सौभरि मुनि

कथा 50 · भागवतम् की कथाएँ

सौभरि मुनि

Even a Yogi Can Slip
स्कन्ध 9, अध्याय 6

सौभरि एक great मुनि थे।

उन्होंने एक अद्भुत तपस्या की थी। बारह साल। पानी के अंदर।

पानी के अंदर तपस्या? हाँ। यमुना के एक गहरे हिस्से में वो डूबे रहते। बस ध्यान में।

साँस को रोकते। मन को रोकते। सब कुछ रोकते।

बारह साल बीते। उनकी तपस्या बहुत powerful। पानी के अंदर भी, उनका मन शान्त।

एक दिन वो अपनी जगह पर बैठे थे। पानी के अंदर।

और एक चीज़ देखी।

मछलियों का एक जोड़ा। एक नर, एक मादा। पास से गुज़र रहे थे।

वो mate कर रहे थे। एक तरह से dance जैसा।

सौभरि की आँखें एक पल को focus हुईं।

उन्होंने यह दृश्य पहले कभी नहीं देखा था। बारह साल अकेले। और यहाँ, दो जीव, एक-दूसरे को choose कर रहे थे।

उनके मन में एक विचार आया।

”एक मछली भी अपना साथी पाती है। मैं, एक महान् मुनि, अकेला हूँ। क्या मुझे भी एक साथी चाहिए?”

एकयैव परीक्ष्यैनं मत्स्यजोदृष्टं चित्तदोषम् ।
योगिनो विषयेन्द्रियैरुग्रामेव परिहरेत् ॥

एक मछली देखने से सौभरि के मन में चित्त-दोष आया। योगी को इन्द्रिय-विषयों से उतना दूर रहना चाहिए जैसे आग से।

वो उठे। पानी के बाहर।

बारह साल बाद वो पहली बार बाहर आए।

उनका शरीर थोड़ा सूखा। पर तपस्या से चमक रहा था।

वो सीधे राजा मांधाता के दरबार में गए।

मांधाता एक powerful राजा। उनकी पचास बेटियाँ थीं। सुन्दर। सब विवाह-योग्य।

”हे राजन्,” सौभरि ने कहा। ”मुझे तेरी एक बेटी से विवाह चाहिए।”

मांधाता ने सोचा। यह एक great मुनि। उन्हें मना करना मुश्किल।

पर सौभरि एक बूढ़े, सूखे आदमी। उनकी बेटियाँ जवान।

मांधाता ने एक middle रास्ता निकाला।

”मुनिवर, हमारी परंपरा है, बेटियों का swayamvara। आप अपनी पसंद की बेटी ख़ुद चुनिए। वो आप के साथ जाएगी अगर वो हाँ कहे।”

”ठीक है।”

सौभरि भीतर गए। पचास बेटियाँ एक मंडप में बैठीं।

उन्होंने अपनी योग-शक्ति से एक काम किया।

वो एक हो गए, मगर पचास रूपों में। हर बेटी के सामने एक रूप।

और हर रूप, बहुत सुन्दर। एक यौवन से भरा, अद्भुत आदमी।

बेटियों ने एक-दूसरे को देखा। हर एक के सामने एक sutiable आदमी।

हर एक ने हाँ कहा।

पचास विवाह।

सौभरि ने अपनी योग-शक्ति से एक विशाल महल बनाया। हर बेटी के लिए अलग। बहुत luxurious।

वहाँ वो रहने लगे। पचास पत्नियों के साथ।

पुराण कहते हैं, उनके पाँच हज़ार बेटे हुए। पाँच हज़ार।

उनकी ज़िंदगी एक complete role-reversal हो गई। पहले एक मुनि, पानी के अंदर तपस्या। अब एक गृहस्थ, महल में, पचास पत्नियों के साथ।

मगर एक बात।

एक दिन सौभरि अपने एक पुत्र को देख रहे थे। बच्चा बच्चे के साथ खेल रहा था।

और अचानक सौभरि को एक झटका।

”मैं क्या कर रहा हूँ?”

”बारह साल तपस्या। एक मछली देखकर बहक गया। अब एक हज़ार रिश्ते, पाँच हज़ार बच्चे। और मेरा मन?”

”शायद कभी से ज़्यादा बेचैन।”

उन्हें समझ आया। उन्होंने एक mistake की थी।

मन की एक छोटी सी इच्छा को follow करके, वो एक गहरे जाल में फँसे।

वो उठे। पचास पत्नियों को बुलाया।

”देखो, मैंने एक ग़लती की। मैंने अपने तप को छोड़ दिया एक छोटी सी इच्छा के लिए। अब मुझे वापस जाना है।”

”मेरे साथ चलोगी?”

पचास पत्नियाँ, अब बूढ़ी, मगर अभी भी सुन्दर। एक-दूसरे को देखीं।

”हाँ। हम चलेंगी।”

सौभरि और उनकी पत्नियाँ, पाँच हज़ार बेटों को राज-पाठ देकर, जंगल में चले गए।

वहाँ उन्होंने तपस्या की। पचास पत्नियाँ भी।

और अंत में, सब के सब, साथ-साथ मुक्ति पाई।

एक interesting कथा है। एक गिरना। और एक उठना।

मन्थन

सौभरि की कथा एक warning है, सब साधकों के लिए।

एक great मुनि। बारह साल पानी के अंदर तप। शायद उस वक़्त का सबसे ऊँचा योगी।

एक mistake। एक मछली देखी। और सब चला गया।

क्यों? क्योंकि उनकी तपस्या ”शक्ति” पर थी, ”वैराग्य” पर नहीं।

उनके पास शक्ति थी। पर इच्छाएँ बच गई थीं। बस छुपी हुई थीं।

जब एक trigger मिला, सब बाहर आ गई।

और एक चीज़ इच्छा बन के, पचास बन गई।

यह कथा हमें यह बताती है कि तपस्या में सिर्फ़ control काफ़ी नहीं। एक deeper transformation चाहिए। ताकि जब trigger आए, तब आप reaction न दें।

और एक beautiful बात है। सौभरि ने बाद में अपनी ग़लती मानी। उन्होंने retreat किया।

बहुत से लोग एक ग़लत रास्ता पकड़ने के बाद, उसी पर चलते रहते हैं। ”अब क्या करें, ऐसे ही है।”

सौभरि ने नहीं। उन्होंने U-turn ली। और अपनी पत्नियों को भी साथ ले लिया।

यह भी एक सबक है। ग़लती की भी, यह पता चलने पर, वापस जाओ।

और सबसे beautiful, पचास पत्नियाँ भी उनके साथ गईं। यह एक तरह की solidarity थी। उन्होंने उन्हें blame नहीं किया।