पुरंजन का रूपक

कथा 38 · भागवतम् की कथाएँ

पुरंजन का रूपक

The City with Nine Gates
स्कन्ध 4, अध्याय 25-29

नारद एक राजा से एक अनोखी कथा कह रहे थे।

”एक बार एक पुरुष था। उसका नाम पुरंजन। वो एक नई जगह बसने की तलाश में था।”

”वो जंगलों में घूमा। पहाड़ों पर चढ़ा। अंत में एक अद्भुत नगर पर पहुँचा।”

”वो नगर बहुत खास था। उसमें नौ दरवाज़े थे।”

”दो दरवाज़े सामने, ऊँचाई पर। दो उनके नीचे। एक सबसे ऊपर। एक नीचे की तरफ़। और तीन छोटे, side में।”

”नगर के अंदर बहुत से लोग, सड़कें, बाज़ार।”

”पुरंजन ने सोचा, ”यह अच्छी जगह है। मैं यहीं बसता हूँ।”

”नगर में घुसा। बीच में पहुँचा।”

”वहाँ एक रानी थी। बहुत सुन्दर। दस सहायिकाएँ उसके साथ।”

”पुरंजन ने उससे पूछा, ”तू कौन है?”

””मैं पुरंजनी। इस नगर की रानी। मेरा कोई पति नहीं है। तुम मेरे पति बन जाओ।”

”वो हाँ कर दिया।”

”पुरंजन ने पुरंजनी से विवाह किया। दोनों उस नगर में बसे।”

”उनके बहुत से बच्चे हुए। बेटे, बेटियाँ। पोते-पोतियाँ।”

”पुरंजन उस नगर का राजा बना। सब उसके control में।”

”वो बहुत खुश था। उसकी ज़िंदगी एक सपने जैसी थी।”

”एक सौ साल बीत गए।”

”एक दिन एक राक्षस-राजा ने उस नगर पर हमला किया। उसका नाम था चण्डवेग। उसके साथ 360 गन्धर्व सैनिक, और 360 स्त्री-सैनिक।”

”वो नौ दरवाज़ों से अंदर घुसने लगे।”

”पुरंजन डर गया। उसने अपनी पत्नी और बच्चों को बचाने की कोशिश की।”

”पर वो नहीं बचा पाया। पुरंजनी डर गई। बच्चे भागे। नगर हिल गया।”

पुरञ्जनः स्वभार्यां च देहं चेति पुरम् ।
नवद्वारं तदाख्यातं देहमिति निरूपणे ॥

पुरंजन यानी ”नगर में रहने वाला”। नौ-दरवाज़ों वाला नगर शरीर है। और उसमें रहने वाली आत्मा, बुद्धि-रूपी पुरंजनी के साथ, जन्म-मरण में फँसती है।

”एक रात पुरंजन ने एक खाली कमरे में पुरंजनी को रोते देखा।”

””क्या हुआ?” उसने पूछा।”

””एक मेरे पास नहीं बचा,” पुरंजनी रो रही थी। ”मैं इस नगर में अकेली हो रही हूँ।”

”पुरंजन ने उसे गले लगाया। मगर वो भी कमज़ोर हो चुका था।”

”उस रात पुरंजन ने एक स्वप्न देखा। उसमें वो एक स्त्री बना हुआ था। एक रानी की तरह।”

”वो उठा। वो स्वप्न उसके अंदर रहा।”

”अगले दिन एक भयानक राक्षस उसके नगर में आया। नाम था कालकन्या। मृत्यु की कन्या।”

”वो पुरंजन को ले गई। पुरंजन की मौत हुई।”

”पर मरते वक़्त वो जो आख़िरी सोच रहा था, वो वो स्वप्न था। एक स्त्री होने का।”

”अगले जन्म में वो एक स्त्री बना। एक रानी। उसके अपने पति थे, बच्चे थे।”

”और इसी तरह वो जन्म-जन्म घूमता रहा। हर बार एक नया शरीर। पर हर बार वही कथा। एक नगर, एक रानी, बच्चे, और अंत में एक राक्षस-attack।”

नारद ने रुककर राजा को देखा।

”क्या तुम समझे?”

राजा ने सिर हिलाया। ”नहीं, सरल नहीं।”

नारद मुस्कुराए।

”देख। पुरंजन तू है। हर एक आत्मा। पुरंजनी तेरी बुद्धि। नगर तेरा शरीर। नौ दरवाज़े, तेरी नौ इन्द्रियाँ। दस सहायिकाएँ, दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय)।”

”चण्डवेग समय है। 360 गन्धर्व 360 दिन, 360 स्त्री 360 रातें।”

”हर साल समय अपने सैनिकों के साथ हमला करता है। हर साल तेरा नगर थोड़ा-थोड़ा टूटता है।”

”कालकन्या मृत्यु है। एक दिन वो आती है। और तू जो आख़िरी सोच रहा होता है, उसी का अगला जन्म।”

राजा के होश उड़ गए।

”तो मैं इस loop से कैसे निकलूँ?”

”एक रास्ता है,” नारद बोले। ”अपने नगर का राजा रहते-रहते भी, अपने आप को नगर नहीं समझ। एक witness बन। तब तू अगले जन्म में नहीं फँसेगा।”

राजा ने सिर झुकाया।

मन्थन

पुरंजन की कथा भागवतम् का एक elaborate allegory है।

हर detail एक रूपक है। नगर शरीर। नौ दरवाज़े (दो आँख, दो कान, दो नाक, मुँह, मूत्र, मल), नौ इन्द्रिय-द्वार। पत्नी बुद्धि।

और हम सब रोज़ इस कथा को जी रहे हैं।

हम एक नगर में बस गए हैं, अपने शरीर में। हमारे साथ एक पत्नी (बुद्धि) है। बच्चे (इच्छाएँ-कर्म)। हम राजा हैं।

हम सोचते हैं हम सुरक्षित हैं।

मगर हर रोज़ चण्डवेग (समय) हमला कर रहा है। हर दिन एक थोड़ी सी क्षति। हम 30 के थे, फिर 40, फिर 50, फिर 60। हर साल कुछ कम हो रहा है।

और एक दिन कालकन्या (मृत्यु) आएगी। हमें ले जाएगी।

और जो हम आख़िरी moment में सोच रहे हैं, वही अगला जन्म।

यह कथा हमें कुछ बहुत practical कह रही है। अपने नगर को अपना मत समझ। एक witness रह।

तब हर रोज़ का loss हमें कम affect करेगा। और जब अंत आए, तब हम अपने आप को नगर से अलग पा सकेंगे।

यह वेदान्त का साधन है, बहुत साधारण भाषा में।