लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

एक लात, और वह छाती जो खुली रही

इस पृष्ठ पर
रामचरितमानससुन्दरकाण्डविभीषण-शरणागति
रावण की भरी सभा में विभीषण ने वही कहा जो हित का था, बदले में लात खायी। समुद्र के इस पार राम ने उन्हें गले लगाकर शरण दी।

समुद्र की ओर चलनेवाली उस सेना के आगे कोई नगाड़ा नहीं बजा। वह रीछों और वानरों की सेना थी, न उसके पास रथ थे न कवच। उसका सारा साज़ इतना था कि हर सिर एक बार झुका और फिर उठ गया।

जिनके आगे वे सिर झुका रहे थे, उन्होंने कुछ कहा नहीं, केवल आँख उठाकर पूरी सेना पर एक दृष्टि डाली। तुलसी उस दृष्टि को ऐसे गिनते हैं जैसे कोई शस्त्र बाँटा गया हो। उसके बाद वानरों का वर्णन बदल जाता है। वे पंख लगे पहाड़ हो जाते हैं।


लंका और राम का डेरा

  • राम, जो इस प्रसंग में एक बार भी शस्त्र नहीं उठाते, फिर भी इसी में उनका एक बड़ा प्रण सुनायी देता है।
  • विभीषण, रावण के छोटे भाई, जो लंका में रहकर भी लंका के नहीं हैं, और जिनकी नीति उन्हें घर से बाहर कर देती है।
  • रावण, जिसे अपनी भुजाओं का हिसाब याद है, अपने कुल का नहीं।
  • मंदोदरी, जो एकान्त में हाथ जोड़कर वह उपाय बताती हैं जो अकेला उपाय था।
  • माल्यवंत, रावण का बहुत समझदार मन्त्री, जो एक बार बोलता है और फिर घर लौट जाता है।
  • सुग्रीव, जिनकी नीति भी ठीक है और सन्देह भी, फिर भी जिनकी बात नहीं मानी जाती।
  • हनुमान, जो राम का वचन सुनकर सबसे पहले प्रसन्न होते हैं।
  • लक्ष्मण, जिनका नाम यहाँ भरोसे की तरह लिया जाता है।
  • सीता, जो लंका में हैं, और जिनके बायें अंग इस प्रसंग के शुरू में ही फड़क उठते हैं।

कूच का दिन

सब राम के चरणों में सिर नवाते हैं, और महाबली रीछ और वानर गरज रहे हैं। राम ने सारी सेना देखी और कमल जैसे नेत्रों से कृपा करके उसकी ओर दृष्टि डाली। न आदेश, न भाषण, और वही दृष्टि काफ़ी हुई। उस कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर ऐसे हो गये मानो बड़े पर्वतों को पंख लग गये हों। इसी हर्ष में राम ने कूच किया, और अनेक सुन्दर शुभ शकुन हुए।

तुलसी जोड़ते हैं कि जिनकी कीर्ति ही सब मंगलों से भरी है, उनके चलने पर शकुन होना नियम है। पोद्दार इसे लीला की मर्यादा कहते हैं। और उसी क्षण समुद्र के उस पार बन्दी सीता को भी बिना किसी दूत के ख़बर मिल जाती है। उनके बायें अंग फड़क उठते हैं।

जो शकुन सीता के लिये शुभ थे, वही रावण के लिये अपशकुन हुए। फिर सेना चली। नख ही जिनके शस्त्र हैं, ऐसे रीछ और वानर पर्वत और पेड़ उठाये कोई आकाश से, कोई धरती से चले। उनकी सिंह जैसी गर्जना से दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ उठे।

दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत काँप उठे, समुद्र खलबला गये। इस उथल-पुथल से सबसे ज़्यादा प्रसन्न गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग और किन्नर हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि अब उनके दुख टल गये। करोड़ों भयानक वानर योद्धा कटकटाते हुए दौड़ रहे हैं। दौड़ते हुए भी वे युद्ध का नारा नहीं, राम की जय बोल रहे हैं और उनके गुण गा रहे हैं।

सेना का बोझ शेषनाग भी नहीं सह पाते। वे बार-बार कच्छप की कठोर पीठ दाँतों से पकड़ लेते हैं, मानो इस प्रस्थान की कथा वहीं लिख रहे हों।

समुद्र तट पर

इस प्रकार राम समुद्र के तट पर जा उतरे, और रीछ और वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे। न शिविर का वर्णन, न व्यूह, न ललकार। इस प्रसंग का असली काम तलवार से नहीं होगा।

लंका में वह डर जो आग के बाद बचा रहा

उधर लंका में, जबसे हनुमान नगर जलाकर गये, राक्षस डरे-डरे रहने लगे। अपने-अपने घरों में सब यही सोचते हैं कि अब राक्षसकुल को बचाने का कोई उपाय नहीं। यह डर सभा में नहीं, घरों में है।

नगर के लोग आपस में एक ही बात कहते हैं: जिसके दूत के बल का वर्णन नहीं हो सकता, उसके ख़ुद आने पर हमारी क्या भलाई होगी? दूतियों के मुँह से यही बात महल के भीतर पहुँचती है, और सुनकर मंदोदरी बहुत व्याकुल हो जाती हैं।

मंदोदरी की विनती

वे एकान्त में हाथ जोड़कर पति के चरणों में लगीं और नीति से भरी वाणी बोलीं: हे प्रियतम, हरि से विरोध छोड़ दीजिये। मेरी बात को बहुत हितकर जानकर हृदय में रखिये। जो उपाय वे बताती हैं, उसमें भी पति का मान बचा रहता है।

हरि के दूत की करनी याद आते ही राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं। हे स्वामी, यदि भला चाहते हैं तो अपने मन्त्री को बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को लौटा दीजिये। उन्होंने यह नहीं कहा कि आप जाकर क्षमा माँगिये। मन्त्री के हाथ भेजने को कहा, यानी वह रास्ता सुझाया जिसमें किसी को झुकना न पड़े। फिर उपमा आती है।

सीता आपके कुलरूपी कमलों के वन के लिये जाड़े की रात बनकर आयी हैं। उन्होंने सीता को दोष नहीं दिया, केवल ऋतु बतायी। और अन्त में वह वाक्य जिसे सुनकर भी रावण नहीं रुका: हे नाथ, सीता को लौटाये बिना शिव और ब्रह्मा भी आपका भला नहीं कर सकते।

राम के बाण साँपों के झुंड जैसे हैं, और राक्षसों के झुंड मेंढकों जैसे। जब तक वे इन्हें निगल नहीं लेते, तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये। मंदोदरी पूरी विनती में अपने डर की बात नहीं करतीं, समय की बात करती हैं: अभी अवसर है, बाद में नहीं रहेगा।

जगत में प्रसिद्ध वह अभिमानी मूर्ख यह सुनकर ख़ूब हँसा। वह मन्दोदरी से बोला कि स्त्रियों का स्वभाव सचमुच डरपोक होता है, वे मंगल में भी डरती हैं, उनका मन बहुत कच्चा होता है। यह तर्क नहीं, कहनेवाले को छोटा करके बात टालने का ढंग है, और आगे यही ढंग मन्त्री और भाई के साथ भी दोहराया जायेगा।

रावण ने आगे कहा कि यदि वानरों की सेना आयेगी, तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना पेट भर लेंगे। जिसके डर से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री डरे, यह तो बड़ी हँसी की बात है। यह कहकर, हँसकर, उसने उन्हें गले लगा लिया और ममता बढ़ाकर सभा में चला गया।

यहाँ गले लगाना सहमति नहीं, बात ख़त्म करने का ढंग है। और पीछे छूटी मंदोदरी मन में चिन्ता करती रह जाती हैं कि पति पर विधाता उलटे हो गये हैं।

सभा, और वह हँसी

सभा में बैठते ही रावण को ख़बर मिली कि शत्रु की सारी सेना समुद्र के उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियों से उचित सलाह माँगी, और वे सब हँसकर बोले कि चुप रहिये, इसमें सलाह की क्या बात है। यह दूसरी हँसी है। पहली घर में चेतावनी पर, यह सभा में सूचना पर।

मन्त्रियों का तर्क छोटा और चिकना था: आपने देवताओं और असुरों को बिना श्रम के जीत लिया, फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं। और यहीं तुलसी कथा रोककर एक बात कहते हैं, जो इस काण्ड के सबसे ज़्यादा काम आनेवाले वचनों में है।

मन्त्री, वैद्य और गुरु

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीनों यदि हित की बात छोड़कर प्रिय बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म, तीनों का जल्दी नाश हो जाता है। चाहे वे अप्रसन्नता के डर से ऐसा करें, चाहे किसी लाभ की आशा से। और तुलसी इसे उपदेश की तरह नहीं, कथा की कड़ी की तरह रखते हैं। वे तुरन्त बताते हैं कि रावण को भी यही संयोग मिल चुका है, और मन्त्री उसे सुना-सुनाकर मुँह पर उसकी स्तुति करते हैं।

अवसर जानकर विभीषण आये

ठीक इसी समय, अवसर जानकर, विभीषण आते हैं और बड़े भाई के चरणों में सिर नवाते हैं। वे बिना बुलाये या अकड़कर नहीं आते, उस क्षण आते हैं जब सभा में प्रश्न पूछा जा चुका है और ठीक उत्तर देनेवाला कोई नहीं। फिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठते हैं, और आज्ञा पाकर ही बोलते हैं।

आरम्भ भी विनय से है: जब आपने मुझसे बात पूछी ही है, तो हे तात, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ। बुद्धि के अनुसार, यानी इससे ज़्यादा का दावा नहीं। हित की बात, यानी प्रिय की नहीं।

चौथ का चन्द्रमा

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और तरह-तरह के सुख चाहता है, वह हे स्वामी, परायी स्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे। चौथ के चन्द्रमा को लोग देखते ही नहीं, बचकर निकल जाते हैं। पोद्दार इसे यों खोलते हैं कि परायी स्त्री का मुख ही न देखे।

फिर वे राजनीति की ओर मुड़ते हैं: चौदह भुवनों का अकेला स्वामी भी जीवों से वैर करके टिक नहीं सकता। और जो गुणों का समुद्र और चतुर भी हो, उसमें थोड़ा सा भी लोभ हो तो उसे कोई भला नहीं कहता।

हे नाथ, काम, क्रोध, मद और लोभ, ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर राम को भजिये, जिन्हें सन्त भजते हैं। यहाँ नीति बिना किसी सीवन के भक्ति में बदल जाती है।

राम कौन हैं

हे तात, राम केवल मनुष्यों के राजा नहीं। वे सब लोकों के स्वामी हैं, काल के भी काल हैं, निर्विकार, अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं। और उन्होंने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित के लिये मनुष्य का शरीर धारण किया है। वे सेवकों को आनन्द देनेवाले, दुष्टों का नाश करनेवाले, और वेद और धर्म की रक्षा करनेवाले हैं।

फिर विभीषण वह वाक्य कहते हैं जो उनके लिये सलाह से बढ़कर, उनकी अपनी आगे की कथा है। वैर छोड़कर उन्हें सिर नवाइये, वे शरणागत का दुख मिटानेवाले हैं। सीता उन्हें दे दीजिये, और उन राम को भजिये जो बिना किसी कारण स्नेह करते हैं।

जिसे सारे जगत से द्रोह करने का पाप लगा हो, शरण जाने पर राम उसे भी नहीं त्यागते। जिनका नाम तीनों तापों को मिटाता है, वही मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं, हे रावण, मन में यह समझ लीजिये। जो बात विभीषण यहाँ रावण से कह रहे हैं, वही कुछ ही देर बाद उन पर ख़ुद घटेगी।

हे रावण, मैं बार-बार आपके चरण छूकर विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद छोड़कर राम को भजिये।

यह बात मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के हाथ कहला भेजी थी, और विभीषण ने अच्छा अवसर पाकर वही तुरन्त कह दी। यानी यह उनकी अपनी राय भर नहीं, कुल के आदिपुरुष का सन्देश है।

माल्यवंत की सहमति, और उसका अन्त

माल्यवंत नाम का एक बहुत समझदार मन्त्री था। विभीषण की बात सुनकर उसे बहुत सुख हुआ। उसने कहा: हे तात, आपके छोटे भाई नीति के आभूषण हैं, विभीषण जो कह रहे हैं उसे हृदय में रखिये। भरी सभा में यह दूसरी आवाज़ है। दो लोग सच कह रहे हैं, एक के बाद एक।

रावण ने न तर्क दिया, न खण्डन किया। केवल कहा कि ये दोनों मूर्ख शत्रु की बड़ाई कर रहे हैं, कोई है जो इन्हें यहाँ से दूर करे? इसके बाद माल्यवंत घर लौट गया। विभीषण लौटे नहीं, हाथ जोड़कर फिर कहने लगे।

सुबुद्धि कहाँ, कुबुद्धि कहाँ

हे नाथ, पुराण और वेद कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि दोनों सबके हृदय में रहती हैं। जहाँ सुबुद्धि है वहाँ तरह-तरह की सम्पदा रहती है, और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ अन्त में विपत्ति। और इसी नरमी के बाद विभीषण सबसे कड़ी बात कहते हैं।

आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है, इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुल के लिये कालरात्रि हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है। यहाँ तक बात नीति की थी, यहाँ से निदान की है।

हे तात, मैं चरण पकड़कर माँगता हूँ कि मेरा दुलार रख लीजिये। सीता राम को दे दीजिये, जिससे आपका अहित न हो। दुलार मन्त्री का नहीं, छोटे भाई का शब्द है।

वह लात

विभीषण ने विद्वानों, पुराणों और वेदों से सम्मत नीति कही। पर सुनते ही रावण क्रोध से उठ खड़ा हुआ और बोला कि इस दुष्ट की मौत अब पास आ गयी है। उसका सारा उत्तर तीन आरोपों में सिमट गया: यह उसी के अन्न पर जीता है, इसे शत्रु का पक्ष प्यारा है। और जगत में ऐसा कौन है जिसे उसने अपनी भुजाओं से न जीता हो।

रावण बोला कि उसके नगर में रहकर यह तपस्वियों से प्रेम करता है, तो यह मूर्ख जाकर उन्हीं से मिले और उन्हीं को नीति सिखाये। यह कहकर उसने विभीषण को लात मारी। और उसी क्षण का बाक़ी हिस्सा देखिये: मारनेवाले ने पैर चलाया, और खानेवाले ने उसी पैर को बार-बार पकड़ लिया।

शिव कहते हैं: हे उमा, सन्त की यही बड़ाई है कि बुराई करनेवाले की भी वे भलाई ही करते हैं। विभीषण ने कहा: आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो अच्छा ही किया, पर हे नाथ, आपका भला राम को भजने में ही है। मार खाकर भी उन्होंने अपनी बात नहीं बदली। फिर वे अपने मन्त्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग से चले, और सबको सुनाकर एक बात कही।

राम सत्यसंकल्प हैं, जो ठान लेते हैं वही होता है। और यह सभा काल के वश में है, इसलिये मैं अब राम की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न दीजियेगा। इस विदा में न बदला है, न शाप, न धमकी।

मार्ग भर के मनोरथ

विभीषण के चलते ही सब राक्षस आयुहीन हो गये। शिव कहते हैं: हे पार्वती, साधु का अपमान तुरन्त ही सारे कल्याण का नाश कर देता है। युद्ध अभी हुआ ही नहीं, पर रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव से हीन हो गया।

उधर जो निकाला गया था, वह हर्ष से भरा चला जा रहा है। अभी-अभी लात खाकर घर से निकला है, और रास्ते भर मन में जो सोच रहा है, वह सब एक ही चीज़ पर टिका है: दो चरण।

मैं जाकर उन कोमल लाल चरणकमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देते हैं। जिनके स्पर्श से ऋषि की पत्नी तर गयीं, और जिन्होंने दण्डक वन को पवित्र किया। जिन्हें सीता ने हृदय में रख रखा है, जो कपटमृग के पीछे धरती पर दौड़े थे, और जो शिव के हृदय रूपी सरोवर में बसते हैं। मेरा अहोभाग्य है कि आज उन्हीं को देखूँगा।

जिन चरणों की पादुकाओं में भरत ने अपना मन लगा रखा है, आज उन्हीं को इन आँखों से देखूँगा। इस पूरी गिनती में वे एक बार भी नहीं सोचते कि लंका का राज्य मिलेगा, या रावण से बदला लिया जायेगा, या अब उनका क्या होगा।

इस पार, और एक सन्देह

इस तरह प्रेम से सोचते हुए वे जल्दी ही समुद्र के इस पार आ गये, जिधर राम की सेना थी। वानरों ने उन्हें आते देखा तो समझा कि शत्रु का कोई ख़ास दूत है। उन्हें पहरे पर रोककर वे सुग्रीव के पास गये और सब बताया। सुग्रीव ने जाकर कहा: हे राम, सुनिये, रावण का भाई मिलने आया है।

राम ने पूछा: हे मित्र, आपकी क्या राय है? सुग्रीव की राय समझदारी की ही थी: राक्षसों की माया जानी नहीं जाती, यह मनचाहा रूप बदलनेवाला न जाने किस कारण आया है।

शरणागत का भय हरना मेरा प्रण है

सुग्रीव आगे कहते हैं: यह हमारा भेद लेने आया है, मुझे तो यही ठीक लगता है कि इसे बाँध रखा जाये। राम ने कहा: हे मित्र, आपने नीति तो अच्छी विचारी, पर मेरा प्रण है शरणागत का भय हर लेना। तुलसी नीति और प्रण को आमने-सामने खड़ा करते हैं, और नीति को ग़लत नहीं कहते, अच्छा ही कहते हैं। प्रण नीति से ऊपर इसलिये नहीं कि नीति बुरी है, इसलिये कि प्रण अपने ऊपर लिया जाता है। उसे हर बार नये सिरे से नहीं तौला जाता।

राम के वचन सुनकर हनुमान हर्षित हुए, और मन ही मन कहने लगे कि भगवान शरणागत पर कैसा स्नेह रखते हैं।

राम फिर कहते हैं कि जो अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये का त्याग कर देते हैं, वे नीच हैं, पापी हैं, उन्हें देखना भी हानि है। यह वचन जानबूझकर कठोर है। जिस हिसाब के बल पर शरण से मना किया जाता है, वही हिसाब यहाँ अपराध है।

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव जैसे ही मेरे सामने आता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर राम सुग्रीव की शंका का उत्तर दो ढंग से देते हैं: पहला तर्क का है, दूसरा प्रेम का।

तर्क यह है: पापी का स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे मेरा भजन कभी नहीं सुहाता। तो यह सचमुच दुष्ट हृदय का होता तो क्या मेरे सामने आ पाता? निर्मल मनवाला ही मुझे पाता है, मुझे कपट और छल नहीं सुहाते। और मान भी लीजिये कि रावण ने इसे भेद लेने भेजा है, तब भी हे सुग्रीव, कोई डर या हानि नहीं। क्योंकि जगत में जितने राक्षस हैं, लक्ष्मण उन सबको क्षण भर में मार सकते हैं।

और यदि यह डरकर मेरी शरण आया है, तो मैं इसे प्राणों की तरह रखूँगा। पहला उत्तर सुरक्षा का था, दूसरा सम्बन्ध का, और अन्त का निर्णय दोनों को एक वाक्य में समेट लेता है।

राम ने हँसकर कहा कि दोनों ही हालत में उसे ले आइये, चाहे वह मित्र हो चाहे भेदिया। और यह सुनकर वानर राम की जय बोलते हुए अंगद और हनुमान के साथ चले।

पहली दृष्टि

वानर विभीषण को आदर से आगे करके वहाँ चले जहाँ राम थे। उन्होंने दोनों भाइयों को दूर से ही देखा, और तुलसी उन्हें आँखों को आनन्द देनेवाले कहते हैं।

फिर राम को देखकर वे पलक रोके ठिठक गये और एकटक देखते रह गये: लम्बी भुजाएँ, लाल कमल जैसे नेत्र, शरणागत का डर मिटानेवाला साँवला शरीर। सिंह जैसे कन्धे, चौड़ी छाती, और वह मुख जो असंख्य कामदेवों का मन मोह ले। आँखों में आँसू भर आये, शरीर पुलकित हो गया, और तब मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल स्वर में बात कही।

हे नाथ, मैं रावण का भाई हूँ, हे देवताओं के रक्षक, मेरा जन्म राक्षसकुल में हुआ है। मेरा शरीर तामसी है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लू को अँधेरे से प्रेम होता है। उन्होंने अपनी नीति नहीं गिनायी, अपनी खायी लात नहीं गिनायी, अपना त्याग नहीं गिनाया। जो अभी सत्य के लिये सब खोकर आया है, वह अपना परिचय अपने सबसे बुरे पक्ष से देता है।

मैं कानों से आपका यश सुनकर आया हूँ कि आप संसार का भय मिटानेवाले हैं। हे दुख हरनेवाले, हे शरण में सुख देनेवाले राम, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

लम्बी भुजाओं में भरकर

यह कहकर उन्हें दण्डवत करते देखा, तो राम बहुत हर्षित होकर तुरन्त उठे। दीन वचन सुनकर उनका मन भर आया, और उन्होंने अपनी लम्बी भुजाओं से पकड़कर विभीषण को हृदय से लगा लिया। जिस सभा से वे आये थे, वहाँ बोलने की आज्ञा लेनी पड़ी थी। यहाँ कुछ पूछा तक नहीं गया।

समुद्र के इस पार शरण में आये विभीषण को राम अत्यन्त हर्षित होकर अपनी विशाल भुजाओं से हृदय से लगा लेते हैं; पास में लक्ष्मण, हनुमान और वानर देख रहे हैं।

फिर लक्ष्मण सहित गले मिलकर, अपने पास बिठाकर, राम ने पहला प्रश्न कुशल का पूछा: हे लंकेश, परिवार सहित अपनी कुशल कहिये, आपका निवास बुरी जगह पर है। यहाँ विभीषण को पहली बार लंकेश, लंका का स्वामी, कहा गया है, और यह सम्बोधन राजतिलक से बहुत पहले आ गया।

बुरी जगह का निवास

दिन-रात दुष्टों की मण्डली में रहते हैं, ऐसे में हे सखा, आपका धर्म कैसे निभता है? मैं आपकी सब रीति जानता हूँ, आप नीति में बहुत निपुण हैं, आपको अनीति नहीं सुहाती। और फिर वह बात जिसे बहुत लोग कण्ठस्थ रखते हैं: हे तात, नरक में रहना भले अच्छा, पर विधाता दुष्ट का संग कभी न दे।

विभीषण ने कहा: हे राम, आपके चरणों के दर्शन करके अब मैं कुशल से हूँ, क्योंकि आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की। और फिर वे कुशल का अर्थ ही बदल देते हैं।

जीव की तब तक कुशल नहीं, न सपने में भी उसके मन को विश्राम है, जब तक वह शोक के घर काम को छोड़कर राम को नहीं भजता। लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान तभी तक हृदय में बसते हैं जब तक धनुष-बाण लिये राम वहाँ नहीं बसते। और ममता एक अँधेरी रात है जो राग और द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देती है। वह तभी तक रहती है जब तक राम के प्रताप का सूर्य नहीं उगता।

अब मैं कुशल हूँ, आपके चरणकमल देखकर मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु, आप जिस पर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के संसारी दुख नहीं सताते। मैं बहुत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ, मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। और जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन्होंने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।

हे राम, मेरा असीम सौभाग्य है कि मैंने ब्रह्मा और शिव के सेवित दोनों चरणकमलों को अपनी आँखों से देखा। यहाँ तक विभीषण बोले। अब राम का उत्तर आता है।

सखा, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ

हे सखा, सुनिये, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिव और पार्वती भी जानते हैं। कोई मनुष्य सारे जड़-चेतन जगत का द्रोही हो। वह भी यदि डरकर मेरी शरण आ जाये, और मद, मोह और तरह-तरह के छल-कपट छोड़ दे, तो मैं उसे बहुत जल्दी साधु के समान बना देता हूँ।

पहले स्वभाव कहा गया, नियम नहीं। नियम में छूट होती है, स्वभाव में नहीं। फिर पात्रता की सीमा हटा दी गयी, क्योंकि सारे जगत के द्रोही से बड़ा अपात्र कोई नहीं। फिर आने का ढंग: डरकर, यानी बिना शर्त। फिर उसके ज़िम्मे एक ही काम: छल छोड़ना। और परिणाम की ज़िम्मेदारी राम अपने ऊपर लेते हैं। सुधरकर आने को नहीं कहा गया, आकर सुधर जाने का वचन दिया गया।

ममता के तागों की एक डोरी

फिर राम उस व्यक्ति का चित्र खींचते हैं जो उन्हें प्रिय है। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार, इन सबकी ममता के तागे अलग-अलग बिखरे रहते हैं। वे जीव को चारों ओर खींचते हैं। और यहाँ वह उपमा आती है जिससे सारी बात खुलती है।

इन सबकी ममता के तागे बटोरकर, उनकी एक डोरी बटकर, जो अपने मन को मेरे चरणों से बाँध देता है। जो सबको समान देखता है, जिसे कोई इच्छा नहीं, जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं। तागे काटे नहीं गये, बटे गये। जो प्रेम दस दिशाओं में बँटा था, वही एक दिशा में लग गया, और उससे एक डोरी बनी जो बाँधने के काम आयी। यह त्याग का नहीं, बटोरने का उपदेश है।

ऐसा सज्जन मेरे हृदय में ऐसे बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन। अपने प्रेम को समझाने के लिये राम लोभ का उदाहरण लेते हैं, क्योंकि लोभी का गाढ़ा लगाव सब जानते हैं। और फिर: आप जैसे सन्त ही मुझे प्रिय हैं, मैं किसी और के कहने से देह धारण नहीं करता।

मेरे प्राणों के समान वे मनुष्य हैं जो सगुण के उपासक हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियम में दृढ़ हैं। और उन्हें ब्राह्मणों के चरणों से प्रेम है। इसमें कोई सिद्धि या तपस्या नहीं माँगी गयी, केवल आचरण।

हे लंकेश, सुनिये, ये सब गुण आप में हैं, इसीलिये आप मुझे बहुत प्रिय हैं। यह सुनकर वानरों के झुंड राम की जय बोलने लगे। और जहाँ कुछ देर पहले यह प्रश्न था कि इसे बाँधा जाये या नहीं, वहीं अब जयकार हो रही है।

राजतिलक

राम की वाणी सुनते हुए विभीषण अघाते नहीं। उसे कानों का अमृत जानकर वे बार-बार उनके चरणकमल पकड़ते हैं, और अपार प्रेम हृदय में समाता नहीं। फिर कहते हैं: हे चराचर के स्वामी, हे अन्तर्यामी, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी, वह आपके चरणों की प्रीति की नदी में बह गयी।

अब हे कृपालु, शिव के मन को सदा प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। राम ने एवमस्तु कहा, और तुरन्त समुद्र का जल मँगवाया। माँगी गयी भक्ति, और मँगवाया गया अभिषेक का जल: जिसने भक्ति माँगी, उसे वह भी मिल रहा है जो उसने नहीं चाहा था।

हे सखा, यद्यपि आपकी इच्छा नहीं है, पर जगत में मेरा दर्शन अमोघ है, कभी निष्फल नहीं जाता। यह कहकर राम ने उनका राजतिलक कर दिया, और आकाश से फूलों की अपार वर्षा हुई।

रावण के क्रोध की आग, पोद्दार के अनुसार, विभीषण की अपनी साँस रूपी हवा से, यानी उनके वचनों से, भड़क रही थी। उस आग में जलते हुए विभीषण को राम ने बचा लिया, और उन्हें अखण्ड राज्य दिया।

शिव ने जो सम्पत्ति रावण को दसों सिरों की बलि लेकर दी थी, वही राम ने विभीषण को सकुचाते हुए दी। इस सकुचाने पर रुकिये।

एक भी बाण नहीं चला

इस प्रसंग में एक भी बाण नहीं चला। लंका में जो हारा, वह सेना की कमी से नहीं हारा। उसके पास सेना थी, ऐश्वर्य था, और भुजाओं का लम्बा हिसाब भी। जो नहीं था, वह ऐसा कान था जो अप्रिय बात सुन सके। पत्नी ने एकान्त में हाथ जोड़कर कहा, हँसी मिली। मन्त्री ने भरी सभा में कहा, निकाल दिया गया। भाई ने चरण पकड़कर कहा, लात मिली। निर्णय की घड़ी युद्धभूमि से बहुत पहले, सभा के भीतर ही बीत गयी।

दूसरी बात उसकी है जो मार खाकर भी झुका रहा। उसने अपमान का उत्तर अपमान से नहीं दिया, और जाते हुए भी कह गया कि मुझे दोष न दीजियेगा। रास्ते भर उसने न बदले की सोची, न राज्य की, केवल चरणों की, और नयी जगह अपना परिचय भी अपने सबसे बुरे पक्ष से दिया। इसी को तुलसी सन्त की बड़ाई कहते हैं: बुराई पाकर भी भलाई लौटाना।

तीसरी बात वह है जिसके लिये बहुत लोग यह काण्ड बार-बार पढ़ते हैं। जब सन्देह सामने था और नीति भी सन्देह के पक्ष में थी, तब भी उत्तर एक प्रण से आया, हिसाब से नहीं। जो आया, उसे पहले गले लगाया गया, फिर कुशल पूछी गयी, फिर राज्य दिया गया, और वह भी सकुचाते हुए। कहीं नहीं पूछा गया कि वह इसके योग्य है या नहीं। योग्यता का प्रश्न उसी क्षण ख़त्म हो गया था जब कोई डरकर सामने आ खड़ा हुआ।

स्रोत: श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 35 से दोहा 49, गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।