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लंका-प्रवेश और विभीषण

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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 2

लंका-प्रवेश और विभीषण

सोने का परकोटा, द्वार पर खड़ी लंकिनी, एक घूँसा, और नगर के भीतर विभीषण का घर, जिसके आँगन में नई तुलसी लगी थी।

रात उतर रही थी, और समुद्र से घिरा वह नगर अँधेरे में छिपा नहीं था, जगमगा रहा था। पहाड़ की चोटी पर हनुमान अकेले खड़े थे, और सामने सोने की एक दीवार दूर तक फैली थी। समुद्र, सुरसा, और जल में परछाईं पकड़ लेनेवाली वह निशाचरी, सब पीछे छूट चुके थे। अब सामने सबसे कठिन चीज़ थी: एक जागा हुआ नगर, जिसके चारों ओर करोड़ों पहरेदार तैनात थे। उसके भीतर एक अकेली स्त्री कहीं बन्दी थी। और नगर को पता नहीं चलना था कि कोई उन्हें खोजने आया है।

तुलसी पहले पूरा नगर दिखाते हैं: परकोटा, चौराहे, बाज़ार, गलियाँ, हाथी, घोड़े, रथ, अखाड़े, बावलियाँ, और वह सेना जिसका वर्णन करते नहीं बनता। फिर उसी नगर के भीतर वे एक ऐसे घर तक ले जाते हैं जिसमें सोने जैसा कुछ नहीं है। उसकी दीवारों पर धनुष और बाण के चिह्न हैं, और आँगन में नई तुलसी। पूरे प्रसंग का आकार यही है। एक तरफ़ सोने का परकोटा, दूसरी तरफ़ तुलसी के कुछ बिरवे, और हनुमान को जो चाहिए था वह उन बिरवों के पास मिला।

उस रात की लंका

  • हनुमान: पवन के पुत्र। इस प्रसंग में वे तीन रूप धरते हैं: मच्छड़ जितना छोटा रूप, फिर नगर में घूमता वही बहुत छोटा रूप, और अन्त में एक ब्राह्मण का रूप।
  • लंकिनी: लंका के द्वार पर बैठी राक्षसी, जिसका काम भीतर जानेवालों को रोकना है। वह चोरों को अपना आहार बताती है, एक घूँसा खाती है। गिरकर उसे वह बात याद आ जाती है जो ब्रह्मा जाते समय कह गये थे।
  • ब्रह्मा: जिन्होंने रावण को वर दिया था और जाते-जाते लंकिनी को राक्षसों के नाश की पहचान बता दी थी। वे इस प्रसंग में आते नहीं, केवल लंकिनी की याद में बोलते हैं।
  • रावण: जिसका महल इतना विचित्र है कि कहा नहीं जाता, और जो सोता हुआ मिलता है। इस प्रसंग में उसका एक भी वचन नहीं, केवल उसकी नींद है।
  • सीता: जनक की पुत्री, जिन्हें खोजने के लिये यह सब हो रहा है। इस प्रसंग में वे दिखती नहीं। तुलसी उनकी अनुपस्थिति बस इतना कहकर दर्ज करते हैं: महल में सीता नहीं दिखीं।
  • विभीषण: राक्षसों के उसी नगर में रहनेवाले, जिनका घर राम के आयुधों से अंकित है। वे नींद से जागते ही राम का नाम लेते हैं, और इसी से हनुमान उन्हें पहचान लेते हैं।
  • शिव और पार्वती, गरुड़ और काकभुशुण्डि: यह कथा दो जगह से सुनायी जा रही है। बीच-बीच में शिव पार्वती से बात करते हैं, और बीच-बीच में गरुड़ से। इस प्रसंग में दोनों बार यह सम्बोधन वहीं आता है जहाँ कवि नहीं चाहता कि बड़ाई हनुमान के खाते में चली जाये।

पहाड़ पर से वह सोने का नगर

नगर का पहला परिचय ऊँचाई और पानी से मिलता है: वह बहुत ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है, और सोने का परकोटा चमक रहा है। फिर तुलसी का वर्णन तेज़ हो जाता है, क्योंकि दृश्य बहुत बड़ा है। चीज़ें गिनती की तरह आती जाती हैं, जैसे ऊपर से देखता कोई आदमी साँस लिये बिना बोल रहा हो।

मणियों से जड़ा सोने का परकोटा, उसके भीतर बहुत से सुन्दर घर, चौराहे, बाज़ार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ: नगर कई तरह से सजा हुआ है। यहाँ डर का एक भी शब्द नहीं है। तुलसी लंका को कुरूप करके नहीं दिखाते। वह एक समृद्ध, सुव्यवस्थित, भरी हुई राजधानी है, और यही ईमानदारी आगे की बात को धार देती है।

हाथी, घोड़े, खच्चरों के झुंड, पैदल सैनिक और रथों के दल, इन्हें कौन गिन सकता है। अनेक रूप धरनेवाले राक्षसों के झुंड हैं, और उस बलवान् सेना का वर्णन करते नहीं बनता। जिस कवि ने अभी सुरसा का मुख योजनों में नाप दिया था, वह यहाँ दो बार हार मान लेता है।

फिर तुलसी वन, बाग, उपवन, फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ दिखाते हैं, और मनुष्यों, नागों, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ, जिनका रूप मुनियों का मन भी मोह लेता है। कहीं पर्वत जैसे शरीरवाले पहलवान अखाड़ों में गरजते और एक-दूसरे को ललकारते हैं। और इसी सजी हुई तस्वीर के आख़िर में वह बात आती है जो सब पलट देती है। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं।

इस वर्णन के अन्त में तुलसीदास अपना नाम लेते हैं। वे कहते हैं कि इनकी कथा उन्होंने थोड़ी-सी इसीलिये कही है कि ये सब राम के बाणों के तीर्थ में शरीर छोड़कर निश्चय ही परमगति पायेंगे। इस एक वाक्य से नगर का रंग बदल जाता है। जिसे हम शत्रु का दुर्ग समझ रहे थे, वह कवि की नज़र में तीर्थ पर आयी हुई भीड़ है। लंका का विनाश आगे होगा, पर उसका अर्थ यहीं तय हो गया।

एक विचार, जो रात का था और छोटेपन का

पहला निर्णय तलवार से नहीं, विचार से आता है। पहाड़ पर से हनुमान ने सबसे पहले रखवालों को देखा, और कोई ललकार नहीं लगायी। उन्होंने मन में हिसाब लगाया।

नगर के बहुत से रखवालों को देखकर उन्होंने सोचा कि बहुत छोटा रूप धरकर रात के समय नगर में प्रवेश करूँ। इस सोच में दो बातें निर्णय करती हैं, छोटा रूप और रात। जिसने अभी सौ योजन का समुद्र लाँघा है और चाहे तो परकोटा तोड़कर भीतर जा सकता है, वह छोटा होने और रात की राह देखने का निर्णय करता है। यह डर नहीं, काम का सलीका है।

इससे पता चलता है कि हनुमान किस तरह के दूत हैं। वे बदला लेने नहीं, ख़बर लेने आये हैं, और ख़बर लानेवाले के लिये दिख जाना ही सबसे बड़ी हार है। इसलिये जहाँ बल दिखाना सबसे आसान था, वहीं वे सबसे छोटा रूप धरते हैं। पूरे सुन्दरकाण्ड में यही क्रम लौटता है: पहले छोटा होना, फिर काम करना, और सबसे अन्त में बड़ा दिखना।

मसक के बराबर रूप, और द्वार पर खड़ी लंकिनी

विचार के बाद काम, और पल भर में रूप धरना, चलना, रोका जाना, ललकारा जाना और उत्तर, सब एक साथ आ जाता है।

हनुमान ने मच्छड़ के समान रूप धरा और मनुष्य रूप में लीला करनेवाले भगवान का स्मरण करके लंका की ओर चले। द्वार पर लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। उसने रोककर कहा: मेरा निरादर करके, बिना मुझसे पूछे, कहाँ चले जा रहे हैं। जो देह अभी पहाड़ पर खड़ा था, वह अब हवा में उड़ती एक बिन्दी भर रह गया है।

फिर भी वे देख लिये गये और टोके गये। लंका का पहरा इतना कड़ा है कि वहाँ एक मच्छड़ भी बिना पूछे भीतर नहीं जा सकता। और टोकनेवाली कोई सेनापति नहीं, द्वार पर बैठी एक शक्ति है। नगर की सबसे बाहरी रेखा का पहरा ही सबसे पहले टूटता है।

उसने कहा: रे मूर्ख, मेरा भेद नहीं जाना, जितने चोर हैं सब मेरे आहार हैं। इस वाक्य में उसने अपनी पहचान ख़ुद बता दी। भीतर आनेवाला हर जीव उसके लिये चोर है, और चोर भोजन। यही उसकी भूल है, क्योंकि सामने खड़ा जीव चुराने नहीं, खोजने आया है।

उत्तर में एक शब्द नहीं आया। हनुमान ने उसे एक घूँसा मारा, और वह ख़ून की उलटी करती हुई धरती पर लुढ़क गयी। एक ही मुक्का, और यही गिनती चोट का माप है। छोटा रूप धरने से बल कहीं नहीं गया था, बस दिखना बन्द हुआ था।

ब्रह्मा का दिया हुआ वह चिह्न

अब गिरी हुई द्वारपालिका बोलती है, और उसकी बात से पता चलता है कि यह चोट साधारण नहीं थी।

लंकिनी अपने को सँभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। उसने बताया कि जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब जाते समय उन्होंने उसे एक पहचान बता दी थी। जिस दिन लंका को वर मिला, उसी दिन उसके विनाश का चिह्न भी लिख दिया गया।

ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन बन्दर के मारने से व्याकुल होना पड़े, उस दिन जान लेना कि राक्षसों का संहार हो गया। वह दिन आ चुका था। इसलिये गिरकर लंकिनी ने शिकायत नहीं की। उसने कहा: हे तात, मेरे बड़े पुण्य हैं कि मैंने राम के दूत को अपनी आँखों से देख लिया। मार खानेवाली उसी घड़ी अपने भाग्य को सराहने लगी।

लंकिनी को किसी ने कुछ समझाया नहीं: न उपदेश हुआ, न तर्क। एक चोट लगी, और बरसों से भीतर पड़ा ब्रह्मा का वचन जाग गया। कुछ सच हमारे भीतर भी इसी तरह पड़े रहते हैं और किसी धक्के से ही याद आते हैं।

और राम के दूत को लंका में सबसे पहले उसी ने पहचाना जिसे सबसे पहले चोट लगी। नगर में करोड़ों योद्धा हैं, रावण सो रहा है, सेना बेख़बर है, और पहचान उसके पहरे को होती है, उसके राजा को नहीं।

सत्संग का वह पलड़ा

अब उसी राक्षसी के मुँह से वह बात निकलती है जो पूरे मानस में सबसे ज़्यादा दोहरायी जानेवाली बातों में है। यह किसी ऋषि की वाणी नहीं, उस स्त्री की वाणी है जो अभी ख़ून की उलटी करके उठी है।

हे तात, स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुख तराजू के एक पलड़े में रख दिये जायें। तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं होते जो लव भर के सत्संग से मिलता है। लव यानी क्षण का भी एक टुकड़ा। एक पलड़े में स्वर्ग और मोक्ष, दूसरे में एक क्षण, और तराजू दूसरी तरफ़ झुक जाता है।

यह बात यहाँ क्यों रखी गयी? अभी जो हुआ वह सत्संग जैसा दिखता ही नहीं था: न कथा, न कीर्तन, सामने से एक घूँसा आया था। फिर भी लंकिनी उसी को अपना सत्संग गिनती है, क्योंकि सामने आया जीव राम के काम पर निकला था। संग का मूल्य उसकी नरमी से नहीं, उसके भीतर बैठे नाम से तय होता है।

यहीं से लंका का किला भीतर से टूटना शुरू होता है। द्वार वहीं है, दीवार अब भी सोने की है, पहरेदार अब भी करोड़ों हैं। पर द्वार पर बैठी शक्ति अब उस तरफ़ नहीं है जिस तरफ़ कल तक थी।

हृदय में राम को रखकर

अब लंकिनी रास्ता ही नहीं देती, रास्ते की तरकीब भी बता देती है। जो अभी तक रोक थी, वह अब मार्ग दिखानेवाली है।

अयोध्या के राजा राम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कीजिए और सारे काम कीजिए। तरकीब यह नहीं कि किस गली से जायें या किस पहरे से बचें। तरकीब यह है कि भीतर किसे रखकर जायें।

ऐसा करनेवाले के साथ क्या होता है, यह भी गिना दिया जाता है। टीका के अनुसार उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, समुद्र गाय के खुर जितना रह जाता है, और आग ठण्डी हो जाती है। जो मारनेवाला था वह बचानेवाला हो जाता है, और जो पार नहीं हो सकता था वह एक क़दम में पार हो जाता है।

और हे गरुड़, जिस पर राम ने एक बार कृपा की नज़र डाल दी, उसके लिये सुमेरु पर्वत भी धूल के कण जितना रह जाता है। यहाँ सुननेवाले गरुड़ हो जाते हैं, ताकि आगे जो होना है उसका श्रेय दूत के बल के खाते में न चला जाये। पहाड़ पर चढ़ते समय शिव ने पार्वती से कहा था कि इसमें वानर की कोई बड़ाई नहीं। वैसे ही नगर में घुसते समय गरुड़ को याद दिलाया गया कि नज़र किसकी पड़ी है।

हनुमान ने बहुत छोटा रूप धरा और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया। इस प्रसंग में यह दूसरी बार है कि छोटा रूप धरा जा रहा है: पहली बार द्वार तक पहुँचने के लिये, अब भीतर चलने के लिये। और दोनों बार रूप धरने के ठीक बाद भगवान का स्मरण है। तुलसी के यहाँ छोटा होना और स्मरण करना साथ-साथ चलते हैं।

मंदिर मंदिर की खोज, और सोता हुआ रावण

अब वह हिस्सा आता है जिसे कथा सबसे कम शब्द देती है और जिसमें रात के सबसे ज़्यादा घंटे बीतते हैं।

उन्होंने एक-एक महल की खोज की और जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गये, जो इतना विचित्र था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। एक-एक महल की इस खोज में एक रात के कई घंटे समाये हैं। यह उड़ान नहीं, घर-घर की तलाशी है, एक के बाद एक। सुन्दरकाण्ड की वीरता अक्सर इसी तरह की है, धीरजवाली।

हर महल में हथियारबन्द लोग सो रहे हैं या पहरा दे रहे हैं, और हनुमान उनके बीच से निकल रहे हैं, किसी को ख़बर नहीं। फिर वे सबसे बड़े घर तक पहुँचते हैं, और वहाँ भी कवि वही कहता है जो परकोटे के बारे में कहा था: कहा नहीं जाता। रावण का वैभव इस कथा में कहीं घटाकर नहीं दिखाया गया।

हनुमान ने रावण को सोया हुआ देखा, पर महल में सीता नहीं दिखीं। यही इस रात की सबसे सूखी और सबसे ज़रूरी ख़बर है। जिसके कारण यह सब हो रहा है वह चैन से सो रहा है। उसके शत्रु का दूत उसके महल के भीतर तक आ चुका है। तुलसी कोई टिप्पणी नहीं करते, बस दो चीज़ें साथ रख देते हैं: उसकी नींद, और सीता का न होना।

फिर एक और सुन्दर भवन दिखा, जिसमें भगवान का एक अलग मन्दिर बना था। यहाँ कहानी मुड़ती है। अब तक खोज सबसे बड़े घर की ओर जा रही थी। पर जो मिला, वह सबसे बड़े घर में नहीं, उसके बाद के एक घर में मिला। और वह भी सोने से नहीं, एक अलग बने मन्दिर से पहचाना गया।

एक घर, जिस पर राम के आयुध बने थे

अब वह क्षण, जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है। सोने के उस नगर में तुलसी एक घर के बाहर रुकते हैं और उसका परिचय वैभव से नहीं, दो चिह्नों से देते हैं।

वह घर राम के आयुधों, यानी धनुष-बाण, के चिह्नों से अंकित था, और उसकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ नई तुलसी के झुंड देखकर हनुमान हर्षित हुए। परकोटे के सामने कवि ने कहा था कि गिना नहीं जा सकता, क्योंकि वहाँ सोना, मणियाँ, बाज़ार और सेना थे। यहाँ धनुष-बाण के चिह्न हैं और कुछ तुलसी के पौधे, और कवि फिर कहता है कि वर्णन नहीं हो सकता।

दोनों बार कवि हार मानता है, पर कारण अलग है। परकोटे के सामने चीज़ें बहुत ज़्यादा थीं। इस घर के सामने चीज़ें बहुत कम हैं, और फिर भी सब कुछ हैं। बड़प्पन गिनती से नहीं नपता।

और हर्ष किसे हुआ, यह भी देखिए। अभी इसी दूत ने द्वारपालिका को एक घूँसे में गिराया था, और रावण को उसके महल में सोता देख आया था। वह सोने, सेना या राजमहल से नहीं, नई तुलसी के कुछ पौधों से ख़ुश होता है। पूरे नगर में यही एक चीज़ उन्हें अपनी लगी।

पर लंका तो राक्षसों के समूह का घर है, यहाँ किसी सज्जन का बसेरा कहाँ? हनुमान मन में इसी तरह तर्क करने लगे, और उसी समय विभीषण जागे। शक बिलकुल वाजिब था। ऐसे नगर में चिह्न और बिरवे देखकर भरोसा कर लेना आसान नहीं, और दूत का काम भरोसा करना नहीं, जाँचना है।

तर्क का उत्तर तर्क से नहीं आया। जब वे मन में हिसाब लगा ही रहे थे, तभी उस घर में कोई जागा। वह ठीक उसी समय जागा। सन्देह और उत्तर के बीच कोई देर नहीं।

राम राम, और एक जागा हुआ आदमी

जो जागा, उसने आँख खुलते ही जो किया, वही इस भेंट की पूरी नींव है।

उन्होंने राम राम का स्मरण किया, और हनुमान ने उन्हें सज्जन जान लिया और मन में हर्षित हुए। उन्होंने सोचा कि इनसे हठ करके, यानी अपनी ओर से आगे बढ़कर, परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से काम की हानि नहीं होती। न वंश पूछा गया, न जाति, न पद। जागते ही मुँह से जो पहला शब्द निकला, उसी से आदमी पहचान लिया गया।

रात की लंका में सोने के महलों के बीच राम के आयुधों से अंकित एक घर के आगे नई तुलसी है। छोटा रूप धरे हनुमान दीवार पर बैठे देखते हैं, और भीतर जागे विभीषण राम राम का स्मरण करते हैं।

और यह लंका के बीचोंबीच हो रहा है। उस रात इस नगर में न जाने कितने लोग जागे होंगे, पर जिसकी नींद टूटते ही राम का नाम निकला, वह इसी घर में था। तुलसी ने विभीषण का परिचय न उनके भाई से दिया, न उनके पद से। उन्होंने उनका परिचय उनकी नींद से दिया।

हनुमान का निश्चय यह है: सामने वाला पूछे या न पूछे, पहल मैं करूँगा, क्योंकि साधु से काम बिगड़ता नहीं। गुप्तचर का नियम तो छिपे रहना है। यह दूसरी समझ है, कि जोखिम उठाने लायक़ जगह कौन-सी है।

ब्राह्मण का रूप, और विभीषण के दो प्रश्न

पहचान तय होने के बाद पहल हुई, और उसके साथ एक और रूप बदला गया।

ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान ने उन्हें पुकारा, और सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके उन्होंने कुशल पूछी और कहा: हे विप्र, अपनी कथा समझाकर कहिए। यह इस प्रसंग का तीसरा रूप है: पहला मच्छड़ का, दूसरा बहुत छोटा, और अब ब्राह्मण का। छिपने के लिये छोटा रूप, और बात करने के लिये वह रूप जिसके आगे राक्षसों के नगर में भी कोई हाथ जोड़ ले।

विभीषण का पहला काम प्रणाम है, फिर कुशल पूछना, फिर यह पूछना कि आप कौन हैं। जिस नगर में हर अजनबी शत्रु माना जाता है, वहाँ रात में घर आये अपरिचित को पहले प्रणाम किया जा रहा है। क्रम बताता है कि आदमी कैसा है।

क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं? मेरे हृदय में बहुत प्रीति उमड़ रही है। या कहीं आप दीनों से प्रेम करनेवाले स्वयं राम ही तो नहीं, जो मुझे बड़भागी बनाने आये हैं? दोनों प्रश्नों का प्रमाण एक ही है, हृदय की प्रीति। विभीषण ने सामने वाले को बाहर से नहीं जाँचा, अपने भीतर उठी लहर को प्रमाण माना।

और दूसरे प्रश्न की आस इस प्रसंग की सबसे मार्मिक बात है। राक्षसों के नगर में रहनेवाला एक आदमी, रात में द्वार पर आये अजनबी से पूछ रहा है कि कहीं आप ही तो नहीं आ गये। जो बहुत दिनों से किसी की राह देखता है, उसे हर दस्तक में उसी की आहट सुनायी देती है।

तब हनुमान ने राम की सारी कथा कही और अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गये, और राम के गुणों का स्मरण करके दोनों के मन मग्न हो गये। एक राक्षसों के कुल का है, एक वानरों का। एक इस नगर का निवासी है, एक उसका भेद लेने आया है। पर पुलक दोनों के शरीर में एक साथ उठी।

दाँतों के बीच बेचारी जीभ

अब विभीषण अपनी बात कहते हैं, और अपनी हालत का जो चित्र खींचते हैं, वह मानस की सबसे याद रह जानेवाली उपमाओं में है।

हे हनुमान, मेरी रहनी सुनिए: मैं यहाँ ऐसे रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ। हे तात, क्या राम कभी मुझे अनाथ जानकर मुझ पर कृपा करेंगे? जीभ हर पल दाँतों के बीच रहती है और फिर भी कटती नहीं, पर यह सुरक्षा नहीं, लगातार की सावधानी है।

जीभ दाँतों से लड़ती भी नहीं, और उन्हें छोड़कर भाग भी नहीं सकती। विभीषण की हालत यही है। वे लंका में हैं, लंका के ही हैं, पर लंका के साथ नहीं। इसलिये वे यह नहीं माँगते कि मुझे यहाँ से निकालिए। बस पूछते हैं कि क्या कभी उधर से नज़र पड़ेगी।

मेरा शरीर तामस है, मुझसे कोई साधन नहीं बनता, और मन में उनके चरणकमलों के लिये प्रीति भी नहीं। पर हे हनुमान, अब मुझे भरोसा हो गया, क्योंकि हरि की कृपा के बिना सन्त नहीं मिलते। जो आदमी अभी कह चुका था कि उसके हृदय में प्रीति उमड़ रही है, वही अब कहता है कि प्रीति नहीं है। जिनके पास यह चीज़ सचमुच होती है, वे इसे अपने खाते में नहीं गिनते।

और प्रमाण उन्होंने अपने भीतर से नहीं लिया: न अपनी भक्ति, न अपनी पुलक, न अपनी प्रतीक्षा। प्रमाण यह मुलाक़ात है जो अभी हो रही है। सन्त का मिल जाना ही सबूत है कि कृपा हो चुकी है।

राम की रीति, और एक अधम की गिनती

उत्तर में जो आता है वह दिलासा नहीं, एक और आदमी का अपने को नीचे रख देना है।

विभीषण कहते हैं: जब राम ने कृपा की है, तभी तो आपने हठ करके, अपनी ओर से, मुझे दर्शन दिये हैं। उत्तर में हनुमान कहते हैं: हे विभीषण, सुनिए, प्रभु की रीति यही है कि वे सेवक पर सदा प्रेम करते हैं। हठ शब्द यहाँ दूसरी बार आता है। पहले हनुमान ने मन में कहा था कि हठ करके परिचय करूँगा, और अब विभीषण उसी पहल को कृपा गिन रहे हैं।

भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? चंचल वानर हूँ, सब तरह से हीन। सुबह-सुबह जो हमारा नाम ले ले, उसे उस दिन भोजन न मिले। यह विभीषण के तामस शरीर वाली बात का जवाब है, और वह बहस से नहीं, अपने को और नीचे रखकर आया है। यह नहीं कहा गया कि ऐसा मत कहिए। कहा गया कि हमारा हाल तो और भी हल्का है।

और अपशकुन वाली यह बात तुलसी ने अपने ही नायक के मुँह में रखी है। जिसने समुद्र लाँघा है, वही कह रहा है कि सुबह हमारा नाम लेनेवाले को दिन भर भोजन न मिले। इतना नीचे उतरकर वही बोल सकता है जिसे अपनी जगह का ज़रा भी सन्देह न हो।

हे सखा, सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, फिर भी राम ने मुझ पर भी कृपा ही की है। यह कहते हुए, राम के गुणों का स्मरण करके, उनकी आँखों में जल भर आया। विभीषण ने हनुमान को तात कहा था, अब हनुमान उन्हें सखा कहते हैं। थोड़ी ही देर में सम्बोधन आदर से बराबरी पर आ गया।

और अन्त में शब्द नहीं, आँसू बचे। मुझ पर भी। इस छोटे से भी पर पूरा प्रसंग टिका है। जो अपने को अधम गिन रहा है वह शिकायत नहीं कर रहा, गिन रहा है कि कृपा कहाँ-कहाँ तक पहुँची। उस गिनती में अपना नाम पाकर उसकी आँखें भर आयी हैं।

बड़ाई नीचे रख देना

इस प्रसंग में दो घर हैं जिन पर कवि ठहरता है। एक रावण का महल, इतना विचित्र कि कहा नहीं जाता, जिसका स्वामी उस रात चैन से सो रहा है। दूसरा वह जिसकी दीवारों पर धनुष-बाण के चिह्न हैं और आँगन में नई तुलसी। हनुमान दोनों तक पहुँचे। पहले में उन्हें जो चाहिए था वह नहीं मिला, दूसरे में एक साथी मिल गया।

भीतर घुसने का यह तरीक़ा ताक़त का नहीं था। पहाड़ पर तय हुआ कि छोटे हो जाना है और रात की राह देखनी है। द्वार पर एक ही घूँसा चला, और वह भी तब जब रास्ता रोका गया। भीतर एक-एक घर धीरज से छाना गया, और जहाँ बात करनी थी वहाँ रूप बदल लिया गया। शक्ति पूरी साथ थी, पर उतनी ही बार निकली जितनी बार ज़रूरी थी।

हमारे अपने दिनों में भी अक्सर यही क्रम होता है। जो जगह हमें रोकती है वह प्रायः सबसे बाहरी होती है, द्वार वाली। जो सच हमें बदलता है वह प्रायः भीतर पहले से पड़ा रहता है और किसी धक्के पर याद आता है, जैसे लंकिनी को ब्रह्मा की बात। और जो साथी मिलता है वह प्रायः सबसे बड़े दरवाज़े पर नहीं, उस घर में मिलता है जिसे हम रास्ते में पड़ा समझकर छोड़ आते हैं।

सबसे सीखने लायक़ बात वह है जो इस प्रसंग में दो लोग एक साथ करते हैं। विभीषण अपने पास कुछ भी होने से इनकार करते हैं, और हनुमान अपने को उनसे भी हल्का बताते हैं। यह कहते-कहते राम के गुण याद करके उनकी आँखें भर आती हैं। जब दो लोग अपनी-अपनी बड़ाई नीचे रख देते हैं, तो बीच की ख़ाली जगह में एक तीसरे का नाम आ बैठता है। सोने के परकोटे के भीतर उस रात यह इसी एक घर में हो सका।

कथा का आधार गीता प्रेस, गोरखपुर के श्रीरामचरितमानस संस्करण का पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका है। सुन्दरकाण्ड, दोहा 3 से 7 तक।