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मत्स्य अवतार

कथा 32 · भागवतम् की कथाएँ

मत्स्य अवतार

The Tiny Fish That Outgrew the Ocean
स्कन्ध 8, अध्याय 24

परीक्षित् ने गंगा की ओर देखा, जहाँ शाम का पानी बहता जा रहा था, और शुकदेव से पूछा, ”भगवन्, कल आपने उस बालक की निडरता की बात कही थी जो आग में भी नहीं डगमगाया। मेरे पास अब चंद दिन रह गए हैं, और जब मैं इस बहती धारा को देखता हूँ तो मन में एक सवाल उठता है। प्रलय में जब सब कुछ बह जाता है, तब वह कौन-सी डोर है जो बचा रहती है? किसी ने उस महाजल को देखा है, और लौटकर बताया है?”

शुकदेव मुस्कुराए। उनकी आवाज़ धीमी रही, जैसे वे किसी बहुत पुरानी सुबह में लौट गए हों। ”राजन्, एक ऐसा राजा हुआ था, सत्यव्रत। उसने वह जल देखा भी और उसके पार भी गया। और जो उसे पार ले गया, वह आरंभ में हथेली-भर पानी में समा जाता था।”

Painterly classical-Indian color scene: the ascetic king-sage Satyavrata, lean and serene with matted hair and rudraksha, standing calf-deep in the cool Kritamala river at dawn, both palms cupped together offering a trembling handful of water (tarpana) as droplets slip from his fingers, golden sunrise light on the rippling stream, forest banks behind.

सत्यव्रत तपस्वी राजर्षि था, केवल जल पीकर भगवान् के ध्यान में लगा रहता। हर सुबह वह कृतमाला नदी में उतरता, ठंडा पानी पिंडलियों तक चढ़ता, और दोनों हथेलियाँ जोड़कर तर्पण करता। पानी की वह अंजुलि उसके हाथ में काँपती, बूँदें उँगलियों से फिसलतीं, और वह मंत्र पढ़ता जाता।

एक सुबह उसने पानी अंजुलि में भरा, और हथेली में कुछ हिला।

एक नन्ही मछली। इतनी छोटी कि उँगली के पोर से बड़ी न थी। पानी के साथ वह उसकी हथेली में आ गिरी थी, और इधर-उधर तड़प रही थी।

सत्यव्रत ने उसे नदी में वापस छोड़ना चाहा। तभी एक आवाज़ आई, इतनी बारीक कि पहले उसे अपना ही भ्रम लगा।

Painterly classical-Indian color scene: Satyavrata's open cupped palm holding river water with one tiny fish, no bigger than a fingertip, flickering and pleading; the king pauses mid-gesture, head bowed in tender attention, eyes soft, sunlight glinting on the water in his hand at the river's edge.

”राजन्, मुझे इस धारा में वापस न डालिए। मुझे डर लगता है। बड़ी मछलियाँ मुझे निगल जाएँगी। मुझे अपने साथ ले चलिए।”

सत्यव्रत की हथेली एक पल को रुक गई। मछलियाँ नहीं बोलतीं, यह वह जानता था। पर उसका हृदय सीधा था, और किसी डरे हुए की पुकार को टालना उसे नहीं आता था।

उसने मछली को अपने कमंडल में रखा, पानी भरा, और उसे साथ आश्रम ले आया।

उसी एक रात में मछली कमंडल में इतनी बढ़ गई कि उसमें उसके लिए जगह ही न रही। शरीर गोलाई में मुड़ा हुआ था, और पानी किनारों से छलक रहा था।

”राजन्, यह बर्तन अब मेरे लिए छोटा है। मुझे थोड़ी और जगह दीजिए, जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ।”

सत्यव्रत एक बहुत बड़े पानी के मटके में मछली को सावधानी से उतार दिया।

पर वहाँ डालने पर मछली दो ही घड़ी में तीन हाथ बढ़ गई, और मटका भी छोटा पड़ गया।

”राजन्, यह मटका भी अब मेरे लिए पर्याप्त नहीं। मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे कोई बड़ा-सा स्थान दीजिए।”

सत्यव्रत ने उसे एक सरोवर में डाल दिया। पर वहाँ भी वह थोड़ी ही देर में इतनी बढ़ गई कि उसने एक महामत्स्य का आकार धारण कर लिया, और सरोवर के जल को ही घेर लिया।

”राजन्, मैं जलचर प्राणी हूँ। इस सरोवर का जल भी मेरे सुखपूर्वक रहने के लिए पर्याप्त नहीं। आप मेरी रक्षा कीजिए, और मुझे किसी अगाध सरोवर में रख दीजिए।”

सत्यव्रत उसे एक-एक करके और बड़े सरोवरों में ले गया, पर जितना बड़ा सरोवर होता, उतनी ही बड़ी वह हो जाती। अन्त में उसने उस लीलामत्स्य को समुद्र में छोड़ दिया।

समुद्र में डालते समय मत्स्य ने कहा, ”वीर, समुद्र में बड़े-बड़े बली मगर आदि रहते हैं, वे मुझे खा जाएँगे; मुझे समुद्र के जल में मत छोड़िए।”

और सत्यव्रत ठिठक गया। समुद्र में भी वह काया बढ़ती ही गई। जहाँ तक नज़र जाती, खारा पानी, और उसके बीच वह एक देह जो क्षितिज को छूने लगी थी।

Painterly classical-Indian color scene: an enormous golden fish (mahamatsya) filling the vast salt sea to the horizon, its body so huge it touches the sky; on the shore Satyavrata kneels on both knees with palms joined in reverence, recognizing it as Lord Shri Hari, awe on his face, churning waves around the colossal form.

तब सत्यव्रत समुद्र के किनारे घुटनों के बल बैठ गया, और हाथ जोड़ दिए। ”प्रभु, आप कौन हैं? आपने एक ही दिन में चार सौ कोस के विस्तार वाले सरोवर को घेर लिया। आज तक न देखा, न सुना कि कोई जलचर इस तरह बढ़ता चला जाए। अवश्य ही आप साक्षात् श्रीहरि हैं, और जीवों पर अनुग्रह करने को आपने यह रूप धरा है।”

तब उस महामत्स्य ने मीठी वाणी में सत्यव्रत से कहा, ”राजन्, मैं श्रीहरि हूँ। पिछले कल्प के अन्त में जब ब्रह्मा जी सोने लगे और वेद उनके मुख से निकल पड़े, तब हयग्रीव नामक दैत्य उन्हें चुरा ले गया। मैंने वही वेद लौटाने को यह रूप धरा है। और आपके पास एक चेतावनी लेकर आया हूँ।”

”आज से सात दिन बाद तीनों लोक प्रलय के समुद्र में डूब जाएँगे। उस समय मेरी भेजी हुई एक बहुत बड़ी नाव आपके पास आएगी। उसमें सब प्रकार के बीज भर लीजिए, सब प्राणियों के सूक्ष्मशरीर ले लीजिए, और साथ में सात ऋषियों को भी बैठा लीजिए।”

”जब प्रचण्ड आँधी से वह नाव डगमगाने लगे, तब मैं इसी रूप में वहाँ आ जाऊँगा। आप उस नाव को वासुकि नाग के द्वारा मेरे सींग से बाँध देना। मैं ब्रह्मा जी की रात रहने तक आपको खींचता हुआ प्रलय के समुद्र में विचरण कराऊँगा। निडर रहिए, मैं स्वयं आपको ढूँढ़ लूँगा।”

सत्यव्रत ने सिर झुका दिया, और जब उसने आँखें उठाईं, समुद्र फिर वैसा ही था, खाली और शांत।

वह लौटा। एक-एक चीज़ इकट्ठी की, अनाज और हर प्रकार के बीज, सब प्राणियों के सूक्ष्मशरीर, और वे सात ऋषि जिनके कंठ में वेद सुरक्षित थे।

सातवें दिन आकाश में पहली गड़गड़ाहट हुई। फिर प्रलयकाल के भयंकर मेघ मूसलधार बरसने लगे, बिना थमे।

धीरे-धीरे सारी पृथ्वी जल में डूबने लगी। समुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर चढ़ आया, पहाड़ों की चोटियाँ एक-एक कर पानी के नीचे चली गईं, और सब कुछ एक ही अथाह सागर में मिल गया।

तभी भगवान् के बताए अनुसार वह बड़ी नाव आ पहुँची। सत्यव्रत बीज और सूक्ष्मशरीर लेकर सप्तर्षियों के साथ उस पर सवार हो गया। सप्तर्षियों ने बड़े प्रेम से कहा, ”राजन्, भगवान् का ध्यान कीजिए। वे ही हमें इस संकट से बचाएँगे और हमारा कल्याण करेंगे।”

उस अंतहीन जल पर सिर्फ़ एक नाव तैरती रही। सत्यव्रत की।

Painterly classical-Indian color scene: on an endless flood-ocean under storm-dark sky, a single boat floats; the water bursts open and a colossal golden Matsya, four lakh kos long and radiant like gold, rises with one great heavy horn on its head, waves circling its body as it draws near the lone boat.

और तभी पानी फटा, और एक विशाल काया ऊपर उठी। चार लाख कोस लंबी, सोने के समान देदीप्यमान, और उसके मस्तक पर एक बड़ा भारी सींग।

मत्स्य।

वह काया धीरे से नाव के पास आ ठहरी, और लहरें उसके इर्द-गिर्द गोल घूमने लगीं।

”राजन्, अपनी नाव मेरे सींग से बाँध दीजिए। वासुकि नाग को रस्सी बना लीजिए।”

Painterly classical-Indian color scene: Satyavrata aboard the boat with the seven sages, using the great serpent Vasuki as a rope to tie one end of the boat to the golden Matsya's single horn while gripping the other end in his fist; the radiant horned fish poised to tow them across the deluge sea, storm clouds and rain above.

सत्यव्रत ने वासुकि को ही डोर की तरह कसा, नाव के एक छोर को सींग से बाँधा, और दूसरा छोर अपनी मुट्ठी में थाम लिया। यह वही था जो पहले राजा ने मनु को कहा था, सो किया गया, और सत्यव्रत ने प्रसन्न होकर भगवान् की स्तुति की।

फिर मत्स्य ने नाव को खींचना शुरू किया। उस उमड़ते सागर के आर-पार, प्रलय के बीचोबीच, एक नन्ही नाव और उसे थामे हुए अनंत। और उसी प्रलय के समुद्र में विहार करते हुए मत्स्य ने सत्यव्रत और ऋषियों को आत्मतत्त्व का वह उपदेश सुनाया, ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग से परिपूर्ण वह दिव्य पुराण, जिसे ‘मत्स्यपुराण’ कहते हैं। मत्स्य ने पहले ही कहा था कि जिसका नाम ‘परब्रह्म’ है, वह महिमा सत्यव्रत के हृदय में प्रकट होगी, और वह उसे ठीक-ठीक जान लेगा। नाव चलती रही, और सत्यव्रत सन्देहरहित होकर सनातन ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्व का श्रवण करता रहा।

आख़िर प्रलय का अन्त हुआ और वह ब्राह्म रात्रि बीत गई। जल उतरने लगा, और एक नई पृथ्वी सतह पर उभरी। तब मत्स्य ने सत्यव्रत की ओर देखा।

”राजन्, अब यहीं ठहरिए। यह आपकी नई पृथ्वी है। आप सूर्य के पुत्र श्राद्धदेव हैं, और इस कल्प के वैवस्वत मनु आप ही होंगे। यहीं से नया जीवन आरंभ कीजिए।”

और भगवान् ने हयग्रीव असुर को मारकर उससे वेद छीन लिए और ब्रह्मा जी को लौटा दिए। फिर वह विशाल काया जल में घुलकर अदृश्य हो गई, जैसे कभी थी ही नहीं।

सत्यव्रत, जो अब मनु था, उस गीली धरती पर उतरा। उसने बीज मिट्टी में बोए, हर प्रजाति के जोड़े छोड़े, और सात ऋषियों ने अपने कंठ में बचा रखे वेद फिर से गुनगुनाने शुरू किए।

एक नया चक्र, उसी हथेली-भर पानी से, जिसे एक राजा ने टाल देने के बजाय थाम लिया था।

मन्थन

परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, मुझे यह बात देर तक रोके रखेगी। जो अनंत है, जो समुद्र में नहीं समाता, वही पहले-पहल एक राजा की हथेली में एक डरी हुई मछली बनकर आया, और बस इतना माँगा कि उसे टाला न जाए।”

शुकदेव ने सिर हिलाया। ”यही उस कथा का मर्म है, राजन्। सत्यव्रत चाहता तो हाथ झटक देता, यह सोचकर कि एक नन्ही मछली से क्या होना है। पर उसने उस पुकार को सुना, और उसी सुनने ने उसे प्रलय के पार पहुँचा दिया।”

”श्रीहरि बड़े-बड़े विस्फोटों में ही नहीं उतरते। कभी वे सब में छोटी ज़रूरत बनकर आते हैं, एक काँपती आवाज़, एक जुड़ी हुई हथेली। जो उसे थाम लेता है, उसकी हथेली में फिर सारी सृष्टि समा जाती है।”

परीक्षित् ने पूछा, ”और जो बचा लिया जाता है, उस पर फिर एक भार भी आ पड़ता है, क्या यही?”

”हाँ,” शुकदेव ने कहा। ”मत्स्य ने सत्यव्रत को बचाया, और उसी साँस में उसे मनु बना दिया। नई पृथ्वी सौंप दी, बीज सौंप दिए, वेद सौंप दिए। जिसे श्रीहरि उठाते हैं, उसे वे यूँ ही नहीं छोड़ देते; वे उसे एक काम दे जाते हैं।”

गंगा बहती रही, और शाम की रोशनी धारा पर काँपती रही। एक दिन और बीत चुका था।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय चौबीस में है। प्रलय के समय सत्यव्रत मनु, वेदों और सृष्टि के बीजों को बचाने वाला यह दशावतारों में पहला अवतार माना जाता है।

शुकदेव परीक्षित् को इसे संक्षेप में सुनाते हैं; मत्स्य-पुराण में यही कथा कहीं विस्तार से आती है। भागवत का स्वर सदा संक्षिप्त और भीतर की ओर मुड़ा हुआ है, जहाँ रक्षा अंततः शरणागति की कथा बन जाती है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

कोई पुकार कभी छोटी नहीं होती। एक डरी हुई आवाज़ को टाल देना सरल था, पर सत्यव्रत ने उसे हथेली में थाम लिया, और वही हथेली एक डूबते संसार को पार ले गई। जिसे आज हम तुच्छ समझकर लौटा देते हैं, हो सकता है कल वही हमें थामे।