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सेतु और सागर

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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 9

जो पानी तीन दिन तक चुप रहा, वह धनुष उठते ही सोने का थाल लेकर सामने आ खड़ा हुआ।

सामने पानी था, और पानी के आगे कुछ नहीं। इस तट पर करोड़ों की सेना बैठी थी, जिसके चलने से दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ उठे थे, और अब वह कुछ नहीं कर सकती थी। पर्वत उठा लेनेवाले हाथ किनारे पर बेकार पड़े थे, और लंका उस पार थी।

अभी-अभी विभीषण ने, जिन्हें राम लंका का राजा बना चुके हैं, एक सलाह दी थी, और वह लड़ाई की नहीं थी। उन्होंने कहा था कि आपका एक बाण करोड़ों समुद्र सोख सकता है। फिर भी नीति यही कहती है कि पहले समुद्र से विनय की जाये, क्योंकि वह आपके कुल का बड़ा है, और वही उपाय भी बतायेगा। यहीं से यह प्रसंग शुरू होता है। इसी में वह बात आयेगी जिसे आज लोग बिना प्रसंग जाने दोहराते हैं। वह तीन दिन की चुप्पी के बाद क्रोध में कही गयी थी।

पार उतरने से पहले

  • राम, जो पहले सिर नवाते हैं, फिर तीन दिन बैठते हैं, और उसके बाद धनुष उठाते हैं।
  • लक्ष्मण, जिन्हें दैव पर भरोसा नहीं, और जिनका कहा अन्त में सच निकलता है।
  • विभीषण, लंका के नये राजा, जिनकी दी हुई नीति से यह पूरा प्रसंग चलता है।
  • सुग्रीव, वानरों के राजा, जो शत्रु के दूतों के लिये सबसे कठोर दण्ड सुनाते हैं।
  • शुक, रावण का दूत, जो कपट के वेष में आया था और मुनि का रूप पाकर लौटा।
  • रावण, जो हर सच सुनकर पहले हँसता है और फिर लात मारता है।
  • समुद्र, इस कथा का वह पात्र जो तब तक कुछ नहीं बोलता, जब तक उसके भीतर आग नहीं उठती।
  • नल और नील, दो वानर भाई, जिन्हें लड़कपन में मिला ऋषि का एक आशीर्वाद अब काम आयेगा।
  • शिव और पार्वती, तथा काकभुशुण्डि और गरुड़, वे दो जोड़ियाँ जिनके बीच यह कथा कही जा रही है। वे बीच-बीच में अपनी बात जोड़ जाती हैं।
  • तुलसीदास, जो काण्ड के अन्त में अपना नाम लिखते हैं। वे अपने ही मन को वही शब्द कहते हैं जो पत्र में रावण के लिये लिखा गया था।

एक सलाह, और एक असहमति

विभीषण की उस नीति का अन्तिम वाक्य यही है, और यहीं से प्रसंग अपना पहला क़दम रखता है।

हे प्रभु, समुद्र आपके कुल के गुरु हैं, वे विचार करके उपाय बता देंगे। तब रीछों और वानरों की सारी सेना बिना परिश्रम के समुद्र पार कर जायेगी। विभीषण ने समुद्र को बाधा नहीं, कुल का बड़ा कहा, और आगे का सारा रास्ता इसी सम्बोधन से निकलेगा।

राम ने विभीषण की बात मान ली। जिस ढंग से मानी उसमें उनका स्वभाव खुल जाता है: न तर्क, न सुधार, बस सखा कहकर स्वीकार। पर तुरन्त पता चल जाता है कि इस स्वीकार से सब प्रसन्न नहीं थे।

हे सखा, आपने अच्छा उपाय बताया, यही किया जाये, यदि दैव सहायक हो। यह सलाह लक्ष्मण के मन को अच्छी नहीं लगी, और राम के ये वचन सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। दुख किस बात से हुआ? उस एक शब्द से जो राम ने अपनी ओर से जोड़ा था: दैव।

लक्ष्मण ने अपनी बात छिपायी नहीं, और उनका उत्तर मानस की सबसे तेज़ बातों में है।

हे नाथ, दैव का कैसा भरोसा! मन में क्रोध लाइये और समुद्र को सुखा डालिये। दैव तो कायर के मन का सहारा भर है, दैव-दैव तो आलसी पुकारा करते हैं। आगे उनका कहा आधा सच निकलेगा। समुद्र सूखने के डर से ही मानेगा, पर उससे पहले राम तीन दिन बैठेंगे भी।

राम ने इस पर बहस नहीं की। पहले हँस दिये, और हँसकर जो कहा वह न सहमति है न असहमति।

यह सुनकर राम हँसकर बोले कि ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखिये। यानी करेंगे वही जो लक्ष्मण कहते हैं, पर अभी नहीं, पहले वह जो नीति कहती है। छोटे भाई को इस तरह समझाकर राम समुद्र के पास गये।

कुश बिछाकर, समुद्र के सामने

अब वह दृश्य आता है जिस पर इस काण्ड का अन्त टिका है, और तुलसीदास उसे बहुत थोड़े में कह देते हैं। न घोषणा, न ललकार। जो सारे संसार के स्वामी हैं, वे पानी के सामने जाकर पहले सिर झुकाते हैं।

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गये। और फिर कथा अचानक दूसरी जगह चली जाती है। जिस घड़ी विभीषण राम के पास आये थे, उसी घड़ी रावण ने उनके पीछे दूत भेज दिये थे।

कुश बिछाकर बैठना प्रार्थना और प्रतीक्षा का आसन है। इसे याद रखियेगा, क्योंकि तीन दिन बाद जो क्रोध आयेगा, उसका सारा वज़न इसी आसन से आता है।

कपट के वेष में आये हुए दूत

रावण के भेजे दूत वानर का शरीर धरकर शिविर में घुस आये थे। वे सब कुछ देखने आये थे, और उन्होंने सब देखा भी, पर नतीजा वह नहीं निकला जो भेजनेवाले ने सोचा था।

कपट से वानर का शरीर धरकर उन्होंने सारी लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदय में राम के गुणों की और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे।

फिर वे खुलकर, बड़े प्रेम से, राम के स्वभाव की बड़ाई करने लगे, और अपना छिपाव ही भूल गये। वानरों ने तभी पहचान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं, और सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आये।

सुग्रीव का फ़ैसला तुरन्त और कठोर आया: वानरो, सुनिये, इन राक्षसों के अंग-भंग करके इन्हें भेज दीजिये। वानर दौड़े, दूतों को बाँधकर सारी सेना के चारों ओर घुमाया, और फिर मारना शुरू किया।

वानर उन्हें तरह-तरह से मारने लगे, वे दीन होकर पुकारते रहे, फिर भी किसी ने नहीं छोड़ा। तब दूतों ने वह बात कही जो इस प्रसंग की धुरी है: जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे राम की सौगंध है। रावण के भेजे जासूस, मार खाते हुए, अपनी जान बचाने के लिये उसी के नाम की दुहाई देते हैं जिसके विरुद्ध भेजे गये थे। और वह नाम काम कर जाता है।

यह सुनकर लक्ष्मण ने सबको पास बुलाया। जिन्होंने अभी समुद्र सुखा देने की बात कही थी, उन्हें इन बँधे राक्षसों पर दया आ गयी, और उन्होंने हँसकर उन्हें तुरन्त छुड़ा दिया।

लक्ष्मण की पाती

छोड़ते समय लक्ष्मण ने उनके हाथ एक पत्र दिया, और साथ में एक ज़बानी सन्देश भी: रावण के हाथ में यह पाती दीजिये। और कहियेगा कि हे कुलघातक, लक्ष्मण का लिखा पढ़ लीजिये। फिर वह सन्देश, जिसमें पूरी कूटनीति थोड़े में आ जाती है।

उस मूर्ख से मुँहज़बानी मेरा यह उदार सन्देश कहियेगा कि सीता को लौटाकर राम से मिल जाइये, नहीं तो समझ लीजिये कि आपका काल आ गया। पोद्दार की टीका उदार का अर्थ कृपा से भरा हुआ बताती है। सुनने में यह धमकी है, भीतर से निमन्त्रण: सीता लौटा दीजिये और मिल लीजिये, इतना ही कहा गया है। जिसने अपने भाई को लात मारकर निकाला था, उसे भी मिलने का न्योता है।

दूत लक्ष्मण के चरणों में सिर नवाकर चले, और रास्ते भर जिनके गुण गाते गये वे उनके स्वामी नहीं थे। राम का यश कहते हुए वे लंका पहुँचे, और वहाँ रावण के चरणों में सिर नवाया।

लंका की सभा, और पहला प्रश्न

रावण ने दूतों को देखकर बात हँसी से शुरू की। यह हँसी अब तक उसकी पहचान बन चुकी है। वह हर सच के आगे पहले हँसता है।

रावण ने हँसकर शुक से पूछा कि वह अपनी कुशल क्यों नहीं कहता। फिर उसने उस विभीषण का समाचार माँगा जिसकी मृत्यु बहुत पास आ गयी है। दूत की कुशल के बाद अगला प्रश्न शत्रु के बारे में नहीं, अपने भाई के बारे में है।

वह मूर्ख राज करते-करते लंका छोड़ गया, अब वह अभागा जौ के साथ पिसनेवाला घुन बनेगा। फिर वह सेना की बात पर आता है, और वह भी ताने की तरह: रीछों और वानरों की वह सेना, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आयी है। और फिर वह वाक्य जो आगे उसी पर लौटेगा।

जिनके जीवन का रखवाला वह कोमल मनवाला बेचारा समुद्र बन गया है। पोद्दार की टीका खोलती है कि बीच में समुद्र न होता तो राक्षस उन्हें अब तक मारकर खा गये होते। यानी रावण उसी पानी का मज़ाक़ उड़ा रहा है जो इस कथा का अगला पात्र है। और उसी साँस में वह शुक से उन तपस्वियों की बात भी पूछता है, जिनके हृदय में उसका बहुत डर है।

क्या उनसे भेंट हुई, या वे कानों से मेरा यश सुनकर ही लौट गये? शत्रु की सेना का तेज और बल क्यों नहीं बताया जाता? और फिर रावण ख़ुद ही जोड़ देता है कि दूत का मन बहुत चकित दिख रहा है। उसने दूत के चेहरे पर वह देख लिया है जिसका नाम वह लेना नहीं चाहता।

दूत का उत्तर, और वह सेना

शुक ने उत्तर से पहले एक नम्र विनती रखी: हे नाथ, जैसे आपने कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात मान लीजिये। कहनेवाला जानता है कि सुननेवाला बीच में भड़क जायेगा।

फिर उसने पहली ख़बर वही दी जो रावण सबसे कम सुनना चाहता था: आपका छोटा भाई जाकर मिला, तो पहुँचते ही राम ने उसका राजतिलक कर दिया। जिसे यहाँ लात मारकर निकाला गया, उसे वहाँ पहुँचते ही लंका का राज मिल गया। फिर उसने अपनी बीती सुनायी: हम रावण के दूत हैं, यह सुनते ही वानरों ने बाँधकर बहुत कष्ट दिये। वे नाक-कान काटने लगे, और राम की शपथ दिलाने पर ही छोड़ा।

और तब वह सेना का वर्णन शुरू करता है, जो मानस की सबसे जोशीली सूचियों में है। उसकी ख़ूबी यह है कि वह शत्रु के मुँह से निकल रही है।

हे नाथ, आपने राम की सेना के बारे में पूछा, सो वह तो सौ करोड़ मुखों से भी बखानी नहीं जा सकती। अनेक रंगों के रीछ और वानर, भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले, डरावने। जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र को मारा, उसका बल तो सब वानरों में थोड़ा है।

फिर वह नाम गिनाता है।

द्विविद, मयन्द, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्, ये सब बल की राशि हैं। इनमें दो नाम याद रखियेगा, नील और नल, क्योंकि इसी काण्ड के अन्त में समुद्र इन्हीं का नाम लेगा, और पूरी सेना का पार उतरना इन्हीं दो पर टिकेगा।

और फिर वह संख्या आती है जिसके आगे रावण का कोई हिसाब नहीं चलता: ये सब वानर बल में सुग्रीव के बराबर हैं। और इनके जैसे करोड़ों हैं, उन्हें कौन गिने। राम की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है, और वे तीनों लोकों को तिनके के बराबर समझते हैं।

हे रावण, मैंने कानों से सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। और हे नाथ, उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं जो आपको रण में न जीत सके।

वानरों की बेचैनी का चित्र भी वह रखता है: सब बहुत क्रोध से हाथ मीजते हैं, पर राम आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं कि मछलियों और साँपों समेत समुद्र को सोख लेंगे, नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ों से उसे पाट देंगे, और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे। सब स्वभाव से निडर हैं, ऐसे गरजते-डपटते हैं मानो लंका को निगल जाना चाहते हों।

सब वानर और रीछ स्वभाव से शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर ख़ुद राम हैं। हे रावण, वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं।

राम का बल, और रावण की हँसी

अब दूत सेना से हटकर उस पर आता है जिसके सिर पर वह सेना खड़ी है। यहीं इस प्रसंग का असली विषय फिर सामने आता है: समुद्र।

राम के तेज, बल और बुद्धि को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्र सोख सकते हैं, फिर भी नीति में निपुण होकर उन्होंने आपके भाई से उपाय पूछा। दूत यह नहीं कह रहा कि राम समुद्र पार नहीं कर सकते, यह कह रहा है कि कर सकते हैं और कर नहीं रहे। विभीषण की बात सुनकर वे समुद्र से राह माँग रहे हैं, क्योंकि उनके मन में कृपा है।

यह सुनते ही रावण ख़ूब हँसा। उसने वही समझा जो वह समझ सकता था: जब ऐसी ही बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है।

स्वभाव से डरपोक विभीषण की बात को प्रमाण मानकर उन्होंने समुद्र से बालहठ ठान रखा है। फिर वह दूत को मूर्ख कहकर डाँटता है कि झूठी बड़ाई क्यों करता है, उसने शत्रु के बल और बुद्धि की थाह पा ली है। और फिर वह मज़ेदार बात: जिसका मन्त्री विभीषण जैसा डरपोक हो, उसे जगत में विजय और ऐश्वर्य कहाँ।

दुष्ट के ये वचन सुनकर दूत को क्रोध आ गया। मौक़ा समझकर उसने पत्र निकाल लिया: राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पाती दी है, हे नाथ, इसे पढ़वाकर छाती ठंडी कर लीजिये। रावण ने हँसकर उसे बायें हाथ से लिया, मन्त्री को बुलवाया, और वह मूर्ख उसे पढ़वाने लगा।

पत्रिका बाँची जाती है

पत्र छोटा है। उसमें न सेना का हिसाब है, न कोई शर्त, केवल एक चेतावनी और एक विकल्प।

अरे मूर्ख, केवल बातों से मन बहलाकर अपने कुल को नष्ट मत कीजिये। राम से विरोध करके विष्णु, ब्रह्मा और शिव की शरण में जाने पर भी बचाव नहीं होगा। फिर लक्ष्मण दो रास्ते रखते हैं: या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई की तरह राम के चरणकमलों के भौंरे बन जाइये। या राम के बाणों की आग में परिवार समेत पतंगा हो जाइये। दोनों में कुछ जलता है, अभिमान या कुल, और चुनाव रावण का है।

पत्र सुनते ही रावण मन में डर गया। पर मुँह से मुस्कराता हुआ सबको सुनाकर कहने लगा। जैसे ज़मीन पर पड़ा कोई हाथ से आकाश पकड़ने की कोशिश करे, वैसे ही यह छोटा तपस्वी बातें बना रहा है। मन और मुख, इन दो शब्दों के फ़ासले में तुलसीदास ने रावण का पूरा चरित्र रख दिया है। भीतर डर बैठ चुका है, बाहर मुस्कान है, और वह भी सबको सुनाकर।

शुक की विनती, और वह लात

यहाँ एक अनपेक्षित मोड़ आता है। जो जासूसी करने भेजा गया था, वही भरी सभा में अपने स्वामी को समझाने लगता है।

शुक ने कहा: हे नाथ, अभिमानी स्वभाव छोड़कर इस पत्र की सब बातों को सच मानिये, क्रोध छोड़कर मेरी बात सुनिये, और राम से वैर त्याग दीजिये। वह डराता नहीं, सेना का हिसाब दुबारा नहीं खोलता, उस पर हाथ रखता है जो उसने अपनी आँखों से देखा है: राम का स्वभाव।

यद्यपि राम सारे लोकों के स्वामी हैं, फिर भी उनका स्वभाव बहुत कोमल है। मिलते ही वे आप पर कृपा करेंगे, और आपका एक भी अपराध मन में नहीं रखेंगे। यही बात हनुमान रावण से कह चुके थे, और यही कहते-कहते विभीषण निकाले गये थे। तीन लोग, एक ही वाक्य, और अब वह उसके मुँह से आ रहा है जिसे रावण ने ख़ुद भेजा था।

सीता राम को दे दीजिये, हे प्रभु, मेरा इतना कहा मान लीजिये। और जैसे ही उसने सीता को लौटाने की बात कही, उस दुष्ट ने उसे लात मार दी। यही दृश्य इसी सभा में विभीषण के साथ घट चुका है। भाई को भी इसी बात पर लात पड़ी थी, और अब दूत को भी।

और इसके बाद भी वही हुआ जो विभीषण के साथ हुआ था। चरणों में सिर नवाकर शुक वहाँ चला जहाँ राम थे। प्रणाम करके उसने अपनी सारी कथा सुनायी, और राम की कृपा से अपना असली रूप पा लिया।

शिव पार्वती से कहते हैं कि वह ज्ञानी मुनि था, जो अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार राम के चरणों की वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रम चला गया। यह छोटी सी बात पूरे प्रसंग को उलट देती है। रावण ने जासूस भेजा, और एक मुनि की मुक्ति करवा दी। इस कथा में उसका हर दाँव उसी के विरुद्ध पड़ता है।

तीन दिन, और वह बात

अब कथा उसी किनारे पर लौटती है जहाँ हमने उसे छोड़ा था। वहाँ कुछ नहीं बदला: कुश बिछा है, राम बैठे हैं, और पानी वैसा ही है।

तीन दिन बीत गये। इन तीन दिनों में इस पार एक आदमी चुपचाप बैठा रहा, और जो शक्ति में सबसे बड़ा था, वही प्रतीक्षा में सबसे धीर निकला।

जड़ समुद्र विनय नहीं मानता, और तीन दिन बीत गये। तब राम क्रोध से बोले कि भय के बिना प्रीति नहीं होती। कहनेवाला वह है जिसने पहले सिर झुकाया, कुश बिछाया और तीन दिन प्रतीक्षा की। और यह क्रोध में कहा गया है, यह तुलसी ने ख़ुद लिखा है।

हे लक्ष्मण, धनुष-बाण लाइये, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। फिर वह सूची शुरू होती है जिसमें व्यर्थ जानेवाली बातें गिनायी गयी हैं: मूर्ख से विनय, कुटिल से प्रीति, स्वभाव से कंजूस को उदारता का उपदेश।

ममता में फँसे से ज्ञान की कथा, बहुत लोभी से वैराग्य की बात, क्रोधी से शान्ति की बात, और कामी से भगवान की कथा। इन सबका वही फल होता है जो ऊसर ज़मीन में बीज बोने का। यह वही बात है जो लक्ष्मण ने समुद्र के पास जाने से पहले कही थी, अब राम के मुँह से। तुलसीदास चुपचाप दर्ज कर देते हैं कि यह मत लक्ष्मण के मन को बहुत अच्छा लगा।

बाण, और समुद्र का आना

धनुष चढ़ा, और उसके बाद सब बहुत जल्दी हुआ। मानस की गति यहाँ अचानक तेज़ हो जाती है, जैसे तीन दिन की चुप्पी का हिसाब चुकाया जा रहा हो।

यह कहकर राम ने धनुष चढ़ाया, और वह भयानक बाण साधा, जिससे समुद्र के हृदय के भीतर आग की ज्वाला उठी। बाण छूटा नहीं, केवल साधा गया है, और आग भीतर उठ चुकी है। समुद्र को मानने के लिये मारना नहीं पड़ा, इरादा दिख जाना काफ़ी था। मगर, साँप और मछलियों के झुंड व्याकुल हो उठे। जब समुद्र ने जाना कि उसके भीतर के जीव जल रहे हैं, तब वह ख़ुद सामने आया।

सोने के थाल में तरह-तरह की मणियाँ भरकर, अभिमान छोड़कर, वह ब्राह्मण के रूप में आया। समुद्र तब आया जब उसने अपने भीतर रहनेवालों को जलते जाना। जड़ कहा गया यह पानी भी तब हिला जब उसके आश्रित तड़पे।

और यहीं तुलसीदास कथा रोककर एक बात अलग से रखते हैं, राम के मुँह से नहीं, काकभुशुण्डि के मुँह से, जो गरुड़ से कहते हैं।

हे गरुड़, सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, डाँटने पर ही झुकता है। केले के लिये काटना नष्ट करना नहीं, उसके फलने की विधि है, और समुद्र भी नष्ट नहीं हुआ, इसके बाद वह कथा का सहायक बनेगा।

सागर की क्षमा-याचना

समुद्र ने डरकर राम के चरण पकड़ लिये और कहा: हे नाथ, मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिये। और जो सफ़ाई उसने दी, वह सफ़ाई से ज़्यादा एक सिद्धान्त है: हे नाथ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।

आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थ यही कहते हैं। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी तरह रहने में सुख पाता है। समुद्र कह रहा है कि उसका न हिलना अवज्ञा नहीं, उसका स्वभाव है, और वह स्वभाव भी राम का ही बनाया है।

प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, पर मर्यादा भी आपकी ही बनायी हुई है, जिसे पोद्दार जीवों का स्वभाव कहते हैं। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं। पोद्दार की टीका यहाँ ताड़ना का अर्थ शिक्षा करती है, कि ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं। समुद्र यह अपने बचाव में कह रहा है, और यह एक पात्र के मुँह की दलील है, कथा की अपनी घोषणा नहीं।

प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी, पर इसमें मेरी मर्यादा नहीं रहेगी। फिर भी प्रभु की आज्ञा टाली नहीं जा सकती, ऐसा वेद कहते हैं, इसलिये आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरन्त वही करूँ। वह मना नहीं कर रहा, और राम ने इसी वाक्य को पकड़ लिया।

उपाय, और नल-नील

अब उत्तर आता है, और वह क्रोध का नहीं। तीन दिन की प्रतीक्षा, एक चढ़ा हुआ धनुष और एक जलता हुआ समुद्र, इन सबके बाद राम मुस्कराते हैं।

समुद्र के बहुत विनीत वचन सुनकर राम ने मुस्कराकर कहा: हे तात, जिस तरह वानरों की सेना पार उतर जाये, वही उपाय बताइये। तात, यानी जिसे अभी बाण से सुखाया जा रहा था, उसे अब अपनेपन का सम्बोधन मिल रहा है। प्रश्न भी वही है जो विभीषण से पूछा गया था: पार कैसे उतरें।

हे नाथ, नील और नल दो वानर भाई हैं, जिन्होंने लड़कपन में एक ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके छू देने भर से भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जायेंगे। ये वही दो नाम हैं जो दूत की गिनायी सूची में दबे पड़े थे।

समुद्र ने आगे कहा कि मैं भी आपकी प्रभुता हृदय में रखकर, अपने बल के अनुसार, सहायता करूँगा। हे नाथ, इसी तरह समुद्र को बँधवा लीजिये, जिससे तीनों लोकों में आपका यश गाया जाये। जो अभी बाधा था, वह अब अपना बँधना ख़ुद माँग रहा है।

और फिर उसने एक बात और कही, जो बहुत कम लोगों को याद रहती है। इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहनेवाले उन दुष्ट मनुष्यों को मारिये जो पाप की राशि हैं। रणधीर राम ने समुद्र के मन की यह पीड़ा सुनकर उसे तुरन्त हर लिया। बाण व्यर्थ नहीं गया, उसका निशाना समुद्र ने ख़ुद चुना। राम का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित और सुखी हुआ। उसने उन दुष्टों का सारा हाल राम को कह सुनाया, और चरणों की वन्दना करके चला गया।

काण्ड का अन्त, और तुलसी की अपनी बात

समुद्र अपने घर चला गया, और राम को उसकी सलाह अच्छी लगी। इसके बाद तुलसीदास कथा से बाहर आते हैं और काण्ड का अन्त अपने हाथ में ले लेते हैं। अब जो आता है वह वर्णन नहीं, हस्ताक्षर है।

समुद्र अपने भवन को गया, राम को यह सलाह अच्छी लगी। यह चरित कलियुग का मैल हरनेवाला है, और इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। राम के गुण सुख के धाम हैं, सन्देह को शान्त करते हैं, विषाद को मिटाते हैं। और अपने मूर्ख मन से वे कहते हैं कि सारी आशा और भरोसा छोड़कर इन्हें सदा गाये और सुने।

इस अन्तिम बात पर रुकिये। जिस शब्द से लक्ष्मण की पाती रावण को पुकारती थी, मूर्ख, ठीक वही शब्द तुलसीदास काण्ड के अन्त में अपने ही मन के लिये लिखते हैं।

राम का गुणगान सब मंगलों को देनेवाला है। जो इसे आदर से सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज़ के भवसागर पार कर जायेंगे। इस पार का समुद्र सेतु से पार होगा, भवसागर सुनने भर से।

इसके बाद गीताप्रेस का पाठ मासपारायण के चौबीसवें विश्राम की सूचना देता है। फिर वह घोषणा आती है जो हर काण्ड के अन्त में आती है, कि कलियुग के सब पापों का नाश करनेवाले रामचरितमानस का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ। सुन्दरकाण्ड यहीं पूरा होता है।

सेतु इस काण्ड में बनता नहीं। यहाँ इतना ही तय होता है कि वह बनेगा, और बनानेवाले दो नाम भी सामने आ चुके हैं। पत्थरों का तैरना, पुल का बँधना और सेना का उस पार उतरना, यह सब आगे के सोपान की कथा है। जो काण्ड एक वानर की समुद्र-छलाँग से खुला था, वह उसी समुद्र के मान जाने पर बन्द होता है।

मिटाना या रास्ता बनाना

इस काण्ड से लोग जो बात सबसे ज़्यादा दोहराते हैं, वह यहीं है: भय के बिना प्रीति नहीं होती। पर वह किसी घर या सम्बन्ध के लिये नहीं, एक जड़ समुद्र के बारे में कही गयी है। कहनेवाला वह है जो पहले प्रणाम कर चुका, कुश बिछा चुका, और तीन दिन बैठ चुका है। तुलसी ने साथ में यह भी लिख दिया है कि राम क्रोध में थे, ताकि हम न भूलें कि यह उपदेश नहीं, क्रोध की घड़ी है। और नियम वाली बात उन्होंने काकभुशुण्डि के मुँह से गरुड़ को सुनवायी, केले के उदाहरण के साथ।

दूसरी बात समुद्र की है, और वही इस प्रसंग की सबसे काम की बात है। उसने न अपनी मर्यादा गिरवी रखी, न आज्ञा ठुकरायी, और उसी विनीत वाक्य को सुनकर राम ने मुस्कराकर उपाय पूछा। राम ने समुद्र को सुखाया नहीं, उस पर पुल बँधवाने का रास्ता चुना। शक्ति के पास हमेशा दो रास्ते होते हैं, बाधा को मिटा देना या बाधा को रास्ता बना लेना। यह कथा साफ़ बताती है कि इनमें कौन सा बड़ा है।

तीसरी बात उन दूतों की है जो कपट का वेष पहनकर आये थे। वे जासूसी करने आये और सराहना करने लगे, बाँधे गये और राम की सौगंध देकर छूटे, पत्र लेकर लौटे। और उनमें से एक भरी सभा में वही बात कह बैठा जो लक्ष्मण ने ज़बानी कहलवायी थी। उसे लात पड़ी, और लात खाकर वह सीधा वहीं गया जहाँ से पत्र आया था, और वहाँ उसका शाप भी कट गया। रावण ने अपने हाथ से भेजा, अपने पैर से मारा, और इस तरह एक मुनि को मुक्त करवा दिया। और जिन तीन दिनों में सामने का पानी कुछ नहीं बोला, वे भी व्यर्थ नहीं गये। उन्हीं के बाद वह उपाय मिला जिससे सेना पार उतरेगी।

पाठ का आधार: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 50 से 60, तथा उसी संस्करण में हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका। यह प्रसंग पाँचवें सोपान की समाप्ति पर ही छोड़ा गया है।