रहूगण और जड़भरत का संवाद
उस सुबह गंगा का पानी राख-सा सलेटी था, और परीक्षित् देर तक उसी बहाव को देखते रहे। फिर उन्होंने शुकदेव की ओर मुड़कर पूछा, ”भगवन्, कल आपने उस भरत की बात कही जो हिरण के मोह में फँसकर हिरण ही बन गए, और फिर अगले जन्म में जान-बूझकर मूरख बने रहे। मेरे भीतर अब भी एक राजा बैठा है, जो अपने को कर्ता समझता है। उस भरत ने आगे क्या किया? क्या उनका वह मौन कभी किसी के काम आया?”
शुकदेव की आँखों में एक शान्त चमक आई। ”आई, राजन्। यही जड़भरत एक दिन एक राजा की पालकी ढोते हुए मिले, और उसी ढुलाई में से वह उपदेश निकला जिसे सुनकर सिन्धु का स्वामी अपना सिंहासन भूल गया।”
शुकदेव कहने लगे।
रहूगण सिन्धु-सौवीर देश के राजा थे। बल भी था, बुद्धि भी, और इन दोनों से बढ़कर यह विश्वास कि उन्हें सब कुछ आता है। उन दिनों वे कपिलमुनि के दर्शन की चाह में निकले थे, उस तत्त्व को समझने जो किताबों में हाथ नहीं आता।

राजा पालकी पर सवार थे। कहार उसे कंधों पर उठाए, इक्षुमती नदी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। हवा में गन्ने के खेतों की मीठी सीलन थी, और कहारों की साँसें भारी।
रास्ते में पालकी ढोते कहार थक चले, और एक कंधा कम पड़ गया। मुखिया को एक और कहार चाहिए था, और जल्दी।
पास ही एक वन की सीमा थी। वहाँ एक हृष्ट-पुष्ट पुरुष खड़ा दिखा, बाल जटा बने, देह पर मिट्टी, मगर बाँहें मज़बूत, कंधे चौड़े।
”इसे पकड़ लो,” मुखिया बोला। ”देह तगड़ी है। पालकी ढोने लायक़ है।”
वही जड़भरत थे।
उन्हें बेगार में पकड़कर पालकी के डंडे के नीचे लगा दिया गया। उन्होंने न पूछा कौन, न पूछा क्यों।
जड़भरत को कोई उज़्र न था। डंडा कंधे पर ले लिया।
पर एक बात उनकी बाक़ी कहारों से अलग थी। चलते वक़्त वे ज़मीन को देख-देखकर पैर रखते थे।

हर जीव में उन्हें वही चैतन्य दिखता था जो अपने में, इसलिए वे किसी चींटी, किसी नन्हे प्राणी को कुचल देना नहीं चाहते थे। पैर उठाने से पहले वे एक बाण-भर आगे की धरती देख लेते कि नीचे कोई साँस लेता हुआ तो नहीं।
सो हर क़दम पर उनके पैर ठिठकते, तिरछे पड़ते, फिर सँभलकर आगे बढ़ते।
और पालकी डगमगा उठती।
राजा को झटका लगा, और फिर दूसरा।
”अरे कहारो! अच्छी तरह चलो। मेरी पालकी इस तरह ऊँची-नीची करके क्यों चलते हो?”
जड़भरत ने कुछ न कहा। बस अपनी वही चाल बनाए रखी, वैसी ही ठहरी हुई।
बाक़ी कहारों को डर लगा कि कहीं राजा दण्ड न दे दें। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, ”महाराज, यह हमारा प्रमाद नहीं। हम तो आपकी नियम-मर्यादा के अनुसार ठीक ही पालकी ले चल रहे हैं। यह एक नया कहार अभी-अभी पालकी में लगाया गया है, यह जल्दी नहीं चलता। हम इसके साथ पालकी सीधी नहीं ले जा सकते।”
राजा फिर भी जड़भरत पर झुँझलाए। उन्हें राजा होने का अभिमान था, सो वे बहुत-सी अनाप-शनाप बातें कह गए, अपने को बड़ा पण्डित समझकर। पर जड़भरत मौन ही रहे।
आख़िर राजा ने पालकी रुकवाई और नीचे उतर आए। माथे की नस तन गई थी।
”अरे! यह क्या? आप जीते-जी मर गए हैं? आप मेरा निरादर करके मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हैं। मालूम होता है आप सर्वथा प्रमादी हैं। जैसे यमराज अपराधियों को दण्ड देते हैं, वैसे ही मैं भी अभी आपका इलाज किए देता हूँ, तब आपके होश ठिकाने आ जाएँगे।”
और तब जड़भरत ने पहली बार होंठ खोले।
उन्होंने जो कहा, वह भागवत के अत्यन्त शान्त और गहरे स्वरों में से एक है।
”हे राजन्,” जड़भरत बोले, उनकी आवाज़ में न क्रोध था न भय, ”आप किसे डाँट रहे हैं?”

”आप कहते हैं, भार उठाने वाला थक रहा है, सीधी चाल चलूँ। पर यदि भार नाम की कोई वस्तु है तो वह ढोने वाली देह के लिए है, और यदि कोई मार्ग है तो वह चलने वाले पैरों के लिए। मोटापन भी इसी शरीर का है। यह सब शरीर के लिए कहा जाता है, उस आत्मा के लिए नहीं, जो इसे देखती भर है।”
”आप कहते हैं, मेरी पालकी मत डगमगाइए। आपकी पालकी? जिस देह पर आप बैठे हैं, वह भी कब आपकी रही? यह राज्य, यह सिन्धु देश, यह सब आपके पास थोड़ी देर के लिए धरा है, जैसे राह चलते किसी की धरोहर।”
”आप कहते हैं, इलाज कर दूँगा। किसका इलाज? मैं तो मत्त, उन्मत्त और जड़ के समान अपनी ही स्थिति में रहता हूँ। यदि मैं वास्तव में जड़ और प्रमादी ही हूँ, तो मुझे शिक्षा देना पिसे हुए को फिर पीसने के समान व्यर्थ ही होगा।”
”तो जिसे आप दण्ड देना चाहते हैं, वह है कौन? और जो अपने को दण्ड देने वाला समझ बैठा है, वह कौन है? इन दोनों को पहचान लें, राजन्, फिर डाँटिए।”
रहूगण की साँस जैसे एक पल को रुक गई।
एक कहार, पालकी के डंडे के नीचे से, यह कह रहा था।

राजा वहीं धरती पर उतर पड़े, धूल की परवाह किए बिना। उनका राजमद सर्वथा दूर हो गया, और वे जड़भरत के चरणों में सिर रखकर अपना अपराध क्षमा कराने लगे।
”आप कौन हैं, मुनिवर? आपने ब्राह्मणों का चिह्न यज्ञोपवीत धारण कर रखा है। क्या आप दत्तात्रेय आदि किन्हीं अवधूतों में से हैं? आप किसके पुत्र हैं, आपका जन्म कहाँ हुआ, और यहाँ कैसे आपका पदार्पण हुआ? कहीं आप साक्षात् भगवान् कपिल ही तो नहीं?”
जड़भरत के होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई।
”पूर्वजन्म में मैं भरत नाम का राजा था। ऐहिक और पारलौकिक, दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होकर भगवान् की आराधना में ही लगा रहता था। तो भी एक हिरण में आसक्त हो जाने से परमार्थ से भ्रष्ट होकर मुझे अगले जन्म में हिरण बनना पड़ा। फिर इस जन्म में मैं जान-बूझकर सबकी आँखों में मूरख बना रहा, ताकि कोई संग, कोई मोह फिर मुझे न बाँध सके।”
रहूगण को सब याद आ गया। उन्होंने भरत-ऋषि की कथा सुन रखी थी, उस राजा की जिसने सब त्याग दिया था।
राजा उठे और जड़भरत के चरणों में फिर झुक गए।
”मुझे क्षमा कीजिए, मुनिवर। मैं अपने अहंकार में अंधा था।”
”उठिए, राजन्। और मेरे पास बैठिए।”
रहूगण बैठ गए, उसी राह की धूल में, राजा और कहार दोनों भूलकर।
और जड़भरत ने उन्हें वह उपदेश दिया जो भागवत में पूरे एक प्रसंग की तरह फैला है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य का मन सत्त्व, रज अथवा तमोगुण के वश में रहता है, तब तक वह जीव को शुभ-अशुभ कर्मों में लगाए रखता है। यही मन भिन्न-भिन्न नामों और रूपों को धारण करके जीव की ऊँचता और नीचता का कारण बनता है। और सब में बढ़कर वह बात, कि मन का यह ‘मैं’ और ‘मेरा’ ही वह वन है जिसमें जीव भटकता रहता है।
”हे राजन्,” जड़भरत ने आगे कहा, ”आज आप सिन्धु के स्वामी हैं। यह केवल एक चोला है। ऐसे कितने चोले आत्मा ने पहने और उतारे। एक दिन यह पालकी कोई और ढोएगा, और आप किसी और देश, किसी और जन्म में होंगे।”
”तो इस ‘मैं’ के बोझ को ढोकर क्या पाइएगा? यह क्षेत्रज्ञ आत्मा सबके भीतर एक-सी है, उस थके कहार में भी, उस चींटी में भी। यह मन ही आपका बलवान् शत्रु है। आप सावधान होकर श्रीगुरु और हरि के चरणों की उपासना के अस्त्र से इसे मार डालिए। फिर न कोई ऊँचा रहेगा, न कोई नीचा।”

रहूगण ने सिर झुका लिया। उनकी पलकें भीग आईं, और आँसू धूल पर गिरकर छोटे-छोटे गड्ढे बनाने लगे।
वे वहीं से उठे और राज-पाट का मोह छोड़ दिया।
जो सुबह राजा होकर चला था, वह साधक बनकर लौटा, और जिसे उसने कहार समझकर पकड़वाया था, वही उसका गुरु ठहरा।
शुकदेव क्षण भर रुके। गंगा का बहाव अब भी वही था, पर परीक्षित् को लगा जैसे पानी पहले से धीमा हो चला हो।
”देखिए, राजन्,” शुकदेव बोले, ”रहूगण ज्ञान लेने कपिल के पास निकले थे, और ज्ञान उन्हें राह में, अपनी ही पालकी के डंडे के नीचे, मिल गया। वे जिसे ढोनेवाला समझ बैठे थे, वही उन्हें पार ले गया।”
परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”भगवन्, उस राजा के पास तो समय था। मेरे पास सात में से अब कुछ ही दिन बचे हैं।”
शुकदेव की आवाज़ और कोमल हो गई। ”रहूगण को अपनी पकड़ छोड़ने में बरसों का राज-पाट गँवाना पड़ा। आप तो पहले ही सब छोड़कर इस किनारे आ बैठे हैं, अन्न-जल तक त्यागकर। जो काम उस राजा का सारा वैभव न कर सका, वह आपकी यह प्रतीक्षा कर रही है।”
”रहूगण की पालकी डगमगाई, तब जाकर उन्होंने सुना। आपकी पालकी तो छूट चुकी, राजन्। अब केवल सुनना बचा है।”
परीक्षित् कुछ न बोले। उन्होंने देखा, राजा रहूगण की तरह वे भी एक देह को थोड़ी देर ढो रहे थे, और वह भार अब हलका जान पड़ता था।
दूर किनारे पर एक बगुला पानी में टाँग धरे निश्चल खड़ा था, उठाने और रखने के बीच ठहरा हुआ, ठीक उस कहार की चाल की तरह।
साहित्यिक-संदर्भ
रहूगण और जड़भरत का यह संवाद श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध, अध्याय 10 से 12 तक फैला है। सिन्धु-सौवीर के राजा रहूगण अपनी पालकी ढोते जड़भरत की रुक-रुककर चलती चाल पर बिगड़ते हैं, और उत्तर में उन्हें आत्मा और देह के भेद का वह उपदेश मिलता है जिसे शुकदेव परीक्षित् को सुनाते हैं।
भागवत का यह प्रसंग शान्त-रस और ज्ञान का है, जिसमें देहाभिमान का छूटना ही असली मुक्ति कहा गया है। आगे अध्याय 13 में जड़भरत इसी राजा को संसार को एक भटकाने वाले वन (भवाटवी) के रूपक से समझाते हैं।
दर्शन-दृष्टि
इस कथा का मर्म यह है कि ज्ञान किसी पद या वेश का मोहताज नहीं। जड़भरत ने जान-बूझकर अपने को मूरख और सुस्त बनाए रखा, मिट्टी में लथपथ, ताकि न कोई उन्हें माने और न मान का मोह उन्हें फिर बाँधे। भीतर का तत्त्व उन्होंने बाहर की पहचान से सर्वथा अलग कर रखा था।
इसीलिए सिन्धु का स्वामी, जो शास्त्र पढ़ चुका था और कपिल तक के दर्शन को निकला था, अपनी ही पालकी के नीचे उस ज्ञान से जा टकराया जिसे वह खोजता फिर रहा था। पहचान देह की होती है, और देह कहार की हो या राजा की, साँस उसी एक चैतन्य की चलती है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
रहूगण ज्ञान खोजने निकले थे, और वह उन्हें उसी कंधे से मिला जिसे उन्होंने तुच्छ समझकर पालकी में जोत दिया था। जिसे हम जड़ और मौन समझकर अनदेखा कर जाते हैं, कभी-कभी वही सब में अत्यन्त गहरा ठहरा होता है।