रहूगण और जड़भरत का संवाद
रहूगण सिन्धु देश का राजा था। एक powerful, थोड़ा अहंकारी आदमी। उसकी एक problem यह थी कि वो सोचता था, उसको सब पता है।
एक दिन वो एक तपस्वी से मिलने जा रहा था। एक बहुत बड़े ऋषि से। कपिल जैसा। उससे ज्ञान लेना चाहता था।
वो पालकी में था। चार आदमी उसे उठाकर ले जा रहे थे।
रास्ते में एक पालकी-वाला बीमार पड़ा। उन्हें एक नया चाहिए था।
वो जंगल के पास से गुज़र रहे थे। वहाँ एक मोटा-तगड़ा आदमी दिखा। बाल बिखरे। मगर शरीर ठीक-ठाक।
”इसको पकड़ो। यह अच्छा पालकी-वाला बनेगा।”
वो जड़भरत था।
उसको पकड़ा गया। पालकी में लगाया गया।
जड़भरत को कोई problem नहीं था। उठा लिया।
पर एक काम वो अलग कर रहा था। चलते वक़्त, वो ज़मीन देख-देख कर पैर रखता था।
क्यों? क्योंकि वो एक jainism-style अहिंसा-व्रत में था। चींटियाँ, छोटे जीव, कोई मरे न।
इसलिए उसके पैर हर बार रुकते। तिरछे जाते।
और पालकी हिलती।
रहूगण को झटका लगा।
”अरे! कौन है यह नया आदमी? सीधा चल।”
जड़भरत ने कुछ नहीं कहा। बस अपना तरीक़ा जारी रखा।
रहूगण फिर बोला, ”ओए! बहरा है? सीधा चल! मेरी पालकी मत हिला!”
जड़भरत चुप।
रहूगण ने पालकी रुकवाई। बाहर निकला।
”तू मेरे साथ बकवास करता है? जानता है मैं कौन हूँ? सिन्धु का राजा। तेरा सिर काट दूँगा।”
और तब जड़भरत ने अपना मुँह खोला। पहली बार।
उसने जो कहा, वो भागवतम् का एक powerful section है।
”हे राजा,” जड़भरत बोला, उसकी आवाज़ शान्त, ”तू किसको डाँट रहा है?”
विश्वग्ज्ञानमपूर्वमिति वदसि ॥
(श्रीमद्भागवत 5.10.13 का भाव)
जड़भरत ने राजा से कहा, ”तू कह रहा है ”मैं ब्रह्मा हूँ, मैं सब कुछ रचता हूँ।” पर असल में तू कुछ नहीं करता। तेरा अहंकार ही बोल रहा है।”
”तू कह रहा है, ”तू सीधा चल।” कौन सीधा चले? यह शरीर? यह तो मेरे चलने के बिना भी चलता है। यह एक जड़ है।”
”तू कह रहा है, ”मेरी पालकी मत हिला।” तेरी पालकी? तेरा यह शरीर तेरा नहीं। तेरा यह राज्य भी कहाँ तेरा? तू तो बस इन सब को carry कर रहा है, थोड़ी देर।”
”तू कह रहा है, ”मेरा सिर काट दूँगा।” तेरा सिर? वो भी तेरा नहीं। एक दिन तेरा सिर ख़ुद ख़त्म हो जाएगा। बिना तेरी पसंद के।”
”तू जिसे मार रहा है, वो कौन है? और जो तुझे लग रहा है तू मार सकता है, वो भी कौन है?”
रहूगण के होश उड़ गए।
एक पालकी-वाला यह बात कह रहा था?
वो ज़मीन पर बैठ गया।
”तू कौन है?”
जड़भरत मुस्कुराया।
”मैं जड़भरत। पुराने राजा भरत का अगला जन्म।”
रहूगण को सब याद आ गया। उसने भरत-ऋषि की कथा सुनी थी।
वो उठा। जड़भरत के पैर छुए।
”मुझे माफ़ करें। मैं अहंकार में था।”
”उठो। और बैठो।”
रहूगण बैठा।
और जड़भरत ने उसे एक upadesh दिया। पूरा एक अध्याय।
उन्होंने आत्मा का स्वरूप बताया। शरीर का temporary होना। और सबसे important, मन के अहंकार से कैसे निकलें।
”हे राजा,” जड़भरत ने आख़िर में कहा, ”तू सिन्धु का राजा है। यह एक role है। तेरे जीवन के सब roles temporary हैं। एक दिन तेरी पालकी कोई और उठाएगा, और तू मरने के बाद कहीं और होगा।”
”तो अहंकार में जीने का क्या फ़ायदा? सहन से जी। समझो। और सब को अपने जैसा देख।”
रहूगण ने सिर झुकाया। उसकी आँखें भर आईं।
वो वहीं उठा। राज-पाठ छोड़ दिया।
एक राजा से एक साधक बना। पालकी-वाला उसका गुरु बना।
रहूगण-जड़भरत का संवाद भागवतम् का एक बहुत powerful moment है।
एक राजा। अहंकार में। एक पालकी-वाले से डाँट रहा है।
और पालकी-वाला कोई साधारण नहीं। एक पुराने ऋषि का अगला जन्म।
जब वो बोलता है, राजा की दुनिया हिल जाती है।
इस कथा का एक central message है। दुनिया में हम अपनी position से अपने आप को judge करते हैं। ”मैं राजा। मैं manager। मैं doctor। मैं engineer।”
और हम सोचते हैं, हमारे role में हमारी identity है।
जड़भरत कहता है, ”नहीं। तेरा role tehas है। तू role नहीं।”
और इस realization के लिए हमेशा एक बाहरी push ज़रूरी होती है। कोई जो हमारी पकड़ हिला दे।
रहूगण के लिए वो पालकी-वाला था। हमारे लिए कुछ और।
मगर वो moment आता है। और उस moment में, हमारे पास option है, या तो ग़ुस्सा करें, या ज़मीन पर बैठ जाएँ।
रहूगण ज़मीन पर बैठ गया। और इसी एक decision ने उसकी ज़िंदगी बदल दी।