नृसिंह अवतार
गंगा का जल साँझ की हवा में धीरे-धीरे बह रहा था। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, कल आपने उस बालक प्रह्लाद की बात कही थी जो आग में भी न डरा। पर हम यह जानना चाहते हैं, जब उसके पिता ने अंत में पूछा कि उसका भगवान् क्या इस खम्भे में भी है, और जब वह खम्भा फटा, तब क्या निकला? हमारे पास थोड़े ही दिन बचे हैं, मुनिवर, और हम उस रूप को देखना चाहते हैं जो मृत्यु के द्वार पर आता है।”
शुकदेव कुछ पल मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, सुनिए। हिरण्यकशिपु ने वही निश्चय कर लिया था कि अब प्रह्लाद को अपने ही हाथों मार डालना चाहिए। उसने कठोर वाणी से उसे डाँटा, और कहा, अरे मूर्ख, आप किसके बल पर मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम करते हैं? पर प्रह्लाद ने बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर कहा कि ब्रह्मा से लेकर एक तिनके तक सब को भगवान् ने ही अपने वश में कर रखा है, वही समस्त बलवानों का बल हैं, वही काल हैं, वही परमेश्वर हैं।”
हिरण्यकशिपु यह सुनकर और भी जल उठा। उसने सिंहासन से उठकर कहा, ”अभागे, आपने मेरे सिवा जो और किसी को जगत् का स्वामी बताया है, सो देखूँ, आपका वह जगदीश्वर कहाँ है? अच्छा, क्या कहा, वह सर्वत्र है? तो इस खम्भे में क्यों नहीं दिखता? लो, अभी आपका सिर धड़ से अलग किये देता हूँ। देखता हूँ, आपका वह सर्वस्व हरि आपकी कैसे रक्षा करता है।”

इतना कहकर उसने तलवार खींची, सिंहासन से कूदा, और अपनी मुट्ठी से उस खम्भे पर बड़े जोर से एक घूँसा मारा। उसी क्षण उस खम्भे में से एक बड़ा भयंकर शब्द हुआ, मानो ब्रह्माण्ड ही फट गया हो। और उसमें से रूप प्रकट हुआ।
हिरण्यकशिपु एक पल को रुक गया।
जो उसने देखा, वह न देवता ने देखा था, न दानव ने। वह रूप न तो पूरा-पूरा सिंह का था, और न मनुष्य का ही।

एक प्राणी। आधा सिंह, आधा मनुष्य। तपाये हुए सोने के समान पीली-पीली भयानक आँखें, मानो प्रलय का सूरज जल रहा हो। जँभाई लेने से गरदन के बाल इधर-उधर लहरा रहे थे। दाढ़ें बड़ी विकराल। तलवार की धार-सी लपलपाती जीभ। टेढ़ी भौंहों से वह मुख और भी दारुण हो रहा था। कान निश्चल और ऊपर की ओर उठे हुए। फूली हुई नासिका, और खुला हुआ मुँह पहाड़ की गुफा-सा।
विशाल शरीर स्वर्ग को छू रहा था। गरदन कुछ नाटी और मोटी, छाती चौड़ी, कमर बहुत पतली। चन्द्रमा की किरणों के समान सफेद रोएँ सारे शरीर पर चमक रहे थे। चारों ओर सैकड़ों भुजाएँ फैली हुईं, जिनके बड़े-बड़े नाख़ून ही आयुध का काम देते थे। उनके पास फटकने का साहस किसी को न होता था।
हिरण्यकशिपु सोचने लगा, हो न हो, महामाया विष्णु ने ही मुझे मार डालने के लिये यह ढंग रचा है। पर इसकी इन चालों से हो ही क्या सकता है।
इस प्रकार सोचता और सिंहनाद करता हुआ वह दैत्यराज हाथ में गदा लेकर भगवान् पर टूट पड़ा। पर जैसे पतिंगा आग में गिरकर अदृश्य हो जाता है, वैसे ही वह दैत्य भगवान् के तेज के भीतर जाकर लापता-सा हो गया।

फिर वह बड़े क्रोध से लपका और अपनी गदा को बड़े जोर से घुमाकर भगवान् पर प्रहार किया। पर प्रहार करते समय ही भगवान् ने गदा-समेत उस दैत्य को वैसे ही पकड़ लिया जैसे गरुड़ साँप को पकड़ लेते हैं। फिर जब वे उसके साथ खेलने लगे, तो वह उनके हाथ से वैसे ही फिसल गया जैसे क्रीड़ा करते गरुड़ की पकड़ से साँप छूट जाए।
हिरण्यकशिपु ने समझा कि नृसिंह उसके बल-वीर्य से डरकर ही उसे छोड़ बैठे। उसकी थकान जाती रही। अब उसने ढाल और तलवार उठाई और फिर उन पर झपटा।
वह बाज़ की तरह बड़े वेग से ऊपर-नीचे उछल-कूदकर ढाल-तलवार के पैंतरे बदलने लगा, ऐसे कि उस पर वार करने का अवसर ही न मिले। तब भगवान् ने बड़े ऊँचे स्वर से प्रचण्ड और भयंकर अट्टहास किया, जिससे हिरण्यकशिपु की आँखें बंद हो गयीं। फिर बड़े वेग से झपटकर भगवान् ने उसे वैसे ही पकड़ लिया जैसे साँप चूहे को पकड़ लेता है।
जिस हिरण्यकशिपु के चमड़े पर वज्र की चोट से भी खरोंच न आयी थी, वही अब उनके पंजे से निकलने के लिये जोर से छटपटा रहा था।
और उसे लेकर भगवान् सभा के दरवाज़े पर आ गए। ठीक देहरी पर।
वहीं भगवान् ने उसे अपनी जाँघ पर लिटाया।
देह उस गोद में टिकी रही, और उन हाथों में नाख़ूनों के सिवा कुछ न था। कोई शस्त्र, कोई अस्त्र उठाया ही न गया।

नृसिंह की उँगलियाँ हिरण्यकशिपु के सीने पर पहुँचीं। और उन तीखे नाख़ूनों ने उसका वक्षःस्थल चीरना आरम्भ किया।
हिरण्यकशिपु चिल्लाया। उसकी पूरी ज़िंदगी में पहली बार उसके गले से डर का स्वर निकला। ब्रह्मा के दिए हुए सब वर एक के बाद एक टूट रहे थे, ठीक उसी दरार से जो उसने ख़ुद अपने माँगने में छोड़ दी थी। हर वर की एक झिरी थी, और हर झिरी पकड़ ली गई थी।
”मैं तो अमर हूँ,” वह मन ही मन सोच रहा था। ”यह क्या हो रहा है?”
जिसने अपने लिए दरारों भरे वर गढ़े थे, उसकी अमरता आज उन्हीं दरारों से रिस रही थी। सच्ची अमरता तो उस रूप में थी जो अभी उसकी जाँघ पर झुका हुआ था।
नृसिंह ने अपने तीखे नाख़ूनों से हिरण्यकशिपु का कलेजा फाड़कर उसे ज़मीन पर पटक दिया। वह गिरा।
उसी क्षण हजारों दैत्य-योद्धा हाथों में शस्त्र लेकर भगवान् पर प्रहार करने के लिये आये। पर भगवान् ने अपनी भुजारूपी सेना से, लातों से और नाख़ूनरूपी शस्त्रों से उन्हें चारों ओर खदेड़-खदेड़कर मार डाला।
उस समय उनकी क्रोध से भरी विकराल आँखों की ओर देखा नहीं जाता था। वे अपनी लपलपाती हुई जीभ से फैले हुए मुँह के दोनों कोने चाट रहे थे। खून के छींटों से उनका मुँह और गरदन के बाल लाल हो आये थे। हाथी को मारकर गले में आँतों की माला पहने हुए मृगराज के समान उनकी शोभा हो रही थी।

भगवान् के गरदन के बालों की फटकार से बादल तितर-बितर होने लगे। उनके नेत्रों की ज्वालाओं से सूर्य आदि ग्रहों का तेज फीका पड़ गया। उनके श्वास के धक्के से समुद्र क्षुब्ध हो गये। उनके सिंहनाद से भयभीत होकर दिग्गज चिग्घाड़ने लगे। उनके गरदन के बालों से टकराकर देवताओं के विमान अस्त-व्यस्त हो गये। उनके पैरों की धमक से भूकम्प आ गया, बड़े-बड़े पर्वत उड़ने लगे, और उनके तेज की चकाचौंध से आकाश तथा दिशाओं का दीखना बंद हो गया।
इस समय नृसिंहभगवान् का सामना करनेवाला कोई दिखायी न पड़ता था। फिर भी उनका क्रोध अभी बढ़ता ही जा रहा था। वे हिरण्यकशिपु की राजसभा में ऊँचे सिंहासन पर जा बैठे। उनका वह अत्यन्त तेजपूर्ण और क्रोधभरा भयंकर मुख देखकर किसी का साहस न हुआ कि पास जाकर उनकी सेवा करे।
देवता दूर से ही हाथ जोड़े खड़े रहे। पास कोई न जा सका।

उधर स्वर्ग की देवियों को जब यह शुभ समाचार मिला कि तीनों लोकों के सिर की पीड़ा का मूर्तिमान् स्वरूप हिरण्यकशिपु युद्ध में भगवान् के हाथों मारा गया, तब आनन्द के उल्लास से उनके चेहरे खिल उठे, और वे बार-बार भगवान् पर पुष्पों की वर्षा करने लगीं।
आकाश में विमानों की भीड़ लग गयी। देवताओं के ढोल और नगारे बजने लगे, गन्धर्वराज गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं।
तभी ब्रह्मा, इन्द्र, शंकर आदि देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, विद्याधर, महानाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराएँ, चारण, यक्ष, किम्पुरुष, वेताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द-कुमुद आदि भगवान् के सभी पार्षद उनके पास आये। उन सब ने कुछ दूरी पर खड़े होकर, सिर पर हाथ जोड़कर, उस अत्यन्त तेजस्वी नृसिंहभगवान् की अलग-अलग स्तुति की।
ब्रह्मा ने कहा, प्रभो, आप अनन्त हैं, आपकी शक्ति का कोई पार नहीं पा सकता, आपका पराक्रम विचित्र और कर्म पवित्र हैं। शंकर ने कहा, आपके क्रोध करने का समय तो कल्प के अन्त में होता है, यदि इस तुच्छ दैत्य को मारने के लिये ही आपने क्रोध किया है तो वह भी मारा जा चुका, अब आप अपने इस भक्त की रक्षा कीजिये। इन्द्र ने कहा, आपने हमारी रक्षा की, आपने हमारे जो यज्ञभाग लौटाये हैं वे वास्तव में आप के ही हैं।
ऋषियों ने, पितरों ने, सिद्धों ने, विद्याधरों ने, नागों ने, मनुओं ने, प्रजापतियों ने, गन्धर्वों ने, चारणों ने, यक्षों ने, किम्पुरुषों ने, वैतालिकों ने, किन्नरों ने और भगवान् के पार्षदों ने, एक-एक करके अपनी-अपनी वाणी में उस अलौकिक नृसिंहरूप की वन्दना की। और भगवान् के पार्षदों ने तो यहाँ तक कहा कि यह दैत्य तो आपका वही आज्ञाकारी सेवक था, जिसे सनकादि ने शाप दे दिया था, हम समझते हैं, आपने कृपा करके इसके उद्धार के लिये ही इसका वध किया है।
पर वह भयंकर रूप तब भी शान्त न हुआ था, और यह आगे की बात है, राजन्। देवता दूर से ही स्तुति करते रहे, पास कोई न गया। तब क्या हुआ, और किसने उस आधे-सिंह को शान्त किया, वह कथा हम आगे कहेंगे।
इतना ही कहना है, राजन्, कि उस संध्या एक राजा गिरा जो ख़ुद को अमर समझता था, और जिस रूप के पास जाने का साहस किसी देवता को न हुआ, उसी रूप ने अपने ही नाख़ूनों से उस वैरी को अपनी जाँघ पर मुक्ति दी।
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, हमने सुना था कि भगवान् करुणामय हैं, बाँसुरी बजाते हैं, माखन चुराते हैं। यह रूप तो रोंगटे खड़े कर देता है। फिर भी इसमें करुणा कहाँ छिपी थी?”
शुकदेव हँसे, धीरे से। ”राजन्, यही तो देखने की बात है। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से ऐसे वर माँगे थे जो उसे हर ओर से अभेद्य कर दें, न दिन में मरे न रात में, न घर में न बाहर, न मनुष्य से न पशु से। पर अहंकार से माँगा हुआ हर वर अपने भीतर अपनी ही दरार रखता है। मनुष्य अपने पतन का बीज अपने ही हाथों बोता है। भगवान् ने बस वही दरार पकड़ी।”
”तो वह क्रोध दण्ड था?” परीक्षित् ने पूछा।
”दण्ड नहीं, राजन्। जिसने जीवन भर हरि से बैर रखा, उसे भी हरि ने अपनी जाँघ पर ही लिया, अपने ही नाख़ूनों से मुक्त किया। बैर भी एक तार है, यदि अटूट हो। और उस जलते रूप के पास जाने का साहस किसी देवता को न हुआ। पर जो आगे की कथा है, उसमें एक छोटा-सा बच्चा उस रूप के पास गया, जिसके भीतर डरने को कुछ बचा ही न था। न मान, न भय, न पकड़। बस एक खुला हाथ, और चरण छूने की एक सीधी इच्छा। परम बड़ी शक्ति अत्यन्त सीधे प्रेम के आगे पिघल जाती है, राजन्।”
गंगा बहती रही। परीक्षित् ने अपने हाथ की ओर देखा, फिर उस जल की ओर, जिस पर साँझ की आख़िरी रोशनी काँप रही थी। तक्षक का स्मरण उस क्षण कहीं बहुत दूर था।
साहित्यिक-संदर्भ
प्रह्लाद और नृसिंह की यह कथा श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 4 से 10 तक फैली है। अध्याय 8 में हिरण्यकशिपु का वध और उसके बाद ब्रह्मादि देवताओं की स्तुति आती है; अध्याय 8 स्तुति पर ही समाप्त हो जाता है। नृसिंह के क्रोध को शान्त करने के लिये लक्ष्मीजी का भेजा जाना और फिर प्रह्लाद का चरण-स्पर्श एवं वर-प्रसंग अध्याय 9 में आता है, जिसे यह कथा आगे कहेगी। नवधा भक्ति का वर्णन प्रह्लाद के मुख से इसी प्रसंग (7.5.23-24) में मिलता है। मूल अध्याय 8 के श्लोक केवल जाँघ (ऊरु) पर लिटाकर नाख़ूनों से वध बताते हैं; वर की हर शर्त को संध्या, देहरी, जाँघ और नाख़ून से एक साथ पूरा कर देने का विवरण श्रीधर स्वामी की परम्परा से है, जिसे श्रीधर स्वामी ने अनुग्रह का शुद्धतम रूप कहा।
यही कथा वहाँ भी
- प्रह्लाद का विद्रोह
श्रीमद्भागवत (स्कन्ध 7): प्रह्लाद का हिरण्यकशिपु से विद्रोह - प्रह्लाद का अंतर्ध्यान
योग वासिष्ठ: प्रह्लाद का विष्णु-चिन्तन और आत्म-बोध