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नरकासुर
भौमासुर, जिसे नरकासुर भी कहते हैं, भूमि का पुत्र था, धरती की कोख से जन्मा एक दैत्य। बल इतना कि देवता भी उससे आँख न मिला पाते।
उसने वरुण का छत्र छीन लिया था, अदिति माता के जगमगाते कुण्डल उतार लिये थे, और मेरु पर्वत पर स्थित देवताओं का मणिपर्वत भी हर लिया था। और उसने एक ऐसा काम किया था जिसकी पहले किसी ने हिम्मत न की थी, उसने अनेक राजाओं की राजकुमारियों को बलपूर्वक उठा लाकर बन्दी बना रखा था।
हर राज्य से उठा लाया था उन्हें, हर दिशा से। अपने महल के भीतर एक बंद कक्ष में बैठा रखा था, इस इरादे से कि सबको अपने अधिकार में रखेगा।
वे राजकुमारियाँ दिन-रात रोती रहतीं। अपने नगर से दूर, अपनी माँ की गोद से दूर, एक दैत्य की दीवारों के भीतर। रात गहराती तो किसी की सिसकी दूसरे को जगा देती, और सवेरा होते-होते सब फिर ख़ामोश हो जातीं, जैसे आँसू भी चुक गए हों।
देवताओं की पुकार जब बहुत बढ़ी, इन्द्र स्वयं द्वारका पहुँचे और श्रीहरि के सामने भौमासुर की एक-एक करतूत कह सुनाई।

कृष्ण और सत्यभामा गरुड़ पर सवार हुए, और प्राग्ज्योतिषपुर की ओर चल पड़े।
प्राग्ज्योतिषपुर में प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था।
पहले उसके चारों ओर पहाड़ों की किलेबन्दी थी, फिर शस्त्रों का घेरा, फिर जल से भरी गहरी खाई, फिर आग और बिजली की दीवारें, और सबके भीतर मुर दैत्य के बिछाए हुए पाश की रस्सियों का सुदृढ़ जाल। द्वार-द्वार पर दैत्यों का पहरा था।

श्रीकृष्ण ने अपनी गदा की चोट से पहाड़ों को तोड़-फोड़ डाला और शस्त्रों के मोर्चों को बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया। फिर चक्र से आग, जल और वायु की दीवारों को तहस-नहस कर दिया और मुर के पाश-जाल को तलवार से काट-काटकर अलग कर दिया। जो बड़े-बड़े यन्त्र वहाँ लगे थे, उन्हें तथा वीरों के हृदयों को शंखनाद से विदीर्ण कर दिया, और नगर के परकोटे को अपनी भारी गदा से ध्वंस कर डाला।
भगवान् के पांचजन्य शंख की ध्वनि प्रलयकाल की बिजली की कड़क के समान गूँजी।
उस गर्जना से मुर दैत्य की नींद टूटी, जो अब तक जल के भीतर सोया पड़ा था। पाँच सिरवाला वह दैत्य प्रलयकाल के सूर्य और अग्नि के समान प्रचण्ड तेज लिये बाहर निकल आया, इतना भयंकर कि उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी सहज न था।
उसने त्रिशूल उठाया और इस प्रकार श्रीहरि की ओर दौड़ा जैसे साँप गरुड़ पर टूट पड़े। ऐसा जान पड़ा मानो वह अपने पाँचों मुखों से तीनों लोकों को निगल जाएगा।
उसने त्रिशूल को बड़े वेग से घुमाकर फेंका और अपने पाँचों मुखों से घोर सिंहनाद किया, जिसका शब्द पृथ्वी, आकाश, पाताल और दसों दिशाओं में फैलकर सारे ब्रह्माण्ड में भर गया।
श्रीकृष्ण ने फुर्ती से दो बाण मारे, जिनसे वह त्रिशूल कटकर तीन टूक हो गया। साथ ही उन्होंने मुर के मुखों में भी बहुत-से बाण मारे। तब क्रोध से भरकर मुर ने अपनी गदा चलायी, पर श्रीहरि ने अपनी गदा के प्रहार से उस गदा को बीच ही में चूर-चूर कर दिया।

अस्त्रहीन होकर वह दैत्य भुजाएँ फैलाए श्रीकृष्ण की ओर झपटा, और भगवान् ने खेल-खेल में ही चक्र से उसके पाँचों सिर उतार लिये। सिर कटते ही मुर के प्राण उड़ गए और वह जल में जा गिरा, जैसे इन्द्र के वज्र से शिखर कट जाने पर कोई पर्वत समुद्र में गिर पड़ा हो।
मुर के सात पुत्र थे, ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। पिता की मृत्यु से शोकाकुल होकर वे क्रोध से भर उठे और शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो गए। पीठ नामक सेनापति को आगे करके भौमासुर की आज्ञा से वे श्रीकृष्ण पर चढ़ आए।
बड़े क्रोध से वे भगवान् पर बाण, खड्ग, गदा, शक्ति, ऋष्टि और त्रिशूल आदि प्रचण्ड शस्त्रों की वर्षा करने लगे। पर भगवान् की शक्ति अमोघ और अनन्त है। उन्होंने अपने बाणों से उनके कोटि-कोटि शस्त्रास्त्र तिल-तिल करके काट गिराये। फिर सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्यों के सिर, जाँघें, भुजाएँ और कवच काटकर उन सबको यमराज के घर पहुँचा दिया।
जब भौमासुर ने देखा कि उसकी सेना और सेनापति सब मृत्यु को प्राप्त हो गए, तब उसे असह्य क्रोध हुआ। वह बहुत-से मतवाले हाथियों की सेना लेकर नगर से बाहर निकला। उसने देखा कि श्रीकृष्ण अपनी पत्नी के साथ आकाश में गरुड़ पर स्थित हैं, जैसे बिजली के साथ वर्षाकाल का श्यामल मेघ सुशोभित हो।
भौमासुर ने वज्र को भी विफल कर देने वाली शतघ्नी नामक शक्ति चलायी, और उसके सब सैनिकों ने भी एक साथ अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़े। पर श्रीकृष्ण ने जो-जो शस्त्र चले, उनमें से प्रत्येक को तीन-तीन तीखे बाणों से काट गिराया। उसी समय भौमासुर के सैनिकों की भुजाएँ, जाँघें, गर्दन और धड़ कट-कटकर गिरने लगे; हाथी और घोड़े भी मरने लगे।

अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए एक त्रिशूल उठाया, पर उसे छोड़ भी न पाया था कि भगवान् ने छुरे के समान तीखी धार वाले चक्र से, हाथी पर बैठे ही बैठे, भौमासुर का सिर काट डाला।
उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल और सुन्दर किरीट सहित पृथ्वी पर जा गिरा। यह देखकर ऋषिगण ‘साधु, साधु’ कहने लगे और देवता भगवान् पर पुष्पों की वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे।
तब दैत्य की माता भूमि सामने आईं। उन्होंने श्रीकृष्ण के गले में वैजयन्ती के साथ वनमाला पहना दी, और अदिति माता के जगमगाते हुए कुण्डल, जो तपाये हुए सोने के और रत्नजटित थे, भगवान् को लौटा दिये, साथ ही वरुण का छत्र और मणिपर्वत भी उन्हें लौटा दिया। फिर हाथ जोड़कर उन्होंने अपने पौत्र भगदत्त के लिए अभय माँगा, और श्रीहरि ने उसे अभयदान देकर उसका राज्य बख़्श दिया। भगदत्त अपने राज्य में सुरक्षित रहा।
इसके बाद श्रीकृष्ण भौमासुर की समस्त सम्पत्तियों से भरे महल में पधारे।

वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भौमासुर बलपूर्वक राजाओं से सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियाँ छीनकर अपने यहाँ बन्द कर रखी थीं।
जब उन राजकुमारियों ने अन्तःपुर में पधारे हुए नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण को देखा, तब वे मोहित हो गयीं। उन्होंने भगवान् की अहैतुकी कृपा और अपना सौभाग्य समझकर मन-ही-मन उन्हें अपने परम प्रियतम पति के रूप में वरण कर लिया।
उनमें से प्रत्येक ने अपने मन में यही निश्चय किया कि ‘ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण करें।’ इस प्रकार उन्होंने प्रेम-भाव से अपना हृदय भगवान् के प्रति निछावर कर दिया।

तब श्रीकृष्ण ने उन राजकुमारियों को सुन्दर-सुन्दर निर्मल वस्त्राभूषण पहनाकर पालकियों में बैठाया और द्वारका भेज दिया। उनके साथ ही बहुत-से खजाने, रथ, घोड़े तथा अतुल सम्पत्ति भी भेजी, और ऐरावत के वंश में उत्पन्न हुए चार-चार दाँतों वाले सफेद रंग के चौंसठ हाथी भी द्वारका भिजवा दिये।
फिर श्रीकृष्ण अमरावती में देवराज इन्द्र के महल में गये। वहाँ इन्द्र ने इन्द्राणी सहित उनकी और सत्यभामा की पूजा की, और भगवान् ने अदिति के कुण्डल उन्हें लौटा दिये। लौटते समय सत्यभामा की प्रेरणा से उन्होंने कल्पवृक्ष पारिजात उखाड़कर गरुड़ पर रख लिया, और देवताओं को जीतकर उसे द्वारका ले आये। यह पारिजात उन्होंने सत्यभामा के महल के बगीचे में लगा दिया, और उस बगीचे की शोभा अत्यन्त बढ़ गयी।
द्वारका में जो सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियाँ बन्दी थीं, वे अब रानियाँ थीं, और भगवान् ने एक ही मुहूर्त में अलग-अलग भवनों में अलग-अलग रूप धारण करके एक ही साथ सब का शास्त्रोक्त विधि से पाणिग्रहण किया। सर्वशक्तिमान् अविनाशी भगवान् के लिए इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है?
हर रानी के अलग-अलग महल में ऐसी दिव्य सामग्रियाँ भरी थीं जिनकी जगत् में कोई बराबरी न थी। और उन सब महलों में, हर रानी के पास, हर घड़ी, अपने आत्मानन्द में मगन उनका अपना श्रीकृष्ण रहा, मानो संसार में और कोई रानी हो ही नहीं।
साहित्यिक-संदर्भ
नरकासुर-वध श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय उनसठ में है, जिसका शीर्षक ‘पारिजातहरण-नरकवध’ है। भूमि के पुत्र भौमासुर (नरकासुर) ने सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याओं को बन्दी बना रखा था; प्राग्ज्योतिषपुर के प्रमुख रक्षक मुर दैत्य और उसके सात पुत्रों तथा सेनापति पीठ का वध करने के बाद श्रीकृष्ण ने स्वयं नरकासुर को मारा, कन्याओं को मुक्त किया और अपनी रानियों के रूप में स्वीकार कर उनका मान लौटाया। इसी से अष्ट महिषियों समेत श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार आठ रानियों की प्रसिद्ध गणना भी जुड़ी है, यद्यपि स्रोत के अध्याय-शीर्षक में सोलह हज़ार एक सौ संख्या आती है।
दीपावली से ठीक पहले की चतुर्दशी, जिसे नरक-चतुर्दशी कहते हैं, इसी विजय की स्मृति में मनाई जाती है।
नरकासुर ने सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियों को बन्दी बना रखा था। दैत्य का वध तो एक पल का काम था; असली काम था उन्हें फिर से मान और आश्रय देना, जिन्हें मुक्त होकर भी अपना कोई ठौर न बचा था। श्रीहरि के दर्शन मात्र से उनका हृदय उन्हीं की ओर झुक गया, और उन्होंने सबको रानी का पद देकर उठा लिया। संसार जिसे भुला देता है, उसे अपने पास उठा लेना श्रीहरि की करुणा का स्वभाव है।
यही कथा वहाँ भी
- हरिवंश · नरकासुर-वध
हरिवंश का नरकासुर-वध