लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

एक चूड़ामणि, और वह बात जो बिना कहे ही भली थी

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रामचरितमानससुन्दरकाण्डसमाचार और राम-मिलन
मधुवन उजड़ा, सुग्रीव समझ गये कि काम हो गया। स्फटिक शिला पर बैठे राम ने वह प्रश्न पूछा जिसके उत्तर में हनुमान ने सीता के आँसुओं की बात कही।

लंका की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक गर्जना उठी। जिस नगर ने अभी अपनी छतें जलती देखी थीं, उसी में उस ध्वनि से राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। यह किसी शस्त्र का काम नहीं था, केवल लौटते हुए दूत का स्वर था।

और समुद्र के दूसरे किनारे पर वानरों की टोली दिन गिनते-गिनते थक चुकी थी। वहाँ उसी क्षण एक दूसरी आवाज़ पहुँची: किलकिला, हर्ष की वह पुकार जो शब्दों से पहले आती है। उसी ने बता दिया कि खोज पूरी हो गयी। आगे का प्रसंग उसी ध्वनि के फैलने की कथा है: समुद्र तट से मधुवन तक, मधुवन से सुग्रीव तक। और सुग्रीव से उस स्फटिक शिला तक जहाँ दो भाई बैठे थे।


लौटे हुए दूत की सभा

  • हनुमान, जो लंका से लौट रहे हैं, और जिनके मुख की प्रसन्नता देखकर औरों को अपना नया जन्म लगता है।
  • राम, जो स्फटिक शिला पर बैठे हैं, और जिनका पहला प्रश्न विजय के बारे में नहीं है।
  • लक्ष्मण, जो उसी शिला पर बड़े भाई के साथ हैं।
  • सीता, जो इस प्रसंग में उपस्थित नहीं हैं, फिर भी पूरा प्रसंग उन्हीं का है: उनकी चूड़ामणि और उनके भेजे हुए वचन।
  • सुग्रीव, वानरों के राजा, जो मधुवन उजड़ने की शिकायत को सफलता का प्रमाण समझ लेते हैं।
  • अंगद, युवराज, जिनकी सम्मति से मधुवन में हाथ पड़ता है।
  • जाम्बवान, जो राम के सामने हनुमान की करनी के गवाह बनते हैं और अपना जन्म सफल मानते हैं।
  • मधुवन के रखवाले, जिनकी शिकायत ही सुग्रीव तक पहुँचा पहला समाचार बनती है।
  • शिव और पार्वती, जिनके बीच यह कथा कही जा रही है। बीच में एक बार शिव ख़ुद प्रेम में डूब जाते हैं।

समुद्र के इस पार

चलते समय की वह गर्जना लंका के लिये सूचना थी, और वानरों के लिये बुलावा। समुद्र लाँघकर हनुमान इस पार आये और आते ही वानरों को किलकिला सुना दिया। तुलसी यहाँ यह नहीं कहते कि उन्होंने समाचार सुनाया। पहले ध्वनि आती है, फिर वृत्तान्त। प्रतीक्षा में पड़ा मन ब्योरे से पहले संकेत पकड़ता है।

वानरों ने संकेत पकड़ लिया। हनुमान को देखकर सब हर्षित हुए, और उन्हें लगा कि उनका नया जन्म हुआ है। नया जन्म उसी का होता है जो भीतर से मर चुका हो। ये वानर सचमुच हार चुके थे। या तो सीता का पता लगता, या लौटकर सुग्रीव के सामने अपनी असफलता रखनी पड़ती, जिसका दण्ड उन्हें मालूम था।

प्रमाण हनुमान के मुख पर लिखा था: मुख प्रसन्न, शरीर में तेज। इन्हीं को देखकर वानरों ने वह बात पढ़ ली जो अभी कही भी नहीं गयी थी, कि ये राम का काम कर आये हैं। फिर सब उनसे मिले और बहुत सुखी हुए, जैसे तड़पती मछली को जल मिल गया हो। जल के बिना मछली थोड़ी देर ही तड़पती है, और इन वानरों की दशा ठीक वही थी।

फिर सब हर्ष से भरकर राम की ओर चले, रास्ते भर नये-नये वृत्तान्त पूछते और कहते हुए। एक अभियान से लौटे साथी यही करते हैं। हर कोई अपनी देखी बात कहता है और दूसरे की पूछता है।


मधुवन उजड़ा

रास्ते में मधुवन पड़ा, सुग्रीव का सुरक्षित बाग़, जिसके अपने रखवाले थे। वानरों ने भीतर घुसकर अंगद की सम्मति से मीठे फल खाये। रखवाले रोकने आये, और उन्हें उत्तर घूँसों में मिला, तो सब भाग छूटे।

इसे अनुशासनहीनता कहकर छोड़ देना आसान है, पर तुलसी इसे ऐसे नहीं रखते। यह उनका उल्लास है जो अभी-अभी मौत के मुँह से लौटे हैं: समुद्र किनारे का उपवास, प्राण देने का निश्चय, और अचानक यह समाचार कि काम हो गया। और अंगद की सम्मति का उल्लेख अकारण नहीं। युवराज साथ है, तो यह लूट नहीं, उत्सव है।

रखवाले भागकर सुग्रीव के पास पहुँचे और पुकार मचायी कि युवराज वन उजाड़ रहे हैं। सुग्रीव ने इसे शिकायत की तरह सुना ही नहीं। वे हर्षित हो गये, क्योंकि उन्होंने उसी वाक्य में दूसरा वाक्य पढ़ लिया: वानर राम का काम कर आये हैं।


सुग्रीव का अनुमान

सुग्रीव का यह अनुमान इस प्रसंग की बहुत चतुर, और बहुत स्नेह भरी बात है। वे मन ही मन तर्क करते हैं, और उसमें राजा कम, साथी ज़्यादा बोल रहा है।

यदि सीता की ख़बर न मिली होती, तो क्या ये मधुवन के फल खा पाते? डर से सूखे गले से फल नहीं उतरते। जिस दल पर असफलता का बोझ हो, वह उत्सव नहीं मनाता, चुपचाप सिर झुकाये लौटता है। सो यह उजाड़ ही प्रमाण है। सुग्रीव यह सोच ही रहे थे कि वानर अपनी पूरी टोली के साथ आ पहुँचे।

आकर सबने उनके चरणों में सिर नवाया, और सुग्रीव सबसे बड़े प्रेम से मिले। उन्होंने कुशल पूछी, तो उत्तर मिला कि आपके चरणों के दर्शन से सब कुशल है, और राम की कृपा से काम में विशेष सफलता हुई है। फिर वह बात आयी जिसे कहने में वानरों ने एक क्षण की देर नहीं की।

हे नाथ, काम हनुमान ने किया, और सब वानरों के प्राण बचा लिये। यह बात पूरे दल की ओर से, एक तथ्य की तरह कही गयी है। कहनेवाले वही हैं जो समुद्र तट पर प्राण त्यागने का निश्चय कर चुके थे। सुनकर सुग्रीव फिर से हनुमान से गले मिले, और सब वानरों को साथ लेकर राम के पास चले।


स्फटिक शिला पर वह भेंट

अब वह दृश्य आता है जिसकी ओर पूरा प्रसंग चल रहा था। राम ने वानरों को काम करके आते देखा, और उनके मन में विशेष हर्ष हुआ।

दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे, और सारे वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े। तुलसी यहाँ राम को करुणा का ढेर कहते हैं। यही इस क्षण का अर्थ है: राम एक-एक से प्रेम से गले लगकर मिले और कुशल पूछी। जिनकी अपनी पत्नी का पता अभी मिला है, वे पहले दूसरों की कुशल पूछ रहे हैं।

वानरों का उत्तर वही रहा: हे नाथ, आपके चरणकमलों के दर्शन पा लिये, अब कुशल है। इसमें एक बात छिपी है। वे इसी भय में थे कि सीता की ख़बर लिये बिना लौटे तो सुग्रीव मार डालेंगे। अब वह भय नहीं रहा, सो सब कुशल है।


जाम्बवान की साक्षी

वृत्तान्त हनुमान ख़ुद नहीं सुनाते। जिसने किया वह चुप है। कहने के लिये जाम्बवान आगे आते हैं, जो बूढ़े हैं, अनुभवी हैं, और जिनकी बात पर किसी को सन्देह नहीं हो सकता।

जाम्बवान पहले वह कहते हैं जो एक बूढ़े की दृष्टि ही कह सकती है। हे राम, सुनिये, जिस पर आप दया करते हैं उसका सदा कल्याण है और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सब उस पर प्रसन्न रहते हैं। वही विजयी होता है, वही विनयी, वही गुणों का समुद्र, और उसी का यश तीनों लोकों में फैलता है।

फिर वे बात अपने ऊपर ले आते हैं: आपकी कृपा से सब काम हुआ, और आज हमारा जन्म सफल हो गया। एक बूढ़े का यह कहना बड़ी बात है, क्योंकि उसके पीछे बहुत सारा जीवन है जिसे तौलकर वह यह कह रहा है।

और फिर: हे नाथ, पवन के पुत्र ने जो करनी की, उसका हज़ार मुखों से भी वर्णन नहीं हो सकता। इसके बाद जाम्बवान ने हनुमान के सारे काम राम को सुनाये।


राम का पहला प्रश्न

वे सब सुनकर राम के मन को बहुत अच्छे लगे। उन्होंने वह किया जो कोई स्वामी नहीं, कोई अपना करता है: हर्षित होकर हनुमान को फिर हृदय से लगा लिया।

अब देखिये कि गले लगाने के बाद उन्होंने क्या पूछा। लंका कितनी बड़ी है, रावण की सेना कितनी है, किले की दीवार कितनी ऊँची है, समुद्र कैसे पार होगा, इनमें से कुछ नहीं। उन्होंने पूछा: हे तात, कहिये, सीता किस प्रकार रहती हैं, और अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती हैं?

वे रहती कैसे हैं, यह पूछना असल में यह पूछना है कि वे किस सहारे टिकी हैं। और सम्बोधन है तात, स्नेह का शब्द। जिससे सबसे कठिन बात पूछनी हो, उसे पहले कोमल नाम से पुकारा जाता है।


नाम पहरेदार, ध्यान किवाड़

उत्तर में हनुमान ने एक चित्र खींचा।

इसे एक छोटे से घर के चित्र की तरह पढ़िये, जिसमें प्राण बन्द हैं और बाहर निकलना चाहते हैं। आपका नाम रात-दिन पहरा देता है, सो द्वार पर पहरेदार खड़ा है। आपका ध्यान ही किवाड़ है, सो द्वार बन्द है। और आँखें अपने ही चरणों पर टिकी हैं, सो किवाड़ पर ताला भी पड़ा है। अब बताइये, प्राण जायें तो किस मार्ग से जायें?

पूरा उत्तर एक ही रूपक में है, और एक भी शब्द व्यर्थ नहीं। राम ने पूछा था कि सीता अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती हैं। हनुमान ने बताया कि रक्षा वे नहीं करतीं, राम का नाम और राम का ध्यान करते हैं। इससे राम को यह भी पता चल गया कि सीता ने अपने जीवन का भार किस पर डाल रखा है।


चूड़ामणि और सीता के वचन

फिर हनुमान ने वह वस्तु निकाली जिसे वे समुद्र के इस पार तक सँभालकर लाये थे। चलते समय सीता ने अपनी चूड़ामणि उतारकर उन्हें दी थी। राम ने उसे लिया और लेते ही हृदय से लगा लिया।

फिर हनुमान ने कहा: हे नाथ, दोनों नेत्रों में जल भरकर सीता ने मुझसे कुछ वचन कहे थे। आगे स्वर हनुमान का है, पर वचन सीता के।

पहला वचन था कि छोटे भाई सहित राम के चरण पकड़ना। सन्देश प्रणाम से शुरू होता है, और उसमें लक्ष्मण भी साथ हैं। फिर याद दिलाना कि आप दीनों के बन्धु हैं और शरणागत का दुख हरनेवाले हैं। फिर यह कि मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। इन तीनों के बाद वह प्रश्न आता है जिसके लिये यह सब कहा गया: फिर किस अपराध से मुझे त्याग दिया?

यह प्रश्न सुनने में शिकायत जैसा लगता है, पर है नहीं। उलाहना देनेवाला पूछता है कि आपने ऐसा क्यों किया। सीता पूछती हैं कि मुझसे क्या अपराध हुआ। वे दोष अपने भीतर खोज रही हैं।


विरह की आग

और फिर वे ख़ुद ही अपना एक दोष मान लेती हैं, जैसे अपने ऊपर दोष लेकर दूसरे को निर्दोष कर रही हों।

एक दोष मैं अपना मानती हूँ, कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। पर हे नाथ, यह भी नेत्रों का अपराध है, जो निकलते हुए प्राणों को हठ करके रोक लेते हैं।

अब आगे का चित्र: विरह आग है, शरीर रूई है, और साँस हवा। आग, रूई और हवा साथ हों तो शरीर क्षण भर में जल जाना चाहिये। पर नहीं जलता, और कारण भी वे ख़ुद बताती हैं: नेत्र अपने हित के लिये जल बरसाते रहते हैं, रूई को भिगोये रखते हैं। इसलिये विरह की आग से देह जलने नहीं पाता।

नेत्रों का हित क्या है? पोद्दार कहते हैं: राम का रूप देखकर सुखी होना। नेत्र चाहते हैं कि यह देह बचा रहे ताकि एक बार फिर वह रूप देखने को मिले। इसी चाह ने सीता को जीवित रखा है। हनुमान के पहले उत्तर में जो आँखें ताला बनकर प्राणों को रोक रही थीं, यहाँ वही जल बरसाकर देह को बचा रही हैं।


जो बिना कहे ही भली है

यहाँ तक कहकर हनुमान रुक जाते हैं, और उनका रुकना इस प्रसंग का बहुत संवेदनशील क्षण है।

हे दीनदयालु, सीता की विपत्ति बहुत बड़ी है, वह बिना कही ही भली है। पोद्दार जोड़ते हैं कि कहने से आपको बड़ा क्लेश होगा। जिसने सब अपनी आँखों से देखा है, वह जानता है कि सब कुछ कह देना हमेशा कर्तव्य नहीं होता। जो सुननेवाले को तोड़ दे और जिससे कुछ बदले भी नहीं, उसे रोक लेना भी करुणा है।

पर रोककर वे चुप नहीं बैठते, तुरन्त काम की बात कहते हैं: उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। इसलिये जल्दी चलिये, और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर उन्हें ले आइये। दुख का ब्योरा नहीं दिया, दुख की माप दे दी: वहाँ समय किस गति से चल रहा है।


राम की आँखों में जल

सीता का दुख सुनकर जो हुआ, तुलसी उसे बस इतना कहकर रख देते हैं: राम के कमल जैसे नेत्रों में जल भर आया।

और तब वे बोले: जो मन, वचन और शरीर से केवल मेरे आश्रय में है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है? यह सीता के लिये आश्वासन है, और आँख भर आने के तुरन्त बाद कहा गया है।

हनुमान ने इसी बात को पकड़कर आगे बढ़ाया: हे प्रभु, विपत्ति तो तभी है जब आपका स्मरण और भजन न हो। राक्षसों की बात ही कितनी है, आप शत्रु को जीतकर सीता को ले आयेंगे।

सेवक ने स्वामी का वाक्य पूरा कर दिया। राम ने कहा कि मेरे आश्रित को विपत्ति नहीं होती। हनुमान ने बताया कि विपत्ति असल में है क्या: न धन का जाना, न बन्दी होना, न वन में रहना, केवल स्मरण का छूट जाना। और यह बात वह कह रहा है जो अभी-अभी बन्दी की कठोर दशा अपनी आँखों से देखकर लौटा है।


आपके समान उपकारी कोई नहीं

अब वह प्रसंग आता है जिसमें प्रशंसा करनेवाले ख़ुद राम हैं।

सुनिये, आपके समान मेरा उपकारी कोई शरीरधारी नहीं, न देवता, न मनुष्य, न मुनि। मैं बदले में क्या उपकार करूँ, मेरा मन भी आपके सामने नहीं हो पाता। हे पुत्र, मैंने मन में ख़ूब विचार करके देख लिया कि मैं आपसे उऋण नहीं हो सकता।

जो देवताओं का रक्षक है, वह कह रहा है कि उसके पास लौटाने को कुछ नहीं। ऋण वहाँ चुकता है जहाँ लेन-देन हो, और प्रेम में लेन-देन नहीं होता। राम यह कहकर उस सेवा को किसी मोल से बाहर कर देते हैं।

फिर राम बार-बार हनुमान की ओर देखते हैं, नेत्रों में प्रेम के आँसू हैं और शरीर पुलकित है। जिसे देखने से जी नहीं भरता, उसे बार-बार देखा जा रहा है।

राम के वचन सुनकर और उनका प्रसन्न मुख और पुलकित शरीर देखकर हनुमान हर्ष से भर गये। वे प्रेम में विकल होकर उनके चरणों में गिर पड़े, यही पुकारते हुए कि हे भगवन्, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। रक्षा शत्रु से नहीं, इस प्रशंसा से, जिसे सहना सेवक के लिये सबसे कठिन है।


चरणों में डूबा हुआ वह प्रेम

राम बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, पर प्रेम में डूबे हनुमान को उठना सुहाता ही नहीं। उसी बीच वह दृश्य बनता है जिस पर कथा कहनेवाला ख़ुद रुक जाता है: राम का हाथ हनुमान के सिर पर है।

यहाँ तुलसी एक परत और खोलते हैं। यह कथा शिव पार्वती को सुना रहे हैं, और उस दशा को याद करते ही शिव ख़ुद प्रेम में मग्न हो गये। कहनेवाला कथा में डूब गया, और कुछ देर वाणी रुक गयी। फिर मन को सँभालकर शिव ने आगे की कथा कही।

राम ने हनुमान को उठाकर हृदय से लगाया, फिर हाथ पकड़कर अपने बहुत निकट बैठा लिया। चरणों से उठाकर गले लगाना, फिर पास बैठा लेना: इस क्रम में दूरी घटती जाती है। जिसे चरणों में पड़ा रहना अच्छा लगता था, उसे स्वामी अपने इतने पास बिठा रहे हैं।


बंदर की बड़ाई

पास बिठाकर राम ने वह पूछा जो अब तक नहीं पूछा था: लंका के जलने की बात।

कहिये, रावण की रखवाली में रहनेवाली लंका, और उसका वह बहुत मज़बूत किला, आपने कैसे जलाया? पूछनेवाला जानता है कि वह किला कैसा था। हनुमान ने राम को प्रसन्न जाना, और जो वचन बोले, उन्हें तुलसी अभिमान से रहित कहते हैं।

बंदर का बस इतना ही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। यह सुनकर पहले हँसी आती है, पर यह हँसी हनुमान अपने ऊपर ही कर रहे हैं। समुद्र लाँघनेवाला अपनी जाति की सबसे मामूली बात गिना रहा है। और फिर वे अपनी करनी एक साँस में गिन जाते हैं: समुद्र लाँघा, सोने का नगर जलाया, राक्षसों को मारा, वन उजाड़ा।

यह गिनती श्रेय लेने के लिये नहीं, उसे पूरा लौटा देने के लिये है। हे नाथ, वह सब आपका प्रताप है, उसमें मेरी बड़ाई कुछ भी नहीं। जिसने किया, वह कह रहा है कि किया मैंने नहीं।

हे प्रभु, जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं। आपके प्रभाव से रूई भी बड़वानल को, समुद्र की उस आग को, जला सकती है। उपमा जानबूझकर उलटी है। नियम से आग रूई को जलाती है, पर आपकी कृपा हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

और यह उपमा वही रूई फिर उठा लाती है जो थोड़ी देर पहले सीता के वचनों में आयी थी। वहाँ रूई शरीर थी जो विरह की आग में जल नहीं पाती। यहाँ रूई सेवक है जो राम के प्रताप से समुद्र की आग जला देता है। दोनों जगह नियम टूटता है।


कभी न छूटनेवाली भक्ति

किसी ने वर देने की बात नहीं कही थी, हनुमान ने अपनी ओर से माँगा। स्वामी कह चुके हैं कि वे उऋण नहीं हो सकते, प्रसन्न हैं, पास बिठाये हुए हैं। ऐसे क्षण में जो माँगा जाये, वही मन की असली माँग होती है।

हे नाथ, बहुत सुख देनेवाली अपनी वह भक्ति कृपा करके दीजिये जो कभी घटे नहीं, कभी छूटे नहीं। न राज्य माँगा, न बल, न युद्ध में काम आनेवाला कोई वरदान। जो पहले से पास था वही माँगा, इस विनती के साथ कि वह कभी छूटे नहीं।

हनुमान की यह बहुत सरल वाणी सुनकर राम ने कहा: एवमस्तु, ऐसा ही हो। यहाँ तुलसी शिव से एक सम्बोधन कहलवाते हैं, हे भवानी, और याद दिला देते हैं कि यह सब कैलास पर कहा जा रहा है। कहनेवाले शिव अभी इसी प्रसंग में ख़ुद डूब चुके थे।

फिर शिव वह बात कहते हैं जो पाठक के लिये है: हे उमा, जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर कुछ और सुहाता ही नहीं। और स्वामी और सेवक का यह संवाद जिसके हृदय में उतर गया, उसने राम के चरणों की भक्ति पा ली।

यह बात पूरे प्रसंग पर मुहर लगा देती है। जो अभी पढ़ा गया, वह केवल वृत्तान्त नहीं था। पूछना और उत्तर देना, बड़ाई करना और बड़ाई लौटा देना, ऋणी होना और उऋण न हो पाना। यही वह संवाद है जिसे हृदय में उतार लेना अपने आप भक्ति पा लेना है।


अब देर किस बात की

राम के वचन सुनकर सारे वानर जय-जयकार कर उठे: कृपालु, आनन्द के मूल राम की जय हो। उसी उल्लास के बीच राम ने सुग्रीव को बुलाकर कहा कि चलने की तैयारी कीजिये।

अब देर किस कारण की जाये, वानरों को तुरन्त आज्ञा दीजिये। जो अब तक समाचार का प्रसंग था, वह एक वाक्य में अभियान बन गया। दूत लौट आया, समाचार मिला, चिह्न मिला, सन्देश मिला, और अब आगे एक ही काम बचा है।

आकाश में देवता यह तैयारी देख रहे थे, जिसे पोद्दार रावण-वध की तैयारी बताते हैं। उन्होंने बहुत से फूल बरसाये, और हर्षित होकर अपने-अपने लोकों को चले गये।

अन्त में वह दृश्य खुलता है जिससे आगे का काण्ड चलेगा। सुग्रीव ने तुरन्त बुलावा भेजा, सेनापतियों के समूह आ गये। अनेक रंगों के वानरों और भालुओं के झुंड इकट्ठे होने लगे, जिनके बल की कोई तुलना नहीं। जो प्रसंग एक दूत की छलाँग से शुरू हुआ था, वह एक पूरी सेना के जुटने पर ख़त्म होता है।


बिना कही बात

जो कहा गया, उससे भारी वह है जो कहने से रोक लिया गया। हनुमान ने सीता की विपत्ति का पूरा ब्योरा नहीं दिया, और कारण भी नहीं छिपाया: वह बिना कही ही भली है। समाचार लानेवाले अक्सर भूल जाते हैं कि समाचार देना और चोट पहुँचाना दो अलग काम हैं। जितना कहने से कुछ बदले, उतना कहना कर्तव्य है।

दूसरी बात उस प्रश्न की है जो राम ने सबसे पहले पूछा। जाम्बवान अभी हनुमान की करनी सुना चुके थे, और राम ने पूछा कि सीता रहती कैसे हैं। किसका ध्यान पहले आता है, इसी से पता चलता है कि भीतर सबसे ऊपर कौन है। और उत्तर देनेवाले ने भी सूचना नहीं, अवस्था बतायी: प्राण किस पहरे में, किस किवाड़ के पीछे और किस ताले में बन्द हैं।

तीसरी बात हमें सबसे ज़्यादा अपनी ओर खींचती है। जिसने समुद्र लाँघा, नगर जलाया और पूरी टोली को नया जीवन दिया, उसने अपनी करनी का पूरा हिसाब एक वाक्य में लौटा दिया, कि इसमें मेरी बड़ाई कुछ भी नहीं। और जब अपनी ओर से कुछ माँगा, तो वही जो उसके पास पहले से था, बस यह जोड़कर कि वह कभी घटे नहीं। तुलसी इसे उपदेश की तरह नहीं, एक बैठक की तरह सामने रखते हैं। उसमें स्वामी बार-बार सेवक को देख रहे हैं और आँख नहीं हटा पा रहे।

स्रोत: श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 28 से दोहा 34, गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।