Lulla Family

सौभरि मुनि

कथा 50 · भागवतम् की कथाएँ

सौभरि मुनि

जल के भीतर बैठा तपस्वी, और एक मत्स्यराज का सुख
स्कन्ध 9, अध्याय 6

गंगा की लहरें उस सुबह कुछ ठहरी हुई थीं। परीक्षित् बहुत देर चुप रहे, फिर बोले।

”भगवन्, मैंने अब तक उन भक्तों की बातें सुनीं जो आख़िरी साँस में पार उतर गए। पर मेरे भीतर एक डर और भी है। यदि किसी ने वर्षों साधना की हो, मन को साध लिया हो, तो क्या वह भी फिसल सकता है? जिसके पास इतनी शक्ति हो, उसे किस बात का भय?”

शुकदेव मुस्कुराए, बहुत धीमे। ”राजन्, शक्ति और वैराग्य दो अलग चीज़ें हैं। एक के पास बड़ी शक्ति हो सकती है, और भीतर इच्छा फिर भी सोई पड़ी रहती है, बस अपने जागने का इंतज़ार करती हुई। सुनिए, सौभरि नाम के एक मुनि की कथा।”


सौभरि बड़े तपस्वी थे। ऋग्वेद के आचार्य, और तप में ऐसे पगे हुए कि उनका ब्रह्मतेज दीर्घकाल तक अक्षुण्ण बना रहा।

उनकी तपस्या का ढंग ही अनोखा था। जल के भीतर।

यमुना के एक गहरे कुंड में वे डूबे रहते, बस ध्यान में लीन। ऊपर धूप चढ़ती और ढलती, पानी की सतह पर छायाएँ काँपतीं, और नीचे वे निश्चल बैठे रहते।

साँस थमी हुई। मन थमा हुआ। सब कुछ थमा हुआ।

लम्बा समय यों ही बीत गया। उनके चारों ओर ठंडे पानी का दबाव, और भीतर एक ऐसी शान्ति कि कोई हलचल उसे छू न पाती थी।

एक दिन वे अपनी उसी जगह पर बैठे थे, जल की गहराई में।

और सामने से कुछ गुज़रा।

Painterly classical-Indian color illustration, underwater scene in a deep pool of the Yamuna: the gaunt sage Saubhari seated motionless in meditation on the sandbed amid dappled green-blue light and shafts of sunlight rippling from the surface above; before him glides a large silvery fish-king encircled by a swarm of many smaller female fish, lively and at play; Saubhari's eyes drawn toward the joyful fish family.

एक मत्स्यराज। अपनी अनेक पत्नियों के बीच, भरे-पूरे सुख में डूबा हुआ।

एक मछली, और उसके चारों ओर इतना साथ, इतनी हलचल, इतना जीवन।

सौभरि की आँखें एक पल को वहीं ठहर गईं।

जल की उस तन्हाई में उन्होंने ऐसा दृश्य कभी न देखा था। और यहाँ, उनके सामने, एक तुच्छ जलचर अपने भरे-पूरे संसार में मगन था।

मन की गहराई से एक विचार उठ आया, बहुत महीन, बहुत पुराना।

”एक मछली तक अपना सुख-संसार पा लेती है। और मैं, इतना बड़ा मुनि, अकेला बैठा हूँ। क्या मुझे भी कोई साथ न चाहिए?”

वे उठे। जल की सतह को चीरते हुए ऊपर आए।

बहुत दिनों बाद पहली बार उनके चेहरे पर खुली हवा लगी।

देह सूख-सी गई थी, पर तप की एक आभा उस पर ठहरी हुई थी।

वे सीधे राजा मान्धाता के दरबार पहुँचे।

Painterly classical-Indian color illustration of the royal court of King Mandhata, mighty sovereign of the seven continents, enthroned in splendor; nearby stand his fifty youthful marriageable princesses in fine attire; the aged ascetic Saubhari, withered yet wrapped in a glow of tapas, stands before the king to ask for one daughter in marriage; richly columned palace hall, courtiers and attendants around.

मान्धाता बड़े प्रतापी राजा थे, सातों द्वीपों के स्वामी। उनकी पचास कन्याएँ थीं, सब सयानी, सब विवाह-योग्य।

”हे राजन्,” सौभरि बोले, ”मुझे आपकी एक कन्या से विवाह की इच्छा है।”

मान्धाता ठहर गए। इतने बड़े मुनि को सीधे मना करना सहज न था। उन्होंने एक रीति का सहारा लिया।

”मुनिवर, हमारे यहाँ की रीत है कि कन्या स्वयंवर में स्वयं वर चुनती है। यदि कोई कन्या आपको चुन ले, तो वह आपकी हो जाएगी।”

सौभरि राजा का अभिप्राय समझ गए।

उन्होंने मन-ही-मन सोचा, ”राजा ने मुझे ऐसा सूखा उत्तर इसलिए दिया है कि मैं बूढ़ा हो चला हूँ, देह पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं, बाल पक गए हैं, और सिर काँपने लगा है। अब कोई कन्या मुझसे प्रेम नहीं करेगी।”

फिर एक संकल्प उनके भीतर जागा। ”अच्छी बात है। मैं अपने-आपको ऐसा सुन्दर बना लूँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिए लालायित हो उठें।”

और सामर्थ्यवान सौभरि ने अपनी योग-शक्ति से ठीक वैसा ही कर दिखाया। पल भर में वही सूखा तपस्वी ऐसे यौवन से दमक उठा कि देखने वाली की नज़र वहीं ठहर जाए।

अन्तःपुर के रक्षक उन्हें कन्याओं के सजे-सजाये महल में पहुँचा आए।

पचास कन्याओं ने उस एक ही सौभरि को अपना वर चुन लिया।

और चुनना भी कैसा। हर कन्या का मन उन पर ऐसा आसक्त हुआ कि आपस का प्रेमभाव भूलकर वे एक-दूसरी से कलह करने लगीं।

”ये मेरे योग्य हैं, आपके नहीं।” ”नहीं, मेरे।”

पचासों में होड़ लग गई, सब एक ही वर को पाने के लिए।

ऋग्वेदी सौभरि ने उन सभी का पाणिग्रहण कर लिया।

Painterly classical-Indian color illustration of Saubhari's opulent household conjured by his yogic power: jewel-laden mansions with rich couches, seats, garments and ornaments, clear lotus-filled pools, fragrant flower gardens with singing birds and humming bees; the now-youthful radiant sage amid his fifty wives, surrounded by countless playing children evoking his five thousand sons; abundance and domestic joy everywhere.

फिर अपनी अपार तपस्या के प्रभाव से उन्होंने ऐसे भवन रचे जो बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषणों से भरे थे। चारों ओर निर्मल जल से भरे सरोवर, सुगन्धित पुष्पों के बाग़, पक्षियों की चहक और भौंरों की गुंजार।

वहीं वे बस गए, अपनी पचास पत्नियों के साथ, हर सुख के बीच।

हर पत्नी से सौ-सौ पुत्र हुए। पूरे पाँच हज़ार।

जल के भीतर साँस रोककर बैठने वाला तपस्वी अब महलों में रहता था, बच्चों की किलकारियों और सेवकों की आवाज़ों के बीच।

एक दिन सातों द्वीपों के स्वामी मान्धाता सौभरि की यह गृहस्थी देखने आए। इतना वैभव, इतना सुख-साधन देखकर वे अचम्भे में पड़ गए। उनके भीतर का वह गर्व, कि मैं सार्वभौम सम्पत्ति का स्वामी हूँ, जाता रहा।

पर एक बात बाक़ी रह गई थी।

सौभरि भोग तो भोग रहे थे, पर भीतर सन्तोष नहीं था। जैसे घी की बूँदों से आग कभी तृप्त नहीं होती, वैसे ही उनका मन कभी भरता न था।

एक दिन वे अपने भीतर शान्त बैठे थे, और सहसा उन्हें अपना पतन याद आया।

”यह मैंने क्या कर बैठा?”

”दीर्घकाल तक मैंने अपना ब्रह्मतेज अक्षुण्ण रखा। और जल के भीतर एक मछली के संसर्ग ने, उसके सुख की एक झलक ने, वह सब बहा दिया। अब पचास घर, पाँच हज़ार संतान, और मेरा मन फिर भी अतृप्त।”

उन्होंने भीतर झाँका। मन पहले से कहीं अधिक बेचैन था, उतना ही जितना जल के भीतर शान्त रहा था।

उन्हें अपनी भूल स्पष्ट दिख गई। जो मोक्ष चाहता है उसे भोगी प्राणियों का संग सर्वथा छोड़ देना चाहिए, और एक क्षण के लिए भी इन्द्रियों को बाहर की ओर न जाने देना चाहिए। एकान्त में बैठकर मन को भगवान् में लगा देना चाहिए। संग करना ही हो तो भगवान् के अनन्य प्रेमी महात्माओं का।

वे उठे। अपनी पचास पत्नियों को बुलाया।

”सुनिए। मुझसे एक भूल हुई। एक छोटी-सी कामना के पीछे चलकर मैंने अपना तप गँवा दिया। अब मुझे लौटना है।”

Painterly classical-Indian color illustration of Saubhari's renunciation: the sage, having handed over rule to his five thousand sons, now in ochre sannyasi robes with staff, walking away from his palace toward the forest at dawn; his fifty devoted wives following behind him in single file along the path, leaving the mansions and gardens fading behind; mood of solemn departure and resolve.

उन्होंने अपने पाँच हज़ार पुत्रों को राज-काज सौंपा, संन्यास लिया, और वन की ओर निकल पड़े।

उनकी पत्नियाँ अपने पति को ही अपना सर्वस्व मानती थीं। वे भी पीछे-पीछे वन को चल पड़ीं।

वहाँ सौभरि ने फिर से घोर तपस्या की, अपनी देह को सुखा दिया, और आहवनीय आदि अग्नियों के साथ अपने-आपको परमात्मा में लीन कर दिया।

और जब उनकी पत्नियों ने अपने पति की वह आध्यात्मिक गति देखी, तो जैसे ज्वालाएँ शान्त होती अग्नि में लीन हो जाती हैं, वैसे ही वे सती होकर उन्हीं में समा गईं, उन्हीं की गति को प्राप्त हुईं।

मन्थन

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, आपने पूछा था कि जिसके पास इतनी शक्ति हो, उसे किस बात का भय। यही उत्तर है। सौभरि के पास शक्ति थी, इतनी कि सूखे तप से वे यौवन रच लें और देवांगनाओं को भी लुभा लें। पर भीतर इच्छा सोई पड़ी थी, और साधना ने उसे जगाया नहीं, बस दबा रखा था।”

”जल के भीतर वह इच्छा चुपचाप पड़ी रही। और जैसे ही एक मछली के सुख की झलक पड़ी, वह उठ खड़ी हुई। एक इच्छा, और देखते-देखते पचास घर।”

परीक्षित् धीरे से बोले, ”तो शक्ति वैराग्य नहीं है।”

”नहीं, राजन्। शक्ति केवल बाँध है। बाँध के पीछे पानी फिर भी भरा रहता है। वैराग्य वह है जब भीतर पानी ही न बचे, जब विषय सामने आकर भी कुछ न जगा सके।”

”पर सौभरि की एक बात मुझे और भी छूती है,” शुकदेव की वाणी में कुछ कोमलता आ गई। ”गिरकर वे वहीं नहीं ठहर गए। बहुत लोग एक बार ग़लत राह पकड़ लेने के बाद उसी पर चलते रहते हैं, यही कहकर कि अब तो यही जीवन है। सौभरि लौट पड़े। और लौटते समय उन्होंने अपनी पत्नियों को छोड़ा नहीं, उन्हें दोष भी नहीं दिया। पचासों उनके साथ वन को चलीं, और अन्त में उन्हीं की गति को प्राप्त हुईं।”

परीक्षित् ने सामने बहती गंगा की ओर देखा। पानी ऊपर से शान्त था, और नीचे न जाने कितनी धाराएँ चल रही थीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपनी हथेली एक पल को छाती पर रखी, जैसे टटोल रहे हों कि भीतर अभी क्या-क्या सोया पड़ा है।

साहित्यिक-संदर्भ

सौभरि-मुनि की कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 6 में आती है। यमुना के जल में दीर्घकाल तक तप करने के बाद अपनी अनेक पत्नियों सहित सुखी एक मत्स्यराज को देखकर मुनि के मन में कामना का जागना, मान्धाता की पचास कन्याओं के साथ विवाह, और अन्त में पश्चात्ताप के साथ वन को लौट जाना, यह सब वहीं वर्णित है।

यह कथा वैराग्य और मात्र संयम के भेद को उभारती है। दबी हुई वासना तप से नष्ट नहीं होती, केवल प्रतीक्षा करती है, और एक छोटा-सा निमित्त उसे जगा देता है। शुद्ध वैराग्य ही उसका विसर्जन है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

मन को दबा देना और मन से मुक्त हो जाना, दो अलग बातें हैं। जिसे हम साध लिया समझते हैं, वह अक्सर भीतर सोया भर रहता है, किसी निमित्त के इंतज़ार में। सौभरि की कथा इसी भुलावे की ओर उँगली रखती है, और साथ ही यह भी कहती है कि गिर जाने पर लौट पड़ना अब भी हो सकता है।