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लंकादहन

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · लंकादहन

लंकादहन

पूँछ में बाँधी गयी आग, उनचास पवन, और उसी जलते हुए नगर के बीच खड़ा वह एक घर जिसे आग ने छुआ तक नहीं।

लंका की सभा में बात अब बहस से उतरकर दण्ड पर आ गयी है। जो बँधा हुआ दूत बीच में खड़ा है, उसने अभी अभी वह सब कह दिया है जो कहने योग्य था, और सिंहासन पर बैठे हुए ने वह सब सुनकर हँस दिया है। अब जो होगा वह तर्क से नहीं, अहंकार से तय होगा। मन्त्री बोलेंगे, छोटा भाई हाथ जोड़कर बीच में आयेगा, और लंकापति एक ऐसी सज़ा सुनायेगा जो उसे स्वयं बहुत चतुर लगती है। उस सज़ा का नाम पूँछ है।

यहीं से वह प्रसंग खुलता है जिसे सारा देश लंकादहन कहकर याद रखता है। पर गोस्वामी तुलसीदास जी के यहाँ यह आग का तमाशा नहीं है। उनके इन चौपाइयों में आग न किसी वीर का पराक्रम है, न किसी क्रोध की भड़ास। वह एक फल है, और तुलसी ने उस फल का बीज खोलकर नाम भी लिख दिया है। जिस नगर ने एक साधु की अवज्ञा की, वह नगर उसी अवज्ञा में जला। और जिस घर ने उस साधु के सामने सिर नवाया था, वह घर उसी आग के बीचोंबीच खड़ा रह गया। यही इस पूरे प्रसंग का हिसाब है, और तुलसी ने इसे एक पंक्ति में चुका दिया है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • हनुमान: पवनसुत, राम के दूत। जो बँधकर भी अपने काम में हैं, और आग लगने पर सबसे पहले छोटे होते हैं।
  • रावण: लंकेश, दसकंधर, दसमुख। जो दो बार हँसता है, और दोनों बार अपने ही विनाश की तैयारी करता है।
  • विभीषण: रावण का भाई, जो मन्त्रियों के साथ आकर कहता है कि दूत मारा नहीं जाता।
  • लंका के नगरवासी: जो तमाशा देखने आते हैं, ठोकर मारते हैं, तालियाँ पीटते हैं, और फिर पुकारते हैं।
  • जानकी: सीता, जिनके सामने यह सारा काम करके वह दूत फिर हाथ जोड़कर आ खड़ा होता है।
  • शिव और पार्वती: वह ढाँचा जिसमें यह कथा कही जा रही है। एक चौपाई में शिवजी पार्वती को सम्बोधित करके इस आग का रहस्य खोलते हैं।

जो हित की बात थी, और जो हँसी में उड़ गयी

जो कहा गया था, तुलसी पहले उसकी गुणवत्ता लिखते हैं, फिर उसका परिणाम। यह क्रम महत्त्व का है, क्योंकि इससे दोष वक्ता के ऊपर से हट जाता है।

जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥

चौपाई १ और २

जदपि कही कपि अति हित बानी, यद्यपि हनुमान ने बहुत ही हित की वाणी कही। और वह वाणी किस किस चीज़ में सनी हुई थी, यह भी गिना दिया गया है: भगति बिबेक बिरति नय सानी। भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति, चारों एक ही बात में घुले हुए। ऐसी वाणी के बाद भी उत्तर क्या आया, यह अगली आधी पंक्ति में है: बोला बिहसि महा अभिमानी। वह बहुत हँसकर बोला। हँसी यहाँ सबसे भारी शब्द है, क्योंकि जो सुनना नहीं चाहता वह खण्डन नहीं करता, वह हँस देता है।

और फिर वह व्यंग्य जिसमें सत्य अपने आप फिसल आया है: मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी। हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला। रावण इसे ताना समझकर कह रहा है, पर जो शब्द उसने चुना वह ठीक वही है जो उस क्षण के लिये सही था। सामने खड़ा हुआ प्राणी उस समय वास्तव में उसका गुरु ही था, और वही एक बात थी जिसे लंकापति ने हँसी में उड़ा दिया।

अब वह धमकी पर उतरता है: मृत्यु निकट आई खल तोही। और उत्तर में हनुमान ने न स्वर ऊँचा किया, न कोई नया दावा जोड़ा। उन्होंने वही वाक्य उठाकर सीधा कर दिया: उलटा होइहि कह हनुमाना। इससे उलटा ही होगा। दो शब्दों में पूरा वाक्य पलट गया है, और उसमें अपना कोई बड़प्पन नहीं जोड़ा गया।

फिर वे एक शब्द देते हैं जिसे पोद्दारजी बुद्धि का फेर कहकर खोलते हैं: मतिभ्रम तोर। और उसके साथ जुड़ा हुआ आधा चरण ही इस पूरे प्रसंग को समझा देता है, प्रगट मैं जाना, यह मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है। दूत किसी भविष्यवाणी के आधार पर नहीं बोल रहा। वह जो सामने देख रहा है, वही कह रहा है। लंका के भीतर जो कुछ उसने इन घंटों में देखा है, उसके बाद उसे अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

दूत मारा नहीं जाता

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥

चौपाई ३ और ४

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना, वानर के वचन सुनकर वह बहुत कुपित हो गया। पोद्दारजी खिसिआना को कुपित होना कहते हैं, और इस क्रोध का पहला रूप एक आदेश है जो प्रश्न के ढंग से निकलता है: बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना। इस मूर्ख के प्राण शीघ्र क्यों नहीं हर लेते। सभा के सामने वध का आदेश दे दिया गया है, और अगली ही आधी पंक्ति में वह आदेश दौड़ने लगता है: सुनत निसाचर मारन धाए

और ठीक उसी क्षण, उसी पंक्ति के दूसरे आधे भाग में, एक और दरवाज़ा खुलता है: सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए। मन्त्रियों के साथ विभीषण आ पहुँचे। तुलसी ने दोनों को एक ही चरण में रख दिया है, दौड़ते हुए राक्षस और आते हुए विभीषण, जैसे एक ही साँस में विपत्ति और उसका उपाय दोनों आ गये हों।

विभीषण की मुद्रा पहले लिखी गयी है, तर्क बाद में: नाइ सीस करि बिनय बहूता। सिर नवाकर और बहुत विनय करके। इस घर में बड़े भाई से बात करने का यही एक ढंग बचा है। और फिर वह वाक्य जो राजनीति की सबसे पुरानी मर्यादाओं में से एक है: नीति बिरोध न मारिअ दूता। दूत को मारना नहीं चाहिये, यह नीति के विरुद्ध है।

ध्यान देने की बात यह है कि विभीषण छोड़ देने की बात नहीं कर रहे। वे इतना ही कहते हैं, आन दंड कछु करिअ गोसाँई, हे गोसाईं, कोई दूसरा दण्ड दे दिया जाय। वे भाई से उसकी भाषा में बात कर रहे हैं, और उतना ही माँग रहे हैं जितना मिल सकता है। और तब एक छोटा सा वाक्य आता है जो बताता है कि सभा में अकेले विभीषण ही ऐसा नहीं सोचते थे: सबहीं कहा मंत्र भल भाई। सबने कहा कि भाई, यह सलाह उत्तम है। पूरी सभा सहमत है। असहमत केवल सिंहासन है।

अंग भंग करके भेज दो

सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

चौपाई ५

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। यह दूसरी हँसी है। पहली हँसी उपदेश पर थी, यह हँसी अपनी ही चतुराई पर है। रावण ने नीति की बात मान ली है और नीति को तोड़ भी दिया है। वध नहीं होगा, यह अक्षर का पालन है। अंग भंग करि पठइअ बंदर, बंदर को अंग भंग करके लौटा दिया जाय, यह अर्थ की हत्या है। जिसे मारा नहीं जाना चाहिये उसे विकलांग करके भेजना मर्यादा नहीं, मर्यादा का उपहास है।

और इस निर्णय में एक और बात छिपी है। रावण दूत को लौटा रहा है। वह उसे बन्दी नहीं बनाता, समुद्र में नहीं डलवाता, गायब नहीं करता। वह चाहता है कि यह लौटकर जाय, और जाकर दिखे। सज़ा का असली पता यहीं से चलता है कि वह किसे दिखाने के लिये दी जा रही है।

सार: भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति से सनी हुई बात रावण ने हँसकर टाल दी और वध का आदेश दे दिया। विभीषण मन्त्रियों सहित आकर कहते हैं कि दूत को मारना नीति के विरुद्ध है, कोई दूसरा दण्ड दीजिये, और पूरी सभा उनसे सहमत हो जाती है। रावण हँसकर बीच का रास्ता निकालता है, अंग भंग करके लौटा दो, और यहीं से वह सज़ा तय होती है जो नगर पर लौटकर गिरेगी।

तेल में डुबोकर, कपड़ा बाँधकर, फिर आग

अब वह सज़ा का ब्योरा देता है, और ब्योरा देते समय उसके स्वर में एक गुरु का सा भाव आ जाता है, जैसे वह कोई गहरी बात खोलकर समझा रहा हो।

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४॥

दोहा २४

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता उसकी पूँछ पर होती है। लंकापति ने वानर जाति का एक सिद्धान्त गढ़ लिया है और उसे सभा के सामने रख रहा है। उसका हिसाब सीधा है, चोट वहीं की जाय जहाँ मान बसता है। देह नहीं, मान। और फिर तीन क्रियाएँ, एक के बाद एक: तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ

तेल में कपड़ा डुबोओ, फिर उसे पूँछ में बाँधो, फिर आग लगा दो। इस क्रम में कोई जल्दबाज़ी नहीं है। यह गुस्से में उठाया गया कदम नहीं, आयोजन है। और आयोजन में समय लगता है, सामान लगता है, और लोग लगते हैं। अगली कुछ चौपाइयों में वही समय, वही सामान और वही लोग, तीनों इस आग की ओर बढ़ते चले जाते हैं।

रावण का अपना हिसाब

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि, बिना पूँछ का यह बंदर जब वहाँ जायगा, तब सठ निज नाथहि लइ आइहि, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आयेगा। यह वाक्य ध्यान से पढ़ने योग्य है। रावण दण्ड इसलिये नहीं दे रहा कि वह दूत को दुख देना चाहता है। वह दण्ड इसलिये दे रहा है कि दूत का स्वामी यहाँ तक चला आये।

अगली आधी पंक्ति में वह अपनी मनचाही बात खोल देता है, देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई, मैं ज़रा उनकी प्रभुता तो देखूँ। जिनकी बड़ाई यह वानर करके गया है, उनका सामर्थ्य देखने की इच्छा। सारा विनाश इसी एक इच्छा से निकलता है, और यह इच्छा किसी शत्रु ने उसके मन में नहीं डाली। लंका का न्यौता लंका ने भेजा है, और भेजने वाले ने उसे दण्ड समझकर भेजा है।

और वह वानर मन ही मन मुसकराया

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥

चौपाई २

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। यह वचन सुनते ही हनुमान मन में मुसकराये। यह सारे प्रसंग की सबसे मीठी आधी पंक्ति है। जिसके शरीर पर सज़ा तय हो रही है वह हँस रहा है, और भीतर हँस रहा है, बाहर नहीं। बाहर हँसना चुनौती होती, भीतर हँसना पहचान है।

और उन्होंने पहचाना क्या, यह उन्होंने स्वयं कह दिया है: भइ सहाय सारद मैं जाना। मैं जान गया, सरस्वती सहायक हुई हैं। पोद्दारजी इसे ऐसे खोलते हैं कि रावण को यह बुद्धि देने में सरस्वती की सहायता रही। अर्थात् जो आदेश अभी दिया गया है वह रावण की चतुराई नहीं, उसकी बुद्धि पर पड़ा हुआ पर्दा है। दूत हँसा इसलिये नहीं कि उसे कष्ट नहीं होगा। वह इसलिये हँसा कि उसने देख लिया कि यह आदेश किसकी लिखावट में लिखा गया है।

और उधर आदेश पर अमल शुरू हो गया है: जातुधान सुनि रावन बचना, लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही तैयारी करने लगे। तुलसी ने रचना शब्द रखा है। वे कोई रचना कर रहे हैं, बहुत मन लगाकर, और उसी रचना में उनका अपना नगर बँधा हुआ है।

सार: रावण ने पूँछ में तेल में डूबा कपड़ा बाँधकर आग लगाने का आदेश दिया, और कारण यह बताया कि बिना पूँछ का यह वानर अपने स्वामी को यहाँ ले आयेगा और तब वह उनकी प्रभुता देखेगा। हनुमान यह सुनकर मन ही मन मुसकराये, क्योंकि उन्होंने जान लिया कि यह बुद्धि रावण की अपनी नहीं है। राक्षस तैयारी में लग गये।

नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं बचा

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥

चौपाई ३

रहा न नगर बसन घृत तेला। नगर में कपड़ा, घी और तेल कुछ नहीं रह गया। और क्यों नहीं रह गया, इसका उत्तर उसी पंक्ति में है: बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला। पूँछ बढ़ती गयी, और तुलसी ने इसे खेल कहा है। हनुमान ने खेल किया। जितना कपड़ा लपेटा जाता है उतनी पूँछ और लम्बी, जितना तेल उँड़ेला जाता है उतनी और लम्बी। लंका अपना सारा भण्डार अपने ही हाथों उस पूँछ में उतारती चली जाती है, और अभी तक एक चिनगारी भी नहीं जली है।

फिर तुलसी नगर को दृश्य में ले आते हैं: कौतुक कहँ आए पुरबासी। तमाशा देखने के लिये नगरवासी आ गये। और आकर उन्होंने क्या किया, यह वह आधी पंक्ति है जिसे आगे की आग समझने के लिये याद रखना पड़ता है: मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी। वे पैर से ठोकर मारते हैं और बहुत हँसी करते हैं।

यह किसी सेनापति का काम नहीं है, न किसी राजाज्ञा का पालन। यह नगर का अपना उत्साह है। बँधे हुए एक प्राणी को ठोकर मारना और उस पर हँसना, यह सज़ा में जोड़ा गया वह हिस्सा है जो किसी ने आदेश में नहीं लिखा था। लंका ने इसे अपनी ओर से जोड़ा। और जब कुछ देर बाद तुलसी आग का कारण लिखेंगे, तो वे रावण के आदेश का नाम नहीं लेंगे। वे इसी दृश्य का नाम लेंगे।

ढोल, तालियाँ, और नगर की परिक्रमा

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। ढोल बज रहे हैं, सब लोग तालियाँ पीट रहे हैं। यह अब उत्सव है। किसी को यह ध्यान नहीं है कि उत्सव किस बात का है। और फिर वह पंक्ति जिसमें आग लगने से पहले का अन्तिम काम है: नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी। नगर में फिराकर, फिर पूँछ जला दी।

इस क्रम पर रुकिये। पहले नगर में घुमाया गया, फिर आग लगायी गयी। घुमाने का उद्देश्य यह था कि हर गली उसे देख ले। पर इसका दूसरा परिणाम वह था जिसे किसी ने नहीं सोचा। जो बँधा हुआ प्राणी इस समय हर गली, हर चौराहा और हर मुहल्ला अपनी आँखों से देखता हुआ चल रहा है, वह इस समय लंका का नक्शा पढ़ रहा है। रावण ने उसे बाँधकर वह सब दिखा दिया जो एक दूत बिना बँधे कभी न देख पाता।

सार: पूँछ लपेटने में नगर का सारा कपड़ा, घी और तेल चुक गया, क्योंकि हनुमान पूँछ बढ़ाते चले गये। नगरवासी तमाशा देखने आये, ठोकर मारी और हँसे। ढोल और तालियों के बीच उन्हें पूरे नगर में घुमाया गया, और तब पूँछ में आग लगायी गयी।

आग लगते ही, सबसे छोटा रूप

पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भईं सभीत निसाचर नारीं॥

चौपाई ४ और ५

पावक जरत देखि हनुमंता, आग को जलते हुए देखकर हनुमान ने जो पहला काम किया वह लड़ना नहीं था, बढ़ना भी नहीं था: भयउ परम लघुरूप तुरंता। वे तुरंत बहुत छोटे रूप में हो गये। बाँधने वाले ने रस्सियाँ एक नाप पर कसी थीं। नाप बदल गयी तो रस्सियों के पास पकड़ने को कुछ बचा ही नहीं।

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं, बन्धन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर चढ़ गये। और वहाँ से जो दिखा वह तुलसी ने एक ही आधी पंक्ति में बता दिया है: भईं सभीत निसाचर नारीं। राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं। अभी तक आग केवल पूँछ में है, महलों तक नहीं पहुँची। पर नगर के भीतर डर पहुँच चुका है, और सबसे पहले वहाँ पहुँचा है जहाँ तमाशा देखने वाली भीड़ नहीं थी।

उनचास पवन

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ २५॥

दोहा २५

इस दोहे का पहला शब्द ही सबसे बड़ा है: हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। भगवान की प्रेरणा से उस समय उनचासों पवन चलने लगे। तुलसी यहाँ हवा का कारण हनुमान को नहीं बनाते। उन्होंने हवा नहीं बुलायी, हवा भेजी गयी। पवनपुत्र के लिये इससे अधिक संयम का वर्णन सम्भव नहीं था, कि जिस तत्त्व से उनका अपना जन्म जुड़ा है, उसे भी इस काम में अपनी ओर से नहीं गिना गया।

और तब वह होता है जो अब तक रोका हुआ था: अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास। अट्टहास करके गरजे, और बढ़कर आकाश से जा लगे। पहले छोटे हुए थे, अब बड़े हुए। दोनों बार नाप काम के अनुसार बदली गयी है। बन्धन से निकलना था तो सबसे छोटे, नगर की छतों तक पहुँचना था तो आकाश तक।

भारी देह और हलकी चाल

देह बिसाल परम हरुआई । मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥

चौपाई १

देह बिसाल परम हरुआई। देह विशाल है और फिर भी बहुत हलकी है। यह विरोध तुलसी ने जान बूझकर एक ही चरण में रखा है, क्योंकि आगे का सारा दृश्य इसी पर टिका है: मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई, वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते हैं। आग नीचे से ऊपर नहीं चढ़ रही, ऊपर से ऊपर चल रही है। छत से छत तक।

जरइ नगर भा लोग बिहाला, नगर जल रहा है और लोग बेहाल हो गये हैं। और फिर लपटों का वह वर्णन जिसमें तुलसी ने कोई सजावट नहीं की, केवल गिनती और स्वभाव दिया है: झपट लपट बहु कोटि कराला। करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं। झपटना शब्द पर ध्यान दीजिये। आग यहाँ फैल नहीं रही, झपट रही है, जैसे किसी चीज़ के पीछे लगी हो।

सार: आग लगते ही हनुमान सबसे छोटे रूप में हो गये, बन्धन से निकलकर सोने की अटारियों पर चढ़ गये, और राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं। उसी समय भगवान की प्रेरणा से उनचास पवन चले। तब हनुमान गरजकर आकाश तक बढ़े, और विशाल देह लेकर भी हलकी चाल से एक महल से दूसरे महल तक दौड़ते रहे।

हाय बप्पा, हाय मैया

तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरें सुर कोई॥

चौपाई २

यहाँ तुलसी ने एक काम किया है जो इस प्रसंग को तमाशे से बचा लेता है। वे मरने वालों की गिनती नहीं देते, गिरते हुए महलों का वर्णन नहीं करते। वे जलते हुए नगर को आवाज़ दे देते हैं: तात मातु हा सुनिअ पुकारा। हाय बप्पा, हाय मैया, यही पुकार चारों ओर सुनायी पड़ रही है। जो नगर कुछ देर पहले तालियाँ पीट रहा था, वह अब अपने माँ बाप को पुकार रहा है।

एहिं अवसर को हमहि उबारा, इस अवसर पर हमें कौन बचायेगा। यह प्रश्न उस नगर से उठ रहा है जिसके पास त्रिलोक का सबसे बलवान स्वामी था। और अगली पंक्ति में वह नगर अपना ही पुराना निर्णय पलट देता है: हम जो कहा यह कपि नहिं होई। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानर का रूप धरे कोई देवता है। जिस बात पर वे ठोकर मारकर हँसे थे, उसी को अब वे स्वयं कह रहे हैं।

साधु अवग्या कर फलु ऐसा

और अब वह पंक्ति आती है जिसके लिये यह सारा प्रसंग लिखा गया है। तुलसी इस आग का कारण बताते हैं, और कारण में न रावण का नाम है, न हनुमान का, न किसी अस्त्र का।

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं । एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥

चौपाई ३

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। साधु की अवज्ञा का फल ऐसा होता है। इसे दण्ड नहीं कहा गया, फल कहा गया है। दण्ड कोई देता है, फल अपने आप लगता है। और उपमा देखिये: जरइ नगर अनाथ कर जैसा, नगर ऐसे जल रहा है जैसे किसी अनाथ का नगर हो। लंका अनाथ नहीं थी। उसका नाथ उसी समय अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था। पर जिस नगर ने एक साधु की अवज्ञा की, उस नगर के लिये उसका नाथ उस क्षण कहीं नहीं था।

जारा नगरु निमिष एक माहीं, सारा नगर एक ही क्षण में जला डाला। और फिर वह आधा चरण जिस पर यह पूरी आग अपना हिसाब खोलकर रख देती है: एक बिभीषन कर गृह नाहीं। एक विभीषण का घर नहीं जला।

यह पंक्ति आग के बारे में नहीं, न्याय के बारे में है। एक ही ज्वाला उठी है, एक ही हवा चल रही है, और महल सटे हुए हैं। भौतिक रूप से यह असम्भव है कि बीच का एक घर बचा रह जाय। तुलसी को यह असम्भवता खटकती नहीं, क्योंकि उनके यहाँ यह आग हवा के नियम से नहीं, किसी और नियम से चल रही है। जिस नगर ने ठोकर मारी थी वह जला, और जिस घर ने सिर नवाया था वह उसी लपट के बीच खड़ा रहा। आग यहाँ फैलने वाली वस्तु नहीं है, वह उत्तर देने वाली वस्तु है।

जिनकी बनायी हुई आग है, उन्हीं का दूत

अब एक प्रश्न बचता है जिसे कोई भी सुनने वाला पूछेगा। जिसकी पूँछ में आग बँधी है, वह स्वयं क्यों नहीं जला। शिवजी पार्वती को सम्बोधित करके इसका उत्तर देते हैं, और उत्तर बल का नहीं, सम्बन्ध का है। जिन्होंने अग्नि को रचा, यह उन्हीं का दूत है, इसी कारण यह अग्नि से नहीं जला।

जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

चौपाई ४

जरा न सो तेहि कारन गिरिजा। हे पार्वती, इसी कारण वह नहीं जला। इस आधी पंक्ति में हनुमान की कोई सामर्थ्य नहीं गिनायी गयी, कोई वरदान नहीं याद दिलाया गया, कोई कवच नहीं बताया गया। केवल यह कहा गया कि वे किसके दूत हैं। आग उन्हें जलाती नहीं, क्योंकि आग उनके स्वामी की बनायी हुई है। सेवक की रक्षा यहाँ उसके अपने गुण से नहीं, उसके पद से हो रही है।

उलटि पलटि लंका सब जारी, उलट पलटकर सारी लंका जला दी। पोद्दारजी इसे एक ओर से दूसरी ओर तक कहकर खोलते हैं। यह काम अधूरा नहीं छोड़ा गया, और साथ ही इसमें कोई क्रोध भी नहीं है। और फिर वह पंक्ति जो इस पूरे दहन को अचानक बन्द कर देती है: कूदि परा पुनि सिंधु मझारी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े।

जो कूदना हुआ है वह भागना नहीं है। नगर जल चुका है, काम पूरा हो चुका है, और अब उस आग को लेकर आगे नहीं बढ़ना है जो अपने ही शरीर पर बँधी है। समुद्र यहाँ शरण नहीं, एक साधन है।

सार: जलते हुए नगर से हाय बप्पा और हाय मैया की पुकार उठी, और नगर ने स्वयं मान लिया कि यह वानर नहीं, वानर रूप में कोई देवता है। तुलसी आग का कारण साधु की अवज्ञा बताते हैं। सारा नगर एक क्षण में जला, केवल विभीषण का घर नहीं जला। और हनुमान इसलिये नहीं जले कि वे अग्नि के रचयिता के ही दूत हैं। उलट पलटकर सारी लंका जलाकर वे समुद्र में कूद पड़े।

पूँछ बुझाकर, हाथ जोड़कर

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ २६॥

दोहा २६

इस दोहे में चार काम हैं और चारों क्रम से हैं। पूँछ बुझाइ, पहले पूँछ बुझायी। खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि, फिर थकावट दूर की और छोटा सा रूप धारण किया। और तब: जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि, जानकी जी के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

जिस व्यक्ति ने अभी अभी एक नगर जलाया है, वह उस नगर की आग अपने साथ उस स्थान तक नहीं ले जाता जहाँ उसका असली काम है। आग पहले बुझायी जाती है। थकान पहले उतारी जाती है। रूप पहले छोटा किया जाता है। और फिर हाथ जोड़े जाते हैं। यह क्रम किसी ने सिखाया नहीं है, यह सेवक का अपना ढंग है।

और जिस मुद्रा में वे खड़े हुए हैं, उस पर ठहरकर देखिये। हाथ जुड़े हुए हैं। जिसने अभी अभी एक नगर जलाया है, वह उस नगर से लौटकर हाथ जोड़े खड़ा है। बड़ा काम करके लौटा हुआ आदमी प्रायः थोड़ा बड़ा होकर लौटता है। यहाँ जो लौटा है वह अपने रूप में भी छोटा होकर लौटा है, और यह छोटापन तुलसी ने अक्षरों में लिख दिया है।

कोई चिह्न दीजिये, माता

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

चौपाई १

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा, हे माता, मुझे कोई चिह्न दीजिये, जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा, जैसा रघुनाथजी ने मुझे दिया था। यह एक दूत की सबसे व्यावहारिक बात है और साथ ही सबसे कोमल भी। जो प्रभु का दिया हुआ चिह्न लेकर आया था, वह खाली हाथ नहीं लौटेगा। सन्देश का दोनों ओर से एक ही ढंग रहेगा।

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ, तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हरष समेत पवनसुत लयऊ, हनुमान ने उसे हर्षपूर्वक ले लिया। तुलसी ने यहाँ हर्ष शब्द रखा है, और वह हर्ष उस वस्तु का नहीं है। वह इस बात का है कि अब प्रभु के सामने जाकर कहने को केवल वचन नहीं, प्रमाण भी है।

मेरा प्रणाम कहना, और विरद याद दिलाना

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी॥

चौपाई २

सन्देश की पहली बात प्रणाम है, माँग नहीं: कहेहु तात अस मोर प्रनामा। और उसके बाद जो कहा गया है, उसमें एक बहुत बारीक बात है: सब प्रकार प्रभु पूरनकामा, प्रभु सब प्रकार से पूर्णकाम हैं। पोद्दारजी इसे ऐसे खोलते हैं कि उन्हें किसी प्रकार की कामना नहीं है। सन्देश भेजने वाली स्वयं कह रही हैं कि जिनसे वे कुछ माँग रही हैं, उन्हें अपने लिये कुछ नहीं चाहिये।

तो फिर माँगने का आधार क्या है। वह आधार अगली पंक्ति में है: दीन दयाल बिरिदु संभारी। दीनों पर दया करना आपका विरद है, उस विरद को याद करके, हे नाथ, मेरा भारी संकट हर लीजिये। यह याचना अपने कष्ट के बल पर नहीं की जा रही, उनके अपने नाम के बल पर की जा रही है। जो कुछ माँगा जा रहा है वह यह है कि आप वही रहिये जो आप कहलाते हैं।

जयन्त की कथा, और महीने भर की अवधि

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

चौपाई ३

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। इन्द्रपुत्र की वह घटना सुनाना, जिसे पोद्दारजी जयन्त की कथा कहकर पहचानते हैं। और उसके साथ यह भी: बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु, प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझा देना। यह उलाहना नहीं है। यह एक स्त्री का अपने स्वामी को यह याद दिलाना है कि जो शक्ति एक अपराध के लिये उठी थी, वह अब तक कहाँ है।

और फिर वह वाक्य जिसके बाद इस प्रसंग में समय एक पात्र बन जाता है: मास दिवस महुँ नाथु न आवा। यदि महीने भर में नाथ न आये, तो फिर मुझे जीती न पायेंगे। यहाँ कोई आवेश नहीं है, कोई धमकी नहीं। यह एक हिसाब है, और वह हिसाब उन्होंने अपने ऊपर लगाया है। उस पूरे लंका काण्ड की जल्दी इसी एक पंक्ति से निकलती है।

प्राण किस विधि रखूँ

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

चौपाई ४

यह चारों पंक्तियों में सबसे कठिन है, क्योंकि इसमें वह अकेलापन बोल रहा है जिसे अभी अभी थोड़ी देर के लिये विश्राम मिला था। कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना, हे हनुमान, कहिये, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ। प्रश्न उस व्यक्ति से पूछा जा रहा है जो उत्तर नहीं दे सकता, और यही इस प्रश्न की पीड़ा है।

तोहि देखि सीतलि भइ छाती, आपको देखकर छाती ठंडी हुई थी। और फिर वही एक पंक्ति जिसमें आने वाले दिनों का सारा भार रख दिया गया है: पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती। फिर मेरे लिये वही दिन और वही रात। कुछ घंटों के लिये जो बदला था, वह फिर लौट आयेगा। इस पूरे प्रसंग में आग से बड़ा ताप यही पंक्ति है।

सार: हनुमान ने पूँछ बुझाकर, थकावट उतारकर और छोटा रूप धरकर जानकी जी के सामने हाथ जोड़े। उन्होंने पहचान के लिये कोई चिह्न माँगा और सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। सन्देश में प्रणाम, दीनदयाल के विरद की याद, इन्द्रपुत्र की घटना, और एक महीने की अवधि है, और अन्त में वह प्रश्न कि अब प्राण किस प्रकार रखूँ।

धीरज देकर, चरणों में सिर नवाकर

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७॥

दोहा २७

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह, जानकी जी को समझाकर बहुत प्रकार से धीरज दिया। तुलसी ने यह नहीं लिखा कि क्या कहा। उन्होंने केवल यह लिखा कि बहुत प्रकार से कहा। जिसे सान्त्वना देनी आती है वह जानता है कि एक ही वाक्य से काम नहीं चलता।

और फिर वही मुद्रा, अन्त में भी: चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह। चरणकमलों में सिर नवाकर हनुमान ने श्रीरामजी के पास गमन किया। जो लंका जलाकर आया था, वह यहाँ से सिर नवाकर निकलता है। इस पूरे प्रसंग का पहला और अन्तिम चित्र एक ही है, जुड़े हुए हाथ और झुका हुआ सिर, और बीच में जो कुछ हुआ उसे तुलसी ने इन्हीं दो के बीच में रख दिया है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को पढ़ते समय सबसे बड़ा प्रलोभन यह होता है कि इसे एक भव्य दृश्य की तरह पढ़ा जाय। जलती हुई लंका, आकाश तक बढ़ा हुआ शरीर, उनचास पवन। पर तुलसी ने इसे एक बार भी दृश्य की तरह नहीं लिखा। उन्होंने आग का कारण लिखा, आग की सीमा लिखी, और आग के बुझाये जाने का समय लिखा। कारण एक अवज्ञा है, सीमा एक घर है, और समय वह क्षण है जब काम समाप्त हुआ। इन तीनों में कहीं कोई प्रदर्शन नहीं है।

दूसरी बात उस घर की है जो नहीं जला। यदि इस आग का कोई और कारण होता, तो वह घर भी जलता, क्योंकि वह उसी गली में था और उसी हवा में था। वह इसलिये बचा कि यह आग हवा के नियम से नहीं चल रही थी। सभा में जब सब मौन थे, तब एक व्यक्ति ने सिर नवाकर कहा था कि दूत मारा नहीं जाता। उस वाक्य का उत्तर उसी रात मिल गया, और वह उत्तर किसी ने घोषित नहीं किया। नगर की छतों पर लिख दिया गया।

और तीसरी बात वह है जो हम अपने साथ ले जा सकते हैं। जिस व्यक्ति ने वह सब किया, उसने काम समाप्त होते ही अपनी पूँछ बुझायी, अपनी थकान उतारी, अपना रूप छोटा किया, और फिर उस कमरे में गया जहाँ उसका असली काम था। वह अपनी उपलब्धि को अपने साथ भीतर नहीं ले गया। हम में से अधिकांश इसका उलटा करते हैं। जो कर आये हैं उसे लेकर भीतर आते हैं, और फिर उसी के भार से वह काम बिगाड़ देते हैं जिसके लिये आये थे। सुन्दरकाण्ड का यह हिस्सा बड़े काम की कीमत नहीं बताता, वह बड़े काम के बाद का ढंग बताता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा तेईस के आगे की चौपाइयों से दोहा सत्ताईस तक, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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