मुचुकुन्द
बहुत पहले, सत्ययुग में, मुचुकुन्द एक राजा थे। बहुत powerful।
देवताओं और राक्षसों की लड़ाई थी। देवता बहुत थक गए थे। उन्हें एक मानव-राजा की मदद चाहिए थी।
उन्होंने मुचुकुन्द को बुलाया।
”हे राजन्, हमारी सेना का नेतृत्व करो। राक्षसों को हराओ।”
मुचुकुन्द ने हाँ कहा। और कई-कई हज़ार साल देवों की तरफ़ से लड़े।
अंत में, राक्षस हारे। देवों ने जीता।
वो मुचुकुन्द के पास आए। ”हम तुम्हारे ऋणी हैं। तुम क्या चाहते हो?”
मुचुकुन्द ने एक पल को सोचा। बहुत साल लड़े थे। बहुत थके थे।
”मुझे बस एक चीज़ चाहिए।”
”क्या?”
”मुझे सोने दो। बहुत साल।”
देव चौंके। ”सोना? बस इतना?”
”हाँ। मेरी आँखें भारी हैं। मेरी हड्डियाँ टूट रही हैं। मुझे बस सोने दो।”
”एक और बात। जो मुझे जगाए, वो भस्म हो जाए। ताकि कोई मुझे disturb न करे।”
देवों ने दोनों वर दिए।
मुचुकुन्द एक गहरी गुफा में गए। वहाँ सो गए।
स्वप्नाधिकारं विद्वान् मे सहायं कुर्वतीश्वरः ॥
मुचुकुन्द ने सोचा, ”मैं तो देव-समान था, हज़ारों साल पूजित। पर भगवान ही मुझे सोने का अधिकार देकर एक कथा का कारण बने।”
वो सोते रहे। साल बीते। हज़ार साल। दस हज़ार साल।
एक पूरा युग बदल गया। सत्ययुग से त्रेता। फिर द्वापर। पर मुचुकुन्द सोते रहे।
अब आता है द्वापर युग का अंत। कृष्ण मथुरा में।
एक यवन राजा था, कालयवन। एक powerful राजा। उसने कृष्ण पर हमला किया।
कृष्ण ने एक tactical retreat की। मथुरा से बाहर। द्वारका जाने की तरफ़।
कालयवन पीछा कर रहा था।
रास्ते में कृष्ण ने एक गुफा देखी। वो उसके अंदर गए।
अंदर अंधेरा। एक आदमी सो रहा था। पर एक धोती थी पास।
कृष्ण ने अपनी पीताम्बर निकाली, उस आदमी पर डाली। फिर एक कोने में छुप गए।
कालयवन आया। गुफा के अंदर।
उसने देखा एक आदमी, पीताम्बर में, सो रहा था।
”यह कृष्ण है। उठ, बकवास। लड़ने आ।”
उसने उस आदमी के पैर को लात मारी।
मुचुकुन्द उठा।
हज़ारों साल बाद। एक झटके में।
उसने आँखें खोलीं। पहली नज़र कालयवन पर।
और कालयवन तुरंत भस्म हो गया।
मुचुकुन्द को एक झटका। ”यह क्या?”
उसे याद आया। उसका वर। ”जो मुझे जगाए, वो भस्म।”
वो उठा। चारों ओर देखा।
एक कोने में एक नौजवान आदमी खड़ा था। नीला रंग। पीताम्बर। मुस्कुराता हुआ।
”नमस्कार, राजन्।”
”तू कौन?”
”मैं कृष्ण।”
”कृष्ण?”
मुचुकुन्द के दिमाग़ में कुछ click हुआ। पुराने ऋषियों की बातें। एक avatar जो आएगा।
”तू वो ही?”
”हाँ।”
मुचुकुन्द ने हाथ जोड़े।
”हे प्रभु! मेरी सालों की waiting सार्थक। मेरी आँखें खुलीं तो आप के दर्शन।”
कृष्ण ने उसके सिर पर हाथ रखा।
”राजन्, अब तू मुक्त। तेरा काम पूरा। बस एक काम और।”
”क्या?”
”इस गुफा से बाहर जा। एक तीर्थ-यात्रा कर। फिर हिमालय। और वहाँ से वैकुण्ठ।”
मुचुकुन्द बाहर निकले। हज़ारों साल बाद।
वो वैसे ही थे, मगर पूरी दुनिया बदल चुकी थी।
उन्होंने तीर्थ किए। फिर हिमालय। और अंत में मुक्ति पाई।
मुचुकुन्द की कथा एक quiet कथा है।
एक राजा जो सब कुछ कर चुका था। देवों के साथ लड़ा। बहुत सालों तक। और अंत में सिर्फ़ नींद माँगी।
बहुत साधारण माँग, मगर बहुत deep।
हम सब एक day-job में कुछ साल बिताते हैं। शायद चालीस। शायद पचास।
और अंत में हम क्या चाहते हैं? बस आराम। कुछ रोज़ की चिंताएँ नहीं।
मुचुकुन्द ने यह बात exaggerate की। हज़ारों साल नींद।
और जब वो आख़िर में जागे, उन्हें भगवान का दर्शन हुआ।
एक तरह से, यह कथा कह रही है, जो आराम लेता है, उसे भगवान मिलते हैं। जो हमेशा कुछ-करते रहता है, उसे नहीं।
इसका मतलब काम नहीं करना? नहीं। इसका मतलब, अपना काम करो, फिर सच में आराम करो। और उस आराम में, भगवान आ सकते हैं।
हमारी ज़िंदगी में, हम कभी सच में आराम नहीं करते। हमेशा कुछ-न-कुछ करते। अगर एक पल को रुकें, और अपनी ख़ुद की breath सुनें, शायद कुछ हो।