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स्यमन्तक मणि

कथा 52 · भागवतम् की कथाएँ

स्यमन्तक मणि

एक मणि, एक गुफा, और एक रीछ का अट्ठाईस दिन का संग्राम
स्कन्ध 10, अध्याय 56-57

परीक्षित् ने मुनिवर की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, अब तक आपने मुझे भगवान् की वे लीलाएँ सुनाईं जिनमें वे माखन चुराते हैं, पर्वत उठाते हैं, गोपियों के संग नाचते हैं। पर मेरे मन में एक बेचैनी है। जब किसी पर झूठा आरोप लगता है, तब वह क्रोध से जल उठता है, अपनी सफ़ाई में चीख़ता है। क्या स्वयं भगवान् पर भी कभी कोई दाग़ लगा? और यदि लगा, तो उन्होंने उसे किस अदब से धोया?”

शुकदेव मुस्कराए। उनकी आँखों में वह शान्ति थी जो किसी प्यारी बात को कहने से पहले ठहर जाती है। ”राजन्, लगा था। एक मणि के कारण द्वारका की गली-गली में यह बात फैल गई कि श्रीहरि ने चोरी की है, हत्या की है। और देखिए, उन्होंने अपनी निर्दोषता तलवार से नहीं, ख़ामोश खोज से प्रमाणित की। सुनिए।”

Painterly classical-Indian color illustration: the radiant Sun-god Surya, golden-skinned and haloed, lovingly bestowing the brilliant Syamantaka jewel upon the wealthy Yadava devotee Satrajit who kneels before him in Dvaraka; the dazzling gem blazes like a captured sun, a small heap of eight bhara of gold glints at Satrajit's feet, prosperous palace courtyard, warm gold-and-saffron palette.

द्वारका में सत्राजित् नाम का एक यदुवंशी रहता था, धन और मान से भरा हुआ। वह भगवान् सूर्य का परम भक्त था, और सूर्यदेव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके बड़े मित्र बन गए थे। उसी प्रसन्नता में सूर्य ने उसे स्यमन्तक नाम की एक मणि दी थी। वह मणि कोई साधारण रत्न न थी। उसकी आभा ऐसी थी कि देखने वाले की आँखें झुक जातीं, और हर दिन वह आठ भार सोना उगल देती थी। जिस घर में वह पूजित होकर रहती, वहाँ न दुर्भिक्ष होता, न महामारी, न कोई और अनिष्ट।

एक दिन सत्राजित् का भाई प्रसेन वही महाप्रभावशाली मणि अपने गले में पहनकर घोड़े पर शिकार खेलने वन में गया। दोपहर की धूप में वह मणि सूरज से होड़ करती जगमगाती रही।

Painterly classical-Indian color illustration: deep green forest at midday, a fierce lion pouncing on the lone rider Prasena and his horse, the gleaming Syamantaka jewel on Prasena's neck flashing like fire amid the attack; dynamic motion, dappled sunlight through dense trees, dramatic earthy greens and reds.

वन के घने भीतर एक सिंह ने उस अकेले सवार को झपट लिया। उसने घोड़े समेत प्रसेन को मार डाला और वह मणि छीन ली, मानो रक्त के बीच एक टुकड़ा आग।

Painterly classical-Indian color illustration: the ancient mighty bear-king Jambavan, dark-furred and powerful, having slain the lion, carrying the glowing Syamantaka jewel into his shadowy cave and handing it as a toy to his small infant child who giggles and turns the shining stone in tiny palms; dim cave interior lit by the jewel's glow, deep browns and amber light.

उसी वन के पर्वत में ऋक्षराज जाम्बवान् रहता था, रीछों का राजा, युगों पुराना। उस मणि की चाह में उसने सिंह को मार गिराया और मणि उठा ली। वह उसे अपनी अँधेरी गुफा में ले गया और एक नन्हे बच्चे को खेलने के लिये दे दिया, जैसे कोई खिलौना। बच्चा उस चमकते पत्थर को हथेली में घुमाता रहा और किलकारी भरता रहा।

उधर द्वारका में सत्राजित् दिन गिनता रहा। भाई न लौटा, न उसकी कोई ख़बर आई।

उसका सन्देह श्रीकृष्ण पर जा टिका। उसने खुलेआम कह दिया, ”बहुत सम्भव है, कृष्ण ने ही मेरे भाई को मरवा डाला, क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।”

बात गली-गली घूमी। द्वारका के लोग आपस में काना-फूसी करने लगे, और हर फुसफुसाहट श्रीहरि के नाम पर एक छोटा-सा दाग़ छोड़ती गई।

श्रीकृष्ण के मन में यह बात काँटे की तरह बैठ गई। यश की धूल भी मैली हो तो खलती है। पर उन्होंने न किसी को ललकारा, न अपनी सफ़ाई में एक शब्द कहा।

”जो कलंक बातों से लगा है, वह बातों से नहीं धुलेगा,” उन्होंने मन में सोचा। ”सच ख़ुद बोलेगा।” और वे नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर उसी वन की ओर निकल पड़े जहाँ प्रसेन गया था।

घास पर पड़े पगचिह्न, टूटी डाल, सूखता रक्त। एक-एक निशान पढ़ते हुए वे आगे बढ़ते रहे। पहले प्रसेन का शव मिला, घोड़े समेत सिंह का फाड़ा हुआ। पास ही सिंह के भारी पंजों के निशान मणि की दिशा में मुड़ते दिखे। उन्हीं को पकड़ते वे चले, तो आगे पर्वत पर स्वयं सिंह पड़ा मिला, किसी और बलशाली पंजे का मारा हुआ। और उस पंजे के निशान, चौड़े और गहरे, ऋक्षराजबिल नाम की एक पहाड़ी गुफा के मुँह तक जाते थे।

श्रीकृष्ण ने सब साथियों को बाहर ही ठहराया, और अकेले ही उस घोर अँधेरे में उतर गए।

भीतर नमी और मिट्टी की गंध थी, और दूर एक कोने में वही श्रेष्ठ मणि बच्चों के खिलौने सी पड़ी थी। वहाँ एक नन्हा बच्चा बैठा था, मणि को हथेलियों में नचाता, अपने आप से बातें करता। पास ही बैठी उसकी धाय एक अपरिचित पुरुष को भीतर आते देख भय से चिल्ला उठी।

श्रीकृष्ण उस मणि को लेने की इच्छा से धीरे से उस ओर बढ़े।

धाय की चीख़ सुनते ही गुफा की छाया हिली, और परम बली जाम्बवान् क्रोधित होकर सामने आ खड़ा हुआ। उसका विशाल शरीर द्वार की सारी रोशनी रोक रहा था।

”कौन हैं आप? इस बच्चे के इतने पास?” उसकी आवाज़ गुफा की दीवारों से टकराकर गहरी हो गई।

श्रीकृष्ण ने शान्ति से अपना परिचय दिया। पर जाम्बवान् भगवान् की महिमा न जान सका; उसने उन्हें एक साधारण मनुष्य समझ लिया और उनके एक शब्द पर विश्वास न किया, और उसकी आँखों में बस एक चोर दिखा जो उसके बच्चे का खिलौना छीनने आया है।

श्रीकृष्ण ने उससे कहा, ”मैं श्रीहरि हूँ, कोई तस्कर नहीं। यह मणि मुझ पर लगे झूठे कलंक की साक्षी है। इसे मुझे सौंप दीजिए।” पर रीछराज को ये शब्द किसी ढीठ चोर की चतुराई जैसे लगे।

और फिर वह संग्राम छिड़ा जो गुफा की पथरीली दीवारों में आज भी गूँजता-सा जान पड़ता है।

जाम्बवान् कोई साधारण भुजबल नहीं था। युगों पहले, रामावतार के समय, वही समुद्र लाँघने वाली सेना का एक स्तम्भ रहा था; उसने सेतु बँधते देखा था, लंका जलते देखी थी। उसकी भुजाओं में सतयुग और त्रेता का बल भरा था।

वह एक पग भी पीछे न हटा।

दो भूखे बाजों की तरह वे एक-दूसरे पर टूटे। पहले अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार चला, फिर शिलाओं का, फिर वे वृक्ष उखाड़कर एक-दूसरे पर फेंकने लगे, और अन्त में बाहुयुद्ध होने लगा। पत्थर चटके, धूल उठी, और वह बच्चा कोने में सहमा अपनी मणि सीने से चिपकाए बैठा रहा।

एक दिन बीता। दो दिन। फिर पूरा एक पक्ष।

Painterly classical-Indian color illustration: the long twenty-eight-day cave duel between blue-skinned Sri Krishna and the giant bear-king Jambavan, locked in bare-handed wrestling amid hurled boulders, uprooted trees and rising dust; in the corner the frightened infant clutches the glowing jewel to its chest; torchless cave lit by the gem, intense browns, stone-greys and Krishna's luminous blue.

अट्ठाईस दिन, बिना विश्राम, बिना सोए, बिना अन्न-जल के, वे रात-दिन वज्र-प्रहार के समान कठोर घूँसों से जूझते रहे।

अट्ठाईस दिनों के अन्त में पहली बार जाम्बवान् की भुजाएँ काँपीं। उसके शरीर की एक-एक गाँठ टूट-फूट गई, उसका उत्साह जाता रहा, और उसका बल, जो युगों से कभी न डिगा था, इस अकेले पुरुष के स्पर्श-मात्र से रिसता जा रहा था। पर वह झुका नहीं।

और तभी, थके हुए मन की किसी गहराई में, एक पुरानी पहचान सिर उठाने लगी। यह आँच, यह स्पर्श, यह अटल शान्ति, यह उसने पहले भी अनुभव की थी, युगों पहले, उस मर्यादापुरुषोत्तम में जिसकी सेवा में उसका सारा जीवन बीता था।

उसके हाथ ढीले पड़ गए। अत्यन्त विस्मित होकर, हाँफते हुए वह बोला, ”ठहरिए। आप कौन हैं? आपका यह बल इस लोक का नहीं।”

”मैं कृष्ण हूँ।”

”वही? जो उस युग में राम थे? जिनके लिए मैंने समुद्र पर पत्थर ढोए थे?”

”हाँ।”

Painterly classical-Indian color illustration: the exhausted bear-king Jambavan bowing his huge head in devotion before the calm radiant blue-skinned Sri Krishna inside the cave, his battle-strength dissolving into worship, hands folded; soft divine glow from Krishna, reverent tender mood, warm amber cave light, deep emotional surrender.

रीछराज का विशाल सिर धीरे से झुक गया, और उस झुकाव में अट्ठाईस दिनों का सारा बल पिघलकर भक्ति बन गया।

”प्रभो! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरुष भगवान् विष्णु हैं। मुझे क्षमा कीजिए। मैं अंधा था जो आपको पहचान न सका, और इतने दिन आप पर हाथ उठाता रहा।”

”इसमें आपका कोई दोष नहीं,” श्रीकृष्ण ने उस भक्त के शरीर पर अपना परम कल्याणकारी शीतल करकमल फेरते हुए कोमलता से कहा। ”मैं इस बार दूसरे रूप में आया हूँ।”

जाम्बवान् भीतर गया और बच्चे की हथेली से वही मणि लेकर श्रीकृष्ण के हाथों में रख दी।

”एक विनती और है, प्रभु,” उसने कहा। ”मेरी बेटी कुमारी जाम्बवती। इसे अपने चरणों में स्थान दीजिए। इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य क्या होगा।”

श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उसका पाणिग्रहण स्वीकार कर लिया।

उधर द्वारका में श्रीकृष्ण को गुफा से न लौटते देख बारह दिन बीत गए, और माता देवकी, रुक्मिणी, वसुदेवजी तथा सब सम्बन्धी शोक में डूब गए। द्वारकावासी सत्राजित् को भला-बुरा कहने लगे और महामाया दुर्गादेवी की शरण में जाकर उनकी उपासना करने लगे। तभी, मणि और नववधू जाम्बवती के साथ, श्रीकृष्ण द्वारका लौटे। जिन्होंने उन्हें खोया मान लिया था, वे ऐसे आनन्द में डूब गए मानो कोई मरकर लौट आया हो।

Painterly classical-Indian color illustration: the royal assembly of Dvaraka with elder King Ugrasena seated on the throne; blue-skinned Sri Krishna placing the brilliant Syamantaka jewel before the shamed Satrajit who hangs his head unable to meet anyone's eyes; courtiers watching, ornate Yadava court, rich crimson and gold palette, the jewel blazing on the floor.

राजसभा बुलाई गई। श्रीकृष्ण ने महाराज उग्रसेन के सामने मणि सत्राजित् के आगे रख दी और सारी कथा कह सुनाई। सत्राजित् का सिर लाज से इतना झुका कि वह आँख न उठा सका।

वह बड़े पश्चात्ताप में घर लौटा। बलवान् श्रीकृष्ण से विरोध करने के कारण उसके मन में भय बैठ गया था, और रात-दिन उसकी आँखों के सामने अपना अपराध नाचता रहता। अन्त में उसने मन ही मन निश्चय किया, ”धन के लोभ में मैं बड़ी मूढ़ता कर बैठा। अब मैं अपनी कन्या सत्यभामा और यह मणि, दोनों श्रीकृष्ण को सौंप दूँ। मेरे अपराध का प्रायश्चित यही है, इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं।”

वह स्वयं ये दोनों लेकर श्रीकृष्ण के पास आया और उनके चरण पकड़ लिए। ”क्षमा कीजिए, प्रभु। मैंने आप जैसे निर्मल पर कीचड़ उछाला। मेरे लोभ ने मेरी आँखों पर परदा डाल दिया था। यह मणि और यह कन्या, दोनों आप स्वीकार कीजिए।”

श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक सत्यभामा का पाणिग्रहण किया। पर मणि उन्होंने कहा, ”हम स्यमन्तक मणि न लेंगे। आप सूर्यभगवान् के भक्त हैं, इसलिये यह आपके ही पास रहे। हम तो केवल इसके फल के, अर्थात् इससे निकले सोने के अधिकारी हैं, वही आप हमें दे दिया करें।” इस प्रकार मणि सत्राजित् के ही पास रही।

इस एक खोज के अन्त में, जो कलंक मिटाने निकले थे, वे दो रानियाँ साथ ले लौटे, जाम्बवती, रीछराज की बेटी, गुफा के अँधेरे से, और सत्यभामा, उसी सत्राजित् की बेटी जिसने आरोप गढ़ा था।

मन्थन

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, मुझे सब में विचित्र वह बात लगी कि स्वयं भगवान् ने अपनी सफ़ाई में एक शब्द न कहा। जिसके पास तीनों लोक हैं, उसे झूठे आरोप से इतना क्यों खलना चाहिए, और फिर भी उसने प्रत्युत्तर के बदले ख़ामोश खोज को क्यों चुना?”

शुकदेव की आवाज़ धीमी हुई। ”राजन्, इसीलिए तो यह कथा सुनाने योग्य है। आरोप तलवार से नहीं कटता; काटो तो और गहरा बैठ जाता है। श्रीहरि जानते थे कि कलंक का एक ही शोधन है, सच को ख़ुद बोलने देना। वे लड़ने नहीं, ढूँढने निकले।”

”और देखिए उस अट्ठाईस दिन के संग्राम का अन्त,” शुकदेव ने कहा। ”जो हारा, वह सचमुच हारा नहीं। जाम्बवान् का बल चुक गया, पर उसी क्षण उसे वह मिल गया जिसकी उसने युगों प्रतीक्षा की थी, अपने राम का दर्शन, इस बार श्याम के रूप में। पराजय और कृपा एक ही साँस में उतरीं।”

”वैर से लड़ने आया रीछ भक्त निकला, लोभ से आरोप लगाने वाला सत्राजित् चरणों में झुक गया, और एक मणि के बहाने श्रीहरि ने दो घरों को अपने प्रेम से बाँध लिया। राजन्, उनकी लीला में दण्ड कहीं नहीं, बस बार-बार अपनी ओर खींचना है।”

परीक्षित् कुछ देर ठहरे रहे, मानो उस गुफा की गूँज अब भी सुन रहे हों।

साहित्यिक-संदर्भ

स्यमन्तक-मणि की यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 56 और 57 में आती है। सत्राजित् का सूर्य से मणि पाना, प्रसेन का वध, जाम्बवान्-गुहा में अट्ठाईस दिन का संग्राम, और जाम्बवती तथा सत्यभामा का विवाह, सब इसी प्रसंग में हैं।

परम्परा में यह प्रसंग भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी की रात चन्द्रदर्शन से बचने की लोकरीति से जोड़ा जाता है; उस रात झूठे कलंक का भय माना गया है, जैसा श्रीकृष्ण पर लगा। गीताप्रेस गोरखपुर का पाठ यहाँ आधार है; मणि अन्ततः सत्राजित् के ही पास रहती है, श्रीकृष्ण उसे स्वीकार नहीं करते।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

स्यमन्तक एक रत्न था जो सत्पुरुष के पास जाकर समृद्धि देता और लोभी के हाथ में पड़कर विनाश लाता। धन, यश, बल, सब इसी मणि जैसे हैं। पात्र मिले तो ये सेवा बन जाते हैं, अपात्र मिले तो अहंकार और कलह। और जब बेक़सूर पर कीचड़ उछले, तब श्रीहरि की राह यही है, सफ़ाई में चीख़ने के बदले चुपचाप सच को ढूँढ लाना; सच जब बोलता है, तो आरोप लगाने वाला स्वयं झुक आता है।