ययाति का बुढ़ापा

कथा 48 · भागवतम् की कथाएँ

ययाति का बुढ़ापा

Desires Don’t End by Enjoying Them
स्कन्ध 9, अध्याय 18-19

ययाति एक राजा थे। बहुत powerful। पाँच बेटे, बहुत सम्पदा।

उनकी एक problem थी। वो बहुत भोगी थे।

हर तरह की इच्छा। हर तरह का सुख। उन्हें कोई भी inferior लगने वाली चीज़ नहीं।

एक दिन उन्होंने अपनी सास से कुछ ऐसा कहा जो नहीं कहना चाहिए था।

(कहानी का यह हिस्सा थोड़ा involved है। उनकी पत्नी देवयानी की दासी शर्मिष्ठा से उन्होंने secret relationship रखी थी। शर्मिष्ठा से बच्चे भी हुए। देवयानी को पता चला। उसके पिता शुक्राचार्य ग़ुस्से में।)

शुक्राचार्य ने ययाति को बुलाया।

”ययाति, तू ने मेरी बेटी का अपमान किया। मेरी सलाह नहीं मानी। अब तुझे एक शाप।”

”क्या शाप?”

”तू तुरंत बूढ़ा हो जा। तेरा यौवन ख़त्म।”

और एक झटके में ययाति का शरीर बूढ़ा। बाल सफ़ेद। चेहरे पर झुर्रियाँ। ताक़त गायब।

ययाति घबराए।

”शुक्राचार्य! मुझे माफ़ करिए। मेरी अभी कई इच्छाएँ बाक़ी हैं। मैं अभी बूढ़ा नहीं हो सकता।”

शुक्राचार्य ने सोचा।

”ठीक है, एक exception। तू अपने किसी बेटे से उसकी जवानी ले ले। बदले में अपना बुढ़ापा उसे दे।”

”दूसरी बात, यह बस तभी काम करेगा जब वो स्वेच्छा से दे।”

ययाति घर गए। पाँच बेटे थे।

पहले को बुलाया। ”बेटा, मुझे तेरी जवानी चाहिए। बदले में मेरा बुढ़ापा। एक काम करो।”

बेटे ने एक पल को सोचा। फिर इनकार। ”नहीं, पिताजी। मुझे अपनी जवानी चाहिए। मेरी अपनी ज़िंदगी।”

ययाति ने सिर हिलाया। पाँच बेटे थे। एक नहीं माना तो दूसरा।

दूसरा। ”नहीं।”

तीसरा। ”नहीं।”

चौथा। ”नहीं।”

ययाति की उम्मीद टूट रही थी।

सबसे छोटा, पुरु। उन्हें बुलाया।

”बेटा, तेरे चार भाई मना कर चुके। तू मेरी आख़िरी उम्मीद।”

पुरु ने पिता को देखा। उनका बूढ़ा चेहरा। उनकी आँखों में एक desperation।

वो बिना सोचे बोला।

”पिताजी, हाँ। ले लो मेरी जवानी।”

और एक exchange हुई। पुरु बूढ़ा। ययाति युवा।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
(श्रीमद्भागवत 9.19.14)

इच्छाएँ कभी भोगने से शान्त नहीं होतीं। जैसे अग्नि में हवि (घी) डालने से वो और बढ़ती है, वैसे ही इच्छाएँ भी।

ययाति खुश। उन्होंने एक हज़ार साल अपनी इच्छाओं को follow किया। हर तरह का सुख। हर तरह की स्त्री। हर तरह का भोजन।

हर तरह का खेल। हर तरह की यात्रा।

एक हज़ार साल बीते।

एक दिन वो अपने महल में बैठे थे। एक पल को रुके।

और एक बात अंदर से आई।

”एक हज़ार साल के बाद, मैं अभी भी असंतुष्ट हूँ। मेरी इच्छाएँ ख़त्म नहीं हो रहीं। बल्कि बढ़ रही हैं।”

उन्होंने पुरु को बुलाया।

पुरु अब बूढ़ा था। उम्र भर बूढ़ा।

ययाति ने उसे देखा। ग्लानि।

”बेटा, मुझे माफ़ कर। मैंने तेरी जवानी ले ली। और एक हज़ार साल बिताए।”

”और मुझे एक बात पता चली। इच्छाएँ भोगने से ख़त्म नहीं होतीं। बल्कि बढ़ती हैं।”

”आग में लकड़ी डालने से, आग बुझती नहीं। बढ़ती है।”

”अब मैं तेरी जवानी वापस करता हूँ। मेरा बुढ़ापा वापस लेता हूँ।”

पुरु ने मना किया। ”नहीं, पिताजी। आप ही रखिए।”

”नहीं। मैंने एक बहुत बड़ा सबक सीखा। अब मैं तपस्या करूँगा।”

Exchange हुई। ययाति वापस बूढ़े। पुरु वापस जवान।

ययाति ने राज्य पुरु को दिया। (उनके बाक़ी चार बेटों को नहीं, क्योंकि उन्होंने ग़लत निकाला था।) उसी से पुरु-वंश शुरू हुआ, जिसमें बाद में पाण्डव-कौरव हुए।

ययाति ख़ुद जंगल में चले गए। तपस्या की। और अंत में मुक्ति पाई।

मन्थन

ययाति की कथा एक basic truth का demonstration है।

हम सब सोचते हैं, ”अगर मैं यह पा लूँ, तो खुश हो जाऊँगा।” ”अगर मेरे पास यह हो, तो शान्ति मिले।”

हम भोगते हैं। थोड़ी देर के लिए संतुष्ट। फिर एक नई इच्छा। फिर भोग। फिर असंतुष्ट।

यह cycle infinite है।

ययाति ने इस truth को एक हज़ार साल में सीखा। हम अक्सर इसे एक जीवन में नहीं सीख पाते।

और भागवतम् का central message यहाँ है। इच्छाओं को follow करने से उनका end नहीं। इच्छाओं को observe करने से, और छोड़ देने से, उनका end।

”आग में लकड़ी डालने से वो बुझती नहीं, बढ़ती है।”

यह एक beautiful image है। हम अपनी इच्छाओं की आग को सुलगाते रहते हैं, यह सोचकर कि इसे feed करने से वो शान्त होगी। पर हर भोग बस और इच्छा पैदा करता है।

रास्ता है? आग पर लकड़ी मत डालो। उसे शान्त होने दो। यही true contentment है।

और एक बात। पुरु ने अपनी जवानी अपने पिता को दे दी। यह एक huge sacrifice है।

पर अंत में, वो pure गेमिंग नहीं था। ययाति वापस लौटे। पुरु को राज्य मिला।

और इस interaction में बेटे ने भी सीखा, बाप ने भी।