वामन और बलि

कथा 13 · भागवतम् की कथाएँ

वामन और बलि

Three Steps to Measure the Universe
स्कन्ध 8, अध्याय 19-22

बलि एक असुर-राजा था। प्रह्लाद का पोता। राक्षस-कुल में जन्मा, मगर अपने दादा से धर्म सीखा था।

उसने इतना धर्म किया, इतना दान किया, इतना यज्ञ किया, कि तीनों लोक उसके हाथ आ गए। स्वर्ग भी।

इन्द्र मारा गया। देवता निर्वासित।

देवताओं की माँ अदिति ने प्रार्थना की। ”हे विष्णु, हमारे राज्य को बचाओ।”

विष्णु ने एक अनोखा रास्ता चुना। वो ख़ुद अदिति के गर्भ से जन्मे। एक छोटे ब्राह्मण-बच्चे के रूप में। नाम वामन।

वामन का मतलब है ”बौना”। उसका शरीर छोटा था। बस तीन हाथ ऊँचा। हाथ में एक छोटी सी छतरी, कमंडल, और मेखला।

उसी समय बलि एक बड़ा यज्ञ कर रहा था। अश्वमेध-जैसा। पूरी सम्पदा दान कर रहा था।

वामन वहाँ पहुँचा। बौना, मासूम, छोटा।

बलि के द्वारपालों ने उसे रोका नहीं। एक ब्राह्मण-बच्चा, क्या नुक़सान करेगा?

वामन यज्ञ-स्थल पर पहुँचा। बलि ने उसे देखा। उठकर स्वागत किया।

”बच्चे, क्या चाहिए?”

वामन ने मुस्कुराकर कहा, ”बस तीन पग ज़मीन। जितनी मेरे तीन पाँव में आ जाए।”

बलि हँसा। ”बच्चे, यह क्या? तू और कुछ माँग। पूरा राज्य भी दे दूँ।”

”नहीं। मुझे बस तीन पग।”

बलि के गुरु शुक्राचार्य पास खड़े थे। उन्हें कुछ शक हुआ।

”राजन्, यह कोई साधारण बच्चा नहीं। यह विष्णु ख़ुद है। तू वचन मत दे।”

बलि ने एक पल को सोचा।

फिर बोला, ”गुरुदेव, क्षमा करें। मेरे कुल में ”नहीं” कहना नहीं है। एक छोटे बच्चे को मैं वचन तोड़ने का उदाहरण नहीं दूँगा।”

उसने जल लिया। संकल्प किया।

”वामन, तीन पग तेरे।”

तेन तं प्रोचुरादाय धर्मसन्तानमिच्छता ।
नैषा सत्या जगन्नाथ नायं भूर्यः सहेत वै ॥

जब बलि ने तीन पग देने का वचन दिया, तो शुक्राचार्य ने भी रोकने की कोशिश की। पर बलि ने वचन का धर्म तोड़ने से मना कर दिया।

और तब, वामन ने अपना रूप बदलना शुरू किया।

बौने का शरीर बढ़ने लगा। पहले एक आदमी। फिर एक हाथी। फिर एक पहाड़। फिर एक ब्रह्मांड।

उसने अपना पहला पैर रखा। पृथ्वी समा गई।

दूसरा पैर। आकाश और स्वर्ग दोनों।

तीनों लोक उसके दो पैरों में।

वो रुक गया।

”बलि, तीसरा पैर कहाँ रखूँ?”

बलि के सामने अब कुछ नहीं था। उसका राज्य, उसकी सम्पदा, उसका सब, दो पैरों में।

उसने हाथ जोड़े। और मुस्कुराया।

”प्रभु, मेरे सिर पर रख दीजिए।”

वामन का तीसरा पैर बलि के सिर पर आया। और बलि नीचे, पाताल लोक में, धकेला गया।

पर वहाँ कुछ अद्भुत हुआ।

बलि गया, मगर उसके साथ विष्णु भी गए।

”बलि, तेरी निष्ठा देखकर मैं तेरे साथ पाताल में रहूँगा। तेरी रक्षा करूँगा। यह तुझे मेरा वचन।”

बलि के पास अब राज्य नहीं था। पर उसके पास विष्णु था। दरवाज़े पर।

लक्ष्मी ख़ुद आईं। ”प्रभु, आप कहाँ? वैकुण्ठ में मेरे साथ रहना है।”

विष्णु ने कहा, ”लक्ष्मी, मैंने बलि को वचन दिया है। एक भक्त के साथ हूँ।”

तब लक्ष्मी ने बलि को राखी बाँधी। उसे भाई बनाया। बदले में बलि से अपना पति माँगा वापस।

बलि ने हाथ जोड़कर विष्णु को विदा किया।

इस कथा का एक interesting twist यह भी है। बलि ने सब कुछ खोया। मगर भागवतम् कहता है, असली में उसने सब कुछ पाया। क्योंकि जब आपकी सम्पदा से आप ख़ाली हो जाते हो, तब आप के पास सच में भगवान के लिए जगह बनती है।

मन्थन

वामन-बलि की कथा भागवतम् का सबसे रोचक paradox है।

बलि एक राक्षस था, पर धार्मिक। विष्णु एक भगवान थे, पर ”चालाक।” उन्होंने एक बच्चे का रूप लिया, ब्राह्मण-वेश में, सिर्फ़ बलि को confuse करने के लिए।

मगर बलि उनकी ”चालाकी” को समझ भी जाता है, और फिर भी वचन देता है। क्यों? क्योंकि उसके लिए वचन भगवान से बड़ा था। उस moment में।

और इसी moment में वो भगवान को पा भी जाता है। क्योंकि बलि के पास कुछ नहीं बचा, तो उसके पास और कुछ नहीं रहा except his commitment। और भगवान ख़ुद उसके साथ रहने को तैयार हो गए।

एक और बात। हम सब अपनी ज़िंदगी में बलि हैं। हम धर्म से, मेहनत से, ईमानदारी से, चीज़ें इकट्ठा करते हैं। फिर एक दिन कोई आकर तीन पग माँगता है। हमारी ज़िंदगी, हमारा सब, बस तीन पग में चला जाता है। यह हर एक के साथ होता है, किसी न किसी रूप में।

सवाल यह है, जब वो तीन पग आते हैं, तो हम कैसे react करते हैं? बलि की तरह सिर झुकाते हैं, या लड़ते हैं?