प्रचेतागण

कथा 39 · भागवतम् की कथाएँ

प्रचेतागण

Ten Brothers in the Sea
स्कन्ध 4, अध्याय 24-31

एक राजा थे प्राचीनबर्हि। उनके दस बेटे थे। दस।

उनको प्रचेतस् या प्रचेतागण कहा जाता था।

एक दिन वो दस मिले। ”हमें कुछ बड़ा करना है।”

”क्या?”

”तपस्या। पर इतनी जोरदार कि देवता हिल जाएँ।”

उन्होंने एक जगह चुनी। समुद्र के बीच। एक छोटी सी टापू।

वहाँ गए। दसों भाई। एक circle में बैठे।

और तपस्या शुरू।

साँस को धीमा किया। मन को एक बिंदु पर रखा। आँखें मूँदीं।

दिन बीते। महीने। साल।

वो भूखे रहे। उनके शरीर सूख गए। उनके बाल बढ़ गए।

मगर उन्होंने आँखें नहीं खोलीं।

देव परेशान। ब्रह्मा देख रहे थे। ”इन दस भाइयों की तपस्या इतनी तीव्र है कि अगर रुकी न तो तीनों लोकों का संतुलन बिगड़ेगा।”

उन्होंने विष्णु को भेजा।

विष्णु प्रकट हुए।

”प्रचेतस्! आँखें खोलो।”

दसों ने आँखें खोलीं। उनके सामने विष्णु। चार-हाथ। शंख-चक्र-गदा-पद्म।

वो हैरान। और खुश।

”प्रभु! आप आए?”

”हाँ। तुम्हारी तपस्या से। क्या चाहिए?”

दसों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।

”हमारी कोई इच्छा नहीं। बस आप का दर्शन चाहिए था। मिल गया।”

विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, ”ठीक है। फिर भी एक काम कर। तुम्हारे पिता का राज्य खराब हालत में है। पेड़ों ने पृथ्वी ढक ली है। तुम जाओ, उसे ठीक करो।”

स्वस्ति प्रचेतसो विष्णोर्भक्तानामुत्तमोत्तमाः ।
विद्यन्ते दश सहस्राणि वर्षाणि तपसा हरेः ॥

प्रचेतस् दस हज़ार वर्ष की तपस्या के बाद, विष्णु के सबसे उत्तम भक्तों में गिने गए।

वो दसों उठे। पानी से बाहर निकले।

और देखा।

उनके निकलने का समय बहुत लंबा था। उनके तपस्या के दौरान, पृथ्वी पर पेड़ इतने बढ़ गए थे कि हर तरफ़ बस जंगल था। ज़मीन छुप गई थी।

लोग रहने को कोई जगह नहीं थी। खेती नहीं हो रही थी।

प्रचेतस् ने एक काम किया।

वो उठे। अपनी तपस्या-शक्ति इकट्ठी की।

मुँह से अग्नि निकाली। और वो दूसरे मुँह से एक तूफ़ान।

अग्नि और वायु, दोनों मिलकर पेड़ों पर। हर तरफ़ आग। हर तरफ़ धुआँ।

जंगल जलने लगा।

तभी एक देव प्रकट हुआ। चन्द्रमा।

”प्रचेतस्, रुको!”

वो भाई रुके।

”तुम पेड़ों को मार रहे हो। यह सही नहीं। पेड़ भी जीव हैं। उनका भी अपना धर्म।”

”पर हमें पृथ्वी साफ़ करनी है।”

”हाँ। पर एक compromise।”

चन्द्रमा ने हाथ बढ़ाए। एक स्त्री प्रकट हुई। बहुत सुन्दर। हरे रंग की। उसके बालों में पत्ते।

”यह मारिषा। पेड़ों की बेटी। तुम सब इसके साथ विवाह करो। फिर तुम्हारे बच्चे होंगे। उन बच्चों के साथ पृथ्वी फिर बस जाएगी।”

प्रचेतस् हैरान। ”एक स्त्री, और दस भाई?”

”हाँ। यह एक special arrangement। तुम सब इसके पति।”

वो मान गए।

विवाह हुआ।

और मारिषा से एक बेटा हुआ, दक्ष। (वही दक्ष जो बाद में सती के पिता बने।)

प्रचेतस् का काम पूरा। वो फिर तपस्या में लौटे। मगर इस बार साधारण तपस्या नहीं। उन्होंने भगवान का नाम जपा।

और एक दिन वो ख़ुद वैकुण्ठ चले गए।

मन्थन

प्रचेतस् की कथा एक interesting case है।

दस भाई। एक साथ। एक focused goal। दस हज़ार साल की तपस्या।

मगर उनकी इच्छा क्या थी? कोई नहीं।

बस ”भगवान का दर्शन।” और कुछ नहीं।

यह बहुत pure intention है। ज़्यादातर तपस्या में कोई wish होती है, कोई वरदान चाहिए। पर इन दस ने सिर्फ़ दर्शन माँगा।

और भगवान आए। बिना कुछ माँगे। बस उनकी पूरी commitment के कारण।

और फिर, भगवान ने उन्हें कोई बड़ा वर नहीं दिया। उन्होंने एक काम सौंपा। ”जाओ, पृथ्वी ठीक करो।”

क्योंकि एक भक्त को रिटायर नहीं करना है। उसे एक काम देना है।

और प्रचेतस् ने वो काम किया, मगर बीच में चन्द्रमा ने उन्हें रोका। ”पेड़ों को मत मारो।”

तब उन्होंने एक creative solution निकाला, विवाह।

इस कथा में एक quiet message है। भगवान-दर्शन end नहीं है, middle है। उसके बाद भी काम चलता है। पर वो काम अब creative है, hostile नहीं।