नृसिंह अवतार

कथा 08 · भागवतम् की कथाएँ

नृसिंह अवतार

The Half-Lion, Half-Man on the Threshold
स्कन्ध 7, अध्याय 8

खम्भा टूटा। उसमें से रूप निकला।

हिरण्यकशिपु एक पल को रुक गया। उसके हाथ में गदा थी, उठी हुई।

जो उसने देखा, वो किसी ने नहीं देखा था। न देव ने, न दानव ने।

एक प्राणी। आधा सिंह, आधा मनुष्य। शरीर मनुष्य का, सिर एक भयानक सिंह का। आँखें ऐसी जलती हुई जैसे प्रलय का सूरज। दाँत बाहर निकले हुए। जीभ लाल। बालों की अयाल भयानक रूप से उठी हुई।

उसके दस हाथ। कुछ में चक्र, कुछ में गदा, कुछ में शंख, कुछ में तलवार। एक हाथ ख़ाली, उसमें बस उँगलियाँ, और उन उँगलियों के नाख़ून।

और गर्जन। ऐसा गर्जन जिसने पूरे महल को हिला दिया। पुराण कहते हैं, ब्रह्मा अपने लोक में डरा। शिव अपने ध्यान से चौंक उठे।

हिरण्यकशिपु थोड़ी देर देखता रहा। फिर उसने अपने आप को संभाला।

”यह क्या जादू है, बच्चे?” उसने प्रह्लाद से नहीं, बल्कि उस रूप से पूछा।

”तू कौन है?”

नृसिंह ने जवाब नहीं दिया। बस गर्जा।

हिरण्यकशिपु ने गदा उठाई। उसके पीछे उसकी पूरी सेना थी। दानव-योद्धा। हज़ारों।

”मारो इसे!”

सेना नृसिंह पर टूट पड़ी। तीर बरसे। तलवार चमकीं। गदाएँ उठीं।

पर उन सब के पास से नृसिंह का शरीर ऐसे ज़ख़्म लेता था जैसे आग कागज़ को ज़ख़्म ले। यानी, बिल्कुल नहीं। हर शस्त्र टूट जाता, हर तीर रुक जाता।

नृसिंह ने अपने नाख़ूनों से सैनिकों को छुआ। एक छुएँ, और सैनिक गिर जाए। दो छुएँ, और सेना का एक हिस्सा ख़त्म।

हज़ारों सैनिक चंद मिनटों में मारे गए।

हिरण्यकशिपु अब अकेला था। उसकी सेना ख़त्म। वो भागा।

नृसिंह ने उसका पीछा किया। महल के एक छोर से दूसरे छोर।

हिरण्यकशिपु बाहर भागा। पर नृसिंह ने उसे दरवाज़े पर पकड़ा।

ठीक दहलीज़ पर। न अंदर, न बाहर।

ऊरुमादाय खड्गेन वज्रनिष्ठाङ्गुलिः प्रभुः ।
नखैरुरः केसरिवद् दारयामास लीलया ॥
(श्रीमद्भागवत 7.8.29)

उसे अपनी जाँघ पर खींचा, और जैसे शेर शिकार के सीने को चीरता है, वैसे ही प्रभु ने अपने वज्र-समान नाख़ूनों से उसका वक्षःस्थल फाड़ डाला, बहुत आसानी से।

और सूरज ढल रहा था। गोधूलि। न दिन, न रात।

नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को उठाया। अपनी जाँघ पर लिटाया।

ज़मीन पर नहीं। आकाश में नहीं। बीच में। जाँघ पर।

और हाथ में शस्त्र नहीं। अस्त्र नहीं। बस नाख़ून।

नृसिंह की उँगलियाँ हिरण्यकशिपु के सीने पर पहुँचीं।

और उसके नाख़ून सीना चीरने लगे।

हिरण्यकशिपु चिल्लाया। पहली बार उसकी ज़िंदगी में डर का स्वर निकला। ब्रह्मा के सब वर एक के बाद एक टूट रहे थे, exactly जैसे उसने उन्हें बनाया था। हर वर की loophole पकड़ी गई थी।

”ये क्या हो रहा है?” वो सोच रहा था। ”मैं तो अमर हूँ।”

मगर अमर वो नहीं था जिसने ख़ुद के लिए loopholes बनाए थे। अमर तो कोई और था।

नृसिंह के नाख़ून ने उसके सीने को चीर दिया। दिल बाहर। हिरण्यकशिपु की आँखें खुली रहीं, और अंतिम पल में उन्हें पहली बार दिखा, कि उनके सामने कोई और था।

मरते-मरते उसने नृसिंह की आँखों में देखा।

और शायद, शायद, उसे एक झलक हुई। एक बात याद आई। जय और विजय, उसकी पुरानी पहचान। यह कथा अलग है। पर उस पल में, उसका तीसरा जन्म भी ख़त्म हुआ। तीन जन्मों के शाप का अंत।

वो गिरा।

नृसिंह ने अपनी अयाल हिलाई। उसका गर्जन और बढ़ा। उसने हिरण्यकशिपु के सीने का माँस अपनी जीभ से चाटा।

वो अभी भी क्रोध में था। उसकी आँखें अभी भी जल रही थीं।

देवता आसमान से देख रहे थे। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र। डर रहे थे। यह रूप अभी भी रुक नहीं रहा था।

ब्रह्मा ने अपनी पत्नी सरस्वती को भेजा। ”शायद उसकी आवाज़ शान्ति लाए।”

सरस्वती गई। पर नृसिंह की आँखें देखकर वो भी रुक गई। वहाँ नहीं जा पाई।

शिव ने जाने की कोशिश की। पर नहीं जा पाए।

लक्ष्मी ख़ुद आईं। नृसिंह उनके ख़ुद के पति का avatar थे। उन्हें देखकर भी नहीं रुके।

सब हैरान।

तभी कोई एक खड़ा हुआ।

पाँच साल का प्रह्लाद। जो पास खड़ा यह सब देख रहा था।

बाक़ी सब डरते थे, क्योंकि बाक़ी सब के अंदर कुछ था जो डरने लायक था। ego, attachment, fear। प्रह्लाद के अंदर वो कुछ नहीं था।

वो आगे बढ़ा।

बच्चे के पैर नंगे, हाथ छोटे। वो नृसिंह के पास गया।

और एक काम किया जो किसी ने नहीं किया था।

उसने नृसिंह के पैरों को छुआ।

और बोला, ”भगवान, मेरे पिता को क्षमा करें। वो अनजान थे।”

नृसिंह की आँखें अब बच्चे पर थीं।

और धीरे-धीरे, उन आँखों में लालिमा कम हुई। गर्जन रुका। अयाल नरम पड़ी। नाख़ून छिप गए।

वो अभी भी आधा सिंह था, मगर अब क्रोध नहीं था। बस एक माँ की तरह की कोमलता।

उन्होंने प्रह्लाद के सिर पर हाथ रखा।

”बेटा, तू ने मेरा क्रोध शान्त किया।”

प्रह्लाद ने हाथ जोड़े।

”भगवान, मुझे एक वरदान दीजिए।”

”माँग।”

”मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए। पर अगर देना ही है, तो यह दीजिए, कि मेरे पिता को आपकी सद्गति मिले। और मेरा मन कभी इस संसार में न लगे, हमेशा आपके चरणों में रहे।”

नृसिंह मुस्कुराए। और वो कथा भी बाद की है।

अभी, इस कथा में, एक राजा गिरा था जो अमर समझता था ख़ुद को, और एक बच्चे ने उस आधे-सिंह को शान्त किया था जो किसी और से नहीं रुकता था।

मन्थन

नृसिंह की कथा भागवतम् का सबसे fierce moment है। बाक़ी जगह कृष्ण बाँसुरी बजा रहे हैं, या यशोदा से बँध रहे हैं, या सुदामा को गले लगा रहे हैं। यहाँ, वो आधा-सिंह है, और आधे-घंटे में पूरी दानव-सेना मिट जाती है।

पर ध्यान देने वाली बात यह है कि नृसिंह की हिंसा एक खास तरह की है। पूरा avatar एक loophole engineering exercise है। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से ऐसे वर माँगे थे जो उसे hypothetically अमर बनाते। तो भगवान ने एक ऐसा रूप बनाया जो उन हर वर की loophole से बच निकलता है।

क्यों? क्योंकि भागवतम् कह रहा है कि आप कितनी भी चालाकी से वर माँगो, अगर आपने अहंकार से माँगा है, तो आपके वर में ख़ुद ही loopholes होंगे। आप ही अपने पतन के engineer होते हैं।

और अंत में, सबसे रोचक बात। नृसिंह को कोई शान्त नहीं कर सका। न शिव, न ब्रह्मा, न लक्ष्मी। शान्त किया एक पाँच साल के बच्चे ने। क्यों? क्योंकि उस बच्चे के पास और कुछ नहीं था जो उसे रोकता। न ego, न डर, न attachment। बस एक खुला हाथ, और पैर छूने की एक सरल इच्छा।

यह कथा कह रही है, कभी-कभी सबसे बड़ी शक्ति सबसे साधारण innocence के सामने पिघलती है।