← संग्रह
क्रियाएँ
भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

रास लीला

कथा 15 · भागवतम् की कथाएँ

रास लीला

हर गोपी के साथ अकेले कृष्ण
स्कन्ध 10, अध्याय 29-33

गोपियों के मन में ‘हम ही सबमें बढ़कर’ का भाव उठा, और उसी क्षण श्याम ओझल हो गए।

रास की पूरी कथा इसी एक मोड़ पर ठहरी है।

भागवतम् 10.29-33

उन्होंने आँखें मूँदीं, जैसे किसी दूर की रात को फिर से देख रहे हों।


शरद की पूर्णिमा थी। चाँद इतना भरा हुआ कि वृन्दावन की धूल भी चाँदी की लगने लगी। बेला और चमेली खिल कर महक रही थीं, और यमुना के किनारे की रेत पाँवों के नीचे ठंडी जान पड़ती थी।

श्रीकृष्ण ने अधरों से वंशी लगाई।

एक स्वर उठा। सीधा-सादा नहीं। ऐसा, जो हवा में बहुत दूर तक खिंचता चला जाता है, और लौटता नहीं।

गोकुल के घरों में गोपियाँ अपने-अपने काम में लगी थीं। कोई दूध औंटा रही थी, कोई बच्चे को थपकी दे कर सुला रही थी, कोई पति की सेवा में लगी थी।

वह स्वर कान में पड़ा।

हाथ वहीं रुक गए। थपकी अधूरी, दूध चूल्हे पर, सेवा बीच में छूटी। किसी को याद नहीं रहा कि वह क्या कर रही थी।

पुकार सुनते ही गोपियाँ जिस वेश में थीं उसी में निकल पड़ीं, न बाल सँवारे, न घर वालों की रोक सुनी।
पुकार सुनते ही गोपियाँ जिस वेश में थीं उसी में निकल पड़ीं, न बाल सँवारे, न घर वालों की रोक सुनी।

जिस वेश में थीं, उसी में निकल पड़ीं। कोई बाल बाँधना भूल गई, किसी की एक आँख में काजल लगा रह गया, दूसरी कोरी। किसी के वस्त्र उलटे-पलटे ही रह गए, और वह चल दी।

घर वालों ने रोकना चाहा।

किसी के पति ने पुकारा, “कहाँ चलीं इस रात में?” किसी की सास ने टोका, “होश में हो?”

गोपियों ने उत्तर में कुछ नहीं कहा। पाँव भर बढ़ते रहे। जो घरों में बन्द रह गईं और निकल न सकीं, वे आँखें मूँद कर मन-ही-मन श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगीं, और उसी ध्यान में अपने बन्धन तोड़ बैठीं।

यमुना के तट पर पहुँचीं, चाँदनी में भीगी हुई, साँस फूली हुई।

पति-सास की रोक के बावजूद गोपियाँ घर से निकल आईं, चाँदनी में भीगी यमुना तट पर साँस फूली हुई पहुँचीं।
पति-सास की रोक के बावजूद गोपियाँ घर से निकल आईं, चाँदनी में भीगी यमुना तट पर साँस फूली हुई पहुँचीं।

श्रीकृष्ण एक कदम्ब के नीचे खड़े थे। वंशी अब भी होंठों पर।

उन्होंने सबको देखा। हलकी मुस्कान आई। और फिर वह कहा जो किसी को सहना कठिन था।

“आप सब इस वक़्त यहाँ क्यों? रात गहरी है। घर हैं, बच्चे हैं, अपने-अपने लोग हैं। लौट जाइए।”

गोपियाँ एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं। बुलाया किसने, और अब लौटने को कौन कह रहा है।

एक आगे आई। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर रुकी नहीं। “गोविन्द, हम तो आ चुकीं। अब किस घर की बात करते हैं आप? आपकी वंशी ने ही तो खींचा था। बुलाने वाले आप, और अब फेरने वाले भी आप? जिसने सब छोड़ दिया, उससे कहते हैं लौट जाओ। यह कौन-सा न्याय हुआ, प्रभु?”

श्रीकृष्ण ने उसे देर तक देखा।

जो भीतर बहता है, वह पाँव की थकान से नहीं डिगता। यही वे देख रहे थे, और देख कर शान्त हो गए।

उन्होंने सिर हिलाया, जैसे कोई बहुत पुरानी बात मान ली हो।

और तब वह हुआ, जिसे रास कहते हैं।

गोपियों के संग कृष्ण की रास लीला की वह अलौकिक घड़ी।
गोपियों के संग कृष्ण की रास लीला की वह अलौकिक घड़ी।

गोपियाँ श्रीकृष्ण को बीच में लेकर घेरे में आ खड़ी हुईं। यमुना की चाँदी-सी रेत पर वह क्रीड़ा आरम्भ हुई।

श्रीहरि ने किसी का हाथ थामा, किसी को बाँहों में लिया, किसी से हँसी-ठिठोली की, किसी को बस उन प्रेमभरी आँखों से देखा भर।

हर गोपी को यही जान पड़ा कि श्याम का स्नेह बस उसी पर बरस रहा है।

कोई उलाहना दे रही थी, “आप हमें याद कब करते हैं, मोहन?”

कोई हँस कर पूछती, “आज वंशी में इतनी मिठास कहाँ से आई?”

और कोई बस चुप, उन आँखों में डूबी हुई।

श्याम का प्रेम किसी पर आधा न था। जिस पर पड़ा, पूरा का पूरा पड़ा।

क्रीड़ा चलती रही। वंशी, थिरकते चरण, घूमता घेरा, सब एक ही साँस में चल रहे थे।

तभी गोपियों के मन में एक महीन-सी लहर उठी।

“हम पर इतनी कृपा है, तो हम ही धरती की सब स्त्रियों में बढ़ कर हुईं।”

रास के मध्य गोपियों के मन में अभिमान जागा कि वे धरती की सब स्त्रियों में बढ़कर हुईं।
रास के मध्य गोपियों के मन में अभिमान जागा कि वे धरती की सब स्त्रियों में बढ़कर हुईं।

सौभाग्य का वह छोटा-सा गर्व उठा ही था कि श्रीकृष्ण ओझल हो गए।

सबके बीच से, एक ही पल में, जैसे दीपक बुझ जाए।

घेरा टूट गया। हाथ हवा में रह गए।

गोपियों ने एक-दूसरे को देखा, और तब समझ आया कि अभी तक हर एक के पास श्याम थे, और अब किसी के पास नहीं।

पहले रोना नहीं आया। पहले तो बस वह सूनापन आया, जो भरे आँगन के अचानक खाली हो जाने पर आता है। फिर एक पुकार उठी, फिर दूसरी, और देखते-देखते सारा तट सिसकियों से भर गया।

वे उन्हें खोजने लगीं। कदम्ब के झुरमुट में, यमुना की रेत पर, हर झाड़ी के पीछे, हर परछाईं में।

श्याम कहीं न मिले।

थक कर गोपियाँ बालू पर बैठ गईं, और जो कुछ भीतर बचा था, उसे एक गीत में ढालने लगीं। वह गीत फिर कभी, राजन्। आज की रात यहीं ठहरती है, उस सूने तट पर, जहाँ हर गोपी अकेली थी और सब एक साथ रो रही थीं।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम-स्कन्ध के अध्याय 29 से 33 तक की है, जिन्हें ‘रास-पंचाध्यायी’ कहते हैं। गीता प्रेस का पाठ श्रीधर स्वामी की ‘भावार्थ-दीपिका’ के अनुसार इसे विशुद्ध भक्ति के रूप में पढ़ता है, शृंगार के रूप में नहीं।

ध्यान देने की बात यह है कि शुकदेव यहाँ गोपी को अनाम रखते हैं; अध्याय 30 में एक प्रधान गोपी का संकेत है, जो अपने सौभाग्य के मद में खो जाती है। भागवत स्वयं इसे अनुकरण के योग्य नहीं, केवल श्रवण-कीर्तन के योग्य बताता है (10.33.30-32)।

English