परशुराम
गंगा के तट पर सूरज ढल रहा था। परीक्षित् कुछ देर मौन रहे, फिर बोले, ”भगवन्, अब तक आपने मुझे करुणा सुनाई, क्षमा सुनाई, उस प्रभु की कोमलता सुनाई जो गजराज की पुकार पर दौड़ पड़ते हैं। पर मेरे भीतर एक प्रश्न बैठा है। जब अधर्म हद से बढ़ जाए, जब बल ही अन्याय का औज़ार बन जाए, तब भगवान् किस रूप में आते हैं? क्या उनके हाथ में कभी कुल्हाड़ी भी होती है?”
शुकदेव के होंठों पर हल्की-सी गंभीरता उतरी। ”होती है, राजन्। और जब वह उठती है, तो पृथ्वी काँपती है। सुनिए, एक ब्राह्मण की कथा, जिसका क्रोध भी प्रभु की लीला था। पर पहले उस वंश को जान लीजिए, जिसमें वह तेज उतरा।”

”पुरूरवा के वंश में आगे चलकर गाधि नामक राजा हुए, राजन्। उनकी एक कन्या थी, सत्यवती। ऋचीक नामक ऋषि ने गाधि से वह कन्या माँगी। गाधि ने सोचा कि यह तपस्वी मेरी कुशिकवंशी कन्या के योग्य वर नहीं, अतः शुल्क में एक हज़ार ऐसे घोड़े माँग लिये, जिनका सारा शरीर श्वेत हो पर एक-एक कान श्याम वर्ण का हो। ऋचीक वरुण के पास गये, वैसे ही घोड़े ले आये, और सत्यवती से विवाह कर लिया।”
”एक बार ऋचीक की पत्नी और सास, दोनों ने पुत्र के लिए प्रार्थना की। ऋषि ने दोनों के लिए अलग-अलग मन्त्रों से चरु पकाया और स्नान को चले गये। सत्यवती की माता ने सोचा कि ऋषि ने अपनी पत्नी के लिए ही श्रेष्ठ चरु बनाया होगा, अतः वह चरु माँगकर अपना चरु बेटी को दे दिया और बेटी का चरु स्वयं खा गयीं। ऋषि ने लौटकर तप-बल से यह जान लिया और सत्यवती से कहा, ‘आपने बड़ा अनर्थ कर दिया। अब आपका पुत्र दण्ड देनेवाला घोर प्रकृति का होगा और आपका भाई एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता।’ सत्यवती के प्रार्थना करने पर ऋषि ने इतना किया कि वह घोर स्वभाव एक पीढ़ी टल गया, और समय पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ।”
जमदग्नि एक ऋषि थे, तपस्या में पगे हुए। उन्होंने रेणु ऋषि की कन्या रेणुका का पाणिग्रहण किया, जिनकी मर्यादा आश्रम की हवा में बसी रहती थी। उनके कई पुत्र हुए, और सब में छोटा था राम, जिसे लोग आगे चलकर परशुराम कहने लगे, उस परशु के कारण जो उसके कंधे से कभी नहीं उतरता था।
बचपन से ही उसमें कुछ और था। बाँहों में एक ऐसा बल जो खेल में भी छिपता नहीं था, और भीतर एक आँच, जो ज़रा-सी हवा पाकर भड़क उठती थी। साधारण आँख से देखने वाले को वह बालक भर लगता, पर उस बालक के भीतर श्रीहरि स्वयं उतर आए थे, इसी एक प्रयोजन से कि क्षत्रियों के उस अहंकार को तोड़ें जो उस युग में मर्यादा की हर दीवार लाँघ चुका था।
जमदग्नि के पास एक गाय थी, कामधेनु, जो माँगी हर वस्तु दे देती थी। उसी के दूध और घी से ऋषि के यज्ञ चलते थे, उसी से अतिथियों का सत्कार होता था।
एक दिन कार्तवीर्य अर्जुन उस आश्रम में आया। हैहयवंश का अधिपति, जिसने भगवान् नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय की आराधना से एक हज़ार भुजाएँ पाई थीं, और जिसकी भुजाओं से बड़ा उसका दर्प था।

आश्रम के सीधे-सादे सत्कार में उसने वह गाय देख ली जो राजमहलों की समृद्धि को लज्जित करती थी। और जो राजा एक हज़ार हाथों का स्वामी हो, वह माँगना नहीं जानता। उसने कामधेनु को बलपूर्वक छीना और अपने सैनिकों से बँधवाकर ले चला, उसका बछड़ा पीछे रँभाता रह गया।
परशुराम बाहर गए हुए थे। लौटे, तो आश्रम की खामोशी ने ही सब कह दिया, खाली खूँटा, टूटा हुआ बाड़ा, और पिता की आँखों में वह पीड़ा जो ऋषि भी छिपा नहीं सके।
उन्होंने कंधे से परशु उतारा। उसकी धार पर अँगुली फेरी, और बिना एक शब्द कहे माहिष्मती की ओर चल पड़े।

युद्ध भयंकर हुआ। एक ओर एक हज़ार भुजाएँ, और हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकों से युक्त सत्रह अक्षौहिणी सेना। दूसरी ओर एक अकेला ब्राह्मण, और उसके हाथ में वह कुल्हाड़ी जो उसके कंधे से कभी नहीं उतरती थी। कार्तवीर्य ने पाँच सौ धनुषों पर एक साथ बाण चढ़ाये, पर परशुराम ने अपने एक ही धनुष के बाणों से उन सबको एक साथ काट डाला। फिर उसने पहाड़ और पेड़ उखाड़कर फेंके, और परशुराम का परशु उन्हें बीच हवा में काटता चला जाता।
अंत में वह हज़ार भुजाओं वाला राजा पृथ्वी पर गिरा, उसकी सब भुजाएँ कटी हुईं, जैसे आँधी में गिरे किसी विशाल वृक्ष की डालियाँ। उसके दस हज़ार पुत्र डरकर भाग खड़े हुए, और परशुराम कामधेनु तथा उसके बछड़े को खोलकर वापस आश्रम ले आए।
एक दिन रेणुका जल भरने गंगा-तट पर गईं। वहाँ गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल-क्रीड़ा करते देख क्षण भर उनका मन डगमगा गया, और हवन का समय बीत गया। आश्रम लौटीं तो जमदग्नि ने अपने तप-बल से सब जान लिया। उन्होंने बारी-बारी अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि वे माता का वध कर दें। बड़े पुत्र ठिठक गए, किसी का हाथ न उठा। पर परशुराम ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की, और रेणुका तथा हिचकते भाइयों को भी शान्त कर दिया। प्रसन्न होकर जमदग्नि ने वर माँगने को कहा। परशुराम ने यही माँगा कि उनकी माता और भाई फिर जी उठें, और उस घड़ी की कोई याद उनके मन में न रहे। ऐसा ही हुआ।
पर बैर यहीं नहीं रुका। कुछ समय बीता। एक दिन परशुराम अपने भाइयों के साथ आश्रम से दूर वन की ओर गए हुए थे, और कार्तवीर्य के पुत्र, अपने पिता का बदला सीने में लिए, चुपचाप आश्रम में घुस आए।
जमदग्नि अग्निशाला में बैठे थे, निःशस्त्र, आँखें मूँदे, भगवान् के चिन्तन में मग्न। उन्होंने उसी अवस्था में ऋषि का सिर धड़ से अलग कर दिया, और उसे साथ लेकर भाग निकले।

रेणुका दौड़ीं। पति के कटे शरीर से लिपटकर उन्होंने अपनी छाती और सिर पीटा, और पीटती चली गईं, ”हे राम! हे राम!” बार-बार उनका हाथ उनकी छाती पर पड़ता, बार-बार वही पुकार उठती।
परशुराम ने बहुत दूर से ही माता का वह करुण-क्रन्दन सुन लिया। दौड़े-दौड़े आश्रम पहुँचे, और द्वार पर ही उनके पाँव रुक गए। सामने पिता का सिरविहीन शरीर पड़ा था, और उस पर झुकी, बार-बार छाती पीटती, उनकी माँ।
उस क्षण उनकी आँखों में कोई आँसू नहीं था, केवल आग। उन्होंने पिता का शव छाती से लगाया, भाइयों को सौंपा, और एक प्रतिज्ञा ली, इतनी शांत कि वह चीख़ से कहीं अधिक भयावनी थी।
”जिस अहंकार ने एक तपस्वी को ध्यान में बैठे-बैठे मार डाला, वह अहंकार इस पृथ्वी पर नहीं रहेगा। मैं बार-बार इस धरती को उन क्षत्रियों से रिक्त कर दूँगा जो बल को अन्याय का साधन बना चुके हैं।”
और उन्होंने वैसा ही किया। पहले वे माहिष्मती गये, और कार्तवीर्य के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचों-बीच एक बड़ा पर्वत खड़ा कर दिया। फिर वे निकल पड़े, एक राज्य से दूसरे राज्य। जो राजा प्रजा को कुचलते थे, जो दर्प में मर्यादा भूल चुके थे, उन्हें उन्होंने चुन-चुनकर समाप्त किया। उनका परशु थमता ही नहीं था।
पर बीज मिट्टी में रह जाते हैं। कुछ क्षत्रिय-बालक माताओं के गर्भ में थे, कुछ को ब्राह्मणों ने अपने आश्रमों में छिपा लिया। वे बच गए, बड़े हुए, और फिर सिंहासनों पर वही पुराना दर्प लौट आया।
परशुराम फिर लौटते। फिर परशु उठता। ऐसा एक बार नहीं, इक्कीस बार हुआ, जब तक उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो गई। कुरुक्षेत्र के समन्तपंचक में उन्होंने रक्त से भरे पाँच तालाब तक बना दिये।

जब उनका संकल्प पूरा हुआ, तब उन्होंने पिता का सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ दिया, और एक महान यज्ञ किया। उस यज्ञ में जो पृथ्वी उन्होंने जीती थी, वह सारी कश्यप ऋषि को दान कर दी। जिस धरती के लिए राजा एक-दूसरे का गला काटते थे, उसे एक ब्राह्मण ने हथेली पर रखकर दे दिया, जैसे वह कोई फल हो।
फिर वे महेन्द्र पर्वत पर चले गए। वहाँ की हवा देवदार की गंध से भरी रहती, झरनों का स्वर दिन-रात बहता रहता।
शुकदेव यहाँ क्षण भर रुके। ”राजन्, सोचिए। जिसने इक्कीस बार पृथ्वी को रिक्त कर दिया, उसे अब अपने ही क्रोध के साथ अकेले बैठना था। बैर का सब में कठिन शत्रु बाहर नहीं रहता।”
धीरे-धीरे, बरसों की उस एकांत-साधना में, उन्होंने शस्त्र नीचे रख दिये, और उनका चित्त शान्त हो गया। परशु अब भी पास था, पर अब वह उठता नहीं था, बैर अपनी पकड़ ढीली कर चुका था।
शास्त्र कहते हैं कि परशुराम आज भी हैं, चिरंजीवी, अमर, उसी महेन्द्र पर्वत पर शान्त-चित्त निवास करते हुए, जहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित का मधुर स्वर से गान करते रहते हैं। आगामी मन्वन्तर में वे सप्तर्षियों के मण्डल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे।
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, मैं सोच रहा था कि अवतार का अर्थ है कोमलता, करुणा। पर यह अवतार तो रक्त से सना है। एक ब्राह्मण, और उसके हाथ में कुल्हाड़ी।”
शुकदेव मुस्कराए। ”राजन्, करुणा का एक रूप ढाल है, और एक रूप कुल्हाड़ी। जब अहंकार इतना बढ़ जाए कि वह निर्बल का गला घोंटने लगे, तब उसे रोकना भी करुणा ही है। परशुराम का परशु उन्हीं पर उठा जिनका बल अन्याय का औज़ार बन चुका था। न्यायी राजा बचे रहे, और प्रजा उनकी छाँव में निश्चिंत रही।”
”पर इक्कीस बार, भगवन्? एक बार में क्यों नहीं?”
”क्योंकि जो काट दिया जाता है, वह फिर उगता है, राजन्। दर्प कभी एक चोट में नहीं मरता। माताएँ अपने बालकों को छिपा लेती थीं, और वे बड़े होकर फिर वही पुराना अभिमान सिंहासन पर ले आते थे। परशुराम फिर लौटते। यही उनका तप था, बार-बार वही काम, बिना थके।”
परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया, मानो अपने ही भीतर किसी चीज़ को पहचान रहे हों।
”और अंत में?” उन्होंने पूछा।
”अंत में उन्होंने जीती हुई सारी पृथ्वी दान कर दी और पर्वत पर चले गए। जिसके लिए राजाओं ने एक-दूसरे को काटा, उसे उन्होंने मुट्ठी खोलकर छोड़ दिया। राजन्, माहिष्मती के रणक्षेत्र से कहीं कठिन वह युद्ध था जो उन्होंने पर्वत पर अकेले बैठकर अपने ही क्रोध से लड़ा।”
परीक्षित् ने गंगा की ओर देखा। दूर, संध्या की लाली पानी पर काँप रही थी, और एक पंछी अकेला उस पार उड़ता चला जा रहा था।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 15 और 16 में आती है। परशुराम श्रीहरि के छठे अवतार हैं, जिन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों के दर्प से रहित किया, फिर सारी पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए। परशुराम और दशरथ-पुत्र राम की भेंट इन अध्यायों में नहीं है; वह प्रसंग रामायण की परम्परा का है, अतः यहाँ केवल भागवत का कथन रखा गया है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
परशुराम ने इक्कीस बार धरती को अहंकारी राजाओं से रिक्त किया, और हर बार वह दर्प लौट आया। बदला एक चोट में नहीं चुकता; काटी हुई जड़ फिर फूट निकलती है। कथा का असली विजय युद्धभूमि में नहीं, उस पर्वत पर है जहाँ परशुराम अकेले बैठकर अपने ही क्रोध को शांत करते हैं। बाहर का शत्रु मर जाता है; भीतर का बहुत धीरे मरता है।