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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 4
मुद्रिका और संदेश
जिस रात सीता आग माँग रही थीं, ऊपर से राम की अँगूठी गिरी। उस अँगूठी से भरोसे तक की बात तुलसीदास धीरे-धीरे कहते हैं।
रात अभी ढली नहीं है। अशोक वाटिका की राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ चली गयी हैं, और पेड़ के नीचे बैठी सीता के पास एक ही साथी बची हैं, त्रिजटा। सीता उनसे न अन्न माँग रही हैं, न जल, न कोई ख़बर। वे लकड़ी माँग रही हैं, और उसमें आग। ऊपर अशोक के पत्तों की ओट में एक वानर बैठा है। उसने आने के बाद से सब देखा है, और अब तक एक शब्द नहीं बोला।
आगे जो होता है, वह एक छोटी-सी चीज़ से शुरू होता है। ऊपर से एक अँगूठी गिरकर उनके सामने आ पड़ती है। उसके गिरने से लेकर उस पर विश्वास होने तक तुलसीदास पूरा समय लेते हैं। क्योंकि जिसके सामने महीनों से केवल दबाव और छल आया हो, वह सच को एक क्षण में नहीं पहचान लेता। प्रसंग वहाँ ख़त्म होता है जहाँ यही स्त्री उस वानर को पुत्र कहकर अजर और अमर होने का आशीर्वाद देती हैं।
पेड़ के ऊपर और नीचे
- सीता: जनक की पुत्री। अशोक के नीचे बैठी, विरह में देह छोड़ देना चाहती हैं, और इसी प्रसंग में फिर जीने को राज़ी होती हैं।
- हनुमान: राम के दूत। पहले पत्तों में छिपे एक गवाह, फिर एक आवाज़, फिर सामने आया एक देह, और अन्त में एक पुत्र।
- त्रिजटा: वह राक्षसी जिसे सीता माता कहकर पुकारती हैं और अपनी विपत्ति की संगिनी बताती हैं।
- मुद्रिका: राम नाम से अंकित अँगूठी, जो दूत के बोलने से पहले ही सीता तक पहुँच जाती है।
- राम: वाटिका में नहीं हैं, फिर भी पूरे प्रसंग में तीन तरह से मौजूद हैं: अँगूठी में, कथा में, और संदेश में।
- लक्ष्मण: केवल कुशल की बात में, कि वे राम के साथ हैं और कुशल हैं।
- रावण: एक बार भी सामने नहीं आता। बस उसकी दी हुई मोहलत चल रही है।
- अशोक वृक्ष: जिससे सीता विनती करती हैं कि वह अपना नाम सच कर दे।
लकड़ी माँगी जा रही है
रावण जो मोहलत देकर गया था, उसका अन्त सीता को दिख रहा है। पर यहाँ वे उस अन्त की प्रतीक्षा नहीं करतीं, उसे अपने हाथ में लेना चाहती हैं।
वे एक राक्षसी से हाथ जोड़कर बात करती हैं, और उसे माता कहती हैं। उन पर जितनी स्त्रियाँ पहरे पर लगायी गयी थीं, उनमें से एक ही ऐसी निकली जिसे वे विपत्ति की संगिनी कह सकें। और वह भी उसी दल की है। माँग सीधी है: कोई उपाय जल्दी कीजिये कि यह शरीर छूट जाये, यह विरह असह्य है, अब सहा नहीं जाता।
उपाय भी वे ख़ुद बता देती हैं: लकड़ी लाकर चिता सजा दीजिये, और उसमें आग लगा दीजिये। फिर वे त्रिजटा को सयानी कहकर कहती हैं, मेरी प्रीति को सत्य कर दीजिये। यानी यह माँग मरने की नहीं, अपनी प्रीति निभाने की है। और साथ में दूसरा कारण: रावण की वह वाणी, जो कानों में शूल की तरह चुभती है, उसे कोई कब तक सुने।
त्रिजटा बहस नहीं करतीं। वे पहले सीता के पैर पकड़ लेती हैं।
पैर पकड़कर उन्होंने सीता को राम का प्रताप, बल और सुयश सुनाकर समझाया। फिर कहा कि रात में आग मिलेगी कहाँ से, और अपने घर चली गयीं। यह मना करना नहीं, टालना है। त्रिजटा ने आग को रात के पार सरका दिया, और उसी रात में अगली घटना छिपी है।
आकाश में अंगारे हैं, धरती पर एक भी नहीं
अब वाटिका में कोई नहीं बचा: एक स्त्री, एक पेड़, और ऊपर एक गवाह जिसे वे नहीं जानतीं। यहाँ तुलसी विरह का जो चित्र बनाते हैं, वह रामचरितमानस के सबसे कड़े चित्रों में है। सीता कहती हैं कि विधाता ही उलटा हो गया है: न आग मिलेगी, न यह पीड़ा मिटेगी। ऊपर देखती हैं तो आकाश अंगारों से भरा दिखता है, तारे जलते कोयले लगते हैं। शिकायत यह है कि इतने अंगारों में से एक भी नीचे नहीं आता।
फिर चन्द्रमा की बारी आती है।
जिस चन्द्रमा को सब शीतल कहते हैं, उसे वे अग्निमय कहती हैं। वे उलाहना देती हैं कि वह भी आग नहीं बरसाता, मानो जान गया हो कि यह हतभागिनी है। फिर वे उसी पेड़ से विनती करती हैं जिसके नीचे बैठी हैं: हे अशोक, अपना नाम सत्य कीजिये, मेरा शोक हर लीजिये। जिसके नाम का अर्थ ही शोक का न होना है, उसके नीचे बैठी स्त्री शोक से मरने को तैयार है।
अशोक से वे छाया नहीं, आग माँगती हैं। उसके नये कोमल पत्ते उन्हें आग जैसे लगते हैं, तो कहती हैं कि वही आग दे दीजिये। वे यह भी कहती हैं कि विरह के रोग का अन्त न कीजिये। पोद्दार की टीका इसका अर्थ यह बताती है कि उसे बढ़ाकर उसकी सीमा तक न पहुँचाइये।
अब तुलसी नज़र ऊपर ले जाते हैं। यह सब किसी की आँखों के सामने हो रहा था। सीता को इस हाल में देखकर ऊपर बैठे वानर का एक क्षण कल्प के बराबर बीता। उनमें यह सब रोकने की ताक़त है, पर बोलने का ठीक तरीक़ा अभी नहीं सूझा, और यही बीच का समय उन्हें युगों जैसा लगता है।
सामने गिरी अँगूठी
हनुमान ने अब तक एक शब्द नहीं कहा, और यहाँ भी वे शब्द से शुरू नहीं करते। पहले हृदय में विचार करते हैं, फिर कुछ नीचे गिरा देते हैं।
यह उपमा पिछली बात के बिना खुलती नहीं। अभी सीता ने अशोक से अंगारा माँगा था। अब ऊपर से कुछ गिरकर सामने आ पड़ता है, और तुलसी कहते हैं, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो। पहले क्षण में वह आग ही समझा गया, इसीलिये सीता हर्ष से उठती हैं। पोद्दार की टीका भी यही कहती है कि अंगारा समझकर वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।
घंटों से वे बैठी थीं, आँखें अपने ही चरणों पर थीं। पहली बार उठती हैं, और कारण यह है कि उन्हें लगा, मरने का सामान आ गया। तुलसी इस पर कुछ नहीं कहते, अगले ही क्षण सच सामने रख देते हैं।
राम नाम अंकित
हाथ में अंगारा नहीं, अँगूठी है, और उस पर राम नाम खुदा है। तुलसी उसे मनोहर और अति सुन्दर कहते हैं। सीता उसे पहचान लेती हैं, चकित होकर देखती रह जाती हैं, और हर्ष और विषाद एक साथ उठने से उनका हृदय अकुला उठता है।
हर्ष इसलिये कि यह निशानी उन्हीं की है जिनकी प्रतीक्षा है। विषाद इसलिये कि यह यहाँ पहुँची कैसे। जो अँगूठी राम की उँगली में होनी चाहिये थी, वह लंका की एक वाटिका में पेड़ से गिर रही है। इसका पहला अर्थ जो मन में आता है वह डरावना है।
जिसे माया रच नहीं सकती
अब वह बात आती है जो इस प्रसंग को केवल भावुक होने से बचाती है। सीता रोती नहीं, सोचती हैं, और उनका सोचना तर्क की तरह चलता है।
पहला तर्क: राम अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है, इसलिये यह अँगूठी उनसे छीनकर नहीं लायी जा सकती। दूसरा तर्क: माया से ऐसी अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। पोद्दार की टीका यहाँ कहती है कि यह अँगूठी माया के उपादान से सर्वथा रहित है, दिव्य है, चिन्मय है। लंका में जो कुछ दिखाया जा सकता था, वह यह नहीं है।
दोनों तर्क एक ही नतीजे पर पहुँचते हैं कि यह असली है। पर मन उस पर टिकता नहीं। तुलसी लिखते हैं कि वे मन में अनेक तरह के विचार कर रही थीं। ठीक इसी घड़ी ऊपर से हनुमान मधुर वचन बोलते हैं, और अपना नाम बताकर शुरू नहीं करते।
कथा, शुरू से
आवाज़ अपना नाम नहीं बताती, राम के गुण सुनाने लगती है, और सुनते ही सीता का दुख भाग जाता है। वे कान और मन दोनों लगाकर सुनती हैं, और हनुमान आदि से लेकर सारी कथा कह सुनाते हैं।
यह क्रम हनुमान की समझ है। एक बन्दी स्त्री के सामने अचानक कोई अनजान देह प्रकट हो जाता तो पहला भाव भय होता। इसलिये पहले राम नाम आया, फिर गुण, फिर पूरी कथा, और देह सबसे आख़िर में। सीता को सबसे पहले सुरक्षा का वचन नहीं, अपनों की ख़बर चाहिये थी, और वह मिलते ही उनका दुख भाग गया।
वह सामने क्यों नहीं आता
सीता उस अनदेखे वक्ता को पुकारती हैं: जिसने कानों के लिये अमृत जैसी यह कथा कही, वह सामने क्यों नहीं आता, भाई। जो अभी तक एक आवाज़ भर था, वह इस एक शब्द में अपना हो गया।
तब हनुमान पास चले जाते हैं, और सीता मुँह फेरकर बैठ जाती हैं, क्योंकि मन में विस्मय हुआ। इतनी बड़ी कथा, और सामने आनेवाला इतना छोटा वानर। इस मुँह फेरने में शिष्टाचार भी है और सतर्कता भी। भरोसा अभी नहीं आया, और उसे लाने का काम अब बोलनेवाले पर है।
मैं राम का दूत हूँ, माता
थोड़े से शब्दों में हनुमान चार काम कर देते हैं। अपना परिचय, कि मैं राम का दूत हूँ। सम्बोधन, हे माता। शपथ, और वह भी राम की, जिनका दूत होने का दावा है। और सबसे ज़रूरी बात, कि यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ।
पोद्दार की टीका इस अँगूठी को निशानी या पहचान बताती है: वह वस्तु जो भेजनेवाले की जगह खड़ी हो सके। राम ने यह अँगूठी हनुमान को अपना सेवक जानकर दी थी, और जिसके पास यह पहुँचेगी उसे परखने का पूरा अधिकार है। इसलिये यहाँ क्रम यही है: पहले निशानी, फिर कथा, फिर देह, फिर शपथ।
नर और वानर का संग
अब सीता पूछती हैं कि मनुष्य और वानर का साथ कैसे हुआ। यह परखने का प्रश्न है और अपनेपन का भी, क्योंकि अयोध्या के राजकुमार का एक वानर को दूत बनाकर समुद्र पार भेजना समझाने लायक़ बात है। हनुमान कोई सफ़ाई नहीं देते, जैसे साथ हुआ था, वैसी कथा कह देते हैं।
और फिर वह घड़ी आती है जिसमें विश्वास उपजता है।
विश्वास अँगूठी, कथा और शपथ के बाद आया, और आया हनुमान के प्रेम भरे वचनों से। अन्त में जो काम आया वह प्रमाण नहीं था, बोलनेवाले की आवाज़ का वह लगाव था जो छिप नहीं सकता। और निष्कर्ष यह नहीं निकला कि यह सच बोल रहा है, बल्कि यह कि यह मन, वचन और कर्म से राम का दास है। परखना ख़त्म हुआ, पहचान शुरू हुई।
विरह के समुद्र में जहाज
उन्हें राम का अपना जानते ही प्रीति गाढ़ी हो गयी, आँखों में आँसू भर आये और रोम-रोम पुलक उठा। सीता कहती हैं: हे तात हनुमान, विरह के समुद्र में डूबती हुई मेरे लिये आप जहाज बन गये। जो थोड़ी देर पहले आग माँग रही थीं, वे अब पार उतरने की बात कर रही हैं। पूरे प्रसंग का मोड़ यही है।
सम्बोधन भी बदलता है: पहले भाई कहा था, अब तात। हर सम्बोधन पहले से ज़्यादा अपना है। और यह उस स्त्री के मुँह से है जिसके पास पूरी लंका में अपना कहने को केवल त्रिजटा थीं।
कुशल पूछना, और एक शिकायत
भरोसा आते ही वही होता है जो किसी भी घर में होता है। कुशल पूछा जाता है। मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई सहित राम का कुशल कहिये।
पर अगली ही साँस में कुशल पूछना शिकायत बन जाता है। राम तो कोमल हृदय और कृपालु हैं, यह जानी हुई बात है, फिर उन्होंने यह निष्ठुरता किस कारण धारण कर ली? दोष नहीं दिया जा रहा। उनका अपना स्वभाव याद दिलाकर पूछा जा रहा है कि उसके उलट यह क्यों हो रहा है।
फिर वे कहती हैं कि सेवक को सुख देना उनकी सहज बान है। इस तरह वे अपने को भी सेवकों की गिनती में रख देती हैं। और पूछती हैं: क्या वे कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात, क्या कभी उनके साँवले कोमल अंगों को देखकर मेरी आँखें ठंडी होंगी?
फिर बोल निकलना बन्द हो जाता है, आँखों में पानी भर आता है। बड़ी मुश्किल से एक वाक्य निकलता है: हा नाथ, आपने मुझे बिल्कुल ही भुला दिया। तुलसी तुरन्त हनुमान की ओर मुड़ते हैं। वे वही बात दोहराते हैं जो अँगूठी गिरने से पहले कही थी, कि सीता को विरह से बहुत व्याकुल देखकर। पहली बार यह देखकर अँगूठी गिरायी गयी थी, इस बार कोमल और विनीत वचन निकलते हैं।
आपसे दूना प्रेम
हनुमान का उत्तर कसा हुआ है: हे माता, राम भाई सहित कुशल हैं। पर केवल कुशल कह देना उस शिकायत का उत्तर नहीं, इसलिये वे जोड़ते हैं कि वे आपके दुख से दुखी हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार कुशल शरीर से है, मन से नहीं।
फिर निष्ठुरता वाले प्रश्न का असली उत्तर: मन छोटा करके दुख मत कीजिये, राम के हृदय में आपसे दूना प्रेम है। यह तुलना वही कर सकता है जिसने दोनों ओर देखा हो, और हनुमान ने राम को भी देखा है और यह वाटिका भी।
संदेश से पहले वे धीरज धरने को कहते हैं, और इतना कहते ही ख़ुद गद्गद हो जाते हैं, आँखों में आँसू भर आते हैं। जो संदेश अभी सुनाना है, उसने सुनानेवाले को पहले ही भिगो दिया है।
राम का संदेश
संदेश का पहला वाक्य सान्त्वना नहीं, सूचना है: आपके वियोग में मेरे लिये सब कुछ उलट गया है। फिर ब्योरा आता है: वृक्षों के नये पत्ते आग जैसे लगते हैं, रात कालरात्रि जैसी, और चन्द्रमा सूर्य जैसा। नये पत्तों और आग की यही उपमा अभी अशोक के नीचे सीता के मुँह से आयी थी। दोनों ओर एक ही चित्र है, और दोनों को एक-दूसरे की ख़बर नहीं। तुलसी इस मेल पर कुछ नहीं कहते, बस दोनों को पास-पास रख देते हैं।
सूची आगे और तीखी होती है: कमलों के वन भालों के वन जैसे हो गये हैं, बादल मानो खौलता तेल बरसाते हैं। जो हित करते थे वही पीड़ा देने लगे हैं, और शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा साँप की साँस जैसी लगती है। विरह में संसार वही रहता है, बस जो शीतल करने के लिये था वह जलाने लगता है।
यह तत्व एक मन जानता है
फिर संदेश चित्रों से हटकर राम के अपने मन पर आता है, और यहीं वह बात है जिसके लिये यह संदेश याद रखा जाता है।
कह देने से दुख कुछ घट जाता है, पर कहूँ किससे, यह कोई नहीं जानता। यह उनका वाक्य है जिनके साथ भाई है, मित्र हैं, और जल्दी ही पूरी सेना होगी, फिर भी सुनने वाला कोई नहीं। और फिर: हे प्रिये, हमारे प्रेम का तत्व एक मेरा मन ही जानता है।
और वह मन सदा आपके ही पास रहता है, प्रेम का सारा रस इतने में समझ लीजिये। संदेश में न कोई वचन है, न योजना, न तारीख़। सुनते ही सीता प्रेम में ऐसी मग्न हुईं कि उन्हें शरीर की सुध नहीं रही।
इस बेसुधी में ख़तरा है, इसलिये हनुमान तुरन्त बोलते हैं: हे माता, हृदय में धीरज रखिये, सेवकों को सुख देनेवाले राम का स्मरण कीजिये। उनकी प्रभुता को मन में लाइये, और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दीजिये। वे विरह को मिटाने की कोशिश नहीं करते, उसके साथ राम के बल की याद जोड़ देते हैं।
राक्षसों का समूह पतंगों जैसा है और राम के बाण आग जैसे। पतंगा आग की ओर ख़ुद जाता है। इसलिये हनुमान कहते हैं कि राक्षसों को जला हुआ ही समझिये, जो अभी हुआ नहीं है उसे हो चुका बता देते हैं।
अभी ले चलूँ
अब हनुमान देर का कारण बताते हैं: यदि राम को ख़बर मिली होती तो वे विलम्ब न करते। देर उपेक्षा से नहीं, अनजानेपन से है, और वह अनजानापन अब ख़त्म होने वाला है।
फिर उपमा: राम के बाण रूपी सूर्य के उगने पर राक्षसों की सेना रूपी अन्धकार कहाँ ठहरेगा। अन्धकार से लड़ना नहीं पड़ता, सूर्य निकलते ही वह नहीं रहता।
और फिर वह प्रस्ताव जो काण्ड की दिशा बदल सकता था: हे माता, मैं अभी आपको यहाँ से ले चलूँ। पर फिर वे ख़ुद रुक जाते हैं: राम की शपथ, मुझे उनकी आज्ञा नहीं है। शक्ति है, अवसर है, रात है, बस आज्ञा नहीं है, और वही निर्णायक है। इसलिये वे कहते हैं कि कुछ दिन और धीरज रखिये, राम वानरों के साथ यहाँ आयेंगे।
वे राक्षसों को मारकर आपको ले जायेंगे, और नारद आदि तीनों लोकों में उनका यश गायेंगे। चोरी से निकाल ले जाने और जीतकर ले जाने में जो अन्तर है, वही यहाँ तय होता है। जो काम आज रात एक वानर अकेले कर सकता था, वह आज्ञा न होने से रुका है। और जो यश गाया जायेगा वह राम के अपने किये का होगा।
संदेह, और वह देह
सीता का उत्तर सीधा और व्यावहारिक है: हे पुत्र, सब वानर तो आप ही जैसे छोटे-छोटे होंगे, और राक्षस बड़े बलवान योद्धा हैं। इसलिये मेरे मन में बड़ा संदेह है। सम्बोधन फिर बदला है: भाई से तात, तात से सुत। जिस पर संदेह है उसी को पुत्र कहा जा रहा है, और संदेह वानरों के आकार पर है, नीयत पर नहीं।
उत्तर में हनुमान बोलते नहीं, अपना देह प्रकट कर देते हैं। वह सोने के पर्वत जैसा विशाल है, जिसे पोद्दार की टीका सुमेरु कहती है, युद्ध में भयंकर, अत्यन्त बलवान और वीर। वाटिका में आने के बाद से यही देह पत्तों में छिपा बैठा था।
तब जाकर सीता के मन में भरोसा हुआ, और हनुमान ने तुरन्त फिर छोटा रूप ले लिया। जितना दिखाना ज़रूरी था उतना दिखाया, एक क्षण भी ज़्यादा नहीं।
छोटा रूप लेकर वे कहते हैं कि वानरों में बहुत बल और बुद्धि नहीं होती, पर राम के प्रताप से बहुत छोटा साँप भी गरुड़ को खा सकता है। अभी-अभी सुमेरु जैसा देह दिखाकर यह कहा जा रहा है। जो दिखा वह अपना नहीं था। यह बात तुलसी उपदेश से नहीं, एक उलटी तस्वीर से कहते हैं: गरुड़ साँपों को खाता है, और यहाँ सबसे छोटा साँप उसे खा रहा है।
आशीर्वाद
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से भरी हनुमान की वाणी सुनकर सीता के मन में सन्तोष हुआ।
और फिर आशीर्वाद। राम का प्रिय जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया: हे तात, आप बल और शील के भण्डार हों। फिर और: हे पुत्र, आप अजर, अमर और गुणों के ख़ज़ाने हों, और राम आप पर बहुत कृपा करें।
इन सब वरदानों में हनुमान को आख़िरी ने छुआ: राम कृपा करें, यह कानों से सुनते ही वे पूरे प्रेम में मग्न हो गये। अजर और अमर होने पर तुलसी अलग से कुछ नहीं कहते। हनुमान ने बार-बार सीता के चरणों में सिर नवाया। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा: हे माता, अब मैं कृतकृत्य हो गया, आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह सब जानते हैं।
भूख, और आज्ञा
इतने भारी प्रसंग का अन्त तुलसी भूख की बात से करते हैं। हनुमान कहते हैं: हे माता, सुन्दर फलों वाले पेड़ देखकर मुझे बहुत भूख लग आयी है। जिसने अभी सुमेरु जैसा देह दिखाया था, वह उसी तरह फल माँग रहा है जैसे कोई बेटा घर में माँगता है।
सीता की चिन्ता भी घर जैसी है: हे बेटा, इस वन की रखवाली बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं। अब उनकी चिन्ता दूत की सुरक्षा की है। हनुमान का उत्तर दो हिस्सों में है: हे माता, उनका भय मुझे बिल्कुल नहीं, यदि आप मन में सुख मानें। बल का दावा पहले, और उसे सीता की प्रसन्नता के अधीन रख देना तुरन्त बाद।
अनुमति देने से पहले सीता ने भूख नहीं देखी। उन्होंने हनुमान को बुद्धि और बल में निपुण देखा, और तब जाने को कहा। यह छूट लाड़ में नहीं, परखकर दी गयी। साथ में एक शर्त भी: हे तात, राम के चरणों को हृदय में रखकर मीठे फल खाइये। इसी एक वाक्य से अगला प्रसंग शुरू होगा, जिसमें बाग़ उजड़ेगा, रखवाले मारे जायेंगे और लंका में हलचल मचेगी।
अँगूठी के बाद की देर
इस प्रसंग की सबसे बड़ी सीख अँगूठी के बाद की देर में है। तुलसी चाहते तो अँगूठी गिरते ही भरोसा करा देते। उन्होंने सीता को तर्क करने दिया, मुँह फेरने दिया, प्रश्न पूछने दिया, और तब विश्वास आने दिया। दुख में पड़े व्यक्ति तक सहारा पहुँचे, तो पहला भाव अक्सर अविश्वास होता है, और यह कमज़ोरी नहीं। जिसे पहले छला जा चुका हो, उसकी सतर्कता उसकी बची हुई पूँजी है, और तुलसी उसे पूरा समय देते हैं।
दूसरी बात दूत के ढंग की है। हनुमान के पास ताक़त भी थी, प्रमाण भी, मौक़ा भी, पर विश्वास इनमें से किसी से नहीं, प्रेम भरे वचनों से आया। अपना बड़ा रूप उन्होंने एक ही बार दिखाया, उतनी देर जितनी देर संदेह रहा, और फिर छोटे हो गये। जो अपना बल काम भर उठाये और काम होते ही रख दे, उस पर भरोसा किया जा सकता है।
तीसरी बात उस संदेश की है जिसमें कोई वचन नहीं था: न तारीख़, न सेना का ब्योरा, न छुड़ा ले जाने का आश्वासन। सिर्फ़ यह कि मन जहाँ है वहीं रहता है। जिस स्त्री ने इसी रात चिता माँगी थी, उसे जीने लायक़ इसी वाक्य ने बनाया। और बदले में उन्होंने जो आशीर्वाद दिया, वह किसी छुटकारे का नहीं, अजर और अमर होने का था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, सोरठा 12 तथा दोहा 13 से दोहा 17, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।