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समुद्र-लंघन

रामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड · समुद्र-लंघन

समुद्र-लंघन

समुद्र के तीर पर खड़ा एक सुन्दर पहाड़, उस पर से भरी हुई एक छलाँग, बीच रास्ते में मिला हुआ विश्राम का न्योता जो छूकर और प्रणाम करके लौटा दिया जाता है, और फिर सौ योजन का एक खुला हुआ मुँह जिसका उत्तर छोटा होकर दिया जाता है।

रामचरितमानस का पाँचवाँ सोपान कथा से नहीं खुलता। पहले संस्कृत के तीन श्लोक आते हैं, और उनमें से पहला श्रीराम की वन्दना है, दूसरा उन्हीं से एक प्रार्थना है, और तीसरा उस सेवक को प्रणाम करता है जिसके नाम से यह पूरा काण्ड पढ़ा जाता है। इसके बाद जो पहली चौपाई आती है वह भी शुरुआत से नहीं, बीच से शुरू होती है: एक भाषण जो पिछले सोपान में समाप्त हो चुका है, उसका असर दर्ज किया जाता है। इस पन्ने पर दोहा एक से दोहा दो तक की कथा है, और उसमें कुल जमा इतना होता है कि एक दूत निकलता है, समुद्र लाँघता है, और रास्ते में दो बार रोका जाता है।

दोनों रुकावटें एक जैसी नहीं हैं। पहली विनम्र है: समुद्र स्वयं चाहता है कि जानेवाला थोड़ी देर सुस्ता ले, और इसके लिये वह एक पर्वत से कहता है। दूसरी विनम्र नहीं है, वह ऊपर से भेजी गयी है और सामने आकर कहती है कि आज का भोजन मिल गया। पहली को हाथ से छूकर, प्रणाम करके, एक प्रश्न के रूप में लौटाया जाता है। दूसरी में जानेवाला बहस नहीं करता, शर्त मान लेता है, और फिर उसी मानी हुई शर्त के भीतर से होकर निकल आता है। दोनों जगह जो चीज़ काम आती है वह अकेला बल नहीं है।

और यह ध्यान में रखने की बात है कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में समुद्र है, दोनों में छलाँग है, पर जो इस पन्ने पर लिखा है वही इस पन्ने की कथा है। तुलसी यहाँ यह नहीं बताते कि मैनाक कौन है, न यह कि समुद्र उसी से क्यों कहता है। वे इतना ही कहते हैं कि जलनिधि ने जानेवाले को रघुपति का दूत समझा, और उसके बाद की सारी शिष्टता उसी एक विचार से निकलती है। जहाँ तुलसी चुप हैं, यह पन्ना भी चुप रहेगा।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • हनुमान पवन के पुत्र, जो इस पन्ने पर एक वचन देकर निकलते हैं और दो परीक्षाओं के बीच से होकर आगे बढ़ जाते हैं।
  • जाम्बवान् वानर-दल के सबसे बुज़ुर्ग, जिनके वचन इस काण्ड के पहले शब्द से पहले कहे जा चुके हैं और यहाँ केवल उनका असर दिखता है।
  • राम जिनका स्मरण इस पूरे पन्ने पर बार-बार सँभाला जाता है, और जिनका काम ही यहाँ हर उत्तर का कारण बनता है।
  • जलनिधि समुद्र, जो ऊपर से जाते हुए पथिक को पहचान लेता है और बिना कहे उसके विश्राम का प्रबन्ध करना चाहता है।
  • मैनाक वह पर्वत, जिससे समुद्र कहता है कि वह इस जानेवाले की थकावट हरनेवाला बने।
  • सुरसा सर्पों की माता, जिन्हें देवता बल और बुद्धि की परख के लिये रास्ते में भेजते हैं।

पञ्चम सोपान का मंगलाचरण

जिस ग्रन्थ का हर सोपान एक मंगलाचरण से खुलता है, उसका यह पाँचवाँ द्वार तीन श्लोकों का है। पहला श्लोक उस एक को प्रणाम करता है जिसकी कथा चल रही है। दूसरा उसी से अपने लिये कुछ माँगता है। और तीसरा वहाँ झुकता है जहाँ से माँगी हुई चीज़ मिलती आयी है। यह क्रम अपने आप में एक सूचना है, क्योंकि कहनेवाला पहले स्वामी के आगे सिर रखता है, फिर अपनी कमी कहता है, और फिर सेवक के आगे हाथ जोड़ता है।

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडमणिम्॥ १॥

मंगलाचरण, श्लोक १

पोद्दारजी की टीका इस श्लोक को खोलकर रख देती है। शान्त, सनातन, अप्रमेय अर्थात् प्रमाणों से परे, निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरन्तर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्यरूप में दीखनेवाले, समस्त पापों को हरनेवाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि। इतने विशेषणों के बीच में एक शब्द ऐसा है जो विशेषण जैसा लगता ही नहीं: रामाख्यं, जिनका नाम राम है।

इन सब पदों में एक पद पर रुकना बनता है, मायामनुष्यं। जो सबका ईश्वर है, जिसे वेदान्त के द्वारा जाना जाता है, जिसकी सेवा ब्रह्मा और शम्भु करते हैं, वही माया से मनुष्य के रूप में दीख रहा है। श्लोक इस बात को सुलझाता नहीं, दोनों सिरे एक साथ रखकर छोड़ देता है। और उसी छूटी हुई जगह में यह पूरा काण्ड बैठ जाता है, जिसमें एक सेवक ऐसे स्वामी का काम करने निकलता है जिसे अपने आप में किसी सहायता की कमी नहीं।

नान्या भक्तिं स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २॥

मंगलाचरण, श्लोक २

दूसरे श्लोक में तुलसीदास अपनी ओर से बोलते हैं, और जो बोलते हैं उसमें एक अनोखी सी सफ़ाई है। हे रघुनाथजी, मैं सत्य कहता हूँ, और फिर आप तो सबके अन्तरात्मा ही हैं, अर्थात् सब जानते ही हैं, कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। गवाही देकर उसी साँस में यह मान लेना कि गवाही की ज़रूरत ही नहीं थी, इतनी बात इतनी कम जगह में कम ही मिलती है।

और माँग दो हैं। पहली, निर्भरा भक्ति, वह पूरी भक्ति जिसमें कुछ बाहर न छूटे। दूसरी, मन को काम आदि दोषों से रहित कर दीजिये। दूसरी माँग पहली की शर्त है, क्योंकि जिस मन में और भी बहुत कुछ भरा पड़ा हो उसमें निर्भरा कोई चीज़ आ ही नहीं सकती। यह प्रार्थना ठीक उस काण्ड के सिरहाने रखी हुई है जिसमें ऐसा पात्र आनेवाला है जिसके हृदय में सचमुच दूसरी कोई इच्छा नहीं है।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३॥

मंगलाचरण, श्लोक ३

तीसरा श्लोक राम के बारे में नहीं है। अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत के समान कान्तिवाले शरीरवाले, दैत्यरूपी वन के लिये अग्निरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त, और पवन से उत्पन्न। इन पदों में एक पद ऐसा है जो बाक़ी से अलग जाता है: ज्ञानिनामग्रगण्यम्, ज्ञानियों में सबसे आगे।

बल की बात पहले पद में हो चुकी, शरीर की दूसरे में, संहार की तीसरे में। इसके तुरन्त बाद बुद्धि का पद आता है। और आगे इसी पन्ने पर देवता ठीक यही दो चीज़ें परखने के लिये किसी को भेजेंगे, बल और बुद्धि, और लौटकर वही दो शब्द उन्हीं के भेजे हुए मुँह से निकलेंगे। मंगलाचरण जिन दो चीज़ों को साथ-साथ गिनाता है, कथा उन्हीं दोनों की परीक्षा लेकर उन्हें साथ-साथ सिद्ध कर देती है।

सार: पाँचवाँ सोपान तीन संस्कृत श्लोकों से खुलता है। पहले में राम की वन्दना है, दूसरे में निर्भरा भक्ति और काम आदि दोषों से रहित मन की प्रार्थना, और तीसरे में पवनपुत्र को प्रणाम, जहाँ उनके बल के साथ-साथ उनकी बुद्धि भी गिनायी जाती है।

जाम्बवान् के वचन, और एक विदा

पहली चौपाई एक भाषण के बाद शुरू होती है, भाषण के साथ नहीं। जो कहा जाना था वह पिछले सोपान में कहा जा चुका। यहाँ केवल यह दर्ज है कि वह कहाँ जाकर बैठा।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

चौपाई १

जाम्बवान् के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान् के हृदय को वे बहुत ही भाये। और इसके बाद वे जो पहला वाक्य बोलते हैं वह अपने बारे में नहीं है, पीछे छूट रहे साथियों के बारे में है। तब तक मेरी राह देखियेगा, दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर। परिखेहु का अर्थ पोद्दारजी राह देखना करते हैं, और राह देखने की क़ीमत उसी पंक्ति में लिखी हुई है: जंगल का भोजन, और वह ठहराव जिसमें कुछ किया नहीं जा सकता।

यह देखने लायक़ है कि जानेवाला अपने लिये कुछ नहीं माँगता और रुकनेवालों के आगे एक शर्त रख देता है। समुद्र लाँघना एक आदमी का काम है, पर उसके पूरा होने तक उस तट पर बैठे रहना पूरे दल का काम है। वह काम इस पन्ने पर कहीं दिखता नहीं, कोई उसका बखान नहीं करता, और फिर भी वह इसी एक पंक्ति में गिन लिया गया है।

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

चौपाई २

जब तक मैं सीताजी को देखकर न लौट आऊँ। और फिर वह पंक्ति जो इस पूरे चरित्र को एक साँस में कह देती है: काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। प्रमाण के तौर पर वे कोई नाप नहीं देते, न समुद्र की चौड़ाई गिनते हैं, न अपने बल का हिसाब लगाते हैं। वे अपने भीतर उठे हुए हर्ष को गवाही की तरह सामने रख देते हैं। जिस काम का होना तय न हो, उसकी ख़बर मन को इस तरह पहले से नहीं मिलती।

इसके बाद विदा है, और वह भी दो हरकतों में पूरी हो जाती है। यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा, यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर। सबको, अर्थात् बड़ों को भी और उनको भी जो बड़े नहीं हैं। और फिर हृदय में श्रीरघुनाथजी को धारण करके वे हर्षित होकर चले। जो चीज़ यहाँ हृदय में रखी जाती है, आगे की पंक्तियों में उसी को बार-बार सँभाला जायेगा।

सार: जाम्बवान् के वचन हनुमान् के हृदय में उतर जाते हैं। वे साथियों से कहते हैं कि सीताजी को देखकर लौटने तक कन्द-मूल-फल पर रहकर उनकी राह देखें, काम होने का प्रमाण अपने हर्ष को बताते हैं, सबको सिर नवाते हैं, और रघुनाथ को हृदय में धरकर चल पड़ते हैं।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर

अब जो होता है उसके लिये तुलसी कोई तैयारी नहीं करते। न कोई सभा बैठती है, न कोई घोषणा होती है, न कोई मुहूर्त निकाला जाता है। दो पंक्तियाँ हैं, और चारों काम उन्हीं में निपट जाते हैं: पहाड़, चढ़ाई, स्मरण और छलाँग।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

चौपाई ३

समुद्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान् खेल से ही, अर्थात् बिना किसी प्रयत्न के, कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े। कौतुक को पोद्दारजी खेल कहते हैं, और यही एक शब्द पूरी चढ़ाई का बोझ उतार देता है। जिस पर्वत पर चढ़ने में औरों की साँस फूलती, उस पर यह चढ़ना खेल-खेल में हो गया, और कवि इसे चढ़ना कहने के बजाय कूदना कहता है।

इसके बाद जो पंक्ति आती है वह इस काण्ड की सबसे अधिक दोहरायी जानेवाली पंक्तियों में है। बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण करके अत्यन्त बलवान् पवनपुत्र बड़े वेग से उछले। क्रम पर ध्यान दीजिये। स्मरण पहले है, उछाल बाद में, और स्मरण एक बार का नहीं, बार-बार का है। बल का उल्लेख भी है, पर वह पंक्ति के आख़िर में आता है, स्मरण के बाद, और उसी के सहारे आता है।

सँभारी शब्द अपने आप में कुछ कहता है। सँभालना उसी चीज़ को पड़ता है जो हाथ से छूट सकती हो, या जिसे थामे रहने से ही खड़ा रहा जाता हो। यह ठीक वही चीज़ है जिसे कुछ पंक्तियाँ पहले हृदय में धरा गया था। धरना एक बार हुआ था, सँभालना बार-बार हो रहा है, और दोनों के बीच में समुद्र है।

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

चौपाई ४

जिस पर्वत पर पैर रखकर वे चले, वह तुरन्त पाताल में धँस गया। यह उस छलाँग का बचा हुआ हिसाब है, और तुलसी उसे बिना किसी विस्मय के, एक ही पंक्ति में निपटा देते हैं। जिस पर से इतना वेग निकला हो, उसे नीचे जाना ही था। पन्ने पर पहला निशान जानेवाले का नहीं है, उस जगह का है जहाँ से वह चला।

और फिर उपमा आती है: जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। अमोघ वह, जो कभी व्यर्थ न जाये। बाण की एक ही आदत होती है, वह वहीं जाता है जहाँ छोड़ा गया है और बिना लगे लौटता नहीं। इस उपमा में छोड़नेवाला भी है और चलनेवाला भी, और रास्ते में जो भी मिले, उसमें फेरबदल की गुंजाइश किसी एक की ही है।

सार: समुद्र के तीर पर खड़े एक सुन्दर पर्वत पर हनुमान् खेल-खेल में कूदकर चढ़ जाते हैं, बार-बार रघुवीर को सँभालकर बड़े वेग से उछलते हैं, पर्वत उसी क्षण पाताल में धँस जाता है, और वे रघुपति के अमोघ बाण की तरह चल पड़ते हैं।

मैनाक, और लौटाया हुआ विश्राम

इसके आगे की चौपाई में समुद्र बोलता है। जलनिधि ने ऊपर से जाते हुए इस पथिक को देखा और उसे श्रीरघुनाथजी का दूत समझा, और उसी समझ के साथ उसने मैनाक पर्वत से कहा कि वह इनकी थकावट दूर करनेवाला बने, अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे। तुलसी यहाँ न यह बताते हैं कि मैनाक कौन है, न यह कि समुद्र से उसका क्या रिश्ता है। जो एक कारण दिया गया है वह बस इतना है, रघुपति का दूत समझकर।

इस शिष्टाचार में समुद्र की अपनी कोई शर्त नहीं है। वह रास्ता नहीं रोकता, कुछ माँगता नहीं, परीक्षा नहीं लेता, अपना नाम तक आगे नहीं करता। वह केवल इतना मानता है कि जो जा रहा है वह किसी और के काम से जा रहा है, और इसीलिये उसका थक जाना समुद्र का भी मामला है। इस पूरे पन्ने पर यह अकेली रुकावट है जो प्रेम से खड़ी होती है, और उसका उत्तर भी उतने ही प्रेम से दिया जाता है।

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ १॥

दोहा १

हनुमान् ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम किया, और कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ। तीन हरकतें हैं और तीनों गिनने लायक़ हैं। पहली, छूना। दूसरी, प्रणाम। तीसरी, उत्तर। छूना इस बात का जवाब है कि न्योता झूठा नहीं माना गया, प्रणाम इस बात का कि देनेवाले का मान रख लिया गया, और उत्तर इस बात का कि लिया कुछ नहीं गया।

और उत्तर का रूप देखिये। वह मना नहीं करता, वह प्रश्न पूछता है। मोहि कहाँ बिश्राम, मुझे विश्राम कहाँ। जिस आदमी का काम अधूरा पड़ा हो उसके लिये विश्राम नाम की कोई जगह ही नहीं बची, इसलिये इनकार करने की नौबत ही नहीं आती। पर्वत को छूकर उन्होंने उसे उतना दे दिया जितना वह माँग रहा था, और उससे आगे कुछ नहीं लिया।

सार: समुद्र जाते हुए हनुमान् को रघुपति का दूत समझकर मैनाक से कहता है कि वह इन्हें विश्राम दे। हनुमान् उस पर्वत को हाथ से छूते हैं, प्रणाम करते हैं, और कहते हैं कि राम का काम किये बिना उनके लिये विश्राम कहीं है ही नहीं।

देवताओं की भेजी हुई परीक्षा

एक रुकावट प्रेम की थी। दूसरी ऊपर से भेजी गयी है, और भेजनेवाले वही हैं जिनके हित में यह सारा काम चल रहा है।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

चौपाई ५

देवताओं ने पवनपुत्र को जाते हुए देखा। और देखकर उन्होंने सहायता नहीं भेजी, परीक्षा भेजी। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिये उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा। पोद्दारजी इस पर एक ही शब्द रखते हैं, परीक्षार्थ। ध्यान रहे कि जो दो चीज़ें यहाँ परखी जानी हैं, वे इसी पन्ने के मंगलाचरण में पहले ही एक साथ गिनायी जा चुकी हैं।

और सुरसा जो पहला वाक्य कहती हैं उसमें धमकी नहीं है, केवल एक सूचना है, और वह सूचना भी अपने नाम पर नहीं, देवताओं के नाम पर दी जाती है।

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

चौपाई ६

आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह सुनकर पवनकुमार जो उत्तर देते हैं उसमें इस वाक्य का खण्डन कहीं नहीं है। वे यह नहीं कहते कि यह बात ग़लत है, न यह कि मुझे छोड़ दीजिये क्योंकि मेरा काम बड़ा है। वे बस समय माँगते हैं, और माँगने के लिये अपना काम पूरा गिना देते हैं: श्रीरामजी का कार्य करके मैं लौट आऊँ, और सीताजी की ख़बर प्रभु को सुना दूँ।

तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

चौपाई ७

तब आकर मैं आपके मुख में घुस जाऊँगा। हे माता, मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दीजिये। जिस प्राणी को उन्हें खा जाना है, उसी को वे माता कहकर पुकारते हैं, और अपनी बात के पीछे केवल एक चीज़ रखते हैं, सत्य। न कोई सौदा है, न कोई तीसरा रास्ता सुझाया जाता है। लौटकर आने का वचन पूरा का पूरा दे दिया जाता है, बिना किसी कटौती के।

और जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान् ने जो कहा वह और भी छोटा है: तो फिर मुझे खा ही लीजिये। ग्रससि न मोहि। यहाँ न कोई ललकार है, न कोई हथियार उठता है, न कोई और उपाय आज़माया जाता है। जिस शर्त को वे टालना चाहते थे, उसी शर्त को उन्होंने पूरा मान लिया। इसके बाद जो होता है, वह सब उसी मानी हुई शर्त के भीतर होता है।

सार: देवता बल और बुद्धि की परख के लिये सर्पों की माता सुरसा को भेजते हैं। हनुमान् विवाद नहीं करते, राम का काम पूरा करके लौट आने और तब स्वयं मुख में चले जाने का वचन देते हैं, और जब वे नहीं मानतीं तो कह देते हैं कि अभी निगल लीजिये।

एक योजन से सौ योजन तक

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

चौपाई ८

उसने योजन भर मुँह फैलाया, जिसे पोद्दारजी चार कोस बताते हैं। हनुमान् ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया, वे तुरन्त बत्तीस योजन के हो गये। दो गिनतियाँ साथ-साथ चलती हैं और एक ही नियम से चलती हैं: जो सामने खुलता है, उससे दूना। यह अपने आप में उत्तर नहीं है, यह उत्तर देने का ढंग है, और अभी यह कुछ देर और चलेगा।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

चौपाई ९

जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थीं, हनुमान् उसका दूना रूप दिखलाते थे। फिर उसने सौ योजन का मुख किया, जो पोद्दारजी के हिसाब से चार सौ कोस हुआ। और ठीक यहीं पंक्ति पलट जाती है। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा। जो अब तक हर बार बड़ा होता आया था, वह एक क्षण में बहुत ही छोटा हो गया, और यह पलटाव किसी थकान से नहीं आया।

यही पलटाव इस पूरे प्रसंग की धुरी है। दूना होते जाना उस पहले प्रश्न का उत्तर था जो बल के बारे में था, और वह उत्तर पूरा दिया जा चुका। सौ योजन के बाद बड़े होने में कुछ बचा भी नहीं था, न उसमें कुछ और सिद्ध होना था। छोटा होना दूसरे प्रश्न का उत्तर है, और वह प्रश्न बुद्धि का था। देवताओं ने दो चीज़ें पूछी थीं, और दोनों के उत्तर एक ही खुले मुँह के सामने, एक के बाद एक, दे दिये गये।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

चौपाई १०

वे मुख में घुसकर तुरन्त बाहर निकल आये, और निकलकर उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। जो शर्त मानी गयी थी वह अक्षरशः पूरी हुई, मुख में जाना था, वे गये। और बाहर आकर जो पहला काम वे करते हैं वह कोई घोषणा नहीं है, सिर नवाना है। इस पन्ने पर वे तीसरी बार सिर नवा रहे हैं, पहली बार साथियों के आगे, दूसरी बार पर्वत के आगे, और अब उसके आगे जो उन्हें खा जाने आयी थी।

और उत्तर में सुरसा वही दो शब्द बोलती हैं जो भेजते समय देवताओं के मन में थे: जिसके लिये देवताओं ने मुझे भेजा था, आपकी बुद्धि और बल का वह भेद मैंने पा लिया। मरमु अर्थात् भेद, वह बात जो भीतर की होती है और बाहर से नहीं दिखती। परीक्षा लेनेवाली स्वयं कह रही हैं कि परीक्षा पूरी हो गयी, और इसके बाद जो आता है वह कोई निर्णय नहीं, आशीर्वाद है।

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २॥

दोहा २

आप श्रीरामचन्द्रजी का सारा कार्य कर लेंगे, क्योंकि आप बल और बुद्धि के भण्डार हैं। यह आशीर्वाद देकर वे चली गयीं, और हनुमान् हर्षित होकर चले। जिस क्रिया पर यह पन्ना बन्द होता है, वह ठीक वही क्रिया है जिस पर यह खुला था। पहले चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा, और अब हरषि चलेउ हनुमान। बीच में एक समुद्र है, एक धँसा हुआ पर्वत है, एक खुला हुआ मुँह है, और हर्ष वहीं का वहीं है।

सार: सुरसा एक योजन से बढ़ाकर सोलह और फिर सौ योजन का मुख करती हैं, हनुमान् हर बार दूना रूप दिखाते हैं, और अन्त में अत्यन्त छोटा रूप लेकर मुख में जाकर बाहर निकल आते हैं। सुरसा बुद्धि और बल का भेद पा लेने की बात कहकर आशीर्वाद देती हैं और चली जाती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर तीन बार सिर झुकता है और एक बार भी कोई हथियार नहीं उठता। जो सबसे बड़ी शारीरिक घटना है, समुद्र के ऊपर की वह छलाँग, उसे दो ही पंक्तियाँ मिली हैं। जो सबसे लम्बी घटना है, उस खुले मुँह के सामने का वह बढ़ना और घटना, उसे छह पंक्तियाँ मिली हैं, और उन छहों में एक भी चोट नहीं है। तुलसी का सुन्दरकाण्ड यहाँ से शुरू होता है, और उसकी पहली बात यही है कि जिस काम पर निकला गया हो उसके आगे बाक़ी सब छोटा पड़ जाता है, विश्राम भी और वाद-विवाद भी।

दूसरी बात उस शब्द की है जो इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा काम करता है, सँभारी। पर्वत पर चढ़ना खेल था, उछलना बल का काम था, पर उछलने से ठीक पहले जो किया गया वह न खेल था न बल। वह स्मरण था, और वह एक बार नहीं, बार-बार किया गया। जो कुछ आगे होना है, उसकी विधि इसी एक अधूरी सी पंक्ति में रख दी गयी है, और उसमें कोई विधान, कोई मन्त्र, कोई तैयारी नहीं है।

और तीसरी बात उन्हीं दो शब्दों की है जिन पर यह पन्ना खुलता और बन्द होता है, बल और बुद्धि। मंगलाचरण ने इन्हें एक साथ गिनाया था, देवताओं ने इन्हीं दोनों की परीक्षा ली, और परीक्षा के बाद आशीर्वाद भी इन्हीं दो शब्दों में मिला। जो पात्र सीताजी को देखने अकेला जा रहा है, उसकी पूरी पूँजी इसी पहले पन्ने पर गिनकर सामने रख दी गयी है, और उस पूँजी में एक भी चीज़ ऐसी नहीं जो किसी और से माँगी गयी हो।

इस प्रसंग की सबसे शान्त पंक्ति शायद वही है जो सबसे पहले आती है, जिसमें जानेवाला पीछे रह जानेवालों से कहता है कि तब तक राह देखियेगा। कथा उनके साथ नहीं जाती। कथा समुद्र के ऊपर चली जाती है, जहाँ पहाड़ धँसते हैं और मुँह खुलते हैं। पर वह तट, वह कन्द-मूल-फल और वह ठहरी हुई प्रतीक्षा इस पूरे काण्ड के नीचे बिछी रहती है, और उसका कोई वर्णन कहीं नहीं आता।

और अन्त में एक बात उस समुद्र की, जो इस पन्ने पर बोलता तो है पर सामने कभी नहीं आता। वह पहचान लेता है, आदर करता है, और अपनी ओर से विश्राम का प्रबन्ध कर देता है, बिना किसी के कहे और बिना कुछ माँगे। दूसरी ओर एक ऐसा पथिक है जो उस प्रबन्ध को हाथ से छूता है, उसे प्रणाम करता है, और आगे बढ़ जाता है। दोनों में से किसी ने कुछ ग़लत नहीं किया, और फिर भी जो पार उतरता है वह वही है जिसने रास्ते में कुछ लिया नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा १ से २, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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