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वामन और बलि

कथा 13 · भागवतम् की कथाएँ

वामन और बलि

Three Steps to Measure the Universe
स्कन्ध 8, अध्याय 15-23

परीक्षित् ने हाथ जोड़कर पूछा, ”भगवन्, श्रीहरि तो स्वयं सबके स्वामी हैं। फिर उन्होंने एक दीन-हीन ब्राह्मण की भाँति राजा बलि से केवल तीन पग पृथ्वी क्यों माँगी? और जो माँगा था वह पा भी लिया, तो फिर निरपराध बलि को बाँधा क्यों? मेरे मन में इस बात का बड़ा कौतूहल है।”

शुकदेव एक पल मुस्कुराए। ”राजन्, इस एक कथा में वह सब छिपा है जो किसी राजा को जानना चाहिए। सुनिए, बलि की कथा। एक असुर-राज के सामने भी यही घड़ी आई थी, और उसने अपनी ख़ाली हथेली में वह पा लिया जो भरी हथेली में कभी नहीं आता।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of King Bali, the noble asura ruler and grandson of Prahlada, enthroned in his hall performing acts of charity and sacrifice; he hands gifts to brahmins, sacred fire and yajna offerings beside him, virtuous and generous bearing, ornate jewelled crown, warm golden palace setting, gracious crowd of supplicants receiving alms.

बलि असुरों का राजा था, प्रह्लाद का पोता। राक्षस-कुल में जन्मा, पर उसी कुल में एक प्रह्लाद हो चुका था, और दादा की वह विरासत उसके भीतर बैठ गई थी। दान, यज्ञ, सत्य, यही उसका स्वभाव बन गया।

एक बार इन्द्र ने उसे परास्त कर उसके प्राण तक हर लिए थे, पर भृगुवंशी गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से उसे फिर जिला दिया। बलि ने अपना सर्वस्व उन्हीं भृगुवंशी ब्राह्मणों के चरणों में रख दिया, और उन ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उससे विश्वजित् नामक यज्ञ कराया।

उस यज्ञ के बल पर उसने अमरावती तक पर चढ़ाई कर दी, और देखते-देखते तीनों लोक एक-एक कर उसके हाथ आ गए। स्वर्ग भी उसी के अधिकार में आ गया।

इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर भाग निकले। देवता अपना घर खोकर इधर-उधर भटकने लगे।

तब देवताओं की माँ अदिति बड़े दुःख में पड़ गईं। उन्हीं दिनों उनके पति, प्रजापति कश्यप, समाधि से उठकर आश्रम लौटे, और पत्नी का उतरा हुआ मुख देखकर उन्होंने उसका कारण पूछा। अदिति ने अपने पुत्रों की दशा कह सुनाई और प्रार्थना की कि वे कोई उपाय बताएँ।

Rich painterly classical-Indian color illustration of the goddess-mother Aditi performing the twelve-day Payovrata vow at sage Kashyapa's forest ashram, seated devoutly before a small sacred fire offering milk, hands folded in prayer to Sri Hari, sage Kashyapa nearby having returned from meditation, serene hermitage with trees and deer, soft dawn light, devotional mood.

कश्यप ने उन्हें ब्रह्माजी का बताया हुआ एक व्रत समझाया, पयोव्रत, जो श्रीहरि को प्रसन्न करने वाला है। अदिति ने बारह दिन तक बड़ी सावधानी से वह व्रत किया, और मन-ही-मन श्रीहरि को पुकारती रहीं, ”प्रभु, मेरे बच्चों का घर लौटा दीजिए।”

श्रीहरि ने इन्द्र से उसका स्वर्ग छीनकर नहीं लौटाया। उन्होंने एक और ही राह चुनी। वे स्वयं कश्यप के अंश से अदिति के गर्भ में उतरे, और समय आने पर एक छोटे ब्राह्मण-बालक के रूप में प्रकट हुए। नाम पड़ा वामन।

शरीर नाटा, साँवला और सुघड़। कंधे पर मृगचर्म, हाथ में दंड और जल से भरा कमंडल, कमर में मूँज की मेखला, गले में यज्ञोपवीत, और चेहरे पर वह सादगी जो किसी को डरने न दे।

ऋषियों ने आगे होकर उनके जातकर्म और उपनयन संस्कार कराए। सविता ने उन्हें गायत्री का उपदेश दिया, बृहस्पति ने यज्ञोपवीत दी, साक्षात् भगवती उमा ने भिक्षा दी। इस प्रकार ब्रह्मतेज से भरे वे बालक यज्ञ की ओर चल पड़े।

उन्हीं दिनों नर्मदा के उत्तर तट पर भृगुकच्छ नामक स्थान पर, जो भृगुओं का यज्ञ-क्षेत्र था, बलि एक बड़ा अश्वमेध यज्ञ कर रहा था। होम का धुआँ आकाश तक उठ रहा था, घी की गंध हवा में थी, और राजा का यही व्रत था, जो माँगने आए वह ख़ाली हाथ न लौटे।

वामन उसी यज्ञशाला में आ पहुँचे। नन्हे क़दम, झुकी हुई आँखें, और उनके तेज से वे ऋत्विज, यजमान और सदस्य एक पल को ऐसे निस्तेज हो गए, मानो साक्षात् सूर्य उदय हो रहा हो।

द्वारपालों ने उन्हें नहीं रोका। एक छोटा-सा ब्रह्मचारी, इससे किसी को क्या ख़तरा।

Rich painterly classical-Indian color illustration of the small dark-complexioned brahmin boy Vamana arriving at Bali's grand Ashvamedha sacrifice at Bhrigukachchha on the Narmada's north bank; Vamana holds a wooden staff and water-pot, wears deerskin on his shoulder, muñja-grass girdle and sacred thread; King Bali steps down from his throne and washes the boy's feet, pouring that water on his own head, hands folded reverently, rising yajna smoke and assembled priests.

बलि ने उन्हें देखा तो स्वयं आसन से उतर आया, उनके पाँव धोए, वह जल अपने सिर पर चढ़ाया, और हाथ जोड़कर कहा, ”भगवन्, आपके पधारने से मेरे पितर तृप्त हो गए, मेरा वंश पवित्र हो गया, मेरा यज्ञ सफल हो गया। जो चाहिए माँगिए, गाँव माँगिए, सोना माँगिए, द्वीप माँगिए। राजा के द्वार पर आकर कोई वंचित नहीं लौटता।”

वामन ने हँसकर कहा, ”राजन्, संसार के सारे भोग एक मनुष्य की कामना भी पूरी नहीं कर पाते, यदि वह सन्तोषी न हो। मुझे बस तीन पग ज़मीन चाहिए, मेरे इन्हीं छोटे पाँवों से नापी हुई, उतनी ही। जिसे अपनी आवश्यकता भर से सन्तोष है, वही सच्चा धनी है।”

बलि मुस्कुरा दिया। ”भगवन्, यह क्या माँगा आपने। तीन पग में एक बालक का क्या भला होगा। और माँगिए।”

”नहीं। मुझे बस तीन पग चाहिए।”

बलि का गुरु शुक्राचार्य पास ही खड़ा था। उसकी आँखों ने उस बालक को पहचान लिया।

Rich painterly classical-Indian color illustration of the guru Shukracharya, recognizing the dwarf boy's true nature, warning King Bali with a raised hand against making the vow; little Vamana stands with open palm asking for only three paces of land, Bali stands thoughtful between his stern bearded preceptor and the small brahmin, the kamandalu water-pot ready for the pledge, ornate sacrificial hall.

”राजन्, यह बालक जैसा दिखता है वैसा नहीं। यह स्वयं अविनाशी श्रीहरि हैं, कश्यप और अदिति के पुत्र होकर देवताओं का काम साधने आए हैं। ये एक पग में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग नाप लेंगे, और तीसरे के लिए कुछ न बचेगा। तब प्रतिज्ञा पूरी न होने पर आपको बँधना पड़ेगा। संकल्प का जल हाथ में मत लीजिए।”

बलि एक पल ठहरा। उसके सामने उसका गुरु था, उसकी बुद्धि थी, और सामने हाथ फैलाए एक नन्हा ब्राह्मण।

फिर उसने धीरे से कहा, ”गुरुदेव, क्षमा कीजिए। मैं प्रह्लाद का पोता हूँ, और एक बार देने का वचन दे चुका हूँ। मैं नरक से, दरिद्रता से, राज्य के नाश से इतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ने से डरता हूँ। जिस कुल में प्रह्लाद हुए, उस कुल का द्वार किसी याचक के आगे बंद नहीं होता। यदि सामने स्वयं श्रीहरि हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा कि वे मुझसे कुछ माँगने आए हैं।”

शुक्राचार्य ने रुष्ट होकर शाप तक दे दिया कि बलि अपनी सम्पदा खो बैठेगा। पर बलि सत्य से नहीं डिगा। उसने कमंडल का जल हथेली में लिया, और संकल्प कर दिया।

”वामन, तीन पग आपके हुए। नापिए जितना नापना है।”

संकल्प का जल अभी बलि की हथेली से गिरा ही था कि वह नन्हा शरीर बढ़ने लगा।

Rich painterly classical-Indian color illustration of Vamana's colossal cosmic Trivikrama form towering beyond the clouds, his body so vast that the sun and moon appear like two tiny lamps beside it; earth, sky, directions, heavens and oceans absorbed within him, one foot striding upward across the worlds, tiny awestruck Bali and his court below, radiant blue-bodied divine giant filling the sky.

पहले एक आदमी जितना। फिर सिर मंडप से ऊपर निकल गया। फिर बादलों के पार। सूरज और चाँद उस देह के पास दो छोटे दीयों जैसे रह गए। पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, सब उसी में समाने लगे, और देखते-देखते वही बालक सारे ब्रह्मांड जितना हो गया।

उसने पहला पग उठाया। एक ही क़दम में सारी पृथ्वी उसके तलवे के नीचे आ गई।

दूसरा पग आकाश की ओर बढ़ा। स्वर्ग, अंतरिक्ष, ऊपर के सब लोक उसी एक क़दम में नप गए। वह दूसरा पग महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक तक जा पहुँचा।

दो ही पगों में तीनों लोक नप चुके थे। तीसरे के लिए अब कहीं ज़मीन बची ही नहीं थी।

वे ठहर गए।

उस विराट देह से एक स्वर उतरा, ”बलि, आपने तीन पग देने का वचन दिया था। दो में ही तीनों लोक नप गए। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ? जो याचक से प्रतिज्ञा करके मुकर जाता है, उसे नरक भोगना पड़ता है।”

उसी समय गरुड़ ने श्रीहरि के मन का भाव जानकर बलि को वरुण के पाश से बाँध दिया। चारों ओर ‘हाय-हाय’ का स्वर उठा। पर बँधे होकर भी बलि की बुद्धि निश्चल थी।

बलि के सामने अब कुछ नहीं बचा था। राज्य गया, स्वर्ग गया, वह सारी सम्पदा गई जिसे उसने जीवन भर धर्म से जोड़ा था। एक पल को उसके भीतर सब कुछ ख़ाली हो गया।

फिर वह झुका। हाथ जोड़े, और उसके चेहरे पर डर नहीं, एक अजीब हल्कापन उतर आया, जैसे कोई बहुत भारी बोझ अभी-अभी कंधे से उतरा हो।

”प्रभु, मुझे न नरक का भय है, न बँधने का, न दुःख का। मैं डरता हूँ तो केवल अपकीर्ति से। अब तो बस यही सिर बचा है, जो किसी और का नहीं हुआ। तीसरा पग इसी पर रख दीजिए।”

तभी वहाँ बलि का दादा प्रह्लाद उदय होते चंद्रमा-सा आ पहुँचा। उस बँधे हुए पोते को देखकर भी उसने श्रीहरि के सामने हाथ जोड़कर कहा, ”प्रभु, यह ऐश्वर्य आपने ही बलि को दिया था, और आज आपने ही छीन लिया। आपका छीनना भी उतना ही सुंदर है, जितना देना। इसे राज्यलक्ष्मी के मद से बचाकर आपने इस पर बड़ी कृपा की है।” और वह नतमस्तक खड़ा रह गया।

बलि की साध्वी पत्नी विन्ध्यावली भी अपने पति को बँधा देखकर हाथ जोड़े आगे आई, ”प्रभु, यह सारा जगत् तो आपकी ही रचना है। जब कर्ता, भर्ता और संहर्ता आप ही हैं, तो आपको समर्पित करने को इसके पास था ही क्या?”

तब ब्रह्माजी ने भी प्रार्थना की कि अब बलि को छोड़ दिया जाए। श्रीहरि ने बलि से कहा, ”आपने अपना सर्वस्व देकर भी, बँधकर भी, गुरु के शाप पर भी, वचन नहीं तोड़ा। मैं उसी का धन छीनता हूँ जिस पर कृपा करता हूँ, क्योंकि धन का मद मनुष्य को मुझसे दूर कर देता है।”

श्रीहरि ने उन्हें सुतल लोक भेजा, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी कठिनाई से मिलता है। ”जाइए, सुतल में रहिए, वहाँ रोग, थकावट और शत्रु का भय नहीं पहुँचता। और आने वाले सावर्णि मन्वंतर में आप ही इन्द्र बनेंगे।”

वामन का तीसरा पग धीरे से बलि के सिर पर टिका। फिर वरुण के पाश खुल गए, और बलि अपने भाई-बन्धुओं के साथ बड़ी प्रसन्नता से सुतल की ओर उतरने लगा। स्वर्ग का राज्य लेकर श्रीहरि ने इन्द्र को लौटा दिया, अदिति की कामना पूरी हुई, और वे स्वयं उपेन्द्र बनकर सारे जगत् का शासन करने लगे।

पर उतरते-उतरते बलि ने देखा, वह अकेला नहीं जा रहा था।

Rich painterly classical-Indian color illustration of Sri Hari, mace in hand, standing as devoted gatekeeper at King Bali's doorway in the realm of Sutala; the dark divine guardian with club keeps watch while Bali, now without a kingdom, stands humbled and content within, jewelled subterranean palace, warm protective glow, the Lord pledging to guard his devotee's door.

श्रीहरि ने एक बात और कही, जो किसी राजा को कभी किसी ने नहीं दी थी। ”जब तक आप वहाँ रहेंगे, मैं स्वयं गदा हाथ में लिए आपके द्वार पर खड़ा रहूँगा, आपका रक्षक बनकर। जिसने मुझे अपना सब कुछ दे दिया, अब उसका द्वार छोड़कर मैं कहीं नहीं जाता।”

बलि के पास अब कोई राज्य नहीं था। पर उसके द्वार पर तीनों लोकों का स्वामी पहरा देने को खड़ा था।

शुकदेव कुछ देर मौन रहे, फिर परीक्षित् की ओर देखा। ”राजन्, जिस दिन बलि की हथेली पूरी तरह ख़ाली हुई, उसी दिन उसमें श्रीहरि के बैठने की जगह बनी। जो उसने पकड़ रखा था, वह छूटा, और जो छूट नहीं सकता, वह उसके पास आ बैठा।”

परीक्षित् ने धीरे से सिर झुका लिया। ”भगवन्, तो जिस ख़ालीपन से लोग डरते हैं, वही द्वार है।”

मन्थन

इस कथा का सारा भार उस एक पल में है जब बलि के सामने सब ख़ाली हो जाता है, और वह लड़ने के बजाय अपना सिर आगे कर देता है।

श्रीहरि ने बल से उसका राज्य नहीं छीना। वे एक नन्हे बालक बनकर आए, हाथ फैलाकर माँगने आए, और बलि को यह चुनने का अवसर दिया कि वह देता है या रोक लेता है। शुक्राचार्य की चेतावनी सच थी, बलि यह जानता था कि वह अपना सर्वस्व दे रहा है। फिर भी उसने दिया।

क्योंकि बलि के लिए वचन उस सम्पदा से बड़ा था जिसके लिए वचन दिया गया था। और जिस घड़ी सम्पदा हाथ से गई, उसी घड़ी जिसके सामने वचन दिया था, वही उसके साथ रह गया।

यही शरणागति है, जैसी गजेन्द्र ने जल में पुकारकर पाई थी। बल चुक जाने पर जो बचता है, वही असली समर्पण है। बलि के पास अंत में देने को केवल अपना सिर था, और श्रीहरि को उतना ही चाहिए था।

साहित्यिक-संदर्भ

वामन-बलि की कथा श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 15 से 23 तक है। तीन पगों में तीनों लोक नाप लेने का यह संकेत ऋग्वेद तक जाता है, जहाँ 1.22.17 में ‘त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुः’ आता है; भागवत उसी वैदिक बीज को पूरी कथा में खोल देता है।

बलि का त्याग केरल के ओणम पर्व का आधार है, जो उसके पाताल से एक दिन के लिए प्रजा से मिलने लौटने का उत्सव माना जाता है। सुतल में श्रीहरि का स्वयं उसका द्वारपाल बन जाना (8.23) कथा का मर्म है।

दर्शन-दृष्टि

इस कथा का मर्म यह है कि असुरों का राजा अपने त्याग से देवराज इन्द्र से ऊँचा सिद्ध होता है। भागवत यहाँ देव और असुर की सीधी रेखा को नरम कर देता है, क्योंकि कसौटी जन्म नहीं, समर्पण है।

श्रीहरि का बलि के द्वार पर पहरेदार बनकर खड़ा हो जाना भक्ति-परंपरा का एक बड़ा सूत्र बन गया, कि भगवान भक्त के दिए हुए के बदले स्वयं को ही गिरवी रख देते हैं। यही भाव आगे चलकर अनेक संतों की वाणी में ‘भक्त के वश में भगवान’ के रूप में दोहराया गया।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

हम जीवन भर धर्म और मेहनत से जो जोड़ते हैं, उसे ख़ाली हाथ छोड़ देने की घड़ी एक दिन सबके आगे आती है। बलि उस घड़ी में लड़ता नहीं, सिर झुका देता है, और तब पाता है कि जो छूट गया वह कभी अपना था ही नहीं, और जो साथ रह गया वह सब में बड़ा था।