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अक्रूर का दर्शन

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कथा 27 · भागवतम् की कथाएँ

अक्रूर का दर्शन

यमुना के जल में जो दिखा
स्कन्ध 10, अध्याय 38-41

कंस को ख़बर लग चुकी थी कि कृष्ण और बलराम गोकुल में नंद के घर पल रहे हैं, बड़े हो रहे हैं।

उसके भेजे हुए सब मारे जा चुके थे। पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, एक के बाद एक राख। राक्षस-सेना का नाम तक न बचा।

अब उसने आख़िरी चाल सोची। धनुर्यज्ञ का बहाना बनाकर दोनों भाइयों को मथुरा बुलाओ, और अपनी आँखों के सामने, अपने अखाड़े में, उन्हें मरवा दो।

उसने अपने एक भरोसेमंद आदमी को बुलाया, अक्रूर को।

अक्रूर यदुवंश के थे, श्वफल्क के पुत्र और वसुदेव के कुटुम्बी। वे कंस के दरबार में सेवा करते थे और मन श्रीहरि में लगा रहता था।

अक्रूर को गोकुल जाकर कृष्ण-बलराम को न्योता देने की आज्ञा मिली, और भीतर एक साथ भय और उल्लास उमड़ पड़े।
अक्रूर को गोकुल जाकर कृष्ण-बलराम को न्योता देने की आज्ञा मिली, और भीतर एक साथ भय और उल्लास उमड़ पड़े।

“अक्रूर, आप गोकुल जाइए। धनुर्यज्ञ का न्योता देकर कृष्ण और बलराम को मथुरा ले आइए। बाक़ी हम सँभाल लेंगे।”

अक्रूर ने सिर झुका लिया। भीतर दो आँधियाँ एक साथ चल पड़ीं।

एक ओर राजा का आदेश, जिसके पीछे कौन-सी मंशा है, वह जानता था और मना भी नहीं कर सकता था।

दूसरी ओर वह बात, जिसे सोचकर उसकी साँस तेज़ हो जाती थी। वर्षों से जिसका नाम लिया था, उसे अब आँखों से देख सकेगा।

कंस की आज्ञा से अक्रूर गोकुल जाने को थे, भीतर ही भीतर वर्षों की चाही हुई कृष्ण-दर्शन की आस से विचलित।
कंस की आज्ञा से अक्रूर गोकुल जाने को थे, भीतर ही भीतर वर्षों की चाही हुई कृष्ण-दर्शन की आस से विचलित।

उस रात वह मथुरा में ही रहा। सवेरा होते ही उसने रथ जुतवाया और गोकुल की ओर चल पड़ा।

पहियों की धमक के साथ-साथ उसके भीतर भी कुछ धड़कता रहा। धूल उड़ती रही, और उसके मन में एक के बाद एक विचार उठते रहे।

“मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी तपस्या की है, जो आज मुझे भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन होंगे? बड़े-बड़े योगी जिनके चरणों को केवल ध्यान में पाते हैं, उन्हीं को आज मैं अपनी आँखों से देखूँगा।”

फिर मन डगमगा जाता, “मैं तो कंस का दूत हूँ। उसी के भेजने से जा रहा हूँ। कहीं वे मुझे अपना शत्रु तो न समझ बैठेंगे?”

और फिर अपने ही मन को समझा लेता, “नहीं। वे तो निर्विकार हैं, सबके भीतर और बाहर बसे हैं, हर मन की एक-एक चेष्टा को जानते हैं। वे मेरी शंका को भी जानते होंगे। मैं हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा, और वे मुस्कुराकर मुझे अपने हृदय से लगा लेंगे। उसी क्षण मेरे जन्म-जन्म के अशुभ संस्कार धुल जाएँगे।”

इसी चिंतन में डूबा-डूबा वह मार्ग काटता रहा।

गोकुल पहुँचते-पहुँचते सूरज ढलने लगा था। गोष्ठ के पास पहुँचकर उसकी दृष्टि भूमि पर पड़ी, और वहीं अटक गई।

श्रीहरि के चरण-चिह्नों की धूल देखकर अक्रूर रथ से कूद पड़े और उसी रज में लोटने लगे।
श्रीहरि के चरण-चिह्नों की धूल देखकर अक्रूर रथ से कूद पड़े और उसी रज में लोटने लगे।

धूल में श्रीहरि के चरणों के चिह्न थे। कमल, जौ, अंकुश और ध्वजा के निशान, जिनसे वह मिट्टी ही दमक रही थी।

दर्शन की ऐसी उमंग उठी कि अक्रूर अपने को सँभाल न सका। वह रथ से कूद पड़ा और उन्हीं चरण-चिह्नों की धूल में लोटने लगा, “अहो! यह मेरे प्रभु के चरणों की रज है।”

फिर वह गोदोहन के स्थान पर पहुँचा, जहाँ दोनों भाई गायों के बीच खड़े थे।

अक्रूर चरण चिह्नों की धूल में लोट चुके, अब गोदोहन स्थल पर श्यामसुन्दर कृष्ण और बलराम को साक्षात् देख रहे।
अक्रूर चरण चिह्नों की धूल में लोट चुके, अब गोदोहन स्थल पर श्यामसुन्दर कृष्ण और बलराम को साक्षात् देख रहे।

श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण पीताम्बर पहने थे, गौरसुन्दर बलराम नीलाम्बर। दोनों के नेत्र शरत्काल के खिले कमल जैसे। अभी किशोर अवस्था में पैर रखा ही था। घुटनों तक झूलती भुजाएँ, मनोहर बदन, और चलते तो ऐसा जान पड़ता मानो दया चल रही हो।

उन्हें देखते ही अक्रूर का गला रुँध गया। वह रथ से उतरा और दोनों के चरणों पर दण्ड की तरह गिर पड़ा। नेत्रों से आँसू बहने लगे, सारा शरीर पुलकित हो उठा, और उमंग से उसका कंठ ऐसा भर आया कि वह अपना नाम तक न बता सका।

शरणागत पर वत्सल भगवान् उसके मन का भाव जान गए। उन्होंने चक्र-चिह्नित हाथों से उसे खींचकर उठाया और हृदय से लगा लिया। बलराम ने भी उसे गले लगाया। फिर दोनों भाई उसका एक-एक हाथ थामे उसे घर ले चले।

घर ले जाकर उन्होंने कुशल-मंगल पूछा, श्रेष्ठ आसन पर बैठाया, विधिपूर्वक उसके पाँव पखारे और मधुपर्क भेंट किया। एक गाय दी, पैर दबाकर उसकी थकान दूर की, और बड़े आदर से उसे भोजन कराया। तब नंदबाबा ने पास आकर पूछा, “अक्रूरजी, उस निर्दयी कंस के रहते आप लोग किस तरह दिन काटते हैं?”

रात ढली। भोजन के बाद, सब शांत हुआ, तब श्रीकृष्ण स्वयं अक्रूर के पास आ बैठे और सहज भाव से पूछा, “चाचाजी, मथुरा में सब कुशल तो है? मामा कंस का हमारे कुल के साथ क्या व्यवहार है? वह किस उद्देश्य से आपको दूत बनाकर हमारे पास भेज रहे हैं?”

अक्रूर ने सब कह सुनाया। कंस ने यदुवंशियों से कैसा घोर वैर ठान रखा है, वसुदेवजी को मारने तक का यत्न कैसे किया, धनुर्यज्ञ के बहाने यह न्योता किसलिए भेजा है, और नारदजी ने कंस को क्या-क्या बता दिया है।

सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम हँस पड़े। फिर उन्होंने नंदबाबा को कंस की आज्ञा सुना दी। नंदबाबा ने गोपों को आदेश दिया कि सारा गोरस इकट्ठा कर लो, भेंट की सामग्री ले लो और छकड़े जोड़ लो, क्योंकि सवेरे ही सब मथुरा चलेंगे।

दिन भर जिस स्वागत की आशा उन्होंने की थी, वह दीप जलते-जलते पूरी हो चुकी थी। आसन, भोजन, आलिंगन और श्रीकृष्ण के मुख से “चाचाजी” का सम्बोधन, सब मिल चुका था।

सवेरे तीनों रथ पर सवार हुए। कृष्ण, बलराम और अक्रूर।

सवेरे कृष्ण, बलराम और अक्रूर रथ पर सवार होकर मथुरा की ओर प्रस्थान करते हैं।
सवेरे कृष्ण, बलराम और अक्रूर रथ पर सवार होकर मथुरा की ओर प्रस्थान करते हैं।

गोपियाँ रात भर विरह में जागती रही थीं। किसी को देह की सुध न रही; किसी को कृष्ण की बातें, मुसकान, गायों के पीछे धूल में सना उनका संध्या का लौटना और रास की रातें याद आती रहीं। रथ चला तो वे लोक-लाज छोड़ उसके पीछे दौड़ीं और पुकारती रहीं, “गोविन्द! दामोदर! माधव!”

श्रीकृष्ण ने दूत के द्वारा लौट आने का सन्देश देकर उन्हें धीरज बँधाया। रथ की ध्वजा दिखती रही तो वे देखती रहीं। ध्वजा ओझल हुई तो उड़ती धूल पर दृष्टि टिकी रही। धूल भी बैठ गई, तब वे चित्रलिखी-सी खड़ी रह गईं। अन्त में व्रज लौटकर वे श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाने लगीं।

रास्ते में यमुना मिली, अपने उसी धीमे, हरे जल के साथ।

अक्रूर ने रथ रोक दिया।

“ज़रा ठहरिए। मुझे यमुना के कुण्ड में स्नान कर लेने दीजिए।”

उसने दोनों भाइयों को रथ पर बैठाया और जल में पैर रखे। ठंडक पिंडलियों से होती हुई ऊपर चढ़ी।

उसने एक डुबकी लगाई और सनातन ब्रह्म का जप, गायत्री का जप मन में दोहराने लगा।

जब सिर ऊपर उठाया, तो आँखें खुली की खुली रह गईं।

अक्रूर यमुना में डुबकी लगाकर गायत्री जप करते रहे, सिर ऊपर उठाया तो आँखें अचरज से खुली की खुली रह गईं।
अक्रूर यमुना में डुबकी लगाकर गायत्री जप करते रहे, सिर ऊपर उठाया तो आँखें अचरज से खुली की खुली रह गईं।

जल के भीतर उसी कृष्ण और बलराम बैठे दिखे जिन्हें वह रथ पर छोड़ आया था। पर वे वैसे न थे। साक्षात् अनन्तदेव शेषजी सहस्र फणों पर मुकुट धारे विराजमान थे, और सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा देवगण सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे थे।

उन्हीं की गोद में मेघ-सा श्यामवर्ण, चतुर्भुज, परम शांत श्रीहरि। पीताम्बर। शंख, चक्र, गदा और पद्म थामे चार भुजाएँ। वक्ष पर श्रीवत्स, गले में कौस्तुभ और वनमाला। और चारों ओर ऐसी आभा कि जल भी जैसे साँस रोके खड़ा था।

अक्रूर ने आँखें मूँद लीं। “कहीं यह मेरे मन का भ्रम तो नहीं।”

फिर पलकें उठाईं।

वही दृश्य, जल के भीतर, अपनी पूरी शांति के साथ।

उसका कंठ रुँध गया, और जल में ही आँसू बहने लगे।

“हे प्रभु!”

हाथ जोड़कर वही स्तुति उसके मुँह से बह निकली जो भीतर वर्षों से जमा थी।

“आपको नमस्कार है। आप प्रकृति आदि समस्त कारणों के परम कारण हैं, अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रिय, सब-के-सब आपके ही अंगस्वरूप हैं। आप समस्त वृत्तियों के साक्षी हैं, सबके भीतर और बाहर बसे हैं। बड़े-बड़े योगी जिन्हें केवल ध्यान में खोजते हैं, उन्हीं आपके चरणों की धूल मेरे माथे पर रहे, यही मेरी सारी कामना है।”

वह रोता रहा, कमर तक जल में डूबा हुआ, हाथ जोड़े।

बाहर रथ पर कृष्ण और बलराम बैठे थे, शांत। कुछ कहने की आवश्यकता न थी। भीतर जो बीत रहा था, वे जानते थे।

कुछ देर बाद अक्रूर जल से बाहर आया। आँखें लाल, देह अब भी काँपती हुई।

वह रथ पर लौटा तो श्रीकृष्ण ने पूछा, “चाचाजी! आपने पृथ्वी, आकाश या जल में कोई अद्भुत वस्तु देखी है क्या? आपकी आकृति देखकर ऐसा ही जान पड़ता है।”

अक्रूर ने कहा, “प्रभो! पृथ्वी, आकाश और जल के जितने अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आप में ही हैं। आपको देखते हुए ऐसी कौन-सी अद्भुत वस्तु रह जाती है जो मैंने न देखी हो?”

यह कहकर उन्होंने रथ हाँक दिया। दिन ढलते-ढलते वे श्रीकृष्ण और बलराम को लेकर मथुरा पहुँचे, जहाँ नन्दबाबा और व्रज के गोप नगर के बाहर एक उपवन में उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय अड़तीस से इकतालीस तक का अनुसरण करती है। यमुना-स्नान के बीच अक्रूर को जल में शेषशायी श्रीहरि और संकर्षण (बलराम) का दर्शन होता है, और वे प्रसिद्ध अक्रूर-स्तुति करते हैं। गोपियों का विरह-दृश्य यमुना पहुँचने से पहले, रथ के व्रज से निकलते समय आता है। अध्याय इकतालीस के आरम्भिक श्लोक कथा को उसका प्रामाणिक समापन देते हैं: श्रीकृष्ण आश्चर्य का कारण पूछते हैं और अक्रूर उत्तर देते हैं कि संसार के सारे आश्चर्य उन्हीं में हैं।

ध्यान रहे, यह कृष्ण का गीता-वाला विश्वरूप नहीं, बल्कि वैकुण्ठ-रूप का दर्शन है, जैसा गीता प्रेस संस्करण में वर्णित है।

अक्रूर वर्षों दूर रहकर, कंस का काम लिए चला आया, और यमुना में एक डुबकी के बीच उसे वह दिख गया जिसे योगी समाधि में ढूँढ़ते हैं। झलक पल भर की थी, पर वही उसके बाक़ी जीवन को सँभाले रही। पास रहना नहीं, भीतर की प्यास देखना सिखाती है।

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