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मुचुकुन्द

कथा 53 · भागवतम् की कथाएँ

मुचुकुन्द

The King Who Wanted Only to Sleep
स्कन्ध 10, अध्याय 51

गंगा की उस साँझ हवा कुछ ठहर सी गई थी। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा, ”भगवन्, मेरे पास अब गिनती के दिन हैं, और मेरी रातें जागती हुई बीतती हैं। मैं सोचता रहता हूँ, इतने जन्मों का यह सारा दौड़ना-भागना किस मोड़ पर जाकर थमता है। क्या कोई ऐसा भी था जिसने थककर बस विश्राम माँगा हो, और उसी विश्राम में उसे श्रीहरि मिल गए हों?”

शुकदेव की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उतरी, जैसे किसी बहुत पुरानी, बहुत प्रिय बात का स्मरण हो आया हो।

”राजन्, एक राजा था, मुचुकुन्द। सूर्यवंशी सम्राट् मान्धाता का पुत्र, इक्ष्वाकु-कुल की आन। सत्यप्रतिज्ञ, संग्राम में अजेय, और ब्राह्मणों का परम भक्त। उसने अपने जीवन के अंत में जो एक चीज़ माँगी, वह किसी और राजा ने आज तक न माँगी थी। पर सुनिए, उस माँग के पीछे थकान कैसी थी, यह जाने बिना उसकी मुक्ति का स्वाद नहीं आएगा।”

उस समय सत्ययुग था। देवताओं और असुरों के बीच युद्धों का एक न टूटने वाला सिलसिला चलता रहता, एक थमता तो दूसरा सिर उठा लेता। एक बार इन्द्र आदि देवता असुरों से अत्यन्त भयभीत हो उठे, और अपनी रक्षा के लिए वे मुचुकुन्द के द्वार पर आए, क्योंकि कुछ ऐसे वर थे जिन्हें केवल मनुष्य का बाहुबल ही काट सकता था।

”हे राजन्,” उन्होंने कहा, ”हमारी सेना का भार आप सँभालिए। इन असुरों को आप ही रोक सकते हैं।”

Classical Indian color illustration, Satya-yuga: the Surya-vamshi Ikshvaku king Muchukunda, crowned and armored, bowing his head then mounting his war-chariot, leaving behind his palace, queens and throne in the background; he rides off to fight on the side of Indra and the devas against the asuras, divine banners overhead, warm jewel-toned palette.

मुचुकुन्द ने सिर झुकाया और रथ पर चढ़ गए। उन्होंने अपना अकण्टक राज्य पीछे छोड़ दिया, अपनी रानियाँ, अपने पुत्र, सिंहासन के सारे सुख, सब छोड़ दिए, और देवताओं की ओर से लड़ते रहे, बहुत-बहुत दिनों तक, युग के पैमाने पर।

फिर एक दिन देवताओं को सेनापति के रूप में स्वामी कार्तिकेय मिल गए, और असुरों का बल टूटने लगा। उस दिन मुचुकुन्द का रथ रुका, और रुका तो जैसे फिर चलने को मन ही न हुआ।

देवता उनके सामने आए। ”हे वीरशिरोमणि, अब आप विश्राम कीजिए। हमारी रक्षा में आपने बहुत श्रम और कष्ट उठाया, अपना राज्य तक छोड़ दिया। अब आपके पुत्र, रानियाँ, बन्धु-बान्धव, मन्त्री, और आपके समय की सारी प्रजा, सब-के-सब काल के गाल में जा चुके हैं। काल समस्त बलवानों से भी बलवान् है, राजन्। पर कैवल्य-मोक्ष के सिवा जो चाहें, हमसे माँग लीजिए, क्योंकि मोक्ष देने की सामर्थ्य तो केवल अविनाशी भगवान् विष्णु में ही है।”

मुचुकुन्द एक पल को चुप रहे। यह वही राजा था जिसने एक हुंकार से असुर-सेनाओं की पाँतें तोड़ी थीं, जिसके धनुष की डोरी की आवाज़ से दानवों के कलेजे काँपते थे। पर अब, जब उसके सामने सारी सृष्टि का खज़ाना खुला पड़ा था, उसकी सब में बड़ी इच्छा कुछ और ही थी। हज़ारों बरस की लड़ाई का बोझ उनकी हड्डियों में बैठ गया था। निद्रा ने उनकी सारी इन्द्रियों की शक्ति छीन ली थी, उन्हें बेकाम कर दिया था। आँखें भारी थीं, जैसे किसी ने उनमें युगों की धूल भर दी हो।

”मुझे बस एक चीज़ चाहिए, देव।”

”कहिए, राजन्।”

Color illustration: the weary aged warrior-king Muchukunda standing before a circle of radiant celestial devas with folded hands, eyes heavy with exhaustion, asking for one boon only; the gods listen astonished as he requests deep uninterrupted sleep, rich celestial light, no Krishna present in this scene.

”मुझे सोने दीजिए। जी भर के, बिना किसी पुकार के।”

देवता ठिठक गए। एक राजा, जिसके आगे तीनों लोकों के वर हाथ बाँधे खड़े थे, और वह माँग रहा था नींद। ”निद्रा? और कुछ नहीं?”

”और क्या चाहूँ? मेरी पलकें अपने ही बोझ से गिरी जा रही हैं। मैंने नरदेव कहलाने का सुख देख लिया, राज-पाट देख लिया, युद्ध देख लिए। जिन्हें मैं अपना कहता था, उन्हें काल ले गया, और मुझे ख़बर तक न लगी। अब इस सबकी कोई पुकार मुझे न सुननी है। बस एक लंबी, गहरी नींद, जहाँ कोई मुझे न जगाए।”

Color illustration: the luminous devas raising hands in blessing as they grant Muchukunda the boon of long sleep, warning him that whoever wakes him will be burned to ashes by his very gaze; the king turning toward a lone dark mountain cave, golden divine glow contrasting the cool shadowed cave mouth.

देवताओं ने वर दे दिया, और साथ ही कहा, ”ऐसा ही हो, राजन्। और सुनिए, सोते समय यदि कोई मूर्ख आपको बीच में जगा देगा, तो वह आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।”

मुचुकुन्द किसी जन-शून्य पहाड़ की एक सुनसान गुफा में उतरे। बाहर का उजाला पीछे छूटता गया, और भीतर एक ठंडी, घनी ख़ामोशी थी, जिसमें केवल उनकी अपनी साँस की आवाज़ थी। वहीं वे लेट गए, और पलकें मुँदते ही जैसे कोई युग उन पर ओढ़ा दिया गया।

वे सोते रहे। ऊपर की दुनिया में दिन-रात आते-जाते रहे, ऋतुएँ घूमती रहीं, पर गुफा के भीतर समय जैसे थम गया था।

सत्ययुग बीता, त्रेता आया और चला गया, द्वापर भी ढलने लगा। पर्वतों के नाम बदल गए, नगर बस गए और उजड़ गए। मुचुकुन्द की पलक तक न हिली।

उधर द्वापर के अंत में मथुरा में श्रीहरि कृष्ण-रूप में लीला कर रहे थे।

एक यवन राजा था, कालयवन, अपने बाहुबल के मद में चूर। पृथ्वी पर उसके टक्कर का कोई योद्धा न बचा था, और इसी मद में उसने म्लेच्छों की सेना लेकर मथुरा को घेर लिया और कृष्ण को ललकारा।

Color illustration, Dwapara end at Mathura: four-armed dark-blue Krishna walking out the city's main gate on foot, unarmed, body radiant like a moonrise, wearing silk yellow pitambara, Shrivatsa mark on chest, glowing Kaustubha gem at throat, makara-shaped earrings, lotus-soft reddened eyes; Mathura's gate and ramparts behind.

श्रीकृष्ण नगर के मुख्य द्वार से निकले, बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के, पैदल ही। पूर्व दिशा में चन्द्रोदय हो रहा हो, उनका साँवला शरीर वैसा ही दर्शनीय था, उस पर रेशमी पीताम्बर की छटा निराली थी। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, गले में कौस्तुभमणि की जगमग, चार लम्बी भुजाएँ, और हाल के खिले कमल-से कोमल रतनारे नेत्र। कानों में मकराकृत कुण्डल झिलमिला रहे थे।

उन्हें देखते ही कालयवन के भीतर एक निश्चय बैठ गया। ”यही पुरुष वासुदेव है। नारदजी ने जो-जो लक्षण बताए थे, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स, चार भुजाएँ, कमल-से नेत्र, गले में वनमाला, और सुन्दरता की सीमा, वे सब इसी में मिल रहे हैं। और देखो, यह बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के पैदल चला आ रहा है। तो मैं भी इसके साथ बिना अस्त्र-शस्त्र के ही लड़ूँगा।” यह सोचकर वह कृष्ण के पीछे-पीछे दौड़ा।

कृष्ण लीला करते हुए आगे-आगे भागते रहे, मानो अत्यन्त भयभीत हों। यह रण छोड़कर भागना भी एक लीला थी, क्योंकि उन्हें कालयवन के वध के लिए किसी और का हाथ चुनना था। योगियों को भी जो दुर्लभ हैं, उन प्रभु को कालयवन पग-पग पर यही समझता रहा कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। पर वह हाथ हमेशा एक डग आगे ही रहा। इस प्रकार वे उसे बहुत दूर, यवनेश पर्वत की एक गुफा तक ले गए।

भागते-भागते कालयवन कभी-कभी पीछे से आक्षेप करता, ”अरे भाई! आप परम यशस्वी यदुवंश में पैदा हुए हैं, आपका इस तरह युद्ध छोड़कर भागना उचित नहीं है।” पर अभी उसके अशुभ पूरे न हुए थे, इसलिए वह कृष्ण को पा न सका।

कृष्ण उस पर्वत की गुफा के भीतर चले गए, और एक कोने के अँधेरे में जा खड़े हुए।

कालयवन हाँफता हुआ उनके पीछे-पीछे गुफा में घुसा। भीतर घना अँधेरा था। वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुष्य को गहरी नींद में सोते हुए देखा।

उसे देखकर कालयवन का मन झुँझला उठा। ”देखो तो सही, यह मुझे इतनी दूर खींच लाया, और अब इस तरह, मानो इसे कुछ पता ही न हो, साधु-बाबा बनकर सो रहा है!”

Color illustration inside a pitch-dark mountain cave: the fierce yavana king Kalayavana, sweating and panting in armor, scowling in fury, kicking the body of the sleeping king Muchukunda who lies in deep slumber; shadowy cave interior, single shaft of dim light, tense moment before disaster.

उसकी छाती धौंकनी सी चल रही थी, माथे पर पसीने की बूँदें, और गुस्से में उसका गला सूख आया था। उसने अपना सारा तिरस्कार उस एक ठोकर में भर दिया। सोते हुए राजा की देह पर उसका पैर पड़ा।

हज़ारों बरस की निद्रा, जो सत्ययुग से लेकर अब द्वापर के अंत तक एक करवट में बीत गई थी, उस एक झटके में काँप उठी।

पहले पलकों के नीचे कुछ हिला। फिर मुचुकुन्द की छाती ने एक लम्बी, थरथराती साँस खींची, युगों बाद की पहली पूरी साँस। उनके हाथ की उँगलियाँ धीरे-धीरे खुलीं। गुफा की उस घनी ख़ामोशी में, जहाँ अब तक केवल उनकी अपनी साँस की आवाज़ थी, अब किसी अनजान की हाँफती साँस और पसीने की गन्ध भी घुल आई थी। मुचुकुन्द को अभी तक यह भी ठीक से याद न था कि वे कौन हैं, कहाँ हैं। केवल इतना भीतर से उठा, कोई था जिसने मुझे छुआ, किसी ने मेरी इस अनन्त नींद को तोड़ने का साहस किया।

उन्होंने बहुत धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पलकें युगों की जमी हुई थीं, जैसे बरसों बन्द रहे किसी द्वार के पट खुल रहे हों। और युगों के बाद उनकी वह पहली दृष्टि, अभी आधी खुली, अभी कुछ भी न पहचानती हुई, बग़ल में खड़े कालयवन पर जा पड़ी।

Color illustration: Muchukunda half-risen with eyes just opening, his gaze falling on Kalayavana, whose own body bursts into inner fire and crumbles to a heap of ash in an instant, mouth open mid-scream, acrid smoke filling the dark cave; no external weapon, fire erupts from within the yavana.

एक क्षण कुछ न हुआ। फिर कालयवन के अपने ही शरीर के भीतर से आग फूट पड़ी। न कोई अस्त्र, न कोई लपट बाहर से आई, उसके बाहुबल का सारा मद, उसका सारा अहंकार, उसी की देह में जलने लगा। उसका मुँह खुला रह गया, चीख तक न निकली, और पल भर में वह राख का एक ढेर रह गया। गुफा में एक तीखी, जली हुई गन्ध भर गई, और फिर वही पुरानी ख़ामोशी लौट आई।

मुचुकुन्द हड़बड़ाकर उठ बैठे। ”यह क्या हुआ?”

फिर युगों पुरानी स्मृति लौटी, देवताओं का दिया वह वर, कि सोते समय जो मुझे बीच में जगा देगा, वह मेरी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।

वे खड़े हुए और गुफा के अँधेरे में चारों ओर देखा।

Color illustration: in a cave corner a youthful Krishna stands, dark like a monsoon cloud, Shrivatsa on chest and glowing Kaustubha gem at throat, four arms, a Vaijayanti garland swaying to his knees, lotus face smiling with loving eyes; his bodily radiance melting the cave's darkness like a lamp; awestruck Muchukunda gazing at him.

एक कोने में एक तरुण खड़ा था। वर्षाकालीन मेघ-सा साँवला, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स और गले में कौस्तुभमणि अपनी ज्योति बिखेरते हुए, चार भुजाएँ, और एक ओर वैजयन्तीमाला घुटनों तक झूलती हुई। मुखकमल अत्यन्त प्रसन्नता से खिला था, होंठों पर एक प्रेमभरी मुसकराहट, और नेत्रों की चितवन में ऐसा अनुराग कि गुफा का घना अँधेरा उस मुख की कान्ति से अपने आप पिघलता जा रहा था, जैसे अँधेरे में रखा कोई दीपक उसे भगाता है।

मुचुकुन्द बड़े बुद्धिमान् और धीर पुरुष थे, फिर भी उस ज्योतिर्मय मूर्ति को देखकर वे कुछ चकित हो गए, उसके तेज से कुछ हतप्रभ-से हो आए। बहुत देर तक उस ओर देख भी न सके। तब उन्होंने काँपते-काँपते से पूछा।

”आप कौन हैं? इस काँटों से भरे घोर जंगल में, इस पर्वत की गुफा में, आप कमल-से कोमल चरणों से क्यों विचर रहे हैं? कहीं आप समस्त तेजस्वियों के मूर्तिमान् तेज तो नहीं, या स्वयं अग्निदेव? या आप सूर्य हैं, चन्द्रमा हैं, देवराज इन्द्र हैं, या कोई और लोकपाल? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर, इन तीनों में से कोई पुरुषोत्तम हैं, क्योंकि जैसे दीपक अँधेरे को हर लेता है, वैसे ही आप अपनी अंगकान्ति से इस गुफा का अँधेरा भगा रहे हैं।”

उस तरुण ने मेघ-सी गम्भीर वाणी में, हँसते हुए, उत्तर दिया। ”राजन्, मेरे जन्म, कर्म और नाम तो हज़ारों हैं, अनन्त हैं, उन्हें मैं भी गिन नहीं सकता। पर इस जन्म में पृथ्वी का भार उतारने के लिए मैंने यदुवंश में वसुदेव के घर अवतार लिया है। लोग मुझे वासुदेव कहते हैं। अभी तक मैं कंस के रूप में जन्मे कालनेमि का, और प्रलम्ब आदि अनेक साधुद्रोही असुरों का संहार कर चुका हूँ। और यह कालयवन था, जो मेरी ही प्रेरणा से आपकी तीक्ष्ण दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया।”

”आप पर अनुग्रह करने के लिए ही मैं इस गुफा में आया हूँ। आपने पहले मेरी बहुत आराधना की है, और मैं भक्तवत्सल हूँ। माँगिए, राजन्, जो अभिलाषा हो माँग लीजिए। जो मेरी शरण आ जाता है, उसके लिए फिर ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती जिसके लिए वह शोक करे।”

मुचुकुन्द के भीतर युगों पहले सुना वृद्ध गर्ग का वह वचन जाग उठा, कि एक दिन स्वयं भगवान् नारायण यदुवंश में उतरेंगे। उन्होंने जान लिया कि ये वही हैं। उनके हाथ अपने आप जुड़ गए, और आँखें भर आईं। पर माँगने को मुँह खुला तो शब्दों की जगह पहले एक पुराना घाव बह निकला।

”प्रभो! मैं राजा था, राज्यलक्ष्मी के मद में मतवाला हो रहा था। इस मरने वाले शरीर को ही मैं अपना स्वरूप समझ बैठा था, राजकुमार, रानी, खज़ाना और पृथ्वी के लोभ-मोह में ही फँसा रहा। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल, चतुरंगिणी सेना से घिरकर मैं नरदेव कहलाता पृथ्वी पर इधर-उधर घूमता रहा। पर जैसे भूख के मारे जीभ लपलपाता साँप असावधान चूहे को दबोच लेता है, वैसे ही काल अपनी एक करवट में मुझ प्रमादी को ले बीता। जिस शरीर पर मैं इतराता था, वही एक दिन कीड़े, विष्ठा और राख बनकर रह जाने को था। मेरे छहों शत्रु, पाँच इन्द्रियाँ और एक मन, कभी शान्त न हुए, विषयों की प्यास दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई। कभी एक क्षण को भी मुझे शान्ति न मिली।”

”शरणदाता! अब मैं आपके अभय, अमृत और शोक से रहित चरणकमलों की शरण में आया हूँ। सारे जगत् के एक मात्र स्वामी! परमात्मन्! आप मुझ शरणागत की रक्षा कीजिए।”

कृष्ण फिर मुस्कुराए। ”सार्वभौम महाराज! आपकी मति, आपका निश्चय बड़ा ही पवित्र और ऊँची कोटि का है। देखिए, मैंने आपको बार-बार वर देने का प्रलोभन दिया, फिर भी आपकी बुद्धि कामनाओं के अधीन न हुई। यही मेरे अनन्य भक्तों का लक्षण है, उनका मन वरों के लोभ में इधर-उधर नहीं भटकता।”

उन्होंने आगे बढ़कर उनके सिर पर हाथ रखा। उस स्पर्श में युगों की थकान जैसे पिघलकर बह गई।

”अब आप मन को मुझमें लगाकर स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी पर विचरण कीजिए। आपमें मेरी निर्मल भक्ति सदा बनी रहेगी। क्षत्रिय-धर्म निभाते समय शिकार आदि में आपने जो बहुत-से प्राणियों का वध किया है, उस पाप को अब एकाग्रचित्त से मेरी उपासना करते हुए तप से धो डालिए। फिर अगले जन्म में आप ब्राह्मण होंगे, समस्त प्राणियों के सच्चे हितैषी, परम सुहृद्, और तब मुझ विशुद्ध विज्ञानघन परमात्मा को ही प्राप्त कर लेंगे।”

Color illustration: Muchukunda reverently circumambulating and bowing to four-armed Krishna inside the cave, then stepping out of the cave mouth into sunlight for the first time in ages; outside the trees, animals and people appear small (Kali-yuga begun); the serene king turns north toward the Gandhamadana mountains, calm and peaceful.

मुचुकुन्द ने भगवान् की परिक्रमा की, उन्हें नमस्कार किया, और गुफा से बाहर निकले, युगों के बाद पहली बार धूप में।

उनका शरीर वही था, पर बाहर की हर चीज़ बदल चुकी थी। मनुष्य, पशु, लता और वृक्ष, सब पहले की अपेक्षा बहुत छोटे-छोटे आकार के हो गए थे। इससे उन्होंने जान लिया कि कलियुग आ गया है। फिर भी उनके मन में न कोई शिकायत थी, न कोई बेचैनी, केवल एक अटल शान्ति। वे उत्तर दिशा की ओर चल दिए, गन्ध-मादन पर्वत की राह, जहाँ नर-नारायण का बदरिकाश्रम था, और वहीं शान्त भाव से तप करते हुए, मन को उसी श्रीहरि में रमाए, उनकी ओर बढ़ते रहे, जिनके दर्शन उनकी निद्रा के पार उन्हें प्रतीक्षा कर रहे थे।

मन्थन

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा का जल धीमे-धीमे बहता रहा।

परीक्षित् बहुत देर तक कुछ न बोले। फिर बोले, और उनका स्वर धीमा था। ”भगवन्, मुझे वह एक करवट भूलती नहीं। वह सोया सत्ययुग में, उसकी आँख खुली द्वापर के अंत में, और बीच में सारे युग एक नींद में बह गए। मेरे सात दिन इसके आगे क्या हैं। पर मुझे यह बात अखरती नहीं, मुझे तो ईर्ष्या-सी होती है। उसके पास खोने को राज्य था, रानियाँ थीं, और उसने सब छोड़कर बस ठहर जाना चुना।”

शुकदेव की आँखों में वही पुरानी मुस्कान लौट आई। ”राजन्, देवताओं ने उसके सामने तीनों लोकों के वर खोल दिए थे, और श्रीहरि ने स्वयं उसे बार-बार माँगने को कहा। एक ने नींद माँगी, दूसरे ने केवल चरणों की सेवा। जिसने जीवन भर बाहर की हर वस्तु जीती थी, वह जान चुका था कि जीती हुई हर वस्तु एक दिन कीड़े, विष्ठा और राख बन जाती है। उसका अपना शरीर तक। बस एक स्वामी नहीं बदलता।”

”उसने अपनी एक दृष्टि से कालयवन को भस्म किया, और उसी दृष्टि से उठते ही भगवान् को पहचान लिया। राजन्, एक ही आँख, और दो छोरें, एक ओर संहार, दूसरी ओर दर्शन। दोनों के बीच केवल एक करवट का अन्तर था।”

परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया, और कुछ पूछने को मुँह खोला, पर शुकदेव पहले ही उनकी ओर देख रहे थे, उस माथे की एक रेखा की ओर जो अभी थोड़ी ढीली पड़ी थी।

”आपके पास भी, राजन्, अब बहुत दौड़ना शेष नहीं है।”

गंगा पर साँझ उतर रही थी। दूर किसी पंछी ने एक बार पुकारा, और फिर सब चुप हो गया। परीक्षित् ने आँखें मूँद लीं, और इस बार उनकी ख़ामोशी में कोई बेचैनी न थी, मानो कहीं भीतर वही एक करवट लेने की घड़ी पास आ रही हो।

साहित्यिक-संदर्भ

मुचुकुन्द-कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 51 में आती है। सूर्यवंशी राजा मान्धाता के पुत्र मुचुकुन्द ने देवताओं की ओर से दानवों से युद्ध किया और वरदान में अखण्ड निद्रा माँगी।

द्वापर के अंत में कृष्ण ने कालयवन को इसी गुफा में लाकर उसका वध मुचुकुन्द की दृष्टि से कराया, फिर राजा को दर्शन देकर मुक्ति का मार्ग दिखाया। यह कृष्ण के ‘रणछोड़’ कहलाने का प्रसंग भी है, जहाँ रण छोड़ना भी एक लीला ठहरता है।

एक प्रश्न, साँझ के नाम

मुचुकुन्द की पलक सत्ययुग में गिरी और द्वापर के अंत में उठी, और जिस क्षण उठी, उसके सामने श्रीहरि खड़े थे। हम दिन भर खुली आँखों से जीते हैं। पर जिस दिन हमारी असली आँख खुलेगी, हमारे सामने कौन खड़ा मिलेगा?