अजामिल की मुक्ति
अजामिल एक ब्राह्मण था।
जवानी में वो पढ़ा-लिखा, धार्मिक। शास्त्र पढ़े थे। यज्ञ कर सकता था। मन्त्र जानता था।
एक दिन वो जंगल से लकड़ी लेकर लौट रहा था। रास्ते में उसने एक स्त्री देखी। दासी थी, एक राक्षसी जैसी, मगर सुंदर। एक पुरुष के साथ। नशे में थी।
उन दोनों को देखकर अजामिल का मन डगमगा गया।
वो उसी क्षण घर गया। अपनी पत्नी को छोड़ा। उस दासी को घर ले आया।
लोग चौंक गए। पंडित-बेटा एक दासी के साथ?
अजामिल को कुछ नहीं फ़र्क़ पड़ा। वो उसी के साथ रहने लगा। बच्चे हुए। दस बच्चे। हर बच्चे का नाम कुछ साधारण।
पर सबसे छोटे का नाम उसने रखा, ”नारायण।”
क्यों? पता नहीं। शायद थोड़ा सा पुराना ब्राह्मण-संस्कार बचा था। शायद कुछ और।
अजामिल अपने आख़िरी बेटे को बहुत प्यार करता था। उसके सब बेटों में सबसे प्यारा।
वो उसे ”नारायण, नारायण” पुकारता रहता। ”नारायण आ। नारायण खा। नारायण सो।”
उसके मन में बस यह नाम था।
इस तरह अस्सी साल बीते।
अजामिल बूढ़ा हो गया। बीमार। बिस्तर पर लेटा।
मरने वाला था।
और तब, उसके सामने तीन यमदूत खड़े हो गए।
बहुत डरावने। हाथ में पाश। आँखें लाल। काले शरीर।
”अजामिल, तू ने अपनी ज़िंदगी में पाप किया। अपनी पत्नी को छोड़ा। एक दासी के साथ रहा। दस बच्चे पैदा किए, बिना धर्म के। तू नरक जाएगा।”
अजामिल डर गया। उसकी आँखें फटी रह गईं।
एक पल में उसके भीतर एक बात आई।
उसे अपने सबसे छोटे बेटे की याद आई। नारायण। पास में खेल रहा था।
उसने उसे पुकारा। आख़िरी बार। माँ की चाहत में नहीं, सिर्फ़ डर के मारे।
”नारायण!”
बेटे ने नहीं सुना। वो किसी और काम में था।
पर एक काम तुरंत हुआ।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥
(श्रीमद्भागवत 6.2.14)
चाहे संकेत में हो, चाहे मज़ाक़ में, चाहे किसी और का नाम लेते हुए हो, चाहे उपेक्षा में, वैकुण्ठ (नारायण) का नाम लेना सारे पापों को हर लेता है। यह बात ज्ञानी जानते हैं।
विष्णु के तीन दूत आ पहुँचे।
उन्होंने यमदूतों को रोका।
”रुको। यह आदमी अब हमारा है।”
यमदूत चौंके। ”क्या? यह तो पापी है। हम इसे ले जाने आए हैं।”
विष्णुदूत बोले, ”इसने ”नारायण” का नाम लिया। यह नाम का मतलब है, यह विष्णु के पास जाएगा।”
”पर इसने बेटे को पुकारा। भगवान को नहीं।”
”नाम तो नाम है। चाहे जिसके लिए भी कहा हो।”
वहीं एक debate शुरू हो गई। यमदूत और विष्णुदूत के बीच। शास्त्रों पर। नियमों पर। न्याय पर।
अजामिल बिस्तर पर लेटा सुन रहा था।
हर argument सुनकर वो हैरान। उसे पता नहीं था कि एक नाम में इतनी शक्ति होती है।
विष्णुदूतों ने कहा, ”यह श्लोक देखो,” और उन्होंने स्कन्ध 6 का famous verse कहा।
”जो भी, चाहे जान बूझकर हो या अनजाने में, हरि का नाम लेता है, उसके सब पाप जल जाते हैं। जैसे आग पास के घास को जला देती है, उसका इरादा घास को जलाना नहीं था।”
यमदूत हार गए। चले गए।
अजामिल बिस्तर पर लेटा था। उसकी आँखों में एक नई समझ।
उसने कुछ ऐसा कहा था जो वो रोज़ कहता रहा। एक बेटे का नाम। पर असली में वो एक भगवान का नाम था। उसने हर रोज़, अनगिनत बार, बिना समझे, ”नारायण” का जाप किया था।
विष्णुदूत बोले, ”अजामिल, तेरा समय बढ़ा दिया गया है। अब तू उठ। अपनी बाक़ी ज़िंदगी में सच में भक्ति कर। फिर हम लौटेंगे।”
अजामिल उठा। वो बीमारी से ठीक हो गया।
उसने अपने सब बच्चों को छोड़ा। अपनी दासी-पत्नी को छोड़ा। हरिद्वार चला गया। वहाँ कुछ साल साधना की।
एक दिन, जब वो ध्यान में था, विष्णुदूत फिर आए। इस बार उसे रथ पर बिठाकर ले गए। वैकुण्ठ।
अजामिल की कथा एक radical statement है।
हम सब अक्सर सोचते हैं कि भक्ति बहुत तीव्र होनी चाहिए। बहुत pure। बहुत focused। नहीं तो काम नहीं करती।
भागवतम् कह रहा है, नहीं।
एक आदमी ने अपनी पूरी ज़िंदगी पाप किया। अपनी पत्नी छोड़ी, एक दासी के साथ रहा, बच्चे पैदा किए, कोई धार्मिक काम नहीं किया। 80 साल ऐसे ही।
मगर उसने अपने सबसे छोटे बेटे का नाम ”नारायण” रखा। और रोज़, हज़ारों बार, वो नाम पुकारा। एक बेटे के लिए। बिना किसी भक्ति-भावना के।
मरते वक़्त, यह नाम उसे बचा गया।
यह कैसे? क्योंकि भागवतम् कहता है कि नाम में अपनी ख़ुद की शक्ति है। आप के intent पर निर्भर नहीं। नाम ख़ुद काम करता है।
यह एक uncomfortable theology है। हम इसे आसानी से misuse कर सकते हैं, ”चलो पाप करो, मरते वक़्त नारायण कह देंगे।”
मगर भागवतम् का असली point अलग है। बात यह नहीं है कि आप जान-बूझकर use करो। बात यह है कि भगवान आपके भीतर हर जगह छिपे हुए हैं, और एक छोटा सा accidental भी contact, अगर एकदम भीतर से हो, वो भी काम कर जाता है।
तो अपनी ज़िंदगी में जहाँ भी ”नारायण” का नाम है, चाहे वो किसी बेटे का हो, चाहे दोस्त का, चाहे किसी काम का, उसे साधारण मत समझो।