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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 6
लंकादहन
पूँछ में बाँधी गयी आग, उनचास पवन, और जलते नगर में विभीषण का वह एक घर जिसे आग ने छुआ तक नहीं।
लंका की सभा में बात अब बहस से उतरकर दण्ड पर आ गयी है। बँधे हुए दूत ने जो कहना था, कह दिया है, और रावण ने सुनकर हँस दिया है। आगे जो होगा, वह तर्क से नहीं, अहंकार से तय होगा। रावण का छोटा भाई मन्त्रियों के साथ आकर सिर नवायेगा, सब उसकी बात को उत्तम कहेंगे। और रावण एक ऐसी सज़ा सुनायेगा जो उसे ख़ुद बहुत चतुर लगती है। उस सज़ा का नाम पूँछ है।
यहीं से लंकादहन का प्रसंग खुलता है। पर तुलसीदास के यहाँ यह आग का तमाशा नहीं है, न किसी वीर का पराक्रम, न किसी क्रोध की भड़ास। वह एक फल है, और तुलसी उसका बीज भी बता देते हैं: जिस नगर ने एक साधु की अवज्ञा की, वह उसी अवज्ञा में जला। और उसी आग के बीचोंबीच एक घर खड़ा रह गया, वह घर जहाँ इसी दूत का आदर हुआ था।
हँसती सभा, जलता नगर
- हनुमान: राम के दूत, जो बँधकर भी अपने काम में लगे हैं, और आग लगने पर सबसे पहले छोटे होते हैं।
- रावण: जो दो बार हँसता है, और दोनों बार अपने ही विनाश की तैयारी करता है।
- विभीषण: रावण का भाई, जो मन्त्रियों के साथ आकर कहता है कि दूत मारा नहीं जाता।
- लंका के नगरवासी: जो तमाशा देखने आते हैं, ठोकर मारते हैं, तालियाँ पीटते हैं, और फिर पुकारते हैं।
- सीता: जिनके सामने यह सारा काम करके हनुमान फिर हाथ जोड़कर आ खड़े होते हैं।
- शिव और पार्वती: जिनके बीच यह कथा कही जा रही है। बीच में शिव पार्वती से इस आग का रहस्य खोलते हैं।
जो हित की बात थी, और जो हँसी में उड़ गयी
तुलसी पहले लिखते हैं कि कही गयी बात कैसी थी, फिर उसका परिणाम। इस क्रम से दोष कहनेवाले पर नहीं आता।
हनुमान ने बहुत ही हित की बात कही थी, जिसमें भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति चारों घुले थे। फिर भी वह महा अभिमानी बहुत हँसकर बोला। जो सुनना नहीं चाहता, वह खण्डन नहीं करता, हँस देता है।
और उस व्यंग्य में सच अपने आप फिसल आया है: हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला! रावण इसे ताना समझकर कहता है, पर उस क्षण यह शब्द ठीक था। सामने खड़ा दूत सचमुच उसका गुरु ही था, और यही बात रावण ने हँसी में उड़ा दी।
फिर वह धमकी पर उतरता है: इस दुष्ट और अधम की मौत पास आ गयी है, जो उसे सीख देने चला है। हनुमान न स्वर ऊँचा करते हैं, न कोई नया दावा जोड़ते हैं, बस उसी वाक्य को सीधा कर देते हैं: इससे उलटा ही होगा। यानी मृत्यु रावण की पास आयी है।
फिर वे कहते हैं कि यह रावण का मतिभ्रम है, जिसे पोद्दार बुद्धि का फेर कहते हैं, और यह उन्होंने प्रत्यक्ष जान लिया है। दूत अनुमान से नहीं, लंका में जो अब तक देखा है उसी से बोल रहा है।
दूत मारा नहीं जाता
यह सुनकर रावण बहुत कुपित हुआ। उसका क्रोध एक प्रश्न जैसे आदेश में निकला: इस मूर्ख के प्राण जल्दी क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस मारने दौड़े।
और ठीक उसी समय मन्त्रियों के साथ विभीषण आ पहुँचे। तुलसी दोनों को एक साथ रखते हैं, दौड़ते राक्षस और आते विभीषण, जैसे एक ही साँस में विपत्ति और उसका उपाय आ गये हों।
विभीषण पहले सिर नवाते हैं और बहुत विनय करते हैं, तर्क बाद में आता है: दूत को मारना नहीं चाहिये, यह नीति के विरुद्ध है।
विभीषण छोड़ देने की बात नहीं करते। वे इतना ही कहते हैं: हे गोसाईं, कोई दूसरा दण्ड दे दिया जाय। वे भाई से उसी की भाषा में बात करते हैं, और उतना ही माँगते हैं जितना मिल सकता है। फिर सबने कहा: भाई, यह सलाह उत्तम है। पूरी सभा सहमत है, असहमत अकेला रावण है।
अंग भंग करके भेज दिया जाए
यह सुनकर रावण हँसकर बोला। यह दूसरी हँसी है। पहली उपदेश पर थी, यह अपनी चतुराई पर। उसने नीति मान ली, वध नहीं होगा, और दूसरा दण्ड यह होगा कि बंदर को अंग भंग करके लौटा दिया जाय।
इस निर्णय में एक बात और छिपी है। रावण दूत को लौटा रहा है। वह उसे बन्दी नहीं बनाता, ग़ायब नहीं करता। वह चाहता है कि यह लौटकर जाये, और जाकर दिखे।
तेल में डुबोकर, कपड़ा बाँधकर, फिर आग
अब वह सज़ा का ब्योरा देता है, और उसके स्वर में एक गुरु जैसा भाव आ जाता है, जैसे कोई गहरी बात समझा रहा हो।
मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता उसकी पूँछ पर होती है। रावण ने बंदरों के बारे में एक सिद्धान्त गढ़कर सभा के सामने रख दिया है: चोट वहाँ की जाय जहाँ मान बसता है।
तेल में कपड़ा डुबोया जाये, उसे पूँछ में बाँधा जाये, फिर आग लगा दी जाये। यह जल्दबाज़ी नहीं, पूरा आयोजन है, और आयोजन में समय, सामान और लोग लगते हैं। आगे यही तीनों इस आग की ओर बढ़ते जाते हैं।
रावण का अपना हिसाब
रावण आगे कहता है: बिना पूँछ का यह बंदर जब वहाँ जायेगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आयेगा। वह दण्ड इसलिये नहीं दे रहा कि दूत को दुख हो, इसलिये दे रहा है कि दूत का स्वामी यहाँ तक चला आये।
फिर वह अपनी मनचाही बात खोल देता है: जिनकी इसने इतनी बड़ाई की है, मैं ज़रा उनकी प्रभुता तो देखूँ। लंका का न्योता लंका ने ख़ुद भेजा है, और भेजनेवाला उसे दण्ड समझ रहा है।
और वह वानर मन ही मन मुसकराया
यह सुनते ही हनुमान मन में मुसकराये। जिसके शरीर पर सज़ा तय हो रही है, वह भीतर-भीतर हँस रहा है। बाहर हँसना चुनौती होती, भीतर हँसना पहचान है।
क्या पहचाना, यह वे ख़ुद कहते हैं: मैं जान गया, सरस्वती सहायक हुई हैं। पोद्दार इसे यों खोलते हैं कि रावण को यह बुद्धि देने में सरस्वती का हाथ है। यानी यह आदेश रावण की चतुराई नहीं, उसकी बुद्धि पर पड़ा पर्दा है, और दूत यही देखकर मुसकराया।
उधर रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही तैयारी करने लगे। तुलसी इसे रचना कहते हैं। वे बड़े मन से कुछ रच रहे हैं, और उसी रचना में उनका अपना नगर बँधा है।
नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं बचा
नगर में कपड़ा, घी और तेल कुछ नहीं बचा, क्योंकि हनुमान ने खेल किया और पूँछ बढ़ती गयी। जितना कपड़ा लपेटा जाता, पूँछ उतनी और लम्बी हो जाती। लंका अपना सारा भण्डार अपने ही हाथों उस पूँछ में उतारती गयी, और अभी एक चिनगारी भी नहीं जली थी।
फिर नगरवासी तमाशा देखने आ गये, और आकर उन्होंने हनुमान को पैरों से ठोकर मारी और उनकी बहुत हँसी उड़ायी।
यह किसी राजाज्ञा का पालन नहीं, नगर का अपना उत्साह है। बँधे हुए को ठोकर मारना और उस पर हँसना, यह वह हिस्सा है जो आदेश में किसी ने नहीं लिखा था। लंका ने अपनी ओर से जोड़ा। कुछ देर बाद तुलसी जब आग का कारण लिखेंगे, तो रावण के आदेश का नहीं, साधु की अवज्ञा का नाम लेंगे। यह ठोकर और हँसी भी उसी अवज्ञा में गिनी जायेगी।
ढोल, तालियाँ, और नगर की परिक्रमा
ढोल बज रहे हैं, सब तालियाँ पीट रहे हैं। यह अब उत्सव है, और किसी को ध्यान नहीं कि किस बात का। फिर उन्हें पूरे नगर में घुमाया गया, और तब पूँछ में आग लगा दी गयी।
क्रम पर ध्यान दीजिये: पहले नगर में घुमाया गया, फिर आग लगी। तुलसी इस फेरे का उद्देश्य नहीं बताते। इतना ही है कि ढोल और तालियों के बीच जिस नगर में उन्हें घुमाया गया, वही आगे जलेगा।
आग लगते ही, सबसे छोटा रूप
आग जलती देखकर हनुमान ने पहला काम न लड़ने का किया, न बढ़ने का। वे तुरन्त बहुत छोटे हो गये। रस्सियाँ एक नाप पर कसी थीं, नाप बदली तो उनके पास पकड़ने को कुछ नहीं बचा।
बन्धन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े, और उन्हें वहाँ देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ डर गयीं। आग अभी पूँछ में ही है, महलों तक नहीं पहुँची, पर डर नगर के भीतर पहुँच चुका है।
उनचास पवन
यहाँ पहली बात सबसे बड़ी है: भगवान की प्रेरणा से उस समय उनचासों पवन चलने लगे। तुलसी हवा का कारण हनुमान को नहीं बनाते। हवा उन्होंने बुलायी नहीं, भेजी गयी। पवन के पुत्र के लिये भी, जिनका जन्म इसी तत्व से जुड़ा है, यह हवा उनकी अपनी ओर से नहीं गिनी गयी।
और तब वे अट्टहास करके गरजे, और बढ़कर आकाश से जा लगे। पहले छोटे हुए थे, अब बड़े। दोनों बार नाप काम के अनुसार बदली। बन्धन से निकलना था तो सबसे छोटे, नगर जलाना था तो आकाश तक।
भारी देह और हलकी चाल
देह विशाल है, फिर भी बहुत हलका। इसी से आगे का दृश्य बनता है। वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते हैं। आग छत से छत तक चल रही है।
नगर जल रहा है, लोग बेहाल हैं, और करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं। तुलसी लपटों को सजाते नहीं, बस गिनती और स्वभाव देते हैं। आग फैल नहीं रही, झपट रही है, जैसे किसी के पीछे लगी हो।
हाय बप्पा, हाय मैया
यहाँ तुलसी मरनेवालों की गिनती नहीं देते, गिरते महलों का वर्णन नहीं करते। वे जलते नगर को आवाज़ दे देते हैं: हाय बप्पा, हाय मैया, यही पुकार चारों ओर सुनायी दे रही है। जो नगर कुछ देर पहले तालियाँ पीट रहा था, वह अब अपने माँ-बाप को पुकार रहा है।
इस घड़ी हमें कौन बचायेगा, यह प्रश्न उस नगर से उठ रहा है जिसके स्वामी की भौं देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े ताकते थे। और फिर नगर अपना ही पुराना फ़ैसला पलट देता है: हमने तो पहले ही कहा था कि यह बंदर नहीं, बंदर का रूप धरे कोई देवता है। जिस पर वे ठोकर मारकर हँसे थे, उसी के बारे में अब यह कह रहे हैं।
साधु की अवज्ञा का फल
अब वह बात आती है जिसके लिये यह सारा प्रसंग लिखा गया है। तुलसी आग का कारण बताते हैं, और उसमें न रावण का नाम है, न हनुमान का, न किसी अस्त्र का।
साधु की अवज्ञा का फल ऐसा ही होता है। इसे दण्ड नहीं, फल कहा गया है। दण्ड कोई देता है, फल अपने आप लगता है। और उपमा: नगर ऐसे जल रहा है जैसे किसी अनाथ का नगर हो। लंका का नाथ रावण था, पर उस क्षण वह कहीं नहीं था।
हनुमान ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। और फिर वह बात जिसमें इस आग का पूरा हिसाब है: एक विभीषण का घर नहीं जला।
यह बात आग के बारे में नहीं, न्याय के बारे में है। सारा नगर एक क्षण में जला, और उसी नगर में एक घर छूट गया। तुलसी यह नहीं बताते कि वह घर कैसे बचा, क्योंकि यह आग हवा के नियम से नहीं, किसी और नियम से चल रही है। जिस नगर ने ठोकर मारी थी वह जला, और जिस घर में इसी दूत का आदर हुआ था वह लपटों के बीच खड़ा रहा।

जिनकी बनायी हुई आग है, उन्हीं का दूत
अब वह प्रश्न बचता है जो हर सुननेवाला पूछेगा: जिसकी पूँछ में आग बँधी थी, वह ख़ुद क्यों नहीं जला? शिव पार्वती से इसका उत्तर देते हैं। उत्तर बल का नहीं, सम्बन्ध का है: जिन्होंने अग्नि को रचा, यह उन्हीं का दूत है, इसलिये अग्नि से नहीं जला।
हे पार्वती, इसी कारण वह नहीं जला। यहाँ हनुमान की कोई सामर्थ्य, कोई वरदान, कोई कवच नहीं गिनाया गया, केवल यह कहा गया कि वे किसके दूत हैं। आग उनके स्वामी की बनायी है, इसलिये उन्हें नहीं जलाती।
उन्होंने उलट-पलटकर सारी लंका जला दी, जिसे पोद्दार एक ओर से दूसरी ओर तक कहकर खोलते हैं। काम अधूरा नहीं छोड़ा गया, और उसमें क्रोध भी नहीं है। फिर वे समुद्र में कूद पड़े।
यह कूदना भागना नहीं है। नगर जल चुका, काम पूरा हुआ, और अब अपने ही शरीर पर बँधी आग को आगे नहीं ले जाना है।
पूँछ बुझाकर, हाथ जोड़कर
अब चार काम क्रम से होते हैं: पहले पूँछ बुझायी, फिर थकावट दूर की, फिर छोटा-सा रूप धरा, और तब सीता के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
जिसने अभी एक नगर जलाया है, वह उस नगर की आग अपने साथ उस जगह नहीं ले जाता जहाँ उसका असली काम है। आग पहले बुझती है, थकान पहले उतरती है, रूप पहले छोटा होता है, और फिर हाथ जुड़ते हैं।
बड़ा काम करके लौटा आदमी अक्सर थोड़ा बड़ा होकर लौटता है। यहाँ जो लौटा है, वह रूप में भी छोटा होकर लौटा है, और यह छोटापन तुलसी साफ़ लिख देते हैं।
कोई चिह्न दीजिये, माता
हे माता, मुझे कोई चिह्न दीजिये, जैसे राम ने मुझे दिया था। यह दूत की व्यावहारिक बात है, और कोमल भी। जो राम का दिया चिह्न लेकर आया था, वह खाली हाथ नहीं लौटेगा।
तब सीता ने चूड़ामणि उतारकर दी, और हनुमान ने उसे हर्ष से ले लिया। यह हर्ष वस्तु का नहीं, इस बात का है कि अब राम के सामने कहने को केवल वचन नहीं, प्रमाण भी है।
मेरा प्रणाम कहना, और विरद याद दिलाना
सन्देश की पहली बात प्रणाम है, माँग नहीं: हे तात, मेरा प्रणाम कहियेगा। फिर एक बारीक बात: प्रभु सब प्रकार से पूर्णकाम हैं, जिसे पोद्दार यों खोलते हैं कि उन्हें किसी प्रकार की कामना नहीं। सीता ख़ुद कह रही हैं कि जिनसे वे माँग रही हैं, उन्हें अपने लिये कुछ नहीं चाहिये।
तो माँगने का आधार क्या है? वह अगली बात में है: दीनों पर दया करना आपका विरद है, उस विरद को याद करके, हे नाथ, मेरा भारी संकट हर लीजिये। याचना अपने कष्ट के बल पर नहीं, राम के अपने नाम के बल पर है: आप वही रहिये जो आप कहलाते हैं।
जयन्त की कथा, और महीने भर की अवधि
हे तात, इन्द्र के पुत्र की वह घटना सुनाइयेगा, जिसे पोद्दार जयन्त की कथा बताते हैं, और उन्हें उनके बाण का प्रताप याद दिलाइयेगा। यह उलाहना नहीं, याद दिलाना है कि जो शक्ति एक अपराध पर उठी थी, वह अब तक कहाँ है।
और फिर वह वाक्य जिसके बाद समय ख़ुद एक पात्र बन जाता है: यदि महीने भर में नाथ न आये, तो मुझे जीती न पायेंगे। इसमें न आवेश है, न धमकी। यह एक हिसाब है, जो उन्होंने अपने ऊपर लगाया है।
प्राण किस विधि रखूँ
इन सब बातों में यह सबसे कठिन है: हे हनुमान, कहिये, मैं किस तरह प्राण रखूँ? हे तात, अब आप भी जाने की बात कह रहे हैं। जो अकेलापन थोड़ी देर के लिये थमा था, वह फिर बोल रहा है।
आपको देखकर छाती ठंडी हुई थी, और अब फिर मेरे लिये वही दिन और वही रात। हनुमान को देखकर जो बदला था, वह फिर पहले जैसा हो जायेगा। इस प्रसंग में आग से बड़ा ताप यही बात है।
धीरज देकर, चरणों में सिर नवाकर
हनुमान ने सीता को समझाकर बहुत प्रकार से धीरज दिया। क्या कहा, यह तुलसी नहीं लिखते, केवल इतना कि बहुत प्रकार से कहा। जिसे सान्त्वना देनी आती है, वह जानता है कि एक वाक्य से काम नहीं चलता।
और विदा के समय भी वही विनय: उनके चरणों में सिर नवाकर हनुमान राम के पास चल दिये। जो लंका जलाकर आया था, वह यहाँ से सिर झुकाकर निकलता है। आते समय जुड़े हाथ, जाते समय झुका सिर, और इन दोनों के बीच चूड़ामणि, सन्देश और धीरज।
बड़े काम के बाद का ढंग
ऊपर से यह भव्य दृश्य लगता है: जलती लंका, आकाश तक बढ़ा शरीर, उनचास पवन। पर तुलसी इसे एक बार भी दृश्य की तरह नहीं लिखते। वे आग का कारण लिखते हैं, उसकी सीमा, और उसके बुझने का समय। कारण एक अवज्ञा है, सीमा एक घर है, और समय वह क्षण जब काम पूरा हुआ।
दूसरी बात उस घर की है जो नहीं जला। वह उसी नगर में था जो एक क्षण में सारा जल गया, फिर भी बचा, क्योंकि यह आग हवा के नियम से नहीं चल रही थी। तुलसी कारण नहीं बताते। पोद्दार की टीका इतना कहती है कि हनुमान ने वह घर नहीं जलाया। और पढ़नेवाले को याद आता है कि सभा में जब राक्षस मारने दौड़े थे, तब इसी घर के स्वामी ने सिर नवाकर कहा था कि दूत मारा नहीं जाता।
तीसरी बात वह है जो हम अपने साथ ले जा सकते हैं। काम पूरा होते ही हनुमान ने पूँछ बुझायी, थकान उतारी, रूप छोटा किया, और तब उस जगह गये जहाँ उनका असली काम था। अपनी उपलब्धि को वे साथ भीतर नहीं ले गये। हममें से ज़्यादातर इसका उलटा करते हैं, और उसी भार से वह काम बिगाड़ देते हैं जिसके लिये आये थे। सुन्दरकाण्ड का यह हिस्सा बड़े काम की क़ीमत नहीं, बड़े काम के बाद का ढंग बताता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा तेईस के आगे की चौपाइयों से दोहा सत्ताईस तक, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।