अक्रूर का दर्शन
साँझ उतर रही थी। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, कल आपने बताया था कि किस तरह यशोदा माता ने अपने लाला के मुँह में सारे लोक देखे और फिर भूल गईं। मेरे मन में एक बात अटकी है। जो लोग दिन-रात उनके पास रहे, वे उन्हें पहचान न सके, और जो दूर बैठा रहा, उसे झलक मिल गई। यह कैसे होता है, मुनिवर? पास होना ही काफ़ी नहीं?”
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आई, जैसी कृष्ण-कथा छेड़ने से पहले हर बार आती थी।
”राजन्, एक यदुवंशी था अक्रूर। वह कंस के दरबार में रहता था, मथुरा में, श्रीहरि से कोसों दूर। और उसी को यमुना के जल में वह दर्शन हुआ जिसके लिए योगी जन्मों तक समाधि साधते हैं। सुनिए।”
कंस को ख़बर लग चुकी थी कि कृष्ण और बलराम गोकुल में नंद के घर पल रहे हैं, बड़े हो रहे हैं।
उसके भेजे हुए सब मारे जा चुके थे। पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, एक के बाद एक राख। राक्षस-सेना का नाम तक न बचा।
अब उसने आख़िरी चाल सोची। धनुर्यज्ञ का बहाना बनाकर दोनों भाइयों को मथुरा बुलाओ, और अपनी आँखों के सामने, अपने अखाड़े में, उन्हें मरवा दो।
उसने अपने एक भरोसेमंद आदमी को बुलाया, अक्रूर को।
अक्रूर यदुवंश का था, कंस का दूर का रिश्तेदार। दरबार में बैठता था, पर भीतर ही भीतर वर्षों से एक ही नाम जपता था। श्रीहरि का नाम मन में, और कंस की सेवा हाथों में।

”अक्रूर, आप गोकुल जाइए। धनुर्यज्ञ का न्योता देकर कृष्ण और बलराम को मथुरा ले आइए। बाक़ी हम सँभाल लेंगे।”
अक्रूर ने सिर झुका लिया। भीतर दो आँधियाँ एक साथ चल पड़ीं।
एक ओर राजा का आदेश, जिसके पीछे कौन-सी मंशा है, वह जानता था और मना भी नहीं कर सकता था।
दूसरी ओर वह बात, जिसे सोचकर उसकी साँस तेज़ हो जाती थी। वर्षों से जिसका नाम लिया था, उसे अब आँखों से देख सकेगा।

उस रात वह मथुरा में ही रहा। सवेरा होते ही उसने रथ जुतवाया और गोकुल की ओर चल पड़ा।
पहियों की धमक के साथ-साथ उसके भीतर भी कुछ धड़कता रहा। धूल उड़ती रही, और उसके मन में एक के बाद एक विचार उठते रहे।
”मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी तपस्या की है, जो आज मुझे भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन होंगे? बड़े-बड़े योगी जिनके चरणों को केवल ध्यान में पाते हैं, उन्हीं को आज मैं अपनी आँखों से देखूँगा।”
फिर मन डगमगा जाता, ”मैं तो कंस का दूत हूँ। उसी के भेजने से जा रहा हूँ। कहीं वे मुझे अपना शत्रु तो न समझ बैठेंगे?”
और फिर अपने ही मन को समझा लेता, ”नहीं। वे तो निर्विकार हैं, सबके भीतर और बाहर बसे हैं, हर मन की एक-एक चेष्टा को जानते हैं। वे मेरी शंका को भी जानते होंगे। मैं हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा, और वे मुस्कुराकर मुझे अपने हृदय से लगा लेंगे। उसी क्षण मेरे जन्म-जन्म के अशुभ संस्कार धुल जाएँगे।”
इसी चिंतन में डूबा-डूबा वह मार्ग काटता रहा।
गोकुल पहुँचते-पहुँचते सूरज ढलने लगा था। गोष्ठ के पास पहुँचकर उसकी दृष्टि भूमि पर पड़ी, और वहीं अटक गई।

धूल में श्रीहरि के चरणों के चिह्न थे। कमल, जौ, अंकुश और ध्वजा के निशान, जिनसे वह मिट्टी ही दमक रही थी।
दर्शन की ऐसी उमंग उठी कि अक्रूर अपने को सँभाल न सका। वह रथ से कूद पड़ा और उन्हीं चरण-चिह्नों की धूल में लोटने लगा, ”अहो! यह मेरे प्रभु के चरणों की रज है।”
फिर वह गोदोहन के स्थान पर पहुँचा, जहाँ दोनों भाई गायों के बीच खड़े थे।

श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण पीताम्बर पहने थे, गौरसुन्दर बलराम नीलाम्बर। दोनों के नेत्र शरत्काल के खिले कमल जैसे। अभी किशोर अवस्था में पैर रखा ही था। घुटनों तक झूलती भुजाएँ, मनोहर बदन, और चलते तो ऐसा जान पड़ता मानो दया चल रही हो।
उन्हें देखते ही अक्रूर का गला रुँध गया। वह रथ से उतरा और दोनों के चरणों पर दण्ड की तरह गिर पड़ा। नेत्रों से आँसू बहने लगे, रोम-रोम खिल उठा, और उमंग से उसका कंठ ऐसा भर आया कि वह अपना नाम तक न बता सका।
शरणागत पर वत्सल भगवान् उसके मन का भाव जान गए। उन्होंने चक्र-चिह्नित हाथों से उसे खींचकर उठाया और हृदय से लगा लिया। बलराम ने भी उसे गले लगाया। फिर दोनों भाई उसका एक-एक हाथ थामे उसे घर ले चले।
घर ले जाकर उन्होंने कुशल-मंगल पूछा, श्रेष्ठ आसन पर बैठाया, विधिपूर्वक उसके पाँव पखारे और मधुपर्क भेंट किया। एक गाय दी, पैर दबाकर उसकी थकान दूर की, और बड़े आदर से उसे भोजन कराया। तब नंदबाबा ने पास आकर पूछा, ”अक्रूरजी, उस निर्दयी कंस के रहते आप लोग किस तरह दिन काटते हैं?”
रात ढली। भोजन के बाद, सब शांत हुआ, तब श्रीकृष्ण स्वयं अक्रूर के पास आ बैठे और सहज भाव से पूछा, ”चाचाजी, मथुरा में सब कुशल तो है? मामा कंस का हमारे कुल के साथ क्या व्यवहार है? वह किस उद्देश्य से आपको दूत बनाकर हमारे पास भेज रहे हैं?”
अक्रूर ने सब कह सुनाया। कंस ने यदुवंशियों से कैसा घोर वैर ठान रखा है, वसुदेवजी को मारने तक का यत्न कैसे किया, धनुर्यज्ञ के बहाने यह न्योता किसलिए भेजा है, और नारदजी ने कंस को क्या-क्या बता दिया है।
सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम हँस पड़े। फिर उन्होंने नंदबाबा को कंस की आज्ञा सुना दी। नंदबाबा ने गोपों को आदेश दिया कि सारा गोरस इकट्ठा कर लो, भेंट की सामग्री ले लो और छकड़े जोड़ लो, क्योंकि सवेरे ही सब मथुरा चलेंगे।
उस रात अक्रूर की आँख न लगी। वर्षों जिसका नाम सुना था, वही सामने था। एक किशोर के रूप में, और फिर भी कोई था जो उससे कहीं बड़ा था।
सवेरे तीनों रथ पर सवार हुए। कृष्ण, बलराम और अक्रूर।
रास्ते में यमुना मिली, अपने उसी धीमे, हरे जल के साथ।
अक्रूर ने रथ रोक दिया।
”ज़रा ठहरिए। मुझे यमुना के कुण्ड में स्नान कर लेने दीजिए।”
उसने दोनों भाइयों को रथ पर बैठाया और जल में पैर रखे। ठंडक पिंडलियों से होती हुई ऊपर चढ़ी।
उसने एक डुबकी लगाई और सनातन ब्रह्म का जप, गायत्री का जप मन में दोहराने लगा।
जब सिर ऊपर उठाया, तो आँखें खुली की खुली रह गईं।

जल के भीतर उसी कृष्ण और बलराम बैठे दिखे जिन्हें वह रथ पर छोड़ आया था। पर वे वैसे न थे। साक्षात् अनन्तदेव शेषजी सहस्र फणों पर मुकुट धारे विराजमान थे, और सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा देवगण सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे थे।
उन्हीं की गोद में मेघ-सा श्यामवर्ण, चतुर्भुज, परम शांत श्रीहरि। पीताम्बर। शंख, चक्र, गदा और पद्म थामे चार भुजाएँ। वक्ष पर श्रीवत्स, गले में कौस्तुभ और वनमाला। और चारों ओर ऐसी आभा कि जल भी जैसे साँस रोके खड़ा था।
अक्रूर ने आँखें मूँद लीं। ”कहीं यह मेरे मन का भ्रम तो नहीं।”
फिर पलकें उठाईं।
वही दृश्य, जल के भीतर, अपनी पूरी शांति के साथ।
उसका कंठ रुँध गया, और जल में ही आँसू बहने लगे।
”हे प्रभु!”
हाथ जोड़कर वही स्तुति उसके मुँह से बह निकली जो भीतर वर्षों से जमा थी।
”आपको नमस्कार है। आप प्रकृति आदि समस्त कारणों के परम कारण हैं, अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रिय, सब-के-सब आपके ही अंगस्वरूप हैं। आप समस्त वृत्तियों के साक्षी हैं, सबके भीतर और बाहर बसे हैं। बड़े-बड़े योगी जिन्हें केवल ध्यान में खोजते हैं, उन्हीं आपके चरणों की धूल मेरे माथे पर रहे, यही मेरी सारी कामना है।”
वह रोता रहा, कमर तक जल में डूबा हुआ, हाथ जोड़े।
बाहर रथ पर कृष्ण और बलराम बैठे थे, शांत। कुछ कहने की आवश्यकता न थी। भीतर जो बीत रहा था, वे जानते थे।
कुछ देर बाद अक्रूर जल से बाहर आया। आँखें लाल, देह अब भी काँपती हुई।
वह रथ पर लौट आया और कृष्ण की ओर देखा।
”प्रभु!”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, ”क्या हुआ, अक्रूर चाचा? पानी बहुत ठंडा था क्या?”
वही किशोर फिर सामने था। साधारण, हँसता हुआ, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
अक्रूर समझ गया। जिसे योगी ढूँढ़ते रह जाते हैं, उसने स्वयं एक झलक दिखा दी, और उसी पल फिर अपने सहज रूप में लौट गए। वह दर्शन केवल उसके लिए था, उसकी वर्षों की पुकार का उत्तर।
रथ आगे बढ़ा, और गोकुल पीछे छूटता गया। पर गोकुल चुपचाप नहीं छूटा।

गोपियाँ रथ के पीछे दौड़ीं। श्यामसुन्दर के मथुरा जाने की बात सुनते ही उनके हृदय में ऐसी जलन उठी थी कि गरम साँस चलने लगी, मुखकमल कुम्हला गए। वे कुछ कह न सकीं, बस रथ के पहियों को देखती रहीं।
रथ की ध्वजा और उड़ती धूल जब तक दिखती रही, तब तक वे चित्रलिखी-सी वहीं खड़ी रहीं। फिर रथ की लीकें ज़मीन पर रह गईं। गोपियाँ उन्हीं लीकों पर झुकीं, और जिस मिट्टी पर उनके श्याम का रथ चला था, उसे आँचल से ढाँपे खड़ी रहीं, जैसे वही अब उनके पास बचा हो।
अक्रूर ने पीछे मुड़कर देखा। उसे जो भीतर मिला था, उन्हें वही बाहर खोता हुआ दिखा।
आगे की कथा मथुरा की है, कंस-वध की। पर अक्रूर के लिए यह यात्रा वहीं, यमुना के जल में पूरी हो चुकी थी। वह कंस के दरबार में लौटा, पर अब उसके भीतर वह दृश्य बस चुका था, और हर काम को बदल रहा था।
कंस के अंत के बाद उसने अपना शेष जीवन श्रीहरि के पास, द्वारका में बिताया, उसी एक झलक के सहारे, जो कभी धुँधली न पड़ी।
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”मुनिवर, गोकुल में कितने ही लोग दिन-रात उनके पास रहे। यशोदा माता ने तो उनके मुँह में सारे लोक देख लिए थे। फिर भी वह झलक एक बाहरी आदमी को, कंस के दूत को मिली। यह कैसे?”
शुकदेव ने बहती हुई धारा की ओर देखा और कहा, ”राजन्, पास होना और देख पाना एक बात नहीं। अक्रूर मथुरा में रहा, दूर रहा, पर वर्षों तक उनका नाम मन में जलाता रहा। जिसने इतनी तीव्रता से पुकारा हो, वह जब सामने आता है, तो पहचान लेता है।”
”कभी-कभी दूरी ही प्यास को गहरा करती है। दूर से जो खिंचा चला आता है, उसकी आँखें पास आकर वह देख लेती हैं जो रोज़ साथ रहने वालों से छूट जाता है।”
परीक्षित् ने पूछा, ”और वह दर्शन भी पल भर का रहा। उन्होंने तुरंत अपना रूप छिपा लिया।”
”एक झलक ही उसके लिए पूरी थी, राजन्। श्रीहरि उतना ही देते हैं जितना भक्त सँभाल सके। पर जो एक बार सच्चे मन से देख लिया जाता है, वह फिर भीतर से कभी नहीं मिटता। अक्रूर दरबार लौटा, द्वारका गया, जीवन भर वही एक झलक उसके हर काम को रोशनी देती रही।”
शुकदेव क्षण भर रुके। ”आपके भी सात दिनों में, राजन्, ऐसी ही एक झलक काफ़ी है।”
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय अड़तीस से चालीस तक है। यमुना-स्नान के बीच अक्रूर को जल में शेषशायी श्रीहरि और संकर्षण (बलराम) के रूप का दर्शन होता है, और वे प्रसिद्ध अक्रूर-स्तुति करते हैं। मथुरा-प्रस्थान के समय गोपियों का विरह यहीं आरंभ होता है, जो आगे भ्रमर-गीत तक चलता है।
ध्यान रहे, यह कृष्ण का गीता-वाला विश्वरूप नहीं, बल्कि वैकुण्ठ-रूप का दर्शन है, जैसा गीता प्रेस संस्करण में वर्णित है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
अक्रूर वर्षों दूर रहकर, कंस का काम लिए चला आया, और यमुना में एक डुबकी के बीच उसे वह दिख गया जिसे योगी समाधि में ढूँढ़ते हैं। झलक पल भर की थी, पर वही उसके बाक़ी जीवन को सँभाले रही। पास रहना नहीं, भीतर की प्यास देखना सिखाती है।
यही कथा वहाँ भी
- हरिवंश · अक्रूर और मथुरा की राह
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