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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

ध्रुव की तपस्या

कथा 03 · भागवतम् की कथाएँ

ध्रुव की तपस्या

पाँच बरस का बालक जिसने स्वर्ग हिला दिया
स्कन्ध 4, अध्याय 8-12

पाँच बरस का बच्चा माँ की गोद से उठा, और भगवान् को ढूँढने निकल पड़ा।

एक ठुकराए हुए बालक की पुकार, जो ध्रुव-तारा बन गई।

भागवतम् 4.8-12

ध्रुव पाँच बरस का था जब उसने पहली बार जाना कि उसका कोई नहीं।

उसके पिता राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं। पहली सुनीति, ध्रुव की माँ। दूसरी सुरुचि, जो ध्रुव के सौतेले भाई उत्तम की माँ थी।

राजा सुरुचि से अधिक प्रेम करते थे। सुनीति, जिसका पुत्र ध्रुव था, उन्हें उतनी प्रिय नहीं थी। यह बात महल के हर कोने को मालूम थी, रसोई से लेकर दरबार तक।

एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बिठाकर प्यार कर रहे थे। उसी समय ध्रुव ने भी गोद में बैठना चाहा।

पर राजा ने उसका स्वागत नहीं किया।

सुरुचि ने डाह से भरकर ध्रुव से कहा कि वे राजसिंहासन पर बैठने के अधिकारी नहीं हैं।
सुरुचि ने डाह से भरकर ध्रुव से कहा कि वे राजसिंहासन पर बैठने के अधिकारी नहीं हैं।

तभी सुरुचि घमंड से भर उठी। उसने अपनी सौत के पुत्र ध्रुव को राजा की गोद में आने का यत्न करते देखा, और राजा के सामने ही उससे डाह-भरे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ मीठी थी, पर शब्द तीखे थे।

“बेटा, आप राजसिंहासन पर बैठने के अधिकारी नहीं। आप भी राजा के ही पुत्र हैं, इससे क्या हुआ; आपको मैंने अपनी कोख में तो धारण नहीं किया। आप अभी नादान हैं, आपको पता नहीं कि आपने किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है। यदि आपको राजसिंहासन की इच्छा है, तो तपस्या करके परम पुरुष श्रीनारायण की आराधना कीजिए, और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म लीजिए।”

पाँच बरस का बच्चा सब कुछ समझ नहीं पाया। पर इतना समझ गया कि इस गोद में उसके लिए जगह नहीं।

जिस प्रकार डंडे की चोट खाकर साँप फुफकार मारने लगता है, उसी प्रकार ध्रुव अपनी सौतेली माँ के कठोर वचनों से घायल होकर क्रोध के मारे लंबी-लंबी साँस लेने लगा। उसके पिता यह सब चुपचाप देखते रहे, मुँह से एक शब्द भी न बोले।

तब ध्रुव चुप-चाप पीछे हटा। फिर रोता हुआ अपनी माँ की कोठरी की ओर भागा।

सुनीति ने उसे रोते देखा। कारण पूछा। बच्चे ने सब बताया।

वन में एकाग्र खड़े ध्रुव की कठोर तपस्या, बालक की आँखों में भगवान् को पाने का हठ।
वन में एकाग्र खड़े ध्रुव की कठोर तपस्या, बालक की आँखों में भगवान् को पाने का हठ।

सुनीति के हाथ रुक गए। महल के दूसरे लोगों से अपनी सौत सुरुचि की कही हुई बातें सुनकर उसे भी बड़ा दुःख हुआ। उसका धीरज टूट गया। वह दावानल से जली हुई बेल के समान शोक से सन्तप्त होकर मुरझा गई। उसके कमल-सरीखे नेत्रों में आँसू भर आए। बच्चे की हिचकियाँ उसके सीने से टकरा रही थीं, और उसके पास उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं था। वह स्वयं उपेक्षित थी; अपने बेटे को वह क्या जगह दिला सकती थी?

उसने गहरी साँस लेकर ध्रुव से कहा, “लाला, आप दूसरों के लिए किसी प्रकार के अमंगल की कामना मत कीजिए। जो मनुष्य दूसरों को दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है। सुरुचि ने जो कुछ कहा, उसमें झूठ नहीं। उस गोद में आपको जगह नहीं मिलेगी। पर एक गोद और भी है, जहाँ यह नहीं पूछा जाता कि कौन किसके गर्भ से जन्मा। वहाँ केवल पुकार से जगह मिलती है। आपके परदादा ब्रह्माजी को भी वह परम पद उन्हीं श्रीहरि के चरणों की आराधना से मिला है, जो मन और प्राणों को जीतनेवाले मुनियों से भी वन्दनीय है। उन्हीं को पुकारिए।”

ध्रुव ने माँ की तरफ़ देखा। वो रो नहीं रहा था अब। उसकी आँखों में कुछ बस गया था।

उसने माँ के पैर छुए और बोला, “मैं जाऊँगा।”

“कहाँ?”

“वहाँ। जहाँ माँ ने कहा। उन्हें ढूँढने।”

और पाँच बरस का बच्चा निकल गया। अकेले। महल छोड़कर। जंगल की तरफ़।

मार्ग में नारद मुनि ध्रुव को रोकते हुए, अभी बालक हैं यह कहकर घर लौट जाने की सलाह देते हैं।
मार्ग में नारद मुनि ध्रुव को रोकते हुए, अभी बालक हैं यह कहकर घर लौट जाने की सलाह देते हैं।

रास्ते में नारद मुनि मिले। उन्होंने उसके मस्तक पर अपना पावन कर-कमल फेरते हुए रोकने की कोशिश की। “बेटा, अभी तो आप बच्चे हैं, खेल-कूद में ही मस्त रहते हैं। इस उम्र में किसी बात से किसी का सम्मान या अपमान कैसा? बड़े होकर जब परमार्थ-साधन का समय आवे, तब उसके लिए यत्न कर लीजिएगा। योगी लोग अनेकों जन्मों तक कठोर साधनाएँ करते रहते हैं, फिर भी भगवान् का मार्ग सहज नहीं पाते। आप घर लौट जाइए।”

ध्रुव ने कहा, “देवर्षि, विमाता के कटु वचन ने मेरे हृदय को बेध दिया है। आपके समता के उपदेश तक मेरी पहुँच अभी नहीं है। मुझे वह मार्ग बताइए जिससे त्रिलोकी में सबसे ऊँचा पद मिल सके।”

नारद चुप हो गए। उन्होंने उसे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मन्त्र दिया और एक ध्यान-तकनीक सिखाई। और कहा, “आपकी माता ने जो मार्ग बताया है, वही आपके लिए परम कल्याण का मार्ग है। आप यमुना के पवित्र तट पर मधुवन में जाकर तप कीजिए, वहाँ श्रीहरि का नित्य-निवास है।”

ध्रुव ने यमुना किनारे एक जगह चुनी। मधुवन। वहाँ बैठ गया।

बैठ गया मतलब, सच में बैठ गया। महीने दर महीने उसने आहार छोड़ा। फिर पानी। फिर साँस को धीमा कर दिया।

पहले महीने तीन-तीन रात के अन्तर से केवल कैथ और बेर के फल खाता रहा।

दूसरे महीने छः-छः दिन के पीछे सूखे घास और पत्ते।

तीसरे महीने नौ-नौ दिन पर केवल जल।

चौथे महीने बारह-बारह दिन के बाद केवल वायु।

बालक ध्रुव वन में तप के आसन पर स्थिर बैठे, मन भगवान् में एकाग्र, शरीर की सुधि तक भूली हुई।
बालक ध्रुव वन में तप के आसन पर स्थिर बैठे, मन भगवान् में एकाग्र, शरीर की सुधि तक भूली हुई।

पाँचवें महीने उसने साँस को जीत लिया और एक पैर पर खड़ा हो गया, खंभे की तरह निश्चल, अचल। साँस रुकी हुई।

उसकी तपस्या इतनी तीव्र हो गई कि तीनों लोक काँपने लगे।

जब उसने अपने अंगूठे के बल सारी पृथ्वी को दबा लिया, तो वह इस प्रकार झुक गई जैसे किसी गजराज के चढ़ जाने पर नाव पद-पद पर दायीं-बायीं ओर डगमगाने लगती है। ध्रुव का मन विश्वात्मा श्रीहरि में ऐसा लीन हुआ कि उसकी समष्टि प्राण से एकता हो गई। तब समस्त जीवों का साँस ही रुक गया।

देवता और लोकपाल घबरा उठे। वे सीधे श्रीहरि की शरण में गए। “भगवन्, समस्त जीवों का प्राण एक साथ रुक गया है। आप शरणागतों की रक्षा करनेवाले हैं, हमें इस दुःख से छुड़ाइए।” भगवान् ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे उस बालक को इस कठिन तप से निवृत्त कर देंगे।

ध्रुव का मन विश्वात्मा श्रीहरि में लीन हुआ, समस्त जीवों का प्राण थम गया, घबराए देवता भगवान् की शरण में पहुँचे।
ध्रुव का मन विश्वात्मा श्रीहरि में लीन हुआ, समस्त जीवों का प्राण थम गया, घबराए देवता भगवान् की शरण में पहुँचे।

आख़िर विष्णु ख़ुद आए, गरुड़ पर चढ़कर।

उस समय ध्रुव अपने हृदय-कमल में जिस मूर्ति का ध्यान कर रहा था, वह सहसा विलीन हो गई। घबराकर उसने ज्यों ही नेत्र खोले, भगवान् को उसी रूप में अपने सामने खड़ा देखा।

विष्णु ने अपना वेदमय शंख उसके गाल से छुआ दिया।

शंख का स्पर्श होते ही ध्रुव को वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गई। वह बड़ी भक्ति से धीरज के साथ श्रीहरि की स्तुति करने लगा।

विष्णु ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या माँगते हैं?”

ध्रुव वहाँ इसलिए गया था कि अपने सौतेले भाई से ऊँचा सिंहासन माँगे। उसने कहा, “प्रभु, मैं तो आपसे एक राजगद्दी माँगने आया था।”

विष्णु हँसे। बहुत प्रेम से।

“बेटा, आप जो माँगने आए थे, वह भी मिलेगा। आप राज्य पाएँगे, और छत्तीस हज़ार बरस धर्म से पृथ्वी का पालन करेंगे। पर इससे बढ़कर आपको कुछ और मिलेगा। एक स्थान, जहाँ से आप कभी नहीं हटेंगे। आकाश का एक तारा, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागण घूमते रहेंगे, जैसे खलिहान की मेढ़ी के चारों ओर बैल घूमते हैं। वह ध्रुवलोक मैं आपको देता हूँ। समय आने पर आपके पिता भी आपको राजसिंहासन देकर वन को चले जाएँगे।”

और सच में ऐसा हुआ।

ध्रुव लौटा। पर घर लौटते-लौटते उसका मन भारी हो आया। प्रभु के चरणों तक पहुँचकर भी उसने नाशवान् वस्तु ही माँगी थी, और इसी का उसे पछतावा हो रहा था।

वह मन-ही-मन कहने लगा, “अहो! मेरी मूर्खता तो देखो। जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट् को प्रसन्न करके उससे चावलों की कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द देनेवाले श्रीहरि से व्यर्थ का अभिमान बढ़ानेवाले उच्च पद ही माँगे। संसार-बन्धन का नाश करनेवाले प्रभु से मैंने संसार ही माँग लिया।”

पिता ने उसे गले लगाया, और कुछ देर कुछ बोल न सके। समय आने पर ध्रुव राजा बना, और छत्तीस हज़ार बरस धर्म से राज किया।

उन्हीं दिनों एक भारी आघात आया। ध्रुव का सौतेला भाई उत्तम एक दिन शिकार खेलते समय हिमालय पर्वत पर एक बलवान् यक्ष के हाथों मारा गया। उसकी माता सुरुचि पुत्र-प्रेम में पागल होकर उसे वन में खोजती हुई दावानल में प्रवेश कर गई।

उत्तम की मृत्यु के शोक में सुरुचि हिमालय के जंगल में पुत्र को खोजती हुई दावानल में प्रवेश कर जाती हैं।
उत्तम की मृत्यु के शोक में सुरुचि हिमालय के जंगल में पुत्र को खोजती हुई दावानल में प्रवेश कर जाती हैं।

भाई के मारे जाने का समाचार सुनकर ध्रुव क्रोध, शोक और उद्वेग से भर उठा। वह एक विजय-रथ पर सवार होकर यक्षों के नगर अलकापुरी पहुँचा, और वहाँ घोर युद्ध हुआ। ध्रुव ने एक-एक करके हज़ारों यक्षों को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया।

तब उसके पितामह स्वायम्भुव मनु बहुत-से ऋषियों को साथ लेकर वहाँ आए और अपने पौत्र को समझाने लगे। “बेटा, बस। अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरक का द्वार है। आपने जो यह समझकर कि ये मेरे भाई के मारनेवाले हैं, इतने निरपराध यक्षों का संहार किया है, यह हमारे कुल के योग्य कर्म नहीं। समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है। आप सब प्रकार उन्हीं परमात्मा की शरण लीजिए। क्रोध को शान्त कीजिए।”

ध्रुव ने अपने दादा के उपदेश से वह दुस्त्याज्य वैर त्याग दिया। तब यक्षों के स्वामी कुबेर वहाँ आए, और प्रसन्न होकर बोले, “क्षत्रियकुमार! आपने अपने दादा के कहने से ऐसा दुस्त्याज्य वैर त्याग दिया; इससे मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ। माँग लीजिए, जो चाहें।” ध्रुव ने केवल यही माँगा कि उसे श्रीहरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसार-सागर को पार कर जाता है।

ध्रुव लौटकर अपनी राजधानी आए, और बहुत-से यज्ञों से भगवान् की आराधना करते हुए छत्तीस हज़ार वर्ष तक पृथ्वी का धर्म से पालन किया। फिर वृद्धावस्था आने पर अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंपकर बदरिकाश्रम को चले गए।

वहाँ उन्होंने पवित्र जल में स्नान करके मन को भगवान् के स्वरूप में स्थिर कर दिया। फिर देहाभिमान गल जाने से उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही।

घने वन में स्थिर खड़े बालक ध्रुव अपनी कठोर तपस्या में लीन, नेत्र मूँदे भगवान् का ध्यान करते हुए।
घने वन में स्थिर खड़े बालक ध्रुव अपनी कठोर तपस्या में लीन, नेत्र मूँदे भगवान् का ध्यान करते हुए।

इसी समय ध्रुव ने आकाश से एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाश से दसों दिशाओं को आलोकित कर रहा था। उसमें श्रीहरि के दो श्रेष्ठ पार्षद सुनन्द और नन्द खड़े थे, चार भुजाएँ, श्याम शरीर और किशोर अवस्था।

सुनन्द और नन्द कहने लगे, “राजन्, आपका कल्याण हो। आपने पाँच वर्ष की अवस्था में ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान् को प्रसन्न कर लिया था। यह श्रेष्ठ विमान साक्षात् श्रीहरि ने आपके लिए ही भेजा है। चलिए, आप विष्णुधाम में निवास कीजिए, जहाँ आपके पूर्वजों सहित कोई भी पहुँच नहीं सका।”

भगवान् के पार्षदों के ये अमृतमय वचन सुनकर ध्रुव ने स्नान किया, मांगलिक अलंकार धारण किए, और बदरिकाश्रम के मुनियों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया। फिर वे उस दिव्य विमान पर चढ़ने को तैयार हुए।

विमान पर बैठकर ध्रुव ज्यों ही भगवान् के धाम को जाने के लिए तैयार हुए, त्यों ही उन्हें अपनी माता सुनीति का स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, “क्या मैं अपनी बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधाम को जाऊँगा?”

नन्द और सुनन्द ने ध्रुव के हृदय की बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे एक दूसरे विमान पर जा रही हैं। जिस माँ की गोद से यह यात्रा शुरू हुई थी, वही माँ अब आगे-आगे चली।

मार्ग में जहाँ-तहाँ देवता विमानों पर बैठे उनकी प्रशंसा करते और फूलों की वर्षा करते जाते थे। उस दिव्य विमान पर बैठकर ध्रुव त्रिलोकी को पारकर सप्तर्षिमण्डल से भी ऊपर भगवान् विष्णु के नित्यधाम को पहुँचे, उस जगह पर जहाँ ध्रुव-तारा आज भी टिका है, अपनी जगह से कभी न हटने वाला।

साहित्यिक-संदर्भ

ध्रुव की कथा श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय आठ से बारह तक आती है। नारद बालक को ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस बारह अक्षर के मन्त्र का जप देते हैं और यमुना-तट पर मधुवन में जाकर तप करने को कहते हैं।

विष्णुपुराण में भी ध्रुव का यही चरित्र थोड़े भिन्न विस्तार से मिलता है; घटनाओं का क्रम और देवी-वचन भागवत के अनुसार ही रखे गए हैं।

दर्शन-दृष्टि

नारद ने ध्रुव को जिस मधुवन में तप के लिए भेजा, वह यमुना के तट पर बसा एक वन है। भागवत प्रायः ऐसे स्थानों का नाम लेकर चलता है, जिससे कथा किसी कल्पित भूमि में नहीं, इसी पृथ्वी पर घटित होती दिखाई देती है।

ध्रुव का एक-एक मास का आहार-संयम, फिर पत्ते, फिर जल, फिर वायु, और अन्त में साँस का थम जाना, चतुर्थ स्कन्ध इसी क्रम से कहता है। बालक की तपस्या की तीव्रता इसी क्रमिक त्याग में खुलती है।

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