अक्रूर का दर्शन

कथा 27 · भागवतम् की कथाएँ

अक्रूर का दर्शन

What He Saw Under the Yamuna
स्कन्ध 10, अध्याय 38-40

कंस को पता चला था कि कृष्ण और बलराम मथुरा से बाहर हैं। गोकुल में, ग्वाले के घर। बड़े हो रहे हैं।

उसके कई plans fail हो गए थे। पूतना, बकासुर, अघासुर, सब। राक्षस-सेना नष्ट।

एक last try। उसने सोचा, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाओ। मल्ल-युद्ध के बहाने। और वहाँ, ख़ुद अपने सामने, उन्हें मरवा दो।

उसने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी अक्रूर को बुलाया।

अक्रूर एक यदुवंशी था। कंस का दूर का रिश्तेदार। पर अंदर से एक भक्त। कृष्ण को मन में पूजता था, मगर कंस के दरबार में था।

”अक्रूर, तू गोकुल जा। कृष्ण और बलराम को धनुर्यज्ञ के बहाने मथुरा ले आ। वहाँ हम उन्हें ख़त्म करेंगे।”

अक्रूर ने सिर झुका लिया। उसके अंदर एक conflict था।

एक तरफ़, राजा का आदेश। मना नहीं कर सकता।

दूसरी तरफ़, कृष्ण से मिलने का मौक़ा। यह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना था।

वो अपना रथ निकाला। मथुरा से गोकुल का सफ़र। एक पूरा दिन।

रास्ते में उसके मन में बहुत हलचल।

”क्या मैं सच में कृष्ण को देख पाऊँगा?” ”क्या वो मुझे अपना मान लेंगे?” ”क्या मेरा यह काम पाप है?”

उसकी आँखों में आँसू। उसने सोचा, ”चाहे जो हो, मैं उन्हें देख तो लूँगा। एक बार। फिर जो हो वो हो।”

रात हो गई जब वो गोकुल पहुँचा।

उसका रथ नंद बाबा के घर के सामने रुका।

द्वार पर एक छोटा सा बच्चा खड़ा था। शायद नौ-दस साल का। साँवला। मुस्कुराता हुआ।

”आइए, अक्रूर चाचा। मैं आपका इंतज़ार कर रहा था।”

अक्रूर हैरान। बच्चे ने उसका नाम कैसे जाना?

बच्चे ने रथ से उसे उतारा। हाथ पकड़ा। गाँव के अंदर ले गया।

उसने रास्ते में कहा, ”आप एक ख़ास मिशन पर आए हैं, ना? मामा कंस ने भेजा। मैं समझता हूँ।”

अक्रूर के सिर पर पसीना। ”नहीं नहीं, यह तो…”

”कोई बात नहीं। मैं चलता हूँ। मामा को ख़ुश करेंगे। पहले रात बिताइए। फिर सुबह चलते हैं।”

रात भर अक्रूर सो नहीं पाया। वो जिसके बारे में बहुत साल से सुना था, वो उसके सामने थे। बच्चा। मगर बच्चा नहीं।

सुबह तीनों चले। कृष्ण, बलराम, अक्रूर। रथ में।

रास्ते में यमुना आई।

अक्रूर ने रथ रोका।

”एक मिनट। मुझे यमुना में स्नान करना है। मेरी रोज़ की आदत है।”

वो रथ से उतरा। नदी में उतरा।

पानी ठंडा था। उसने डुबकी ली।

जब वो ऊपर आया, तो उसकी आँखें फटी रह गईं।

अहो भाग्यं तस्मादद्य पादौ ते हृष्टमानसः ।
स्पृशामि कृष्ण भगवन्नियच्छति समाधयः ॥

हे कृष्ण, क्या भाग्य है मेरा। मैं आज खुश-मन से आपके चरण छू रहा हूँ। योगी जिनके लिए समाधि में बैठते हैं, वो आज मेरे सामने हैं।

पानी के नीचे, उसने कृष्ण और बलराम को देखा। नहीं, उन्हें नहीं। बल्कि शेषनाग पर लेटे विष्णु, और उनके पास खड़े बलराम-जैसे एक पुरुष।

विष्णु की पूरी image। चार-हाथ। शंख-चक्र-गदा-पद्म। नीला रंग। दिव्य चमक।

अक्रूर ने आँखें बंद कीं। ”शायद मैं भ्रम में हूँ।”

फिर खोलीं।

वही दृश्य। पानी के नीचे।

उसने रोना शुरू किया। पानी में।

”हे प्रभु!”

उसने तुरंत एक स्तुति शुरू की। जो भागवतम् में आती है। बहुत प्रसिद्ध।

”आपको नमस्कार है। आप कारण के कारण हैं। आप सब के ईश्वर हैं। आप के पैरों की धूल मेरे सिर पर हो।”

वो रोता रहा। पानी में।

बाहर रथ में कृष्ण और बलराम बैठे थे। उन्हें कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं थी। वो जानते थे क्या हो रहा है।

थोड़ी देर बाद, अक्रूर बाहर आया। उसकी आँखें लाल। उसका शरीर हिलता हुआ।

वो रथ में बैठा। कृष्ण को देखा।

”प्रभु!”

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, ”अक्रूर चाचा, क्या हुआ? पानी ठंडा था?”

वो बच्चा था फिर। साधारण।

अक्रूर समझ गया। कृष्ण अपना असली रूप दिखाते हैं, मगर तुरंत वापस छुपा लेते हैं। यह सिर्फ़ उसके लिए था, एक छोटा सा reward, उसकी सालों की भक्ति का।

वो मथुरा गए। और बाक़ी कथा कंस-वध की।

मगर अक्रूर के लिए, यह यात्रा बदल गई थी। वो कंस के दरबार में लौटा, पर अब अंदर से बदला हुआ।

बाद में, जब कंस मारा गया, अक्रूर ने एक काम किया। उसने कंस के कुछ दूर के रिश्तेदारों से एक मूल्यवान मणि चुराई थी, सालों पहले। उसने पश्चाताप में वो मणि कृष्ण को सौंप दी। और अपनी बाक़ी ज़िंदगी कृष्ण के पास, द्वारका में, बिताई।

मन्थन

अक्रूर की कथा एक sleeper hit है।

ज़्यादातर लोग कृष्ण के साथ रहते थे, मगर देख नहीं पाते थे।

एक यशोदा। उसने कृष्ण को ब्रह्मांड दिखाते देखा था (मुँह खोलकर), मगर तुरंत भूल गई।

ग्वाले देखते रहते थे, पर साधारण बच्चा समझते थे।

अक्रूर एक outsider था। मथुरा का। कंस का दूत। और उसी को, यमुना में, असली दर्शन हुआ।

क्यों? क्योंकि उसके अंदर एक तीव्र चाह थी। उसने कृष्ण को इतना सोचा, इतना याद किया, कि जब मिले, तो पहचान सकता था।

नज़दीकी हमेशा देखने में help नहीं करती। अक्सर दूरी help करती है। दूर से जो खींचा गया, वो जब पास आता है, तो असली रूप देख सकता है।

और एक बात। यमुना में जो दर्शन हुआ, वो एक secret था। कृष्ण ने तुरंत अपना asli रूप छुपा लिया, और बच्चा बन गए। क्यों? क्योंकि अक्रूर के लिए वो enough था। एक झलक।

हमारे जीवन में भी ऐसे moments आते हैं। एक झलक। एक हलकी सी realization। फिर वो ग़ायब। पर एक बार जो देखा, वो भूलता नहीं। और वही भीतर बैठा रहता है, हमारे आगे के सब काम बदलता हुआ।