Lulla Family

एक लात, और वह छाती जो खुली रही

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · विभीषण-शरणागति

एक लात, और वह छाती जो खुली रही

रावण की भरी सभा में विभीषण ने वही कहा जो हित का था, बदले में चरण का प्रहार पाया, और समुद्र के इस पार उन्हें वह छाती मिली जिसका द्वार शरणागत के लिये कभी बन्द नहीं होता

समुद्र की ओर चलने वाली उस सेना के सामने उस सुबह कोई नगाड़ा नहीं बजा। जो खड़ी थी वह रीछों और वानरों की थी, उसके पास न रथ थे न कवच, और उसका सारा साज़ यही था कि हर सिर एक बार झुका और फिर उठ गया। झुकने की वही क्रिया उस दिन की सबसे बड़ी घटना थी। इसके बाद जो हुआ, वह चलना भर था।

जिनके आगे वे सिर झुका रहे थे, उन्होंने कुछ कहा नहीं। उन्होंने केवल आँख उठायी और पूरी सेना पर एक दृष्टि डाल दी। तुलसी उस दृष्टि को गिनती में लाते हैं, जैसे वह कोई शस्त्र हो जो बाँटा गया हो। और सचमुच उसके बाद वानरों का वर्णन बदल जाता है। जो अभी तक वानर थे, वे पंख लगे हुए पहाड़ हो जाते हैं।


इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम, जो इस प्रसंग में एक बार भी शस्त्र नहीं उठाते और फिर भी इसी प्रसंग में उनका सबसे बड़ा प्रण सुनायी देता है।
  • विभीषण, रावण के छोटे भाई, जो लंका में रहकर भी लंका के नहीं हैं, और जिनकी नीति उन्हें घर से बाहर कर देती है।
  • रावण, जिसे अपनी भुजाओं का हिसाब याद है और अपने कुल का नहीं।
  • मंदोदरी, जो एकान्त में हाथ जोड़कर वह उपाय बताती हैं जो अकेला उपाय था।
  • माल्यवंत, रावण का अत्यन्त बुद्धिमान मन्त्री, जो एक बार बोलता है और फिर घर लौट जाता है।
  • सुग्रीव, जिनकी नीति ठीक है और सन्देह भी ठीक है, और फिर भी जो हार जाते हैं।
  • हनुमान, जो प्रभु का वचन सुनकर सबसे पहले प्रसन्न होते हैं।
  • लक्ष्मण, जिनका नाम यहाँ भरोसे की तरह लिया जाता है।
  • जानकी, जो लंका में हैं और जिनके बायें अंग इस प्रसंग के आरम्भ में ही फड़क उठते हैं।

कूच का दिन

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३५ की चौपाई १

वे प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाते हैं और महाबली रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीराम ने वानरों की सारी सेना देखी और कमलनेत्रों से कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली। ध्यान दीजिये कि यहाँ आदेश नहीं दिया गया, भाषण नहीं हुआ, उत्साह बढ़ाने वाला कोई वचन नहीं कहा गया। जो दिया गया वह केवल देखा जाना था। और वही पर्याप्त हुआ, क्योंकि अगली ही पंक्ति में उसी कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर ऐसे हो जाते हैं मानो बड़े पर्वतों को पंख लग गये हों। इसी हर्ष में श्रीराम ने प्रस्थान किया और अनेक सुन्दर शुभ शकुन हुए।

तुलसी यहाँ एक बात जोड़ते हैं जो उनकी अपनी है। जिनकी कीर्ति स्वयं सब मंगलों से भरी हुई है, उनके प्रस्थान पर शकुन का होना कोई आवश्यकता नहीं, वह लीला की मर्यादा है। शकुन उन्हें नहीं बताते कि आगे क्या होगा, शकुन संसार को बताते हैं कि कौन चल पड़ा है। और उसी क्षण, समुद्र के उस पार, बन्दी जानकी को भी खबर मिल जाती है, बिना किसी दूत के, केवल इससे कि उनके बायें अंग फड़क उठते हैं।

जो शकुन जानकी के लिये शुभ थे, वही रावण के लिये अपशकुन हुए। एक ही घटना, और दो विपरीत अर्थ, केवल इसलिये कि दोनों का सम्बन्ध उस चलने वाले से अलग अलग था। फिर सेना चली। नख ही जिनके शस्त्र हैं, ऐसे वीर पर्वत और वृक्ष उठाये कोई आकाश से और कोई पृथ्वी से चले, और उनकी सिंहगर्जना से दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ उठे।

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोट्न्हि धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३५ का छंद १

दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत काँप उठे और समुद्र खलबला गये। पर इस उथल पुथल को सुनकर जो लोग सबसे अधिक प्रसन्न हुए वे गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग और किन्नर थे, क्योंकि उन्हें लगा कि अब हमारे दुख टल गये। करोड़ों भयानक वानर योद्धा कटकटाते हुए दौड़ रहे हैं, और दौड़ते हुए भी वे लड़ाई का नारा नहीं, कोसलनाथ की जय बोल रहे हैं और उनके गुण गा रहे हैं।

गीताप्रेस के पाठ में यहाँ एक दूसरा छंद भी है, जो हमारे संग्रह में मूल रूप में नहीं बचा और केवल टीका के भीतर से पढ़ा जा सकता है। उसका आशय यह है कि सेना का बोझ शेषनाग तक नहीं सह पाते और बार बार कच्छप की पीठ दाँतों से पकड़ लेते हैं, मानो इस प्रस्थान की कथा वहीं लिख रहे हों। बोझ का चित्र यहाँ लिखने के चित्र में बदल जाता है।

समुद्र तट पर

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३५

इस प्रकार कृपानिधान समुद्र के तट पर जा उतरे, और अनेकों रीछ और वानर वीर जहाँ तहाँ फल खाने लगे। यह पंक्ति जितनी सीधी है उतनी ही बड़ी है। जिस सेना ने अभी पर्वत उठाये थे, वही किनारे पहुँचते ही फल खाने बैठ जाती है। न शिविर का वर्णन, न व्यूह की रचना, न कोई ललकार। तुलसी को युद्ध की तैयारी दिखाने की जल्दी नहीं, क्योंकि इस काण्ड का असली काम तलवार से नहीं होगा।

सार: प्रस्थान में शस्त्र नहीं गिने गये, एक दृष्टि गिनी गयी। और उस दृष्टि का बल पाकर सेना को पंख लग गये। पहुँचकर वही सेना फल खाने लगती है, जैसे आना ही सबसे कठिन काम था।

लंका में वह डर जो आग के बाद बचा रहा

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका । जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा । नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३६ की चौपाई १

वहाँ लंका में, जबसे हनुमान नगर जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने अपने घरों में सब यही विचार करते हैं कि अब राक्षसकुल की रक्षा का कोई उपाय नहीं। यह डर सभा में नहीं है, घरों में है। लंका सार्वजनिक रूप से अब भी अजेय है, निजी रूप से अपना अन्त जान चुकी है। जहाँ यह अन्तर बड़ा हो, वहीं राज्य गिरते हैं।

नगर के लोग आपस में एक ही बात दोहराते हैं, कि जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं आने पर हमारी क्या भलाई होगी। यही बात दूतियों के मुँह से महल के भीतर पहुँचती है, और सुनकर मंदोदरी बहुत व्याकुल हो जाती हैं।

मंदोदरी की विनती

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू । मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३६ की चौपाई ३

वे एकान्त में हाथ जोड़कर पति के चरणों लगीं और नीति के रस में पगी हुई वाणी बोलीं। हे प्रियतम, हरि से विरोध छोड़ दीजिये, और मेरे कहे को अत्यन्त हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिये। यहाँ तीन बातें एक साथ हैं। बात एकान्त में कही गयी है, ताकि किसी के सामने भाई का मान न घटे। हाथ जोड़कर कही गयी है, ताकि वह आग्रह न लगे। और चरणों लगकर कही गयी है, ताकि सुनने वाला उसे प्रतिद्वन्द्विता न समझे। इसके बाद वे उपाय भी बता देती हैं, और उपाय में भी उसका मान बचा रहता है।

जिनके दूत की करनी याद आते ही राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे स्वामी, यदि भला चाहते हैं तो अपना मन्त्री बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिये। ध्यान दीजिये कि उन्होंने यह नहीं कहा कि आप जाकर क्षमा माँगिये। उन्होंने मन्त्री के हाथ भेजने की बात कही, अर्थात् वह रास्ता सुझाया जिसमें किसी को झुकना न पड़े। और फिर वह उपमा, जो इस पूरे प्रसंग की सबसे सुन्दर उपमा है।

तव कुल कमल बिपिन दुखदाई । सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३६ की चौपाई ५

सीता आपके कुलरूपी कमलों के वन को दुख देने वाली जाड़े की रात के समान आयी हैं। कमल और पाला, इससे अधिक कोमल ढंग से यह बात कही ही नहीं जा सकती थी। उन्होंने सीता को दोष नहीं दिया, उन्होंने केवल ऋतु बतायी। और अन्त में वह वाक्य, जिसे सुनकर भी रावण नहीं रुका, कि हे नाथ, सीता को लौटाये बिना शम्भु और ब्रह्मा के किये भी आपका भला नहीं हो सकता।

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३६॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३६

राम के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढकों के समान। जब तक वे इन्हें निगल नहीं लेते, तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये। मंदोदरी ने अपनी पूरी विनती में एक बार भी भय शब्द का प्रयोग अपने लिये नहीं किया। उन्होंने समय की बात की, कि अभी अवसर है और बाद में नहीं रहेगा। जो लोग सच कहते हैं वे प्रायः इसी तरह कहते हैं, समय बताकर, और जो नहीं सुनते वे प्रायः इसी बात को अनसुना करते हैं।

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३७ की चौपाई १

जगत्प्रसिद्ध अभिमानी मूर्ख ने कानों से उनकी वाणी सुनी और खूब हँसा। स्त्रियों का स्वभाव सचमुच डरपोक होता है, मंगल में भी भय करती हो, मन बहुत कच्चा है। यह उत्तर किसी तर्क का उत्तर नहीं है। यह वक्ता को छोटा करके बात टाल देने की रीति है, और यही रीति आगे पूरे प्रसंग में दोहरायी जायेगी, पहले पत्नी के साथ, फिर मन्त्री के साथ, और अन्त में भाई के साथ। जो सुनना नहीं चाहता वह पहले सुनाने वाले का दर्जा घटाता है।

रावण ने आगे कहा कि यदि वानरों की सेना आयेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना निर्वाह कर लेंगे। जिसके भय से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री डरे, यह तो बड़ी हँसी की बात है। ऐसा कहकर, हँसकर, उसने उन्हें हृदय से लगा लिया और ममता बढ़ाकर सभा में चला गया।

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३७ की चौपाई ३

गले लगाना यहाँ सहमति नहीं है, गले लगाना यहाँ बात समाप्त करने का ढंग है। और जो पीछे छूट जाती हैं, वे हृदय में चिन्ता करती रह जाती हैं कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गये। तुलसी मंदोदरी को न विलाप देते हैं न वाद विवाद। वे उन्हें केवल एक सही अनुमान देते हैं, जिसे कोई नहीं सुनेगा।

सार: जो अकेला उपाय था वह सबसे पहले घर के भीतर, एकान्त में, हाथ जोड़कर बताया गया। और उसका उत्तर तर्क से नहीं, हँसी से दिया गया।

सभा, और वह हँसी

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई । सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू । ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३७ की चौपाई ४

ज्यों ही वह सभा में जाकर बैठा, उसे खबर मिली कि शत्रु की सारी सेना समुद्र के उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियों से उचित सलाह पूछी। और मन्त्री हँस पड़े और बोले कि चुप रहिये, इसमें सलाह की कौन सी बात है। यह उसी दिन की दूसरी हँसी है। पहली घर में हुई थी, चेतावनी पर। यह सभा में हुई है, सूचना पर। एक ही दिन में लंका दो बार हँसती है, और दोनों बार उसी बात पर जो सच थी।

मन्त्रियों का तर्क छोटा और चिकना था। आपने देवताओं और असुरों को जीत लिया, उसमें तो श्रम ही नहीं हुआ, फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं। यह तर्क नहीं है, यह पुरानी विजयों की सूची है, जिसे नयी परिस्थिति पर चिपका दिया गया है। और यहीं तुलसी कथा रोककर एक दोहा रख देते हैं, जो इस पूरे काण्ड में सबसे अधिक व्यवहार में आने वाला वचन है।

सचिव बैद गुर तीनि

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३७॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३७

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय से या किसी लाभ की आशा से हित की बात न कहकर प्रिय बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म, इन तीनों का शीघ्र नाश हो जाता है। यह वचन किसी राक्षस के लिये नहीं लिखा गया। यह हर उस व्यक्ति के लिये लिखा गया है जिसके पास कोई ऐसा था जो उससे सच कह सकता था और अब नहीं कहता। और तुलसी इसे उपदेश की तरह नहीं, कथा की एक कड़ी की तरह रखते हैं, क्योंकि अगली ही पंक्ति में वे बता देते हैं कि यही सहायता इस समय रावण को मिल चुकी है और मन्त्री उसे सुना सुनाकर मुँह पर स्तुति करते हैं।

सार: लंका का पतन उस दिन नहीं हुआ जिस दिन सेना आयी। वह उस दिन हुआ जिस दिन सभा में सच बोलने वाला कोई नहीं बचा और सब हँसने लगे।

अवसर जानि बिभीषनु आवा

ठीक इसी समय, अवसर जानकर, विभीषण आते हैं और बड़े भाई के चरणों में सिर नवाते हैं। ध्यान रखिये कि वे बिन बुलाये नहीं आते और अकड़कर नहीं आते। वे उस क्षण आते हैं जब सभा में प्रश्न पूछा जा चुका है और उत्तर देने वाला कोई नहीं है। फिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठते हैं और आज्ञा पाकर ही बोलते हैं।

उनका आरम्भ भी विनय से है। हे कृपालु, जब आपने मुझसे बात पूछी ही है तो हे तात, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ। इस एक वाक्य में उन्होंने अपनी सीमा भी बता दी और अपना अधिकार भी। बुद्धि के अनुसार, अर्थात् इससे अधिक का दावा नहीं। और हित की बात, अर्थात् प्रिय की नहीं। दोहा सैंतीस को पढ़ चुकने के बाद यह वाक्य एक शपथ की तरह सुनायी देता है।

चौथ का चन्द्रमा

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं । तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३८ की चौपाई ३

जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना सुख चाहता है, वह हे स्वामी, परायी स्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे। उपमा को देखिये। चौथ के चन्द्रमा को लोग देखते ही नहीं, बचकर निकल जाते हैं। और उन्होंने मुख नहीं कहा, ललाट कहा, अर्थात् वह भाग भी नहीं जो सबसे पहले दिखता है।

इसके बाद वे राजनीति की ओर मुड़ते हैं। चौदह भुवनों का एक ही स्वामी क्यों न हो, जीवों से वैर करके वह ठहर नहीं सकता। और जो मनुष्य गुणों का समुद्र हो और चतुर भी हो, उसमें थोड़ा सा भी लोभ हो तो उसे कोई भला नहीं कहता। यह रावण की दोनों नसों पर एक साथ हाथ रखना है, उसका ऐश्वर्य और उसका लोभ। और फिर वे चारों का नाम लेकर उन्हें एक ही श्रेणी में रख देते हैं।

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३८॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३८

हे नाथ, काम, क्रोध, मद और लोभ, ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर रघुवीर को भजिये, जिन्हें सन्त भजते हैं। यहाँ नीति समाप्त होती है और भक्ति आरम्भ होती है, और दोनों के बीच कोई सीवन नहीं दिखती। विभीषण के लिये ये दो विषय नहीं हैं। जिस मार्ग पर चलने से नरक मिलता है, उसे छोड़ने का नाम ही उनके यहाँ भजना है।

राम कौन हैं

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३९ की चौपाई १

हे तात, राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी हैं और काल के भी काल हैं। वे निर्विकार, अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं, वे भगवान हैं। और वही कृपासिन्धु पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का हित करने के लिये मनुष्यशरीर धारण किये हुए हैं। वे सेवकों को आनन्द देने वाले, दुष्टों के समूह का नाश करने वाले और वेद तथा धर्म की रक्षा करने वाले हैं।

इसके बाद विभीषण वह वाक्य कहते हैं जो उनके लिये केवल सलाह नहीं, अपनी ही आगे की कथा है। वैर छोड़कर उन्हें मस्तक नवाइये, वे शरणागत का दुख नाश करने वाले हैं। जानकी उन्हें दे दीजिये और उन राम को भजिये जो बिना किसी कारण स्नेह करते हैं। बिना कारण, अर्थात् बदले में कुछ लेकर नहीं। यह शर्त हटा देने की बात है, और यही आगे इस प्रसंग का मर्म बनेगी।

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३९ की चौपाई ४

जिसे सारे जगत से द्रोह करने का पाप लगा हो, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करने वाला है, वही प्रभु मनुष्यरूप में प्रकट हुए हैं, हे रावण, हृदय में यह समझ लीजिये। इस चौपाई पर ठहरिये, क्योंकि जो बात विभीषण यहाँ रावण से कह रहे हैं, वही बात कुछ ही देर बाद उन्हें अपने ऊपर घटती हुई मिलेगी। जो उपदेश वे दे रहे हैं, वही उनका आश्रय बनेगा।

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ ३९ (क)॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३९ (क)

हे दशशीश, मैं बार बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद त्यागकर कोसलाधीश को भजिये। इस दोहे के आगे गीताप्रेस के पाठ में एक और अर्धाली है, जो हमारे इस संग्रह में मूल रूप में नहीं बची और केवल टीका के भीतर मिलती है। उसका अर्थ यह है कि यह बात मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के हाथ कहला भेजी थी और विभीषण ने अवसर पाकर वही तुरन्त कह दी। अर्थात् यह उनकी अपनी राय भर नहीं, कुल के आदिपुरुष का सन्देश है।

सार: विभीषण ने तीन तल पर बात रखी। पहले चरित्र, फिर राजनीति, फिर तत्त्व। और तीनों का निष्कर्ष एक ही निकला, कि जानकी लौटा दीजिये। जो बात सबसे ऊँचे सिद्धान्त से निकली, वह सबसे सीधे काम पर आकर रुकी।

माल्यवंत की सहमति, और उसका अन्त

माल्यवंत अति सचिव सयाना । तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४० की चौपाई १

माल्यवंत नाम का एक अत्यन्त बुद्धिमान मन्त्री था। उसने विभीषण के वचन सुनकर बहुत सुख माना और बोला कि हे तात, आपके छोटे भाई नीति के आभूषण हैं, विभीषण जो कह रहे हैं उसे हृदय में धारण कर लीजिये। यह सभा की एकमात्र दूसरी आवाज़ है। पूरी लंका में दो लोग सच कह रहे हैं, और दोनों एक ही क्षण में बोल रहे हैं।

उत्तर में रावण ने न तर्क दिया, न खण्डन किया। उसने केवल कहा कि ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं, यहाँ कोई है, इन्हें दूर करो। और इसके बाद माल्यवंत घर लौट गया। तुलसी उसे न तो वीर बनाते हैं न कायर। वे केवल इतना लिखते हैं कि वह लौट गया, और इसी एक क्रिया से नीति कहने और नीति पर टिके रहने का अन्तर खुल जाता है। विभीषण लौटे नहीं, उन्होंने हाथ जोड़े और फिर कहना शुरू किया।

सुमति कहाँ, कुमति कहाँ

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४० की चौपाई ३

हे नाथ, पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि और कुबुद्धि दोनों सबके हृदय में रहती हैं। जहाँ सुमति है वहाँ नाना सम्पदाएँ रहती हैं, और जहाँ कुमति है वहाँ परिणाम में विपत्ति रहती है। यह वाक्य किसी को दोषी नहीं ठहराता। यह कहता है कि दोनों सबके भीतर हैं, इसलिये प्रश्न स्वभाव का नहीं, चुनाव का है। और इसी नरमी के बाद विभीषण सबसे कड़ी बात कहते हैं।

आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है, इसी से आप हित को अहित मान रहे हैं और शत्रु को मित्र। जो राक्षसकुल के लिये कालरात्रि के समान हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है। यहाँ तक बात नीति की थी। यहाँ से बात निदान की है।

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४०॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४०

हे तात, मैं चरण पकड़कर भीख माँगता हूँ कि मेरा दुलार रख लीजिये। सीता राम को दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो। दुलार शब्द पर रुकिये। यह मन्त्री का शब्द नहीं है, यह छोटे भाई का शब्द है। सभा के बीच, सारे तर्क समाप्त करके, वे अन्त में सम्बन्ध पर आ जाते हैं। और उत्तर में उन्हें वही मिलता है जो सम्बन्ध पर आने वालों को अक्सर मिलता है।

वह लात

विभीषण ने पण्डितों, पुराणों और वेदों से सम्मत वाणी में नीति बखानकर कही। पर सुनते ही दशानन क्रोध से उठ खड़ा हुआ और बोला कि रे दुष्ट, अब मृत्यु निकट आ गयी है। उसका सारा उत्तर तीन आरोपों में सिमट गया। कि यह मेरे ही अन्न पर जीता है, कि इसे शत्रु का पक्ष प्रिय है, और कि जगत में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं से न जीता हो। अन्न, निष्ठा और बल, तीनों की गिनती, पर एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं।

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा । अनुज गहे पद बारहिं बारा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४१ की चौपाई ३

मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियों पर, मूर्ख, उन्हीं से जा मिल और उन्हीं को नीति बता। ऐसा कहकर उसने चरण से प्रहार किया। और अब उस पंक्ति को पढ़िये जो इस पूरे काण्ड में सबसे सुन्दर है। मारने वाले ने चरण चलाया, और खाने वाले ने उसी चरण को बार बार पकड़ लिया।

उमा संत कइ इहइ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४१ की चौपाई ४

हे उमा, सन्त की यही बड़ाई है कि बुराई करने पर भी वे भलाई ही करते हैं। और विभीषण ने कहा कि आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो अच्छा ही किया, परन्तु हे नाथ, आपका भला राम को भजने में ही है। मार खाकर भी उन्होंने अपनी बात नहीं बदली, केवल अपना आसन बदला। वे नीचे झुक गये और वहीं से वही बात दोहरा दी। इसके बाद वे अपने मन्त्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग में गये और सबको सुनाकर एक वाक्य कहा।

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४१॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४१

राम सत्यसंकल्प प्रभु हैं और यह सभा काल के वश है, इसलिये मैं अब रघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना। यह विदा किसी अपमान का प्रतिशोध नहीं है। इसमें कोई शाप नहीं है, कोई धमकी नहीं है। इसमें केवल एक सूचना है, और एक क्षमायाचना है। जाते हुए भी वे यही चाहते हैं कि उनका जाना किसी के मन में दोष न बने।

सार: तीन लोगों ने सच कहा। एक अनसुनी कर दी गयी, एक लौट गया, एक निकाल दिया गया। और जो निकाला गया, उसने जाते समय भी गाली नहीं दी, केवल यह कहा कि मुझे दोष न देना।

मार्ग भर के मनोरथ

विभीषण ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये। और शिवजी कहते हैं कि हे भवानी, साधु का अपमान तुरन्त ही सम्पूर्ण कल्याण की हानि कर देता है। यहाँ तुलसी कारण और परिणाम को एक ही पंक्ति में जोड़ देते हैं। लंका को हराने के लिये अभी कोई युद्ध नहीं हुआ। जो होना था वह सभा में हो चुका। रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव से हीन हो गया, यद्यपि उसका सिंहासन अभी उसी जगह खड़ा है।

और उधर जो निकाला गया था, वह हर्षित होकर चला जा रहा है। जिसे अभी अभी घर से लात मारकर निकाला गया है, वह रास्ते भर मनोरथ कर रहा है, और उसके सारे मनोरथ एक ही वस्तु पर टिके हैं, दो चरण।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी । दंडक कानन पावनकारी॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४२ की चौपाई ३

मैं जाकर उन कोमल लाल चरणकमलों के दर्शन करूँगा जो सेवकों को सुख देने वाले हैं, जिनका स्पर्श पाकर ऋषि की पत्नी तर गयीं और जिन्होंने दण्डकवन को पवित्र कर दिया। जिन चरणों को जानकी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के पीछे पृथ्वी पर दौड़े थे, और जो साक्षात् शिव के हृदयरूपी सरोवर में विराजते हैं। मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा।

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४२॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४२

जिन चरणों की पादुकाओं में भरत ने अपना मन लगा रखा है, आज मैं उन्हीं चरणों को इन नेत्रों से देखूँगा। इस पूरी गिनती में एक बात नहीं है, और उसका न होना ही सबसे बड़ी बात है। वे एक बार भी यह नहीं सोचते कि मुझे लंका का राज्य मिलेगा, या कि रावण से बदला लिया जायेगा, या कि अब मेरा क्या होगा। जो व्यक्ति अभी अभी सब कुछ खोकर निकला है, वह रास्ते भर केवल यह सोच रहा है कि किसे देखूँगा।

इस पार, और एक सन्देह

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्र के इस पार आ गये, जिधर राम की सेना थी। वानरों ने उन्हें आते देखा तो समझा कि शत्रु का कोई खास दूत है। उन्हें पहरे पर रोककर वे सुग्रीव के पास आये और सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीव ने जाकर कहा कि हे रघुनाथ, सुनिये, रावण का भाई मिलने आया है।

प्रभु ने पूछा कि हे मित्र, आपकी क्या राय है। और यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि सुग्रीव की राय बुद्धिमानी की ही थी। उन्होंने कहा कि राक्षसों की माया जानी नहीं जाती, यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है, यह हमारा भेद लेने आया है, इसे बाँध रखा जाय। जिसने अपना राज्य छल से खोया और फिर पाया, उसकी यह आशंका अनुभव से निकली है।

मम पन सरनागत भयहारी

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी । मम पन सरनागत भयहारी॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४३ की चौपाई ४

हे मित्र, आपने नीति तो अच्छी विचारी, परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागत का भय हर लेना। इस एक पंक्ति में तुलसी ने नीति और प्रण को आमने सामने खड़ा कर दिया और नीति को गलत नहीं कहा। उन्होंने उसे अच्छी ही कहा। प्रण नीति से इसलिये ऊपर नहीं है कि नीति बुरी है, बल्कि इसलिये कि प्रण अपने ऊपर लिया गया होता है और उसे हर बार नये सिरे से नहीं तौला जाता। यही सुनकर हनुमान प्रसन्न हुए कि भगवान कैसे शरणागतवत्सल हैं। यह वचन हमारे पाठ में बीच से टूटा हुआ है और पूरा केवल टीका में मिलता है।

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४३॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४३

जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर हैं, पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि है। यह कठोर वचन है और जान बूझकर कठोर है। इसमें शरण देने की प्रशंसा नहीं है, इसमें शरण न देने की निन्दा है। और निन्दा का आधार भी देखिये, अपने अहित का अनुमान। अर्थात् जिस गणित के बल पर मना किया जाता है, वही गणित यहाँ अपराध है।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४४ की चौपाई १

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद वे सुग्रीव की शंका का उत्तर दो अलग अलग ढंग से देते हैं, और दोनों ढंग सुनने योग्य हैं। पहला तर्क है और दूसरा प्रेम।

तर्क यह है कि पापी का सहज स्वभाव यही होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता, तो यदि यह सचमुच दुष्ट हृदय का होता तो क्या मेरे सम्मुख आ पाता। निर्मल मन वाला ही मुझे पाता है, मुझे कपट और छल छिद्र नहीं सुहाते। और यदि मान भी लीजिये कि रावण ने इसे भेद लेने भेजा है, तब भी हे सुग्रीव, कोई भय या हानि नहीं है, क्योंकि जगत में जितने राक्षस हैं, लक्ष्मण उन सबको क्षण भर में मार सकते हैं।

जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं । रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४४ की चौपाई ४

और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण आया है, तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा। पहला उत्तर सुरक्षा का था, दूसरा सम्बन्ध का। और अन्त में जो निर्णय आता है, वह दोनों को एक ही वाक्य में समेट लेता है।

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४४॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४४

कृपाधाम ने हँसकर कहा कि दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ। उभय भाँति, अर्थात् चाहे वह मित्र हो चाहे गुप्तचर, लाना दोनों हालत में है। सन्देह का उत्तर यहाँ प्रमाण से नहीं दिया गया, निर्णय से दिया गया। और उस निर्णय को सुनकर वानर जय बोलते हुए चले, अंगद और हनुमान सहित।

सार: सुग्रीव की नीति को गलत नहीं ठहराया गया, केवल उससे बड़ा एक प्रण याद दिलाया गया। जहाँ प्रण पहले से लिया हुआ हो, वहाँ हर बार नया हिसाब नहीं लगाया जाता।

पहली दृष्टि

वानरों ने विभीषण को आदरसहित आगे किया और वहाँ चले जहाँ करुणा की खान रघुनाथ थे। दोनों भाइयों को उन्होंने दूर ही से देखा, और तुलसी उन्हें नेत्रों को आनन्द का दान देने वाले कहते हैं। जो दिखायी दे रहा है वह कमाया हुआ नहीं, दिया हुआ है।

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४५ की चौपाई २

फिर शोभा के धाम राम को देखकर वे पलक रोककर ठिठक गये और एकटक देखते रह गये। विशाल भुजाएँ, लाल कमल जैसे नेत्र, शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर, सिंह जैसे कन्धे, चौड़ी छाती, और वह मुख जो असंख्य कामदेवों के मन को मोह ले। नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो गया, और तब मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे। ध्यान दीजिये कि बोलने से पहले धीरज धरना पड़ा। जो कहने आया था, वह देखकर भूल गया।

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४५ की चौपाई ४

हे नाथ, मैं दशमुख का भाई हूँ, हे देवताओं के रक्षक, मेरा जन्म राक्षसकुल में हुआ है। मेरा शरीर तामसी है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अन्धकार पर सहज स्नेह होता है। परिचय का यह ढंग देखने योग्य है। उन्होंने अपनी नीति नहीं गिनायी, अपनी मार नहीं गिनायी, अपना त्याग नहीं गिनाया। जो व्यक्ति अभी अभी सत्य के लिये सब कुछ खोकर आया है, वह अपना परिचय अपने सबसे बुरे पक्ष से देता है।

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४५॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४५

मैं कानों से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव के भय का नाश करने वाले हैं। हे आर्ति हरने वाले, हे शरण में सुख देने वाले रघुवीर, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। उनके पास देने को कुछ नहीं है, इसलिये वे कुछ देते नहीं। उनके पास केवल एक सुना हुआ यश है, और वही वे लौटाकर सामने रख देते हैं।

भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४६ की चौपाई १

ऐसा कहकर उन्हें दण्डवत करते देखा तो प्रभु अत्यन्त हर्षित होकर तुरन्त उठे। दीन वचन सुनकर उनका मन भर आया और उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया। इस चौपाई में सारी क्रियाएँ जल्दी की हैं। तुरन्त उठे, पकड़ लिया, हृदय से लगा लिया। जिस सभा में वे अभी अभी खड़े थे, वहाँ उन्हें बैठने की अनुमति लेनी पड़ी थी। यहाँ उनसे कुछ पूछा तक नहीं गया।

फिर लक्ष्मण सहित गले मिलकर, उन्हें अपने पास बैठाकर, भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले। पहला प्रश्न कुशल का था। हे लंकेश, परिवार सहित अपनी कुशल कहिये, आपका निवास बुरी जगह पर है। यहाँ पहली बार उन्हें लंकेश कहा गया है, और यह पुकार राजतिलक से बहुत पहले आ गयी।

कुसल कुठाहर बास

दिन रात दुष्टों की मण्डली में बसते हैं, ऐसी दशा में हे सखा, आपका धर्म किस प्रकार निभता है। मैं आपकी सब रीति जानता हूँ, आप अत्यन्त नीतिनिपुण हैं, आपको अनीति नहीं सुहाती। और फिर वह वाक्य, जिसे इस काण्ड में बहुत लोग कण्ठस्थ रखते हैं, कि हे तात, नरक में रहना वरन् अच्छा है, पर विधाता दुष्ट का संग कभी न दे। जिसने अभी दुष्ट का संग छोड़ा है, उसके सामने यह कहना केवल सिद्धान्त नहीं, सान्त्वना भी है।

उत्तर में विभीषण ने कहा कि हे रघुनाथ, अब आपके चरणों का दर्शन कर मैं कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की। और इसके बाद वे कुशल की परिभाषा ही बदल देते हैं।

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४६॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४६

तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को विश्राम है, जब तक वह शोक के घर काम को छोड़कर राम को नहीं भजता। प्रश्न कुशल का पूछा गया था और उत्तर में कुशल का अर्थ ही बदल दिया गया। लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान, ये सब हृदय में तभी तक बसते हैं जब तक धनुष बाण धारण किये रघुनाथ वहाँ नहीं बसते। और ममता पूरी अँधेरी रात है जो राग और द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देती है, और वह रात तभी तक रहती है जब तक प्रभु का प्रतापरूपी सूर्य नहीं उगता।

अब मैं कुशल हूँ, मेरे भारी भय मिट गये, आपके चरणकमल देखकर। हे कृपालु, आप जिस पर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भवशूल नहीं व्यापते। मैं अत्यन्त नीच स्वभाव का राक्षस हूँ, मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया, और जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ ४७॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४७

हे कृपा और सुख के पुंज राम, मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है कि मैंने ब्रह्मा और शिव के द्वारा सेवित युगल चरणकमलों को अपने नेत्रों से देखा। यहाँ तक विभीषण बोलते रहे हैं। अब जो बोलेंगे, उनका उत्तर इस काण्ड का और बहुतों के लिये इस पूरे ग्रन्थ का केन्द्र है।

सार: जो घर से निकाला गया था, उससे पहला प्रश्न कुशल का पूछा गया। और उत्तर में उसने कुशल का अर्थ ही बदल दिया, कि जब तक भीतर कोई और बसा है, तब तक कहीं भी रहकर कुशल नहीं है।

सुनहु सखा, निज कहउँ सुभाऊ

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवै सभय सरन तकि मोही॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४८ की चौपाई १

हे सखा, सुनिये, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शम्भु और गिरिजा भी जानते हैं। कोई मनुष्य सारे जड़ चेतन जगत का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाये, और मद, मोह तथा नाना छल कपट त्याग दे, तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ।

इस वाक्य के हर हिस्से पर ठहरना चाहिये। पहले स्वभाव कहा गया, नियम नहीं। नियम में छूट होती है, स्वभाव में नहीं। फिर पात्रता की सीमा हटा दी गयी, क्योंकि सारे जगत का द्रोही से बड़ा कोई अपात्र हो ही नहीं सकता। फिर आने का ढंग बताया गया, भयभीत होकर, अर्थात् शर्त लगाकर नहीं। फिर एक ही काम उसके ज़िम्मे रखा गया, छल छोड़ना। और परिणाम की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली गयी, कि मैं उसे साधु के समान कर देता हूँ। सुधरकर आने को नहीं कहा गया। आकर सुधर जाने का वचन दिया गया।

ममता के तागों की एक डोरी

इसके बाद वे उस व्यक्ति का चित्र खींचते हैं जो उन्हें प्रिय है। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार, इन सबके ममत्व के तागे अलग अलग बिखरे रहते हैं और जीव को चारों ओर खींचते रहते हैं। और यहाँ तुलसी वह उपमा लाते हैं जिससे सारी बात खुल जाती है।

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४८ की चौपाई ३

इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर, उन सबकी एक डोरी बटकर, जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है, जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं, जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं। यहाँ तोड़ने को नहीं कहा गया। तागे काटे नहीं गये, बटे गये। जो प्रेम अब तक दस दिशाओं में बँटा था, वही प्रेम एक दिशा में लगा दिया गया, और उससे एक डोरी बन गयी जो बाँधने के काम आयी। यह त्याग का नहीं, एकत्र करने का उपदेश है।

अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४८ की चौपाई ४

ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है। इस उपमा की निर्भीकता पर ध्यान दीजिये। अपने ही प्रेम को समझाने के लिये उन्होंने लोभ का दृष्टान्त लिया, क्योंकि संसार में सबसे सघन लगाव वही है जिसे सब जानते हैं। और फिर वह वाक्य, जो इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा उपकार है, कि आप जैसे सन्त ही मुझे प्रिय हैं, मैं और किसी के निहोरे से देह धारण नहीं करता।

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४८॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४८

जो सगुण के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियम में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं। यह सूची कठिन नहीं है और यही इसकी विशेषता है। इसमें कोई सिद्धि नहीं माँगी गयी, कोई तपस्या नहीं माँगी गयी। जो माँगा गया वह सब आचरण की बात है, और आचरण सबके हाथ में है।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४९ की चौपाई १

हे लंकेश, सुनिये, ये सब गुण आप में हैं, इसी से आप मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। और यह सुनकर वानरों के समूह कृपा के समूह राम की जय बोलने लगे। अब तक जो सिद्धान्त था, वह इस एक पंक्ति में एक व्यक्ति पर उतर आया। और जिस सभा में कुछ देर पहले यह प्रश्न था कि इसे बाँध लिया जाय या नहीं, उसी सभा में अब जयकार हो रही है।

सार: शरणागति की शर्त यहाँ यह नहीं है कि आने वाला अच्छा हो। शर्त केवल यह है कि वह छल छोड़कर आये। बाकी काम लेने वाले ने अपने ज़िम्मे लिया है।

राजतिलक

प्रभु की वाणी सुनते हुए विभीषण अघाते नहीं, उसे कानों के लिये अमृत जानकर वे बार बार चरणकमल पकड़ते हैं, और अपार प्रेम हृदय में समाता नहीं। फिर उन्होंने कहा कि हे चराचर के स्वामी, हे अन्तर्यामी, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना रही थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीति रूपी नदी में बह गयी।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४९ की चौपाई ४

अब हे कृपालु, शिव के मन को सदा प्रिय लगने वाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। और उत्तर में प्रभु ने एवमस्तु कहा, और तुरन्त समुद्र का जल मँगवाया। यह क्रम उलटा लगता है और उलटा ही चमत्कार है। माँगा गया भक्ति को, और मँगवाया गया अभिषेक का जल। जिसने कुछ नहीं माँगा, उसे वही दिया जा रहा है जो उसने कभी नहीं चाहा था।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४९ की चौपाई ५

हे सखा, यद्यपि आपकी इच्छा नहीं है, पर जगत में मेरा दर्शन अमोघ है। ऐसा कहकर राम ने उनका राजतिलक कर दिया और आकाश से फूलों की अपार वृष्टि हुई। अमोघ शब्द यहाँ भार उठाता है। दर्शन निष्फल नहीं जाता, यह नियम है, और नियम चाहने वाले की इच्छा से नहीं चलता। इसलिये जो नहीं माँगा गया, वह भी देना पड़ा।

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क)॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४९ (क)

रावण के क्रोध रूपी अग्नि में, जो उसकी अपनी श्वास रूपी पवन से प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषण को प्रभु ने बचा लिया और उन्हें अखण्ड राज्य दिया। गीताप्रेस के पाठ में इसके साथ एक और अर्धाली है, जो हमारे संग्रह में मूल रूप में नहीं बची और केवल टीका में पढ़ी जा सकती है। उसका आशय यह है कि शिव ने जो सम्पत्ति रावण को दसों सिरों की बलि देने पर दी थी, वही रघुनाथ ने विभीषण को सकुचते हुए दी। सकुचना यहाँ सबसे बड़ी बात है।

सार: जिस राज्य के लिये एक भाई ने दसों सिर चढ़ाये थे, वही राज्य दूसरे भाई को बिना माँगे मिला, और देने वाला देते हुए सकुचा।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में एक भी बाण नहीं चला और फिर भी इसे सुन्दरकाण्ड का सबसे बड़ा युद्ध कहा जा सकता है। लंका में जो हारा, वह सेना के अभाव से नहीं हारा। उसके पास सेना थी, ऐश्वर्य था, और भुजाओं का लम्बा हिसाब भी था। उसके पास जो नहीं था, वह एक ऐसा कान था जो अप्रिय बात सुन सके। पत्नी ने एकान्त में हाथ जोड़कर कहा, हँसी मिली। मन्त्री ने भरी सभा में कहा, निकाल दिया गया। भाई ने चरण पकड़कर कहा, चरण से मारा गया। तुलसी ने इस क्रम को इतनी सफाई से रखा है कि निर्णय की घड़ी युद्धभूमि से बहुत पहले, सभा के भीतर ही बीत जाती है।

दूसरी बात उस व्यक्ति की है जो मार खाकर भी झुका रहा। उन्होंने अपमान का उत्तर अपमान से नहीं दिया, और जाते हुए यह भी कह गये कि मुझे दोष न देना। फिर रास्ते भर उन्होंने न बदले की सोची, न राज्य की। उन्होंने केवल चरणों की सोची, और नये घर में अपना परिचय भी अपने सबसे बुरे पक्ष से दिया। इसी को तुलसी सन्त की बड़ाई कहते हैं, कि बुराई पाकर भी भलाई ही लौटाना। यह सहनशीलता नहीं है, यह एक भिन्न स्वभाव है, जिसमें अपमान का हिसाब रखने की जगह ही नहीं बची।

और तीसरी बात, जिसके लिये बहुत लोग यह काण्ड बार बार पढ़ते हैं। जब सन्देह सामने था और नीति भी सन्देह के ही पक्ष में थी, तब भी उत्तर एक प्रण से आया, न कि हिसाब से। सारे जगत का द्रोही भी यदि छल छोड़कर आ जाये तो उसे साधु के समान कर देने का काम लेने वाले ने अपने ऊपर ले लिया। और जो आया, उसे पहले गले लगाया गया, फिर कुशल पूछी गयी, फिर राज्य दिया गया, और वह भी सकुचते हुए। कहीं भी यह नहीं पूछा गया कि यह इसके योग्य है या नहीं। योग्यता का प्रश्न उसी क्षण समाप्त हो गया था जिस क्षण कोई डरकर सामने आ खड़ा हुआ।

स्रोत: श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ३५ से दोहा ४९, गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण, मूल पाठ के साथ हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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