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ययाति का बुढ़ापा

कथा 48 · भागवतम् की कथाएँ

ययाति का बुढ़ापा

हज़ार वर्ष बीते, तृष्णा और गहरी हुई
स्कन्ध 9, अध्याय 18-19

ययाति बड़े राजा थे। पृथ्वी उनके अधीन थी, कोष भरा था, और भुजाओं में अभी भी वह बल था जो किसी शत्रु को टिकने न देता। पर एक बात थी जो किसी को दिखती न थी। जो मिलता, थोड़ी देर भाता, फिर फीका पड़ जाता, और उसी फीकेपन के नीचे से एक नई भूख सिर उठा लेती। वे सिंहासन पर बैठे रहते और भीतर कोई था जो कभी बैठता ही न था।

ययाति की दो रानियाँ, कुएँ से हाथ थामकर लाई गई देवयानी, और उनकी सेविका बनी राजकुमारी शर्मिष्ठा, साथ रहती थीं।
ययाति की दो रानियाँ, कुएँ से हाथ थामकर लाई गई देवयानी, और उनकी सेविका बनी राजकुमारी शर्मिष्ठा, साथ रहती थीं।

उनकी दो रानियाँ थीं। शुक्राचार्य की बेटी देवयानी, जिसका हाथ ययाति ने स्वयं एक कुएँ से निकालकर थामा था। और देवयानी के साथ दासी बनकर आई शर्मिष्ठा, दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री, जो एक हज़ार सखियों के बीच राजकुमारी रही थी और अब एक हज़ार सखियों के साथ देवयानी की सेवा करती थी। शुक्राचार्य ने ययाति से साफ़ कह दिया था, कि शर्मिष्ठा को कभी शय्या पर न लें। पर एकान्त में शर्मिष्ठा ने स्वयं ऋतुकाल में पुत्र की याचना की, और ययाति शास्त्र की वह बात याद रखते हुए, कि पुत्र की प्रार्थना धर्मसंगत है, उसकी ओर झुक गए। उससे उनके पुत्र हुए।

देवयानी को जब यह जाना, वह क्रोध से बेसुध हो उठी, और रोती-बिलखती सीधे पिता के घर चल दी। शुक्राचार्य ने ययाति को बुलाया।

मुनि के स्वर में वह शान्ति न थी जो वे कुएँ के समय बरते थे। “ययाति, मेरी बेटी के साथ छल किया आपने, और मेरी कही बात नहीं मानी। आप अत्यन्त स्त्रीलम्पट हैं, मन्दबुद्धि हैं, और झूठे हैं। जिस यौवन के बल पर यह सब कर रहे थे, उसी पर अब दण्ड दूँगा।”

“कौन-सा दण्ड, मुनिवर?”

शुक्राचार्य ने छल के लिए ययाति को झूठा और स्त्रीलम्पट कहकर उन्हीं के यौवन को दण्ड बनाने की घोषणा की।
शुक्राचार्य ने छल के लिए ययाति को झूठा और स्त्रीलम्पट कहकर उन्हीं के यौवन को दण्ड बनाने की घोषणा की।

“जाइए, आपके शरीर में वह बुढ़ापा आ जाए जो मनुष्यों को कुरूप कर देता है।”

शब्द हवा में अभी ठहरे ही थे कि ययाति ने अपने भीतर एक खिंचाव महसूस किया, मानो किसी ने छाती के पीछे से कोई डोरी पकड़कर धीरे-धीरे खींच ली हो। पहले घुटनों ने जवाब दिया। वह बल जो अभी एक पल पहले वहाँ था, बहकर कहीं नीचे उतर गया, और जाँघें ऐसे काँपने लगीं जैसे बहुत दूर से चलकर आई हों। फिर हाथ। उन्होंने अपनी ही हथेलियों को सामने उठाया और देखा कि चमड़ी पतली होकर हड्डियों पर ढीली पड़ रही है, नसें उभर आई हैं, उँगलियाँ अपने आप थरथरा रही हैं और वे उन्हें रोक नहीं पा रहे। मुँह में एक स्वाद आया, खट्टा और धातु-सा, जैसे डर का अपना कोई स्वाद होता हो। कानों में सीटी-सी बजी, और मुनि का अगला शब्द उसमें कहीं दब गया।

उन्होंने ज़बान फेरकर होंठ गीले करने चाहे, पर ज़बान भी सूखी थी। साँस ऊपर छाती में अटककर रह गई, नीचे पेट तक उतरी ही नहीं। एक राजा, जिसने अभी क्षण भर पहले पूरी पृथ्वी पर हाथ रखा था, अब अपनी ही साँस पर हाथ नहीं रख पा रहा था। और उस सबके बीच एक ही बात मन में घूम रही थी, बार-बार, मूर्ख की तरह सीधी, कि अभी तो बहुत कुछ बाक़ी है। अभी तो शुरू ही किया था।

“शुक्राचार्य,” स्वर अब उनका अपना नहीं लग रहा था, फटा हुआ, काँपता हुआ, “मुझे क्षमा करें। मेरी कितनी ही इच्छाएँ अभी अधूरी हैं। इस तरह बीच में मैं नहीं उठ सकता।”

मुनि ने काँपते राजा को देखा, और बेटी के आँसू भी उन्हें याद रहे होंगे। आधे क्षण को क्रोध का ताप घटा।

“एक रास्ता है। आप अपने किसी पुत्र से उसका यौवन ले लीजिए, और अपना यह बुढ़ापा उसे दे दीजिए। पर तभी, जब वह अपनी ही इच्छा से दे।”

ययाति काँपते क़दमों से अपनी राजधानी लौटे। और तब पहली बार उन्होंने अपने पुत्रों को उस तरह देखा जैसे पहले कभी न देखा था, उनकी सीधी कमरों को, उनके भरे हुए चेहरों को, उस यौवन को जो उनके अपने देह से अभी-अभी छिन गया था।

राजा ययाति पर आए बुढ़ापे से जुड़ी इस कथा का एक क्षण।
राजा ययाति पर आए बुढ़ापे से जुड़ी इस कथा का एक क्षण।

बड़े पुत्र यदु को पहले बुलाया, देवयानी का बड़ा बेटा। “बेटा, मेरी तृप्ति अभी हुई नहीं है। मुझे कुछ बरस के लिए आपका यौवन चाहिए। बदले में अपने नाना का दिया यह बुढ़ापा ले लीजिए।”

यदु ने पिता के सफ़ेद बालों को देखा, फिर अपनी ही जवान हथेलियों को, और सिर हिला दिया। “पिताजी, बिना समय के आया यह बुढ़ापा लेकर तो मैं जीना भी नहीं चाहता। और जब तक आदमी विषय-सुख को भोग नहीं लेता, उससे वैराग्य कैसे हो? मुझसे यह न होगा।”

ययाति ने कुछ नहीं कहा। मुड़कर तुर्वसु को बुलाया, देवयानी का छोटा बेटा। “नहीं, पिताजी।” फिर द्रुह्यु, शर्मिष्ठा का बड़ा बेटा। “नहीं।” फिर अनु। उसने भी हाथ जोड़ लिए, “क्षमा करें।”

चार बार पूछा, चार बार वही उत्तर। हर इनकार पर ययाति का सिर थोड़ा और झुकता गया। वे जिन्हें उन्होंने जन्म दिया था, वही अपना देह उन्हें एक पल को सौंपना नहीं चाहते थे, और इसमें कोई ग़लती भी न थी। यही तो वे स्वयं जीवन भर करते आए थे, अपना सुख किसी और को न देना।

अब शर्मिष्ठा का छोटा पुत्र बचा था, सब में छोटा पर गुणों में बड़ा, पुरु। उसे बुलाया।

“बेटा, आपके चारों भाई मना कर चुके। अपने बड़े भाइयों की तरह आप भी मेरी बात न टालिएगा।”

पुरु ने पिता का झुर्रियों में ढला चेहरा देखा, और उन आँखों में वह बेचैनी जो वे राजा होकर भी छिपा नहीं पा रहे थे। एक क्षण को कुछ कहा नहीं। फिर बहुत धीरे से बोला, जैसे कोई बहुत सीधी बात कह रहा हो जिस पर सोचने की ज़रूरत ही न हो।

पुरु ने पिता ययाति का बुढ़ापा स्वयं ओढ़ लिया, उसकी कमर झुक गई और ययाति में जवानी लौट आई।
पुरु ने पिता ययाति का बुढ़ापा स्वयं ओढ़ लिया, उसकी कमर झुक गई और ययाति में जवानी लौट आई।

“पिताजी, इस संसार में ऐसा कौन है जो पिता के उपकारों का बदला चुका सके। यह शरीर तो आपका ही दिया हुआ है। ले लीजिए। मेरा बुढ़ापा आज से शुरू।”

और वह हो गया। पुरु की सीधी कमर झुक गई, उसका भरा चेहरा झुर्रियों में बैठ गया, उसके हाथ काँपने लगे, और वही सब ययाति के देह में उल्टी दिशा में लौट आया, गरमी, बल, वह पुराना ताप। पुरु ने उफ़ तक न की।

पुत्र पुरु पिता ययाति का बुढ़ापा स्वयं ओढ़ लेते हैं, और उनकी जवानी ययाति के शरीर में लौट आती है।
पुत्र पुरु पिता ययाति का बुढ़ापा स्वयं ओढ़ लेते हैं, और उनकी जवानी ययाति के शरीर में लौट आती है।

फिर पूरे एक हज़ार बरस ययाति अपनी इन्द्रियों के साथ मन को जोड़कर उनके प्रिय विषयों के पीछे चलते रहे। उनकी इन्द्रियों में पूरी शक्ति थी, और वे यथावसर यथाप्राप्त विषयों का यथेच्छ उपभोग करते रहे। समस्त वेदों के प्रतिपाद्य सर्वदेवस्वरूप यज्ञपुरुष भगवान् श्रीहरि का बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले यज्ञों से यजन भी किया, और अपनी प्रियतमा देवयानी को मन, वाणी, शरीर और वस्तुओं से दिन-दिन और प्रसन्न करते रहे। जो मन में आया, उसे भोगा। एक हज़ार बरस यों ही पानी की तरह बह गए।

एक साँझ वे अपने महल में अकेले बैठे थे। बाहर दीप जलने को थे, और किसी दूर के आँगन से किसी स्त्री का गाना तैरता हुआ आ रहा था, वही पुराना राग जो उन्होंने न जाने कितनी बार सुना था और जिसमें अब कोई नया रस नहीं बचा था। एक पल के लिए सब ठहर गया, गाना भी, हवा भी।

और तब वह बात भीतर से उठी जिसे वे एक हज़ार बरस से टालते आए थे। उन्होंने अपने भीतर झाँका, उस जगह जहाँ कभी प्यास उठा करती थी, यह देखने को कि अब वहाँ शान्ति है या नहीं। और वहाँ ठीक वही प्यास खड़ी थी, लेशमात्र कम नहीं, बल्कि और गहरी, जैसे इन हज़ार बरसों के हर भोग ने उसे और चौड़ा कर दिया हो।

उनके मुँह से बहुत धीरे, अपने ही लिए, निकला। “एक हज़ार बरस मैंने विषयों को सेवा है, और फिर भी क्षण-प्रति-क्षण इनकी लालसा बढ़ती ही जा रही है।” वे चुप हुए, फिर और धीरे से, “अग्नि में घी की आहुति डालिए, तो वह शान्त नहीं होती। और भड़कती है।”

बात कहते ही जैसे भीतर कुछ हलका हो गया। एक हज़ार बरस वे जिस पंख को फड़फड़ाते रहे थे, वह अब पूरा निकल आया था, और घोंसला अपने आप पीछे छूट रहा था।

उन्होंने पुरु को बुलवाया।

पुरु अब वृद्ध था, एक पूरी उम्र का बोझ लिए जो उसकी अपनी कभी थी ही नहीं।

ययाति ने उसकी झुकी कमर देखी, उसके काँपते हाथ देखे, वही हाथ जो हज़ार बरस पहले सीधे और जवान थे, और उनका सिर अपने आप झुक गया।

“बेटा, मेरी विषयों से तृप्ति आज भी नहीं हुई। पर आपका यौवन लेकर मैं देख चुका कि यह तृप्ति किसी भी उमर में आने वाली नहीं। पृथ्वी का सारा अन्न, सारा सोना, सारे पशु, सारी स्त्रियाँ, सब मिलकर भी उस मन को सन्तुष्ट नहीं कर सकतीं जो कामनाओं की मार से जर्जर हो रहा हो।”

“अपना यह यौवन अब वापस लीजिए। और मेरा बुढ़ापा मुझे लौटा दीजिए।”

पुरु ने काँपते हाथ जोड़ दिए। “नहीं, पिताजी। यह आप ही के पास रहे।”

“नहीं, बेटा। जो सीखने को रुका था, सीख लिया। अब और रुकूँगा तो वही भूल दुबारा करूँगा।”

और वही फिर हुआ, उल्टी दिशा में। बल और गरमी ययाति के देह से बहकर पुरु में लौट आई, उसकी कमर सीधी हुई, हाथ का काँपना थमा, और ययाति फिर वही वृद्ध हो गए जो शुक्राचार्य के शाप से हुए थे।

राजा ययाति बुढ़ापे के बोझ तले झुके खड़े, यौवन खो चुका शरीर अब भोग की थकान बताता।
राजा ययाति बुढ़ापे के बोझ तले झुके खड़े, यौवन खो चुका शरीर अब भोग की थकान बताता।

फिर उन्होंने राज्य बाँटा। द्रुह्यु को दक्षिण-पूर्व दिशा दी, यदु को दक्षिण, तुर्वसु को पश्चिम, और अनु को उत्तर। और सारे भूमण्डल का योग्यतम पात्र मानकर सब में छोटे पुरु को अपने राज्य पर अभिषिक्त किया, बाक़ी चारों भाइयों को उसके अधीन रखकर। उसी पुरु से वह वंश चला जो आगे चलकर महान् पूरुवंश कहलाया।

फिर ययाति वन को चल दिए। वहाँ उन्होंने अपनी सारी आसक्तियों से छुट्टी पा ली, और आत्मा का साक्षात्कार करके उनका त्रिगुणमय लिंगशरीर भी गल गया। माया-मल से रहित परब्रह्म परमात्मा वासुदेव में वे जा मिले, उसी गति को पाकर जो बड़े-बड़े भगवान् के प्रेमी सन्तों को मिलती है।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अठारहवें और उन्नीसवें अध्याय में आती है। यही प्रसंग महाभारत के आदिपर्व में विस्तार से है; भागवत उसे संक्षेप में, वैराग्य की ओर मोड़ते हुए कहता है। ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (9.19.14) इस कथा का प्राण है।

देवयानी ने वह गाथा सुनी

देवयानी ने बकरे की वह गाथा सुनी और मुस्कुरा दी, क्योंकि उसे लगा कि उसका पति यह सब प्रेम के विकल कर देने वाले विरह की बात हँसी-हँसी में कह रहा है। उसे यह नहीं सूझा कि एक हज़ार बरस जिसके साथ बीते, वह उससे आख़िरी बार विदा माँग रहा है। आप होते तो किस बात में सुनते, हँसी में या विदा में?

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