रास लीला
शरद ऋतु की एक पूर्णिमा। आकाश में चाँद ऐसा कि उसकी रोशनी से पूरा वृन्दावन सोने जैसा दिख रहा था।
हवा ठंडी, मगर मीठी। यमुना के पानी पर चाँदनी काँप रही थी।
कृष्ण अपनी बाँसुरी निकाली।
उसने एक धुन छेड़ी। साधारण नहीं। एक ऐसी धुन जो हवा में लंबी चली जाती है।
गोकुल के घरों में गोपियाँ बैठी थीं। कुछ खाना बना रही थीं। कुछ बच्चों को सुला रही थीं। कुछ अपने पतियों के साथ बात कर रही थीं।
एक धुन कान में आई।
हर एक गोपी ने सब छोड़ा। बच्चे की सुलाई बीच में, खाना बीच में, बात बीच में।
जो कपड़े पहने थे, वैसे ही निकलीं। बिना बाल बाँधे। बिना श्रृंगार के। कुछ ने तो अपनी अंगिठी पर रोटी पलटनी थी, वो भी छोड़ कर निकलीं।
किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
पति ने कहा, ”कहाँ जा रही हो?” सास ने कहा, ”क्या पागल हो?”
गोपियों ने कुछ नहीं कहा। बस चलती गईं।
वृन्दावन के यमुना-तट पर पहुँचीं। चाँदनी में नहाई हुई।
कृष्ण वहाँ खड़ा था। एक कदम्ब के नीचे। बाँसुरी अभी बजा रहा था।
उसने गोपियों को देखा। मुस्कुराया। और एक काम किया जो uncomfortable था।
”तुम सब क्यों आ गईं? रात है। तुम्हारे घर, तुम्हारे पति। जाओ, वापस।”
गोपियों ने एक-दूसरे को देखा। यह कैसा स्वागत?
एक गोपी आगे आई। बोली, ”कृष्ण, हम आ चुकीं। अब क्या वापस जाएँ? तुम बाँसुरी बजाओगे, और हम न आएँ, यह कैसे हो सकता है? तुम्हारी आवाज़ ने हमें खींचा है। अब तुम कह रहे हो, ”वापस जाओ?” यह क्या न्याय?”
कृष्ण ने ध्यान से देखा।
वो एक test ले रहा था। यह real love है, या emotional impulse?
गोपियों का जवाब साफ़ था।
”ठीक है,” उन्होंने कहा। ”तो नृत्य।”
और तब वो हुआ जिसे रास-लीला कहते हैं।
गोपियाँ एक circle में खड़ी हुईं। कृष्ण बीच में। हर गोपी अपनी जगह पर।
और तब कृष्ण ने एक अद्भुत काम किया।
उन्होंने अपने आप को duplicate किया। दो नहीं, तीन नहीं, हज़ार नहीं। हर एक गोपी के लिए एक कृष्ण।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥
(श्रीमद्भागवत 10.29.48)
उनके सौभाग्य के मद और अहंकार को देखकर, कृष्ण ने उन्हें शान्त करने के लिए, और बाद में उन पर कृपा बरसाने के लिए, वहीं से अदृश्य हो गए।
हर गोपी को लगा, कि कृष्ण उसके साथ है। सिर्फ़ उसके साथ। कोई दूसरी गोपी नहीं।
हर गोपी का अपना duet। अपना नृत्य। अपनी बातचीत।
कोई कृष्ण से शिकायत कर रही थी, ”तुम मेरे बारे में कितनी देर में सोचते हो?”
कोई हँस रही थी, ”आज तुम्हारी बाँसुरी इतनी मीठी क्यों थी?”
कोई बस चुप-चाप उसकी आँखों में देख रही थी।
और हर एक के साथ एक कृष्ण। हर एक के साथ पूरा कृष्ण। बीच में नहीं बँटा। पूरा।
नृत्य चलता रहा। आधी रात। पूरी रात। पुराण कहते हैं, एक ब्रह्म-रात्रि। यानी एक ब्रह्मा-दिन जितना समय।
इस बीच कृष्ण की बाँसुरी, उसका नृत्य, उसका हर step, सब एक साथ हो रहा था।
देव आकाश में खड़े देख रहे थे। ऋषि भी आए, अपने योग-शरीर में। ब्रह्मा भी झुक के देख रहे थे।
एक गोपी, जिसका नाम राधा था, उसे एक पल को आभास हुआ।
”क्यों कृष्ण मेरे साथ अलग है? क्या मैं special हूँ?”
इस छोटे से अहंकार के क्षण में, कृष्ण ग़ायब हो गए।
सब गोपियों के साथ ग़ायब। एक झटके में।
और तब गोपियाँ रोने लगीं।
उन्होंने एक-दूसरे को देखा, और पाया कि सब के पास कृष्ण था। पर अब कोई के पास नहीं।
”हमारे cosmic आँख से देखो, उसने हम सब को एक साथ छोड़ा। पर हम सब को लगता था कि हम अकेली थीं उसके साथ।”
गोपियाँ कृष्ण को ढूँढने लगीं। पेड़ों के बीच। यमुना के तट पर। हर जगह।
वो नहीं मिला।
तब गोपियाँ बैठ गईं। और उन्होंने एक गीत गाया। जो भागवतम् का सबसे gorgeous हिस्सा है। ”गोपी-गीत।” पर वो अगली कथा है।
इस कथा में, इतना ही समझें कि एक पूर्णिमा की रात कुछ हुआ। एक नृत्य हुआ। और इस नृत्य ने हर एक को अकेला बना दिया, फिर एक साथ। यह paradox ही रास का असली रहस्य है।
रास-लीला भागवतम् की सबसे rich और सबसे आसानी से misunderstand की जाने वाली कथा है।
ऊपर से देखें तो यह एक romantic dance है। एक रात, चाँदनी, गोपियाँ, कृष्ण। एक picnic-jaisa।
अंदर से देखें तो यह एक deep theological statement है।
कृष्ण ने अपने आप को हर गोपी के साथ duplicate किया। हर एक के साथ पूरा। कोई एक के साथ ”ज़्यादा” नहीं, कोई के साथ ”कम” नहीं।
क्यों? क्योंकि भगवान का प्रेम बंटता नहीं है। वो हर एक को पूरा मिलता है। आप दूसरे से तुलना करोगे, तो आप जान लोगे कि आपके पास भी पूरा था।
और दूसरी बात। जब राधा को एक पल को लगा कि वो ”ख़ास” है, तब कृष्ण ग़ायब हो गए। अहंकार आते ही presence जाती है।
हम सब अपनी ज़िंदगी में यह करते हैं। हम मानते हैं हम ख़ास हैं। और इसी moment में जो असली ख़ास था, वो ग़ायब हो जाता है।
रास-लीला का सबक यह है कि भगवान का प्रेम पाने के लिए ”मैं ख़ास हूँ” की सोच को छोड़ना पड़ता है। तब आप पाते हो कि आप already ख़ास थे, बस वो ”ख़ास होने का consciousness” ही समस्या थी।