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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

यमलार्जुन उद्धार

कथा 25 · भागवतम् की कथाएँ

यमलार्जुन उद्धार

दो जुड़वाँ वृक्ष, दो बंदी राजकुमार, और एक ऊखल
स्कन्ध 10, अध्याय 9-10

यशोदा मैया उस दिन कान्हा को ऊखल से बाँधकर, घर के कामों में लग गई थीं। थकी हुई थीं, पर मन कहीं और ही अटका था। बच्चे को आँगन में छोड़ गई थीं, यह सोचकर कि अब तो बँधा है, कहीं न जाएगा।

लाला कुछ देर बैठे रहे, ऊखल को घूरते रहे। फिर धीरे से उठे।

ऊखल से बँधे लाला धीरे उठकर उसे घसीटते हुए पिछवाड़े के बाग़ की ओर बढ़ते हैं, जहाँ दो ऊँचे जुड़वाँ अर्जुन वृक्ष खड़े हैं।
ऊखल से बँधे लाला धीरे उठकर उसे घसीटते हुए पिछवाड़े के बाग़ की ओर बढ़ते हैं, जहाँ दो ऊँचे जुड़वाँ अर्जुन वृक्ष खड़े हैं।

ऊखल भारी था, और वे इतने से। पर जिसके आगे पर्वत हलके पड़ें, उसके लिए लकड़ी का एक ऊखल क्या? उन्होंने उसे घसीटना शुरू किया, और घिसटते ऊखल की रगड़ आँगन की मिट्टी पर एक लंबी लकीर छोड़ती चली गई।

खींचने में जो मज़ा आ रहा था, वह उनके चेहरे पर साफ़ था। आँगन पार किया, फिर पिछवाड़े के बाग़ की ओर बढ़ चले, ऊखल पीछे-पीछे लुढ़कता हुआ।

बाग़ में दो ऊँचे अर्जुन के वृक्ष खड़े थे, जुड़वाँ, इसी से लोग उन्हें यमलार्जुन कहते थे। एक ही ज़मीन से उठे हुए, इतने पास कि उनकी छालें एक-दूसरे को छूती थीं।

दोनों के बीच बस इतनी सी जगह थी कि एक नन्हा बच्चा निकल जाए, पर ऊखल नहीं।

कान्हा उस सँकरी जगह में घुस गए। ऊखल पीछे आते-आते दोनों तनों के बीच आड़ा होकर फँस गया।

उन्होंने एक झटका दिया।

दोनों वृक्षों की जड़ें ज़मीन के नीचे काँप उठीं।

दूसरा झटका।

जड़ें चटकीं।

तीसरा झटका।

यमलार्जुन वृक्ष गड़गड़ाहट के साथ उखड़कर गिरते हैं, और उनके तनों से दो तेजस्वी सिद्ध पुरुष निकलकर कान्हा के चरणों में झुक जाते हैं।
यमलार्जुन वृक्ष गड़गड़ाहट के साथ उखड़कर गिरते हैं, और उनके तनों से दो तेजस्वी सिद्ध पुरुष निकलकर कान्हा के चरणों में झुक जाते हैं।

दोनों वृक्ष एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ जड़ से उखड़े और धरती पर आ गिरे, और उनके तने, शाखाएँ, छोटी-छोटी डालियाँ और एक-एक पत्ता काँप उठा।

और उन गिरे हुए तनों में से दो ज्योतियाँ उठीं।

दो सिद्ध पुरुष, अग्नि के समान तेजस्वी, ऐसे चमचमाते कि उनके सौन्दर्य से दिशाएँ दमक उठीं। हाथ जोड़े हुए, वे दोनों कान्हा के नन्हे चरणों में आ गिरे।

“प्रभु! आख़िरकार आपने हमें इस बंधन से छुड़ाया।”

नन्हे कान्हा कुछ देर उन्हें देखते रहे, फिर धीरे से मुस्कुरा दिए।

वे दोनों थे कौन?

नलकूबर और मणिग्रीव। एक ओर धनाध्यक्ष कुबेर के दो पुत्र, दूसरी ओर रुद्रभगवान के अनुचरों में गिने जाने वाले।

मद में चूर दोनों भाई मन्दाकिनी के तट पर मदिरा पीकर स्त्रियों संग जल-क्रीड़ा में मगन थे, अपने ऐश्वर्य के घमंड में डूबे।
मद में चूर दोनों भाई मन्दाकिनी के तट पर मदिरा पीकर स्त्रियों संग जल-क्रीड़ा में मगन थे, अपने ऐश्वर्य के घमंड में डूबे।

बहुत पहले की बात है। इस दोहरे ऐश्वर्य का घमंड दोनों भाइयों को चढ़ आया था। एक दिन कैलास के एक रमणीय उपवन में, मन्दाकिनी के तट पर, वे वारुणी मदिरा पीकर मदोन्मत्त हो गए। आँखें नशे में घूम रही थीं। बहुत-सी स्त्रियाँ उनके साथ गा-बजा रही थीं, और वे गंगाजी में, खिले हुए कमलों के बीच, उन युवतियों के साथ जल-क्रीडा करने लगे, जैसे हाथियों का कोई जोड़ा हथिनियों के संग जल में विहार करता हो।

उसी राह से देवर्षि नारद गुज़रे।

मुनि को देखते ही अप्सराएँ सकुचा गईं और झट अपने वस्त्र समेट लिए।

पर दोनों राजकुमार वैसे ही खड़े रहे, बेपरवाह। श्रीमद से अंधे, मदिरा के नशे में चूर, उन्हें अपने नंगे होने का बोध और लाज, दोनों भूल गए।

नारद ने उन्हें देखा। उनकी वाणी करुणा से भरी थी, क्योंकि वे इन दोनों पर अनुग्रह ही करना चाहते थे।

“श्रीमद, अर्थात् धन-सम्पत्ति का नशा, बुद्धि को सब में बढ़कर नष्ट करता है। आपको अपने ऐश्वर्य का इतना मद है कि लज्जा भी जाती रही? जिस जड़ता ने आपको ऐसा कर दिया, उसी जड़ता का रूप आप ले लें। वृक्ष बनकर वहीं अचल खड़े रहिए। इस दशा में स्मृति बनी रहेगी और श्रीकृष्ण के सान्निध्य से मुक्ति मिलेगी।”

दोनों भाई उसी क्षण नंद-बाबा के आँगन के पिछवाड़े दो अर्जुन-वृक्ष बनकर खड़े हो गए।

पर देवर्षि का हृदय कोमल था। जाते-जाते उन्होंने एक डोर छोड़ दी, कि वृक्ष-योनि में पड़े रहने पर भी इनकी स्मृति श्रीहरि में लगी रहे। मेरे अनुग्रह से देवताओं के सौ वर्ष बीतने पर इन्हें भगवान श्रीकृष्ण का सान्निध्य मिलेगा, और फिर भगवान के चरणों में परम प्रेम पाकर ये अपने लोक लौट जाएँगे।

फिर सौ दिव्य वर्ष बीत गए। और वह दिन आ पहुँचा।

कान्हा ने मंत्र और विधि के बिना उन्हें छुड़ा दिया। बस ऊखल की एक खींच, और सौ दिव्य वर्ष का बंधन टूट गया।

नलकूबर और मणिग्रीव ने उस नन्हे रूप को बार-बार प्रणाम किया।

“प्रभु, हमने आपको पहचान लिया। आप ही सारे जगत् के कारण हैं, सबको अपनी ओर खींचने वाले परम योगेश्वर, और इस बालक के वेश में हमारे उद्धार के लिए आ खड़े हुए। हमें यही वर दीजिए कि हमारी वाणी आपके गुण गाए, हमारे कान आपकी कथाओं में लगे रहें, हमारे हाथ आपकी सेवा करें, और हमारा मन सदा आपके चरणों में रहे।”

“अब जाइए,” कान्हा बोले, अपनी तोतली बोली में, “मेरे परायण होकर अपने-अपने घर लौट जाइए। जिस अनन्य भक्ति की आपको चाह थी, वह आपको मिल गई।”

दोनों ने एक बार और सिर झुकाया, भगवान की परिक्रमा की, और उत्तर दिशा की ओर, अपने लोक की राह पर चल पड़े।

उसी समय, वृक्षों के गिरने का धमाका सुनकर, यशोदा मैया दौड़ती हुई आईं।

दोनों विशाल वृक्ष धराशायी, बीच में ऊखल से बँधे कन्हैया निश्चिन्त खेल रहे थे, यशोदा ने दौड़कर गोद में भर लिया।
दोनों विशाल वृक्ष धराशायी, बीच में ऊखल से बँधे कन्हैया निश्चिन्त खेल रहे थे, यशोदा ने दौड़कर गोद में भर लिया।

जो दृश्य सामने था, उसने उनके पाँव जड़ कर दिए। दोनों विशाल वृक्ष धराशायी, और उनके बीच, ऊखल से बँधा, उनका लाला, मिट्टी में बैठा खेल रहा था, ज्यों कुछ हुआ ही न हो।

एक पल को मैया की साँस रुक गई।

“कन्हैया!”

वे झपटकर आगे बढ़ीं, बच्चे को गोद में भर लिया। हाथ काँपते हुए उसका माथा टटोला, बाँहें, पैर, कहीं कोई चोट तो नहीं, कोई खरोंच तो नहीं?

लाला को कुछ न हुआ था। उन वृक्षों ने गिरते हुए भी उसका बाल बाँका न किया।

तब कहीं जाकर मैया ने काँपते हाथों से ऊखल की गाँठ खोली।

गोकुल के लोग एक-एक कर जमा होने लगे। यह कैसे हुआ? आँधी, बिजली और कुल्हाड़ी का कोई चिह्न वहाँ नहीं था। बस इतना कि वह बालक वहाँ था।

नंद बाबा भी दौड़े आए। सब हैरान, चुप।

पर नंद बाबा का प्रेम इतना सघन था कि वे उस बालक में और कुछ देख ही नहीं सकते थे, न देखना चाहते थे। उन्होंने तो बस अपने लाला को सकुशल पाया, और इतने में ही निहाल हो गए।

और श्यामसुंदर भी तो यही चाहते थे। एक माँ की गोद, एक पिता की उँगली, गोकुल की धूल। बाक़ी सारे ऐश्वर्य उनके आगे फीके थे।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 9 और 10 में आती है, सीधे दामोदर-लीला के बाद। दोनों मुक्त होने वाले यक्ष नलकूबर और मणिग्रीव हैं, कुबेर के पुत्र, जिन्हें देवर्षि नारद ने अर्जुन-वृक्ष होने का शाप दिया था। वृक्षों का जोड़ा होने से ही उन्हें यमलार्जुन कहा गया।

दर्शन-दृष्टि

इस छोटी सी लीला में भागवत की एक बड़ी बात छिपी है। नलकूबर और मणिग्रीव ऐश्वर्य के स्वामी थे, फिर भी जड़ हो गए, और एक नन्हे बालक के स्पर्श से चेतन हुए। ऐश्वर्य बाँधता है, प्रेम छुड़ाता है।

यही कारण है कि यह कथा वात्सल्य और अनुग्रह दोनों की है। जो हाथ दो वृक्षों को उखाड़ देता है, वही हाथ शाम को यशोदा मैया का आँचल पकड़कर सो जाता है। भागवत बार-बार यही दिखाता है, कि भगवान का परम ऐश्वर्य उनका भक्तवत्सल हो जाना है।

यमलार्जुन-उद्धार: बाल-कृष्ण ने जुड़वाँ अर्जुन-वृक्षों के बीच से ऊखल खींचा, वृक्ष गिरे, और उनमें बँधे दो भाई, नलकूबर और मणिग्रीव, मुक्त हुए। अहंकार की रस्सी जब टूटती है, तभी सच्ची स्वतंत्रता आती है।

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