Lulla Family

सेतु और सागर

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · सेतु और सागर

सेतु और सागर

जो पानी तीन दिन तक चुप रहा, वह धनुष उठते ही सोने का थाल लेकर सामने आ खड़ा हुआ।

सामने पानी था और पानी के आगे कुछ नहीं था। जहाँ तक आँख जाती थी वहाँ तक वही एक रंग, वही एक आवाज़, और उस आवाज़ में न कोई उत्तर था न कोई इनकार। इस तट पर करोड़ों की सेना बैठी थी, जिसके चलने से दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ उठे थे, और वह सेना अब कुछ नहीं कर सकती थी। पर्वत उठा लेने वाले हाथ किनारे पर बेकार पड़े थे। लंका उस पार जगमगा रही थी, इतनी पास कि दिखती थी, इतनी दूर कि पहुँची नहीं जा सकती थी।

अभी-अभी लंकापति विभीषण ने एक सलाह दी थी, और वह सलाह लड़ाई की नहीं थी। उन्होंने कहा था कि आपका एक बाण करोड़ों समुद्र सोख सकता है, फिर भी नीति यही कहती है कि पहले सागर से विनय की जाय, क्योंकि वह आपके कुल का ही बड़ा-बूढ़ा है और वही उपाय भी बतायेगा। यहीं से यह प्रसंग शुरू होता है। और इसी प्रसंग में वह पंक्ति आयेगी जिसे आज लोग बिना प्रसंग जाने दोहराते हैं, वह पंक्ति जो एक सोये हुए समुद्र के सामने, तीन दिन की चुप्पी के बाद, क्रोध में कही गयी थी।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम, जो पहले सिर नवाते हैं, फिर तीन दिन बैठते हैं, और उसके बाद धनुष उठाते हैं।
  • लक्ष्मण, जिन्हें दैव पर भरोसा नहीं है, और जिनका कहा हुआ अन्त में सच निकलता है।
  • विभीषण, लंकापति, जिनकी दी हुई नीति से यह पूरा प्रसंग चलता है।
  • सुग्रीव, वानरराज, जो शत्रु के दूतों के लिये सबसे कठोर दण्ड सुनाते हैं।
  • शुक, रावण का दूत, जो कपट के वेष में आया था और मुनि का रूप पाकर लौटा।
  • रावण, दशानन, जो हर सच सुनकर पहले हँसता है और फिर लात मारता है।
  • समुद्र, इस कथा का वह पात्र जो बोलता कुछ नहीं, जब तक उसके भीतर आग नहीं उठती।
  • नल और नील, दो वानर भाई, जिन्हें लड़कपन में मिला एक शाप-जैसा आशीर्वाद अब काम आयेगा।
  • शिवजी और भवानी, तथा काकभुशुण्डि और गरुड़, वे दो जोड़ियाँ जिनके बीच यह कथा कही जा रही है, और जो बीच-बीच में अपनी टिप्पणी जोड़ जाती हैं।
  • तुलसीदास, जो काण्ड के अन्त में अपना नाम लिखते हैं, और अपने ही मन को वही गाली देते हैं जो पत्र में रावण को दी गयी थी।

एक सलाह, और एक असहमति

विभीषणजी की उस नीति का अन्तिम वाक्य यही दोहा है, और यहीं से यह प्रसंग अपना पहला क़दम रखता है।

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ ५०॥

दोहा ५०

हे प्रभु, समुद्र आपके कुल के गुरु हैं, वे विचार करके उपाय बता देंगे, और तब भालुओं तथा वानरों की सारी सेना बिना परिश्रम के ही समुद्र पार कर जायेगी। ध्यान दीजिये कि विभीषणजी ने बल का प्रश्न उठाया ही नहीं। उन्होंने समुद्र को बाधा नहीं कहा, कुल का बड़ा कहा, और आगे का सारा रास्ता इसी एक सम्बोधन से निकलने वाला है।

विभीषण की बात सुनकर श्रीराम ने उसे मान लिया, और जिस तरह मानी उसमें उनका पूरा स्वभाव खुल जाता है। उन्होंने तर्क नहीं किया, सुधार नहीं किया, केवल सखा कहकर बात स्वीकार कर ली। पर उसी चौपाई का दूसरा आधा तुरन्त बता देता है कि सब लोग इस स्वीकार से प्रसन्न नहीं थे।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई । करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

चौपाई

हे सखा, आपने अच्छा उपाय बताया, यही किया जाय, यदि दैव सहायक हो। यह सलाह लक्ष्मणजी के मन को अच्छी नहीं लगी, और श्रीराम के ये वचन सुनकर उन्होंने बहुत दुःख पाया। ध्यान दीजिये कि दुःख किस बात से हुआ। विभीषण की सलाह से नहीं, बल्कि उस एक शब्द से जो श्रीराम ने अपनी ओर से जोड़ा था, दैव। जिस भाई ने अभी-अभी सारी सेना को समुद्र तक पहुँचते देखा है, उसे यह सुनना कठिन लग रहा है कि अब आगे की बात दैव के भरोसे है।

और लक्ष्मणजी ने अपनी बात छिपायी नहीं। उनका उत्तर मानस की सबसे तेज़ पंक्तियों में से है, और वह पंक्ति किसी शास्त्रार्थ से नहीं, एक जवान आदमी की खीझ से निकली है।

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा॥

चौपाई २

हे नाथ, दैव का कौन सा भरोसा! मन में क्रोध लाइये और समुद्र को सुखा डालिये। यह दैव तो कायर के मन का एक सहारा भर है, और दैव दैव तो आलसी लोग ही पुकारा करते हैं। यह बहुत बड़ी बात है, और तुलसीदासजी ने इसे किसी विरोधी के मुँह में नहीं रखा। यह राम के अपने भाई कह रहे हैं, और अगले ही क्षण उनका कहा हुआ आधा-आधा सच निकलेगा। समुद्र सचमुच सूखने के डर से ही मानेगा, पर उसे मनाने से पहले राम तीन दिन बैठेंगे भी।

श्रीराम ने इस पर बहस नहीं की। उन्होंने पहले हँस दिया, और हँसकर जो कहा वह न सहमति है न असहमति।

यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले कि ऐसे ही करेंगे, मन में धीरज रखिये। कीजिये वही जो आप कहते हैं, पर अभी नहीं, और पहले वह जो नीति कहती है। छोटे भाई को इस तरह समझाकर प्रभु समुद्र के समीप गये।

सार: विभीषण ने कहा था कि समुद्र से विनय की जाय। श्रीराम ने यह मान लिया और साथ में दैव का नाम ले लिया। लक्ष्मणजी को यही खटका, उन्होंने कहा कि दैव आलसियों का बहाना है और समुद्र को सुखा दीजिये। श्रीराम ने हँसकर उन्हें धीरज बँधाया और कहा कि ऐसा ही होगा।

कुश बिछाकर, समुद्र के सामने

अब वह दृश्य आता है जिस पर इस पूरे काण्ड का अन्त टिका हुआ है, और तुलसीदासजी उसे दो पंक्तियों में निपटा देते हैं। कोई घोषणा नहीं, कोई ललकार नहीं। जो सारे संसार के स्वामी हैं, वे पानी के सामने जाकर पहले सिर झुकाते हैं।

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई । बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

चौपाई ४

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गये। और उसी चौपाई का दूसरा आधा हमें अचानक दूसरी जगह ले जाता है। जिस घड़ी विभीषणजी प्रभु के पास आये थे, उसी घड़ी रावण ने उनके पीछे दूत भेज दिये थे। यानी जिस समय यहाँ प्रणाम हो रहा है, उसी समय शिविर में अजनबी घूम रहे हैं। तुलसी की कथा में दो चीज़ें अक्सर एक ही साँस में चलती हैं, एक तपस्या और एक चाल।

कुश बिछाकर बैठना कोई साधारण बात नहीं है। यह उपवास का, प्रार्थना का और प्रतीक्षा का आसन है। राम ने समुद्र से केवल माँगा नहीं, उन्होंने माँगने का विधिवत् व्रत लिया। इस बात को याद रखियेगा, क्योंकि तीन दिन बाद जो क्रोध आयेगा उसका सारा वज़न इसी आसन से आता है।

कपट के वेष में आये हुए दूत

रावण के भेजे हुए दूत वानर का शरीर धारण करके शिविर में घुस आये थे। वे सब कुछ देखने आये थे, और उन्होंने सब कुछ देख भी लिया। पर देखने का नतीजा वह नहीं निकला जो भेजने वाले ने सोचा था।

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१॥

दोहा ५१

कपट से वानर का शरीर धारण करके उन्होंने सारी लीलाएँ देखीं, और अपने हृदय में वे प्रभु के गुणों की तथा शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे। जासूस का काम है देखकर चुप रहना। यहाँ देखना ही उनसे छूट गया और सराहना शुरू हो गयी। और सराहना भीतर तक रह भी न सकी।

अगली ही चौपाई में तुलसीदासजी एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं। वे प्रकट रूप में भी, अत्यन्त प्रेम के साथ, श्रीराम के स्वभाव की बड़ाई करने लगे, और उन्हें अपना दुराव भूल ही गया। कपट कोई ओढ़ा हुआ कपड़ा है, प्रेम भीतर से आता है, और भीतर वाला ऊपर वाले को गिरा देता है। वानरों ने तभी पहचान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं, और सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आये।

सुग्रीव का फ़ैसला तुरन्त आया और कठोर आया। वानरो, सुनिये, इन राक्षसों के अंग-भंग करके भेज दीजिये। वानर दौड़े, दूतों को बाँधकर सारी सेना के चारों ओर घुमाया, और फिर मारना शुरू किया।

बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥

चौपाई ३

वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे, वे दीन होकर पुकारते रहे, फिर भी किसी ने नहीं छोड़ा। तब दूतों ने वह बात कही जो इस पूरे प्रसंग की धुरी है। जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीराम की सौगंध है। ज़रा इसका मज़ा देखिये। रावण के भेजे हुए जासूस, मार खाते हुए, अपनी जान बचाने के लिये जिस नाम की दुहाई देते हैं वह उसी का नाम है जिसके विरुद्ध वे भेजे गये थे। और वह नाम काम कर जाता है।

यह सुनकर लक्ष्मणजी ने सबको पास बुलाया। जिन्होंने अभी-अभी समुद्र सुखा देने की बात कही थी, उन्हें इन बँधे हुए राक्षसों पर दया आ गयी, और वे हँसकर उन्हें तुरन्त छुड़ा देते हैं। यह वही स्वभाव है, बस दूसरी दिशा में। जिसके भीतर तेज़ी होती है उसके भीतर तरलता भी होती है, और तुलसीदासजी इसे बिना समझाये दिखा देते हैं।

सार: रावण के दूत कपट से वानर बनकर शिविर में आये, राम का चरित देखकर मुग्ध हो गये और प्रकट रूप में बड़ाई करने लगे, जिससे पहचाने गये। सुग्रीव ने अंग-भंग की आज्ञा दी, वानरों ने मारा, और दूतों ने राम की ही सौगंध देकर अपने नाक-कान बचाये। लक्ष्मणजी को दया आयी और उन्होंने सबको हँसकर छोड़ दिया।

लक्ष्मण की पाती

छोड़ते समय लक्ष्मणजी ने उनके हाथ में एक चिट्ठी दी, और साथ में एक ज़बानी सन्देश भी, जो चिट्ठी से भी छोटा है। रावण के हाथ में यह पाती दीजिये, और कहियेगा कि हे कुलघातक, लक्ष्मण का लिखा बाँच लीजिये। और फिर वह दोहा, जिसमें कूटनीति की सारी बात दो पंक्तियों में आ जाती है।

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥ ५२॥

दोहा ५२

उस मूर्ख से मुँहज़बानी यह मेरा उदार सन्देश कहियेगा कि सीताजी को देकर उनसे मिल जाइये, नहीं तो समझ लीजिये कि आपका काल आ गया। पोद्दारजी की टीका यहाँ एक शब्द पर रुकती है, उदार, और उसका अर्थ कृपा से भरा हुआ बताती है। यह सुनने में धमकी है और भीतर से निमन्त्रण है। सीता लौटा दीजिये और मिल लीजिये, इतना ही कहा गया है। जिस आदमी ने लात मारकर अपने ही भाई को निकाला था, उसे भी अन्त तक मिलने का न्योता भेजा जा रहा है।

दूत लक्ष्मणजी के चरणों में सिर नवाकर चले, और रास्ते भर वे जिनके गुण गाते गये वे उनके स्वामी नहीं थे। श्रीराम का यश कहते हुए वे लंका पहुँचे, और वहाँ पहुँचकर उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाया। एक ही शरीर, एक ही यात्रा, दो अलग-अलग जगह झुके हुए सिर।

सार: लक्ष्मणजी ने दूतों को छोड़कर उनके हाथ रावण के लिये एक पाती दी और एक ज़बानी सन्देश भी, कि सीताजी लौटाकर मिल जाइये, नहीं तो काल आ गया। दूत राम का यश गाते हुए लंका लौटे।

लंका की सभा, और पहला प्रश्न

रावण ने दूतों को देखकर पहले हँसी से बात शुरू की, और यह हँसी इस पूरे काण्ड में उसकी पहचान बन चुकी है। वह हर सच के आगे पहले हँसता है।

दशमुख ने हँसकर पूछा कि अरे शुक, अपनी कुशल क्यों नहीं कहता, और फिर उस विभीषण का समाचार सुना जिसके अत्यन्त निकट मृत्यु आ गयी है। ध्यान दीजिये कि पहला प्रश्न शत्रु के बारे में नहीं है, अपने भाई के बारे में है। जिसे उसने ख़ुद निकाला था, उसी की ख़बर सबसे पहले चाहिये।

मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका छोड़ दी, अब अभागा जौ के साथ पिसने वाला घुन बनेगा। इतना कहकर वह सेना की बात पर आता है, और उसे भी वह एक ताने की तरह पूछता है। वह भालु और वानरों की सेना का हाल भी पूछता है, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आयी है। और फिर वह वाक्य, जो आगे चलकर उसी पर लौटेगा।

जिनके जीवन का रखवाला वह कोमल चित्त वाला बेचारा समुद्र बन गया है। पोद्दारजी की टीका खोलकर कहती है कि यदि बीच में समुद्र न होता तो राक्षस उन्हें अब तक मारकर खा गये होते। यानी रावण उसी पानी का मज़ाक़ उड़ा रहा है जो इस कथा में अगला पात्र है। और फिर वह अपने भीतर का डर एक ही पंक्ति में उगल देता है, कि अब उन तपस्वियों की बात हो, जिनसे मेरे हृदय में बहुत डर है। मज़ाक़ ऊपर है, त्रास भीतर है, और दोनों एक ही साँस में निकल रहे हैं।

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३॥

दोहा ५३

क्या उनसे भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये? शत्रु की सेना का तेज और बल बताता क्यों नहीं? और फिर वह ख़ुद ही जोड़ देता है कि दूत का चित्त बहुत ही चकित हो रहा है। यह अन्तिम आधी पंक्ति रावण की अपनी ज़बान से निकला हुआ सबसे सच्चा वाक्य है। उसने दूत के चेहरे पर वह देख लिया है जिसका नाम वह लेना नहीं चाहता।

सार: लंका की सभा में रावण ने हँसकर पहले विभीषण की ख़बर पूछी, फिर मज़ाक़ के लहजे में वानरसेना का हाल, और साथ ही स्वीकार कर लिया कि तपस्वियों से उसे बहुत डर है। दूत के भौंचक्के चेहरे को उसने ख़ुद पहचान लिया।

दूत का उत्तर, और वह सेना

शुक ने उत्तर देने से पहले एक शर्त रखी, और वह शर्त बहुत नम्र थी। हे नाथ, जैसे आपने कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात मान लीजिये। जो कहने वाला है वह जानता है कि सुनने वाला बीच में ही भड़क जायेगा।

फिर उसने पहली ख़बर वही दी जो रावण सबसे कम सुनना चाहता था। आपका छोटा भाई जाकर जब मिला, तो पहुँचते ही श्रीराम ने उसका राजतिलक कर दिया। जिस आदमी को यहाँ लात मारकर निकाला गया, उसे वहाँ पहुँचते ही लंका का राज मिल गया। उसके बाद उसने अपनी बीती सुनायी, कि हम रावण के दूत हैं, यह सुनते ही वानरों ने बाँधकर बहुत कष्ट दिये, नाक-कान काटने लगे, और श्रीराम की शपथ दिलाने पर कहीं छोड़ा।

और तब वह सेना का वर्णन शुरू करता है, जो मानस की सबसे उत्साह भरी सूचियों में से एक है, और जिसकी विशेषता यह है कि वह एक शत्रु के मुँह से निकल रही है।

हे नाथ, आपने श्रीराम की सेना पूछी, सो वह तो सौ करोड़ मुखों से भी बखानी नहीं जा सकती। अनेक रंगों के भालु और वानरों की सेना है, भयंकर मुख वाली, विशाल शरीर वाली, डर लगाने वाली। जिसने नगर जलाया और आपके पुत्र को मारा, सब वानरों में उसी का बल सबसे थोड़ा है। यह एक पंक्ति पूरी लंका की नींद उड़ा देने के लिये काफ़ी है, क्योंकि उस एक वानर को लंका देख चुकी है।

फिर वह नाम गिनाता है, और तुलसीदासजी उन नामों को दोहे में इस तरह पिरोते हैं कि पढ़ते समय एक-एक नाम अलग खड़ा दिखाई देता है।

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४॥

दोहा ५४

द्विविद, मयन्द, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्, ये सब बल की राशि हैं। इस सूची में दो नाम याद रखियेगा, नील और नल, क्योंकि इसी काण्ड के अन्त में समुद्र इन्हीं दोनों का नाम लेगा। अभी वे एक लम्बी सूची में दबे हुए हैं, थोड़ी देर बाद पूरी सेना का पार उतरना इन्हीं दो पर टिकेगा।

और फिर वह संख्या आती है जिसके आगे रावण के पास कोई हिसाब नहीं बचता। ये सब वानर बल में सुग्रीव के बराबर हैं, और इनके जैसे करोड़ों हैं, उन्हें गिन कौन सकता है। श्रीराम की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है और वे तीनों लोकों को तिनके के बराबर समझते हैं।

हे दशग्रीव, मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। और हे नाथ, उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है जो आपको रण में न जीत सके। यहाँ दूत ने बहुत नम्र भाषा में सबसे कठोर बात कह दी है, और वह सीधे मुँह पर कही गयी है, भरी सभा में।

वानरों की बेचैनी का चित्र भी वह सामने रख देता है। सब अत्यन्त क्रोध से हाथ मीजते रहते हैं, पर श्रीरघुनाथजी आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं कि मछलियों और साँपों समेत समुद्र को सोख लेंगे, नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ों से उसे पाट देंगे और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे। सब सहज ही निडर हैं, इस तरह गरजते और डपटते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हों।

सब वानर और भालु सहज ही शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर स्वयं प्रभु श्रीराम हैं। हे रावण, वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं। जिस काल का भय रावण दूसरों को दिखाता रहा है, वही काल यहाँ गिनती की चीज़ बनकर रह गया है।

सार: शुक ने नम्रता से कहकर सच सुनाया कि विभीषण को पहुँचते ही राजतिलक मिल गया, कि सेना गिनी नहीं जा सकती, कि अठारह पद्म तो केवल सेनापति हैं, और उस सेना में हर वानर रावण को जीत सकता है। दोहे में नल और नील का नाम भी आ जाता है, जिनकी बात अन्त में फिर उठेगी।

राम का बल, और रावण की हँसी

अब दूत सेना से हटकर उस आदमी पर आता है जिसके सिर पर वह सेना खड़ी है, और यहीं इस काण्ड का असली विषय दुबारा सामने आ जाता है, समुद्र।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई । सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

चौपाई १

श्रीराम के तेज, बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, फिर भी नीति में निपुण उन्होंने आपके भाई से उपाय पूछा। इस पंक्ति को धीरे से पढ़िये। दूत यह नहीं कह रहा कि राम समुद्र पार नहीं कर सकते। वह कह रहा है कि वे कर सकते हैं और कर नहीं रहे, और यही उनकी असली शक्ति है। उनके वचन सुनकर वे समुद्र से राह माँग रहे हैं, क्योंकि उनके मन में कृपा भरी हुई है।

यह सुनते ही रावण खूब हँसा। उसने वही समझा जो वह समझ सकता था। जब ऐसी ही बुद्धि है तभी तो वानरों को सहायक बनाया है।

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई । सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥

चौपाई ३

स्वभाव से ही डरपोक विभीषण का वचन प्रमाण मानकर उन्होंने समुद्र से बालहठ ठान रखी है। अरे मूर्ख, झूठी बड़ाई क्या करता है, मैंने शत्रु के बल और बुद्धि की थाह पा ली। और फिर वह वाक्य जो सबसे मज़ेदार है, कि जिसका विभीषण जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत् में विजय और ऐश्वर्य कहाँ। जिस मन्त्री को उसने ख़ुद निकाला, उसी की गिनती वह अब शत्रु के घाटे में कर रहा है।

दुष्ट के ये वचन सुनकर दूत को क्रोध आ गया, और उसने मौक़ा समझकर पत्रिका निकाल ली। श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पाती दी है, हे नाथ, इसे बँचवाकर छाती ठंडी कर लीजिये। रावण ने हँसकर उसे बायें हाथ से लिया, मन्त्री को बुलवाया, और वह मूर्ख उसे बँचाने लगा।

सार: दूत ने कहा कि राम एक बाण से सैकड़ों समुद्र सोख सकते हैं, पर नीति के कारण उन्होंने विभीषण से उपाय पूछा और समुद्र से राह माँग रहे हैं। रावण ने इसे कमज़ोरी समझा और हँस दिया। तब क्रुद्ध दूत ने लक्ष्मणजी की पाती निकाली, जिसे रावण ने बायें हाथ से लेकर मन्त्री से बँचवाया।

पत्रिका बाँची जाती है

पत्र दो दोहों का है और उसमें कोई सेना का हिसाब नहीं है, कोई शर्त नहीं है। उसमें केवल एक चेतावनी है और एक विकल्प।

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ ५६ (क)॥

दोहा ५६ (क)

अरे मूर्ख, केवल बातों से मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट मत कीजिये। श्रीराम से विरोध करके विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण में जाने पर भी बचाव नहीं होगा। और दूसरे दोहे में लक्ष्मणजी दो रास्ते सामने रख देते हैं, कि या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई की तरह प्रभु के चरणकमलों के भौंरे बन जाइये, या फिर श्रीराम के बाणरूपी अग्नि में परिवार समेत पतंगा हो जाइये। दोनों में एक ही चीज़ जलती है, अभिमान या कुल। चुनाव उसी का है।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥

चौपाई १

पत्र सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, पर मुँह से मुस्कराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा कि जैसे कोई ज़मीन पर पड़ा हुआ आदमी हाथ से आकाश पकड़ने की चेष्टा करे, वैसे ही यह छोटा तपस्वी वाग्विलास कर रहा है। दो शब्दों का फ़ासला देखिये, मन और मुख। तुलसीदासजी ने रावण का पूरा चरित्र इसी फ़ासले में रख दिया है। भीतर डर बैठ चुका है, बाहर मुस्कान चल रही है, और वह मुस्कान भी अकेले के लिये नहीं, सबको सुनाकर है।

सार: लक्ष्मणजी की पाती में लिखा था कि बातों से मन बहलाकर कुल मत नष्ट कीजिये, राम से विरोध करके किसी की शरण काम न आयेगी, और दो ही रास्ते हैं, चरणों का भौंरा बनना या बाण की आग का पतंगा। सुनते ही रावण भीतर से डर गया और ऊपर से मुस्कराकर बात हँसी में उड़ा दी।

शुक की विनती, और वह लात

यहाँ इस प्रसंग का सबसे अप्रत्याशित मोड़ आता है। जो आदमी जासूसी करने भेजा गया था, वही भरी सभा में अपने स्वामी को समझाने लगता है।

शुक ने कहा कि हे नाथ, अभिमानी स्वभाव छोड़कर इस पत्र में लिखी सब बातों को सच मानिये। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये, और हे नाथ, श्रीराम से वैर त्याग दीजिये। ध्यान दीजिये कि वह डराता नहीं है। वह सेना का हिसाब दुबारा नहीं खोलता। वह उस चीज़ पर हाथ रखता है जो उसने अपनी आँखों से देखी है, राम का स्वभाव।

यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, फिर भी उनका स्वभाव अत्यन्त कोमल है। मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध हृदय में नहीं रखेंगे। यह वही बात है जो विभीषण कहते-कहते निकाल दिये गये थे, और यह वही बात है जो लक्ष्मणजी ने पत्र में लिखी थी। तीन अलग-अलग लोग, एक ही वाक्य। और अब यह वाक्य उस आदमी के मुँह से आ रहा है जिसे रावण ने ख़ुद भेजा था।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे । एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही । चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

चौपाई ४

जानकीजी श्रीरघुनाथजी को दे दीजिये, हे प्रभु, इतना कहना मेरा मान लीजिये। और जैसे ही उसने जानकीजी को देने की बात कही, उस दुष्ट ने उसको लात मार दी। यह ठीक वही दृश्य है जो थोड़ी देर पहले विभीषण के साथ इसी सभा में घट चुका है। रावण के यहाँ सच की एक ही सज़ा है, और वह सज़ा हर बार वही रहती है, चाहे कहने वाला भाई हो या नौकर।

पर इसके बाद जो हुआ, वह भी वही हुआ जो विभीषण के साथ हुआ था। चरणों में सिर नवाकर वह वहीं चला जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी सारी कथा सुनायी, और श्रीराम की कृपा से उसने अपना असली रूप पा लिया।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी । राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा । मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

चौपाई ६

शिवजी भवानी से कहते हैं कि वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीराम के चरणों की वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया। यह छोटी सी जानकारी पूरे प्रसंग को उलट देती है। जिसे रावण ने अपना दूत समझकर भेजा था, वह वस्तुतः एक शापग्रस्त मुनि था, और लंका की उस यात्रा ने उसका शाप काट दिया। रावण ने जासूस भेजा और एक मुनि को मुक्ति दिलवा दी। इस कथा में उसका हर दाँव उसी के विरुद्ध पड़ता है।

सार: शुक ने भरी सभा में रावण को समझाया कि राम का स्वभाव कोमल है, मिलते ही वे सब अपराध भुला देंगे, और सीताजी लौटा दीजिये। रावण ने उसे लात मारी। वह सिर नवाकर श्रीराम के पास गया, अपनी कथा सुनायी और अगस्त्य ऋषि के शाप से मिला राक्षस-शरीर छोड़कर मुनि-रूप पाकर अपने आश्रम लौट गया।

तीन दिन, और वह दोहा

अब कथा उसी किनारे पर लौटती है जहाँ हमने उसे छोड़ा था। वहाँ कुछ नहीं बदला है। कुश बिछा है, राम बैठे हैं, और पानी वैसा ही है।

तीन दिन बीत गये। यह गिनती तुलसीदासजी यूँ ही नहीं देते। तीन दिन में उस पार एक पूरी सभा बैठ चुकी, पत्र बाँचा जा चुका, एक दूत लात खाकर मुनि बन चुका, और इस पार एक आदमी चुपचाप बैठा रहा। जो शक्ति में सबसे बड़ा है, वही प्रतीक्षा में सबसे लम्बा निकला।

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ ५७॥

दोहा ५७

जड़ समुद्र विनय नहीं मानता, और तीन दिन बीत गये। तब श्रीराम क्रोध सहित बोले कि भय के बिना प्रीति नहीं होती। यह वही पंक्ति है जिसे आज हर तरह के मौक़े पर उद्धृत कर दिया जाता है, अक्सर उसे बल का समर्थन बनाकर। पर उसे उसके अपने कमरे में रखकर देखिये। कहने वाला वह है जिसने पहले सिर झुकाया, फिर कुश बिछाया, फिर तीन दिन प्रतीक्षा की। सुनने वाला कोई व्यक्ति नहीं, जड़ समुद्र है, और तुलसीदासजी ने उसे जड़ कहा भी है। और यह पंक्ति किसी उपदेश के बीच नहीं, क्रोध के बीच बोली गयी है, सकोप, जो तुलसी ने ख़ुद लिख दिया है।

लछिमन बान सरासन आनू । सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥

चौपाई १

हे लक्ष्मण, धनुष-बाण लाइये, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। और फिर वह सूची शुरू होती है जिसमें व्यर्थ जाने वाली बातें गिनायी गयी हैं। मूर्ख से विनय, कुटिल से प्रीति, स्वभाव से कंजूस आदमी को उदारता का उपदेश।

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

चौपाई २

ममता में फँसे हुए से ज्ञान की कथा, अत्यन्त लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शान्ति की बात और कामी से भगवान् की कथा, इन सबका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर ज़मीन में बीज बोने से होता है। यह लक्ष्मणजी की ही बात है, वही जो उन्होंने पहले दिन कही थी, और अब वह राम के मुँह से निकल रही है। तुलसीदासजी अगली ही पंक्ति में यह चुपचाप दर्ज भी कर देते हैं, कि यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा।

सार: तीन दिन प्रतीक्षा के बाद भी समुद्र ने कुछ नहीं कहा। तब राम ने क्रोध में वह पंक्ति कही कि भय बिना प्रीति नहीं होती, धनुष-बाण मँगवाया, और गिनाया कि किन-किन लोगों से कही गयी सही बात ऊसर में बोये बीज की तरह व्यर्थ जाती है। यह मत लक्ष्मणजी के मन को अच्छा लगा।

बाण, और समुद्र का आना

धनुष चढ़ा, और उसके बाद जो हुआ वह बहुत जल्दी हुआ। मानस की गति यहाँ अचानक तेज़ हो जाती है, जैसे तीन दिन की चुप्पी का हिसाब चुकाया जा रहा हो।

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

चौपाई ३

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया, और प्रभु ने वह भयानक बाण सन्धान किया, जिससे समुद्र के हृदय के भीतर आग की ज्वाला उठी। ध्यान दीजिये कि बाण छूटा नहीं है, केवल जोड़ा गया है, और आग भीतर उठ चुकी है। समुद्र को हराने के लिये मारना नहीं पड़ा, इरादा दिख जाना काफ़ी था। मगर, साँप और मछलियों के झुंड व्याकुल हो उठे, और जब समुद्र ने जाना कि उसके भीतर के जीव जल रहे हैं, तब वह ख़ुद सामने आया।

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

चौपाई ४

सोने के थाल में अनेक मणियाँ भरकर, अभिमान छोड़कर, वह ब्राह्मण के रूप में आया। एक बात पर रुकियेगा। समुद्र अपने डर से नहीं आया, अपने भीतर बसने वालों के जलने से आया। जड़ कहा गया यह पानी भी उस वक़्त हिला जब उसके आश्रित तड़पे।

और इसी जगह तुलसीदासजी कथा रोककर अपनी बात अलग से रख देते हैं। वे इसे राम के मुँह में नहीं डालते, काकभुशुण्डिजी गरुड़जी से कहते हैं, और इस तरह यह सामान्य नियम की जगह एक पक्षी की कही हुई लोकोक्ति बन जाती है।

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥ ५८॥

दोहा ५८

हे गरुड़जी, सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है। केले का उदाहरण बहुत सटीक है, क्योंकि उसमें काटना नष्ट करना नहीं है, वह उसके फलने की विधि है। समुद्र भी नष्ट नहीं हुआ, वह इसी घड़ी के बाद इस कथा का सहायक बनेगा।

सार: धनुष चढ़ते ही समुद्र के हृदय में ज्वाला उठी और जल-जन्तु व्याकुल हो गये। अपने आश्रितों को जलता देखकर समुद्र सोने के थाल में मणियाँ भरकर ब्राह्मण के रूप में आया। काकभुशुण्डिजी यहाँ गरुड़जी से कहते हैं कि केला काटने पर ही फलता है और नीच डाँटने पर ही झुकता है।

सागर की क्षमा-याचना

समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़ लिये और कहा कि हे नाथ, मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिये। और फिर उसने जो सफ़ाई दी, वह सफ़ाई से ज़्यादा एक सिद्धान्त है। हे नाथ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।

आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है। यह उत्तर बहुत गहरा है। समुद्र यह नहीं कह रहा कि मैंने सुना नहीं। वह कह रहा है कि जो मैं हूँ वह आपका ही बनाया हुआ हूँ, और मेरा न हिलना मेरी अवज्ञा नहीं, मेरा स्वभाव है।

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥

चौपाई ३

प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, किन्तु मर्यादा भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं। पोद्दारजी की टीका इस पंक्ति में ताड़ना का अर्थ शिक्षा करती है और लिखती है कि ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं। समुद्र यह अपने बचाव में कह रहा है, अपनी उसी दलील को आगे बढ़ाते हुए कि स्वभाव से जड़ वस्तु शिक्षा से ही ठिकाने आती है, और वह मर्यादा भी प्रभु की ही बनायी हुई है। यह पंक्ति एक पात्र के मुँह की दलील है, कथा की अपनी घोषणा नहीं।

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

चौपाई ४

प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी, पर इसमें मेरी मर्यादा नहीं रहेगी। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है, ऐसा वेद गाते हैं, इसलिये अब आपको जो अच्छा लगे मैं तुरन्त वही करूँ। यह इस पूरे प्रसंग का सबसे सुन्दर वाक्य है, और इसे ध्यान से पढ़िये। समुद्र मना नहीं कर रहा। वह कह रहा है कि सूख जाना मेरे लिये कठिन नहीं, बस उसमें मेरा होना नहीं बचेगा, और फिर भी आज्ञा दीजिये तो अभी सूख जाता हूँ। और श्रीराम ने इसी वाक्य को पकड़ लिया।

सार: समुद्र ने चरण पकड़कर कहा कि पाँचों भूतों की करनी स्वभाव से जड़ है, वह स्वभाव भी प्रभु का ही बनाया हुआ है, और मर्यादा भी उन्हीं की बनायी हुई है। उसने कहा कि आपके प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना उतर जायेगी, पर उसमें मेरी मर्यादा न रहेगी, फिर भी आज्ञा हो तो वही करूँ।

उपाय, और नल-नील

अब उत्तर आता है, और वह क्रोध का उत्तर नहीं है। तीन दिन की प्रतीक्षा, एक चढ़ा हुआ धनुष और एक जलता हुआ समुद्र, इन सबके बाद श्रीराम जो करते हैं वह मुस्कराना है।

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९॥

दोहा ५९

समुद्र के अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु ने मुस्कराकर कहा कि हे तात, जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाय, वही उपाय बताइये। एक शब्द पर रुकिये, तात। जिसे अभी बाण से सुखाया जा रहा था, उसे अब पिता जैसा सम्बोधन मिल रहा है। क्रोध चला गया और साथ में कोई शर्त नहीं छोड़ गया। और प्रश्न भी वही पुराना है, जो विभीषण से पूछा गया था, कि पार कैसे उतरा जाय।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई । लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

चौपाई १

हे नाथ, नील और नल दो वानर भाई हैं, जिन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके छू देने भर से भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जायेंगे। यही वे दो नाम हैं जो दोहा चौवन की लम्बी सूची में दबे पड़े थे। सारी सेना का पार उतरना अब उन्हीं दो के हाथ आ गया, और उसका कारण कोई युद्धकला नहीं, बचपन में मिला हुआ एक आशीर्वाद है।

समुद्र ने आगे कहा कि मैं भी प्रभु की प्रभुता हृदय में रखकर, अपने बल के अनुसार, जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा सहायता करूँगा। हे नाथ, इसी तरह समुद्र को बँधा लीजिये, जिससे तीनों लोकों में आपका सुयश गाया जाय। जो अभी-अभी बाधा था, वह अब अपना बँधना ख़ुद माँग रहा है, और उसे इसमें अपना सुख भी दिख रहा है।

और फिर उसने एक और बात कही, जो बहुत कम लोगों को याद रहती है। इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले उन दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिये जो पाप की राशि हैं। कृपालु और रणधीर श्रीराम ने समुद्र के मन की यह पीड़ा सुनकर उसे तुरन्त हर लिया। बाण व्यर्थ नहीं गया, बस उसका निशाना बदल गया, और निशाना भी समुद्र ने ख़ुद चुना। श्रीराम का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया, उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया, और चरणों की वन्दना करके चला गया।

सार: राम ने मुस्कराकर उपाय पूछा। समुद्र ने नल और नील का नाम लिया, जिनके स्पर्श से पहाड़ भी तैरते हैं, अपनी ओर से सहायता का वचन दिया और कहा कि इसी तरह मुझे बँधा लीजिये। उसने अपने उत्तर तट के दुष्टों के वध की प्रार्थना भी की, जो श्रीराम ने उसी बाण से पूरी कर दी, और फिर वह प्रसन्न होकर लौट गया।

काण्ड का अन्त, और तुलसी की अपनी पंक्ति

समुद्र अपने घर चला गया और श्रीरघुनाथजी को उसकी सलाह पसन्द आयी। इसके बाद तुलसीदासजी कथा से बाहर आते हैं और काण्ड का अन्त अपने हाथ में ले लेते हैं। छंद की चाल इसीलिये आती है, क्योंकि यह अब वर्णन नहीं है, यह हस्ताक्षर है।

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

छंद

समुद्र अपने भवन को गया, श्रीरघुनाथजी को यह सलाह अच्छी लगी। यह चरित कलियुग के मल को हरने वाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया। श्रीरघुनाथजी के गुणसमूह सुख के धाम हैं, सन्देह को शान्त करने वाले हैं, विषाद का दमन करने वाले हैं। सब आशा और भरोसा छोड़कर, हे मूर्ख मन, इन्हें निरन्तर गा और सुन।

इस छंद की आख़िरी पंक्ति पर ठहरिये। जिस शब्द से लक्ष्मणजी की पाती रावण को सम्बोधित करती थी, सठ, ठीक वही शब्द तुलसीदासजी काण्ड के अन्त में अपने ही मन के लिये लिख देते हैं। पूरा काण्ड एक ऐसे आदमी की कथा है जिसने हर चेतावनी हँसकर टाल दी, और कथा ख़त्म करते ही कवि वही शब्द अपनी ओर मोड़ लेता है। यह विनय नहीं, हिसाब है।

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६०॥

दोहा ६०

श्रीरघुनाथजी का गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदरपूर्वक सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज़ के ही भवसागर तर जायेंगे। यह इस काण्ड का अन्तिम दोहा है, और यह संयोग नहीं है कि जो काण्ड एक समुद्र को पार करने की समस्या पर ख़त्म हो रहा है, उसकी आख़िरी पंक्ति में दूसरा समुद्र आ जाता है और उसे पार करने के लिये कोई जहाज़ भी नहीं चाहिये। इस पार का समुद्र सेतु से पार होगा, उस पार का सुनने भर से।

इसके बाद गीताप्रेस का पाठ मासपारायण के चौबीसवें विश्राम की सूचना देता है और फिर वह पंक्ति आती है जो हर काण्ड के अन्त में आती है, कि कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ। सुन्दरकाण्ड यहीं पूरा होता है।

सेतु इस काण्ड में बनता नहीं। यहाँ केवल इतना तय होता है कि वह बनेगा, और बनाने वाले दो नाम भी सामने आ चुके हैं। पत्थरों का तैरना, पुल का बँधना और सेना का उस पार उतरना, यह सब आगे के सोपान की कथा है। सुन्दरकाण्ड अपनी सीमा यहीं खींच देता है। जो काण्ड एक वानर की समुद्र-छलाँग से खुला था, वह उसी समुद्र के मान जाने पर बन्द हो जाता है, और बीच में जो कुछ हुआ, वह सब इसी एक पानी के आसपास हुआ।

सार: समुद्र लौट गया, राम को उसकी सलाह अच्छी लगी, और तुलसीदासजी छंद में अपना नाम लिखकर अपने ही मन को सठ कहकर राम के गुण गाने को कहते हैं। अन्तिम दोहे में वे कहते हैं कि जो यह गुणगान आदर से सुनेंगे वे बिना जहाज़ के भवसागर तर जायेंगे। इसी के साथ पाँचवाँ सोपान समाप्त होता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को पढ़ते हुए हमें सबसे पहले वही पंक्ति रोकती है जिसे लोग सबसे ज़्यादा दोहराते हैं। भय बिनु होइ न प्रीति। पर उसे उसके कमरे से निकालकर बाज़ार में रख देना उसके साथ अन्याय है। वह वाक्य किसी घर के लिये नहीं, किसी सम्बन्ध के लिये नहीं, एक जड़ समुद्र के लिये कहा गया है, और कहने वाला वह है जो पहले प्रणाम कर चुका, कुश बिछा चुका और तीन दिन बैठ चुका है। तुलसीदासजी ने साथ में सकोप भी लिख दिया है, ताकि हम भूल न जायें कि यह उपदेश नहीं, क्रोध की घड़ी है। और उन्होंने इसे नियम बनाने का काम अपने ऊपर नहीं लिया, वह दोहा उन्होंने काकभुशुण्डिजी के मुँह से गरुड़जी को सुनवाया, केले और नीच का उदाहरण देकर। जो बात कथा के भीतर एक पात्र कहता है और जो बात कथा ख़ुद घोषित करती है, इन दोनों में फ़र्क़ है, और तुलसी यह फ़र्क़ बहुत सावधानी से रखते हैं।

दूसरी बात समुद्र की है, और वही इस प्रसंग की सबसे काम की बात है। उसने अपनी सफ़ाई में जो कहा वह गिड़गिड़ाना नहीं था। उसने कहा कि सूखना मेरे लिये कठिन नहीं, पर उसके बाद मैं रहूँगा ही नहीं, और फिर भी आज्ञा हो तो अभी सूख जाता हूँ। उसने अपनी मर्यादा गिरवी नहीं रखी और आज्ञा भी नहीं ठुकरायी, और उसी वाक्य ने बाण का रुख़ मोड़ दिया। श्रीराम ने समुद्र को सुखाया नहीं, उन्होंने उस पर पुल बनवाया। शक्ति के पास हमेशा दो रास्ते होते हैं, बाधा को मिटा देना या बाधा को रास्ता बना लेना, और यह कथा साफ़ बता देती है कि इनमें कौन सा बड़ा है। जिस समुद्र को सुखा दिया जाता, उसका नाम इस कथा में फिर कभी न आता। जिस समुद्र पर पुल बना, वह सेतु के साथ अमर हो गया।

और तीसरी बात उन दूतों की है जो कपट का वेष पहनकर आये थे। वे जासूसी करने आये और सराहना करने लगे, वे बाँधे गये और राम की सौगंध देकर छूटे, वे चिट्ठी लेकर लौटे और भरी सभा में वही बात कह बैठे जो चिट्ठी में लिखी थी। एक को लात पड़ी, और वह लात खाकर सीधा वहीं गया जहाँ से चिट्ठी आयी थी, और वहाँ जाकर उसका शाप भी कट गया। रावण ने अपने हाथ से भेजा, अपने हाथ से मारा, और अपने हाथ से एक मुनि को मुक्त करवा दिया। जिनके भीतर सुनने की जगह ही नहीं बची, उनके सारे इन्तज़ाम उन्हीं के विरुद्ध काम करने लगते हैं। हम सबके पास ऐसे तीन दिन आते हैं जब सामने वाला पानी कुछ नहीं कहता। उन तीन दिनों में जो हुआ, वह ज़ाया नहीं गया, क्योंकि उन्हीं के बाद वह उपाय मिला जिससे सेना पार उतरी, और वह उपाय आया भी उसी के मुँह से जो चुप बैठा था।

पाठ का आधार: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ५० से ६०, तथा उसी संस्करण में हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका। यह प्रसंग पाँचवें सोपान की समाप्ति पर ही छोड़ा गया है।

English