अजामिल की मुक्ति
परीक्षित् ने हाथ जोड़े और शुकदेव की ओर देखा।
”भगवन्, एक बात मेरे भीतर बैठी रह गई है। मेरे पास अब गिनती के दिन हैं, और मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ ठीक नहीं किया। मन कहता है कि इतने वर्षों की भूल कोई अन्तिम क्षण कैसे धो सकता है। क्या सचमुच नाम में इतनी शक्ति है कि वह एक डूबे हुए मनुष्य को भी पार ले जाए?”
शुकदेव कुछ देर ख़ामोश रहे। फिर उनके चेहरे पर वह हल्की-सी आभा आई जो हरि की चर्चा के समय आती थी।
”राजन्, महात्मा लोग इस विषय में एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। कान्यकुब्ज नगर में, जिसे आप कन्नौज कहते हैं, एक ब्राह्मण रहता था, अजामिल। उसकी कथा सुनिए। फिर आप ख़ुद देख लेंगे कि नाम किसका इन्तज़ार नहीं करता।”
अजामिल जवानी में शास्त्रों का ज्ञाता था, शील और सदाचार का घर। ब्रह्मचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ और पवित्र। मन्त्रों का मर्म उसके भीतर बसा था। गुरु, अग्नि, अतिथि और वृद्धजनों की सेवा करता, सब प्राणियों का हित चाहता, और किसी के गुणों में दोष नहीं ढूँढता था।

एक दिन वह अपने पिता के आदेश से जंगल गया और वहाँ से फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर लौट रहा था। रास्ते में उसकी नज़र एक जोड़े पर पड़ी। एक भ्रष्ट शूद्र, शराब पीकर मतवाला, और उसके साथ उसकी एक दासी। वह स्त्री भी मद से चूर थी, अस्त-व्यस्त वस्त्रों में, बेपरवाह हँसती और गाती हुई। शूद्र उसे रिझा रहा था।
उस एक पल में अजामिल के भीतर का कुछ डगमगा गया। शास्त्र भी थे भीतर, और यह आँच भी। उसने अपने धैर्य और ज्ञान से मन को रोकने की बहुत चेष्टा की, पर मन को सँभाल न सका। आँच जीत गई।
वह घर लौटा, पर पहले जैसा नहीं। उसी स्त्री का चिन्तन उसके मन को घेरे रहा। थोड़े ही दिनों में उसने अपनी कुलीन ब्याहता पत्नी को अलग कर दिया और उस दासी को घर ले आया।
कन्नौज के लोग दबी ज़बान में बातें करने लगे। वह पंडित का बेटा, जो मन्त्र जानता था, अब उस स्वच्छन्दचारिणी के साथ। पर अजामिल को किसी की बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
उस दासी के कुटुम्ब को पालने के लिए उसने शास्त्र की मर्यादा भुला दी। कभी बटोहियों को बाँधकर लूट लेता, कभी जुए के छल से किसी को हरा देता, किसी का धन धोखे से तो किसी का चुरा लेता। यहाँ तक कि अपने पिता की सारी सम्पत्ति भी उसी को सौंप दी। इसी निन्दनीय वृत्ति से वह अपने कुटुम्ब का पेट भरता रहा।
बरस बीतते गए। दस बेटे हुए। हर बेटे का नाम कुछ साधारण-सा रखा गया।
पर सब में छोटे का नाम उसने रखा, ”नारायण।”
क्यों, यह वह ख़ुद नहीं जानता था। शायद भीतर कहीं पुरखों का कोई संस्कार बचा रह गया था, जो ख़ुद को इस एक नाम में टिका गया।
छोटा बेटा उसे प्राणों से प्यारा था। बूढ़े बाप की आँखों का तारा।

वह दिन भर उसी के पीछे लगा रहता। उसकी तोतली बोली सुनकर और बालसुलभ खेल देखकर फूला न समाता। ”नारायण, इधर आइए। नारायण, खा लीजिए। नारायण, सो जाइए।” सुबह से शाम, यही नाम उसकी ज़बान पर रहता।
उसे ख़बर तक न थी कि वह किसका नाम दिन-रात रट रहा है।
इसी तरह अठासी बरस बीत गए।
अजामिल बूढ़ा हो गया, फिर बीमार। साँस उखड़ने लगी। बिस्तर पर पड़ा वह अपने अन्तिम दिन गिन रहा था, और मन में अब भी उसी बालक नारायण के सम्बन्ध में सोच-विचार करता रहा।
और तभी उसके सामने तीन आकृतियाँ आ खड़ी हुईं। यमदूत।

उनके मुँह टेढ़े-टेढ़े, शरीर के रोएँ खड़े हुए, रूप अत्यन्त भयावना। वे अजामिल के सूक्ष्म शरीर को उसके शरीर से खींचने लगे।
अजामिल की आँखें फटी रह गईं। हलक सूख गया। साँस जैसे सीने में ही अटक गई।
उसी घबराहट में उसकी नज़र दरवाज़े पर पड़ी। वहाँ उसका छोटा बेटा कुछ दूरी पर खेल रहा था। नारायण।
डर के मारे, जैसे डूबता मनुष्य किसी तिनके को पुकारे, उसने ऊँचे स्वर से अपने बेटे को आवाज़ दी। भगवान के लिए नहीं, बस उस बच्चे के लिए, जिसे वह आख़िरी बार देख लेना चाहता था।
”नारायण!”
बेटे ने नहीं सुना। वह अपने खेल में डूबा रहा।
पर एक काम तुरन्त हुआ।
उस एक पुकार के साथ ही कमरे में एक और रोशनी उतर आई। भगवान के पार्षद, दिव्य रूप, शान्त मुख, कमल जैसी नज़र। उन्होंने देखा कि यह मरते समय अपने स्वामी भगवान् नारायण का नाम ले रहा है, और बड़े वेग से झटपट वहाँ आ पहुँचे।

उन्होंने आगे बढ़कर यमदूतों के पाश को बलपूर्वक रोक दिया।
”ठहरिए। यह मनुष्य अब हमारा है। इसे यहाँ से ले जाने का हक़ अब आपका नहीं रहा।”
यमदूत चौंक उठे। ”यह कैसे? यह तो जीवन भर का पापी है। हमें इसे धर्मराज के पास ले जाने का आदेश है।”
विष्णुदूत बोले, ”इसने अभी अपने अन्तिम क्षण में नारायण का नाम लिया। उस नाम के साथ ही इसका हिसाब बदल गया।”
”पर इसने तो अपने बेटे को पुकारा था,” यमदूतों ने कहा, ”भगवान को नहीं।”
”नाम तो नाम ही रहता है,” विष्णुदूत बोले, ”किसी के भी लिए कहा गया हो। संकेत में, परिहास में, गीत के टेक के रूप में, या किसी की अवहेलना में भी यदि कोई भगवान् का नाम ले ले, तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। आग जिस हाथ से छू ले, उसी हाथ को जला देती है, चाहे छूने वाले को मालूम हो या न हो कि वह आग है।”
फिर दोनों ओर से शास्त्र और न्याय की बातें होने लगीं। धर्म का लक्षण, पाप का हिसाब, दण्ड की मर्यादा। विष्णुदूतों ने कहा कि वेद ही भगवान् के स्वरूप हैं, और जो उन्हें जानता है वही धर्म और अधर्म को ठीक से पहचानता है।
अजामिल बिस्तर पर पड़ा यह सब सुन रहा था। एक-एक बात उसके भीतर उतरती जा रही थी। उसे आज तक यह पता ही नहीं था कि जिस नाम को वह बरसों से यूँ ही पुकारता रहा, उसमें इतना बल भरा था।
विष्णुदूतों ने वही बात दोहराई जो शास्त्र कहते आए हैं, कि जो भी हरि का नाम लेता है, जान-बूझकर या अनजाने, उसके सब पाप वैसे ही भस्म हो जाते हैं जैसे ईंधन को अग्नि का स्पर्श।
यमदूतों के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। वे धर्मराज के पास लौट गए और सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।
अजामिल यमदूतों के फंदे से छूटकर निर्भय हो गया। उसने भगवान् के पार्षदों को सिर झुकाकर प्रणाम किया, और उसकी आँखों में आँसुओं के साथ एक नई समझ उतर आई।
जिस नाम को वह बरसों से अपने बेटे के लिए पुकारता रहा, वह असल में उसी श्रीहरि का नाम था जिसे वह जवानी में भूल बैठा था। बिना जाने, बिना भक्ति की कोई भावना लिए, उसने अनगिनत बार ”नारायण” का जाप कर डाला था। और उसी अनजाने जाप ने उसे आज मृत्यु के द्वार से लौटा लिया।
अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चात्ताप होने लगा। ”अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ! मैंने अपनी सती और अबोध पत्नी को छोड़ दिया, बूढ़े और तपस्वी माँ-बाप को असहाय छोड़ दिया, और अपने कुल में कलंक की टीका लगा दी। पर भगवान् का वह परम मंगलमय नाम मेरी जीभ पर आ गया, और मैं तर गया।”
भगवान् के पार्षद उसकी ओर देखते रहे, और जैसे वह कुछ और कहना चाहता था, वैसे ही वहीं अन्तर्धान हो गए।
अजामिल की बीमारी जाती रही। वह उठ बैठा।
इस बार वह पहले जैसा नहीं रहा। उसने घर-बार, बेटे, वह दासी, सब पीछे छोड़ दिया और हरिद्वार की ओर चल पड़ा। गंगा के किनारे भगवान् के मन्दिर में बैठकर उसने योग का आश्रय लिया, अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन में लीन कर लिया, और वही नाम लिया जो उम्र भर उसकी ज़बान पर तो रहा था, पर आज पहली बार उसके मन में भी उतर आया।

कुछ ही समय में, गंगा के तट पर उसने अपना शरीर त्याग दिया। उसी क्षण वही दिव्य पार्षद फिर सामने आ खड़े हुए। अबकी बार पाश नहीं था। अजामिल ने उन्हीं का दिव्य रूप पा लिया, और उनके साथ एक स्वर्णमय विमान पर बैठकर वह भगवान् लक्ष्मीपति के धाम वैकुण्ठ को चला गया।
शुकदेव यहाँ रुके। परीक्षित् देर तक चुप बैठे रहे, फिर धीरे से बोले।
”भगवन्, एक उलझन है। अगर अनजाने में लिया हुआ नाम भी पाप धो देता है, तो कोई भी कह सकता है, जीवन भर मनमानी करूँ और अन्त में एक बार नाम ले लूँ। फिर धर्म की मर्यादा का क्या रह जाएगा?”
शुकदेव मुस्कुराए। ”राजन्, जो यह सोचकर पाप करता है कि अन्त में नाम ले लूँगा, उसकी ज़बान पर वह नाम अन्त में आता ही नहीं। मृत्यु का भय मनुष्य को वही लौटाता है जो उसने उम्र भर भीतर सँजोया हो। अजामिल ने सोच-समझकर कोई सौदा नहीं किया था। उसने बरसों, हर सुबह-शाम, बिना किसी गिनती के वह नाम पुकारा था। वही संस्कार अन्तिम क्षण में अपने आप उसकी जीभ पर चढ़ आया।”
”तो नाम की शक्ति झूठी नहीं,” परीक्षित् ने कहा, ”पर वह किसी चालाकी से नहीं खुलती।”
”नाम में अपनी शक्ति है, राजन्, यह सच है। श्रीहरि अपने नाम से अलग नहीं। पर वह नाम तभी पुकारा जाता है जब वह भीतर बसा हो। अजामिल ने अनजाने में ही सही, जीवन का परम धन एक बच्चे के नाम में जोड़ रखा था। और श्रीहरि उस धन को भूले नहीं।”
परीक्षित् ने आँखें मूँद लीं। सात दिन का डर अब उन्हें उतना भारी नहीं लग रहा था।
साहित्यिक-संदर्भ
अजामिल की कथा श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध, अध्याय 1 और 2 में आती है। यह पूरे भागवत में नाम-महिमा की सब में अधिक मुखर कथा है। विष्णुदूतों का यमदूतों से संवाद (6.2) ही इसका हृदय है, जहाँ नाम की अपनी शक्ति का सिद्धान्त खुलता है। प्रसिद्ध श्लोक ‘साङ्केत्यं पारिहास्यं वा…’ (6.2.14) यहीं का है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
अजामिल जीवन भर भटका रहा, और अन्तिम क्षण में लिया हुआ एक नाम उसे पार ले गया। यह कथा उस मनुष्य के लिए उम्मीद है जो सोचता है कि अब बहुत देर हो चुकी। नाम किसी का इन्तज़ार नहीं करता, यही इसका सहारा है।