस प्रसंग की सीख नहीं है, यह इसका स्वभाव है, और तुलसी ने इसे उपदेश की तरह नहीं, एक बैठक की तरह हमारे सामने रख दिया, जिसमें स्वामी बार-बार सेवक को देख रहे हैं और आँख नहीं हटा पा रहे।
स्रोत: श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा २८ से दोहा ३४, गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण, मूल पाठ के साथ हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।