परशुराम

कथा 47 · भागवतम् की कथाएँ

परशुराम

The Brahmin Who Destroyed the Warriors
स्कन्ध 9, अध्याय 15-16

जमदग्नि एक ऋषि थे। एक तपस्वी। उनकी पत्नी रेणुका।

उनके पाँच बेटे। सबसे छोटा परशुराम।

परशुराम बचपन से अलग था। बहुत strong। बहुत powerful। और एक quick temper।

वो विष्णु का अवतार था। इस avatar का काम था, क्षत्रियों का अहंकार तोड़ना।

जमदग्नि के पास एक special गाय थी। कामधेनु, हर इच्छा पूरी करती। उनके यज्ञों के लिए दूध देती।

एक दिन कार्तवीर्य अर्जुन नाम के एक क्षत्रिय-राजा ने उनके आश्रम पर हमला किया।

कार्तवीर्य के हज़ार हाथ थे। बहुत powerful राजा।

उसने जमदग्नि की कामधेनु छीनी। ले गया।

परशुराम को जब पता चला, वो ग़ुस्से में।

उन्होंने अपना परशु (कुल्हाड़ी) उठाया। कार्तवीर्य को ढूँढा।

एक भयंकर युद्ध। कार्तवीर्य के हज़ार हाथ। पर परशुराम का परशु।

अंत में कार्तवीर्य मरा। सब हाथ कटे।

परशुराम कामधेनु वापस लाए।

मगर कार्तवीर्य के बेटों को यह पसंद नहीं आया।

वो जमदग्नि के आश्रम पर हमला किया। परशुराम घर पर नहीं थे।

उन्होंने जमदग्नि को मार डाला।

रेणुका भागी। एक्कीस बार उन्होंने अपनी छाती पीटी, रोते-रोते। ”हे राम! हे राम!” इक्कीस बार।

जब परशुराम लौटे, उन्होंने यह सब देखा।

उनके पिता का शव। उनकी माँ का रोना। इक्कीस बार पीटी छाती।

हन्तुं नियुक्त इति विद्धि सहस्रकोटीन् ।
क्षत्रत्रिमेभ्योऽपहृताभिमानयुक्तान् ॥

क्षत्रियों के अहंकार को नष्ट करने के लिए, उनके अधिनायकों को मारने के लिए, मुझे (परशुराम-रूप में) भेजा गया था।

उन्होंने एक भयंकर प्रतिज्ञा की।

”मैं पृथ्वी से क्षत्रियों को ख़त्म कर दूँगा। इक्कीस बार। मेरी माँ ने जितनी बार छाती पीटी, उतनी बार।”

और उन्होंने ऐसा किया।

वो निकले। एक-एक क्षत्रिय राज्य पर हमला किया। पुरुषों को मारा। राजाओं को मारा। सैनिकों को मारा।

पृथ्वी पर एक भी क्षत्रिय नहीं छोड़ा।

मगर वो सब के नहीं मारे। थोड़े गर्भ में होते थे। माएँ छुपातीं। और थोड़े बच जाते।

जब वो बड़े होते, परशुराम फिर आते। फिर मारते।

इक्कीस बार उन्होंने पूरी पृथ्वी पर क्षत्रियों का सफ़ाया किया।

और हर बार, क्षत्रिय फिर पैदा होते थे। माओं की रक्षा से।

अंत में, पृथ्वी से क्षत्रियों का सफ़ाया करने का उनका काम पूरा।

वो हिमालय में चले गए। तपस्या के लिए।

मगर एक problem थी। उनका ग़ुस्सा अभी भी अंदर था।

वो mahendra पर्वत पर तपस्या में बैठे।

मगर बीच-बीच में, उठ जाते। जंगल में जाते। पेड़ काटते। चट्टान फोड़ते।

उनका परशु अभी भी गरमा-गरम।

बहुत साल बाद, एक और दिन।

अयोध्या के राजकुमार राम, जिन्होंने अपने स्वयंवर में शिव-धनुष तोड़ा था, वो उस रास्ते से गुज़रे।

परशुराम को पता चला। वो तुरंत वहाँ पहुँचे।

”एक नया राजकुमार जिसने शिव का धनुष तोड़ा? यह तो मेरी जगह का हमला है। शिव की चीज़ें मेरी हैं।”

वो राम के सामने।

”तू ने यह कैसे किया? कौन है तू?”

राम ने नम्रता से कहा, ”मैं दशरथ-पुत्र राम।”

”ठीक है। तो तू क्षत्रिय। मैं तुझे मार दूँगा।”

परशुराम ने अपना दूसरा शस्त्र निकाला। एक विशेष धनुष। ”इस को खींच।”

राम ने हाथ बढ़ाया। उठाया। एक झटके में खींचा।

और तब परशुराम को महसूस हुआ कि यह कोई साधारण राजकुमार नहीं।

एक पल को उन्होंने ध्यान-दृष्टि से देखा। और पाया, यह विष्णु का अवतार।

उन्हें एक झटका लगा।

”ओह। मैं तो अपनी ही पीछे की कहानी से मिल रहा हूँ।”

(दोनों परशुराम और राम, दोनों विष्णु के अवतार थे।)

उन्होंने धनुष राम को सौंपा।

”अब तू ले। मेरा काम ख़त्म। तू अगला अवतार।”

वो जंगल में चले गए।

पुराण कहते हैं, परशुराम अभी भी जीवित हैं। chiranjeevi, अमर। हिमालय में कहीं।

मन्थन

परशुराम की कथा भागवतम् का सबसे violent अवतार है।

एक ऋषि का बेटा। पर एक ऐसे काम के लिए लिया गया अवतार जो शान्ति का नहीं था। एक खूनी काम।

क्यों? क्योंकि क्षत्रियों का अहंकार उस वक़्त तीनों लोकों को मार रहा था। उन्हें रोकना ज़रूरी था।

मगर एक interesting बात। परशुराम ने न्यायी क्षत्रियों को नहीं मारा। बस अधिनायकों को। जो शोषण करते थे। जो अहंकार में थे।

और दूसरी बात। उन्होंने एक बार नहीं, इक्कीस बार किया। हर बार क्षत्रिय वापस आते थे। माओं की रक्षा से।

यह एक symbol है। बुराई कभी पूरी तरह ख़त्म नहीं होती। वो वापस आती है। और हर बार फिर रोकनी पड़ती है।

हम अपने में भी यही experience करते हैं। एक ego हम तोड़ते हैं, दूसरा आ जाता है।

और शायद यह कथा कह रही है, यह work continuous है। एक काम नहीं, repeat काम।

एक और बात। परशुराम का अंत interesting है। उन्होंने राम के सामने अपना धनुष सौंपा। और जंगल में चले गए।

एक avatar खत्म, दूसरा शुरू। बिना ego के, बिना stake के।

यह transition एक मॉडल है। जब आपका काम पूरा हो, हट जाओ। अगले को आने दो।