नरकासुर

कथा 54 · भागवतम् की कथाएँ

नरकासुर

16,100 Princesses, One Liberation
स्कन्ध 10, अध्याय 59

नरकासुर एक powerful राक्षस था। पृथ्वी का पुत्र। (कथा थोड़ी complex है, पर वो वराह-अवतार से जन्मा था।)

उसने एक काम किया जो किसी ने नहीं किया था।

उसने 16,100 राजकुमारियों को बँदी बनाया।

हर राज्य से। उन्हें अपने महल में रखा। उन्हें अपनी पत्नी बनाने का इरादा।

ये राजकुमारियाँ रोती रहीं। उनके राज्य से बाहर। उनके परिवार से दूर। एक राक्षस की क़ैद में।

धरती-माँ (नरकासुर की माँ) देख रही थीं। उन्हें अपने बेटे की हरकत पसंद नहीं।

उन्होंने इन्द्र को बताया। ”मेरा बेटा हाथ से निकल गया है। उसे रोको।”

इन्द्र ने कृष्ण को बुलाया।

कृष्ण और सत्यभामा (कृष्ण की पत्नी, जो एक great योद्धा भी थी) ने अपना रथ निकाला।

नरकासुर के राजधानी पहुँचे। प्रागज्योतिषपुर।

वहाँ एक मज़बूत क़िला। सात दीवारें। दानव-पहरे।

कृष्ण ने अपनी ताक़त से सब दीवारें तोड़ीं। अंदर पहुँचे।

नरकासुर बाहर आया। एक भयानक युद्ध।

वो भी powerful था। उसके पास हज़ार हाथ। हर हाथ में शस्त्र।

कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र निकाला।

एक झटके में, नरकासुर के हज़ार हाथ कटे। उसका सिर अलग।

षोडशाधिकसहस्राणि कन्याः कन्यापुरस्थिताः ।
शाश्वतं श्रीहरेर्योगात् पतिमेकं समाप्नुयुः ॥

सोलह हज़ार से ज़्यादा कन्याएँ, जो उस राक्षस के नगर में बँदी थीं, हरि के योग-बल से, एक ही पति को प्राप्त हुईं।

वो मरा।

कृष्ण और सत्यभामा महल में गए।

वहाँ 16,100 राजकुमारियाँ। एक hall में।

वो सब चुप-चाप बैठीं थीं। उनके चेहरों पर एक despair।

कृष्ण ने अंदर जाते ही कहा, ”अब तुम सब आज़ाद। अपने-अपने घर जाओ।”

एक लंबी चुप्पी।

फिर एक राजकुमारी आगे आई।

”हम कहाँ जाएँ?”

कृष्ण ने उसे देखा।

”अपने घर। अपने माँ-बाप के पास।”

”हम वहाँ नहीं जा सकतीं।”

”क्यों?”

”क्योंकि,” दूसरी राजकुमारी ने कहा, ”हम एक राक्षस के घर में रहीं। चाहे हमारी ग़लती नहीं, लेकिन समाज हमें वापस स्वीकार नहीं करेगा। हमारे पिता का सम्मान कम होगा।”

”हम अब किसी से विवाह नहीं कर सकतीं। पवित्र-दोष की वजह से।”

”हमें कहीं जगह नहीं है। अगर तुम हमें यहाँ से निकाल भी दो, हम भिखारी हो जाएँगी, या वेश्या।”

कृष्ण को एक झटका।

वो जानते थे कि यह सच था। उस समय का समाज, और कई बार आज भी, ऐसा था।

एक victim को पवित्र-दोष का burden।

उन्होंने सत्यभामा को देखा। फिर राजकुमारियों को।

”ठीक है। मैं तुम सब से विवाह करता हूँ।”

”क्या? सब से?”

”हाँ। हर एक एक रानी होगी। हर एक का अपना महल होगा द्वारका में।”

”हम 16,100 हैं।”

”ठीक है।”

कृष्ण ने अपनी योग-शक्ति से एक काम किया।

उन्होंने अपने आप को 16,100 रूप में duplicate किया। हर रानी के लिए एक।

और हर एक रानी के पास, हमेशा, एक कृष्ण।

द्वारका में 16,100 महल बने।

ये राजकुमारियाँ अब रानियाँ। उनके माँ-बाप के सम्मान बच गए, क्योंकि वो कृष्ण की पत्नियाँ बनीं।

और कृष्ण उन सब को पूरी तरह devoted। हर एक के साथ।

नारद एक बार आश्चर्य में देखने आए। वो हर महल में गए। हर जगह कृष्ण को पाया, अपनी रानी के साथ engaged।

”यह कैसे संभव?”

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, ”योग।”

मन्थन

नरकासुर की कथा एक radical सामाजिक statement है।

16,100 राजकुमारियाँ। एक राक्षस की क़ैद में।

जब वो मरा, वो सब आज़ाद हुईं। पर कहाँ जातीं?

उनका समाज उन्हें वापस नहीं ले सकता था। पवित्र-दोष की वजह से।

यह एक brutal social reality। आज भी, victims को blame करते हैं।

कृष्ण ने एक radical decision लिया, ”मैं सब से विवाह करूँगा।”

यह कोई romantic decision नहीं। यह एक practical compassion थी।

इन सब को सम्मान देना। उनके पिता-घर का इज़्ज़त बचाना। और उन्हें एक future देना।

और कृष्ण ने अपने आप को duplicate कर दिया। हर रानी के पास, एक पूरा कृष्ण।

इस कथा का एक deep message है। compassion के लिए कभी-कभी conventional rules तोड़ने पड़ते हैं।

एक पति 16,100 पत्नियाँ? यह conventional नहीं। पर वो situation conventional नहीं थी।

और कृष्ण ने उस situation का response तैयार किया। personal cost के बावजूद।

यह कथा कह रही है, अगर सच में किसी की मदद करनी हो, तो rules को थोड़ा सा bend करना ग़लत नहीं।