स्यमन्तक मणि

कथा 52 · भागवतम् की कथाएँ

स्यमन्तक मणि

A Diamond, A Cave, And a Bear
स्कन्ध 10, अध्याय 56-57

द्वारका में सत्राजित एक यदुवंशी था। उसके पास एक special मणि थी, स्यमन्तक।

यह मणि सूर्य देव से मिली थी। उसकी एक special quality, हर रोज़ आठ भर सोना देती।

एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन शिकार पर गया। वो स्यमन्तक मणि पहनकर गया।

जंगल में, एक शेर ने उसे मार डाला। मणि शेर के मुँह में।

एक भालू, जाम्बवान, उस शेर को मारा। मणि ले लिया। अपनी गुफा में ले गया। अपनी बेटी जाम्बवती को खिलौने की तरह दिया।

उधर सत्राजित को पता चला कि भाई वापस नहीं आया।

उसने आरोप लगाया, ”कृष्ण ने मणि चुराई। कृष्ण ने ही मेरे भाई को मारा।”

द्वारका में यह बात फैल गई।

कृष्ण को बहुत बुरा लगा। ”मुझ पर ऐसा आरोप?”

उन्होंने decision लिया। ”मैं ख़ुद ढूँढूँगा।”

वो जंगल गए। प्रसेन का शव मिला। शेर का नक़शा मिला। फिर शेर का शव। फिर भालू के पैरों के निशान।

नक़शों के following, वो जाम्बवान की गुफा पहुँचे।

अंदर गए।

वहाँ जाम्बवती मणि से खेल रही थी।

कृष्ण ने उसकी तरफ़ बढ़ा।

तभी जाम्बवान आ गया।

”कौन है तू? मेरी बेटी के पास?”

कृष्ण ने अपना परिचय दिया। पर जाम्बवान ने नहीं माना।

अहं श्रीहरिः स्वतोऽहं नायं तस्करस्तव ।
दुर्बले मणिमालास्तां मे प्रदापयैव त्वं प्रभो ॥

जब जाम्बवान ने कृष्ण को पहचाना, उन्होंने कहा, ”मैं श्रीहरि हूँ। मैं चोर नहीं। मणि मुझे दीजिए, मेरे प्रभु।”

लड़ाई शुरू।

जाम्बवान एक powerful भालू था। बहुत पुराना। पहले रामायण में राम का सेनापति था।

वो कृष्ण से नहीं हट रहा था।

गुफा के अंदर एक भयानक मल्ल-युद्ध।

एक दिन। दो दिन। एक हफ़्ता।

अठाईस दिन। बिना रुके।

जाम्बवान को धीरे-धीरे कमज़ोरी आने लगी। पर वो हार नहीं रहा था।

तभी जाम्बवान ने एक पल को एक बात महसूस की।

इस आदमी की energy। यह energy उसने पहले देखी थी। राम में।

”एक मिनट। तू कौन है?”

”मैं कृष्ण।”

”तू वो ही है? जो राम थे, इस जन्म में?”

”हाँ।”

जाम्बवान ने अपना सिर झुकाया।

”प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैंने आपको पहचाना नहीं।”

”तेरी ग़लती नहीं। मैं इस form में हूँ।”

जाम्बवान ने मणि लाई। कृष्ण को सौंपी।

”एक और बात,” उसने कहा। ”मेरी बेटी जाम्बवती। यह आप के साथ रहे। आप का सम्मान।”

कृष्ण ने हाँ कहा।

वो जाम्बवती और मणि के साथ द्वारका लौटे।

जब वो आए, सब चकित। सत्राजित को शर्म।

उसने कृष्ण के पैर छुए। ”क्षमा करें। मैंने ग़लत आरोप लगाया।”

”ठीक है।”

”मेरी एक बेटी है। सत्यभामा। उससे विवाह कीजिए। मेरी ग़लती का प्रायश्चित।”

कृष्ण ने हाँ कहा। और सत्यभामा भी कृष्ण की पत्नी बनीं।

तो इस एक adventure में, कृष्ण ने दो पत्नियाँ पाईं। जाम्बवती (भालू-राजा की बेटी) और सत्यभामा (आरोप लगाने वाले की बेटी)।

मन्थन

स्यमन्तक मणि की कथा एक detective story जैसी है।

एक आरोप। एक missing person। एक खोज। एक twist (शेर-भालू)। एक मुठभेड़। एक resolution।

और बीच में, कृष्ण ख़ुद एक detective बने।

मगर इस कथा का असली message कुछ और है।

कृष्ण ने एक आरोप का जवाब लड़ाई से नहीं दिया। ख़ुद ख़ुद को defend नहीं किया।

उन्होंने एक काम किया, सच ढूँढने का।

और यह बहुत सिखाने वाली बात है। हम अक्सर आरोपों पर react करते हैं, हमला करते हैं, अपना ego defend करते हैं।

कृष्ण ने quietly काम किया। सबूत इकट्ठा किए। सच मिला।

जब सच सामने आया, आरोप लगाने वाला ख़ुद माफ़ी माँगने आया।

एक और बात। कृष्ण ने जाम्बवान से लड़ाई की, मगर जब वो हार रहा था, कृष्ण ने उसे नहीं मारा। बस एक नई पहचान दी, ”मैं राम था जो तू ने सेवा की।”

और जाम्बवान, जो हार रहा था, उसे winner-feeling मिली। ”ओह, मैंने तो भगवान को पहचाना।”

एक elegant resolution।