Lulla Family

लंका-प्रवेश और विभीषण

लंका-प्रवेश और विभीषण

लंका-प्रवेश और विभीषण

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · लंका-प्रवेश और विभीषण
सोने का परकोटा, द्वार पर खड़ी लंकिनी, एक घूँसा, और उस पूरे नगर में वह अकेला घर जिसके आँगन में नई तुलसी लगी थी।

रात उतर रही थी और समुद्र के उस पार वाला नगर अँधेरे में छिपा हुआ नहीं था, जगमगा रहा था। पहाड़ की चोटी पर एक ही देह खड़ी थी, पवन के पुत्र की देह, और उस देह की आँखों के सामने सोने की एक दीवार दूर तक फैली हुई थी। समुद्र पीछे छूट चुका था। सुरसा पीछे छूट चुकी थी। जल में परछाईं पकड़ लेने वाली वह निशाचरी भी पीछे छूट चुकी थी। अब सामने वह चीज़ थी जिसे लाँघना सबसे कठिन होता है, एक जागा हुआ नगर, जिसके चारों ओर करोड़ों पहरेदार तैनात हैं और जिसके भीतर एक अकेली स्त्री कहीं बन्दी है और उसका पता किसी को नहीं देना है।

तुलसी यहाँ एक काम बहुत सलीके से करते हैं। पहले वे पूरा नगर दिखाते हैं, परकोटा, चौराहे, बाज़ार, गलियाँ, हाथी, घोड़े, खच्चर, रथ, अखाड़े, बावलियाँ, और वह सेना जिसका वर्णन करते नहीं बनता। और फिर उसी नगर के भीतर वे हमें एक ऐसे घर तक ले जाते हैं जिसके बारे में कहने को सोना कुछ नहीं है। उस घर की दीवारों पर धनुष और बाण के चिह्न बने हैं और उसके आँगन में नई तुलसी लगी हुई है। पूरे प्रसंग का आकार यही है। एक तरफ़ कनक कोट, दूसरी तरफ़ तुलसी का एक बिरवा। और दूत को जो चाहिए था, वह सोने में नहीं, उस बिरवे के पास मिला।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • हनुमान: पवन के पुत्र, जिन्हें यह प्रसंग कपि, मारुतसुत, पवनसुत, हनुमंत और कपिराज कहकर पुकारता है। इस प्रसंग में वे तीन रूप धरते हैं, मच्छड़ जितना छोटा रूप, फिर नगर में घूमता हुआ वही अति लघु रूप, और अन्त में एक ब्राह्मण का रूप।
  • लंकिनी: लंका के द्वार पर बैठी वह राक्षसी, जिसका काम भीतर जाने वालों को रोकना है। वह चोरों को अपना आहार बताती है, एक घूँसा खाती है, और गिरकर उसे वह पुरानी बात याद आ जाती है जो ब्रह्मा चलते समय कह गये थे।
  • विरंचि: ब्रह्मा, जिन्होंने रावण को वर दिया था और जाते-जाते लंकिनी को राक्षसों के नाश की पहचान बता दी थी। वे इस प्रसंग में आते नहीं, केवल लंकिनी की याद में बोलते हैं।
  • दसानन: रावण, जिसका महल इतना विचित्र है कि कहा नहीं जाता, और जो उस पूरी रात सोता हुआ मिलता है। इस प्रसंग में उसका एक भी वचन नहीं है, केवल उसकी नींद है।
  • बैदेही: जनक की पुत्री, जिन्हें खोजने के लिये यह सारा उपक्रम हो रहा है। इस प्रसंग में वे दिखती नहीं। तुलसी उनकी अनुपस्थिति को एक ही पंक्ति में दर्ज करते हैं, कि महल में वैदेही नहीं दिखीं।
  • विभीषण: राक्षसों के उसी नगर में रहने वाले वे, जिनका घर राम के आयुध से अंकित है। वे नींद से जागते ही राम का नाम लेते हैं, और यही नाम उन्हें हनुमान के लिये पहचान लिया जाने वाला बना देता है।
  • शिव और उमा, गरुड़ और काकभुशुण्डि: यह कथा दो जगह से सुनाई जा रही है। बीच-बीच में शिव उमा को सम्बोधित करते हैं, और बीच-बीच में गरुड़ को सम्बोधित किया जाता है। इस प्रसंग में दोनों सम्बोधन ठीक उस जगह आते हैं जहाँ कवि नहीं चाहता कि बड़ाई किसी और के खाते में चली जाए।

पहाड़ पर से वह सोने का नगर

जो नगर सामने था, उसका पहला परिचय ऊँचाई और पानी से मिलता है। वह अत्यन्त ऊँचा है और उसके चारों ओर समुद्र है, और सोने के परकोटे का परम प्रकाश हो रहा है। इसके बाद तुलसी छन्द पर उतर आते हैं, क्योंकि चौपाई की चाल इतने बड़े दृश्य को नहीं सँभाल पाती। छन्द की लय तेज़ है और उसमें गिनती की तरह चीज़ें आती चली जाती हैं, जैसे कोई ऊपर से देखता हुआ आदमी साँस लिये बिना बोल रहा हो।

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

सुन्दरकाण्ड · छंद ३

विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, और उसके भीतर बहुत सारे सुन्दर घर हैं। चौराहे हैं, बाज़ार हैं, सुन्दर मार्ग हैं, गलियाँ हैं, और पूरा नगर कई तरह से सजा हुआ है। ध्यान दीजिए कि यहाँ एक भी शब्द डर का नहीं है। यह किसी दानव की माँद का वर्णन नहीं है, यह एक समृद्ध राजधानी का वर्णन है। तुलसी लंका को कुरूप बनाकर नहीं दिखाते। वे उसे ठीक वैसी दिखाते हैं जैसी वह है, सुन्दर, सुव्यवस्थित, और भरी हुई। यही ईमानदारी आगे की बात को धार देती है।

हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह, पैदल सैनिक और रथों के दल, इन्हें कौन गिन सकता है। अनेक रूप धरने वाले राक्षसों के झुंड हैं और उस अत्यन्त बलवती सेना का वर्णन करते नहीं बनता। कवि दो बार हार मान लेता है। पहले कहता है कि गिने कौन, फिर कहता है कि वर्णन करते नहीं बनता। और यह वही कवि है जिसने अभी-अभी सुरसा के मुख को योजनों में नाप दिया था। जहाँ गिनती छोड़नी पड़े, वहाँ समझ लीजिए कि सामने वाली चीज़ बहुत बड़ी है।

टीका इस छन्द के आगे के हिस्सों में और भी दिखाती है, वन, बाग, उपवन, फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ, बावलियाँ, और मनुष्यों, नागों, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ जिनका रूप मुनियों तक के मन मोह लेता है। कहीं पर्वत जैसे शरीर वाले पहलवान अखाड़ों में गरजते और एक-दूसरे को ललकारते हैं। और इसी सजी हुई तस्वीर के आख़िर में वह पंक्ति आती है जो सब कुछ पलट देती है, कि कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। सोने के परकोटे के भीतर जो चल रहा है, उसका असली नाम यही है।

और छन्द के अन्त में तुलसीदास अपना नाम लेकर एक बात कह देते हैं, कि इनकी कथा उन्होंने इसीलिये थोड़ी-सी कही है कि ये सब निश्चय ही राम के बाणरूपी तीर्थ में अपने शरीर छोड़कर परमगति पाएँगे। यह वाक्य पढ़ते ही पूरे नगर का रंग बदल जाता है। जिसे हम अभी शत्रु का दुर्ग समझ रहे थे, वह कवि की निगाह में तीर्थ पर आई हुई भीड़ है। लंका का विनाश आगे होगा, पर उसका अर्थ यहीं तय कर दिया गया है।

सार: तुलसी लंका को छोटा करके नहीं दिखाते। वे उसका सोना, उसकी सजावट, उसकी सेना और उसका सौन्दर्य पूरा गिनाते हैं, दो बार कहते हैं कि गिनती नहीं होती, और फिर उसी सजी हुई तस्वीर के भीतर बलि चढ़ते पशुओं और मनुष्यों को रख देते हैं। जो नगर बाहर से प्रकाश है, वह भीतर से भोजन का एक विशाल प्रबन्ध है।

एक विचार, जो रात का था और छोटेपन का

अब पहला निर्णय आता है, और वह तलवार से नहीं, विचार से आता है। पहाड़ पर खड़े हुए दूत ने सबसे पहले रखवालों को देखा, और रखवालों को देखकर उन्होंने कोई ललकार नहीं लगाई। उन्होंने मन में एक हिसाब लगाया।

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ३

नगर के बहुत सारे रखवालों को देखकर कपि ने मन में विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धारण करूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ। इस दोहे में दो शब्द तय करने वाले हैं, लघु और निसि। जिस देह ने अभी-अभी सौ योजन का समुद्र लाँघा है और जो चाहे तो सोने का परकोटा तोड़कर भीतर जा सकती है, वह देह अपने आप से कहती है कि छोटे हो जाओ और रात का इन्तज़ार करो। यह डर नहीं है। यह काम का सलीका है।

और इस एक दोहे में यह भी छिपा है कि हनुमान किस तरह के दूत हैं। वे बदला लेने नहीं आये। वे ख़बर लेने आये हैं। जिस आदमी का काम ख़बर लाना हो, उसके लिये दिखाई देना ही सबसे बड़ी हार है। इसलिये जहाँ शक्ति का प्रदर्शन सबसे आसान था, वहीं तुलसी उनसे सबसे छोटा रूप धरवाते हैं। पूरे सुन्दरकाण्ड में यह चाल बार-बार लौटती है, पहले छोटा होना, फिर काम करना, और सबसे अन्त में बड़ा दिखना।

मसक के बराबर रूप, और द्वार पर खड़ी लंकिनी

विचार के बाद अमल है, और अमल की पहली चार पंक्तियाँ इतनी तेज़ हैं कि उनमें रूप धरना, चलना, रोका जाना, ललकारा जाना और उत्तर मिल जाना, सब एक साथ आ जाता है।

मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई १ और २

कपि ने मच्छड़ के समान रूप धरा और नररूप में लीला करने वाले उन भगवान का स्मरण करके लंका की ओर चले। वहाँ द्वार पर लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। उसने रोककर कहा कि मेरा निरादर करके, बिना मुझसे पूछे, कहाँ चले जा रहे हैं। यहाँ मसक शब्द पर ठहरना चाहिए। मच्छड़ इस कथा का सबसे छोटा जीव है और सबसे कम ध्यान खींचने वाला। जिस देह को अभी-अभी हमने पहाड़ पर खड़ा देखा था, वह अब इतनी छोटी है कि हवा में उड़ती हुई एक बिन्दी भर लगती है।

पर इतनी छोटी होकर भी वह पकड़ ली गई। यह तुलसी की बारीकी है। लंका की पहरेदारी इतनी कड़ी है कि वहाँ एक मच्छड़ भी बिना पूछे भीतर नहीं जा सकता। और जो पकड़ती है, वह कोई सेनापति नहीं है। वह एक ऐसी शक्ति है जो सिर्फ़ द्वार पर बैठी रहती है। नगर की सबसे बाहरी रेखा पर बैठा हुआ पहरा ही सबसे पहले टूटता है, और टूटते ही भीतर का सारा गणित बदल जाता है।

उसने कहा कि रे मूर्ख, मेरा भेद नहीं जाना। जहाँ तक चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। इस वाक्य में उसने अपनी पहचान ख़ुद बता दी। वह भीतर आने वाले को चोर मानती है और चोर को भोजन मानती है। उसके लिये लंका में घुसने वाला हर जीव एक ही क़िस्म का है। यही उसकी भूल है, क्योंकि जो सामने खड़ा है वह चुराने नहीं, खोजने आया है।

और उत्तर में एक शब्द भी नहीं आया। महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा, और वह ख़ून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर लुढ़क पड़ी। मुठिका एक, केवल एक मुक्का। तुलसी यहाँ गिनती दे देते हैं, और यह गिनती ही चोट का माप है। जिस देह ने अभी मच्छड़ का रूप धरा हुआ था, उसी के एक घूँसे से लंका की द्वारपालिका गिर गई। छोटा रूप धरने से बल कहीं नहीं जाता, बस दिखना बन्द हो जाता है।

सार: द्वार पर पहला टकराव बहुत छोटा है और बहुत तेज़ है। एक तरफ़ मच्छड़ जितना रूप, दूसरी तरफ़ नगर की द्वारपालिका। वह भीतर आने वाले हर जीव को चोर और आहार मानती है, और उत्तर में उसे एक ही घूँसा मिलता है।

ब्रह्मा का दिया हुआ वह चिह्न

अब कथा उस जगह पहुँचती है जहाँ गिरी हुई द्वारपालिका बोलती है, और उसके बोलने से पता चलता है कि यह चोट कोई साधारण चोट नहीं थी।

पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ३

फिर वह लंकिनी अपने को सँभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। और उसने जो कहा, उससे इस घूँसे का अर्थ खुल गया। उसने कहा कि जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने उसे एक पहचान बता दी थी। वर देते हुए ही विनाश का चिह्न भी बता देना, यह इस कथा का बहुत गहरा गणित है। जिस दिन लंका को अभय मिला था, उसी दिन उसके भय का दिन भी लिख दिया गया था।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ४

ब्रह्मा की बात यह थी कि जिस दिन बन्दर के मारने से व्याकुल हो जाना पड़े, उस दिन जान लेना कि राक्षसों का संहार हो गया। और अब वह दिन आ चुका था। इसलिये गिरने के बाद लंकिनी के मुँह से शिकायत नहीं निकली। उसने कहा कि हे तात, मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैंने राम के दूत को अपनी आँखों से देख लिया। मार खाने वाली उसी घड़ी अपने भाग्य को सराहने लगी।

इस पलटाव को थोड़ा ठहरकर देखिए। लंकिनी को यह किसी ने समझाया नहीं। न कोई उपदेश हुआ, न कोई तर्क। बस एक चोट लगी और उसके साथ एक पुरानी बात याद आ गई। ब्रह्मा का वचन उसके भीतर बरसों से पड़ा हुआ था, पर उसे जगाने के लिये एक घूँसा चाहिए था। कुछ सच हमारे भीतर भी इसी तरह पड़े रहते हैं, और उन्हें किसी व्याख्यान से नहीं, किसी धक्के से याद आना होता है।

और एक बात और। लंकिनी पहचानती है कि सामने खड़ा जीव कौन है। नगर में करोड़ों योद्धा हैं, रावण सो रहा है, और भीतर की सारी सेना बेख़बर है। जो सबसे पहले पहचानती है, वह वही है जिसे सबसे पहले चोट लगी। लंका में राम के दूत को पहली बार जिसने पहचाना, वह उसका पहरा था, उसका राजा नहीं।

सत्संग का वह पलड़ा

अब उस राक्षसी के मुँह से वह दोहा निकलता है जो पूरे मानस के सबसे ज़्यादा दोहराए जाने वाले दोहों में है। यह ध्यान रखने लायक़ है कि यह किसी ऋषि की वाणी नहीं है। यह उस स्त्री की वाणी है जो अभी-अभी ख़ून की उलटी करके उठी है।

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ४

हे तात, स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुखों को तराजू के एक पलड़े में रख दिया जाए, तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं होते जो एक लव भर के सत्संग से मिलता है। लव यानी क्षण का भी एक टुकड़ा। एक पलड़े में स्वर्ग और मोक्ष, दूसरे में एक क्षण। और तराजू दूसरी तरफ़ झुक जाता है।

यह बात इस जगह क्यों रखी गई, इस पर सोचिए। अभी-अभी जो हुआ, वह सत्संग जैसा दिखता ही नहीं था। न कोई कथा हुई, न कोई नाम-कीर्तन, न कोई चरण-स्पर्श। सामने से एक घूँसा आया था। पर लंकिनी उसी को अपना सत्संग गिन रही है, क्योंकि जो देह सामने आई वह राम के काम पर निकली हुई देह थी। संग का मूल्य उसकी नरमी से नहीं, उसके भीतर बैठे हुए किसी और के नाम से तय होता है।

और यही वह जगह है जहाँ से लंका का किला भीतर से टूटना शुरू होता है। द्वार अब भी वहीं है, दीवार अब भी सोने की है, पहरेदार अब भी करोड़ों हैं। पर द्वार पर बैठी हुई शक्ति अब उस तरफ़ नहीं है जिस तरफ़ वह कल तक थी।

सार: गिरी हुई लंकिनी को ब्रह्मा का दिया हुआ चिह्न याद आता है कि बन्दर के हाथों व्याकुल होना ही राक्षसों के अन्त की पहचान है। और मार खाकर वह शिकायत नहीं करती, अपने पुण्य गिनती है, और एक क्षण के सत्संग को स्वर्ग और मोक्ष दोनों से भारी बता देती है।

जिनके हृदय में कोसलपुर के राजा हों

अब लंकिनी रास्ता ही नहीं देती, रास्ते की तरकीब भी दे देती है। जो अभी तक रोक थी, वह अब मार्गदर्शक हो गई है।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई १, पहली पंक्ति

अयोध्यापुरी के राजा को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कीजिए और सारे काम कीजिए। यह पूरी सलाह का पहला आधा हिस्सा है, और यही सबसे बड़ा हिस्सा है। तरकीब यह नहीं बताई गई कि किस गली से जाइए या किस पहरे से बचिए। तरकीब यह बताई गई कि भीतर किसे रखकर जाइए।

इसके आगे की पंक्ति में गिनाया गया है कि ऐसा करने वाले के साथ क्या होता है। टीका के अनुसार उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर जितना रह जाता है, और आग में शीतलता आ जाती है। चारों बातें एक ही ढाँचे की हैं। जो चीज़ मारने वाली थी, वह बचाने वाली हो जाती है, और जो चीज़ पार नहीं की जा सकती थी, वह एक क़दम में पार हो जाती है।

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई २

और हे गरुड़, सुमेरु पर्वत भी उसके लिये धूल के कण जितना रह जाता है, जिसे राम ने एक बार कृपा करके देख लिया। यहाँ कथा का सम्बोधन बदल जाता है और सुनने वाले गरुड़ हो जाते हैं। यह इसलिये कि आगे जो होने जा रहा है, उसका श्रेय दूत के बल के खाते में न चला जाए। जिस तरह पहाड़ पर चढ़ते समय शिव ने उमा से कहा था कि इसमें वानर की बड़ाई कुछ नहीं है, उसी तरह नगर में घुसते समय गरुड़ को यह याद दिला दिया गया कि नज़र किसकी पड़ी है।

हनुमान ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश कर लिया। ध्यान दीजिए कि यह दूसरी बार है जब इसी प्रसंग में छोटा रूप धरा जा रहा है। पहली बार द्वार तक पहुँचने के लिये, दूसरी बार भीतर चलने के लिये। और दोनों बार रूप धरने से ठीक पहले एक स्मरण है। पहली बार नरहरी का, दूसरी बार भगवान का। तुलसी बार-बार यही दिखाते हैं कि छोटा होना और स्मरण करना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।

मंदिर मंदिर की खोज, और सोता हुआ दसानन

अब वह हिस्सा आता है जिसे कथा सबसे कम शब्द देती है और जिसमें रात के सबसे ज़्यादा घंटे बीतते हैं।

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ३

उन्होंने एक-एक महल की खोज की और जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गये, जो इतना विचित्र था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा, यह पंक्ति एक रात के कई घंटे अपने भीतर समेटे हुए है। यह कोई उड़ान नहीं है, यह घर-घर की तलाशी है, धीरे-धीरे, एक के बाद एक। सुन्दरकाण्ड की सबसे बड़ी वीरता अक्सर इसी तरह की होती है, धैर्य वाली।

और इस तलाशी में जो मिलता है, वह भी दर्ज कर लिया गया है, असंख्य योद्धा। हर महल में हथियारबन्द लोग सो रहे हैं या पहरा दे रहे हैं। दूत उनके बीच से गुज़र रहा है और किसी को ख़बर नहीं। फिर वह सबसे बड़े घर तक पहुँचता है, और वहाँ भी कवि वही बात दोहराता है जो उसने परकोटे के बारे में कही थी, कि कहा नहीं जाता। रावण के महल का वैभव इस कथा में कहीं भी घटाकर नहीं दिखाया गया।

सयन किएँ देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ४

कपि ने उसे सोया हुआ देखा, पर महल में वैदेही नहीं दिखीं। और यही इस पूरी रात की सबसे सूखी और सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति है। रावण सो रहा है। जिस आदमी के कारण यह सारा उपक्रम हो रहा है, वह चैन से सो रहा है, और उसके सिरहाने तक उसका शत्रु का दूत पहुँच चुका है। तुलसी यहाँ कोई टिप्पणी नहीं करते। वे सिर्फ़ दो चीज़ें बग़ल-बग़ल रख देते हैं, उसकी नींद और सीता की अनुपस्थिति।

फिर एक और सुन्दर भवन दिखाई दिया, और उसमें एक अलग ही मन्दिर बना हुआ था। कहानी यहाँ मुड़ती है। अब तक खोज बड़े से बड़े घर की ओर जा रही थी, इस उम्मीद में कि जो सबसे बड़ा है उसके पास ही सब कुछ होगा। पर जो मिला, वह सबसे बड़े घर में नहीं मिला। उसके बाद वाले एक घर में मिला, और वह भी सोने से नहीं, एक अलग बने हुए मन्दिर से पहचाना गया।

सार: लंका में प्रवेश बल से नहीं, स्मरण और छोटेपन से होता है। भीतर एक-एक महल छाना जाता है, हर जगह असंख्य योद्धा मिलते हैं, रावण अपने विचित्र महल में सोता हुआ मिलता है, और जिनकी खोज है वे नहीं मिलतीं। खोज का रुख़ तब सबसे बड़े घर से हटकर एक और भवन की ओर मुड़ जाता है।

एक घर, जिस पर राम के आयुध बने थे

और अब वह दोहा, जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है। सोने के उस नगर में तुलसी एक घर के बाहर रुक जाते हैं और उसका परिचय उसके वैभव से नहीं, दो चिह्नों से देते हैं।

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ ५॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ५

वह घर राम के आयुधों के चिह्नों से अंकित था और उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। वहाँ नई-नई तुलसी के झुंड देखकर कपिराज हर्षित हुए। इस दोहे को उस छन्द के साथ रखकर पढ़िए जो थोड़ी देर पहले आया था। वहाँ सोना था, मणियाँ थीं, बाज़ार थे, अखाड़े थे, और सेना थी, और कवि ने कहा कि गिना नहीं जा सकता। यहाँ धनुष-बाण के चिह्न हैं और कुछ तुलसी के पौधे हैं, और कवि फिर वही कहता है, बरनि न जाइ।

एक ही कवि ने दो जगह हार मानी है, और दोनों हार का कारण अलग है। परकोटे के सामने वह इसलिये हारा कि चीज़ें बहुत ज़्यादा थीं। इस घर के सामने वह इसलिये हारता है कि चीज़ें बहुत कम हैं और फिर भी सब कुछ हैं। बड़प्पन को गिनती से नहीं नापा जा सकता, यह बात यहाँ दो बार के बरनि न जाइ से निकलती है।

और हर्ष किसे हुआ, यह भी देखिए। जिस देह ने अभी-अभी लंका की द्वारपालिका को एक घूँसे में गिरा दिया था और रावण के सिरहाने तक बेख़बर पहुँच गई थी, वह देह सोने से नहीं, सेना से नहीं, राजमहल से नहीं, नई तुलसी के कुछ पौधों से ख़ुश होती है। पूरे नगर में जो एक चीज़ अपनी लगी, वह यही थी।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई १

लंका तो राक्षसों के समूह का निवास है, यहाँ किसी सज्जन का बसेरा कहाँ। कपि मन में इसी तरह तर्क करने लगे, और उसी समय विभीषण जागे। यहाँ जो शक हुआ, वह बिलकुल वाजिब शक है। एक ऐसे नगर में जहाँ हर घर में हथियारबन्द लोग सो रहे हैं, वहाँ धनुष-बाण के चिह्न और तुलसी का बिरवा देखकर भरोसा कर लेना आसान नहीं। दूत का काम भरोसा करना नहीं, जाँचना है।

और तर्क का उत्तर तर्क से नहीं आया। जब वे मन में हिसाब लगा ही रहे थे, तभी उस घर में कोई जागा। तुलसी यहाँ एक शब्द रखते हैं, तेहीं समय, ठीक उसी समय। सन्देह और उत्तर के बीच कोई देर नहीं है।

राम राम, और एक जागा हुआ आदमी

और जो जागा, उसने आँख खुलते ही जो किया, वही इस भेंट की पूरी बुनियाद है।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई २

उन्होंने राम राम का स्मरण किया, और कपि ने उन्हें सज्जन जान लिया और हृदय में हर्षित हुए। फिर उन्होंने सोचा कि इनसे हठ करके, यानी अपनी ओर से आगे बढ़कर, परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती। पहचान का यह तरीक़ा देखने लायक़ है। न वंश पूछा गया, न जाति, न पद। जागते ही मुँह से जो पहला शब्द निकला, उसी से आदमी पहचान लिया गया।

और यह लंका के बीचों-बीच हो रहा है। इसी नगर में उस रात कितने लोग जागे होंगे, पर जिसकी नींद टूटते ही राम का नाम निकला, वह पूरे नगर में एक ही निकला। तुलसी ने विभीषण का परिचय उनके भाई से नहीं दिया, उनके पद से नहीं दिया, उनकी नीयत से नहीं दिया। उन्होंने उनका परिचय उनकी नींद से दिया।

हठि करिहउँ पहिचानी, इस पर भी ठहरिए। हठ करके परिचय करूँगा। यानी सामने वाला पूछे या न पूछे, पहल मैं करूँगा। और इसका कारण भी साथ ही रख दिया गया है, कि साधु से काम बिगड़ता नहीं। यह गुप्तचर का नियम नहीं है, गुप्तचर का नियम तो छिपे रहना है। यह किसी और तरह की समझ है, कि जोखिम उठाने लायक़ जगह कौन-सी है।

ब्राह्मण का रूप, और विभीषण के दो प्रश्न

पहचान तय हो जाने के बाद पहल हुई, और पहल के साथ ही एक और रूप बदला गया।

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ३ और ४

ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान ने उन्हें वचन सुनाये, और सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आ गये। प्रणाम करके उन्होंने कुशल पूछी और कहा कि हे विप्र, अपनी कथा समझाकर कहिए। यह इस प्रसंग का तीसरा रूप है। पहला मच्छड़ का, दूसरा अति लघु, और अब ब्राह्मण का। हर रूप काम के हिसाब से है। छिपने के लिये छोटा रूप, और बात करने के लिये वह रूप जिसके सामने राक्षसों के नगर में भी कोई हाथ जोड़ ले।

और विभीषण का पहला काम प्रणाम है, दूसरा कुशल पूछना है, तीसरा यह पूछना है कि आप कौन हैं। क्रम बताता है कि आदमी कैसा है। जिस नगर में हर अजनबी शत्रु माना जाता है, वहाँ आधी रात को घर पर आये एक अपरिचित से पहले प्रणाम किया जा रहा है, फिर उसका हाल पूछा जा रहा है।

क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं, क्योंकि मेरे हृदय में अत्यन्त प्रीति उमड़ रही है। या फिर कहीं आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं राम ही तो नहीं हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आये हैं। दो प्रश्न हैं और दोनों में एक ही प्रमाण दिया गया है, हृदय की प्रीति। विभीषण ने सामने वाले की जाँच बाहर से नहीं की। उन्होंने अपने भीतर उठी हुई लहर को प्रमाण माना।

और दूसरे प्रश्न में जो आस है, वह इस पूरे प्रसंग की सबसे मार्मिक चीज़ है। एक आदमी जो बरसों से उस नगर में अकेला रह रहा है, आधी रात को द्वार पर खड़े अजनबी से पूछ रहा है कि कहीं आप ही तो नहीं आ गये। जो बहुत दिनों से किसी की राह देखता है, वह हर दस्तक में उसी की आहट सुनता है।

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ६

तब हनुमान ने राम की सारी कथा कही और अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गये और गुणों के समूह का स्मरण करके दोनों के मन मग्न हो गये। जुगल, यानी दोनों। कवि यहाँ दोनों को एक ही शब्द में बाँध देता है। एक राक्षसों के कुल का है और एक वानरों के। एक उस नगर का निवासी है और एक उसका भेदिया। पर पुलक दोनों के शरीर में एक साथ उठी।

सार: जिस घर पर राम के आयुध के चिह्न हैं और आँगन में नई तुलसी है, वहाँ कवि फिर कहता है कि वर्णन नहीं होता। भीतर का आदमी नींद से जागते ही राम का नाम लेता है और इसी से पहचान लिया जाता है। दूत ब्राह्मण का रूप धरकर पहल करता है, कथा कहता है, नाम बताता है, और दोनों एक साथ पुलकित हो जाते हैं।

दाँतों के बीच बेचारी जीभ

अब विभीषण अपनी बात कहते हैं, और वे अपनी हालत का जो चित्र खींचते हैं, वह मानस की सबसे याद रह जाने वाली उपमाओं में गिना जाता है।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई १ और २

हे पवनसुत, मेरी रहनी सुनिए। मैं यहाँ ऐसे रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ। और हे तात, क्या सूर्यकुल के नाथ कभी मुझे अनाथ जानकर मुझ पर कृपा करेंगे। यह उपमा मानस की सबसे सटीक उपमाओं में से एक है। जीभ दाँतों के बीच ही रहती है, हर पल, और फिर भी कटती नहीं। पर यह सुरक्षा नहीं है, यह लगातार का सावधानीपन है।

और उपमा में एक बात और है। जीभ दाँतों से लड़ती नहीं, और दाँतों को छोड़कर भाग भी नहीं सकती। विभीषण की स्थिति ठीक यही है। वे लंका में हैं, लंका के ही हैं, और लंका के साथ नहीं हैं। इसीलिये उनका प्रश्न भी अपने लिये कुछ माँगने वाला नहीं है। वे यह नहीं पूछते कि मुझे यहाँ से निकालिए। वे बस इतना पूछते हैं कि क्या कभी उस तरफ़ से नज़र पड़ेगी।

मेरा तामस शरीर है, इससे साधन तो कुछ बनता नहीं, और मन में उन चरणकमलों के लिये प्रीति भी नहीं है। पर हे हनुमंत, अब मुझे भरोसा हो गया, क्योंकि हरि की कृपा के बिना सन्त नहीं मिलते। यह वाक्य जिस आदमी के मुँह से निकल रहा है, वह उसी घड़ी रो पड़ने लायक़ प्रीति दिखा चुका है। फिर भी वह कह रहा है कि प्रीति नहीं है। जिनके पास यह चीज़ सचमुच होती है, वे इसे अपने खाते में नहीं गिनते।

और प्रमाण जो उन्होंने चुना, वह अपने भीतर से नहीं लिया गया। उन्होंने अपनी भक्ति को प्रमाण नहीं बनाया, अपने आँसू को प्रमाण नहीं बनाया, अपनी प्रतीक्षा को प्रमाण नहीं बनाया। उन्होंने उस मुलाक़ात को प्रमाण बनाया जो अभी-अभी हो रही है। सन्त का मिल जाना ही इस बात का सबूत है कि कृपा हो चुकी है।

प्रभु की रीति, और एक अधम की गिनती

उत्तर में जो आता है, वह दिलासा नहीं है। वह एक और आदमी का अपने को नीचे रख देना है।

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥

सुन्दरकाण्ड · चौपाई ३ और ४

जब रघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने हठ करके मुझे दर्शन दिये हैं। और फिर उत्तर आता है, कि हे विभीषण, सुनिए, प्रभु की रीति यही है कि वे सेवक पर सदा प्रेम किया करते हैं। ध्यान दीजिए कि हठ शब्द यहाँ दूसरी बार आ रहा है। पहले हनुमान ने मन में कहा था कि इनसे हठ करके परिचय करूँगा, और अब विभीषण कह रहे हैं कि आपने हठ करके दर्शन दिये। जो पहल एक तरफ़ से हुई थी, उसे दूसरी तरफ़ वाला कृपा गिन रहा है।

भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ। चंचल वानर हूँ और सब तरह से हीन हूँ। सुबह-सुबह जो हमारा नाम ले ले, उसे उस दिन भोजन न मिले। यह उत्तर विभीषण के तामस तनु वाले वाक्य का जवाब है, और यह जवाब बहस से नहीं आया। यह अपने को और नीचे रखकर आया। सामने वाला कह रहा था कि मेरा शरीर तामसी है, और उत्तर में यह नहीं कहा गया कि ऐसा मत कहिए। उत्तर में यह कहा गया कि हमारा हाल तो और भी हल्का है।

और अपशकुन वाली बात तो लोक की कहावत है, जो तुलसी ने अपने ही नायक के मुँह में रख दी है। जिस देह ने समुद्र लाँघा है, वही देह कह रही है कि हमारा नाम सुबह ले लेने से आदमी को दिन भर भोजन न मिले। इतना नीचे उतरकर बोलने की ताक़त वही रख सकता है जिसे अपनी जगह का ज़रा भी सन्देह न हो।

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७॥

सुन्दरकाण्ड · दोहा ७

हे सखा, सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, पर रघुवीर ने मुझ पर भी कृपा ही की है। और यह कहते हुए, गुणों का स्मरण करके, उनके दोनों नेत्रों में जल भर आया। सखा शब्द पर ठहरिए। पहले तात कहा गया था, अब सखा कहा जा रहा है। कुछ ही पंक्तियों में सम्बोधन बड़े से बराबरी वाला हो गया है। यह पूरी मुलाक़ात का सबसे साफ़ सबूत है।

और अन्त में शब्द नहीं बचे, पानी बचा। मोहू पर, यानी मुझ पर भी। इस छोटे से भी ने इस पूरे प्रसंग का भार उठा रखा है। जो अपने को अधम गिन रहा है, वह शिकायत नहीं कर रहा, गिनती कर रहा है कि कृपा कहाँ-कहाँ तक पहुँची है, और उस गिनती में अपना नाम पाकर उसकी आँखें भर आई हैं।

सार: विभीषण अपनी हालत को दाँतों के बीच की जीभ बताते हैं और अपने पास कुछ भी न होने की बात कहकर भरोसा सिर्फ़ इस पर करते हैं कि सन्त मिल गये। उत्तर में हनुमान अपने को और नीचे रखते हैं, वानरों के अपशकुन वाली लोक-कहावत तक कह जाते हैं, और अन्त में मुझ पर भी कहते हुए उनकी आँखों में जल भर आता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में दो घर हैं। एक वह जिसका परकोटा सोने का है, जिसकी सेना गिनी नहीं जाती, और जिसका स्वामी उस रात चैन से सो रहा है। दूसरा वह जिसके बारे में कहने को बस इतना है कि दीवारों पर धनुष-बाण के चिह्न हैं और आँगन में नई तुलसी है। दूत पहले घर तक भी पहुँचा और दूसरे तक भी। पहले घर में उसे जो चाहिए था वह नहीं मिला, और दूसरे में एक साथी मिल गया।

और भीतर घुसने का जो नुस्ख़ा इस प्रसंग ने दिया, वह ताक़त का नहीं था। पहाड़ पर खड़े होकर तय हुआ कि छोटे हो जाना है और रात का इन्तज़ार करना है। द्वार पर एक ही घूँसा चला, और वह भी तब जब रास्ता रोका गया। भीतर एक-एक घर धीरज से छाना गया। और जहाँ बात करनी थी, वहाँ रूप बदल लिया गया। शक्ति पूरी की पूरी साथ थी, पर वह सिर्फ़ उतनी ही बार निकली जितनी बार ज़रूरी थी।

हमारे अपने दिनों में भी चीज़ें अक्सर इसी क्रम से होती हैं। जो जगह हमें रोकती है, वह प्रायः सबसे बाहरी होती है, द्वार वाली, और वहाँ लम्बी बहस नहीं चलती। जो सच हमें बदलता है, वह प्रायः हमारे भीतर पहले से पड़ा रहता है और किसी धक्के पर ही याद आता है, जैसे लंकिनी को ब्रह्मा की बात याद आई। और जो साथी हमें मिलता है, वह प्रायः सबसे बड़े दरवाज़े पर नहीं मिलता। वह उस घर में मिलता है जिसे हम रास्ते में पड़ा हुआ समझकर छोड़ आते हैं।

और सबसे सीखने लायक़ बात शायद वह है जो इस प्रसंग में दो लोग एक साथ करते हैं। विभीषण अपने पास कुछ भी होने से इनकार कर देते हैं, और हनुमान अपने को उनसे भी हल्का बता देते हैं। दोनों में से कोई अपनी जगह का दावा नहीं करता, और ठीक इसी वजह से दोनों की आँखें एक साथ भर आती हैं। जिस घड़ी दो लोग अपनी-अपनी बड़ाई नीचे रख देते हैं, उसी घड़ी बीच में जो जगह ख़ाली होती है, उसमें किसी तीसरे का नाम आकर बैठ जाता है। लंका में सोने के परकोटे के भीतर उस रात यही एक कमरा था जहाँ यह हो सका।

मूल पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के श्रीरामचरितमानस संस्करण से, और अर्थ हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका के आधार पर। सुन्दरकाण्ड, दोहा ३ से ७ तक।

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