दामोदर लीला
परीक्षित् ने मुनि शुकदेव की ओर देखा, फिर कुछ देर ख़ामोश रहे।
”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”कल आपने उस बालक ध्रुव की बात कही, जो तप के बल पर भगवान् तक पहुँचा। हमारे पास अब थोड़े ही दिन बचे हैं, और हम सोचते हैं, क्या उन तक केवल तप और बल से ही पहुँचा जाता है? कोई और राह भी है?”
शुकदेव की आँखों में एक हलकी सी चमक आई, जैसे आती है जब कृष्ण की कोई बात कहनी हो। ”राजन्, एक राह है जो बल से नहीं, हार से खुलती है। सुनिए, एक माँ की कथा है, जिन्होंने समस्त जगत के स्वामी को अपनी रस्सी से बाँधना चाहा।”

वृन्दावन की एक सुबह। नन्द-रानी यशोदा ने उस दिन घर की दासियों को दूसरे कामों में लगा दिया था, और स्वयं अपने लाला को माखन खिलाने के लिए दही मथने लगीं।
वे माखन बना रही थीं। मथानी से दही मथ रही थीं। एक हाथ रस्सी पर, एक हाथ संतुलन के लिए। दही ऊपर-नीचे होता, फिर माखन की एक हलकी सी झलक ऊपर आती।
तभी कन्हैया आ पहुँचे। दूध पीने का मन था। यशोदा ने मथानी छोड़ी, उन्हें गोद में लिया और दूध पिलाने लगीं। उनका मुख निहारते हुए वे मन्द-मन्द मुस्कुरा रही थीं।
इतने में अँगीठी पर रखे दूध में उफान आया। यशोदा कन्हैया को अतृप्त ही छोड़कर दूध उतारने भागीं।
कन्हैया को इस पर कुछ क्रोध आया। उनके लाल-लाल होंठ फड़के। वे उठे, पास ही पड़े एक लोढ़े से दही का मटका फोड़ डाला, और दूसरे घर में जाकर अकेले में रखा हुआ बासी माखन खाने लगे।

यशोदा दूध उतारकर लौटीं तो दही का मटका टूटा पड़ा था। वे समझ गईं कि यह उन्हीं लाला की करतूत है। फिर उन्हें वहाँ न देखकर हँसने लगीं। बाहर निकलीं तो देखा, कन्हैया एक उलटे ऊखल पर खड़े छींके का माखन उतार-उतार कर बंदरों को बाँट रहे थे।
उनके मुँह पर माखन लगा था। आँखों में चोरी पकड़े जाने का डर। वे चौकन्ने होकर चारों ओर ताक रहे थे।
यशोदा के भीतर एक माँ जागी। उन्होंने हाथ में एक छड़ी उठा ली।
”कन्हैया!”
कन्हैया ने देखा कि माँ हाथ में छड़ी लिये उनकी ही ओर आ रही हैं। वे एक झटके में उलटे ऊखल पर से कूद पड़े और डरे हुए की भाँति भागे। यशोदा पीछे।
वे एक नन्हे बालक थे, चपल और चतुर। यशोदा एक माँ थीं, थकी हुई, पर ज़िद्दी।
राजन्, बड़े-बड़े योगी तपस्या के द्वारा अपने मन को अत्यन्त सूक्ष्म और शुद्ध बनाकर भी जिनमें प्रवेश नहीं कर पाते, उन्हीं भगवान् के पीछे-पीछे यशोदा दौड़ रही थीं। वे आँगन में पहुँचीं, फिर और आगे। यशोदा हाँफ रही थीं, मगर पीछा छोड़ नहीं रही थीं।
थोड़ी ही देर में बड़े-बड़े नितम्बों के कारण उनकी चाल धीमी पड़ गई। वेग से दौड़ने के कारण चोटी की गाँठ ढीली पड़ गई, और ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़तीं, पीछे-पीछे चोटी में गुँथे हुए फूल गिरते जाते। फिर भी, ज्यों-त्यों करके वे कृष्ण को पकड़ ही सकीं।
यशोदा ने उन्हें पकड़ा।
उन्हें पकड़कर यशोदा डराने-धमकाने लगीं। बालक रोने लगे। अपराध तो किया ही था, इसलिये पिटने के भय से रुलाई रुकने पर भी न रुकती थी। हाथों से आँखें मल रहे थे, इसलिये मुँह पर काजल की स्याही फैल गई थी। यशोदा का दिल पिघलने लगा। उन्होंने छड़ी एक ओर फेंक दी। पर वे माँ थीं, और एक बात सिखानी थी।
”अरी, मैं अब ऐसा कभी न करूँगा,” कन्हैया ने कहा, ”आप अपने हाथ से छड़ी डाल दीजिए।” पर यशोदा ने सोचा, इसको एक बार रस्सी से बाँध देना चाहिए, नहीं तो यह कहीं भाग जाएगा। ”आज आपको ऊखल से बाँधूँगी, ताकि माखन चुराना समझ जाएँ।”
कृष्ण ने अपनी रोती हुई आँखों से उनकी ओर देखा। कुछ न बोले।
वहीं एक भारी ऊखल था, जो धान कूटने के काम आता था। यशोदा ने वहीं उन्हें बाँधना तय किया।
उन्होंने रस्सी ली। उसे कृष्ण के पेट के चारों ओर लपेटा। फिर ऊखल के पास ले गईं।
बाँधना शुरू किया।
रस्सी दो अंगुल छोटी।
उन्होंने दूसरी रस्सी लाकर उसमें जोड़ी।
फिर भी दो अंगुल छोटी।
जब वह भी छोटी पड़ी, तब उसके साथ और जोड़ी। ज्यों-ज्यों वे रस्सी लातीं और जोड़ती जातीं, त्यों-त्यों जुड़ने पर भी वे सब दो-दो अंगुल छोटी पड़ती जातीं।

यशोदा हैरान रह गईं। हाथ रुक गया। माथे पर पसीने की लकीर उतर आई। यह क्या हो रहा है? कन्हैया का यह नन्हा-सा पेट, और कोई रस्सी उनके चारों ओर पूरी नहीं पड़ती।
उन्होंने घर की सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं। फिर भी हर बार वही दो अंगुल कम।
एक माँ अपने बालक को बाँधने में लगी हैं। बालक अब रो भी नहीं रहे, बस देख रहे हैं। मगर रस्सी हर बार वही दो अंगुल पीछे रह जाती है।
यह विचित्र दृश्य देखकर पास खड़ी गोपियाँ मुसकराने लगीं, और उनकी असफलता पर देखती हुई यशोदा भी मुसकराती हुई आश्चर्यचकित हो गईं।
क्यों? क्योंकि जिन्हें वे बाँधना चाहती हैं, वे समस्त ब्रह्मांड हैं। और ब्रह्मांड को बाँधने के लिए कोई रस्सी काफ़ी नहीं।
मगर एक वस्तु है जो ब्रह्मांड को भी बाँध सकती है।
यशोदा का शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। चोटी में गुँथी हुई मालाएँ गिर गई थीं, और वे बहुत थक गई थीं।

तब कृपा करके भगवान् श्रीकृष्ण अपनी माँ के बन्धन में बँध गए। उन्होंने माँ की ओर देखा, उस पसीने से भीगे माथे को, बिखरे बालों को, उन थकी हुई आँखों को जो अब भी उन्हीं पर टिकी थीं।
और मुस्कुराए।
रस्सी अब पूरी पड़ी।
यशोदा ने उन्हें ऊखल से बाँध दिया।
और यहीं से कृष्ण का एक नाम पड़ा, दामोदर। ”दाम” अर्थात् रस्सी, ”उदर” अर्थात् पेट। जिनका पेट रस्सी से बाँधा गया, वे दामोदर।
वे बालक वहीं बैठे रहे। बँधे हुए। ऊखल को घसीटते हुए थोड़ा सा हिले।
उस घसीटने में एक और बात हुई। आँगन के पास खड़े दो पुराने पेड़, जिनके बीच से ऊखल खिंचता निकल गया, जड़ से उखड़कर गिर पड़े। एक भारी कड़कड़ाहट गूँजी, और दोनों तने धूल उड़ाते हुए ज़मीन पर आ गिरे। उन पेड़ों के पीछे कौन सी कथा छिपी थी, यह उस दिन किसी ने न जाना।
पर बँधे हुए कन्हैया को इसकी कोई ख़बर न थी। वे तो ऊखल के पास बैठे, रस्सी को उँगली से छेड़ते रहे।
और वे माँ, जिन्हें यह पता न था कि उन्होंने अभी-अभी समस्त ब्रह्मांड को अपनी रस्सी से बाँध लिया है, काम निपटाकर कहीं थककर बैठ गई थीं।
शुकदेव कुछ क्षण रुके। परीक्षित् ने पाया कि उनकी अपनी साँस धीमी पड़ गई थी।
”तो भगवन्,” वे बोले, ”जिन्हें ध्रुव ने इतने तप से पाया, उन्हें यशोदा ने अपनी हार से बाँध लिया?”
”राजन्, जिस दिन यशोदा ने अपनी मेहनत और अपने ‘मैं’ को छोड़ा, उसी क्षण उनकी रस्सी पूरी पड़ी। भगवान् को पकड़ने में हमारा बल नहीं चलता; जब हाथ ढीले होते हैं, तभी वे स्वयं आकर उनमें बँध जाते हैं। आपके पास जो दिन बचे हैं, उनमें यही एक काम है।”
परीक्षित् ने कुछ नहीं कहा। एक दिन और कम हो गया।
यह कथा बहुत साधारण लगती है। एक माँ का अपने बालक को बाँधने का प्रयास। पर इसके भीतर भागवतम् की परम मर्मस्पर्शी बात छिपी है।
जिन्हें शास्त्र अप्रमेय कहते हैं (वाणी और मन की पकड़ से परे), वे एक माँ की रस्सी से बँध जाते हैं। कैसे? केवल तब, जब वे स्वयं बँधना चाहें। बल की कोई रस्सी उन तक पहुँच ही नहीं सकती थी; जो पहुँची, वह यशोदा के प्रेम की थी।
रस्सी का दो अंगुल कम पड़ना भी अपने आप में एक संदेश है। टीकाकार कहते हैं, एक अंगुल भक्त के अहंकार की कमी है, और एक अंगुल उसके प्रयास की। जब तक यशोदा अपने ”मैं” पर खड़ी थीं, और जब तक वे अपनी ”मेहनत” पर भरोसा कर रही थीं, कुछ न हो रहा था। जब वे दोनों गिरीं, तब रस्सी पूरी पड़ी।
और यह परम मर्म की बात है। रस्सी ऊखल से बालक को बाँधती दिखती है, पर असल बन्धन माँ का है, उन्हीं की ममता में बँधे हुए कन्हैया रुक गए। उनकी रस्सी की मेहनत में जो प्रेम था, जो पसीना और थकान थी, वही उस ब्रह्मांड को छू गई जो हर रस्सी से परे है। प्रेम के आगे वही वशीभूत हुए, जिन्हें कोई वश में नहीं कर सकता।
साहित्यिक-संदर्भ
दामोदर-लीला भागवत के दसवें स्कन्ध, अध्याय नौ में आती है। ‘दामोदर’ का अर्थ है ‘जिसके उदर पर रस्सी बँधी हो’, और यह नाम कृष्ण को इसी प्रसङ्ग से मिला। यशोदा के इस दण्ड में माँ की ममता और बालक की दिव्यता एक साथ बँधी दिखती हैं।
इसी प्रसङ्ग में आगे दो पेड़ों के गिरने की कथा है, जो स्कन्ध 10, अध्याय 10 में खुलती है।