रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · मुद्रिका और संदेश
मुद्रिका और संदेश
जिस रात जानकी आग माँग रही थीं, ऊपर से एक अँगूठी गिरी, और उस अँगूठी से लेकर भरोसे तक का रास्ता तुलसीदास पूरी सावधानी से तय कराते हैं।
रात अपने सबसे भारी पहर में है। अशोक वाटिका का पहरा ढीला पड़ चुका है, राक्षसियाँ जहाँ तहाँ पड़ी सो गयी हैं, और पेड़ की जड़ के पास बैठी जानकी के पास अब एक ही साथी बची हैं, त्रिजटा। जानकी उनसे जो माँग रही हैं वह न अन्न है, न जल, न कोई ख़बर। वे लकड़ी माँग रही हैं, और उस लकड़ी में आग माँग रही हैं। ऊपर, अशोक के पत्तों की ओट में, एक वानर बैठा है जिसने यह सारी रात देखी है और जो अभी तक बोल नहीं सका है।
इसके बाद जो होता है वह एक बहुत छोटी चीज़ से शुरू होता है। एक अँगूठी ऊपर से गिरती है और गोद में आ पड़ती है। उस अँगूठी के गिरने और उस पर विश्वास हो जाने के बीच तुलसीदास पूरी छह चौपाइयाँ और एक दोहा लगा देते हैं, क्योंकि जिस स्त्री के सामने महीनों से केवल दबाव और छल आता रहा है, उसके लिये सच को पहचान लेना एक ही क्षण का काम नहीं है। यह प्रसंग उसी दूरी का है। गोद में पड़ी एक धातु की अँगूठी से चलकर यह वहाँ पहुँचता है जहाँ वही स्त्री एक वानर को पुत्र कहकर अजर और अमर होने का आशीर्वाद दे देती हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- जानकी: बैदेही, जनकसुता। अशोक के नीचे बैठी, विरह में देह छोड़ने पर उतारू, और इसी प्रसंग में फिर से जीने को राज़ी होती हुईं।
- हनुमान: पवनसुत, राम के दूत। पहले पत्तों में छिपे एक गवाह, फिर एक आवाज़, फिर एक देह, और अन्त में एक पुत्र।
- त्रिजटा: वह राक्षसी जिसे जानकी माता कहकर पुकारती हैं और अपनी विपत्ति की संगिनी बताती हैं।
- मुद्रिका: राम नाम से अंकित अँगूठी, जो इस प्रसंग में पहला वाक्य बोलती है, बिना बोले।
- श्रीराम: वाटिका में कहीं नहीं, और तीन रूपों में पूरे प्रसंग में मौजूद। अँगूठी में, कथा में, और संदेश में।
- लक्ष्मण: संदेश में केवल इतने से, कि वे साथ हैं और कुशल हैं।
- रावण: एक बार भी सामने नहीं आता। उसकी दी हुई मोहलत भर चलती रहती है।
- अशोक वृक्ष: जिससे जानकी विनती करती हैं कि वह अपना नाम सच कर दे।
लकड़ी माँगी जा रही है
जिस मोहलत की घोषणा करके रावण गया था, उसकी गिनती जानकी के मन में चल रही है, और उस गिनती का अन्त उन्हें दिख रहा है। पर जो चौपाई अब आती है, उसमें वे उस अन्त की प्रतीक्षा नहीं कर रहीं। वे उसे अपने हाथ में ले लेना चाहती हैं। सम्बोधन पर ध्यान दीजिये, क्योंकि तुलसी ने पूरा भार वहीं रखा है।
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी । मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
चौपाई १ (सोरठा १२)
तजौं देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
एक राक्षसी को हाथ जोड़कर, और माता कहकर। लंका में जितनी स्त्रियाँ उनके चारों ओर बैठायी गयी हैं, उन सबमें से एक ही ऐसी निकली जिसे वे विपत्ति की संगिनी कह सकें, और वह उसी दल की है जिसे डराने के लिये तैनात किया गया था। इसके बाद की माँग सीधी है, कि कोई उपाय जल्दी कीजिये जिससे यह शरीर छूट जाए, क्योंकि विरह असह्य हो चला है और अब सहा नहीं जाता।
अगली चौपाई में वे उपाय भी ख़ुद ही बता देती हैं। आनि काठ रचु चिता बनाई, लकड़ी लाकर चिता सजा दीजिये, और फिर उसमें आग लगा दीजिये। और फिर वह पंक्ति आती है जिसमें इस पूरी माँग का कारण छिपा है। सत्य करहि मम प्रीति सयानी। पोद्दारजी की टीका इसे यों खोलती है कि मेरी प्रीति को सत्य कर दीजिये। यानी आग माँगने का तर्क मरने का नहीं है, निभाने का है। जिस प्रीति का दावा किया गया है उसे सच करने का एक ही रास्ता उन्हें दिख रहा है। इसके साथ ही जो कारण वे गिनाती हैं वह भी सुनने लायक़ है, सुनै को श्रवन सूल सम बानी, वह वाणी जो कानों में शूल की तरह चुभती है, उसे कोई कब तक सुने।
त्रिजटा इसका उत्तर बहस से नहीं देतीं। वे पहले पैर पकड़ लेती हैं।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
चौपाई ३ (सोरठा १२)
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
जो समझाना था वह उन्होंने प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाकर समझाया। और जब बात फिर भी नहीं बनी तो उन्होंने वह कारण रखा जिसका कोई उत्तर नहीं होता, कि रात के समय आग मिलेगी कहाँ से। इतना कहकर वे अपने घर चली गयीं। ध्यान दीजिये कि यह टालना है, मना करना नहीं। त्रिजटा ने आग देने से इनकार नहीं किया, उन्होंने आग को रात के पार सरका दिया। और उसी रात में वह घटना छिपी बैठी है जिसके लिये यह पूरी वाटिका सजी है।
सार: जानकी त्रिजटा से चिता माँगती हैं और कारण रावण को नहीं, विरह को बताती हैं। त्रिजटा चरण पकड़कर प्रभु का प्रताप सुनाती हैं, रात में आग न मिलने की बात कहकर उस माँग को टाल देती हैं, और अपने घर लौट जाती हैं।
आकाश में अंगारे हैं, धरती पर एक भी नहीं
अब वाटिका में कोई नहीं बचा। एक स्त्री है, एक पेड़ है, और ऊपर एक गवाह है जिसे वे नहीं जानतीं। और यहाँ तुलसी विरह की दृष्टि का जो चित्र बनाते हैं वह रामचरितमानस के सबसे कड़े चित्रों में है। कह सीता बिधि भा प्रतिकूला, यानी विधाता ही उलटा पड़ गया। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला, न आग मिलेगी और न यह पीड़ा मिटेगी। फिर वे ऊपर देखती हैं, और आकाश उन्हें अंगारों से भरा दिखता है। तारे तारे नहीं रह जाते, वे जलते हुए कोयले हो जाते हैं। और शिकायत यह है, अवनि न आवत एकउ तारा, कि इतने अंगारे ऊपर बिखरे पड़े हैं पर एक भी नीचे नहीं आता।
इसके बाद चन्द्रमा की बारी आती है, और यहीं यह दृष्टि अपनी हद पर पहुँचती है।
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
चौपाई ५ (सोरठा १२)
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
जिस चन्द्रमा को सारी दुनिया शीतल कहती है, उसे यह स्त्री अग्निमय कहती हैं, और उलाहना यह देती हैं कि वह अपनी आग बरसाता नहीं। कारण भी वे ख़ुद ही गढ़ लेती हैं, मानो वह भी जान गया हो कि यह हतभागिनी है, इसलिये इसे वह भी नहीं देता जो इसे चाहिये। आधी चौपाई के बाद वे आकाश छोड़कर उस पेड़ से बात करने लगती हैं जिसके नीचे बैठी हैं। अशोक से विनती यह है कि वह अपना नाम सत्य करे और शोक हर ले। नाम का यह हिसाब तुलसी बहुत चुपचाप रखते हैं। जिसका नाम ही शोक का न होना है, उसके नीचे बैठी स्त्री शोक से मरने की तैयारी कर रही है।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
चौपाई ६ (सोरठा १२)
देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
और अशोक से जो माँगा जा रहा है वह छाया नहीं है, आग है। नये कोमल पत्ते उन्हें अग्नि जैसे लगते हैं, तो वे कहती हैं कि वही अग्नि दे दीजिये, इस रोग को बढ़ाकर यहीं तक मत छोड़िये। पोद्दारजी की टीका इस निदाना शब्द को खोलकर कहती है कि विरह के रोग का अन्त न करना, यानी उसे सीमा तक पहुँचाकर वहीं ठहरा देना, यही सबसे बड़ी निष्ठुरता है।
और अब तुलसी अचानक कैमरा घुमाकर ऊपर ले जाते हैं। इतनी देर से जो सुनाई दे रहा था वह किसी के कानों में भी पड़ रहा था। सो छन कपिहि कलप सम बीता, उन्हें इस हाल में देखकर ऊपर बैठे वानर का एक क्षण कल्प के बराबर बीता। यह पूरे प्रसंग की धुरी है। जो हो रहा है उसे रोकने की ताक़त उस वानर में है, पर बोलने का ठीक तरीक़ा अभी उसके पास नहीं है, और इसी बीच का समय उसे युगों जैसा लग रहा है।
सार: अकेली पड़ी जानकी तारों में अंगारे और चन्द्रमा में अग्नि देखती हैं, और अन्त में अशोक वृक्ष से माँगती हैं कि वह अपना नाम सच करके यह शोक हर ले। यह सब ऊपर बैठे हनुमान देख रहे हैं, और उनका एक क्षण कल्प के समान बीतता है।
गोद में अँगूठी
अब वह सोरठा आता है जिस पर यह पूरा काण्ड मुड़ता है। ध्यान रखिये कि हनुमान ने अब तक एक शब्द नहीं कहा है, और यहाँ भी वे शब्द से शुरू नहीं करते। पहले हृदय में विचार करते हैं, फिर एक चीज़ नीचे गिरा देते हैं।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
सोरठा १२
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२॥
तुलसी ने जो उपमा यहाँ रखी है वह इस प्रसंग की सबसे सुन्दर चीज़ों में है, और वह पिछली चौपाई के बिना खुलती ही नहीं। अभी अभी जानकी ने अशोक से अंगारा माँगा था। अब ऊपर से कुछ गिरता है और गोद में आ पड़ता है, और तुलसी कहते हैं, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो। माँग आग की थी, आया कुछ और, और पहले क्षण में वह आग ही समझा गया। इसीलिये जो प्रतिक्रिया होती है वह हर्ष की है। पोद्दारजी की टीका यही कहती है कि अंगारा समझकर वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में उठा लिया।
उठकर हाथ में लेना, इस एक क्रिया में उस पूरी रात का हिसाब है। घंटों से वे बैठी थीं, नेत्र अपने ही चरणों पर थे, और उठने का कोई कारण नहीं था। पहली बार वे उठती हैं, और उठने का कारण यह है कि उन्हें लगा कि मरने का सामान आ गया। तुलसी ने इस विडम्बना पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं किया, बस अगली चौपाई में सच सामने रख दिया।
राम नाम अंकित
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चौपाई १ (दोहा १३)
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
हाथ में जो आया वह अंगारा नहीं, अँगूठी है, और उस पर राम नाम खुदा हुआ है। तुलसी इसे केवल सुन्दर नहीं कहते, वे मनोहर कहते हैं और फिर अति सुन्दर कहते हैं, यानी उस अँधेरी रात में भी वह चीज़ पहचान में आ जाने लायक़ थी। और पहचान होते ही जो हुआ वह एक ही आधी पंक्ति में रख दिया गया है, हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी। हर्ष और विषाद, दोनों एक साथ, और हृदय दोनों के बीच अकुला उठा।
यह अकुलाहट समझने लायक़ है। हर्ष इसलिये कि यह चिह्न उन्हीं का है जिनका इन्तज़ार है। और विषाद इसलिये कि यह चिह्न यहाँ पहुँचा कैसे। जो अँगूठी अंगुली में रहनी चाहिये थी वह लंका की एक वाटिका में आसमान से गिर रही है। इसका सीधा अर्थ जो पहले मन में आता है वह डरावना है। इसीलिये चकित होकर देखती रह जाना, और आगे बढ़कर कुछ पूछ न पाना।
जिसे माया रच नहीं सकती
अब वह चौपाई आती है जो इस प्रसंग को भावुकता से बचा लेती है। जानकी रोती नहीं हैं, वे सोचती हैं, और उनका सोचना तर्क की तरह चलता है।
जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई॥
चौपाई २ (दोहा १३)
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
पहला तर्क यह कि रघुनाथ अजेय हैं, उन्हें जीत कौन सकता है। इसलिये यह अँगूठी किसी हार का सामान नहीं हो सकती, यह छीनकर यहाँ नहीं लायी जा सकती। दूसरा तर्क यह कि माया से ऐसी वस्तु बनायी नहीं जा सकती। पोद्दारजी की टीका इस जगह ठहरकर कहती है कि यह अँगूठी माया के उपादान से सर्वथा रहित है, दिव्य है, चिन्मय है, इसलिये जो कुछ रचा जा सकता है उसमें यह आती ही नहीं। लंका में जो कुछ भी दिखाया जा सकता था वह दिखाया जा चुका है, पर यह उस श्रेणी की चीज़ नहीं है।
दोनों तर्क मिलकर एक ही नतीजे पर पहुँचते हैं, कि यह असली है। पर मन उस नतीजे पर टिकता नहीं। तुलसी यही लिखते हैं, कि वे मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। और ठीक इसी घड़ी, जब सोचना अपनी सीमा पर पहुँच चुका था, एक आवाज़ आती है। ऊपर बैठे हनुमान मधुर वचन बोलते हैं। ध्यान दीजिये कि वे अपना परिचय देकर शुरू नहीं करते।
सार: गोद में गिरी अँगूठी पर राम नाम अंकित है। हर्ष और विषाद एक साथ उठते हैं, और जानकी दो तर्कों से यह तय करती हैं कि यह वस्तु न जीती जा सकती थी और न रची जा सकती थी। मन फिर भी नहीं ठहरता, और तभी ऊपर से एक आवाज़ आती है।
कथा, शुरू से
जो आवाज़ आयी वह अपना नाम नहीं बताती। वह कथा सुनाने लगती है। रामचंद्र गुन बरनैं लागा, और असर तत्काल हुआ, सुनतहिं सीता कर दुख भागा। अगली ही पंक्ति में तुलसी उस सुनने का ढंग बता देते हैं, लागीं सुनैं श्रवन मन लाई, कान और मन दोनों लगाकर वे सुनने लगीं। और सुनाने वाले ने कहीं से भी शुरू नहीं किया, आदिहु तें सब कथा सुनाई, आदि से लेकर सारी कथा कह सुनायी।
यह जो क्रम है वह हनुमान की सबसे बड़ी चतुराई है और इसमें चतुराई जैसा कुछ लगता नहीं। एक बंदी स्त्री के सामने अचानक एक अनजान देह प्रकट हो जाती तो पहला भाव भय होता। इसलिये पहले नाम आया, फिर गुण आये, फिर पूरी कथा आयी, और देह सबसे आख़िर में आयी। जो चीज़ उन्हें सबसे पहले चाहिये थी वह सुरक्षा का कोई वचन नहीं था, वह अपने ही लोगों की ख़बर थी। और उस ख़बर को सुनते ही दुख का भाग जाना, तुलसी इसे किसी चमत्कार की तरह नहीं, एक स्वाभाविक बात की तरह लिखते हैं।
कही सो प्रगट होति किन भाई
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होति किन भाई॥
चौपाई ४ (दोहा १३)
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
पहली आधी पंक्ति में जानकी उस अनदेखे वक्ता को पुकारती हैं। जिसने कानों के लिये अमृत जैसी यह कथा कही, वह सामने क्यों नहीं आता। सम्बोधन भाई का है, और यह अपने आप में बताता है कि कथा ने क्या किया। जो अभी तक एक आवाज़ भर था, वह इस एक शब्द में रिश्तेदार हो गया।
और फिर वह चीज़ होती है जिस पर पूरा प्रसंग टिका है। हनुमान पास चले जाते हैं, और जानकी मुँह फेरकर बैठ जाती हैं। तुलसी इसका कारण एक ही शब्द में देते हैं, मन में विस्मय हुआ। आवाज़ जिस चीज़ से आ रही थी उसे देखकर बात मिली नहीं। कथा इतनी बड़ी थी और सामने आने वाला इतना छोटा। इस मुँह फेर लेने में शिष्टाचार भी है और सतर्कता भी, और तुलसी दोनों में से किसी को अलग करके नहीं दिखाते। वे बस यह बता देते हैं कि भरोसा अभी नहीं आया है, और अब उसे लाने का काम बोलने वाले पर है।
राम दूत मैं मातु जानकी
राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की॥
चौपाई ५ (दोहा १३)
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
दो पंक्तियों में चार काम हो जाते हैं। पहला, परिचय, कि मैं राम का दूत हूँ। दूसरा, सम्बोधन, कि हे माता जानकी, जिससे दूरी और रिश्ता दोनों एक साथ तय हो जाते हैं। तीसरा, शपथ, और वह शपथ किसी और की नहीं, करुणानिधान की है, यानी जिनका दूत होने का दावा किया जा रहा है उन्हीं की। और चौथा, वह जो सबसे ज़रूरी था, कि यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ।
उस आख़िरी शब्द पर रुकिये। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी। पोद्दारजी की टीका सहिदानी का अर्थ निशानी या पहचान बताती है। यानी वह वस्तु जो भेजने वाले की जगह पर खड़ी हो सके। राम ने जब यह अँगूठी दी थी तो यह जानते हुए दी थी कि जिस स्त्री तक यह पहुँचेगी उसके पास प्रमाण माँगने का अधिकार है और परखने का कारण भी। दूत के शब्दों पर भरोसा बाद में होगा, पहले चिह्न पर होना चाहिये। यह पूरा प्रसंग इसी क्रम में चलता है, पहले चिह्न, फिर कथा, फिर शपथ, फिर देह।
नर और वानर का संग
अगली चौपाई में जानकी जो प्रश्न पूछती हैं वह विनम्र है और बिल्कुल छूट नहीं देता। वे पूछती हैं कि मनुष्य और वानर का साथ हुआ कैसे। यह प्रश्न परखने का है और अपनेपन का भी। अयोध्या के राजकुमार का एक वानर को दूत बनाकर समुद्र पार भेजना अपने आप में समझाने लायक़ बात है, और वे वही समझ माँग रही हैं। उत्तर में हनुमान कोई सफ़ाई नहीं देते। कही कथा भइ संगति जैसें, जैसे साथ हुआ था वैसे की वैसी कथा कह दी।
और इसके बाद वह दोहा आता है जिसके लिये यह सारी मेहनत की गयी थी।
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
दोहा १३
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३॥
विश्वास किस चीज़ से आया, इस पर तुलसी बहुत साफ़ हैं। न अँगूठी से, न कथा से, न शपथ से। कपि के बचन सप्रेम सुनि, प्रेम से भरे हुए वचन सुनकर। जो चीज़ अन्त में काम आयी वह प्रमाण नहीं थी, वह वह लगाव था जो बोलने वाले की आवाज़ में था और छिप नहीं सकता था। और जो निष्कर्ष निकला वह भी ध्यान देने लायक़ है। यह नहीं कि यह सच बोल रहा है, बल्कि यह कि यह कृपासिंधु कर दास। मन, वचन और कर्म, तीनों से। परखना ख़त्म हुआ और पहचान शुरू हुई।
सार: हनुमान नाम, कथा, शपथ और अँगूठी, सब सामने रख देते हैं, पर जानकी का विश्वास इनमें से किसी एक से नहीं आता। वह उनके प्रेम से भरे वचनों से आता है, और आते ही वे जान लेती हैं कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर का दास है।
विरह के समुद्र में जहाज
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी । सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
चौपाई १ (दोहा १४)
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥
हरिजन जानते ही प्रीति गाढ़ी हो गयी, नेत्रों में जल भर आया और रोम रोम पुलक उठा। और फिर वह उपमा आती है जो हनुमान को इस काण्ड में हमेशा के लिये एक नाम दे देती है। विरह का समुद्र है, उसमें डूबना हो रहा था, और इस समय एक जहाज मिल गया। जो स्त्री थोड़ी देर पहले आग माँग रही थीं वे अब तैरने की बात कर रही हैं। यही इस प्रसंग का पूरा मोड़ है, और तुलसी ने इसे एक ही शब्द में बाँध दिया है।
सम्बोधन फिर बदलता है। पहले भाई कहा गया था, अब तात कहा जा रहा है। रिश्ता तेज़ी से बन रहा है और हर सम्बोधन पहले से ज़्यादा अपना है। यह उस स्त्री का व्याकरण है जिसके पास इस पूरी लंका में अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा था।
कुशल पूछना, और एक शिकायत
भरोसा आते ही पहला काम वही होता है जो किसी भी घर में होता है। ख़बर पूछी जाती है। अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी, मैं बलिहारी जाती हूँ, अब कुशल कहिये। और किसका कुशल, यह भी पूरा गिनाया जाता है, अनुज सहित सुख भवन खरारी, छोटे भाई सहित, खर के शत्रु, सुख के धाम का। एक ही अर्ध में स्नेह भी है, आदर भी है और वह सारा संकोच भी है जो महीनों की चुप्पी के बाद पहली बार कुछ पूछते समय होता है।
पर अगली ही आधी पंक्ति में कुशल पूछना शिकायत में बदल जाता है, और यह इस पूरे काण्ड की सबसे मानवीय जगह है। कोमलचित कृपाल रघुराई, वे कोमल हृदय हैं और कृपालु हैं, यह तो जानी हुई बात है। फिर प्रश्न यह है, कपि केहि हेतु धरी निठुराई, तो फिर उन्होंने यह निष्ठुरता किस कारण धारण कर ली। ध्यान दीजिये कि दोष नहीं दिया जा रहा। जो गुण उनका है वही याद दिलाया जा रहा है, और फिर पूछा जा रहा है कि जो स्वभाव है उसके उलट यह क्यों हो रहा है।
अगली चौपाई में यही बात और नीचे उतरती है। सहज बानि सेवक सुखदायक, सेवक को सुख देना उनकी सहज बान है। यह कहकर वे अपने आपको उसी सेवक की पंक्ति में रख देती हैं, कोई विशेष अधिकार नहीं माँगतीं। और फिर वह प्रश्न, जिसमें विरह की पूरी विनम्रता है, कबहुँक सुरति करत रघुनायक, क्या वे कभी मेरी भी याद करते हैं। इसके बाद दूसरा प्रश्न और छोटा है, कबहुँ नयन मम सीतल ताता, हे तात, क्या कभी उन साँवले कोमल अंगों को देखकर मेरे नेत्र ठंडे होंगे।
और फिर बोलना बन्द हो जाता है। बचनु न आव नयन भरे बारी, वचन निकलता ही नहीं, नेत्रों में पानी भर आया है। जो एक वाक्य बड़ी मुश्किल से निकलता है वह यह है, अहह नाथ हौं निपट बिसारी, हा नाथ, मुझे तो बिल्कुल ही भुला दिया गया। इस पंक्ति के बाद तुलसी सीधे हनुमान की ओर मुड़ जाते हैं, और वहाँ भी वही शब्द दोहराते हैं जो अँगूठी गिरने से पहले आया था, कि उन्हें विरह से परम व्याकुल देखकर। दो बार एक ही वाक्य, और बीच में पूरा एक मोड़। पहली बार यह देखकर अँगूठी गिरी थी, दूसरी बार यह देखकर संदेश निकलेगा।
आपसे दूना प्रेम
उत्तर में हनुमान जो कहते हैं उसमें एक भी शब्द ढीला नहीं है। मातु कुसल प्रभु अनुज समेता, कुशल हैं, भाई सहित हैं। पर वे इसे यहीं नहीं छोड़ते, क्योंकि केवल कुशल कह देना उस शिकायत का उत्तर नहीं होता जो अभी सुनी गयी है। इसलिये आगे जोड़ते हैं, तव दुख दुखी सुकृपा निकेता, आपके दुख से दुखी हैं। कुशल शरीर का है, मन का नहीं।
फिर वह वाक्य आता है जो निष्ठुरता वाले प्रश्न का असली जवाब है। जनि जननी मानहु जियँ ऊना, मन में ग्लानि मत मानिये, मन छोटा करके दुख मत कीजिये। और कारण, तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना, राम के हृदय में आपसे दूना प्रेम है। यह कहने की हिम्मत सिर्फ़ वही कर सकता है जिसने दोनों ओर देखा हो। हनुमान ने एक ओर उस वन को देखा है जहाँ वे भटक रहे हैं और दूसरी ओर यह वाटिका देख ली है, और दोनों का हिसाब लगाकर वे यह तुलना कर रहे हैं।
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
दोहा १४
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४॥
संदेश देने से पहले धीरज धरने को कहना, यह दूत की सावधानी है। और उसके बाद जो होता है वह दूत का काम नहीं, उसका मन है। इतना कहते ही वे ख़ुद गद्गद हो गये और उनके नेत्रों में जल भर आया। जो संदेश अभी सुनाया जाना है, वह उसे सुनाने वाले पर पहले असर कर चुका है। तुलसी ने संदेश की गम्भीरता बताने के लिये कोई विशेषण नहीं लगाया, बस सुनाने वाले की आँखें दिखा दीं।
सार: कुशल पूछने से शुरू होकर बात शिकायत तक पहुँचती है और फिर चुप्पी में डूब जाती है। हनुमान उत्तर में शरीर का कुशल और मन का दुख, दोनों बता देते हैं, और कहते हैं कि राम के हृदय में उनसे दूना प्रेम है। फिर वे धीरज धरने को कहकर संदेश शुरू करते हैं, और ख़ुद गद्गद हो जाते हैं।
राम का संदेश
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
चौपाई १ (दोहा १५)
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
संदेश का पहला वाक्य कोई सान्त्वना नहीं है। वह एक सूचना है, कि इस वियोग में मेरे लिये सब कुछ उलट गया है। और फिर उलटने का ब्योरा शुरू होता है, और वह ठीक उसी भाषा में है जिसमें थोड़ी देर पहले जानकी आकाश को देख रही थीं। वृक्षों के नये कोमल पत्ते अग्नि जैसे लगते हैं, रात कालरात्रि जैसी लगती है, और चन्द्रमा सूर्य जैसा लगता है। ध्यान दीजिये कि किसलय और अग्नि की वही उपमा अभी अशोक के नीचे आ चुकी है। दोनों ओर एक ही चित्र बन रहा है और दोनों को एक दूसरे की ख़बर नहीं है। तुलसी ने इस मेल पर एक शब्द भी नहीं कहा, बस दोनों को इतने पास रख दिया कि पढ़ने वाला ख़ुद देख ले।
आगे यह सूची और तीखी होती जाती है। कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा, कमलों के वन भालों के वन जैसे हो गये। बारिद तपत तेल जनु बरिसा, बादल मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। फिर वह पंक्ति जो सबसे सीधी है, जे हित रहे करत तेइ पीरा, जो हित करने वाले थे वही अब पीड़ा दे रहे हैं। और अन्त में हवा, उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा, वह त्रिविध वायु जो शीतल, मन्द और सुगन्ध कही जाती है, अब साँप की साँस जैसी लगती है। विरह में संसार बदलता नहीं, उसका काम बदल जाता है। जो शीतल करने के लिये बना था वही जलाने लगता है।
यह तत्व एक मन जानता है
संदेश का अगला हिस्सा चित्रों से हटकर अपने ऊपर आ जाता है, और यहीं वह पंक्ति है जिसके लिये यह पूरा संदेश याद रखा जाता है।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि कहौं यह जान न कोई॥
चौपाई ३ (दोहा १५)
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
पहले अर्ध में एक साधारण सच्चाई है, कि कह देने से दुख कुछ घट जाता है। और उसके तुरन्त बाद वह लाचारी, कि कहूँ किससे, यह कोई जानता नहीं। ध्यान दीजिये कि यह उस व्यक्ति का वाक्य है जिसके साथ भाई है, जिसके साथ मित्र हैं, जिसके साथ एक पूरी सेना जुटने वाली है। और फिर भी सुनने वाला कोई नहीं, क्योंकि जो कहना है वह सुनने में नहीं आता। दूसरे अर्ध में यही बात अपने ठिकाने पर पहुँच जाती है, कि इस प्रेम का तत्व एक मेरा मन ही जानता है।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं । जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
चौपाई ४ (दोहा १५)
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
और वह मन कहाँ रहता है, यह अगली ही आधी पंक्ति बता देती है। बस इतने से प्रेम का सारा रस समझ लीजिये। संदेश में न कोई वचन है, न कोई योजना, न कोई तारीख़। सिर्फ़ यह कि मन जहाँ है वहीं है। और उसका असर यह हुआ कि सुनते ही जानकी प्रेम में मग्न हो गयीं और उन्हें शरीर की सुध ही नहीं रही।
इस बेसुधी में एक ख़तरा है और हनुमान उसे पहचानते हैं, इसलिये वे तुरन्त बोलते हैं। कह कपि हृदयँ धीर धरु माता, हृदय में धीरज धरिये। सुमिरु राम सेवक सुखदाता, सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण कीजिये। और फिर वह बात जो इस पूरे प्रसंग में उनका असली काम है, उर आनहु रघुपति प्रभुताई, रघुनाथ की प्रभुता को हृदय में लाइये, और सुनि मम बचन तजहु कदराई, मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दीजिये। विरह को वे मिटाने की कोशिश नहीं करते, वे उसके साथ प्रभुता की याद जोड़ देते हैं।
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
दोहा १५
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५॥
उपमा देखिये। राक्षसों का पूरा समूह पतंगों जैसा है और रघुनाथ के बाण अग्नि जैसे। पतंगा आग की ओर ख़ुद जाता है, उसे पकड़कर लाना नहीं पड़ता। इसलिये जो वाक्य निकलता है वह भविष्य में नहीं है, बीत चुके काल में है, कि राक्षसों को जला ही हुआ समझिये। दूत जिस चीज़ का समाचार लाया है वह अभी हुई नहीं है, और वह उसे हो चुकी बताकर जा रहा है।
सार: राम का संदेश वियोग के चित्रों से शुरू होकर उस पंक्ति पर पहुँचता है कि इस प्रेम का तत्व एक मेरा मन ही जानता है, और वह मन सदा वहीं रहता है। सुनते ही जानकी की देह की सुध छूट जाती है, और हनुमान धीरज, स्मरण और प्रभु की प्रभुता, तीनों याद दिलाकर उन्हें सँभालते हैं।
अभी ले चलूँ
अगली चौपाई हनुमान के मुँह से एक ऐसी बात कहलवाती है जो दूत की सीमा में नहीं आती। पोद्दारजी की टीका इसे यों देती है कि यदि रघुवीर ने ख़बर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। यानी देर का कारण उपेक्षा नहीं, अनजानपन है, और वह अनजानपन इसी क्षण ख़त्म होने जा रहा है। इसके बाद वह उपमा आती है जिसमें दिलासा और चेतावनी दोनों हैं।
राम बान रबि उएँ जानकी, राम के बाण रूपी सूर्य के उदय होने पर, तम बरूथ कहँ जातुधान की, राक्षसों की सेना रूपी अन्धकार कहाँ ठहरेगा। अन्धकार से लड़ा नहीं जाता, सूर्य निकलते ही वह नहीं रहता। रावण की सारी सेना को तुलसी ने एक ही उपमा में गिन लिया है और उसे हराने की मेहनत तक ख़त्म कर दी है।
और फिर वह प्रस्ताव आता है जो इस पूरे काण्ड का सबसे बड़ा मोड़ हो सकता था। अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई, हे माता, मैं अभी आपको यहाँ से लिवा ले चलूँ। पर उसी साँस में वह ख़ुद ही उसे रोक देते हैं, प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई, राम की दुहाई है, मुझे प्रभु की आज्ञा नहीं है। शक्ति है, अवसर है, और रात भी है। जो चीज़ नहीं है वह आज्ञा है, और वही निर्णायक है। इसके बाद जो कहा जाता है वह प्रतीक्षा की माँग है, कछुक दिवस जननी धरु धीरा, कुछ दिन और धीरज धरिये, कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा, रघुवीर वानरों सहित यहाँ आवेंगे।
और उसके बाद कारण, जो इस पूरे संयम को अर्थ देता है। निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं, राक्षसों को मारकर आपको ले जायेंगे, तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं, और नारद आदि तीनों लोकों में उस यश को गायेंगे। चोरी से निकाल ले जाना और जीतकर ले जाना, दोनों में जो अन्तर है वही इस प्रसंग में तय हो रहा है। जो काम आज रात एक वानर अकेले कर सकता था, वह इसलिये नहीं किया जा रहा कि उसका किया जाना और उसका किया हुआ कहलाना, दोनों अलग चीज़ें हैं।
संदेह, और वह देह
जानकी का उत्तर इस प्रसंग में सबसे व्यावहारिक है और इसीलिये सबसे विश्वसनीय भी। पोद्दारजी की टीका इसे सीधे रख देती है, कि हे पुत्र, सब वानर तो आप ही के समान होंगे, और राक्षस बड़े बलवान योद्धा हैं। इसलिये हृदय में बड़ा संदेह होता है। यहाँ सम्बोधन फिर बदल गया है। भाई से तात, और तात से सुत। जिस पर संदेह किया जा रहा है उसी को पुत्र कहा जा रहा है, और संदेह सेना के आकार पर है, नीयत पर नहीं।
उत्तर में हनुमान बोलते नहीं। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा, यह सुनकर उन्होंने अपनी देह प्रकट कर दी। पोद्दारजी की टीका उस देह का माप सोने के पर्वत के आकार का बताती है, और तुलसी उसे एक ही पंक्ति में गिना देते हैं, समर भयंकर अतिबल बीरा, युद्ध में भयंकर, अत्यन्त बलवान और वीर। रात भर यह देह पत्तों में छिपी बैठी थी, और इसे छिपाये रखना भी उतनी ही साधना थी जितनी इसे पाना।
सीता मन भरोस तब भयऊ, तब जाकर उनके मन में भरोसा हुआ। और अब उस एक आधी पंक्ति को देखिये जिसमें तुलसी का पूरा हनुमान खड़ा है, पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ। दिखाया, और तुरन्त फिर छोटा रूप ले लिया। जितना दिखाना ज़रूरी था उतना दिखाया गया, एक क्षण भी ज़्यादा नहीं। बड़ा होना उनका काम था, बड़ा दिखते रहना उनका स्वभाव नहीं है।
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
दोहा १६
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६॥
और छोटा रूप लेकर जो वाक्य कहा जाता है वह और भी छोटा है। वानरों में बहुत बल और बुद्धि नहीं होती। अभी अभी सुमेरु जैसी देह दिखाकर यह कहा जा रहा है। और फिर उसका कारण, कि प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा साँप भी गरुड़ को खा सकता है। जो हुआ वह अपना नहीं था, यह बात कह देने का यही सबसे साफ़ तरीक़ा था, और तुलसी इसे उपदेश की तरह नहीं, एक उलटी हुई तस्वीर की तरह रखते हैं। सर्पों को खाने वाला गरुड़ है, और यहाँ सबसे छोटा सर्प उसे खा रहा है।
सार: जानकी का संदेह वानरों के आकार पर है, सो हनुमान अपनी विराट देह दिखा देते हैं और तुरन्त फिर छोटा रूप ले लेते हैं। और वह सारा बल अपने नाम करने के बजाय प्रभु के प्रताप के खाते में डाल देते हैं।
आशीर्वाद
मन संतोष सुनत कपि बानी, हनुमान की वाणी सुनकर मन में सन्तोष हुआ, और तुलसी उस वाणी का वर्णन चार चीज़ों से करते हैं, भगति प्रताप तेज बल सानी, भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई। इन चारों का एक साथ होना ही वह चीज़ है जिसने भरोसा दिया। केवल बल होता तो डर लगता, केवल भक्ति होती तो सान्त्वना भर मिलती।
और फिर वह क्षण आता है जिसके लिये यह पूरा प्रसंग चला था। आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना, राम का प्रिय जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया। कारण पर ध्यान दीजिये। आशीर्वाद इसलिये नहीं मिला कि वे दूत थे या शक्तिशाली थे, बल्कि इसलिये कि वे राम को प्रिय हैं। और आशीर्वाद के शब्द, होहु तात बल सील निधाना, बल और शील के निधान होइये। बल पहले, शील उसके साथ, और दोनों एक ही वाक्य में। आगे और भी मिलता है, अजर अमर गुननिधि सुत होहू, अजर हो जाइये, अमर हो जाइये, गुणों के ख़ज़ाने हो जाइये, करहुँ बहुत रघुनायक छोहू, और रघुनाथ की बहुत कृपा हो।
इन सब वरदानों में से हनुमान को जो एक चीज़ छू गयी वह सबसे छोटी थी। तुलसी लिखते हैं कि प्रभु कृपा करें, यह कानों से सुनते ही वे पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये। अजर और अमर हो जाना उन्होंने सुना ही नहीं, या सुनकर छोड़ दिया। जिस वाक्य पर वे डूब गये वह अपने बारे में था ही नहीं। बार बार नाएसि पद सीसा, बार बार चरणों में सिर नवाया, और हाथ जोड़कर बोले, अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता, अब मैं कृतकृत्य हो गया, आसिष तव अमोघ बिख्याता, आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह प्रसिद्ध है।
भूख, और आज्ञा
इतने भारी प्रसंग का अन्त तुलसी जिस बात से करते हैं वह हैरान कर देने वाली है। हनुमान भूख की बात करते हैं। सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा, हे माता सुनिये, मुझे बहुत भूख लगी है, लागि देखि सुंदर फल रूखा, सुन्दर फलों वाले पेड़ देखकर। अभी अभी जिसने सुमेरु जैसी देह दिखायी थी वह अब फल माँग रहा है, और माँगने का ढंग वैसा ही है जैसा किसी घर में होता है।
उत्तर में जो चिन्ता आती है वह भी बिल्कुल घर की है। सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी, हे बेटा सुनिये, परम सुभट रजनीचर भारी, इस वन की रखवाली बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं। पूरे प्रसंग में पहली बार जानकी किसी और की सुरक्षा की बात कर रही हैं। इस पर हनुमान का उत्तर दो हिस्सों में है और दोनों ज़रूरी हैं। तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं, हे माता, उनका भय मुझे बिल्कुल नहीं है। पर उसके साथ यह भी, जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं, बशर्ते आप मन में सुख मानें। बल का दावा पहले आता है और उसे आज्ञा के अधीन कर देना उसके तुरन्त बाद।
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
दोहा १७
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७॥
अनुमति देने से पहले जानकी ने जो देखा वह भूख नहीं थी। तुलसी लिखते हैं कि उन्होंने उन्हें बुद्धि और बल में निपुण देखा, और तब जाने को कहा। यानी यह छूट लाड़ में नहीं दी गयी, परख कर दी गयी। और आज्ञा के साथ एक शर्त भी लगी, कि रघुनाथ के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाइये। खाने की अनुमति के साथ स्मरण जोड़ देना, यही इस माता का ढंग है। इसी एक वाक्य से अगला प्रसंग शुरू होगा, और उसमें बाग़ उजड़ेगा, रखवाले मारे जायेंगे और लंका में हलचल मच जायेगी। जिस विध्वंस के लिये सुन्दरकाण्ड याद किया जाता है, उसका आदेश पत्र यही दोहा है, और वह एक भूखे बेटे को दी गयी अनुमति जैसा दिखता है।
सार: हनुमान भूख बताकर फल माँगते हैं, जानकी पहरेदार राक्षसों की चिन्ता करती हैं, और हनुमान अपने निर्भय होने को भी उनकी प्रसन्नता के अधीन रखते हैं। उन्हें बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी जाने की आज्ञा देती हैं, इस शर्त के साथ कि राम के चरण हृदय में रहें।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में सबसे ज़्यादा सिखाने वाली चीज़ अँगूठी नहीं है, उसके बाद की देर है। तुलसी चाहते तो अँगूठी गिरते ही पहचान करा देते और काम आगे बढ़ा देते। उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने जानकी को तर्क करने दिया, मुँह फेरने दिया, प्रश्न पूछने दिया, और तब कहीं जाकर विश्वास आने दिया। किसी दुख में पड़े व्यक्ति के पास जब कोई सहारा पहुँचता है तो पहला भाव कृतज्ञता नहीं होता, अविश्वास होता है, और यह कमज़ोरी नहीं है। जिसे बहुत बार छला गया हो उसकी सतर्कता उसकी बची हुई पूँजी है। तुलसी उस सतर्कता का मज़ाक नहीं बनाते, उसे पूरा समय देते हैं।
दूसरी बात दूत के ढंग की है। हनुमान के पास ताक़त भी थी, प्रमाण भी था, और मौक़ा भी। इनमें से किसी ने काम नहीं किया। दोहा कहता है कि विश्वास प्रेम भरे वचनों से आया। और जब उन्हें अपनी देह दिखानी पड़ी तो उन्होंने दिखायी, पर उतनी देर के लिये जितनी देर संदेह रहा, और उसके तुरन्त बाद फिर छोटे हो गये। जो अपने बल को अपने काम भर उठाता है और काम होते ही रख देता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है। यही कारण है कि इस पूरे काण्ड में सबसे बड़ा काम सबसे छोटे रूप वाले से कराया गया।
और तीसरी बात उस संदेश की है जिसमें कोई वचन नहीं था। न तारीख़, न सेना का ब्योरा, न छुड़ा ले जाने का आश्वासन। सिर्फ़ यह कि मन जहाँ है वहीं रहता है और इस प्रेम का तत्व एक ही मन जानता है। जिस स्त्री ने कुछ घंटे पहले चिता माँगी थी, उसे जीने लायक़ इसी वाक्य ने बनाया। और जो आशीर्वाद उन्होंने बदले में दिया वह भी किसी छुटकारे का नहीं था, अजर और अमर होने का था। एक ने बिना कुछ वादा किये सब कुछ दे दिया, और दूसरे ने बिना कुछ माँगे सब कुछ ले लिया। सुन्दरकाण्ड इसी लेन देन पर खड़ा है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, सोरठा १२ तथा दोहा १३ से दोहा १७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।