रास लीला
गंगा की लहरें उस सुबह कुछ धीमी थीं, जैसे वे भी सुनने को रुक गई हों। परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा, और कुछ देर कुछ कहा नहीं।
फिर बोले, ”भगवन्, एक बात मेरे मन में काँटे की तरह अटकी है। आपने कल कहा कि वही श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा के लिए उतरे थे। फिर सुना है, एक रात उन्होंने व्रज की उन स्त्रियों के साथ नृत्य किया जो दूसरों की पत्नियाँ थीं। मेरे पास गिनती के दिन बचे हैं, मुनिवर। मैं इस कथा को आधा-अधूरा समझ कर नहीं मरना चाहता। यह कैसा धर्म था?”
शुकदेव मुस्कुराए। वह मुस्कान, जो किसी प्रश्न से नहीं घबराती।
”राजन्, आपने वही पूछा जो पूछना चाहिए था। जो इसे नहीं पूछता, वह इस कथा के पास जाने योग्य ही नहीं। सुनिए। और सुनते-सुनते देखिएगा कि यह देह का खेल है या आत्मा का।”
उन्होंने आँखें मूँदीं, जैसे किसी दूर की रात को फिर से देख रहे हों।
शरद की पूर्णिमा थी। चाँद इतना भरा हुआ कि वृन्दावन की धूल भी चाँदी की लगने लगी। बेला और चमेली खिल कर महक रही थीं, और यमुना के किनारे की रेत पाँवों के नीचे ठंडी जान पड़ती थी।
श्रीकृष्ण ने अधरों से वंशी लगाई।
एक स्वर उठा। सीधा-सादा नहीं। ऐसा, जो हवा में बहुत दूर तक खिंचता चला जाता है, और लौटता नहीं।
गोकुल के घरों में गोपियाँ अपने-अपने काम में लगी थीं। कोई दूध औंटा रही थी, कोई बच्चे को थपकी दे कर सुला रही थी, कोई पति की सेवा में लगी थी।
वह स्वर कान में पड़ा।
हाथ वहीं रुक गए। थपकी अधूरी, दूध चूल्हे पर, सेवा बीच में छूटी। किसी को याद नहीं रहा कि वह क्या कर रही थी।

जिस वेश में थीं, उसी में निकल पड़ीं। कोई बाल बाँधना भूल गई, किसी की एक आँख में काजल लगा रह गया, दूसरी कोरी। किसी के वस्त्र उलटे-पलटे ही रह गए, और वह चल दी।
घर वालों ने रोकना चाहा।
किसी के पति ने पुकारा, ”कहाँ चलीं इस रात में?” किसी की सास ने टोका, ”होश में हो?”
गोपियों ने उत्तर में कुछ नहीं कहा। पाँव भर बढ़ते रहे। जो घरों में बन्द रह गईं और निकल न सकीं, वे आँखें मूँद कर मन-ही-मन श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगीं, और उसी ध्यान में अपने बन्धन तोड़ बैठीं।
यमुना के तट पर पहुँचीं, चाँदनी में भीगी हुई, साँस फूली हुई।

श्रीकृष्ण एक कदम्ब के नीचे खड़े थे। वंशी अब भी होंठों पर।
उन्होंने सबको देखा। हलकी मुस्कान आई। और फिर वह कहा जो किसी को सहना कठिन था।
”आप सब इस वक़्त यहाँ क्यों? रात गहरी है। घर हैं, बच्चे हैं, अपने-अपने लोग हैं। लौट जाइए।”
गोपियाँ एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं। बुलाया किसने, और अब लौटने को कौन कह रहा है।
एक आगे आई। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर रुकी नहीं। ”गोविन्द, हम तो आ चुकीं। अब किस घर की बात करते हैं आप? आपकी वंशी ने ही तो खींचा था। बुलाने वाले आप, और अब फेरने वाले भी आप? जिसने सब छोड़ दिया, उससे कहते हैं लौट जाओ। यह कौन-सा न्याय हुआ, प्रभु?”
श्रीकृष्ण ने उसे देर तक देखा।
जो भीतर बहता है, वह पाँव की थकान से नहीं डिगता। यही वे देख रहे थे, और देख कर शान्त हो गए।
उन्होंने सिर हिलाया, जैसे कोई बहुत पुरानी बात मान ली हो।
और तब वह हुआ, जिसे रास कहते हैं।

गोपियाँ श्रीकृष्ण को बीच में लेकर घेरे में आ खड़ी हुईं। यमुना की चाँदी-सी रेत पर वह क्रीड़ा आरम्भ हुई।
श्रीहरि ने किसी का हाथ थामा, किसी को बाँहों में लिया, किसी से हँसी-ठिठोली की, किसी को बस उन प्रेमभरी आँखों से देखा भर।
हर गोपी को यही जान पड़ा कि श्याम का स्नेह बस उसी पर बरस रहा है।
कोई उलाहना दे रही थी, ”आप हमें याद कब करते हैं, मोहन?”
कोई हँस कर पूछती, ”आज वंशी में इतनी मिठास कहाँ से आई?”
और कोई बस चुप, उन आँखों में डूबी हुई।
श्याम का प्रेम किसी पर आधा न था। जिस पर पड़ा, पूरा का पूरा पड़ा।
क्रीड़ा चलती रही। वंशी, थिरकते चरण, घूमता घेरा, सब एक ही साँस में चल रहे थे।
तभी गोपियों के मन में एक महीन-सी लहर उठी।
”हम पर इतनी कृपा है, तो हम ही धरती की सब स्त्रियों में बढ़ कर हुईं।”

सौभाग्य का वह छोटा-सा गर्व उठा ही था कि श्रीकृष्ण ओझल हो गए।
सबके बीच से, एक ही पल में, जैसे दीपक बुझ जाए।
घेरा टूट गया। हाथ हवा में रह गए।
गोपियों ने एक-दूसरे को देखा, और तब समझ आया कि अभी तक हर एक के पास श्याम थे, और अब किसी के पास नहीं।
पहले रोना नहीं आया। पहले तो बस वह सूनापन आया, जो भरे आँगन के अचानक खाली हो जाने पर आता है। फिर एक पुकार उठी, फिर दूसरी, और देखते-देखते सारा तट सिसकियों से भर गया।
वे उन्हें खोजने लगीं। कदम्ब के झुरमुट में, यमुना की रेत पर, हर झाड़ी के पीछे, हर परछाईं में।
श्याम कहीं न मिले।
थक कर गोपियाँ बालू पर बैठ गईं, और जो कुछ भीतर बचा था, उसे एक गीत में ढालने लगीं। वह गीत फिर कभी, राजन्। आज की रात यहीं ठहरती है, उस सूने तट पर, जहाँ हर गोपी अकेली थी और सब एक साथ रो रही थीं।
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, मैं जिस काँटे को लेकर बैठा था, वह अब चुभता नहीं। पर समझ अभी पूरी नहीं हुई। आप ही कहिए, यह जो हुआ, इसे संसार के स्त्री-पुरुष के प्रेम जैसा क्यों न समझा जाए?”
”इसलिए, राजन्, कि जिनके पास वे आईं, वे आप्तकाम हैं। जिसकी कोई कामना शेष नहीं, जिसे किसी से कुछ पाना नहीं, उसके लिए पाने-खोने का खेल है ही नहीं। सूर्य जल को खींचता है, पर उससे लिपटता नहीं। वैसे ही श्रीहरि ने उन प्राणों को अपनी ओर खींचा, और स्वयं निर्लेप रहे।”
”फिर वह नृत्य क्या था?”
”वह जीव की अपने मूल की ओर दौड़ थी, परीक्षित्। गोपियों ने घर, कुल, लोक-लाज, देह तक का भान छोड़ कर केवल उन्हें चाहा। यही आत्मनिवेदन है, परम भक्ति। और देखिए, हर गोपी के पास पूरा श्याम था, किसी के पास आधा नहीं। भगवान का प्रेम बँटता नहीं। जो उन्हें पाता है, पूरा पाता है।”
”पर वे ओझल क्यों हुए?”
”क्योंकि गोपियों के मन में ‘हम ही’ उठ आया। ‘हम सब स्त्रियों में बढ़ कर हैं’, यह भाव आते ही प्रेम का धरातल खिसक गया। श्रीहरि ओझल हुए तभी, जब घेरे में ‘हम ही’ खड़ा हुआ। उस गर्व को शान्त करने के लिए ही वे लोप हुए। जहाँ अहंकार आता है, वहाँ से प्रसाद उठ जाता है।”
शुकदेव की आवाज़ धीमी हुई। ”और एक बात गाँठ बाँध लीजिए, राजन्। यह केवल देखने और गाने की कथा है, करने की नहीं। साधारण प्राणी मन से भी इसका अनुकरण न करे। जो स्वयं समस्त लोकों के स्वामी हैं, उन पर वह नियम नहीं लगता जो हम पर लगता है, जैसे प्रचंड अग्नि सब कुछ भस्म कर के भी स्वयं मैली नहीं होती।”
परीक्षित् ने सिर झुका लिया, जैसे कोई बहुत भारी और बहुत कोमल चीज़ एक साथ हाथ में आ गई हो।
गंगा की एक लहर किनारे से टकराई और लौट गई। दूर कहीं एक पपीहा बोला, और रात का एक पहर और बीत गया।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम-स्कन्ध के अध्याय 29 से 33 तक की है, जिन्हें ‘रास-पंचाध्यायी’ कहते हैं। गीता प्रेस का पाठ श्रीधर स्वामी की ‘भावार्थ-दीपिका’ के अनुसार इसे विशुद्ध भक्ति के रूप में पढ़ता है, शृंगार के रूप में नहीं।
ध्यान देने की बात यह है कि शुकदेव यहाँ किसी गोपी का नाम नहीं लेते; अध्याय 30 में केवल एक प्रधान गोपी का संकेत है, जो अपने सौभाग्य के मद में खो जाती है। भागवत स्वयं इसे अनुकरण के योग्य नहीं, केवल श्रवण-कीर्तन के योग्य बताता है (10.33.30-32)।