दामोदर लीला
वृन्दावन की एक सुबह। यशोदा रसोई में थी।
वो माखन बना रही थी। मथानी से दही मथ रही थी। एक हाथ रस्सी पर, एक हाथ संतुलन के लिए। मटका लकड़ी के खूंटे से बँधा था। दही ऊपर-नीचे होता, फिर माखन की एक हलकी सी झलक ऊपर आती।
कृष्ण उसकी गोद में नहीं थे। सुबह से कहीं और गायब थे। यशोदा को इसकी आदत थी। मगर बच्चा है, कहीं तो होगा।
तभी रसोई के बाहर के बर्तन गिरने की आवाज़ आई।
उसने मथानी छोड़ी और भागी। बाहर निकली तो देखा, कृष्ण माखन के एक मटके के पास खड़ा था। मटका टूटा हुआ। माखन ज़मीन पर बिखरा हुआ। और कृष्ण का एक हाथ अभी भी मटके में।
उसके मुँह पर माखन लगा था। आँखों में ज़रा सी शरारत। और एक एहसास कि अब पकड़ा गया।
यशोदा के अंदर एक माँ जागी। हाथ में अभी भी रस्सी थी, मथानी की।
”कन्हैया!”
कृष्ण एक झटके में मुड़ा और भागा। यशोदा पीछे।
वो एक तीन साल का बच्चा था, चपल और चालाक। यशोदा एक माँ थी, थकी हुई, पर ज़िद्दी।
वो आँगन में पहुँचे। फिर बाग़ में। फिर पेड़ों के बीच। यशोदा हाँफ रही थी, मगर पीछा छोड़ नहीं रही थी।
आख़िर एक मोड़ पर कृष्ण रुक गया। शायद थक गया। शायद उसकी मर्ज़ी थी कि रुक जाए।
यशोदा ने उसे पकड़ा।
बच्चा रोने लगा। नकली रोना, मगर ज़ोरदार। यशोदा का दिल पिघलने लगा। पर वो माँ थी, और एक बात सिखानी थी।
”आज तुझे बाँधूँगी। पूरा दिन ऊखल से। ताकि माखन चुराना समझ जाए।”
कृष्ण ने अपनी रोने वाली आँखों से उसकी तरफ़ देखा। कुछ नहीं बोला।
यशोदा उसे रसोई के बाहर ले गई। वहाँ एक भारी ऊखल था, जो धान कूटने के काम आता था। वहीं उसे बाँधना तय किया।
उसने रस्सी ली। एक टुकड़ा। उसे कृष्ण के पेट के चारों ओर लपेटा। फिर ऊखल के पास ले गई।
बाँधना शुरू किया।
रस्सी दो अंगुल छोटी।
उसने दूसरी रस्सी ली। जोड़ी।
फिर दो अंगुल छोटी।
उसने तीसरी, चौथी, पाँचवीं ली। हर बार रस्सी पूरी पड़ती-पड़ती दो अंगुल कम पड़ जाती।
यदासीत्तदपि स्वङ्गं द्व्यङ्गुलोनं समैक्षत ॥
(श्रीमद्भागवत 10.9.15)
जो भी रस्सी वो लाई, वो दो अंगुल कम पड़ी। उसने दूसरी जोड़ी। फिर भी दो अंगुल कम। यह कितनी ही बार हुआ।
यशोदा हैरान हो गई। हाथ रुक गया। माथे पर पसीना। यह क्या हो रहा है? कृष्ण का पेट कोई बहुत बड़ा नहीं था। फिर भी कोई रस्सी कस नहीं पाती।
उसने पड़ोसी से रस्सी माँगी। फिर एक और। फिर सब पुरानी रस्सियाँ इकट्ठी कीं। फिर भी हर बार वही दो अंगुल कम।
यह दृश्य भागवतम् में एक अनोखा पल है। एक माँ अपने बच्चे को बाँधने की कोशिश कर रही है। बच्चा रो नहीं रहा। मगर रस्सी हर बार छोटी।
क्यों? क्योंकि जिसे वो बाँधना चाहती है, वो ब्रह्मांड है। और ब्रह्मांड को बाँधने के लिए कोई रस्सी काफ़ी नहीं।
मगर एक चीज़ है जो ब्रह्मांड को भी बाँध सकती है।
यशोदा अब रोने लगी थी। पसीने से तर। उसकी साड़ी ढीली। बाल बिखरे।
उसने रस्सी छोड़ दी। बैठ गई वहीं। कृष्ण के सामने।
”हे कन्हैया, अब तू ही जान। माँ अब हार गई। तुझे बाँधना है तो ख़ुद बँध जा। मैं नहीं कर पाती।”
कृष्ण ने माँ की तरफ़ देखा। उसके पसीने वाले माथे को। बिखरे बालों को। थकी हुई आँखों को।
और मुस्कुराया।
उसने ख़ुद अपने पेट को थोड़ा सिकोड़ लिया। उतना ही, जितनी दो अंगुल कम थी।
रस्सी अब पूरी पड़ी।
यशोदा ने उसे बाँध दिया। ऊखल से।
और यहीं से कृष्ण का एक नाम पड़ा, दामोदर। ”दाम” मतलब रस्सी, ”उदर” मतलब पेट। जिसका पेट रस्सी से बँधा गया, वो दामोदर।
वो बच्चा वहीं बैठा रहा। बँधा हुआ। ऊखल को घसीटते हुए थोड़ा सा हिला।
उस घसीटने में एक काम और हुआ। पास के दो पेड़, जो असल में कुबेर के दो शापित बेटे थे, उखड़ गए। उनका शाप ख़त्म हुआ। वो स्वर्ग लौटे।
तो बँधने में भी कृष्ण ने एक काम कर दिया। पर वो अगली कथा है।
अभी, इस कथा में, एक बच्चा अपनी माँ की रस्सी से बँधा था। और वो माँ, जिसे यह नहीं पता था कि उसने ब्रह्मांड को बाँधा है, थक के सो गई थी।
यह कथा बहुत साधारण लगती है। एक माँ का अपने बच्चे को बाँधने का प्रयास। पर इसके अंदर भागवतम् की सबसे गहरी बात है।
वो जिसे शास्त्र ”अप्रमेय” कहते हैं, ”वाणी और मन की पकड़ से बाहर,” वो एक माँ की रस्सी से बँध जाता है। कैसे? सिर्फ़ अगर वो ख़ुद बँधना चाहे। यह बाँधना बल से नहीं हुआ। यह बाँधना प्रेम से हुआ।
रस्सी का दो अंगुल कम पड़ना भी अपने आप में एक संदेश है। टीकाकार कहते हैं, एक अंगुल अहंकार का प्रतीक है, और एक अंगुल प्रयास का। जब तक यशोदा अपने ”मैं” पर खड़ी थी, और जब तक वो अपनी ”मेहनत” पर भरोसा कर रही थी, कुछ नहीं हो रहा था। जब वो दोनों गिरीं, तब रस्सी पूरी पड़ी।
और सबसे important। यह कथा यह नहीं कहती कि बच्चा बँधा। यह कहती है कि माँ बँधी। माँ की रस्सी की मेहनत में, उसका प्रेम, उसका पसीना, उसकी थकान, वो सब उस ब्रह्मांड को छू गई जो हर रस्सी से बाहर है। इसी कारण कृष्ण को ”वशीभूत” होना पड़ा। प्रेम के सामने।