Lulla Family

प्रचेतागण

कथा 39 · भागवतम् की कथाएँ

प्रचेतागण

Ten Brothers in the Sea
स्कन्ध 4, अध्याय 24-31

गंगा के किनारे साँझ उतर रही थी। परीक्षित् ने जल की ओर देखा, जहाँ रोशनी काँप रही थी, और शुकदेव की ओर मुड़े।

”भगवन्, कल आपने पुरंजन की बात कही थी, वह नगरी जिसके नौ द्वार थे। मैंने सुना, और रात भर सोचता रहा कि शरीर तो छूट ही जाएगा। पर एक बात पूछनी है। जो भक्त बिना किसी कामना के भगवान को पुकारता है, सिर्फ़ दर्शन के लिए, उसे भगवान क्या देते हैं? और दर्शन के बाद उस भक्त के जीवन का बचा हुआ हिस्सा किस काम आता है?”

शुकदेव कुछ देर ख़ामोश रहे। फिर बोले, ”राजन्, यह बात मैं आपको दस भाइयों की कथा से कहूँगा। वे समुद्र के किनारे बैठे थे, और उन्होंने कुछ भी नहीं माँगा। सुनिए।”


प्राचीनबर्हि नाम के एक राजा थे, और उनके दस बेटे थे। लोग उन्हें प्रचेतस् कहते, या प्रचेतागण।

एक दिन पिता ने उन्हें पास बुलाया। ”वंश को आगे बढ़ाना है, संतान पैदा करनी है। पर उससे पहले भगवान को पाइए। बिना उनकी कृपा के कोई सृष्टि नहीं चलती।”

Ten princely brothers, the Pracetas, standing together waist-deep in a salt sea at a desolate shore, eyes closed in austerity, gaunt bodies, matted hair growing to their shoulders, evening light on rolling waves; rich classical Indian color illustration, no extra figures.

दसों भाई सिर झुकाकर निकल पड़े। समुद्र के किनारे एक जगह थी, जहाँ खारे पानी की गंध हवा में भरी रहती और लहरें रात-दिन एक ही लय में टकरातीं। वहीं वे जल के भीतर जा खड़े हुए, दसों एक साथ, अन्न तक त्यागकर।

और तपस्या शुरू हुई।

उन्होंने साँस को धीमा किया, मन को एक बिंदु पर टिकाया, और आँखें मूँद लीं।

दिन बीते, फिर महीने, फिर बरस।

वे भूखे रहे। शरीर सूखकर हड्डियों पर खिंच आए, जटाएँ कंधों तक बढ़ आईं, नमक की पपड़ी उनकी त्वचा पर जम गई। पर किसी ने पलक तक नहीं खोली।

Lord Rudra appearing in a spreading radiance from the sea before the ten kneeling brothers who bow with foreheads to the ground, Rudra blue-throated with a crescent moon on his brow and compassionate eyes, singing a hymn amid the waves; luminous classical Indian color painting.

तभी उस सूने किनारे पर एक उजाला फैला, और पास के जल से साक्षात् रुद्र प्रकट हुए। उनका कंठ नीला था, माथे पर चन्द्रमा की रेखा, और उनकी आँखों में वह करुणा जो प्रलय को भी सँभाले रखती है।

दसों भाइयों ने आँखें खोलीं और उन्हें सामने पाकर काँप उठे, फिर माथा भूमि से लगा दिया।

रुद्र ने कोमल स्वर में कहा, ”आप लोगों का मन निर्मल है, इसीलिए मैं स्वयं आया हूँ। एक स्तोत्र सुन लीजिए, यही आपकी तपस्या का सहारा बनेगा।” और उन्होंने वहीं, उस लहरों की गूँज के बीच, श्रीहरि की स्तुति गाई, वह गान जो आगे रुद्र-गीत कहलाया, नारायण के नाम और रूप की एक-एक माला।

उन्होंने कहा, ”इसी को जपते रहिए। समय आने पर वही प्रभु, जिनकी मैं वंदना करता हूँ, स्वयं आपके सामने खड़े होंगे।” इतना कहकर रुद्र अंतर्धान हो गए।

प्रचेतागण ने वह स्तोत्र हृदय में बसा लिया और फिर से आँखें मूँद लीं। इस बार उनके होंठ धीरे-धीरे हिलते रहते, श्रीहरि का नाम लेते हुए। दस हज़ार बरस इसी तरह बीत गए।

और एक दिन, उस लंबी ख़ामोशी के पार, एक स्वर आया।

Shri Hari (Vishnu) appearing before the ten brothers, riding on the shoulders of Garuda, eight long arms each holding a weapon, a vanamala forest-garland swaying among the arms, gentle smile; the ten brothers gazing up with brimming eyes from the sea-shore; vivid classical Indian color illustration.

दसों ने आँखें खोलीं। उनके सामने श्रीहरि खड़े थे, वही जिनका नाम वे जप रहे थे। गरुड़ के कंधे पर सवार, आठ लंबी भुजाएँ, हर हाथ में एक आयुध, और उन भुजाओं के घेरे के बीच लक्ष्मी-जैसी शोभावाली वनमाला झूलती हुई, और मुख पर वह स्निग्ध मुस्कान जो थके हुए को विश्राम दे देती है।

उनकी आँखें भर आईं। एक भाई ने काँपते स्वर में कहा, ”प्रभु! आप सचमुच आ गए?”

”हाँ,” श्रीहरि बोले। ”आप लोगों की लगन मुझे खींच लाई। माँगिए, क्या चाहिए?”

दसों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उनके मन में अपने लिए कोई कामना न थी, फिर भी सबने हाथ जोड़कर कहा, ”प्रभु, आपकी प्रसन्नता ही हमारा सब-कुछ है, इससे बढ़कर हमें कुछ नहीं चाहिए। फिर भी एक वर हम अवश्य माँगते हैं। जब तक आपकी माया से मोहित होकर हम अपने कर्मों के अनुसार इस संसार में भटकते रहें, तब तक जन्म-जन्म में हमें आपके प्रेमी भक्तों का संग मिलता रहे। बस इतना दे दीजिए।”

श्रीहरि मुस्कुराए। ”ऐसा ही हो। आप लोगों का परस्पर इतना प्रेम है, और मेरे प्रति यह स्नेह है, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपके पिता ने जो सृष्टि का भार सौंपा था, उसे पूरा कीजिए। आप पृथ्वी के और दिव्य भोग भोगिए, संतान से अपना वंश आगे बढ़ाइए। और अंत में, मेरी अचल भक्ति से जब हृदय की सारी वासनाएँ दग्ध हो जाएँगी, तब आप इन भोगों से ऊपर उठकर मेरे परमधाम को आएँगे।”

श्रीहरि अंतर्धान हो गए, और दसों भाई जल से बाहर निकल आए।

बाहर का संसार पहचान में ही नहीं आया।

दस हज़ार बरस की समाधि में उन्हें पता ही नहीं चला कि बाहर समय कैसे बीता। पृथ्वी पर पेड़ इतने ऊँचे और घने उग आए थे कि सूरज की किरण भी ज़मीन तक नहीं पहुँचती थी। हर ओर बस जंगल, और जंगल के नीचे छिपी हुई धरती।

न मनुष्यों के बसने को जगह बची थी, न हल चलाने को खुली ज़मीन।

प्रचेतागण को पिता का दिया भार याद आया। इतने घने जंगल में न बसना हो सकता था, न संतान बढ़ानी। उनका मन क्रोध से भर उठा, और उन्होंने अपनी हज़ारों बरस की तपस्या का तेज समेटा।

The ten Pracetas standing in a vast overgrown forest, one breathing out blazing fire from his mouth and another a fierce gale of wind, fire and wind together tearing into the towering dense trees, smoke and scorched leaves filling every direction; dramatic classical Indian color painting.

एक मुख से उन्होंने अग्नि छोड़ी, दूसरे से प्रचंड वायु। आग और हवा मिलकर पेड़ों पर टूट पड़ीं। चटकती लकड़ी की आवाज़, झुलसते पत्तों की गंध, और धुएँ का परदा हर दिशा में फैल गया।

जंगल भभककर जलने लगा।

तभी उस धुएँ के पार से एक शान्त उजाला उतरा, और साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए।

”प्रचेतागण, ठहर जाइए।”

दसों भाइयों ने अपना तेज रोक लिया।

”आप वृक्षों को भस्म कर रहे हैं,” ब्रह्माजी ने कहा। ”ये भी जीव हैं, इनका भी अपना स्थान है इस सृष्टि में। इन्हें यों समूल नष्ट करना उचित नहीं।”

”पर हमें तो धरती को बसने योग्य बनाना है,” एक भाई बोला। ”पिता का यही भार है, और संतान भी इसी धरती पर बसेगी।”

Lord Brahma, four-faced and serene, standing amid clearing smoke before the ten brothers as the surviving trees timidly come forward presenting a tender maiden, Marisha, daughter of the trees, her body soft as a new shoot with leaves tangled in her hair; warm classical Indian color illustration, no extra figures.

”वह भार क्रोध से नहीं, रचना से पूरा होगा।” ब्रह्माजी के कहने पर जो वृक्ष अब तक बचे थे, वे डरते-डरते आगे आए और एक कन्या लाकर प्रचेताओं को सौंप दी। उसका देह नई कोंपल जैसी कोमल था, बालों में पत्तियाँ उलझी थीं, और चलने पर उसके पीछे वन की गंध बहती थी।

”यह मारिषा है, वृक्षों की पुत्री। आप सब इसके साथ विवाह कीजिए। इससे जो संतान होगी, उसी से यह धरती फिर से भर उठेगी,” ब्रह्माजी ने कहा।

प्रचेतागण ठिठक गए। ”एक कन्या, और हम दस भाई?”

”हाँ,” ब्रह्माजी ने कोमलता से कहा। ”आप सब मिलकर इसके स्वामी होंगे, और कोई बैर इस घर में न आएगा।”

दसों ने सिर झुकाकर मान लिया।

विवाह हुआ।

मारिषा से उनका एक पुत्र हुआ, दक्ष, वही प्रजापति दक्ष जिन्होंने पूर्व शरीर त्यागकर यहाँ फिर जन्म लिया, और जो आगे चलकर सती के पिता हुए।

प्रचेतागण का सौंपा हुआ काम पूरा हो गया। फिर दस लाख दिव्य वर्ष तक वे गृहस्थी में भोग भोगते रहे, और जब इतने बरस बीत जाने पर उन्हें विवेक जागा, तब वे मारिषा को पुत्र के पास छोड़कर फिर एकांत में लौटे, इस बार किसी सिद्धि के लिए नहीं, केवल श्रीहरि का नाम जपते हुए, वही रुद्र-गीत जो उन्होंने उस किनारे पर सीखा था।

और एक दिन, उसी नाम में डूबे-डूबे, वे श्रीहरि के परमधाम को चले गए।

मन्थन

दस भाई, एक ही घेरे में, दस हज़ार बरस तक एक ही नाम जपते रहे। और जब प्रभु सामने आकर पूछते हैं, माँगिए क्या चाहिए, तो उनके मन में अपने लिए कोई चाह नहीं उठती। उनकी प्रसन्नता ही उन्हें सब-कुछ लगती है।

फिर भी वे एक वर माँगते हैं, और वह वर अपने लिए कोई सुख नहीं, बल्कि यह कि जब तक संसार में रहना पड़े, तब तक भक्तों का संग बना रहे। यही दास्य की परम ऊँची घड़ी है, जहाँ सेवक की एकमात्र याचना भी सत्संग की होती है, अपने भोग की नहीं।

और श्रीहरि उन्हें विश्राम पर नहीं बिठाते। वे उन्हें पिता का अधूरा भार पूरा करने भेजते हैं, भोग और संतान के बीच रहते हुए भी अपना नाम जपते रहने को कहते हैं।

भक्त को विश्राम पर नहीं बिठाया जाता। उसकी सेवा का रूप भर बदल जाता है। पहले वह आँखें मूँदे जप करता था, अब वह आँखें खोलकर वही जप कर्म में करता है।

साहित्यिक-संदर्भ

प्रचेताओं की कथा श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 24 से 31 तक फैली है। अध्याय 24 में साक्षात् रुद्र उन्हें वह स्तुति सिखाते हैं जो रुद्र-गीत कहलाती है (4.24.33 से आगे), और दस हज़ार वर्ष के तप के अंत में श्रीहरि उन्हें दर्शन देते हैं (4.30)।

प्रचेताओं की तपस्या, रुद्र-गीत और श्रीहरि-दर्शन का यह प्रसंग मैत्रेय ऋषि का विदुर को सुनाया हुआ है; बीच में आया पुरंजन का रूपक ही नारद ने प्राचीनबर्हि को सुनाया था। आगे इन्हीं प्रचेताओं के पुत्र दक्ष होते हैं, जिनकी कथा सती के प्रसंग में फिर लौटती है।

गंगा-तट पर

शुकदेव चुप हुए। गंगा पर अँधेरा घिर आया था, और दूर किसी पक्षी की आख़िरी पुकार जल पर तैरती रही।

परीक्षित् देर तक कुछ न बोले। फिर धीरे से कहा, ”भगवन्, मैंने सोचा था आप किसी बड़े वरदान की कथा सुनाएँगे। पर इन भाइयों ने अपने लिए कोई सुख नहीं माँगा, केवल भक्तों का संग माँगा, और प्रभु ने उन्हें अपने ही काम में जोड़ लिया।”

”यही तो दास्य है, राजन्,” शुकदेव ने कहा। ”जो सेवक स्वामी से अपने लिए कुछ नहीं माँगता, स्वामी उसे अपने ही काम में जोड़ लेता है। और उससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं।”

परीक्षित् ने जल की ओर देखा। ”मेरे पास भी अब गिने हुए दिन हैं, भगवन्। मैं सोचता था इन दिनों में डरते हुए कुछ माँगूँ। पर शायद बस सुनना ही मेरा काम है।”

शुकदेव मुस्कुराए, और कुछ नहीं कहा। किनारे पर हवा चली, और दिया एक पल को काँपकर फिर स्थिर हो गया।

एक पंक्ति, साथ रखने को

जिसने कुछ नहीं माँगा, उसे प्रभु ने अपना काम सौंप दिया। भक्ति का फल विश्राम नहीं, सेवा का एक नया रूप है।