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समुद्र-लंघन

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रामचरितमानससुन्दरकाण्डखण्ड 1

समुद्र के तीर का एक सुन्दर पहाड़, उस पर से एक छलाँग। रास्ते में मिला विश्राम का न्योता जिसे हनुमान छूकर और प्रणाम करके लौटा देते हैं। और फिर सौ योजन का एक खुला मुँह, जिसका उत्तर वे छोटे होकर देते हैं।

रामचरितमानस का पाँचवाँ सोपान कथा से नहीं, संस्कृत की तीन स्तुतियों से खुलता है: पहली में राम की वन्दना है, दूसरी में उन्हीं से एक प्रार्थना। तीसरी में उस सेवक को प्रणाम है जिसके नाम से यह काण्ड पढ़ा जाता है। फिर कथा भी बीच से शुरू होती है। जाम्बवान् का भाषण पिछले सोपान में पूरा हो चुका है। यहाँ उसका असर दिखता है। इस प्रसंग में बस इतना होता है कि हनुमान निकलते हैं, समुद्र के ऊपर छलाँग भरते हैं, और पानी के ऊपर दो बार रोके जाते हैं। समुद्र अभी पार नहीं हुआ है। उसमें रहनेवाली वह निशाचरी, जो आकाश में उड़ते जीवों की परछाईं पकड़ लेती है, अगले प्रसंग में आती है।

दोनों रुकावटें एक जैसी नहीं हैं। पहली प्रेम की है। समुद्र चाहता है कि जानेवाला थोड़ी देर सुस्ता ले, और इसके लिये वह एक पर्वत से कहता है। दूसरी देवताओं की भेजी हुई है, और सामने आकर कहती है कि आज का भोजन मिल गया। पहली को हनुमान हाथ से छूकर और प्रणाम करके लौटा देते हैं। दूसरी में वे बहस नहीं करते, शर्त मान लेते हैं, और उसी शर्त के भीतर से निकल आते हैं। दोनों जगह काम अकेले बल से नहीं बनता।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। दोनों में समुद्र है और छलाँग है, पर यहाँ की कथा वही है जो तुलसी ने लिखी है। तुलसी यह नहीं बताते कि मैनाक कौन है, न यह कि समुद्र उसी से क्यों कहता है। वे इतना कहते हैं कि जलनिधि ने जानेवाले को राम का दूत समझा, और उसकी सारी शिष्टता इसी एक बात से निकलती है।

तट से सुरसा के मुख तक

  • हनुमान पवन के पुत्र, जो तट पर साथियों को वचन देकर निकलते हैं और रास्ते की दो रुकावटें पार करते हैं।
  • जाम्बवान् रीछों के राजा और दल के सबसे बुज़ुर्ग। उनके वचन पिछले सोपान में कहे जा चुके हैं, यहाँ उनका असर दिखता है।
  • राम जिनका काम इस यात्रा का कारण है, और जिनका स्मरण हनुमान रास्ते भर बार-बार सँभालते हैं।
  • समुद्र जो ऊपर से जाते हनुमान को राम का दूत समझकर उनके विश्राम का प्रबन्ध करना चाहता है।
  • मैनाक वह पर्वत, जिससे समुद्र कहता है कि वह हनुमान की थकावट दूर करे।
  • सुरसा सर्पों की माता, जिन्हें देवता हनुमान के बल और बुद्धि की परख के लिये रास्ते में भेजते हैं।

पञ्चम सोपान का मंगलाचरण

हर सोपान की तरह यह पाँचवाँ भी मंगलाचरण से खुलता है, और यहाँ उसमें तीन संस्कृत स्तुतियाँ हैं। क्रम सीधा है: पहले स्वामी की वन्दना, फिर अपनी कमी कहकर एक माँग, और फिर सेवक को प्रणाम।

पहली स्तुति राम की वन्दना है। पोद्दार की टीका के अनुसार ये वे जगदीश्वर हैं जो शान्त और सनातन हैं, जिनकी सेवा ब्रह्मा, शिव और शेष निरन्तर करते हैं, और जिन्हें वेदान्त से जाना जाता है। वे करुणा की खान हैं, रघुकुल में श्रेष्ठ और राजाओं के शिरोमणि। इतने विशेषणों के बीच नाम केवल एक बार आता है: वे राम कहलाते हैं।

इनमें एक बात पर रुकना बनता है। जो सबका ईश्वर है, वही माया से मनुष्य के रूप में दीख रहा है। स्तुति इस बात को सुलझाती नहीं, दोनों सिरे साथ रख देती है। यह पूरा काण्ड उसी के भीतर चलता है। एक सेवक ऐसे स्वामी का काम करने निकलता है जिसे अपने आप में किसी सहायता की कमी नहीं।

दूसरी स्तुति में तुलसीदास अपनी ओर से बोलते हैं। हे राम, मैं सत्य कहता हूँ, और आप तो सबके अन्तरात्मा हैं, सब जानते ही हैं, कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। वे गवाही देते हैं और उसी साँस में मान लेते हैं कि गवाही की ज़रूरत नहीं थी।

माँगें दो हैं: पूरी भक्ति, और काम आदि दोषों से रहित मन। दूसरी माँग पहली की शर्त है, क्योंकि जिस मन में और बहुत कुछ भरा हो उसमें पूरी भक्ति नहीं समाती। यह प्रार्थना उस काण्ड के सिरहाने रखी है जिसमें एक ऐसा पात्र आता है जिसके हृदय में सचमुच दूसरी कोई इच्छा नहीं।

तीसरी स्तुति राम के बारे में नहीं, हनुमान के बारे में है। उसमें वे अतुल बल के धाम हैं, सोने के पर्वत जैसे देहवाले, दैत्यों के वन के लिये अग्नि, वानरों के स्वामी, राम के प्रिय भक्त और पवन से उत्पन्न। इनमें एक विशेषण अलग पड़ता है: ज्ञानियों में सबसे आगे।

बल, देह और संहार के बाद बुद्धि की बात आती है। आगे इसी प्रसंग में देवता ठीक यही दो चीज़ें परखेंगे, बल और बुद्धि, और उनकी भेजी हुई सुरसा जाते-जाते इन्हीं दो का नाम लेंगी।

जाम्बवान् के वचन, और एक विदा

कथा भाषण के बाद शुरू होती है। जो कहा जाना था वह पिछले सोपान में कहा जा चुका, यहाँ बस यह दर्ज है कि उसका असर क्या हुआ।

जाम्बवान् के वचन हनुमान के हृदय को बहुत भाये। और उनका पहला वाक्य अपने बारे में नहीं, पीछे रह रहे साथियों के बारे में है: तब तक मेरी राह देखियेगा, दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर। इस प्रतीक्षा की क़ीमत भी उन्हीं के शब्दों में है: जंगल का भोजन, और ऐसा ठहराव जिसमें कुछ किया नहीं जा सकता।

जानेवाला अपने लिये कुछ नहीं माँगता, रुकनेवालों के आगे एक काम रख देता है। समुद्र लाँघना एक का काम है, पर उसके लौटने तक तट पर बैठे रहना पूरे दल का। उस प्रतीक्षा का आगे कहीं बखान नहीं होता, फिर भी हनुमान उसे यहीं गिन लेते हैं।

राह तब तक देखनी है, जब तक वे सीता को देखकर न लौट आयें। फिर वह बात आती है जो इस चरित्र का सार कह देती है: काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत हर्ष हो रहा है। वे न समुद्र की चौड़ाई नापते हैं, न अपने बल का हिसाब लगाते हैं। अपने भीतर उठे हर्ष को ही गवाही की तरह सामने रख देते हैं।

फिर विदा, दो हरकतों में। यह कहकर उन्होंने सबको सिर नवाया, बड़ों को भी और छोटों को भी। और राम को हृदय में धरकर वे हर्षित होकर चल पड़े। जो चीज़ यहाँ हृदय में रखी गयी, आगे उसी को बार-बार सँभाला जायेगा।

समुद्र के तीर का सुन्दर पहाड़

तुलसी यहाँ कोई तैयारी नहीं दिखाते: न सभा, न घोषणा, न मुहूर्त। पल भर में चारों काम हो जाते हैं: पहाड़, चढ़ाई, स्मरण और छलाँग।

समुद्र के तीर पर एक सुन्दर पहाड़ था। हनुमान खेल-खेल में कूदकर उस पर चढ़ गये। पोद्दार इसे अनायास कहते हैं, और यही बात चढ़ाई का सारा बोझ उतार देती है। यह चढ़ना नहीं, कूदना है।

फिर इस काण्ड के सबसे ज़्यादा याद किये जानेवाले क्षणों में से एक आता है: बार-बार राम का स्मरण करके बलवान् हनुमान बड़े वेग से उछले। स्मरण पहले है, उछाल बाद में, और स्मरण एक बार का नहीं, बार-बार का है। बल का ज़िक्र भी है, पर आख़िर में, स्मरण के सहारे।

यहाँ स्मरण का अर्थ है सँभालना, और सँभालना उसी चीज़ को पड़ता है जो छूट सकती हो, या जिसे थामे रहकर ही खड़ा रहा जाता हो। यह वही चीज़ है जिसे कुछ ही पल पहले हृदय में धरा गया था। धरना एक बार हुआ, सँभालना बार-बार हो रहा है।

जिस पहाड़ पर पैर रखकर वे चले, वह तुरन्त पाताल में धँस गया। तुलसी इसे बिना किसी विस्मय के कह देते हैं। जिस पर से इतना वेग निकला हो, उसे नीचे जाना ही था।

और फिर उपमा: जैसे राम का अमोघ बाण। अमोघ वह, जो कभी व्यर्थ न जाये। बाण वहीं जाता है जहाँ छोड़ा गया है, और रास्ते में जो मिले उससे मुड़ता नहीं। इस उपमा में छोड़नेवाले राम हैं और चलनेवाले हनुमान।

मैनाक, और लौटाया हुआ विश्राम

अब समुद्र बोलता है। जलनिधि ने ऊपर से जाते इस पथिक को राम का दूत समझा। उसने मैनाक पर्वत से कहा कि वह इनकी थकावट दूर करे, अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे। कारण बस इतना दिया गया है: राम का दूत समझकर।

इस शिष्टाचार में समुद्र की अपनी कोई शर्त नहीं। वह रास्ता नहीं रोकता, कुछ माँगता नहीं, परीक्षा नहीं लेता। वह इतना मानता है कि जानेवाला किसी और के काम से जा रहा है, इसलिये उसकी थकान समुद्र का भी मामला है। रास्ते की दोनों रुकावटों में यही प्रेम से खड़ी होती है, और इसका उत्तर भी प्रेम से मिलता है।

हनुमान ने उसे हाथ से छूकर प्रणाम किया, और कहा कि राम का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ। छूना बताता है कि न्योता झूठा नहीं माना गया, प्रणाम कि देनेवाले का मान रखा गया, और उत्तर कि लिया कुछ नहीं गया।

उत्तर इनकार नहीं, एक प्रश्न है: मुझे विश्राम कहाँ। जिसका काम अधूरा पड़ा हो उसके लिये विश्राम की कोई जगह बची ही नहीं, इसलिये मना करने की नौबत नहीं आती। पर्वत को छूकर उन्होंने उसका मन रख लिया, और उससे आगे कुछ नहीं लिया।

देवताओं की भेजी हुई परीक्षा

एक रुकावट प्रेम की थी। दूसरी देवताओं ने भेजी है, जिनके हित में यह सारा काम चल रहा है।

देवताओं ने हनुमान को जाते देखा, और सहायता नहीं, परीक्षा भेजी। उनका विशेष बल और बुद्धि जानने के लिये उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा। पोद्दार इस पर एक शब्द रखते हैं, परीक्षार्थ। जो दो चीज़ें यहाँ परखी जानी हैं, वे मंगलाचरण में पहले ही साथ गिनायी जा चुकी हैं।

सुरसा का पहला वाक्य धमकी नहीं, सूचना है, और वह भी अपने नाम पर नहीं, देवताओं के नाम पर।

आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। हनुमान इस बात का खण्डन नहीं करते, न यह कहते हैं कि मेरा काम बड़ा है इसलिये छोड़ दीजिये। वे बस समय माँगते हैं, और अपना काम गिना देते हैं: राम का काम करके मैं लौट आऊँ, और सीता की ख़बर प्रभु को सुना दूँ।

तब आकर मैं आपके मुख में घुस जाऊँगा। हे माता, मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दीजिये। जो उन्हें खाने आयी है, उसे वे माता कहते हैं, और अपनी बात के पीछे केवल सत्य रखते हैं। न कोई सौदा, न कोई तीसरा रास्ता। लौटकर आने का वचन पूरा का पूरा दे दिया जाता है।

जब किसी भी उपाय से सुरसा ने जाने नहीं दिया, तब हनुमान ने और भी छोटी बात कही: तो मुझे खा ही लीजिये। न ललकार, न हथियार। जिस शर्त को वे टालना चाहते थे, उसे उन्होंने पूरा मान लिया। आगे जो होता है वह उसी मानी हुई शर्त के भीतर होता है।

एक योजन से सौ योजन तक

सुरसा ने एक योजन भर मुँह फैलाया, जिसे पोद्दार चार कोस बताते हैं, और हनुमान ने अपना शरीर उससे दूना कर लिया। उन्होंने सोलह योजन का मुख किया, हनुमान तुरन्त बत्तीस योजन के हो गये। दोनों गिनतियाँ एक ही नियम से चलती हैं: जो सामने खुलता है, उससे दूना।

जैसे-जैसे सुरसा मुख बढ़ाती गयीं, हनुमान उसका दूना रूप दिखाते गये। फिर उन्होंने सौ योजन का मुख किया, पोद्दार के हिसाब से चार सौ कोस। और यहीं बात पलट जाती है: हनुमान एक क्षण में बहुत छोटा रूप ले लेते हैं। यह पलटाव थकान से नहीं आया।

यही इस प्रसंग की धुरी है। दूना होते जाना बल के प्रश्न का उत्तर था, और सौ योजन तक वह उत्तर पूरा हो चुका था। छोटा होना दूसरे प्रश्न का उत्तर है, बुद्धि का। देवताओं ने दो चीज़ें पूछी थीं, और दोनों के उत्तर एक ही खुले मुँह के सामने, एक के बाद एक, दे दिये गये।

वे मुख में घुसकर तुरन्त बाहर निकल आये, और सिर नवाकर विदा माँगने लगे। शर्त अक्षरशः पूरी हुई। मुख में जाना था, वे गये। बाहर आकर पहला काम घोषणा नहीं, सिर नवाना है। यह तीसरी बार है: पहले साथियों के आगे, फिर पर्वत के आगे, और अब उनके आगे जो उन्हें खाने आयी थीं।

सुरसा उत्तर में वही दो शब्द बोलती हैं जो भेजते समय देवताओं के मन में थे। जिसके लिये देवताओं ने मुझे भेजा था, आपकी बुद्धि और बल का वह भेद मैंने पा लिया। भेद यानी भीतर की वह बात जो बाहर से नहीं दिखती। परीक्षा लेनेवाली ख़ुद कहती हैं कि परीक्षा पूरी हुई, और इसके बाद निर्णय नहीं, आशीर्वाद आता है।

आप राम का सारा काम कर लेंगे, क्योंकि आप बल और बुद्धि के भण्डार हैं। यह आशीर्वाद देकर सुरसा चली गयीं, और हनुमान हर्षित होकर आगे चले। कथा जिस बात पर चली थी उसी पर थमती है: पहले वे राम को हृदय में धरकर हर्षित होकर चले थे, और अब भी हर्षित होकर चले। बीच में एक समुद्र, एक धँसा हुआ पहाड़ और एक खुला मुँह है, और हर्ष वहीं का वहीं है।

तीन बार झुका हुआ सिर

साथियों से विदा से लेकर सुरसा के आशीर्वाद तक तीन बार सिर झुकता है और एक बार भी हथियार नहीं उठता। सबसे बड़ी घटना, समुद्र के ऊपर की छलाँग, पल भर में कह दी गयी है। सुरसा के सामने बढ़ने और घटने को कहीं ज़्यादा जगह मिली है, और उसमें एक भी चोट नहीं। सुन्दरकाण्ड की पहली सीख यही है कि जिस काम पर निकले हों उसके आगे विश्राम भी छोटा पड़ता है और वाद-विवाद भी।

दूसरी बात सँभालने की है। पहाड़ पर चढ़ना खेल था, उछलना बल का काम, पर उछलने से ठीक पहले जो किया गया वह स्मरण था, और बार-बार। आगे जो कुछ होना है उसकी विधि इसी एक बात में है, बिना किसी मन्त्र या तैयारी के।

तीसरी बात बल और बुद्धि की है। मंगलाचरण ने इन्हें साथ गिनाया, देवताओं ने इन्हीं की परीक्षा ली, और आशीर्वाद भी इन्हीं दो शब्दों में मिला। जो सीता को देखने अकेले जा रहे हैं, उनकी पूरी पूँजी पहले प्रसंग में ही गिना दी गयी है।

इस प्रसंग का सबसे शान्त क्षण वह है जिसमें हनुमान पीछे रहनेवालों से कहते हैं कि तब तक राह देखियेगा। कथा समुद्र के ऊपर चली जाती है, पर वह तट, वह कन्द-मूल-फल और वह प्रतीक्षा पूरे काण्ड के नीचे बिछी रहती है। हनुमान के लौटने तक उसका कोई वर्णन नहीं आता।

और अन्त में समुद्र, जो बोलता तो है पर सामने नहीं आता। वह पहचानता है, आदर करता है, और बिना किसी के कहे विश्राम का प्रबन्ध कर देता है। हनुमान उस प्रबन्ध को छूते हैं, प्रणाम करते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। किसी ने कुछ ग़लत नहीं किया, और फिर भी आगे वही जाता है जिसने रास्ते में कुछ लिया नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 1 से 2, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।