Lulla Family

ब्रह्मा विमोहन

कथा 26 · भागवतम् की कथाएँ

ब्रह्मा विमोहन

जिसने सबको छिपाया, उसी ने सबमें अपने को पाया
स्कन्ध 10, अध्याय 13-14

परीक्षित् ने मुनिवर की ओर देखा और कहा, ”भगवन्, अब तक आपने मुझे वह कृष्ण दिखाए जो पूतना को तारते हैं, जो कालिय के फनों पर नाचते हैं। मन डरना भूलने लगा है। पर एक बात समझ नहीं आती। वही नन्हा बालक, जो अपनी माँ के आँचल में सोता है, और वही सबका स्वामी, यह दोनों एक कैसे हैं? मेरे पास गिनती के दिन हैं, मुनिवर। मैं उस एक को पहचान कर जाना चाहता हूँ।”

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर उनके होंठों पर वह हल्की-सी मुसकान आई जो कृष्ण-कथा के समय ही आती थी।

”राजन्, यही प्रश्न एक दिन स्वयं ब्रह्मा के मन में उठा था। और उन्होंने इसका उत्तर पाने के लिए जो किया, उसमें उन्हीं की हार हुई, और सारे व्रज को एक बरस का अनमोल वरदान मिल गया। सुनिए।”

वृन्दावन के उस छोर पर सुबह की धूप अभी घास पर से ओस सुखा रही थी। कान्हा हर रोज़ की तरह अपने ग्वाल-सखाओं को हाँक लगाते, बछड़े रँभाते हुए इकट्ठा होते, और सब टोली बाँधकर चल पड़ते, कभी किसी चरागाह की ओर, कभी यमुना के किनारे।

उस दिन वे बछड़े चराते-चराते यमुना के पुलिन पर आ पहुँचे। कान्हा, ग्वाल-बाल, और उनके बछड़े। श्यामसुंदर ने सबको रोककर कहा, ”देखिए तो सही, यहाँ की बालू कितनी कोमल और साफ़ है। एक ओर रंग-बिरंगे कमल खिले हैं और उन पर भौंरे गुंजार कर रहे हैं, दूसरी ओर सुन्दर पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं। दिन भी काफ़ी चढ़ आया है और हम सब भूख से पीड़ित हो रहे हैं। बछड़े पानी पीकर पास ही धीरे-धीरे घास चरते रहें, और हम लोग यहीं भोजन कर लें।”

ग्वाल-बालों ने एक स्वर में कहा, ”ठीक है, ठीक है!” उन्होंने बछड़ों को पानी पिलाकर हरी घास में छोड़ दिया और अपनी-अपनी पोटलियाँ खोलीं, जो भोर में उनकी माओं ने बाँध दी थीं। घी से सना दही-भात, और अदरक-नींबू आदि का अचार-मुरब्बा। ग्वालों का सीधा-सादा भोजन, जिसमें घर की गंध बसी रहती है।

Painterly classical-Indian color scene on the soft sand of the Yamuna bank: the young cowherd boys (gopas) sit in a ring eating their packed curd-rice meals, with little Krishna (Shyamasundar), dark-blue-skinned and crowned with a peacock feather, seated radiant in the very centre, so the circle looks like lotus petals around the flower's calyx; blossoming lotuses, hovering bees and bright birds nearby, grazing calves at the edge.

वे सब एक घेरा बनाकर बैठ गए, बीचों-बीच श्यामसुंदर, और हर एक के सामने उसका खाना खुला हुआ। दूर से देखिए तो जान पड़ता, मानो कमल की कर्णिका के चारों ओर उसकी पँखुड़ियाँ सजी हों।

खाते-खाते हँसी-ठिठोली चलती रही, किसकी पोटली में क्या है। कोई पत्ते को दोना बना लेता, कोई फूल को, कोई कोंपल या छाल को, तो कोई पत्थर के टुकड़े को ही थाली बना बैठता। कान्हा अपनी विनोदभरी बातों से सबको हँसाते जाते, किसी के हाथ का कौर उठाकर अपने मुँह में रख लेते, किसी के मुँह में अपना कौर रख देते। बायें हाथ में दही-भात का कौर लिए, अँगुलियों में अचार-मुरब्बा दबाए, मुरली कमर की फेंट में और सींगी-बेंत बगल में दबाए, वे बीच में यों शोभा पा रहे थे, मानो साक्षात् यज्ञभोक्ता ही बाल-लीला कर रहे हों। स्वर्ग के देवता तक यह अद्भुत लीला विस्मय से देख रहे थे।

इसी बीच बछड़े हरी-हरी घास के लोभ में न जाने कहाँ दूर खिसक गए।

”अरे, बछड़े तो दिख ही नहीं रहे!”

कान्हा ने हँसकर कहा, ”आप लोग बेफ़िक्र होकर खाते रहिए। हम अभी ढूँढ लाते हैं।”

और बायें हाथ में दही-भात का वही कौर लिए ही वे उठे, बछड़ों की खोज में पहाड़ों, गुफाओं और कुंजों की ओर चल पड़े, यही सोचते हुए कि वे भला दूर कहाँ गए होंगे।

पर उसी घड़ी ऊपर, अपने लोक में, ब्रह्मा यह सारा दृश्य निहार रहे थे।

जिनके हाथों से जीव-जीव रचा जाता है, उन्हें अघासुर के उद्धार पर बड़ा विस्मय हुआ था। मन में आया, ”लीला से मनुष्य-बालक बने हुए इस श्यामसुंदर की कोई और मनोहर महिमा देखनी चाहिए।”

Four-headed Brahma in the sky above Vrindavan, swan-borne and luminous, using his yogic power to lift the herd of calves up and away through the air to hide them in a hidden cave; below, the unaware cowherd boys still eat by the river. Classical-Indian color illustration, devotional tone.

और उन्होंने पहले अपनी योगशक्ति से सारे बछड़ों को उठाकर अन्यत्र ले जाकर छिपा दिया।

कान्हा पहाड़ों, गुफाओं और कुंजों में ढूँढते रहे, पर बछड़ों का कहीं पता न चला।

वे यमुना के पुलिन की ओर लौटे। पर तब तक ब्रह्मा एक और काम कर चुके थे। बछड़ों को खोजने कान्हा के चले जाने पर उन्होंने उसी योगशक्ति से सारे ग्वाल-सखाओं को भी उठाकर अन्यत्र छिपा दिया, और स्वयं अन्तर्धान हो गए।

अब उस पुलिन पर श्यामसुंदर अकेले खड़े थे। न बछड़े, न सखा, खाने की खुली पोटलियाँ बस यों ही पड़ी थीं।

उन्होंने एक नज़र चारों ओर दौड़ाई, और भीतर ही भीतर सब समझ गए कि यह तो सर्वज्ञ ब्रह्मा की करतूत है। होंठों पर वही चपल मुसकान लौट आई।

”अच्छा, तो पितामह यह खेल खेल रहे हैं।”

और फिर सर्वशक्तिमान् ने अपने बछड़ों और ग्वाल-बालों की माताओं को तथा ब्रह्मा को भी आनन्दित करने के लिए ऐसी लीला रची, जिसे देखकर सृष्टि का रचयिता ही चकरा गया।

Krishna on the Yamuna bank expanding himself into countless identical forms: rows of identical blue Kanha boys, each with peacock-feather crown, flute and herding stick, and a matching calf beside each, all utterly alike in size, dress and ornament; one inner radiance shining through every form. Rich painterly classical-Indian color art conveying many-as-one.

उन्होंने अपने ही से अनगिनत रूप रच डाले। हर खोए हुए ग्वाले के बदले एक कान्हा, हर खोए बछड़े के बदले एक बछड़ा।

और हर रूप हू-ब-हू वैसा ही। संख्या में जितने थे उतने ही, शरीर जितने छोटे थे उतने ही, हाथ-पैर जैसे थे वैसे ही, जिसकी जितनी और जैसी छड़ी, सींगी, बाँसुरी, पत्ते और छीके थे, जैसे वस्त्राभूषण थे, वही शील, वही स्वभाव, वही गुण, वही नाम, वही रूप और वैसी ही अवस्थाएँ। हर एक ठीक उतना ही, जितना वह बालक था। पर भीतर हर एक में वही एक श्यामसुंदर, और ‘यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है’, मानो यह वेदवाणी ही मूर्तिमती होकर प्रकट हो गई हो।

शाम ढली, और ये सब अपने-अपने घर लौट गए। किसी माँ-बाप को कानोंकान ख़बर न हुई। बछड़े बाड़े में आ गए, बच्चे आँगन में। माएँ निहाल। ”आ गया मेरा लाल?”

Evening in the Vraja village courtyards: gopi mothers, hearing the flute, run out and lift the Kanha-formed boys into their laps against their chests to nurse them, then anoint them with oil and sandal paste and dress them in fine clothes and ornaments; cows licking their new calves nearby. Warm domestic classical-Indian color scene.

बाँसुरी की तान सुनते ही माताएँ दौड़ आतीं, इन कान्हा-रूप बालकों को गोद में उठाकर छाती से लगा लेतीं, और स्नेह की अधिकता से सुधा से भी मधुर अपना दूध उन्हें पिलातीं। उन्हें उबटन लगातीं, नहलातीं, चन्दन का लेप करतीं, अच्छे-अच्छे वस्त्र और गहने पहनातीं।

इसी तरह पूरा एक बरस बीत गया।

और जिन घरों में ये पल रहे थे, वहाँ माँ-बाप को अपने ये बच्चे पहले से कहीं अधिक प्यारे जान पड़ने लगे। अपने-अपने बालकों के प्रति उनकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन धीरे-धीरे बढ़ती ही गई। उन्हें पता न था कि अब हर आँगन में स्वयं श्यामसुंदर उनके अपने लाल का रूप धरे बैठे हैं।

व्रज की गायों तक का यही हाल था। अपने नए बछड़ों को देखते ही उनके थन अपने आप दूध से भर आते, और वे पगलाई-सी उन्हें चाटती रहतीं।

जब एक वर्ष पूरा होने में पाँच-छः रातें शेष थीं, तब एक दिन श्यामसुंदर बलराम के साथ बछड़ों को चराते हुए वन में गए। उस समय गायें गोवर्धन की चोटी पर घास चर रही थीं, और वहाँ से उन्होंने व्रज के पास ही घास चरते हुए अपने बछड़ों को बहुत दूर देखा। बछड़ों को देखते ही गौओं का वात्सल्य उमड़ आया। वे ग्वालों के रोकने की परवा न कर बड़े वेग से उनकी ओर दौड़ पड़ीं और स्नेहवश अपने बच्चों को चाटने लगीं। गोपों ने उन्हें रोकने का बहुत यत्न किया, पर सब व्यर्थ रहा। बड़े कष्ट से जब वे उस कठिन मार्ग से उस स्थान पर पहुँचे, तब अपने-अपने बालकों को देखते ही उनका हृदय प्रेम-रस से सराबोर हो गया, उनका क्रोध न जाने कहाँ हवा हो गया। उन्होंने अपने-अपने बालकों को गोद में उठाकर हृदय से लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर परम आनन्द पाया।

बलराम ने देखा कि व्रजवासी गोप, गौएँ और ग्वालिनें अपने उन सन्तानों पर, जिन्होंने अपनी माँ का दूध पीना तक छोड़ दिया है, क्षण-प्रतिक्षण और अधिक स्नेह उँडेल रही हैं। उन्हें इसका कारण मालूम न था, इसलिए वे विचार में पड़ गए। ”यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्ण में व्रजवासियों का और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ों पर भी बढ़ता जा रहा है। यह कौन-सी माया है? देवता की, मनुष्य की, या असुर की? नहीं, यह तो मेरे प्रभु की ही माया है।”

यों सोचकर बलराम ने ज्ञानदृष्टि से देखा, तो उन्हें मालूम हुआ कि इन सब बछड़ों और ग्वाल-बालों के रूप में केवल श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, और श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा की सारी करतूत उन्हें कह सुनाई। बलराम ने सब बातें जान लीं।

उधर बरस भर बाद, अपने मान से तो बस एक पल बीतने पर, ब्रह्मा लौटे, यह देखने कि उनकी परीक्षा का क्या हुआ।

उन्होंने देखा, सब कुछ ज्यों का त्यों था। ग्वाले अपने काम में लगे, बछड़े वृन्दावन में चरते, नंद और यशोदा अपने लाल पर निछावर।

”यह कैसे? मैंने तो इन सबको अपने हाथों छिपा दिया था।”

उन्होंने अपनी ज्ञानदृष्टि टिकाकर देखा, कि कौन-से पहले के ग्वाल-बाल हैं और कौन-से पीछे बने।

और जो दिखा, उससे उनके पैरों तले की धरती खिसक गई।

हर ग्वाला, हर बछड़ा, हर बालक, एक-एक करके, सब के सब साक्षात् श्यामसुंदर थे।

Brahma's overwhelming vision: every boy and every calf revealed as four-armed Vishnu-Krishna in yellow silk (pitambara) and peacock-feather crown, holding conch, discus, mace and lotus, one being in innumerable forms; at the feet of each, all creatures from other Brahmas down to blades of grass dance and worship with offerings, the twenty-four cosmic principles standing with folded hands. Majestic painterly classical-Indian color illustration.

हर एक के भीतर वही एक चेतना झलक रही थी। वही पीताम्बर, वही मोरपंख का मुकुट, शंख, चक्र, गदा और पद्म से युक्त चतुर्भुज रूप, असंख्य रूपों में एक ही। और हर एक के चरणों में, उन्होंने देखा, उन्हीं के जैसे दूसरे ब्रह्मा से लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकार की पूजा-सामग्री से उनकी उपासना कर रहे थे, और काल, स्वभाव, संस्कार, कामना, कर्म आदि चौबीसों तत्त्व भी हाथ जोड़े खड़े थे।

ब्रह्मा की सुध-बुध जाती रही। ग्यारहों इन्द्रियाँ क्षुब्ध और स्तब्ध रह गईं। कुछ क्षण वे न हिल सके, न पलक झपका सके, मानो व्रज के अधिष्ठातृ-देवता के पास एक पुतली खड़ी हो।

”यह मैंने क्या कर डाला? मैंने उसकी परीक्षा लेनी चाही, जिसकी एक चितवन से मेरा अपना जन्म हुआ? मैं हूँ ही कौन?”

तब श्रीकृष्ण ने बिना किसी प्रयत्न के अपनी माया का परदा हटा दिया। ब्रह्मा को बाह्यज्ञान हुआ, मानो वे मरकर फिर जी उठे हों। उन्होंने ज्यों-त्यों करके बड़े कष्ट से अपने नेत्र खोले, और तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखाई पड़ा।

उन्होंने देखा, श्यामसुंदर अब भी अकेले, बायें हाथ में दही-भात का वही कौर लिए, वैसे ही अपने ग्वालबाल और बछड़ों को ढूँढ रहे हैं, मानो अभी-अभी उनकी खोज में निकले हों।

Humbled four-headed Brahma leaps down from his swan vehicle and falls flat like a rod on the ground before child Krishna, touching Krishna's lotus-feet with the tips of his four crowns and bathing them with streaming tears of joy; little Shyamasundar stands gently smiling, still holding a morsel of curd-rice in his left hand. Reverent classical-Indian color scene on the Yamuna bank.

भगवान् को देखते ही ब्रह्मा अपने वाहन हंस पर से कूद पड़े, और सोने के समान चमकते हुए अपने शरीर से पृथ्वी पर दण्ड की भाँति गिर पड़े। उन्होंने अपने चारों मुकुटों के अग्रभाग से श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का स्पर्श करके नमस्कार किया और आनन्द के आँसुओं की धारा से उन्हें नहला दिया।

”प्रभु, क्षमा कीजिए। मैं अपने अहंकार में अंधा था। मैं स्वयं को कर्ता मान बैठा था। आप कौन हैं, यह मेरी पकड़ से बाहर था।”

कान्हा मुसकराए। उन्होंने नन्हे हाथ से ब्रह्मा के सिर को सहलाया, जैसे कोई बालक किसी बूढ़े को दिलासा दे रहा हो।

”पितामह, उठिए। आपके इस खेल से मेरे व्रज को एक पूरा बरस मेरा साथ मिल गया, अपने ही लालों के रूप में। आप जानते न थे, पर आपकी यह परीक्षा एक वरदान बन गई।”

”अब जिन्हें आपने छिपा रखा है, उन्हें लौटा दीजिए।”

ब्रह्मा ने छिपाए हुए सच्चे बालक, सच्चे बछड़े लौटा दिए। और जो रूप कान्हा ने धरे थे, वे चुपचाप उनमें समा गए।

किसी को कुछ भनक तक न लगी। बालकों को लगा, अभी तो वे खाना खाकर बछड़े ढूँढने निकले थे, बस एक पल हुआ है।

मन्थन

शुकदेव यहाँ क्षण भर के लिए रुके।

परीक्षित् ने धीमे स्वर में पूछा, ”भगवन्, तो वह माँ जो अपने बच्चे को छाती से लगा रही थी, और वह बछड़े को चाटती गाय, सब उसी एक को प्यार कर रहे थे, अपने ही अपने के रूप में?”

”यही तो, राजन्,” शुकदेव बोले। ”ब्रह्मा परम रचयिता हैं, पर उस सुबह वे यही भूल बैठे कि रचने वाला भी किसी का रचा हुआ है। उन्होंने सोचा, मैं इसे परखूँ। और परीक्षा लेने जिसे चले, उसी ने उन्हें दिखा दिया कि जिस-जिस को उन्होंने छिपाया था, सब वही एक था।”

”बाहर से देखिए तो असंख्य दिखते हैं, राजन्। माँ अलग, पिता अलग, सखा अलग, बैरी तक अलग। पर जिस दृष्टि से ब्रह्मा ने उस दिन देखा, उससे देखिए तो वही एक चेतना है, अनगिनत रूप धरे हुए।”

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ”ब्रह्मा को तो झुकने में एक पल भी न लगा। पर हम अपनी छोटी-सी ज़िंदगी भर यही कहते रह जाते हैं, यह मैंने बनाया, यह मेरा है।”

शुकदेव ने सिर हिलाया। ”और जिस दिन यह कहना छूट जाता है, राजन्, उसी दिन हर मुख में वही श्यामसुंदर दिखने लगते हैं, जो उस दिन ब्रह्मा को दिखे थे। मृत्यु से वही नहीं डरता जो अपने भीतर और सबके भीतर एक ही को पहचान लेता है।”

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 13 और 14 की है। ब्रह्मा बछड़ों और फिर ग्वाल-बालकों को छिपा देते हैं, और कृष्ण उन सबका रूप स्वयं धर लेते हैं। एक वर्ष बीतने पर लौटे ब्रह्मा को हर रूप में वही एक दिखता है, और वे शरणागत होकर ब्रह्मा-स्तुति (14) गाते हैं।

कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् (1.3.28) का जो वचन भागवत के आरम्भ में आता है, उसकी झलक इसी लीला में मूर्त होती है, जहाँ अंश और कला नहीं, स्वयं भगवान् ही असंख्य रूपों में प्रकट हैं।

कथा का सार

सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने एक बालक की परीक्षा लेनी चाही और बछड़ों तथा ग्वालों को छिपा दिया। कान्हा ने उन सबका रूप स्वयं धर लिया, और एक वर्ष व्रज की हर गोद में वही बैठे रहे। लौटे ब्रह्मा को जहाँ देखा वहीं वही एक दिखा, और कर्ता होने का अहंकार उनके चरणों में बिखर गया।