Lulla Family

कालिय नाग

कथा 14 · भागवतम् की कथाएँ

कालिय नाग

Dance on a Serpent’s Hood
स्कन्ध 10, अध्याय 16-17

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

कालिय के फन पर नृत्य। हर फन पर एक ताल।

यमुना के बीचों-बीच, ज़हर पर पड़ता एक नन्हा पैर।

भागवतम् 10.16

उस दिन की कथा आरम्भ करने से पहले परीक्षित् ने अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रखीं और शुकदेव की ओर देखा।

”भगवन्, कल से एक बात मन में अटकी है। आपने बताया था कि वे नन्हे से थे, माखन चुराते थे, माँ की गोद में सोते थे। फिर वही बालक यमुना के उस काले कुण्ड में कूद पड़ा, जहाँ बड़े-बड़े योद्धा झाँकने से डरते। मुझे यह समझ नहीं आता, मुनिवर। इतनी कोमलता और इतना साहस, एक ही देह में कैसे?”

शुकदेव की आँखों में हलकी मुस्कान तैरी। ”राजन्, जिसे आप साहस कह रहे हैं, वह उनके लिए साहस था ही नहीं। साहस वहाँ चाहिए जहाँ भीतर कहीं डर बैठा हो और उसे लाँघना पड़े। उनके भीतर वह डर था ही नहीं, इसलिए उतरना भी उतना ही सहज था जितना आपके किसी बालक का आँगन में दौड़ पड़ना। यह कथा सुनिए। फिर आप स्वयं देखिएगा कि उस काले कुण्ड में जो उतरा, वह क्या-क्या कर आया।”

वे एक पल ठहरे, फिर कहने लगे।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the colossal venomous black serpent Kaliya, son of Kadru, coiled in a deep pool at the very centre of the Yamuna; his one hundred and one raised hoods each crowned with a glowing red jewel; the water around him turned inky-black, poisonous vapour rising from it, while the riverbanks behind show scorched grass, withered trees, dead birds fallen, and cows lying dead near the toxic water.

यमुना का पानी पहले मीठा था। साफ़, ठंडा, सब के काम का। फिर उसके एक हिस्से में, बीचों-बीच के एक गहरे कुण्ड में, एक नाग आकर बस गया। उसका नाम था कालिय। बहुत बड़ा, बहुत ज़हरीला, कद्रू का पुत्र। उसकी एक सौ एक फनें थीं, और हर फन के मस्तक पर लाल-लाल मणियाँ जड़ी थीं। उसका ज़हर इतना तेज़ था कि उसके आसपास का पानी काला पड़ जाता, और उस काले जल से उठती भाप तक में ज़हर घुला रहता।

वह यहाँ क्यों आ बसा था, इसके पीछे एक पुरानी बात थी। उसका असली घर समुद्र के बीच रमणक द्वीप में था, जहाँ सारे साँप रहते थे। पर वहाँ एक नियम चलता था। हर अमावस को हर साँप-कुल को एक निश्चित पेड़ के नीचे गरुड़ के लिए एक साँप की भेंट छोड़नी पड़ती थी, क्योंकि गरुड़ और साँपों के बीच पुराना बैर था। कालिय को यह मंज़ूर न था। वह अपने ज़हर और बल के घमंड में चूर था। उसने अपनी भेंट तो दी ही नहीं, उल्टे जो भेंट दूसरे साँप गरुड़ के लिए रखते, उन्हें भी खा जाता। गरुड़ को यह सहन न हुआ। उसने अपने सुनहले बाएँ पंख से कालिय पर ऐसा प्रहार किया कि वह घायल होकर भागा, और यमुना के इसी कुण्ड में आ छिपा। यह एक ही कुण्ड गरुड़ के लिए अगम्य था, क्योंकि किसी समय एक तपस्वी, सौभरि मुनि, इसी जल में मछलियों के बीच रहते थे, और जब गरुड़ ने उनके बीच की एक मछली बलपूर्वक पकड़कर खा ली, तो मुनि ने शाप दे दिया कि गरुड़ अब इस कुण्ड में पैर रखेगा तो प्राण से हाथ धो बैठेगा। उसी शाप की ओट में कालिय निडर होकर बैठ गया था। जिस ज़हर से वह यहाँ छिपने आया था, वही ज़हर अब उसका घमंड बन गया था।

धीरे-धीरे यह ज़हर पूरी यमुना में फैलने लगा। वृन्दावन के लोग परेशान थे। गायें वहाँ पानी पीने जातीं और गिर मरतीं। ऊपर से उड़ते पंछी उस काले जल की भाप का स्पर्श पाते और पंख समेटे बिना नीचे आ गिरते, मरे हुए। किनारे के घास-पात और पेड़ तक झुलस गए थे।

एक दिन कृष्ण अपने झुंड के साथ वहीं गायें चरा रहा था। उस दिन बलराम साथ नहीं थे। कृष्ण ने उस दूषित कुण्ड को देखा। दुष्टों का दमन करना तो उनके अवतार का प्रयोजन ही था, और जिस साँप के ज़हर ने उनके विहार के इस स्थान को भी दूषित कर डाला था, उसे अब वहाँ रहने देना नहीं था।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the small dark-blue cowherd boy Krishna (alone, no Balarama present) having tightened the waistcloth at his waist and climbed a tall old kadamba tree on the bank; he stands on a branch that bends out over the black serpent pool, gripping it with one hand, gazing down at the water an instant before his leap, peacock feather in his hair, anxious cows and young cowherds clustered on the shore behind.

किनारे पर एक बहुत ऊँचा कदम्ब का पेड़ खड़ा था। पुराना। उसकी एक डाल कुण्ड के ऊपर तक झुकी हुई थी। कृष्ण ने अपनी कमर का फेंटा कसा और उस कदम्ब पर चढ़ गया। डाल पकड़ी, एक पल पानी की ओर देखा, और ताल ठोककर छलाँग लगा दी।

सीधे यमुना के बीच के कुण्ड में, कालिय के घर के भीतर।

एक बालक के कूदने भर से इतना भारी जल इस तरह उछला, मानो किसी ने उसे जड़ से हिला दिया हो। ज़हर से पहले ही खौलता वह पानी और भी उबल पड़ा, उसकी लाल-पीली लहरें इधर-उधर उछलकर चारों ओर चार सौ हाथ तक फैल गईं। ग्वाले डर के मारे चिल्लाए, ”कृष्ण! कृष्ण!”

कृष्ण उस गहरे जल में मतवाले गजराज की तरह कूद-कूदकर पानी उछालने लगा। उसकी भुजाओं की टक्कर से जल में ज़ोर का शब्द गूँजा। कालिय आँखों से नहीं, कानों से सुनता था। उसने वह आवाज़ सुनी कि कोई उसके घर में, उसके राज में, उसका तिरस्कार कर रहा है, और यह उससे सहा न गया।

Rich painterly classical-Indian color illustration set underwater in the churning poison pool: Kaliya's one hundred and one jewel-crowned hoods all rearing up at once, the giant serpent biting the small dark-skinned boy Krishna at his vital points and binding him completely within the great loops of his body, so the child is almost hidden inside the coils; turbulent red-yellow venomous waves splash outward all around.

कालिय की एक सौ एक फनें एक साथ उठीं। उसने उस साँवले-से बालक को मर्मस्थानों में डँसा और अपने पूरे शरीर के बन्धन में उसे जकड़ लिया। एक पल को कृष्ण उन कुण्डलियों में ऐसा छिप गया कि जल के ऊपर कुछ दिखाई ही न देता था।

ऊपर वृन्दावन में आकाश, पृथ्वी और देह में अपशकुनों के उत्पात उठ खड़े हुए। नंद आदि गोपों ने पहले उन अपशकुनों को देखा, फिर जाना कि आज कृष्ण बिना बलराम के ही गायें चराने गए हैं। मन में यही बात आई कि कहीं कृष्ण का अनिष्ट न हो गया हो, और वे अपने प्यारे कन्हैया को देखने की उत्कट लालसा से घर-द्वार छोड़कर निकल पड़े। मार्ग में उन्हें भगवान् के चरण-चिह्न मिलते जाते, जिन पर कमल, जौ, अंकुश, वज्र और ध्वजा के चिह्न थे, और उन्हीं को पहचानते-पहचानते वे यमुना-तट की ओर बढ़ते गए।

जब वे यमुना किनारे पहुँचे, तो उन्होंने दूर से ही देखा कि कालिय की देह से बँधे हुए कृष्ण चेष्टाहीन पड़े हैं, कुण्ड के किनारे ग्वाले अचेत गिरे हैं, और गायें, बैल, बछड़े आर्त स्वर में डकरा रहे हैं। यह दशा देखकर सब गोप दुःख, पछतावे और भय से बेसुध होकर वहीं गिर पड़े। उन्होंने तो अपना सब कुछ, अपने प्राण तक, उसी एक बालक को सौंप रखे थे।

गोपियाँ कृष्ण के सौहार्द को, उनकी मधुर मुस्कान को, उनकी प्रेमभरी चितवन और मीठी वाणी को ही स्मरण करती रहती थीं। अपने प्यारे को साँप के बन्धन में जकड़ा देखकर उन्हें तीनों लोक सूने जान पड़े। माता यशोदा तो अपने लाड़ले के पीछे उसी कुण्ड में कूद ही पड़तीं, पर गोपियों ने उन्हें कसकर थाम लिया, और उनके अपने हृदय में भी वैसी ही पीड़ा थी। जिनमें कुछ चेतना बची थी, वे यशोदा को कृष्ण की पूतना-वध आदि प्यारी-प्यारी लीलाएँ कह-कहकर धीरज बँधाने लगीं। पर अधिकांश तो मूर्छित-सी ही पड़ी रहीं। थोड़ी ही दूर, इसी भीड़ में, बलराम खड़े थे। न वे काँपे, न जल की ओर बढ़े। वे अपने छोटे भाई का बल जानते थे, इसलिए चुप रहे। नंद आदि भी जब कृष्ण के पीछे कुण्ड में घुसने लगे, तो बलराम ने किन्हीं को समझा-बुझाकर, किन्हीं को बलपूर्वक और किन्हीं को धीरज बँधाकर रोक दिया।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the boy Krishna, having swelled his body and burst free of Kaliya's loosening coils, now risen up and standing serene and upright squarely atop the single highest, loftiest hood among the serpent's hundred-and-one jewelled hoods, ready to dance; dark waters of the Yamuna pool swirling below, the other red-gemmed hoods spread out beneath his small feet.

पर तभी जल के भीतर कुछ हुआ। कृष्ण ने अपने देह को फुलाना शुरू किया, फैलाना, और भारी करना। कालिय की वे कसी हुई कुण्डलियाँ एक-एक गाँठ ढीली पड़ने लगीं। उसकी पकड़ छूटी, और बालक बाहर आ गया। न केवल बाहर, बल्कि कालिय के सब फनों में जो परम ऊँचा था, उसी फन के ठीक ऊपर जा खड़ा हुआ।

और नृत्य करने लगा।

नृत्य-गान की समस्त कलाओं का जो आदि-प्रवर्तक है, उसने उसी फन पर ताल लेना शुरू किया। पहला पैर पड़ा, और कालिय के सारे देह में एक कँपकँपी दौड़ गई। फन पर जड़ी लाल मणियों की रगड़ से कृष्ण के नन्हे, कमल-से कोमल तलुए और भी लाल हो उठे, मानो किसी ने महावर रच दिया हो। एक फन झुकता, वह उछलकर दूसरे पर जा खड़ा होता। साँप जिस सिर को झुकाए रखता, उसी को छोड़कर जो भी सिर ऊपर उठाता, क्रोध में फुँफकारता, कृष्ण उसी पर अपने पैरों की ठोकर से कूद पड़ता और उसे झुका देता। एक सौ एक फन, और हर फन पर एक ताल।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the small blue Krishna dancing rhythmically upon Kaliya's many jewelled hoods, one tiny lotus-soft foot pressing down a hood; in the sky above, gandharvas, siddhas, devas, charanas and celestial women joyfully play the mridanga, dhol and nagara drums and sing, raining down flowers that float upon the black water; below, blood-mixed venom oozes from the serpent's mouths and nostrils as hoods bow one by one.

जल के भीतर पाँव की हर थाप के साथ एक धमक उठती, जो किनारे की मिट्टी तक काँप जाती। और जल के ऊपर एक और ही दृश्य था। भगवान् के प्यारे भक्त, गन्धर्व और सिद्ध और देवता और चारण और देवांगनाएँ, आकाश में आ जुटे थे। उन्होंने देखा कि प्रभु नाचना चाहते हैं, तो बड़े प्रेम से मृदंग, ढोल और नगाड़े बजाने लगे। मधुर गीत उठा, और ऊपर से फूलों की वर्षा होने लगी, जो उस काले जल पर तैरती चली। एक तरफ़ मृदंग का बोल, एक तरफ़ नन्हे पैर की थाप, और बीच में कहीं फूलों के झरने की हलकी-सी आहट।

कालिय ने यह सोचकर बालक को जकड़ा था कि उसे प्राण से मार डालेगा। अब वही जकड़न उल्टी पड़ गई थी। जिस-जिस फन को वह घमंड में ऊपर उठाता, उसी पर वह कोमल पैर पड़ता, ज़रा-सा भारी होकर, और उस दबाव से ज़हर उसके मुँह और नथुनों से लहू के साथ बाहर बहने लगता। उसके फन एक-एक करके छिन्न-भिन्न हो चले, उसकी जीवन-शक्ति घटने लगी, उसके देह की एक-एक गाँठ ढीली पड़ती गई। वह जिस ज़हर को जीवन भर अपना बल और अपना घमंड समझता रहा था, वही ज़हर अब उसमें से निचुड़कर बाहर जा रहा था, और हर बूँद के साथ जैसे उसका अहंकार भी निकलता जाता था। अन्त में वह चक्कर खाता-खाता बेहोश हो चला।

और कृष्ण? वह नाच रहा था। उसकी साँस तक ऊँची-नीची न होती थी। होंठों पर वही हलकी, अधखिली मुस्कान, जैसे यह कोई युद्ध नहीं, बस एक खेल हो।

किनारे खड़े ग्वाले आँखें झपकाना तक भूल गए। फूलों की भीनी गंध हवा में तैर रही थी, और दूर मृदंग की धमक सुनाई देती थी। यह क्या हो रहा है, किसी की समझ में न आता था।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the Naga-wives (serpent queens with human upper bodies, dishevelled garments, ornaments askew and loosened braided hair from fear) rising from the pool, placing their small serpent-children in front of them, all prostrating together upon the water surface with palms joined in pleading prayer toward the dancing boy Krishna who stands above on the subdued, exhausted Kaliya's hood.

तभी जल के भीतर से कालिय की पत्नियाँ, नाग-पत्नियाँ, ऊपर उठ आईं। अपने पति की यह दशा देखकर उनके मन में बड़ी घबराहट थी। भय के मारे उनके वस्त्र-आभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे थे, केश की चोटियाँ बिखर गई थीं। उन्होंने अपने नन्हे बालकों को आगे करके, सब एक साथ जल पर लोट गईं और हाथ जोड़ लिए। वे कृष्ण को दण्ड देने से रोक नहीं रही थीं। वे यह जानती थीं कि यह दण्ड न्यायपूर्ण है, कि जो ज़हर इस सर्प के भीतर भरा था उसका यही प्रायश्चित था। वे केवल इतना ही चाहती थीं कि उनके पति के प्राण रह जाएँ।

”नाथ, आपका यह अवतार दुष्टों को दण्ड देने के लिए ही हुआ है,” वे काँपती आवाज़ में बोलीं। ”हमारा पति तमोगुणी योनि में जन्मा है, स्वभाव से ही क्रोधी। आपका जो दण्ड इसे मिल रहा है, हम उसे भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं, क्योंकि आपकी चरण-रज तो लक्ष्मीजी को भी बरसों की तपस्या के बाद मिली। पर हम आपकी दासी हैं। हमें हमारे प्राणनाथ का जीवन-दान दे दीजिए।”

कृष्ण ने अपने पाँव की थाप रोक दी और उन्हें देखा।

कालिय की चेतना तब तक लौट चली थी। बड़ी कठिनाई से साँस खींचता हुआ, दीन होकर, उसने भी हाथ जोड़े। ”नाथ, हम जन्म से ही दुष्ट हैं, तमोगुणी, क्रोधी। अपना स्वभाव छोड़ देना हमारे बस में नहीं। यह सारी सृष्टि आपकी ही है, हमारा यह विषैला स्वभाव भी आपका ही रचा है। अब जैसा ठीक समझें, कृपा कीजिए या दण्ड दीजिए।”

कृष्ण ने कहा, ”सर्प, अब आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए। अपने जाति-भाई, बालक और पत्नियों के साथ समुद्र में, अपने रमणक द्वीप में लौट जाइए।”

कालिय एक पल हिचका। उसी द्वीप के डर से तो वह भागकर यहाँ आ छिपा था। कृष्ण उसके मन की बात समझ गया। ”गरुड़ की चिन्ता मत कीजिए। आपके फन पर अब मेरे चरणों का चिह्न पड़ चुका है। जिस सिर पर मेरा पैर पड़ा हो, उसे देखकर गरुड़ भी रुक जाएगा, उसे कभी न खाएगा।”

कालिय हाथ जोड़कर, अपनी पत्नियों और बालकों के साथ रमणक द्वीप की ओर लौट गया।

और उसी पल यमुना का जल फिर निर्मल हो उठा। ज़हर तो गया ही, वह जल अमृत के समान मीठा भी हो गया।

Rich painterly classical-Indian color illustration on the now-clear Yamuna bank: Krishna emerged from the pool, adorned with a divine garland, fragrant sandal, fine garments, a great gem and golden ornaments, his hair still wet and his soles reddened from the serpent's jewels; mother Yashoda, weeping with joy and tears of bliss falling from her eyes, lifts her beloved child into her lap and clasps him to her heart, with Balarama and the joyful cowherds gathered around.

कृष्ण कुण्ड से बाहर निकला। दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुनहले आभूषणों से सजा हुआ। किनारे पर बलराम सब से पहले बढ़े, और उसे हृदय से लगाकर हँस पड़े। फिर ग्वालों ने उसे घेर लिया, और यशोदा रोते-रोते अपने लाल को गोद में उठाकर हृदय से चिपका ले गईं। उनकी आँखों से आनन्द के आँसू की बूँदें बार-बार टपक रही थीं।

कृष्ण के बाल अभी भी गीले थे। उसके तलुओं की लाली, जो कालिय की मणियों की रगड़ से आई थी, अभी भी बाकी थी।

मगर वह हँस रहा था, जैसे अभी-अभी जो हुआ, वह सचमुच बस एक नृत्य था।


शुकदेव कुछ देर मौन रहे।

परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”मुनिवर, अब समझ आया। वे डर को जीतने नहीं उतरे थे। उन्हें डर था ही नहीं। जिस कुण्ड में सब मौत देखते थे, वहाँ वे खेलने उतरे।”

शुकदेव ने सिर हिलाया, फिर एक क्षण रुककर बोले। ”एक बात और देखिए, राजन्। उस कुण्ड में कालिय इसलिए नहीं घुसा था कि वह बहुत बलवान था। वह तो भागकर, छिपकर वहाँ बैठा था, गरुड़ के डर से, एक मुनि के शाप की ओट में। उसका सारा ज़हर भीतर ही भीतर खौलता था, और उसी खौलते ज़हर को वह अपना बल समझता रहा। श्रीहरि ने उसे मारा नहीं। उन्होंने केवल उसी ज़हर पर ताल दिया, फन-दर-फन, जब तक वह सारा बाहर न बह गया। जिस दिन भीतर का ज़हर निकल गया, उसी दिन वह सिर भी झुक गया जो किसी के आगे न झुका था। और जिस पैर ने उसे कुचला, वही पैर उसके फन पर ऐसा चिह्न छोड़ गया जिसके आगे गरुड़ तक रुक जाता है।”

परीक्षित् कुछ बोले नहीं। सात दिन की गिनती एक पल को मन से उतर गई।

मन्थन

एक नन्हा बालक एक काले नाग के एक सौ एक फन पर नाच रहा है। नीचे जल से ज़हर बाहर निचुड़ रहा है, फन एक-एक करके झुक रहे हैं। ऊपर आकाश से फूल झर रहे हैं, और कहीं दूर मृदंग बज रहा है।

वह नाग जीवन भर उस ज़हर को अपना बल समझता रहा। उसी के घमंड में वह किसी के आगे न झुका। और एक दिन वही ज़हर उसमें से, बूँद-बूँद, बाहर बह गया, और जो सिर कभी न झुके थे, वे झुक गए।

जिस फन पर वह पैर पड़ा, उस पर एक चिह्न रह गया। ऐसा चिह्न जिसे देखकर गरुड़ तक रुक जाता है।

भीतर जो खौलता है, और जिसे हम अपना बल समझ बैठते हैं, क्या उस पर भी कोई इस तरह ताल दे सकता है, हलका-सा मुस्कुराते हुए, जब तक वह सारा बह न जाए?

साहित्यिक-संदर्भ

कालिय-दमन की कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 16 और 17 में आती है। कालिय का रमणक द्वीप लौट जाना और गरुड़ से अभय पाना, दोनों गीताप्रेस के पाठ के अनुसार हैं।

फन पर नृत्य करते बालक का यह रूप शास्त्रीय नृत्य में ‘कालिय-मर्दन’ के नाम से बहुत गाया-नाचा गया है, और मूर्ति-शिल्प में भी प्रिय रहा है।