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अशोक वाटिका

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · अशोक वाटिका

अशोक वाटिका

लंका के बीचोंबीच एक बाग़ है जहाँ रावण तलवार खींचकर खड़ा होता है, और उसके सामने बैठी स्त्री एक तिनके की आड़ करके उत्तर देती हैं।

लंका की इस रात का एक हिस्सा अभी भी एक घर के भीतर है। दीवारों पर राम का नाम लिखा है, एक राक्षस बैठा सुन रहा है, और एक वानर बोलते बोलते वहाँ पहुँच गया है जहाँ गिनती अपने आप रुक जाती है। पर इसी बीच एक काम अधूरा पड़ा है, और वह इस घर में पूरा नहीं होगा। उसके लिये नगर के उस कोने तक जाना है जहाँ अशोक के पेड़ों के नीचे एक स्त्री महीनों से बैठी हैं, और जिनके पास न कोई ख़बर पहुँची है न कोई मुँह जो उनका अपना हो।

आगे जो प्रसंग आता है उसमें तुलसीदास तीन चीज़ें एक के बाद एक रखते हैं। पहले वह दृश्य जिसे देखकर देखने वाला स्वयं टूट जाता है, फिर वह दबाव जो बात से शुरू होकर तलवार तक पहुँचता है, और अन्त में एक स्वप्न जो पूरी लंका का हिसाब उलट देता है। बीच में जो आवाज़ सबसे ऊँची है वह न रावण की है, न पत्तों में छिपे दूत की। वह उस स्त्री की है जो बात करने से पहले सामने एक तिनका रख लेती हैं, और उस तिनके के पीछे से जो कहती हैं वह इस काण्ड की सबसे मज़बूत पंक्तियाँ हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • जानकी: बैदेही, जनकसुता। अशोक के नीचे बैठी, देह सूख चुकी, आँखें अपने ही चरणों पर, और मन राम के चरणों में।
  • हनुमान: पवनसुत। इस पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते। पत्तों की ओट में बैठे गवाह हैं, और सब कुछ देख रहे हैं।
  • विभीषण: वह घर जिससे रास्ता निकलता है। जानकी का हाल और वाटिका तक पहुँचने की युक्तियाँ वही बताते हैं।
  • रावण: दसकंधर, दसमुख। सज धजकर, स्त्रियों का दल साथ लेकर आता है, और लौटता है एक महीने की मोहलत घोषित करके।
  • मन्दोदरी: मय दानव की पुत्री। एक ही पंक्ति में आती हैं, और उसी एक पंक्ति में जानकी की जान बचा देती हैं।
  • राक्षसियाँ: पिशाचिनियों का समूह, जिन्हें डराने के काम पर लगाया गया है और जो प्रसंग के अन्त तक डरकर चरणों पर गिरी हैं।
  • त्रिजटा: वह राक्षसी जिसका मन राम के चरणों में है और जिसका स्वप्न इस रात की सबसे बड़ी घटना है।
  • श्रीराम: वाटिका में कहीं नहीं, और हर वाक्य में। जानकी उन्हीं का स्मरण करके मुँह खोलती हैं।

विभीषण के घर से वाटिका तक

बात वहीं से उठती है जहाँ रात छूटी थी। राम के गुणों की गिनती करते करते कहने वाला उस जगह पहुँच जाता है जहाँ से आगे शब्द काम नहीं देते, और तुलसीदास उस अवस्था के लिये एक ही विशेषण रखते हैं। जो कहा नहीं जा सकता, वही मिला।

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥

चौपाई १

इसी चौपाई का पहला भाग यह कहता है कि जो ऐसे स्वामी को जानते हुए भी भुलाकर भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों। यह वाक्य विभीषण के घर में बैठकर कहा जा रहा है, उस नगर में जहाँ इस भूल का सबसे बड़ा उदाहरण सिंहासन पर बैठा है। कहने वाला किसी का नाम नहीं लेता, और सुनने वाला समझ जाता है। इसके बाद विभीषण उस घर की सबसे कठिन ख़बर पर आते हैं।

पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता ।

चौपाई २

जिस स्त्री का पता लगाने के लिये समुद्र लाँघा गया, उनकी सारी कथा विभीषण उसी क्रम से कहते हैं जिस क्रम से वे यहाँ रहती आयी हैं। किस दशा में रहती हैं, कहाँ बैठती हैं, कौन पहरे पर है, सब। और सुनने वाला सुनकर चुप नहीं बैठता। भाई कहकर वे जो माँगते हैं वह सलाह नहीं है, रास्ता है। जानकी माता को देखना है, और उसके बिना यह यात्रा अधूरी है।

विभीषण उन्हें युक्तियाँ बताते हैं, क्योंकि अशोक वाटिका कोई खुला बाग़ नहीं है। वहाँ पहरा है, राक्षसियाँ हैं, और भीतर जाने का कोई सीधा दरवाज़ा नहीं। जो सुनकर पवनसुत करते हैं वह इस पूरे काण्ड का ढंग है। वे बड़े नहीं होते, छोटे हो जाते हैं।

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ॥

चौपाई ३

सोइ रूप, यानी वही रूप जो लंका में घुसते समय धरा था, मच्छर जितना। जिस शरीर से पूरा समुद्र लाँघा गया था, वही अब इतना छोटा कर लिया गया है कि किसी की नज़र में न आये। तुलसी इसे एक चौपाई के आधे हिस्से में निपटा देते हैं, पर यह इस प्रसंग की सबसे बड़ी सीख है। जिस काम में देखा जाना ही सबसे बड़ा ख़तरा हो, उस काम में बल दिखाना नहीं, बल छिपाना होता है।

सार: विभीषण जानकी का हाल और वाटिका तक पहुँचने की युक्तियाँ बताते हैं। विदा लेकर पवनसुत फिर वही अत्यन्त छोटा रूप धरते हैं और अशोक वन के उस भाग में पहुँचते हैं जहाँ जानकी रहती हैं।

पत्तों की ओट से पहला दर्शन

और तब वह दृश्य सामने आता है जिसके लिये यह सारी यात्रा हुई थी। तुलसीदास यहाँ कोई बड़ा वर्णन नहीं करते। वे सिर्फ़ चार चीज़ें गिनाते हैं, और चारों ऐसी हैं जो किसी के भी जी को बैठा दें।

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

चौपाई ४

पहली बात प्रणाम की है। वे सामने नहीं जाते, नाम नहीं लेते, मन ही मन प्रणाम करते हैं, क्योंकि इस समय अपने होने की ख़बर देना उन्हें ख़तरे में डालना है। दूसरी बात रात की है। बैठे ही बैठे चारों पहर बीत जाते हैं, यानी लेटना नाम की कोई चीज़ इस बाग़ में बची ही नहीं है। तीसरी देह की है, जो सूखकर आधी रह गयी है। और चौथी उस एक वेणी की है, सिर पर जटाओं की एक लट, जो इस बात का सबसे चुपचाप कहा गया प्रमाण है कि इस स्त्री ने अपने लिये कुछ भी करना छोड़ दिया है।

पर इन चारों के बीच पाँचवीं बात वह है जो सबको सँभाले हुए है। हृदय में लगातार राम के गुणों का जाप चल रहा है। यह विरह का रोना नहीं है, यह एक अभ्यास है, जो टूटने नहीं देता। और इसी पर दोहा आता है, जो इस काण्ड के सबसे सधे हुए दोहों में है।

और अब यह देखिये कि इन पंक्तियों में क्या नहीं है। न वस्त्रों का वर्णन है, न आभूषणों का, न किसी सौन्दर्य की गिनती। जिस कवि ने बालकाण्ड में जनक की सभा का एक एक रंग लिखा था, वही यहाँ चार शब्दों में काम निपटा देते हैं, क्योंकि इस बाग़ में देखने लायक़ कुछ बचा ही नहीं है। जो बचा है वह एक जाप है, और उसी को तुलसीदास पंक्ति के अन्त में रखते हैं ताकि पढ़ने वाले के पास भी वही बात अन्त में रह जाये।

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८॥

दोहा ८

आँखें अपने ही चरणों पर टिकी हैं और मन राम के चरणकमलों में लीन है। एक ही पंक्ति में तुलसीदास दो चरण रख देते हैं, एक जिन्हें वे देख रही हैं और एक जिनमें वे रह रही हैं। नीचे देखना यहाँ हार नहीं है, वह मर्यादा है। जिस बाग़ में चारों ओर वही लोग हैं जिन्हें वे देखना नहीं चाहतीं, वहाँ आँख उठाना ही क्यों।

और दोहे का दूसरा आधा हिस्सा दूत का है। जानकी को दीन देखकर पवनसुत परम दुखी हो गये। इतने बड़े बल वाले के लिये तुलसी यही लिखते हैं, कि वे दुखी हुए। यह प्रसंग यहीं पर एक और बात तय कर देता है। जो सचमुच किसी का दूत है, वह दूसरे का दुख अपने ऊपर लेकर ही उसका काम करता है।

सार: पवनसुत जानकी को पहली बार देखते हैं। देह सूखी हुई, सिर पर जटाओं की एक वेणी, रातें बैठे ही बैठे बीतती हुईं, हृदय में राम के गुणों का जाप, आँखें अपने ही चरणों पर। उन्हें इस दशा में देखकर दूत स्वयं परम दुखी हो जाते हैं।

उसी अवसर पर वह आया

अब तक का सब कुछ शान्त था। एक बैठी हुई स्त्री, एक छिपा हुआ वानर, और बीच में कोई तीसरा नहीं। पवनसुत सोच ही रहे हैं कि करें क्या, कि बाग़ का सन्नाटा टूटता है। तुलसी की कथा में संयोग यों ही नहीं आते, और यह संयोग तो पूरे प्रसंग की धुरी है।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी॥

चौपाई १, २

छिपे हुए दूत का प्रश्न सुनिये। करौं का भाई, यानी करूँ क्या। यह वही हैं जो अभी अभी समुद्र लाँघकर आये हैं, जिन्होंने रास्ते में सुरसा को हराया और लंकिनी को एक घूँसे में गिराया, और यहाँ आकर पत्तों में बैठे यह पूछ रहे हैं कि अब क्या करें। इसका कारण सीधा है। बल से जो काम हो सकता था वह रास्ते तक था। यहाँ जो चाहिये वह धैर्य है, और धैर्य किसी को अपने आप नहीं आता।

और ठीक इसी क्षण रावण आता है, सज धजकर, स्त्रियों का पूरा दल साथ लिये। यह दिखावा अपने आप में एक तर्क है, कि देखिये यहाँ क्या क्या है। फिर वह चारों उपाय आज़माता है जो राजनीति में गिनाये जाते हैं। साम, यानी मीठी बात। दान, यानी लालच। भय, यानी धमकी। और भेद, यानी फूट डालना। तुलसी इन चारों को एक ही पंक्ति में निपटा देते हैं, और उनके निपटाने के ढंग में ही उनका फ़ैसला छिपा है, कि चारों बेकार गये।

फिर वह जो प्रस्ताव रखता है, वह उसके अपने मन का सबसे सच्चा नमूना है। सुमुखि कहकर, सयानी कहकर, वह मन्दोदरी तक का नाम गिरवी रख देता है।

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

चौपाई ३

मन्दोदरी आदि सब रानियों को दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है, बस एक बार मेरी ओर देख लीजिये। इस वाक्य में जो सौदा है उसे ध्यान से देखिये। वह अपनी पत्नियों को गिनती की चीज़ों की तरह सामने रख रहा है, और बदले में जो माँग रहा है वह भी बहुत छोटा है, केवल एक नज़र। जिसने इतने बड़े लोकों को जीता है, वह एक स्त्री की आँख नहीं पा रहा, और यही उसकी हार का पहला प्रमाण है।

तिनके की आड़

अब जानकी उत्तर देती हैं, और तुलसीदास उत्तर से पहले दो काम करवाते हैं। पहला, वे अवधपति का स्मरण करती हैं। दूसरा, वे एक तिनका उठाकर अपने और उसके बीच में कर लेती हैं। बोलने से पहले का यह इन्तज़ाम इस पूरे काण्ड में सबसे ज़्यादा याद रखा गया चित्र है।

तिनके की यह आड़ कोई दीवार नहीं है। हवा चले तो उड़ जाये। पर यह दीवार का काम नहीं कर रही, यह मर्यादा का काम कर रही है। बात करनी पड़ रही है, क्योंकि चुप रहने का अर्थ वह अपने हक़ में लगा लेगा। पर बात सीधे नहीं होगी। बीच में कुछ रहेगा, चाहे वह एक तिनका ही क्यों न हो। और स्मरण पहले इसलिये कि जो शक्ति इन शब्दों में आने वाली है, वह अपनी नहीं मानी जा रही।

स्मरण के लिये तुलसीदास जो सम्बोधन चुनते हैं उस पर भी रुकिये। वे यहाँ न मर्यादापुरुषोत्तम लिखते हैं, न कोदण्डधारी। वे लिखते हैं अवधपति, और साथ में जोड़ते हैं परम सनेही। जिस समय सामने खड़ा आदमी अपने राज का, अपनी रानियों का और अपनी तलवार का हिसाब गिना रहा है, उस समय याद किया जा रहा नाम भी एक राजा का है, पर उस राजा का जो सबसे गहरा स्नेह करने वाला है। बल के मुक़ाबले बल नहीं, बल के मुक़ाबले सम्बन्ध। इस एक शब्द के बाद जो उत्तर आता है उसमें काँपने की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

चौपाई ४, ५

पहला वाक्य एक प्रश्न है, और प्रश्न में ही उत्तर रखा है। जुगनू के उजाले से क्या कभी कमलिनी खिल सकती है। कमल सूरज से खिलता है, यह उस बाग़ में बैठा हर आदमी जानता है। तो जिस स्त्री का खिलना सूरज से बँधा है, उसके सामने जुगनू खड़ा होकर क्या कर लेगा। और उपमा चुनने का ढंग देखिये। जुगनू अँधेरा नहीं है, उसके पास अपनी थोड़ी सी चमक है, और वह चमक रात में दिख भी जाती है। रावण को तुलसी शून्य नहीं कहते, वे उसे छोटा कहते हैं, और यह ज़्यादा चुभता है।

अगली पंक्ति में वे उसी से कहती हैं कि अपने मन में भी यही बात बैठा लीजिये, और फिर सीधे उस जगह पर हाथ रखती हैं जहाँ उसे डर लगता है। रघुवीर के बाण की ख़बर नहीं है। बाण अभी चला नहीं है, समुद्र अभी पार नहीं हुआ है, सेना अभी दूर है। पर कहने वाली के मन में उस बाण का पहुँचना तय है, और उसी तय होने से यह वाक्य अपना वज़न पाता है।

और सबसे आख़िरी पंक्ति सबसे सीधी चोट है। सूने में हर लाया, यानी जब कोई देखने वाला नहीं था तब चुराकर लाया। उन्होंने उसे चोर कहा, और चोर भी वह जो सामने आने का साहस न कर सका। लाज नहीं आती, यह प्रश्न किसी हथियार से नहीं रोका जा सकता। जो स्त्री महीनों से पहरे में बैठी हैं, वे उस आदमी से उसकी लज्जा का हिसाब माँग रही हैं जिसके हाथ में इस समय उनका जीवन है।

सार: रावण साम, दान, भय और भेद, चारों आज़माता है और मन्दोदरी तक को दासी बनाने का प्रण करता है। जानकी राम का स्मरण करके, तिनके की आड़ लेकर उत्तर देती हैं कि जुगनू के उजाले से कमलिनी नहीं खिलती, और उसे चोर तथा निर्लज्ज कहती हैं।

तलवार निकल आयी

इस उत्तर के बाद रावण के पास बात करने को कुछ नहीं बचता। तुलसी उसके भीतर का हिसाब दोहे में खोलकर रख देते हैं, और उस हिसाब का सबसे कड़वा हिस्सा यह है कि चोट बाण की नहीं, तुलना की है।

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९॥

दोहा ९

अपने को जुगनू के समान और राम को सूर्य के समान सुनकर, वह तलवार निकालकर बड़े ग़ुस्से में बोला। खिसिआन शब्द पर रुकिये। यह केवल क्रोध नहीं है, यह वह क्रोध है जो हारकर आता है, जिसमें शर्म मिली हुई होती है। जिसके पास तर्क खत्म हो जाते हैं, उसके हाथ अपने आप हथियार पर जाते हैं, और तुलसीदास इस क्रम को बहुत सावधानी से लिखते हैं। पहले बात, फिर लालच, फिर धमकी, और अब लोहा।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥

चौपाई १

सीधा सौदा सामने रख दिया गया है। या तो सिर कट जायेगा, या अभी की अभी बात मान ली जाये। बीच का कोई रास्ता उसने नहीं छोड़ा। और यहीं इस प्रसंग का वह मोड़ आता है जिसके लिये तुलसीदास ने अपनी सबसे कसी हुई पंक्तियाँ बचा रखी थीं। जिस स्त्री के गले पर तलवार है, वे उस तलवार को अपनी बात पूरी करने का साधन बना लेती हैं।

वह भुजा, या यह तलवार

स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

चौपाई २

पहले वे उस भुजा का चित्र बनाती हैं जो यहाँ मौजूद नहीं है। श्याम कमलों की माला जैसी सुन्दर, और हाथी की सूँड़ जैसी भरी हुई और लम्बी। सुन्दरता और शक्ति एक ही पंक्ति में। फिर वे उस चित्र को अपने कंठ के पास ले आती हैं और सामने खड़े आदमी के सामने केवल दो विकल्प रख देती हैं। इस कंठ में या तो वह भुजा पड़ेगी, या यह भयानक तलवार।

इस वाक्य से तलवार का सारा काम छिन जाता है। हथियार तब डराता है जब सामने वाले को जीवन चाहिये हो। यहाँ वह भी चुनाव का एक पलड़ा बना दिया गया है, और चुनाव करने वाली वही हैं जिनके गले पर वह रखा है। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा, यानी सुनिये, यही मेरा सच्चा प्रण है। कुछ देर पहले रावण ने भी अपना प्रण सुनाया था, रानियों को दासी बनाने का। दोनों प्रण आमने सामने रख दीजिये और इस प्रसंग का पूरा फ़ैसला अपने आप हो जाता है।

चन्द्रहास से विनती

और इसके बाद वह होता है जिसकी कल्पना रावण ने नहीं की थी। जानकी उससे बात करना छोड़ देती हैं और उसकी तलवार से बात करने लगती हैं, वह भी विनती के स्वर में।

चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा॥

चौपाई ३

हे चन्द्रहास, राम के विरह की आग से पैदा हुई मेरी यह जलन हर लीजिये। आपकी धार ठंडी है और तेज़ भी, तो मेरे दुख का बोझ उतार दीजिये। तलवार को शीतल कहना इस प्रसंग की सबसे बारीक चोट है। जिस देह में विरह की आग जल रही हो, उसके लिये लोहे की धार सचमुच ठंडी लगेगी। रावण जिसे अन्त समझकर सामने कर रहा है, उसे वे राहत समझकर माँग रही हैं।

यहाँ एक बात साफ़ कर लेनी चाहिये, क्योंकि तुलसी इसे दो बार कहते हैं। उनका दुख रावण का दिया हुआ नहीं है। जो जलन वे तलवार से हरवाना चाहती हैं वह रघुपति के विरह से उत्पन्न हुई है। रावण उस दुख की गिनती में इतना छोटा है कि उसका नाम भी नहीं आता। वह केवल हथियार लेकर खड़ा है, और उसके हथियार का उपयोग भी उसके हाथ में नहीं रहा।

सार: रावण तलवार खींचकर सिर काटने की धमकी देता है। जानकी उत्तर में कहती हैं कि इस कंठ में या तो प्रभु की भुजा पड़ेगी या यह तलवार, और फिर तलवार से ही विनती करती हैं कि वह विरह की आग से उपजी उनकी जलन हर ले।

मय की पुत्री, और महीने भर की मोहलत

यह सुनते ही वह मारने दौड़ता है। तुलसी को यहाँ किसी बड़े युद्ध की ज़रूरत नहीं पड़ती, एक ही पंक्ति में वे उसे रोक भी देते हैं, और रोकने वाली वही स्त्री हैं जिसका नाम अभी अभी सौदे में गिरवी रखा गया था।

सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

चौपाई ४, ५

मय दानव की पुत्री, यानी मन्दोदरी, नीति कहकर उसे समझाती हैं। पूरे प्रसंग में उनका यही एक हिस्सा है, और उसी में सब आ जाता है। कुछ ही देर पहले उन्हीं को दासी बना देने का प्रण सुनाया गया था, और अब वही इस घर की एकमात्र ऐसी आवाज़ हैं जो हत्या रोक देती है। तुलसीदास इस विडम्बना पर कोई टिप्पणी नहीं करते, वे बस दोनों पंक्तियाँ पास पास रख देते हैं और पढ़ने वाले पर छोड़ देते हैं।

फिर रावण वह करता है जो हर कमज़ोर पड़ते हुए बलवान का तरीक़ा है। वह काम अपने हाथ से नहीं करता, दूसरों को सौंप देता है। सब राक्षसियों को बुलाकर आज्ञा होती है कि जाकर इन्हें तरह तरह से डराओ, और एक महीने की मोहलत घोषित कर दी जाती है। महीने भर में कहा न माने तो तलवार निकालकर मार डालूँगा। जो अभी हाथ में थी और चल सकती थी, वही तलवार अब तीस दिन बाद के लिये टाल दी गयी है। धमकी को समय दे देना ही उसके खोखले होने का प्रमाण है।

इस मोहलत के साथ ही इस काण्ड में एक घड़ी चल पड़ती है। अब तक बाग़ में समय का कोई हिसाब नहीं था, रातें बैठे बैठे बीतती थीं और दिन उनसे अलग नहीं थे। अब एक महीना गिना जाने लगा है, और वह गिनती जानकी के मन में चलेगी। रावण ने सोचा होगा कि यह दबाव है। असल में उसने अपने ही हाथ से अपनी सबसे बड़ी भूल कर ली, क्योंकि जो काम आज नहीं हुआ वह अब तीस दिन तक नहीं होगा, और इन तीस दिनों में समुद्र के उस पार से बहुत कुछ आ सकता है।

पिशाचिनियों का घेरा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १०॥

दोहा १०

रावण घर चला गया, और यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत से बुरे रूप धरकर जानकी को भय दिखाने लगे। दोहे के दो आधे हिस्सों में दो अलग दुनिया हैं। एक में महल है, नींद है, और वह आदमी है जो आज्ञा देकर लौट गया। दूसरे में पेड़ के नीचे बैठी एक स्त्री हैं और चारों ओर बदलते हुए भयानक चेहरे। मंद शब्द पर ध्यान दीजिये, जो रूपों के साथ लगा है। ये रूप डरावने तो हैं, पर हैं ओछे, क्योंकि जिनसे यह काम कराया जा रहा है वे भी जानती हैं कि यह काम क्या है।

और इस घेरे के बीच वह होता है जो इस रात का असली मोड़ है। जिस भीड़ को डराने के लिये लगाया गया था, उसी भीड़ के भीतर से एक आवाज़ उठती है जो सबका पक्ष बदल देती है।

सार: मन्दोदरी नीति कहकर रावण को रोक लेती हैं। वह राक्षसियों को जानकी को डराने के काम पर लगाकर और एक महीने की मोहलत घोषित करके महल लौट जाता है, और वाटिका में डरावने रूपों का घेरा शुरू हो जाता है।

त्रिजटा का स्वप्न

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

चौपाई १

परिचय की इन दो पंक्तियों में तुलसीदास बहुत कुछ तय कर देते हैं। वे राक्षसी हैं, इसे वे छिपाते नहीं। साथ ही उनका मन राम के चरणों में लगा है और वे विवेक में निपुण हैं। जन्म कहीं का, और मन कहीं और का। इस काण्ड में यह दूसरी बार है कि लंका के भीतर से ही राम का पक्ष निकलता है, पहले विभीषण के घर से और अब इस स्वप्न से।

और ध्यान दीजिये कि वे सबको बुलाकर क्या कहती हैं। डराना छोड़ दो, ऐसा नहीं कहतीं। वे कहती हैं कि जानकी की सेवा करके अपना कल्याण कर लीजिये। विवेक में निपुण होने का अर्थ यही है, कि बात उस भाषा में कही जाये जो सुनने वाले को समझ में आये। फिर वे स्वप्न सुनाती हैं।

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

चौपाई २, ३

स्वप्न में एक बंदर ने लंका जला दी और राक्षसों की सारी सेना मारी गयी। रावण नंगा है, गधे पर सवार है, सिर मुँड़े हुए हैं और बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं, और इस दशा में वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। लंका मानो विभीषण को मिल गयी है, और पूरे नगर में राम की दुहाई फिर गयी है। इसके बाद प्रभु ने जानकी को बुला भेजा।

इस स्वप्न को इस प्रसंग में रखने का ढंग देखिये। जिस बंदर के लंका जलाने की बात हो रही है, वह इसी समय ऊपर पत्तों में बैठा यह सब सुन रहा है, और उसने अभी तक एक तिनका भी नहीं जलाया। सुनने वाली राक्षसियों के लिये यह एक डरावना सपना है। पढ़ने वाले के लिये यह आगे की पूरी कथा का नक़्शा है। तुलसीदास कहानी को पहले से बता देते हैं और फिर भी उसका रस कम नहीं होने देते, क्योंकि उनके यहाँ प्रश्न यह कभी नहीं रहता कि क्या होगा, प्रश्न हमेशा यह रहता है कि किस ढंग से होगा।

स्वप्न के ब्योरों में भी एक तरतीब है। सिर मुँड़ा होना, नंगा होना, गधे पर बैठना, ये तीनों उस समय के समाज में अपमान की सबसे जानी पहचानी निशानियाँ थीं, और तीनों उस आदमी के साथ लगी हैं जो अभी अभी अपनी रानियों का हिसाब गिनाकर गया है। बीस भुजाएँ कटी हुई हैं, यानी वह बल जिसके भरोसे यह सारा दंभ खड़ा था। और दिशा दक्षिण है, जिसे पोद्दारजी की टीका यमपुरी की दिशा बताती है। जो भोग की गिनती में सबसे आगे था, वह इस स्वप्न में उसी गिनती से खाली होकर जा रहा है।

चार दिन की बात

यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

चौपाई ४

मैं पुकारकर कहती हूँ कि यह स्वप्न चार दिन में सच होकर रहेगा। चार दिन यहाँ गिनती नहीं है, थोड़े से समय का ढंग है। और इस घोषणा का असर तुरन्त दिखता है। जो राक्षसियाँ डराने आयी थीं वे सुनकर स्वयं डर गयीं और जनकसुता के चरणों पर गिर पड़ीं। एक ही चौपाई में पूरा पासा पलट जाता है। घेरा वही है, बैठी हुई स्त्री वही हैं, पर अब घेरा घुटनों पर है।

इसके बाद वे सब जहाँ तहाँ चली जाती हैं और बाग़ फिर सूना हो जाता है। तुलसीदास इस प्रसंग को उस विजय पर बन्द नहीं करते। वे उसे वहाँ बन्द करते हैं जहाँ रात का सबसे भारी हिस्सा शुरू होता है।

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११॥

दोहा ११

सब चली गयीं, और जानकी के मन में सोच होने लगा कि महीना बीत जाने पर वह नीच राक्षस मुझे मारेगा। यह वही स्त्री हैं जिन्होंने कुछ देर पहले तलवार से अपना दुख हरने की विनती की थी। पर वह सामने खड़े शत्रु के आगे कही गयी बात थी, और यह अकेले में उठा हुआ विचार है। तुलसीदास दोनों को एक ही प्रसंग में रख देते हैं, और इसी से उनकी जानकी सचमुच की स्त्री बनती हैं। सामने वे किसी से नहीं झुकतीं, और अकेले में वे मनुष्य हैं।

सार: त्रिजटा अपना स्वप्न सुनाती हैं, जिसमें लंका जली है, सेना मरी है, रावण विरूप होकर दक्षिण दिशा जा रहा है और लंका विभीषण को मिली है। राक्षसियाँ डरकर जानकी के चरणों पर गिरती हैं और चली जाती हैं, और अकेली बची जानकी के मन में महीने भर बाद की मृत्यु का विचार उठता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को याद रखने का सबसे सीधा तरीक़ा वह तिनका है। जिस समय गले पर तलवार हो, उस समय आदमी या तो झुक जाता है या लड़ पड़ता है। जानकी तीसरा काम करती हैं। वे बीच में एक तिनका रख देती हैं। उस तिनके से कोई वार नहीं रुकता, पर उससे यह तय हो जाता है कि बात किन शर्तों पर होगी। बल सामने वाले के पास था, शर्तें उनके पास रहीं, और पूरे प्रसंग में वे शर्तें एक बार भी नहीं हिलीं।

दूसरी बात उस दूत की है जो इस पूरे अध्याय में एक शब्द नहीं बोलता। वे ऊपर बैठे हैं, सब देख रहे हैं, उनके भीतर वह बल है जिससे यह सारा दृश्य एक क्षण में बदल सकता था, और वे कुछ नहीं करते। यह कायरता नहीं है, यह काम की समझ है। बीच में कूद पड़ते तो एक रावण गिरता और जानकी का पता खुल जाता, राम का संदेश उन तक कभी न पहुँचता, और समुद्र पार बैठी सेना अंधेरे में रह जाती। जिसे कोई बड़ा काम सौंपा गया हो, उसकी सबसे कठिन परीक्षा यह होती है कि छोटा काम सामने आने पर हाथ न उठाये।

और तीसरी बात त्रिजटा की है। उस बाग़ में पहरे पर लगायी गयी सब राक्षसियाँ एक जैसी नहीं थीं। भीड़ जब किसी को घेरती है तो उसमें भी कोई एक होता है जिसका मन उस काम में नहीं लगता, और बदलाव प्रायः वहीं से शुरू होता है। त्रिजटा ने न किसी से लड़ाई की, न कोई उपदेश दिया। उन्होंने जो देखा था वह सबके सामने कह दिया, और घेरा अपने आप टूट गया। इस रात के अन्त तक वाटिका में तीन लोग ऐसे हो चुके हैं जो राम के हैं, एक जानकी, एक त्रिजटा, और एक वह जो पत्तों में छिपा बैठा है। लंका को इसकी ख़बर अभी नहीं है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ८ से दोहा ११, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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