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अशोक वाटिका

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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 3

लंका के भीतर एक बाग़ है जहाँ रावण तलवार खींचकर खड़ा होता है। उसके सामने बैठी स्त्री एक तिनके की आड़ करके उत्तर देती हैं।

लंका की इस रात का एक हिस्सा अभी विभीषण के घर में है, जिस पर राम के आयुध अंकित हैं। हनुमान राम के गुण कहते-कहते वहाँ पहुँच गये हैं जहाँ शब्द रुक जाते हैं। पर असली काम इस घर में पूरा नहीं होगा। उसके लिये नगर के उस कोने तक जाना है जहाँ अशोक के पेड़ों के नीचे एक स्त्री महीनों से बैठी हैं। उनके पास न कोई ख़बर पहुँची है, न कोई अपना।

आगे तुलसीदास तीन चीज़ें एक के बाद एक रखते हैं: पहले वह दृश्य जिसे देखकर देखनेवाला ख़ुद टूट जाता है। फिर वह दबाव जो बात से शुरू होकर तलवार तक पहुँचता है। और अन्त में एक स्वप्न जो पूरी लंका का हिसाब उलट देता है। बीच में सबसे ऊँची आवाज़ न रावण की है, न पत्तों में छिपे हनुमान की। वह सीता की है। वे बोलने से पहले सामने एक तिनका रख लेती हैं, और उस तिनके के पीछे से इस काण्ड की सबसे मज़बूत बातें कहती हैं।

अशोक वन की वह रात

  • सीता: जनक की पुत्री। अशोक के नीचे बैठी, देह सूख चुका, आँखें अपने ही चरणों पर, और मन राम के चरणों में।
  • हनुमान: वाटिका में पहुँचकर एक शब्द नहीं बोलते। पत्तों की ओट में बैठे सब कुछ देख रहे हैं।
  • विभीषण: जिनके घर से रास्ता निकलता है। सीता का हाल और वाटिका तक पहुँचने की युक्तियाँ वही बताते हैं।
  • रावण: सज-धजकर, स्त्रियों का दल साथ लेकर आता है, और एक महीने की मोहलत घोषित करके लौटता है।
  • मन्दोदरी: मय दानव की पुत्री। बस एक बार बोलती हैं, और उसी में सीता की जान बचा लेती हैं।
  • राक्षसियाँ: पिशाचिनियों का झुंड, जिन्हें डराने के काम पर लगाया गया है। वे त्रिजटा की बात सुनकर ख़ुद डरकर सीता के चरणों पर गिर पड़ती हैं।
  • त्रिजटा: वह राक्षसी जिसका मन राम के चरणों में है, और जिसका स्वप्न इस रात की सबसे बड़ी घटना है।
  • राम: वाटिका में कहीं नहीं, और हर वाक्य में। सीता उन्हीं का स्मरण करके मुँह खोलती हैं।

विभीषण के घर से वाटिका तक

बात वहीं से उठती है जहाँ रात छूटी थी। राम के गुण गिनाते-गिनाते हनुमान उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ से आगे शब्द काम नहीं देते। वहाँ उन्हें वह शान्ति मिली जो शब्दों से परे है।

राम के गुण कहते हुए यह बात भी आती है कि जो ऐसे स्वामी को जानते हुए भी भुलाकर भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों। यह बात विभीषण के घर में कही जा रही है, उस नगर में जहाँ इस भूल का सबसे बड़ा उदाहरण सिंहासन पर बैठा है। कहनेवाला किसी का नाम नहीं लेता, और सुननेवाला समझ जाता है। फिर विभीषण उस घर की सबसे कठिन ख़बर पर आते हैं।

जिस तरह सीता वहाँ रह रही थीं, वह सारी कथा विभीषण ने कह सुनायी। सुनकर हनुमान चुप नहीं बैठे। भाई कहकर उन्होंने सलाह नहीं, रास्ता माँगा: मैं सीता माता को देखना चाहता हूँ। उनके दर्शन के बिना यह यात्रा अधूरी है।

विभीषण ने उन्हें सारी युक्तियाँ बतायीं, क्योंकि अशोक वाटिका कोई खुला बाग़ नहीं है। वहाँ पहरा है, और भीतर जाने का कोई सीधा दरवाज़ा नहीं। सुनकर हनुमान वही करते हैं जो इस काण्ड में उनका बार-बार का ढंग है। वे बड़े नहीं होते, छोटे हो जाते हैं।

रूप वही है जो लंका में घुसते समय धरा था, मच्छर जितना। विदा लेकर वे इसी रूप में अशोक वन के उस भाग में पहुँचे जहाँ सीता रहती थीं। तुलसी इसे बहुत थोड़े में निपटा देते हैं, पर बात बड़ी है। जिस काम में देखा जाना ही सबसे बड़ा ख़तरा हो, उसमें बल दिखाना नहीं, छिपाना होता है।

पत्तों की ओट से पहला दर्शन

और तब वह दृश्य सामने आता है जिसके लिये यह सारी यात्रा हुई थी। तुलसी कोई बड़ा वर्णन नहीं करते, बस कुछ बातें गिनाते हैं, और उनमें से तीन किसी का भी जी बैठा देने को काफ़ी हैं।

हनुमान सामने नहीं जाते, नाम नहीं लेते, मन ही मन प्रणाम करते हैं, क्योंकि इस समय अपने होने की ख़बर देना सीता को ख़तरे में डालना है। फिर वे देखते हैं: बैठे-बैठे ही रात के चारों पहर बीत जाते हैं, लेटना इस बाग़ में बचा ही नहीं। देह सूखकर दुबला हो गया है। और सिर पर जटाओं की एक ही वेणी है, जो चुपचाप बताती है कि इस स्त्री ने अपने लिये कुछ भी करना छोड़ दिया है।

इन सबको एक बात सँभाले हुए है: हृदय में लगातार राम के गुणों का जाप चल रहा है। यह विरह का रोना नहीं, एक अभ्यास है जो टूटने नहीं देता।

इस चित्र में न वस्त्रों का वर्णन है, न आभूषणों का, न सौन्दर्य की गिनती, क्योंकि इस बाग़ में देखने लायक़ कुछ बचा ही नहीं। जो बचा है वह जाप है, और तुलसी उसे सबसे अन्त में रखते हैं, ताकि पढ़नेवाले के पास भी अन्त में वही रह जाये।

आँखें अपने ही चरणों पर टिकी हैं, और मन राम के चरणकमलों में लीन है। एक साथ दो चरण: एक जिन्हें वे देख रही हैं, एक जिनमें वे रह रही हैं। नीचे देखना यहाँ हार नहीं, मर्यादा है। जो बाग़ उसी का है जो उन्हें हरकर लाया, वहाँ आँख उठाना ही क्यों।

फिर बात हनुमान पर आती है: सीता को इस दीन दशा में देखकर वे परम दुखी हो गये। इतने बलवान् के लिये तुलसी बस यही लिखते हैं, कि वे दुखी हुए। जो सचमुच किसी का दूत है, वह दूसरे का दुख अपने ऊपर लेकर ही उसका काम करता है।

उसी अवसर पर वह आया

अब तक सब शान्त था: एक बैठी हुई स्त्री, एक छिपा हुआ वानर, और कोई तीसरा नहीं। हनुमान सोच ही रहे हैं कि क्या करें, कि बाग़ का सन्नाटा टूटता है।

पत्तों में छिपे हनुमान का प्रश्न है: भाई, अब क्या करूँ? जिन्होंने अभी समुद्र लाँघा, सुरसा की परीक्षा पार की और लंकिनी को एक घूँसे में गिराया, वे यहाँ पूछ रहे हैं कि क्या करें। कारण सीधा है। इस घड़ी का काम बल का नहीं, धैर्य का है।

ठीक इसी क्षण रावण आता है, सज-धजकर, स्त्रियों का पूरा दल साथ लिये। फिर वह राजनीति के चारों उपाय आज़माता है: साम यानी मीठी बात, दान यानी लालच, भय यानी धमकी, और भेद यानी फूट डालना। तुलसी चारों को एक साँस में निपटा देते हैं, और इसी में उनका फ़ैसला है कि चारों बेकार गये।

फिर वह अपना प्रस्ताव रखता है। सुन्दर मुखवाली और सयानी कहकर पुकारता है, और मन्दोदरी तक का नाम दाँव पर लगा देता है।

मन्दोदरी आदि सब रानियों को आपकी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है, बस एक बार मेरी ओर देख लीजिए। वह अपनी पत्नियों को गिनती की चीज़ों की तरह सामने रख रहा है, और बदले में माँग रहा है केवल एक नज़र। जिसने इतने लोक जीते, वह एक स्त्री की आँख नहीं पा रहा, और यही उसकी हार का पहला प्रमाण है।

तिनके की आड़

अब सीता उत्तर देती हैं, और उत्तर से पहले दो काम करती हैं। पहले राम का स्मरण करती हैं। फिर एक तिनका उठाकर अपने और रावण के बीच रख लेती हैं। बोलने से पहले का यह इन्तज़ाम इस काण्ड के सबसे याद रखे गये चित्रों में है।

तिनके की यह आड़ कोई दीवार नहीं, हवा चले तो उड़ जाये। पर वह दीवार का नहीं, मर्यादा का काम कर रही है। बोलना पड़ रहा है, क्योंकि चुप्पी का अर्थ वह अपने हक़ में लगा लेगा। पर बात सीधे नहीं होगी, बीच में कुछ रहेगा, चाहे एक तिनका ही सही। और स्मरण पहले इसलिये, कि जो शक्ति इन शब्दों में आनेवाली है वह अपनी नहीं मानी जा रही।

स्मरण में राम किस रूप में आते हैं, यह यहाँ काम का है: अयोध्या के राजा, और साथ में परम स्नेही। जिस घड़ी सामने खड़ा आदमी अपनी रानियों का हिसाब गिना रहा है, उस घड़ी याद किया जा रहा नाम भी एक राजा का है। पर उस राजा का रिश्ता स्नेह का है। बल के आगे बल नहीं, सम्बन्ध। इसके बाद जो उत्तर आता है उसमें काँपने की कोई गुंजाइश नहीं।

पहला वाक्य एक प्रश्न है, और उत्तर उसी में है: जुगनू के उजाले से क्या कभी कमलिनी खिल सकती है? कमल सूरज से खिलता है, यह सब जानते हैं। जुगनू अँधेरा नहीं है, उसमें थोड़ी चमक है जो रात में दिख भी जाती है। तुलसी रावण को शून्य नहीं, छोटा कहते हैं, और यह ज़्यादा चुभता है।

फिर वे कहती हैं कि अपने मन में भी यही बात बैठा लीजिए। वे सीधे उस जगह हाथ रखती हैं जहाँ उसे डर लगता है: उसे राम के बाण की ख़बर नहीं है। बाण अभी चला नहीं, सेना ने अभी समुद्र पार नहीं किया, राम अभी दूर हैं। पर सीता के मन में उस बाण का पहुँचना तय है, और इसी से यह वाक्य वज़न पाता है।

आख़िरी बात सबसे सीधी चोट है: वह उन्हें सूने में हर लाया, जब कोई देखनेवाला नहीं था। सीता उसे चोर कहती हैं, ऐसा चोर जो सामने आने का साहस न कर सका। वे उसे अधम और निर्लज्ज कहकर पूछती हैं कि क्या उसे लाज नहीं आती। जो स्त्री महीनों से पहरे में बैठी हैं, वे उस आदमी से उसकी लज्जा का हिसाब माँग रही हैं जिसके हाथ में इस समय उनका जीवन है।

तलवार निकल आयी

इस उत्तर के बाद रावण के पास कोई तर्क नहीं बचता। अब उसके भीतर का हिसाब खुल जाता है। चोट बाण की नहीं, तुलना की है।

अपने को जुगनू के समान और राम को सूर्य के समान सुनकर उसने तलवार निकाल ली और बड़े ग़ुस्से में बोला। यह वह क्रोध है जो हारकर आता है, जिसमें शर्म मिली होती है। तर्क ख़त्म होते ही हाथ हथियार पर जाता है, और क्रम पूरा होता है: पहले बात, फिर लालच, फिर धमकी, और अब लोहा।

वह कहता है कि सीता ने उसका अपमान किया है, वह कठोर तलवार से उनका सिर काट देगा, नहीं तो वे अभी उसकी बात मान लें। उसने बीच का कोई रास्ता नहीं छोड़ा। और यहीं वह मोड़ आता है जिसके लिये तुलसी ने अपनी सबसे कसी हुई बात बचा रखी थी। जिस स्त्री के सामने तलवार खिंची है, वे उसी तलवार को अपनी बात पूरी करने का साधन बना लेती हैं।

वह भुजा, या यह तलवार

पहले वे उस भुजा का चित्र बनाती हैं जो यहाँ नहीं है: राम की भुजा, श्याम कमलों की माला जैसी सुन्दर, और हाथी की सूँड़ जैसी। पोद्दार की टीका उसे पुष्ट और विशाल बताती है। फिर वे उस चित्र को अपने कंठ तक ले आती हैं। वे रावण के सामने दो ही विकल्प रखती हैं: इस कंठ में या तो वह भुजा पड़ेगी, या उसकी यह भयानक तलवार।

इस वाक्य से तलवार का सारा काम छिन जाता है। हथियार तब डराता है जब सामनेवाले को जीवन चाहिये हो। यहाँ वह चुनाव का एक पलड़ा बन गया है, और चुननेवाली वही हैं जिनके सामने वह खिंचा है। फिर वे कहती हैं: सुनिए, यही मेरा सच्चा प्रण है। कुछ देर पहले रावण ने भी अपना प्रण सुनाया था, रानियों को दासी बनाने का। दोनों प्रण आमने-सामने रख दीजिए, और फ़ैसला अपने आप हो जाता है।

चन्द्रहास से विनती

और फिर वह होता है जिसकी रावण ने कल्पना नहीं की थी। सीता उससे बात करना छोड़ देती हैं और उसकी तलवार से बात करने लगती हैं, विनती के स्वर में।

हे चन्द्रहास, राम के विरह की आग से उपजी मेरी यह जलन हर लीजिए। आपकी धार ठंडी है और तेज़ भी, मेरे दुख का बोझ उतार दीजिए। जिस देह में विरह की आग जल रही हो, उसे लोहे की धार सचमुच ठंडी लगेगी। रावण जिसे अन्त समझकर सामने कर रहा है, उसे वे राहत समझकर माँग रही हैं।

सीता पहले ही वाक्य में साफ़ कर देती हैं कि यह दुख रावण का दिया हुआ नहीं है। जो जलन वे तलवार से हरवाना चाहती हैं, वह राम के विरह से उपजी है। उस दुख की गिनती में रावण का नाम तक नहीं आता। वह बस हथियार लेकर खड़ा है, और उसके हथियार का उपयोग भी उसके हाथ में नहीं रहा।

मय की पुत्री, और महीने भर की मोहलत

यह सुनते ही रावण मारने दौड़ता है। तुलसी तुरन्त उसे रोक भी देते हैं, और रोकनेवाली वही हैं जिनका नाम अभी सौदे में दाँव पर लगाया गया था।

मय दानव की पुत्री मन्दोदरी नीति कहकर उसे समझाती हैं। यहाँ तुलसी वाल्मीकि से अलग चलते हैं। वाल्मीकि के सुन्दरकाण्ड (सर्ग 22) में रावण को धान्यमालिनी रोकती है, और बारह महीने की अवधि के बचे दो महीने गिनाये जाते हैं। मानस में रोकनेवाली मन्दोदरी हैं, और मोहलत एक महीने की। पूरे प्रसंग में मन्दोदरी का बस यही एक हिस्सा है। कुछ ही देर पहले उन्हें दासी बना देने का प्रण सुनाया गया था, और अब उन्हीं की आवाज़ यह हत्या रोक देती है। तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते, बस दोनों बातें पास-पास रख देते हैं।

फिर रावण काम अपने हाथ से नहीं करता, दूसरों को सौंप देता है। सब राक्षसियों को बुलाकर आज्ञा होती है कि जाकर सीता को तरह-तरह से डराया जाये। एक महीने की मोहलत घोषित होती है: महीने भर में कहा न माना, तो तलवार निकालकर मार डालूँगा। जो तलवार अभी हाथ में थी, वह अब तीस दिन बाद के लिये टल गयी।

इस मोहलत के साथ इस काण्ड में एक घड़ी चल पड़ती है। अब तक बाग़ में समय का कोई हिसाब नहीं था, रातें बैठे-बैठे बीतती थीं। अब एक महीना गिना जाने लगा है, और वह गिनती सीता के मन में चलेगी। रावण ने इसे दबाव समझा होगा। असल में उसने अपने ही हाथ से भूल कर दी। जो आज नहीं हुआ वह तीस दिन तक नहीं होगा, और इन तीस दिनों में समुद्र पार से बहुत कुछ आ सकता है।

पिशाचिनियों का घेरा

रावण महल चला गया, और यहाँ पिशाचिनियों के झुंड बहुत से बुरे रूप धरकर सीता को भय दिखाने लगे। यहाँ दो दुनियाएँ आमने-सामने हैं: एक में महल, और वह आदमी जो आज्ञा देकर लौट गया। दूसरे में पेड़ के नीचे बैठी एक स्त्री, और चारों ओर बदलते भयानक चेहरे। रूप बुरे हैं: डरावने, पर ओछे।

और इसी घेरे के बीच इस रात का असली मोड़ आता है। जिस भीड़ को डराने के लिये लगाया गया था, उसी के भीतर से एक आवाज़ उठती है जो सबका पक्ष बदल देती है।

त्रिजटा का स्वप्न

तुलसी शुरू में ही त्रिजटा का परिचय तय कर देते हैं: वे राक्षसी हैं, यह छिपाया नहीं जाता। उनका मन राम के चरणों में लगा है, वे विवेक में निपुण हैं। इस काण्ड में यह तीसरी बार है कि लंका के भीतर से राम का पक्ष निकलता है: पहले द्वार पर लंकिनी, फिर विभीषण का घर, और अब यह स्वप्न।

और वे सबको बुलाकर यह नहीं कहतीं कि डराना छोड़ दीजिए। वे कहती हैं कि सीता की सेवा करके अपना कल्याण कर लीजिए। विवेक का अर्थ यही है, कि बात उस भाषा में कही जाये जो सुननेवाले को समझ आये। फिर वे अपना स्वप्न सुनाती हैं।

स्वप्न में एक बंदर ने लंका जला दी और राक्षसों की सारी सेना मारी गयी। रावण नंगा है, गधे पर सवार है, सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं। इस दशा में वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। लंका मानो विभीषण को मिल गयी है, और पूरे नगर में राम की दुहाई फिर गयी है। तब राम ने सीता को बुला भेजा।

जिस बंदर के लंका जलाने की बात हो रही है, वह इसी समय ऊपर पत्तों में बैठा यह सब सुन रहा है। उसने अभी एक तिनका भी नहीं जलाया। राक्षसियों के लिये यह डरावना सपना है, पढ़नेवाले के लिये आगे की पूरी कथा का नक़्शा। तुलसी कहानी पहले बता देते हैं और फिर भी रस कम नहीं होता, क्योंकि उनके यहाँ प्रश्न यह नहीं रहता कि क्या होगा, बल्कि यह कि कैसे होगा।

स्वप्न के ब्योरों में भी तरतीब है। सिर मुँड़ा होना, नंगा होना, गधे पर बैठना, ये उस आदमी के साथ लगी हैं जो अभी अपनी रानियों का हिसाब गिनाकर गया है। बीस भुजाएँ कटी हैं, यानी वह बल जिसके भरोसे सारा दंभ खड़ा था। और दिशा दक्षिण है, जिसे पोद्दार की टीका यमपुरी की दिशा बताती है।

चार दिन की बात

मैं पुकारकर कहती हूँ कि यह स्वप्न चार दिन में, यानी थोड़े ही दिनों में, सच होकर रहेगा। असर तुरन्त दिखता है। जो राक्षसियाँ डराने आयी थीं, वे ख़ुद डर गयीं और सीता के चरणों पर गिर पड़ीं। पल भर में पासा पलट जाता है। घेरा वही है, बैठी हुई स्त्री वही हैं, पर अब घेरा घुटनों पर है।

फिर वे सब जहाँ-तहाँ चली जाती हैं और बाग़ फिर सूना हो जाता है। तुलसी इस प्रसंग को इस जीत पर बन्द नहीं करते। वे इसे वहाँ बन्द करते हैं जहाँ रात का सबसे भारी हिस्सा शुरू होता है।

सब चली गयीं, और सीता के मन में सोच होने लगा कि महीना बीत जाने पर वह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा। ये वही हैं जिन्होंने कुछ देर पहले तलवार से अपना दुख हरने की विनती की थी। पर वह बात शत्रु के सामने कही गयी थी, और यह अकेले में उठा विचार है। तुलसी दोनों को एक ही प्रसंग में रखते हैं। इसी से उनकी सीता सचमुच की स्त्री बनती हैं। सामने वे किसी से नहीं झुकतीं, और अकेले में वे मनुष्य हैं।

शर्तें किसके हाथ में

सब कुछ उस तिनके पर टिका है। जब सामनेवाला बल से दबाव डाले, तो आदमी या तो झुक जाता है या लड़ पड़ता है। सीता तीसरा काम करती हैं। बोलने से पहले, तलवार निकलने से भी पहले, बीच में एक तिनका रख देती हैं। उससे कोई वार नहीं रुकता, पर यह तय हो जाता है कि बात किन शर्तों पर होगी। बल रावण के पास था, शर्तें सीता के पास रहीं, और वे एक बार भी नहीं हिलीं।

दूसरी बात हनुमान की है, जो वाटिका में एक शब्द नहीं बोलते। वे ऊपर बैठे सब देख रहे हैं, उनमें वह बल है जिससे यह दृश्य एक क्षण में बदल सकता था, और वे कुछ नहीं करते। यह कायरता नहीं, काम की समझ है। बीच में कूद पड़ते तो नगर जान जाता कि राम का दूत यहाँ है। राम का संदेश सीता तक कभी न पहुँचता, और समुद्र पार बैठी सेना अँधेरे में रह जाती। जिसे बड़ा काम सौंपा गया हो, उसकी सबसे कठिन परीक्षा यही है कि छोटा काम सामने आने पर हाथ न उठाये।

तीसरी बात त्रिजटा की है। पहरे पर लगायी गयी सब राक्षसियाँ एक जैसी नहीं थीं। भीड़ में भी कोई एक होता है जिसका मन उस काम में नहीं लगता, और बदलाव अक्सर वहीं से शुरू होता है। त्रिजटा ने किसी से लड़ाई नहीं की, जो देखा था वह सबके सामने कह दिया, और घेरा अपने आप टूट गया। रात के अन्त तक वाटिका में तीन लोग ऐसे हैं जो राम के हैं: सीता, त्रिजटा, और वह जो पत्तों में छिपा बैठा है। लंका को अभी इसकी ख़बर नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 8 से दोहा 11, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।