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क्रियाएँ
भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

त्र्यम्बक, वैद्यनाथ, नागेश्वर

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ब्रह्मगिरि पर सौ वर्षका अकाल

दक्षिणकी ओर ब्रह्मगिरि नामक पर्वत है। वहाँ महर्षि गौतम अपनी परम धर्मपरायणा पत्नी अहल्याके साथ दस हज़ार वर्षोंसे तपमें बैठे थे। उन्हीं दिनों उस प्रदेशमें ऐसा भयानक अकाल पड़ा कि पूरे सौ वर्षोंतक एक बूँद जल न बरसा। धरतीपर कहीं एक गीला पत्ता तक दिखायी न देता था। जीवनका आधार जल जब आँखोंसे ओझल हो गया, तब मुनि, मनुष्य, पशु, पक्षी और मृग सब दसों दिशाओंमें भटकने लगे।

गौतमजीने छह महीने कठिन तप करके वरुणदेवको प्रसन्न किया। वरुण प्रकट हुए और वर माँगनेको कहा। मुनिने वृष्टिकी प्रार्थना की। वरुण बोले, देवताओंकी इच्छाके विरुद्ध वर्षा तो मैं नहीं कर सकता, परंतु आपको सदा अक्षय रहनेवाला जल देता हूँ; आप एक गड्ढा खोद लीजिए। उस गड्ढेमें कभी न सूखनेवाला जल भर गया।

पके सुनहरे धान के खेत में वृद्ध महर्षि गौतम तिनके के गुच्छे से एक दुर्बल गाय को हांकते हैं और वह गाय भूमि पर गिर पड़ती है, पास खड़ी पत्नी अहल्या व्यथित होती हैं और ओट में छिपे ईर्ष्यालु ऋषि तथा उनकी स्त्रियां अंगुली उठाकर गोहत्या का झूठा दोष चिल्लाते हैं।

उस अक्षय जलसे गौतमके आश्रमके चारों ओर धान और नाना अन्न लहलहा उठे। यह समाचार सुनकर दूर-दूरसे ऋषि-मुनि अपनी पत्नियों, पुत्रों और शिष्योंको लेकर वहीं आ बसे। जो वन अनावृष्टिसे सूना पड़ा था, वह फिर हरा-भरा हो उठा। दयालु, अभिमानहीन, उपकारी और जितेन्द्रिय पुरुष ऐसे ही होते हैं, जो दूसरोंका दुःख सह नहीं पाते।

छल, गाय और गोहत्या

किंतु सुख कहाँ स्थिर रहता है। वहीं बसे कुछ ऋषि अपनी स्त्रियोंके वश होकर गौतमकी प्रतिष्ठासे जल उठे। उन्होंने गणेशजीकी आराधना करके यह वर माँगा कि किसी उपायसे गौतम आश्रमसे बाहर निकाल दिये जाएँ। गणेशराज बोले, ऋषियो, आप उचित नहीं कर रहे। जिसने पहले उपकार किया हो, उसे बिना अपराध दुःख देना अपना ही नाश बुलाना है। अकालके दिनों जिसने जलकी व्यवस्था करके आपको जिलाया, आज उसीके साथ छल करना कदापि ठीक नहीं। कोई दूसरा वर माँग लीजिए। पर वे न माने। तब भक्तोंके अधीन गणेशने कहा, जो आपने माँगा वही होगा; आगे जो होनहार है, वह होकर रहेगा। यों कहकर वे अन्तर्धान हो गये।

फिर एक दिन गौतमके खेतमें, जहाँ धान पका खड़ा था, गणेशजी स्वयं एक दुर्बल गाय बनकर आ पहुँचे और धान चरने लगे। गौतमने दयावश मुट्ठीभर तिनके लेकर उस गायको हाँका। तिनकोंका छूना था कि वह गाय वहीं गिरकर प्राण छोड़ बैठी। ओटमें छिपे वे ऋषि और उनकी स्त्रियाँ यह देखते ही चिल्ला उठे, गौतमने यह क्या कर डाला। गौतम भी अवाक रह गये। उन्होंने अहल्याको बुलाकर दुःखसे कहा, देवि, यह क्या हो गया, गोहत्या मुझसे लग गयी।

अब वे दुर्जन ब्राह्मण अहल्याको भी कटु वचन कहने लगे और बोले, पापी गोघाती, आप परिवारसहित यहाँसे कहीं और चले जाइए; जबतक आप इस आश्रममें रहेंगे, हमारे दिये हव्य-कव्यको न अग्नि लेंगे न पितर। गौतम एक कोस दूर हटकर नया आश्रम बना बैठे, पर वहाँ भी वे उन्हें यज्ञ-याग करनेसे रोकते रहे। बहुत विनयसे शुद्धिका उपाय पूछनेपर उन्होंने कहा, अपना पाप प्रकट करते हुए ब्रह्मगिरिकी परिक्रमा कीजिए, फिर वहाँ गंगाको ले आकर उन्हींके जलमें स्नान कीजिए, एक करोड़ पार्थिव लिंग बनाकर महादेवकी आराधना कीजिए; तभी आपका उद्धार होगा।

गंगा उतरीं, त्र्यम्बक प्रकट हुए

गौतमने यह कठिन विधान सिर झुकाकर स्वीकार किया। पत्नीसहित उन्होंने पार्थिव लिंग बनाकर ऐसी तपस्या की कि भगवान शिव पार्वती और गणोंके साथ प्रकट हो गये। त्रिशूलधारी शंकरने कहा, महर्षि, आपकी भक्तिसे मैं अति प्रसन्न हूँ; वर माँगिए। गौतमने उनके चरण पकड़कर कहा, देवेश, पंच जो कह दें वह अन्यथा नहीं होता, इसलिए जो हुआ सो हुआ; यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गंगा दीजिए और इस लोकका महान उपकार कीजिए। शिवने उन्हें धन्य कहा और उन छली ऋषियोंको दुरात्मा बताया, जिनका उद्धार कभी नहीं होता।

तब शंकरने पृथ्वी और स्वर्गके सारभूत जलको, तथा अपने विवाहमें ब्रह्माजीके दिये जलमेंसे जो शेष बचा था, वह सब गौतमको दे दिया। वह जल परम सुन्दरी स्त्रीका रूप धरकर सामने खड़ा हो गया। गौतमने स्तुति करके कहा, गंगे, आपने सारे भुवनको पवित्र किया है, अब नरकमें गिरते मुझको भी पवित्र कीजिए। शिवने गंगासे कहा, देवि, मुनिको पवित्र कीजिए और तुरंत लौटकर न जाइए, वैवस्वत मनुके अढ़ाईसवें कलियुगतक यहीं रहिए। गंगा बोलीं, महेश्वर, यदि सब नदियोंसे मेरा माहात्म्य अधिक हो और अम्बिका तथा गणोंके साथ आप भी यहाँ रहें, तभी मैं इस धरातलपर ठहरूँगी। शिवने कहा, गंगे, मैं आपसे अलग नहीं हूँ, फिर भी आपके कहे अनुसार यहीं स्थित रहूँगा।

भस्मधवल शिव सुनहरी पार्वती और गणों के साथ प्रकट होते हैं, जटा से छूटा जल परम सुन्दरी गंगा का रूप धरकर करोड़ों पार्थिव लिंगों पर बरसता है, ज्योतिर्मय त्र्यम्बक लिंग दमकता है और गौतम तथा अहल्या हाथ जोड़े नतमस्तक होते हैं जबकि देवगण पुष्प बरसाते हैं।

तभी देवता, प्राचीन ऋषि और अनेक तीर्थ वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने जय-जयकार करते हुए गौतम, गंगा और गिरिशायी शिवका पूजन किया और वर माँगनेको कहे जानेपर प्रार्थना की कि आप दोनों लोकके हितके लिए सदा यहीं निवास कीजिए। देवताओंने वचन दिया कि जब-जब बृहस्पति सिंह राशिपर आयेंगे, तब-तब सब तीर्थ, सरोवर, नदियाँ और देवगण यहीं गौतमीके तटपर आकर स्नान करेंगे। इस प्रकार वह गंगा गौतमी अथवा गोदावरीके नामसे विख्यात हुई और शिवका ज्योतिर्मय लिंग त्र्यम्बक कहलाया। भक्तिभावसे जो इस लिंगका दर्शन, पूजन और वन्दना करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

वैद्यनाथ और रावणका अभिमान

अब सुनिए वैद्यनाथेश्वर लिंगकी कथा। पुलस्त्यकुलका राक्षसराज रावण, जो अपने अहंकारको सदा प्रकट करता रहता था, पहले कैलासपर शिवकी आराधना करता रहा। जब इतनेसे संतोष न हुआ, तब उसने हिमालयसे दक्षिण, पृथ्वीके भीतर गहरा गड्ढा खोदकर अग्नि स्थापित की और अपने पास शिवको स्थापित करके भीषण ग्रीष्ममें पाँच अग्नियोंके बीच बैठकर कठोर तप किया। इस तपसे भगवान शिवका कृपाप्रसाद पाकर रावणने हाथ जोड़कर कहा, देवेश्वर, प्रसन्न होइए, मैं आपको लंका ले चलता हूँ, मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिए, मैं आपकी शरणमें आया हूँ। शंकर कुछ असमंजसमें पड़कर बोले, राक्षसराज, मेरी सारगर्भित बात सुनिए, इस उत्तम शिवलिंगको भक्तिसे अपने घर ले जाइए, परंतु जहाँ भी इसे भूमिपर रख देंगे, यह वहीं स्थिर हो जायगा; इसमें संदेह नहीं।

पांच धधकती अग्नियों के बीच गड्ढे में बैठा दस मुख और बीस भुजाओं वाला भस्मलिप्त रावण कठोर तप करता है, और ऊपर से कृपालु भस्मधवल शिव उसके हाथ में दमकता शिवलिंग सौंपते हैं इस चेतावनी के साथ कि जहां यह भूमि पर रखा जाएगा वहीं सदा के लिए स्थिर हो जाएगा।

वही हुआ। यह दिव्य लिंग सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिए वहीं स्थिर होकर वैद्यनाथ कहलाया, और रावण शिवका परम उत्तम वर पाकर अपने घर लौट गया। वहाँ उसने हर्षसे मन्दोदरीको सारी बातें सुनायीं। यह समाचार पाकर इन्द्र आदि देवता घबरा उठे कि यह देवद्रोही अब शिवके वरदानसे और क्या करेगा। उन्होंने नारदजीको भेजा। नारदने रावणसे कहा, यदि शिवका वरदान सचमुच सफल हुआ है तो कैलासको उठाकर देखिए। बात रावणको रुच गयी। उसने कैलासको उखाड़ लिया, जिससे पर्वत हिल उठा। तब गिरिजाके कहनेपर महादेवजीने रावणको घमंडी जानकर शाप दिया कि इस बलका इतना दर्प व्यर्थ है; इन भुजाओंका घमंड चूर करनेवाला वीर पुरुष शीघ्र ही इस जगतमें अवतीर्ण होगा। यह सुनकर भी रावण प्रसन्न-चित्त लौट गया। लोकमें प्रचलित बालक-प्रसंग इस संहितामें नहीं आता; यहाँ लिंग सीधे वहीं स्थिर होकर वैद्यनाथ कहलाता है।

दस मुख और बीस भुजाओं वाला बलशाली रावण हिमधवल कैलास को नीचे से उठाकर हिला देता है, कांपते शिखर पर बैठे भस्मधवल शिव और सुनहरी गिरिजा के बीच शिव हाथ उठाकर अभिमानी राक्षसराज को शाप देते हैं कि उसके भुजबल का दर्प चूर करने वाला वीर शीघ्र अवतरित होगा।

नागेश्वर: दारुक और सुप्रिय

अन्तमें नागेश्वर लिंगका प्रसंग सुनिए। पश्चिम समुद्रके तटपर सोलह योजन विस्तारका एक समृद्ध वन था। पार्वतीने उसकी देख-रेख दारुका नामक राक्षसीको सौंप रखी थी, और वरदान ऐसा था कि वह जहाँ जाती, वह सारा वन भूमि और वृक्षोंसहित उसके साथ चला जाता। यही दारुका अपने बलवान पति राक्षस दारुकके साथ वहाँ रहती और प्राणियोंको भय देती थी। वे दुष्ट यज्ञ और धर्मका नाश करते फिरते थे। पीड़ित प्रजाने महर्षि और्वके पास जाकर अपना दुःख सुनाया। और्वने शाप दिया कि ये राक्षस यदि पृथ्वीपर प्राणियोंकी हिंसा या यज्ञोंका विध्वंस करेंगे तो उसी क्षण प्राणोंसे हाथ धो बैठेंगे।

यह शाप सुनकर देवता राक्षसोंपर चढ़ आये। राक्षस दुविधामें पड़े, क्योंकि लड़ें तो शापसे मरें, न लड़ें तो पराजित होकर मरें। तब दारुकाने कहा, भवानीके वरदानसे मैं इस सारे वनको जहाँ चाहूँ ले जा सकती हूँ। यों कहकर वह समूचे वनको ज्यों-का-त्यों समुद्रमें ले धँसी। अब राक्षस जलके भीतर निर्भय होकर प्राणियोंको सताने लगे।

एक बार मनुष्योंसे भरी बहुत सी नावें उधरसे निकलीं। राक्षसोंने सबको पकड़कर बेड़ियोंमें बाँध कारागारमें डाल दिया। उन बंदियोंमें सुप्रिय नामका एक वैश्य था, जो उस दलका सरदार और भगवान शिवका परम भक्त था। भस्म और रुद्राक्ष धारण करनेवाला सुप्रिय शिवकी पूजा किये बिना अन्न न लेता था। बंदीगृहमें भी उसने अपने साथियोंको शिवपूजा सिखा दी, और सब नमः शिवाय कहते हुए शंकरका ध्यान करने लगे। सुप्रियको शिवके दर्शन भी होने लगे। यह जानकर दारुक क्रोधसे भरकर आया और राक्षसोंको सुप्रियका वध करनेको दौड़ाया। भयसे व्याकुल सुप्रिय दृढ़ प्रेमसे शिवका ध्यान और नाम-जप करते हुए पुकार उठा, देवेश्वर शंकर, मेरी रक्षा कीजिए।

समुद्र में डूबे राक्षसों के बंदीगृह में बेड़ियों से बंधा भस्म और रुद्राक्षधारी वैश्य सुप्रिय अपने साथी बंदियों के साथ छोटे शिवलिंग के आगे हाथ जोड़े शिव का ध्यान करता है, तभी क्रोध में भरा काला राक्षस दारुक गदा उठाए उसे मारने को झपटता है।

शम्भु प्रसन्न होकर स्वयं पाशुपत अस्त्र लेकर प्रकट हुए और प्रधान राक्षसों तथा उनके सेवकोंको तत्काल नष्ट करके अपने भक्तकी रक्षा की। फिर उन्होंने उस वनको वर दिया कि आजसे यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चारों वर्णोंके धर्मका पालन हो, श्रेष्ठ मुनि यहाँ निवास करें और तमोगुणी राक्षस कभी न रहें। इसी समय दारुकाने दीन होकर पार्वतीकी स्तुति की। देवीके प्रसन्न होनेपर उसने प्रार्थना की कि मेरे पुत्र इसी वनमें बसें। शिवने कहा, प्रिये, यदि आप ऐसा चाहती हैं तो मेरा वचन सुनिए। भक्तोंकी रक्षाके लिए मैं भी इसी वनमें रहूँगा; जो यहाँ वर्णधर्मका पालन करते हुए प्रेमसे मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती होगा। कलियुगके अन्त और सत्ययुगके आरम्भमें महासेनका पुत्र वीरसेन यहाँ आकर मेरा दर्शन करते ही चक्रवर्ती सम्राट हो जायगा।

इस प्रकार लीला करते हुए वे दोनों वहीं स्थित हो गये। ज्योतिर्लिंगरूप महादेव वहाँ नागेश्वर कहलाये और शिवा देवी नागेश्वरीके नामसे विख्यात हुईं। जो प्रतिदिन आदरसे नागेश्वरके इस प्रादुर्भाव (manifestation) को सुनता है, वह अपने समस्त मनोरथ पा लेता है और उसके महापातक भी भस्म हो जाते हैं।

भस्मधवल शिव हाथ में दमकता पाशुपत अस्त्र लिए प्रकट होकर प्रधान राक्षसों को खदेड़ देते हैं और हाथ जोड़े कांपते सुप्रिय की रक्षा करते हैं, फिर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग रूप में विराजते हैं, समीप सुनहरी पार्वती देवी नागेश्वरी बनकर बैठती हैं और नत राक्षसी दारुका उनके चरणों में झुकती है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), कोटिरुद्रसंहिता

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