ध्रुव की तपस्या
ध्रुव पाँच साल का था जब उसने पहली बार जाना कि उसका कोई नहीं है।
उसके पिता राजा उत्तानपाद के दो रानियाँ थीं। पहली सुनीति, ध्रुव की माँ। दूसरी सुरुचि, जो ध्रुव के सौतेले भाई उत्तम की माँ थी।
राजा सुरुचि से ज़्यादा प्यार करता था। यह कोई secret नहीं था। पूरा महल जानता था। सुनीति को अपनी अलग कोठरी में रखा गया था, बच्चे के साथ।
एक दिन ध्रुव खेलते-खेलते अपने पिता के पास गया। उत्तम राजा की गोद में बैठा था। पिता उसके बालों में अंगुली घुमा रहे थे।
ध्रुव भी पास गया। चढ़ने की कोशिश की।
सुरुचि ने तुरंत रोक दिया। उसने ध्रुव को देखा, मुस्कुराई, और बोली। उसकी आवाज़ मीठी थी, पर शब्द तीखे थे।
”बेटा, राजा की गोद में बैठने के लिए तुम्हें मेरे पेट से जन्म लेना पड़ता। तुम्हारी माँ कौन है, यह तुम जानते हो। यहाँ बैठने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”
पाँच साल का बच्चा सब समझ नहीं पाया। पर इतना समझ गया कि वो वहाँ अस्वीकार है।
उसके पिता कुछ नहीं बोले। सिर्फ़ नीचे देखते रहे।
ध्रुव चुप-चाप पीछे हटा। दरवाज़े तक गया। फिर भागा। अपनी माँ की कोठरी में।
सुनीति ने उसे रोते देखा। कारण पूछा। बच्चे ने सब बताया।
सुनीति की आँखें भर आईं। उसे कुछ कहना था, कुछ करना था, पर वो क्या करती? वो ख़ुद उपेक्षित थी।
उसने बच्चे को गोद में लिया और बस इतना कहा, ”बेटा, सुरुचि ने जो कहा, वो सच है। तुम्हें वहाँ जगह नहीं मिलेगी। पर एक जगह है जहाँ माँ के पेट से जन्म लेना ज़रूरी नहीं है। वहाँ बस तपस्या से जगह मिलती है। उस जगह के राजा भगवान विष्णु हैं। उन्हें ही माँग।”
ध्रुव ने माँ की तरफ़ देखा। वो रो नहीं रहा था अब। उसकी आँखों में कुछ बस गया था।
उसने माँ के पैर छुए और बोला, ”मैं जाऊँगा।”
”कहाँ?”
”वहाँ। जहाँ माँ ने कहा। उन्हें ढूँढने।”
और पाँच साल का बच्चा निकल गया। अकेले। महल छोड़कर। जंगल की तरफ़।
रास्ते में नारद मुनि मिले। उन्होंने रोकने की कोशिश की। ”बच्चे, तुम छोटे हो। तपस्या इतनी आसान नहीं। फिर बड़ा होकर आना।”
ध्रुव ने सिर्फ़ इतना कहा, ”आज दिल जला है। फिर शायद नहीं जलेगा। मुझे आज ही जाना है।”
नारद चुप हो गए। उन्होंने उसे ”ओम् नमो भगवते वासुदेवाय” मन्त्र दिया और एक ध्यान-तकनीक सिखाई।
ध्रुव ने यमुना किनारे एक जगह चुनी। मधुवन। वहाँ बैठ गया।
बैठ गया मतलब, सच में बैठ गया। तीन महीने में उसने खाना छोड़ा। फिर पानी। फिर साँस को धीमा कर दिया।
पहले महीने वो फल खाता रहा।
दूसरे महीने सूखे पत्ते।
तीसरे महीने पानी।
चौथे महीने वायु।
पाँचवें महीने उसने साँस लेना भी कम कर दिया।
छठे महीने वो एक पैर पर खड़ा था, अंगूठे के बल। साँस रुकी हुई।
उसकी तपस्या इतनी तीव्र हो गई कि तीनों लोक काँपने लगे।
देवताओं ने इन्द्र से शिकायत की। ”यह बच्चा क्या कर रहा है? अगर इसकी तपस्या और बढ़ी, तो हम सब का संतुलन बिगड़ जाएगा।”
इन्द्र ने अप्सराएँ भेजीं, राक्षस भेजे, उसे डराने और लुभाने को। ध्रुव की आँखें मूँदी थीं। उसने कुछ नहीं देखा।
सर्वे चित्र: श्लोकमयाश्च मुनिप्रिया: ॥
विष्णु ने जो दृश्य ध्रुव को दिखाया, वो किसी मन्त्र, किसी ध्यान, किसी पुस्तक से प्राप्त नहीं हो सकता। वो सिर्फ़ एक खुले हृदय की पुकार पर मिलता है।
आख़िर विष्णु ख़ुद आए।
उन्होंने उसके कंधे पर अपना शंख छुआया। ध्रुव की आँखें खुलीं।
जो उसने देखा, वो वर्षों पहले एक माँ की कोठरी में दिखाई दिया था, उसका दस-हज़ार-गुना था।
विष्णु ने मुस्कुराकर पूछा, ”क्या माँगते हो?”
और यह बहुत interesting बात है। ध्रुव वहाँ गया था कि अपने सौतेले भाई से ऊँचा सिंहासन माँगे। पर अब? अब वो सब बहुत छोटा लगने लगा।
उसने कहा, ”प्रभु, मैं तो आपसे एक राजगद्दी माँगने आया था। मगर आपको देखकर अब वो माँगना भी शर्मसार लगता है। मैंने काँच के टुकड़ों के लिए हीरों के मालिक से बात करनी चाही।”
विष्णु हँसे। बहुत प्रेम से।
”बेटा, तुमने जो माँगा था, वो भी मिलेगा। तुम राज्य पाओगे, और तुम्हारे पिता भी तुम्हारे पैर छूएँगे। पर तुम्हें और कुछ भी मिलेगा। एक स्थान, जहाँ से तुम कभी नहीं हटोगे। आसमान का एक तारा, जो सब तारों का केन्द्र रहेगा। तुम्हारा नाम होगा ध्रुव।”
और सच में ऐसा हुआ।
ध्रुव लौटा। पिता ने उसे गले लगाया। राजा बना। छत्तीस हज़ार साल राज किया (पुराणों के अनुसार)।
और जब समय आया, तब विष्णु का दूत आया, एक रथ लेकर।
ध्रुव ने माँ को पुकारा। सुनीति, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, साथ चलने को तैयार थी।
दोनों उस रथ पर बैठे। और आकाश में चले गए, उस जगह पर जहाँ ध्रुव-तारा आज भी टिका है, हमेशा अपनी जगह पर।
ध्रुव की कथा एक चोट से शुरू होती है। एक छोटे बच्चे का दिल टूटता है, और वो कहीं और जगह ढूँढने निकल पड़ता है।
यह एक ख़ास Indian pattern है। कई संत-कथाएँ ऐसे ही शुरू होती हैं। मीरा को पति का घर रास नहीं आया। चैतन्य को बचपन के कुछ अनुभव चुभे। तुलसी की पत्नी ने उन्हें घर से निकाला। हर बार एक रोज़मर्रा का दर्द, और हर बार वो दर्द एक दरवाज़ा बन गया।
भागवतम् कह रहा है कि वो दर्द बेकार नहीं है। अगर सही दिशा में हो, तो वो दर्द आपको वहाँ ले जाता है जहाँ सुख का सूरज ख़ुद डूबता नहीं।
एक और बात। जब विष्णु आते हैं, ध्रुव को अब राज्य नहीं चाहिए। उसकी original माँग छोटी लगने लगती है। यह bhakti का एक central effect है। जो आप पाने के लिए चले थे, उस तक पहुँचते-पहुँचते आप बदल जाते हैं। और तब वो माँग ही भूल जाती है।