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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

परशुराम

कथा 47 · भागवतम् की कथाएँ

परशुराम

वह ब्राह्मण जिसने क्षत्रियों का संहार किया
स्कन्ध 9, अध्याय 15-16
एक ब्राह्मण ने शस्त्र उठाकर क्षत्रियों का संहार किया, परशुराम की वह अनोखी गाथा शुकदेव अब सुनाने लगे।
एक ब्राह्मण ने शस्त्र उठाकर क्षत्रियों का संहार किया, परशुराम की वह अनोखी गाथा शुकदेव अब सुनाने लगे।

“पुरूरवा के वंश में आगे चलकर गाधि नामक राजा हुए, राजन्। उनकी एक कन्या थी, सत्यवती। ऋचीक नामक ऋषि ने गाधि से वह कन्या माँगी। गाधि ने सोचा कि यह तपस्वी मेरी कुशिकवंशी कन्या के योग्य वर नहीं, अतः शुल्क में एक हज़ार ऐसे घोड़े माँग लिये, जिनका सारा शरीर श्वेत हो पर एक-एक कान श्याम वर्ण का हो। ऋचीक वरुण के पास गये, वैसे ही घोड़े ले आये, और सत्यवती से विवाह कर लिया।”

“एक बार ऋचीक की पत्नी और सास, दोनों ने पुत्र के लिए प्रार्थना की। ऋषि ने दोनों के लिए अलग-अलग मन्त्रों से चरु पकाया और स्नान को चले गये। सत्यवती की माता ने सोचा कि ऋषि ने अपनी पत्नी के लिए ही श्रेष्ठ चरु बनाया होगा, अतः वह चरु माँगकर अपना चरु बेटी को दे दिया और बेटी का चरु स्वयं खा गयीं। ऋषि ने लौटकर तप-बल से यह जान लिया और सत्यवती से कहा, ‘आपने बड़ा अनर्थ कर दिया। अब आपका पुत्र दण्ड देनेवाला घोर प्रकृति का होगा और आपका भाई एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता।’ सत्यवती के प्रार्थना करने पर ऋषि ने इतना किया कि वह घोर स्वभाव एक पीढ़ी टल गया, और समय पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ।”

जमदग्नि एक ऋषि थे, तपस्या में पगे हुए। उन्होंने रेणु ऋषि की कन्या रेणुका का पाणिग्रहण किया, जिनकी मर्यादा आश्रम की हवा में बसी रहती थी। उनके कई पुत्र हुए, और सब में छोटा था राम, जिसे लोग आगे चलकर परशुराम कहने लगे, उस परशु के कारण जो उसके कंधे से कभी नहीं उतरता था।

बचपन से ही उसमें कुछ और था। बाँहों में एक ऐसा बल जो खेल में भी छिपता नहीं था, और भीतर एक आँच, जो ज़रा-सी हवा पाकर भड़क उठती थी। साधारण आँख से देखने वाले को वह बालक भर लगता, पर उस बालक के भीतर श्रीहरि स्वयं उतर आए थे, इसी एक प्रयोजन से कि क्षत्रियों के उस अहंकार को तोड़ें जो उस युग में मर्यादा की हर दीवार लाँघ चुका था।

जमदग्नि के पास एक गाय थी, कामधेनु, जो माँगी हर वस्तु दे देती थी। उसी के दूध और घी से ऋषि के यज्ञ चलते थे, उसी से अतिथियों का सत्कार होता था।

एक दिन कार्तवीर्य अर्जुन उस आश्रम में आया। हैहयवंश का अधिपति, जिसने भगवान् नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय की आराधना से एक हज़ार भुजाएँ पाई थीं, और जिसकी भुजाओं से बड़ा उसका दर्प था।

कार्तवीर्य अर्जुन आश्रम से कामधेनु को बलपूर्वक छीन ले जाता है, और लौटे परशुराम आश्रम की वीरानी और पिता की पीड़ा देखते हैं।
कार्तवीर्य अर्जुन आश्रम से कामधेनु को बलपूर्वक छीन ले जाता है, और लौटे परशुराम आश्रम की वीरानी और पिता की पीड़ा देखते हैं।

आश्रम के सीधे-सादे सत्कार में उसने वह गाय देख ली जो राजमहलों की समृद्धि को लज्जित करती थी। और जो राजा एक हज़ार हाथों का स्वामी हो, वह माँगना नहीं जानता। उसने कामधेनु को बलपूर्वक छीना और अपने सैनिकों से बँधवाकर ले चला, उसका बछड़ा पीछे रँभाता रह गया।

परशुराम बाहर गए हुए थे। लौटे, तो आश्रम की खामोशी ने ही सब कह दिया, खाली खूँटा, टूटा हुआ बाड़ा, और पिता की आँखों में वह पीड़ा जो ऋषि भी छिपा नहीं सके।

उन्होंने कंधे से परशु उतारा। उसकी धार पर अँगुली फेरी, और बिना एक शब्द कहे माहिष्मती की ओर चल पड़े।

कार्तवीर्य के सहस्र भुजाओं और विशाल सेना के सामने अकेले परशुराम खड़े, अपने एक धनुष से उसके सारे बाण काट डालते।
कार्तवीर्य के सहस्र भुजाओं और विशाल सेना के सामने अकेले परशुराम खड़े, अपने एक धनुष से उसके सारे बाण काट डालते।

युद्ध भयंकर हुआ। एक ओर एक हज़ार भुजाएँ, और हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकों से युक्त सत्रह अक्षौहिणी सेना। दूसरी ओर एक अकेला ब्राह्मण, और उसके हाथ में वह कुल्हाड़ी जो उसके कंधे से कभी नहीं उतरती थी। कार्तवीर्य ने पाँच सौ धनुषों पर एक साथ बाण चढ़ाये, पर परशुराम ने अपने एक ही धनुष के बाणों से उन सबको एक साथ काट डाला। फिर उसने पहाड़ और पेड़ उखाड़कर फेंके, और परशुराम का परशु उन्हें बीच हवा में काटता चला जाता।

अंत में वह हज़ार भुजाओं वाला राजा पृथ्वी पर गिरा, उसकी सब भुजाएँ कटी हुईं, जैसे आँधी में गिरे किसी विशाल वृक्ष की डालियाँ। उसके दस हज़ार पुत्र डरकर भाग खड़े हुए, और परशुराम कामधेनु तथा उसके बछड़े को खोलकर वापस आश्रम ले आए।

एक दिन रेणुका जल भरने गंगा-तट पर गईं। वहाँ गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल-क्रीड़ा करते देख क्षण भर उनका मन डगमगा गया, और हवन का समय बीत गया। आश्रम लौटीं तो जमदग्नि ने अपने तप-बल से सब जान लिया। उन्होंने बारी-बारी अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि वे माता का वध कर दें। बड़े पुत्र ठिठक गए, किसी का हाथ न उठा। पर परशुराम ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और रेणुका तथा आज्ञा से पीछे हटे भाइयों का वध कर दिया। प्रसन्न होकर जमदग्नि ने वर माँगने को कहा। परशुराम ने यही माँगा कि उनकी माता और भाई फिर जी उठें, और उस घड़ी की कोई याद उनके मन में न रहे। ऐसा ही हुआ।

पर बैर यहीं नहीं रुका। कुछ समय बीता। एक दिन परशुराम अपने भाइयों के साथ आश्रम से दूर वन की ओर गए हुए थे, और कार्तवीर्य के पुत्र, अपने पिता का बदला सीने में लिए, चुपचाप आश्रम में घुस आए।

जमदग्नि अग्निशाला में बैठे थे, निःशस्त्र, आँखें मूँदे, भगवान् के चिन्तन में मग्न। उन्होंने उसी अवस्था में ऋषि का सिर धड़ से अलग कर दिया, और उसे साथ लेकर भाग निकले।

परशुराम के वन जाने पर कार्तवीर्य के पुत्र आश्रम में घुस आते हैं, ध्यानमग्न निःशस्त्र जमदग्नि का सिर धड़ से अलग कर भाग जाते हैं।
परशुराम के वन जाने पर कार्तवीर्य के पुत्र आश्रम में घुस आते हैं, ध्यानमग्न निःशस्त्र जमदग्नि का सिर धड़ से अलग कर भाग जाते हैं।

रेणुका दौड़ीं। पति के कटे शरीर से लिपटकर उन्होंने अपनी छाती और सिर पीटा, और पीटती चली गईं, “हे राम! हे राम!” बार-बार उनका हाथ उनकी छाती पर पड़ता, बार-बार वही पुकार उठती।

परशुराम ने बहुत दूर से ही माता का वह करुण-क्रन्दन सुन लिया। दौड़े-दौड़े आश्रम पहुँचे, और द्वार पर ही उनके पाँव रुक गए। सामने पिता का सिरविहीन शरीर पड़ा था, और उस पर झुकी, बार-बार छाती पीटती, उनकी माँ।

उस क्षण उनकी आँखें आग से भरी थीं। उन्होंने पिता का शव छाती से लगाया, भाइयों को सौंपा, और एक प्रतिज्ञा ली, इतनी शांत कि वह चीख़ से कहीं अधिक भयावनी थी।

“जिस अहंकार ने एक तपस्वी को ध्यान में बैठे-बैठे मार डाला, वह अहंकार इस पृथ्वी पर नहीं रहेगा। मैं बार-बार इस धरती को उन क्षत्रियों से रिक्त कर दूँगा जो बल को अन्याय का साधन बना चुके हैं।”

और उन्होंने वैसा ही किया। पहले वे माहिष्मती गये, और कार्तवीर्य के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचों-बीच एक बड़ा पर्वत खड़ा कर दिया। फिर वे निकल पड़े, एक राज्य से दूसरे राज्य। जो राजा प्रजा को कुचलते थे, जो दर्प में मर्यादा भूल चुके थे, उन्हें उन्होंने चुन-चुनकर समाप्त किया। उनका परशु थमता ही नहीं था।

पर बीज मिट्टी में रह जाते हैं। कुछ क्षत्रिय-बालक माताओं के गर्भ में थे, कुछ को ब्राह्मणों ने अपने आश्रमों में छिपा लिया। वे बच गए, बड़े हुए, और फिर सिंहासनों पर वही पुराना दर्प लौट आया।

परशुराम फिर लौटते। फिर परशु उठता। ऐसा एक बार नहीं, इक्कीस बार हुआ, जब तक उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो गई। कुरुक्षेत्र के समन्तपंचक में उन्होंने रक्त से भरे पाँच तालाब तक बना दिये।

परशुराम इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हैं, और कुरुक्षेत्र के समन्तपंचक में रक्त से पाँच तालाब भर देते हैं।
परशुराम इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हैं, और कुरुक्षेत्र के समन्तपंचक में रक्त से पाँच तालाब भर देते हैं।

जब उनका संकल्प पूरा हुआ, तब उन्होंने पिता का सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ दिया, और एक महान यज्ञ किया। उस यज्ञ में जो पृथ्वी उन्होंने जीती थी, वह सारी कश्यप ऋषि को दान कर दी। जिस धरती के लिए राजा एक-दूसरे का गला काटते थे, उसे एक ब्राह्मण ने हथेली पर रखकर दे दिया, जैसे वह कोई फल हो।

फिर वे महेन्द्र पर्वत पर चले गए। वहाँ की हवा देवदार की गंध से भरी रहती, झरनों का स्वर दिन-रात बहता रहता।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 15 और 16 में आती है। परशुराम श्रीहरि के छठे अवतार हैं, जिन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों के दर्प से रहित किया, फिर सारी पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए। परशुराम और दशरथ-पुत्र राम की भेंट का स्रोत रामायण की परम्परा है। यहाँ भागवत का कथन रखा गया है।

परशुराम ने इक्कीस बार धरती को अहंकारी राजाओं से रिक्त किया, और हर बार वह दर्प लौट आया। बदला एक चोट में नहीं चुकता; काटी हुई जड़ फिर फूट निकलती है। कथा का असली विजय युद्धभूमि में नहीं, उस पर्वत पर है जहाँ परशुराम अकेले बैठकर अपने ही क्रोध को शांत करते हैं। बाहर का शत्रु मर जाता है; भीतर का बहुत धीरे मरता है।

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