यमलार्जुन उद्धार
यह कथा सीधे दामोदर-लीला के बाद आती है।
यशोदा कृष्ण को ऊखल से बाँधकर, थक के सो गई। बच्चे को बाँधा छोड़ा, खाने का काम करने के लिए।
कृष्ण ऊखल से बँधा। बैठा रहा कुछ देर। फिर उठा।
ऊखल भारी था। पर बच्चा तो बच्चा है। उसने उसको घसीटा।
”ओह, ऊखल खींचने में मज़ा है।”
वो उसे खींचते-खींचते बाहर निकला। आँगन में। फिर बाग़ की तरफ़।
बाग़ में दो बड़े पेड़ थे। यमल और अर्जुन। दोनों एक-दूसरे के पास। एक जगह से उठे। आपस में जुड़े हुए।
बीच में एक थोड़ी सी जगह थी। एक बच्चा निकल सकता था, मगर ऊखल नहीं।
कृष्ण उस जगह में घुसा। ऊखल पीछे। ऊखल अटक गया।
उसने एक झटका दिया।
पेड़ों की जड़ें हिलीं।
दूसरा झटका।
जड़ें टूटीं।
तीसरा झटका।
दोनों पेड़ ज़ोरदार आवाज़ से उखड़ कर गिरे।
विद्रुह्य लीलामनिशं समीक्षन्ते ॥
(श्रीमद्भागवत 10.10 का भाव)
जो दामोदर खींचता हुआ चले, और जिसकी हर लीला से एक नया रहस्य खुले, उसी की क्रीडा को देवता बार-बार देखते हैं।
और उन पेड़ों से कुछ निकला।
दो दिव्य पुरुष। बहुत सुन्दर। चमकते हुए। चार-चार हाथ। मुकुट पहने।
वो कृष्ण के पैरों में गिर पड़े।
”प्रभु! धन्यवाद! आख़िर आप ने हमें मुक्त किया।”
बच्चा कृष्ण थोड़ी देर उन्हें देखता रहा। फिर मुस्कुराया।
वो दोनों कौन थे?
नल और कूबर। कुबेर के दो बेटे। स्वर्ग के राजकुमार।
एक बार उन्हें घमंड हो गया था। बहुत अमीर, बहुत powerful। एक दिन वो मानसरोवर सरोवर में अप्सराओं के साथ नहा रहे थे। नशे में। नंगे।
तभी नारद वहाँ से गुज़र रहे थे।
अप्सराओं ने नारद को देखा, सकपकाईं, अपने कपड़े उठा लिए।
मगर नल-कूबर ने नहीं उठाए। उन्हें परवाह नहीं। ”हम कुबेर के बेटे हैं। हम राजकुमार हैं। क्या फ़र्क़ पड़ता है?”
नारद ने उनकी तरफ़ देखा।
”तुम्हें अपनी राजकुमार-स्थिति का इतना घमंड है? तो तुम पेड़ बन जाओ। बिना हिले-डुले। ताकि तुम स्थिर रहना सीखो।”
नल और कूबर पेड़ बन गए। एक पेड़ नल, एक कूबर। बाग़ में।
नारद को बाद में दया आई। उन्होंने कहा, ”एक उपाय। जब त्रेता या द्वापर में भगवान बाल-रूप में आएँगे, और तुम्हारे पास से एक बच्चा खिंचता हुआ ऊखल लेकर निकलेगा, तब तुम्हें मुक्ति मिलेगी।”
हज़ार साल बीते। और वो दिन आया।
कृष्ण ने उन्हें ऊखल से ही, बिना किसी मन्त्र-तन्त्र के, सिर्फ़ एक खींच से, मुक्त कर दिया।
नल और कूबर ने कृष्ण को नमस्कार किया।
”प्रभु, हमने आपको पहचाना। आप ब्रह्मांड के कर्ता हैं। आप ने हम पर कृपा की। हम आपके वैकुण्ठ में आपकी सेवा करना चाहते हैं।”
”अभी जाओ,” कृष्ण ने कहा, ”अपने पिता के पास। उन्हें बताओ। बाद में हम मिलेंगे।”
वो चले गए। आकाश की तरफ़।
इसी समय, यशोदा भागकर आई। पेड़ों के गिरने की आवाज़ सुनकर।
उसने देखा, अपने बच्चे को बीच में, ऊखल अटका हुआ। दोनों पेड़ नीचे।
उसकी आँखें फटी रह गईं।
”कन्हैया!”
वो दौड़ी, बच्चे को उठाया। ज़ख़्म तो नहीं? हाथ-पाँव सही?
सब सही था।
उसने ऊखल को खोला।
गाँव वाले इकट्ठा हुए। पेड़ कैसे गिरे? कोई आँधी नहीं। कोई बिजली नहीं। बस यह बच्चा वहाँ था।
नंद बाबा भी आए। सब हैरान।
एक बूढ़े ग्वाले ने कहा, ”नंद, यह बच्चा साधारण नहीं। यह कुछ और है।”
नंद ने अपने बेटे को देखा। बच्चे ने उसकी तरफ़ देखा, मुस्कुराया।
”अरे, यह तो हमारा कन्हैया है। साधारण।”
नंद का प्रेम इतना था कि वो बच्चे की किसी और identity को नहीं देख पा रहा था।
और कृष्ण भी यही चाहते थे। एक माँ का प्रेम। एक पिता का प्रेम। बाक़ी सब बातें secondary।
यमलार्जुन-कथा छोटी है, मगर रोचक। दो पुराने पेड़ बीच में आ गए। एक बच्चे ने ऊखल खींचा। और पेड़ गिरे, और दो शापित आत्माएँ मुक्त हुईं।
इस कथा का सबक यह है, मुक्ति कभी-कभी सबसे साधारण activity में आती है। कोई बहुत बड़ा spiritual achievement नहीं। बस एक accident जैसा। एक बच्चा खींच रहा था, एक ऊखल अटका, पेड़ गिरे।
नारद ने हज़ार साल पहले शाप दिया था, और साथ ही एक रास्ता। नल-कूबर ने हज़ार साल इंतज़ार किया। और मुक्ति मिली एक चपल बच्चे के एक झटके से।
हम सब अपनी ज़िंदगी में किसी न किसी ”पेड़” की तरह जमे हैं। शायद अहंकार से, शायद किसी आदत से, शायद किसी पुरानी कथा से। हम सोचते हैं, ”इस से मुक्त होने के लिए मुझे कुछ बड़ा करना है। बहुत तपस्या। बहुत साधना।”
भागवतम् कह रहा है, शायद नहीं। शायद बस एक चपल झटका काफ़ी है। पर वो झटका हमारे control में नहीं। वो भगवान के control में है।
हमारा काम है तैयार रहना। जब झटका आए, हम झेलने के लिए। और झटका आता है, अक्सर, सबसे अनजान moment में।