शंखचूड

पुष्कर के तीर्थ पर एक तपस्वी वर्षों से आसन जमाए बैठा था। उसके होंठ श्रीकृष्ण-मन्त्र का जप करते रहते। जब उस जप को पूरे एक लाख वर्ष बीत गए, तब उसके मस्तक से एक जाज्वल्यमान तेज निकलकर सारी दिशाओं में फैल गया। वह तेज इतना असह्य था कि देवता, मुनि और मनु तक व्याकुल होकर उठ खड़े हुए।

वह तपस्वी कौन था, यह सनत्कुमारजी ने व्यासजी को सुनाया। ब्रह्मा के पुत्र मरीचि, उनके पुत्र कश्यप, और कश्यप की पत्नी दनु के वंश में विप्रचित्ति का पुत्र दम्भ हुआ, जो जितेन्द्रिय और विष्णु का परम भक्त था। बहुत काल तक कोई पुत्र न होने पर उसने अपने गुरु शुक्राचार्य से श्रीकृष्ण-मन्त्र लेकर पुष्कर में यही घोर तप आरम्भ किया था।

देवताओं की घबराहट और विष्णु का वरदान

उस तेज से घबराए देवता इन्द्र को आगे करके ब्रह्मा के पास पहुँचे। ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर वैकुण्ठ गए, जहाँ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए भगवान् विष्णु विराजते थे। देवताओं ने हाथ जोड़कर पुकारा, “हे देवदेव! हम नहीं जानते कि यह तेज कहाँ से उठा है। हम शरणागत हैं, हमारी रक्षा कीजिए।” विष्णु मुसकराकर बोले, “घबराइए मत। अभी प्रलय का समय नहीं आया। यह तेज तो मेरे भक्त दम्भ का है, जो पुत्र की कामना से तप कर रहा है। हम उसे वर देकर शान्त कर देंगे।”

ऐसा कहकर विष्णु स्वयं पुष्कर पहुँचे और दम्भ से बोले, “वर मांगिए।” दम्भ चरणों में लोटकर बोला, “हे रमानाथ! मुझे एक ऐसा वीर पुत्र दीजिए, जो आपका भक्त हो और तीनों लोकों में किसी से न जीता जा सके।” विष्णु “तथास्तु” कहकर अन्तर्धान हो गए।

कुछ काल बाद दम्भ की पत्नी गर्भवती हुई। श्रीकृष्ण के पार्षदों में अग्रणी सुदामा नामक जो गोप था, जिसे शाप मिला हुआ था, वही उस गर्भ में प्रविष्ट हुआ। समय आने पर एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। पिता ने मुनियों को बुलाकर विधिपूर्वक संस्कार कराए और शुभ दिन उसका नाम शङ्खचूड रखा। वह शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ने लगा और बचपन में ही सारी विद्याएँ सीख लीं।

बड़ा होने पर जैगीषव्य मुनि के उपदेश से शङ्खचूड भी पुष्कर गया और ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगा। ब्रह्मा प्रकट होकर बोले, “वर मांगिए।” उसने नम्रता से प्रणाम करके कहा, “भगवन्! मैं देवताओं के लिए अजेय हो जाऊँ।” ब्रह्मा ने “तथास्तु” कहकर उसे श्रीकृष्ण-कवच प्रदान किया, जो समस्त मंगल और सर्वत्र विजय देने वाला है। फिर उन्होंने आज्ञा दी, “पुष्कर के समीप धर्मध्वज की तपस्विनी कन्या तुलसी तप कर रही है। आप जाकर उससे विवाह कर लीजिए।”

पुष्कर में तुलसी

शङ्खचूड वहाँ पहुँचा जहाँ तुलसी तप में लीन थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था। उसने मधुर वाणी में पूछा, “सुन्दरी! आप कौन हैं? किसकी पुत्री हैं? यहाँ चुपचाप बैठकर क्या कर रही हैं?” तुलसी बोली, “मैं धर्मध्वज की तपस्विनी कन्या हूँ और यहाँ तपोवन में तप कर रही हूँ। आप कौन हैं? सुखपूर्वक अपने स्थान को चले जाइए, क्योंकि नारी-जाति ब्रह्मा तक को मोह में डाल देने वाली और विचारशीलों को शृंखला के समान जकड़ लेने वाली होती है।”

यह सुनकर शङ्खचूड मुसकराया, “देवी! आपकी बात सारी की सारी सच नहीं। संसार की जितनी भी पतिव्रता नारियाँ हैं, उनमें आप अग्रणी हैं। ब्रह्मा की आज्ञा से मैं गान्धर्व विधि से आपका पाणिग्रहण करने आया हूँ। क्या आपने मेरा नाम भी नहीं सुना? मैं दनु के वंश में दम्भ का पुत्र शङ्खचूड हूँ। पूर्वकाल में मैं श्रीहरि का पार्षद सुदामा गोप था; इस समय शापवश दानवराज होकर उत्पन्न हुआ हूँ। श्रीकृष्ण के प्रभाव से मुझे अपने पूर्वजन्म का स्मरण बना हुआ है।”

यह सत्य वचन सुनकर तुलसी प्रसन्न हुई और मुसकराकर बोली, “भद्र पुरुष! आज आपने अपने सात्त्विक विचार से मुझे परास्त कर दिया। जिसे स्त्री जीत लेती है, वह पुरुष होते हुए भी सदा अपावन रहता है; देवता और पितर तक उसकी निन्दा करते हैं। मैंने तो केवल आपकी परीक्षा ली थी, क्योंकि कामिनी को चाहिए कि अपने मनोनीत कान्त को परखकर ही वरे।”

तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे और बोले, “शङ्खचूड! व्यर्थ वाद-विवाद मत कीजिए, गान्धर्व विधि से इसका पाणिग्रहण कीजिए। आप पुरुषों में रत्न हैं और यह सतियों में रत्न है।” फिर तुलसी की ओर देखकर बोले, “इसके साथ चिरकाल तक सुख से विहार कीजिए। देह छूटने पर यह पुनः गोलोक में श्रीकृष्ण को पाएगा और आप वैकुण्ठ में चतुर्भुज भगवान् को।” ऐसा आशीर्वाद देकर ब्रह्मा लौट गए। शङ्खचूड ने तुलसी से विवाह किया और उसे लेकर अपने पिता के पास आ गया।

असुरराज्य और देवताओं की पुकार

शङ्खचूड के लौटते ही दानवों और दैत्यों में बड़ा उत्सव हुआ। उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य को आगे करके उसका समस्त दानवों के राज्य पर अभिषेक कर दिया। फिर वह महाबली सम्पूर्ण लोकों से देवताओं का सारा अधिकार छीनने लगा। यज्ञ के भाग वह स्वयं लेने लगा और कुबेर, सोम, सूर्य, अग्नि, यम तथा वायु जैसे अधिकारियों से भी अपना काम कराने लगा। तीनों लोकों में केवल देवता ही दुःखी थे। दानव-योनि में जन्म लेने पर भी उसकी बुद्धि दानवों-सी न थी; वह श्रीकृष्ण का परम भक्त और साधु-स्वभाव का था।

राज्य से हाथ धो बैठे देवता पहले ब्रह्मा और फिर उनके साथ वैकुण्ठ पहुँचे और विष्णु की स्तुति करके रो पड़े। विष्णु ने रहस्य खोला, “यह सारी बात मैं जानता हूँ। शङ्खचूड पूर्वजन्म में मेरा भक्त सुदामा गोप था। श्रीकृष्ण ने पहले ही रुद्र के त्रिशूल से इसकी मृत्यु निश्चित कर दी है; दानव-देह त्यागकर यह फिर कृष्ण-पार्षद हो जाएगा। इसलिए भय मत कीजिए; आइए, हम दोनों शंकर की शरण में चलें।”

ब्रह्मा और विष्णु शिवलोक पहुँचे, जहाँ रत्नमय सिंहासन पर उमा सहित शंकर विराजते थे। हाथ जोड़कर दोनों ने स्तुति की, “हे दीनबन्धु! हे शरणागतवत्सल! हमारा उद्धार कीजिए।” शंकर मुसकराए, “शङ्खचूड की सारी कथा मैं जानता हूँ। मैं सैनिकों सहित उसका वध कर डालूँगा, इसमें तनिक भी संशय नहीं।”

यह वचन सुनकर देवताओं को परम आनन्द हुआ। तब शंकर ने अपने प्रिय गन्धर्वराज चित्ररथ को दूत बनाकर शङ्खचूड के पास भेजा। किन्तु शङ्खचूड ने बिना युद्ध किए राज्य लौटाना स्वीकार न किया और कहा, “महेश्वर के साथ युद्ध किए बिना मैं न राज्य लौटाऊँगा, न अधिकार। रुद्र जैसा उचित समझें, वैसा करें।”

शिव का प्रस्थान और संग्राम

दूत के लौटकर यह कहने पर शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने वीरभद्र, नन्दी, क्षेत्रपाल और आठों भैरव को आज्ञा दी कि शस्त्रों से सज्जित होकर तैयार हो जाएँ। कुमार कार्तिकेय और गणेश भी कवच पहनकर आ पहुँचे, और भद्रकाली अपनी सेना तथा अनेक दिव्य अस्त्रों के साथ विमान पर चढ़कर चलीं। करोड़ों गण, ग्यारह रुद्र, आठों वसु, इन्द्र, बारहों आदित्य और अन्य देवता महेश्वर के पीछे चले। शिव एक मनोहर वटवृक्ष के नीचे आ खड़े हुए।

उधर शङ्खचूड ने तुलसी से कहा, “देवी! शम्भु के दूत के मुख से युद्ध का समाचार सुनकर मैं जाने को उद्यत हूँ; मुझे आज्ञा दीजिए।” फिर उसने प्रातःकृत्य करके बहुत दान दिया, अपने पुत्र का राज्य पर अभिषेक किया, और रोती हुई तुलसी को धीरज बँधाकर कवच धारण कर युद्ध के लिए निकल पड़ा। अपनी सेना के साथ वह पुष्पभद्रा के तट पर शिव की सेना के सामने डट गया।

शङ्खचूड ने भी एक दूत भेजा। महेश्वर ने उससे कहा, “हम किसी का पक्ष नहीं लेते, सदा भक्तों के अधीन रहते हैं। पूर्वकाल में देवताओं की प्रार्थना पर ही श्रीहरि ने मधु-कैटभ और हिरण्यकशिपु का संहार किया, मैंने त्रिपुरों को भस्म किया और देवी ने शुम्भ आदि को मारा। इसी प्रकार हम युग-युग में देवताओं के लिए युद्ध में आते हैं।” यह सुनकर शङ्खचूड ने भी प्रसन्नता से युद्ध स्वीकार कर लिया।

फिर घोर संग्राम छिड़ गया। इन्द्र वृषपर्वा से, सूर्य विप्रचित्ति से और विष्णु दम्भ से भिड़ गए; ग्यारह रुद्र ग्यारह असुर-वीरों से जूझ पड़े। भद्रकाली ने रणभूमि में ऐसा भयंकर सिंहनाद और अट्टहास किया कि दानव मूर्च्छित हो गए। उन्होंने शङ्खचूड पर आग्नेयास्त्र, नारायणास्त्र और ब्रह्मास्त्र चलाए, पर वह प्रत्येक अस्त्र को प्रणाम करके अथवा उसी के प्रति-अस्त्र से शान्त कर देता। अन्त में देवी ने मुक्का मारकर उसे घुमाया और दूर फेंक दिया, फिर भी शङ्खचूड ने माता समझकर देवी पर प्रहार न किया।

कवच, शील और त्रिशूल

तभी आकाशवाणी हुई और भद्रकाली युद्ध से निवृत्त हो गईं। अब तत्त्वज्ञ शंकर स्वयं नन्दी पर सवार होकर, वीरभद्र और भैरवों को साथ लेकर रणभूमि में आए। शिव को देखते ही शङ्खचूड विमान से उतरकर दण्ड की भाँति पृथ्वी पर लोट गया और भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। फिर वह पुनः विमान पर चढ़कर धनुष उठा लाया और दोनों में शस्त्रों की वर्षा होने लगी।

तभी फिर आकाशवाणी हुई, “हे व्योमकेश! जब तक इसकी पत्नी का शील अखण्ड है और जब तक यह श्रीकृष्ण-कवच धारण किए है, तब तक इसकी मृत्यु सम्भव नहीं।” शिव की प्रेरणा से विष्णु वृद्ध ब्राह्मण का वेष धरकर शङ्खचूड के पास गए और भिक्षा में उसका कवच माँग लिया। ब्राह्मण-भक्त और सत्यवादी शङ्खचूड ने प्राणों के समान वह दिव्य कवच दे दिया। फिर श्रीहरि ने शङ्खचूड का रूप धारण करके तुलसी के पास जाकर उसके शील का हरण कर लिया।

अब विष्णु ने शम्भु से सारी बात कह दी। तब शिव ने वध के लिए अद्भुत त्रिशूल हाथ में लिया, जो करोड़ों सूर्यों-सा प्रज्वलित और मन के समान वेगशाली था। शिव की आज्ञा से वह त्रिशूल शङ्खचूड पर गिरा और उसी क्षण उसे भस्म की ढेरी बना दिया। कार्य पूरा करके त्रिशूल आकाश-मार्ग से लौट आया। स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बज उठीं, शिव पर पुष्पों की वर्षा हुई, और शङ्खचूड अपने पूर्व कृष्ण-पार्षद रूप को प्राप्त हो गया।

शङ्खचूड की हड्डियों से शङ्ख-जाति का प्रादुर्भाव हुआ। शङ्ख का जल श्रीहरि और लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है और शंकर को छोड़कर समस्त देवताओं के लिए शुभ माना जाता है; किन्तु शिव को वह अर्पित नहीं किया जाता। इस प्रकार शङ्खचूड का वध करके शंकर उमा, स्कन्द और गणों के साथ शिवलोक लौट गए, और संसार में परम शान्ति छा गई।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता, पञ्चम (युद्ध) खण्ड