प्रह्लाद की गर्भ-शिक्षा

गंगा का जल उस सुबह बहुत धीमे बह रहा था, मानो वह भी सुनने को ठहर गया हो। परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, कल आपने उस बालक की चर्चा की थी जो आग में भी नहीं डरा, जिसके लिए विष भी अमृत हो गया। रात भर एक बात मुझे सोने न दे रही थी। ऐसी अटल टेक उस दैत्य-कुल के बालक में आई कहाँ से? पिता दैत्य, माता दैत्य, घर में दिन-रात हरि के नाम पर पहरा। फिर भी वह नाम उस घर में किसने बोया? क्या प्रह्लाद ने यह कहीं जन्म के बाद सीखा, या उससे भी पहले?”
शुकदेव कुछ देर ख़ामोश रहे, फिर हलकी मुस्कान के साथ बोले, ”राजन्, यह बात स्वयं प्रह्लाद ने आगे चलकर अपने सहपाठी दैत्य-बालकों को बताई थी, अपने ही गर्भ की याद से। उसकी पाठशाला उसके जन्म से पहले खुल चुकी थी। सुनिए।”

उन दिनों हिरण्यकशिपु अपने भाई के वध का बदला माँगने मन्दराचल को चला गया था, घोर तप करने। वह वहीं एक पैर पर खड़ा, ऊर्ध्वबाहु, ब्रह्मा से अमरता का वर छीन लाने की ज़िद में देह को गलाता रहा। उसे यह सुध न थी कि घर में, उसकी रानी कयाधु के गर्भ में, वही जीव पल रहा है जो एक दिन उसकी सारी अमरता को एक प्रश्न बना देगा।
दैत्यराज के पीठ फेरते ही देवताओं को अवसर मिल गया। उनकी सेना की तैयारी देखकर असुरों के सेनापतियों का साहस ही जाता रहा। प्राण बचाने की ऐसी हड़बड़ी मची कि स्त्री, पुत्र, मित्र, गुरुजन, महल, पशु, घर का साज-सामान, सब वहीं छोड़कर वे इधर-उधर भाग खड़े हुए। राजमहल खुला पड़ा रह गया। देवता भीतर घुसे और लूट-खसोट मचा दी। और उसी लूट में इन्द्र की दृष्टि गर्भवती रानी पर पड़ी।
उसने मन में हिसाब लगा लिया। ”दैत्यराज दूर है। इसके पेट में उसी देवद्रोही का वीर्य पल रहा है। इसे अमरावती ले चलूँ। जैसे ही प्रसव हो, बालक को मार दूँ, फिर इसे छोड़ दूँ। आगे का बड़ा काँटा अभी जड़ से उखड़ जाए।”

उसने कयाधु की कलाई पकड़ी और घसीटना शुरू किया। रानी भय से थर-थर काँपती हुई, कुररी पक्षी की भाँति बिलख-बिलखकर रो रही थीं। उनका एक हाथ बार-बार पेट पर चला जाता, मानो भीतर वाले को ढाँक लेना चाहती हों।

तभी मार्ग में एक वीणा की हलकी झंकार उठी, और उसके पीछे-पीछे देवर्षि नारद वहाँ आ निकले।
उन्होंने एक क्षण उस रोती हुई स्त्री को देखा, फिर इन्द्र को।
”देवराज, ठहरिए। यह स्त्री निरपराध है। यह तो एक सती-साध्वी परनारी है। इसे छोड़ दीजिए, महाभाग, छोड़ दीजिए।”
इन्द्र रुके, पर पकड़ ढीली न की। ”देवर्षि, इसके गर्भ में देवद्रोही हिरण्यकशिपु का अत्यन्त बली वीर्य है। प्रसव होने तक यह मेरे पास रहे। बालक को मारकर मैं इसे छोड़ दूँगा।”
नारद की आवाज़ धीमी ही रही, पर उसमें कुछ ऐसा था कि इन्द्र का हाथ अपने आप शिथिल पड़ने लगा। ”देवराज, जिसे आप शत्रु का बीज समझ रहे हैं, वह साक्षात् भगवान् का परम प्रेमी भक्त है। निष्किल्बिष, निष्पाप, अत्यन्त बली। उसमें भगवान् के अनन्त अनुचर का बल है। आपमें उसे मारने की शक्ति नहीं, देवराज। आप व्यर्थ इस पाप को अपने सिर लेंगे।”
इन्द्र के भीतर का देवराज एक पल को ठिठक गया। अभी-अभी उसने एक काँपती हुई स्त्री को घसीटा था, यह सोचकर कि वीरता यही है। अब देवर्षि के शब्दों ने उसे आईना दिखा दिया था। उसने देवर्षि की बात का सम्मान करते हुए कयाधु की कलाई छोड़ दी। फिर, जिस गर्भ को क्षण भर पहले वह मिटा देना चाहता था, उसी में बैठे भगवद्भक्त के प्रति श्रद्धा से भरकर, उसने उस माँ की प्रदक्षिणा की, और अपने लोक को लौट गया।
नारद रानी के पास आए। ”बेटी, चलिए। जब तक आपके पति तप से न लौटें, तब तक आप मेरे आश्रम में रहिए। आप और भीतर वाला, दोनों यहाँ निरापद रहेंगे।”
कयाधु देवर्षि के पीछे चल पड़ीं।
आश्रम में एक ऐसी शान्ति थी जो कयाधु ने अपने सारे जीवन में कभी न जानी थी। असुरों के महल में हवा सदा किसी आशंका से भारी रहती, तलवारों के घिसने की आवाज़, किसी के क्रोध की प्रतीक्षा। यहाँ पहली बार उनकी साँसें अपने ही भीतर ठहरकर बैठ गई थीं।
देवर्षि उन्हें भागवत-धर्म का रहस्य और विशुद्ध ज्ञान, दोनों का उपदेश करते, आत्मा के निर्मल स्वरूप की बात कहते। उपदेश करते समय उनकी दृष्टि बीच-बीच में उस माँ पर भी ठहर जाती, मानो वे जानते हों कि एक श्रोता और भी है, जो भीतर पल रहा है।
और कयाधु सुनतीं। दैत्य-कुल की वह रानी, जिसने सारी उम्र शाप और शस्त्र और शत्रुता के सिवा कुछ न जाना था, अब एक ऋषि के मुख से हरि का नाम सुनती और उसकी पलकें भीग जातीं। वह स्वयं नहीं समझ पातीं कि यह कौन-सा भाव है जो उनके भीतर उतर आया है, अपना-सा, और फिर भी पहले कभी न देखा हुआ।
पर सब में गहरे, सब में चुपचाप, एक और श्रोता था।
उस अँधेरे, गुनगुने, धड़कनों से भरे लोक में, जहाँ अभी न आँखें खुली थीं, न उँगलियाँ पूरी बनी थीं, एक नन्हा-सा जीव सिमटा हुआ था। बाहर का कुछ भी वह देख न सकता था। पर वह सुन सकता था।
नारद का स्वर उठता, और वह स्वर पहले माँ के देह से होकर गुज़रता, फिर उस छोटे-से लोक की दीवारों तक पहुँचता। शिशु के पास कान नाम की कोई चीज़ अभी ठीक से बनी भी न थी, फिर भी हर शब्द उस तक पहुँच रहा था।
माँ का मन जब हरि की किसी बात पर ठहरकर शान्त हो जाता, तो उनके भीतर का जीव भी उसी शान्ति में डूब जाता। माँ भूल जातीं कि वे एक असुर की पत्नी हैं, कि बाहर युद्ध है, कि उनका पति देह गला रहा है। उस घड़ी वे बस एक श्रोता रहतीं, और उनके भीतर का जीव भी।
और जैसे किसी सूखी मिट्टी पर पहली बूँद गिरती है और मिट्टी उसे चुपचाप पी जाती है, वैसे ही वह नन्हा जीव हर वचन को अपने में उतारता जाता। भागवत-धर्म का रहस्य। आत्मा के निर्मल स्वरूप की बात। कोई न जानता था कि उस बन्द लोक में एक पाठशाला खुली हुई है, और उसका एक ही विद्यार्थी हर अक्षर को सहेज रहा है।
महीने यों ही बीतते गए। फिर एक दिन हिरण्यकशिपु की घोर तपस्या पूरी हुई। ब्रह्मा से मनचाहा वर पाकर वह घर लौटा, और रानी को न पाकर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते नारद के आश्रम जा पहुँचा। उसने कयाधु को साथ ले लिया।
नारद ने स्नेह से सिर हिलाया और रानी को विदा किया। माँ की स्मृति में, समय बीतने के कारण, वे सब वचन धीरे-धीरे धुँधले पड़ गए जो उन्होंने आश्रम में सुने थे। पर देवर्षि की एक विशेष कृपा थी, और उसी कृपा से वह सब उस गर्भस्थ शिशु के भीतर ज्यों-का-त्यों बैठा रहा। माँ भूल गईं। भीतर वाला नहीं भूला।
कयाधु असुरों के महल लौट आईं, और कुछ समय बाद शिशु ने जन्म लिया। प्रह्लाद।

हिरण्यकशिपु फूला न समाया। दैत्य-कुल का गौरव, उसके वंश का दीपक। पर जिस बालक की उसने कल्पना की थी, यह वैसा निकला ही नहीं। वह न जाने कहाँ खोया-सा रहता, और बीच-बीच में, बिना किसी के सिखाए, धीरे से ‘नारायण’ पुकार उठता, मानो किसी बहुत दूर की, बहुत पुरानी कक्षा का पाठ दोहरा रहा हो।
आगे की कथा परीक्षित् सुन ही चुके थे। पिता का क्रोध, बालक की अडिग टेक, विष, आग, और अन्त में खंभे से प्रकट हुए नृसिंह।
यहाँ तक कहकर शुकदेव क्षण भर रुके। गंगा की लहरें किनारे की रेत को छूकर लौट रही थीं।
परीक्षित् बहुत देर मौन रहे, फिर धीमे से बोले, ”भगवन्, तो जिस घड़ी इन्द्र उस माँ को घसीट रहे थे, उसी घड़ी भीतर पाठ चल रहा था। बाहर भय, भीतर हरि का नाम।”
”हाँ, राजन्,” शुकदेव ने कहा, ”और स्वयं माँ उसे भूल गईं, फिर भी जो उन्होंने उन दिनों सुना, वह व्यर्थ न गया। एक के कान बन्द भी न हुए थे, और वह सब सहेज बैठा।”
परीक्षित् ने अपने दिनों की गिनती की होगी, क्योंकि उनकी आवाज़ काँपी। ”मेरे पास भी अब गिनती के दिन हैं, मुनिवर, और मैं इन्हीं कथाओं को सुनते-सुनते उन्हें बिता रहा हूँ।”
शुकदेव की आँखों में एक कोमल चमक उतरी। ”तो आप ठीक वही कर रहे हैं, राजन्, जो उस गर्भ में एक नन्हे जीव ने किया था। नौ प्रकार की भक्ति में सब में पहली केवल कान का काम है, सुनना। न धन चाहिए, न देह का बल, न आँखों का खुला होना भी। प्रह्लाद के पास इनमें से कुछ भी न था, बस एक खुला कान था, और एक माँ थी जो सुन रही थी।”
परीक्षित् ने कुछ न कहा। सुबह की धूप जल पर उतर आई थी, और लहरें उसे टुकड़ों में तोड़कर बहाए लिए जा रही थीं। दूर बैठे ऋषियों में से किसी की साँस भी अब सुनाई न देती थी। बस गंगा बहती रही, अपनी ही कथा कहती हुई, और किनारे पर बैठा एक राजा कान खोले उसे सुनता रहा, एक दिन और बीत चला।
आगे चलकर वही प्रह्लाद, अपने पिता की पाठशाला में बैठा, जब बाक़ी दैत्य-बालक उससे पूछते कि यह हरि-भाव उसमें आया कहाँ से, तो वह उन्हें यही दिन सुनाता।
वह बताता कि एक माँ थी जो डर से काँपती हुई एक आश्रम में आ रही थी, और उसके भीतर एक जीव था जिसके अभी कान भी पूरे न बने थे। बाहर लूट थी, युद्ध था, एक पति जो वर माँगने देह गला रहा था। और इन सबके बीच, एक देवर्षि का स्वर उठता, हरि की कथा कहता।
वह माँ बाद में भूल गई। पर उस अँधेरे लोक में सिमटा हुआ एक नन्हा कान, जिसने माँ के भीतर उतरकर वह हर वचन सुना था, वह नहीं भूला।
साहित्यिक-संदर्भ
यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 7 में आता है। हिरण्यकशिपु के मन्दराचल पर तप करने के समय इन्द्र कयाधु को बन्दी बनाकर ले जाता है, नारद उसे रोककर रानी को अपने आश्रम में रखते हैं, और वहीं गर्भस्थ प्रह्लाद नारद की ब्रह्म-विद्या सुनकर हरि का उत्तम भक्त हो जाता है।
गर्भस्थ प्रह्लाद को नारद के उपदेश का वचन 7.7.15 में आता है। नौ प्रकार की भक्ति में पहली श्रवण है (7.5.23-24), और यह कथा उसी श्रवण की महिमा का मूल दृष्टान्त है। गीताप्रेस, गोरखपुर के पाठ का अनुसरण किया गया है।
वह स्वर, वह कान
एक देवर्षि का स्वर उठता है, हरि की कथा कहता है, और एक माँ के भीतर एक नन्हा जीव उसे चुपचाप पी जाता है। बाहर लूट है, युद्ध है। भीतर, एक कान खुला हुआ है। और कौन कह सकता है कि इस गंगा-तट पर बैठा यह राजा, अपने आख़िरी दिनों में कान खोले, अभी ठीक उसी कक्षा का विद्यार्थी नहीं है।