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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

पुरंजन का रूपक

कथा 38 · भागवतम् की कथाएँ

पुरंजन का रूपक

नौ द्वारों वाला नगर
स्कन्ध 4, अध्याय 25-29

नारद का स्वर शान्त था।

“एक पुरुष था, नाम पुरंजन, बड़ा यशस्वी राजा। उसका एक मित्र भी था, अविज्ञात, जिसकी चालढाल कोई समझ न पाता था, पर जो सदा साथ रहता। पुरंजन के मन में भोग की लालसा थी, कि कहीं अपना एक ठिकाना हो, जहाँ जी भर के रहा जाए।”

राजा पुरंजन अपनी नगरी में विचरते, यह नगरी और उसका सारा वैभव जीव और देह के रूपक में ढला हुआ।
राजा पुरंजन अपनी नगरी में विचरते, यह नगरी और उसका सारा वैभव जीव और देह के रूपक में ढला हुआ।

“वह सारी पृथ्वी पर भटका, पर अपने योग्य कोई स्थान उसे न मिला, और कुछ उदास सा हो गया। आख़िर एक दिन हिमालय के दक्षिण तट पर, कर्मभूमि भारतखण्ड में, उसने एक नगर देखा, जैसा उसने पहले कभी न देखा था।”

“उस नगर में नौ दरवाज़े थे। पाँच सामने की ओर खुलते थे, एक दायीं ओर, एक बायीं ओर, और दो पीछे की ओर। चारों ओर परकोटे थे, बग़ीचे, अटारियाँ, सरोवर और राजमार्ग, और सोने, चाँदी तथा लोहे के शिखरों वाले भवन उसमें खचाखच भरे थे।”

“भीतर सभा-भवन थे, बाज़ार थे, लोगों की आवाज़ें, और बाहर एक सुन्दर बाग था जिसमें कोयल कूकती थी।”

“पुरंजन ने मन ही मन कहा, यह जगह अच्छी है। यहीं रहूँगा। और वह नगर के भीतर चला गया।”

पुरंजन को एक भोली किशोरी मिलती है, दस सेवकों और पाँच फनों वाले सर्प द्वारपाल के साथ, वह श्रेष्ठ वर की खोज में है।
पुरंजन को एक भोली किशोरी मिलती है, दस सेवकों और पाँच फनों वाले सर्प द्वारपाल के साथ, वह श्रेष्ठ वर की खोज में है।

“वहाँ एक स्त्री घूमती हुई आ निकली। उसके साथ दस सेवक थे, और हर सेवक सौ-सौ नायिकाओं का स्वामी। उसका द्वारपाल एक पाँच फनों वाला सर्प था, जो उसकी सब ओर से रखवाली करता था। वह भोली-भाली किशोरी थी, और विवाह के लिए किसी श्रेष्ठ पुरुष की खोज में थी।”

“पुरंजन ठहर गया। फिर पूछा, ”आप कौन हैं? यह नगर किसका है?“”

“स्त्री ने उसकी ओर देखा। ”मुझे नहीं मालूम मैं कौन हूँ, न यह जानती हूँ कि यह नगर किसने बनाया। बस इतना जानती हूँ कि मैं यहाँ हूँ, और मेरा कोई संगी नहीं। ये दस सेवक मेरे सखा हैं, और सोते समय यह सर्प जागकर इस नगर की रखवाली करता है। आप यहीं रह जाइए। हम दोनों मिलकर इस नगर में बस जाएँ, और मैं आपको सब भोग प्रस्तुत करती रहूँगी।“”

“पुरंजन को यह बात भा गई। उसने हाँ कर दी।”

“दोनों ने उस नगर में घर बसाया। सौ बरस उसी में बीते। पुरंजनी की हर बात पुरंजन के लिए कानून हो गई। वह हँसती तो वह हँसता, वह रोती तो वह रोता; वह खाती तो वह खाता, वह चलती तो वह चलता। जो-जो वह करती, वही पुरंजन भी करने लगता, जैसे पाला हुआ बन्दर अपनी मालकिन की नक़ल करता है।”

“उनके ग्यारह सौ बेटे हुए और एक सौ दस बेटियाँ, फिर उनके बच्चे, और उनके भी। पुरंजन का वंश सारे पांचाल देश में फैल गया।”

“पुरंजन उस सारे नगर का स्वामी बन बैठा। हर गली, हर दरवाज़ा, हर साँस उसी के हाथ में थी, ऐसा उसे जान पड़ता था। वह सुखी था, और उसे लगता यह सब यूँ ही चलता रहेगा।”

“सौ बरस बीत गए। पुरंजन को पता ही न चला कि कब बीते।”

पुरंजन अपने नगर का स्वामी बनकर सुखी जीवन जीता है, यह मानते हुए कि यह सदा यूँ ही चलेगा, और सौ बरस बीत जाते हैं।
पुरंजन अपने नगर का स्वामी बनकर सुखी जीवन जीता है, यह मानते हुए कि यह सदा यूँ ही चलेगा, और सौ बरस बीत जाते हैं।

“फिर एक दिन नगर की दीवारों पर धूल का बादल उठा। एक गन्धर्वराज चढ़ आया था, नाम चण्डवेग। उसके साथ तीन सौ साठ गन्धर्व योद्धा, और उतनी ही गन्धर्व-स्त्रियाँ, तीन सौ साठ। वे बारी-बारी से चक्कर लगाकर नगर को लूटने लगे।”

“उस पाँच फनों वाले सर्प ने अकेले ही उन सात सौ बीस योद्धाओं से मोर्चा सँभाला। सौ बरस तक वह अकेला उनसे जूझता रहा।”

“पर एक सर्प कितने मोर्चे सँभाले। पुरंजन देख रहा था कि उसका एकमात्र संगी प्रजागर (वह सर्प) बलहीन होता जा रहा है, और उसे अपने राष्ट्र और नगर की बड़ी चिन्ता हुई। पर स्त्री के वश में रहने के कारण इस आने वाले भय का उसे ठीक-ठीक पता न चला।”

पाँच फनों वाला प्रजागर सर्प सात सौ बीस योद्धाओं से जूझता रहा, और पुरंजन स्त्री के मोह में अपने राज्य का संकट भाँप न सका।
पाँच फनों वाला प्रजागर सर्प सात सौ बीस योद्धाओं से जूझता रहा, और पुरंजन स्त्री के मोह में अपने राज्य का संकट भाँप न सका।

“उन्हीं दिनों एक काली कन्या त्रिलोक में अपने लिए वर खोजती फिर रही थी। बड़ी अभागी थी, इसलिए लोग उसे दुर्भगा कहते थे, और कोई उसे स्वीकार न करता था। वह कालकन्या थी, जिसे लोग जरा कहते हैं, बुढ़ापे की वह कन्या जो किसी को पसन्द नहीं आती।”

“उसने मृत्युरूप यवनराज को अपना पति-रूप में वरा, और यवनराज ने उसे अपनी बहिन मान लिया। उसका भाई प्रज्वार था, शीत और उष्ण दो प्रकार का ज्वर। उन दोनों के साथ वह यवनराज अपनी भयंकर सेना लेकर सारे लोकों में विचरने लगा।”

“एक दिन वे पुरंजन के नगर पर टूट पड़े। कालकन्या ने नगर को घेर लिया, यवन सैनिक नौ दरवाज़ों से भीतर घुस आए, और नगर का विध्वंस करने लगे। कालकन्या ने जिसे छू लिया, उसकी सारी श्री नष्ट हो गई।”

“पुरंजन घबरा उठा। नगर की एक-एक ईंट दरकने लगी। पुत्र-पौत्र, सेवक और मन्त्री उसके विरुद्ध हो गए, पुरंजनी की भी सुध-बुध जाती रही, और सारा नगर पांचाल-शत्रुओं के हाथ पड़कर भ्रष्ट हो गया। इस विपत्ति से छूटने का उसे कोई उपाय न सूझा।”

पुरंजन के रूपक की कथा में जीव और मन के इस रूपक से जुड़ा अंश।
पुरंजन के रूपक की कथा में जीव और मन के इस रूपक से जुड़ा अंश।

“उसी समय यवनराज के बड़े भाई प्रज्वार ने अपने भाई को प्रिय करने के लिए सारे नगर में आग लगा दी। नगर जलने लगा, और उसका रक्षक सर्प भी, जलते वृक्ष के कोटर से निकलते साँप की तरह, वहाँ से भागने को तड़पने लगा, उसके अंग ढीले पड़ चुके थे और गन्धर्वों ने उसका सारा बल हर लिया था।”

“पुरंजन तब भी देह और घर में ‘मैं-मेरे’ की पकड़ नहीं छोड़ पाया। वह अपने पुत्र, पौत्र, बहू, दामाद, नौकर, घर और कोश के लिए सोचता रहा, हाय, मेरे जाने पर ये कैसे जिएँगे, यह बीच समुद्र में नाव टूट जाने पर बिलबिलाते यात्रियों जैसा होगा। यवनराज ने उसे यज्ञ-पशु की तरह बाँधकर खींचा, उसका वह पुराना मित्र अविज्ञात उसे अन्त तक याद न आया। जिन पशुओं की उसने कभी बलि दी थी, वे क्रोध से कुठारें लिए उसे काटने लगे, और वह अपार अन्धकार में जा गिरा।”

“अन्त समय में पुरंजन का चित्त अपनी पुरंजनी में ही लगा था। उसी चिन्तन के कारण अगले जन्म में वह सचमुच एक स्त्री हुआ, विदर्भराज के घर सुन्दरी कन्या, यह भूले हुए कि पिछली बार भी यही कथा थी।”

“जब वह कन्या विवाह-योग्य हुई, तो पाण्ड्यनरेश मलयध्वज ने समरभूमि में सब राजाओं को जीतकर उसे ब्याहा। उससे सात पुत्र हुए, जो आगे चलकर द्रविड़ देश के सात राजा हुए, और उनके करोड़ों वंशधर इस पृथ्वी पर फैल गए। अन्त में मलयध्वज पृथ्वी को पुत्रों में बाँटकर तप करने कुलाचल पर्वत चले गए, और वैदर्भी सब भोग छोड़कर उनके पीछे हो ली, जैसे चाँदनी चन्द्रमा के पीछे चलती है।”

“वहाँ मलयध्वज ने सब द्वन्द्वों को जीतकर आत्मा में ब्रह्म-भावना कर ली, और एक दिन वे शरीर छोड़ गए। पति के परलोक चले जाने से अनजान वैदर्भी उनके चरण सेवती रही; चरणों की गरमी समाप्त पाकर, तो वह झुंड से बिछुड़ी हिरनी की तरह विलाप करने लगी, और चिता बनाकर सती होने को तैयार हुई।”

पुरंजन के रूपक से जुड़ी इस कथा का एक क्षण।
पुरंजन के रूपक से जुड़ी इस कथा का एक क्षण।

“उसी घड़ी उसका वह पुराना मित्र, अविज्ञात, एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण के रूप में वहाँ आ खड़ा हुआ। उसने रोती हुई स्त्री से पूछा, ‘आप कौन हैं, किसकी पुत्री हैं, और जिसके लिए शोक कर रही हैं, वह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या आपको अपनी याद नहीं आती? मैं ही आपका वह सखा हूँ जिसके साथ आप पहले मानसरोवर पर हंस-रूप में रहती थीं। भोग की लालसा से आप मुझे छोड़कर इस पृथ्वी पर चली आईं, और यहाँ एक नौ दरवाज़ों वाला नगर रचकर उसी में भूल गईं।”’

“और इसी तरह वह जीव जन्म-जन्म घूमता रहा। हर बार नया देह, नया नाम, नया नगर। पर भीतर की कथा हर बार वही, एक नगर, एक संगिनी, बच्चे, और अन्त में वही धूल का बादल दीवारों पर।”

नारद कुछ देर रुके। प्राचीनबर्हि उन्हें ताकता रहा।

“आप समझे, राजन्?”

राजा ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं, मुनिवर। कथा सुन ली, पर भेद खुला नहीं।”

नारद हलके से मुस्कुराए।

“तो सुनिए। पुरंजन आप हैं। हर जीव है। पुरंजनी आपकी अपनी बुद्धि है, जो स्वयं नहीं जानती वह कहाँ से आई। वह नगर यह देह है, और नौ दरवाज़े इसके नौ छिद्र, जिनसे आप संसार को भीतर लेते हैं। सामने के पाँच द्वार दो आँखें, दो नथुने और मुख हैं; दायाँ कान दक्षिण का द्वार है और बायाँ कान उत्तर का; और पीछे के दो द्वार गुदा और लिंग हैं। वे दस सेवक दस इन्द्रियाँ हैं, पाँच जानने की, पाँच करने की, और उनकी सौ-सौ नायिकाएँ उन्हीं की अनगिनत वृत्तियाँ। और वह पाँच फनों वाला सर्प पाँच प्रकार का प्राण है, जो नगर को सँभाले हुए दिखता है पर भीतर ही भीतर उसी को चुका रहा है। और वह मित्र अविज्ञात, जिसे पुरंजन पहचान न सका, वही भीतर बैठा परमात्मा है, जो आरम्भ से साथ था और अन्त तक साथ रहता है।”

“चण्डवेग समय है, काल। उसके तीन सौ साठ योद्धा बरस के तीन सौ साठ दिन हैं, और उतनी ही स्त्रियाँ उतनी ही रातें।”

“हर बरस काल अपनी सेना लेकर आपके नगर पर चढ़ता है। और हर बरस नगर की एक-एक ईंट चुपचाप खिसकती जाती है, आपको पता भी नहीं चलता।”

“और कालकन्या बुढ़ापा (जरा) है। उसका भाई यवनराज मृत्यु है, और प्रज्वार शीत-उष्ण ज्वर। एक दिन वे द्वार पर आ खड़े होते हैं, और कोई दीवार उन्हें रोक नहीं पाती। उस घड़ी मन में जो अन्तिम छवि होती है, वही अगले जन्म का बीज बन जाती है। पुरंजन स्त्री का चिन्तन लेकर मरा, तो स्त्री हुआ।”

राजा कुछ देर साँस रोके बैठा रहा।

“तो इस फेरे से बाहर का रास्ता क्या है, मुनिवर?”

“एक ही रास्ता है,” नारद बोले। “नगर के भीतर रहिए, राज भी कीजिए, पर अपने को नगर मत मानिए। आप वह हैं जो भीतर बैठा सब देख रहा है, साक्षी। जिस दिन यह पकड़ में आ गया, उस दिन काल आपका नगर तो ले लेगा, पर आपको नहीं ले पाएगा। और जिसके भीतर भगवान् वासुदेव की सुदृढ़ भक्ति जाग गई, उसके लिए यह सारा जन्म-मरण का फेरा वैसे ही टूट जाता है जैसे जागने पर स्वप्न।”

राजा ने सिर झुका लिया, और बहुत देर तक कुछ न बोला।

साहित्यिक-संदर्भ

पुरंजन का यह रूपक श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 25 से 29 तक है, जहाँ देवर्षि नारद इसे राजा प्राचीनबर्हि को सुनाते हैं। पुरंजन जीव है, नौ दरवाज़ों का नगर देह, पुरंजनी बुद्धि, पाँच फनों वाला सर्प पाँच प्राण, चण्डवेग काल है और कालकन्या बुढ़ापा (जरा) है। शरीर को रूपक बनाकर आत्मा की बात कहने का यही ढंग आगे कठोपनिषद् के रथ-रूपक में भी मिलता है।

पुरंजन एक नगर का स्वामी बना बैठा था और भूल गया कि एक दिन यह नगर छूट जाएगा। काल हर बरस उसकी दीवारें खाता रहा, और वह गिनता ही नहीं था। जो आज भी अपने काम, अपने घर, अपने देह को ही ‘मैं’ मान बैठे हैं, उनके सामने यह रूपक एक ही प्रश्न रखता है, कि भीतर बैठा देखने वाला कौन है।

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