समुद्र मन्थन
परीक्षित् कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर शुकदेव की ओर देखा।
”भगवन्, कल आपने उस गजराज की पुकार सुनाई थी, जिसे श्रीहरि ने डूबते-डूबते थाम लिया। मेरे पास अब थोड़े ही दिन बचे हैं, और मन के भीतर एक बात बार-बार उठती है। जो अच्छा है, वह इतनी आसानी से हाथ क्यों नहीं आता? सुख के साथ इतना दुख क्यों बँधा रहता है?”
शुकदेव की आँखों में एक हल्की मुस्कान तैरी। ”राजन्, यही प्रश्न एक बार देवताओं के सामने भी खड़ा हुआ था। और उसका उत्तर एक समुद्र की तह में छिपा था। सुनिए।”
उस समय देवता श्री से हीन हो चुके थे।
उनका बल, तेज, ऐश्वर्य और कान्ति, सब जैसे उतर गया था। निस्तेज होकर वे ब्रह्मा को आगे करके श्रीहरि की शरण में पहुँचे, और हाथ जोड़कर बड़ी कोमल वाणी में उनकी स्तुति करने लगे।
स्तुति सुनकर श्रीहरि उनके बीच में ही प्रकट हो गए। उनके शरीर की प्रभा ऐसी थी, मानो हज़ारों सूर्य एक साथ उग आए हों। देवता उन्हें भर आँख देख भी न पाए।
श्रीहरि ने सब जान लिया, और मेघ के समान गम्भीर वाणी में धीरे से एक उपाय बताया।
”इस समय असुरों पर काल की कृपा है,” वे बोले। ”अकेले आप उनसे नहीं जीत पाएँगे। कोई बड़ा कार्य करना हो तो शत्रुओं से भी मेल कर लेना चाहिए। आप दैत्यों के पास जाइए और उनसे सन्धि कर लीजिए।”
”और फिर, प्रभु?”
”फिर सब मिलकर क्षीर-सागर का मन्थन कीजिए। उस दूध के समुद्र की तह में अनेक अमूल्य रत्न छिपे हैं, और उन्हीं में अमृत भी है। पर इतना बड़ा समुद्र अकेले आपसे न मथा जाएगा। दैत्यों से कहिए, अमृत निकलेगा और पीकर सब अमर हो जाएँगे, आप भी, वे भी।”
”वे हमारी बात मानेंगे, भगवन्?”
”अमृत का लोभ कौन छोड़ पाता है, राजन् के पूर्वजो? वे अवश्य मानेंगे। पर सुन लीजिए, श्रम और क्लेश दैत्यों के भाग आएगा, और फल आप ही को मिलेगा। आप केवल इतना कीजिए कि मन्थन में धैर्य न खोएँ। पहले समुद्र से कालकूट विष निकलेगा, उससे डरना नहीं। और किसी भी वस्तु के लिए कभी लोभ न करना, क्रोध भी न करना।”
देवता असुरराज बलि के पास गए और संधि की बात रखी। बलि सन्धि और विरोध के अवसर को पहचानने वाले थे; उन्होंने यह बात मान ली, और दूसरे सेनापति शम्बर, अरिष्टनेमि तथा त्रिपुर के निवासी असुरों को भी यह सुहा गई। फिर सब मिलकर क्षीर-सागर के किनारे आ खड़े हुए।
अब मथें कैसे? मथानी चाहिए, और रस्सी चाहिए।

मथानी के लिए मन्दराचल पर्वत चुना गया, और रस्सी के लिए वासुकि नाग।
पहले-पहल अजित श्रीहरि वासुकि के मुख की ओर जा लगे, इसलिए देवता भी उसी ओर जुट गए। पर दैत्यसेनापतियों को यह न सुहाया। ”पूँछ तो साँप का अशुभ अंग है, हम उसे नहीं पकड़ेंगे।” तब श्रीहरि मुस्कुराकर मुख का छोर छोड़ बैठे, और देवताओं के साथ पूँछ थाम ली; मुख वाला सिरा दैत्यों के हाथ आया।
दैत्यों को यह न सूझा कि फन वाला सिरा ही आगे चलकर विष की आग उगलेगा।
मन्थन आरम्भ हुआ। एक ओर से देवता खींचते, दूसरी ओर से दैत्य। पर्वत घूमता, और समुद्र में भँवर उठते।

पहली ही बाधा सामने आ खड़ी हुई। किसी आधार के बिना मन्दराचल समुद्र में धँसने लगा, और देखते-देखते जल में डूब गया। तब श्रीहरि ने एक विशाल कूर्म का रूप धरा, समुद्र की तह में जा बैठे, और डूबते पर्वत को अपनी पीठ पर उठा लिया। पर्वत फिर घूमने लगा, और देव-दानव को पता भी न चला कि जिस आधार पर वे टिके हैं, वह स्वयं भगवान् हैं।
मन्थन चलता रहा, घड़ी पर घड़ी।
और जो समुद्र की तह से उठा, उसे देखकर साँस रुक जाती थी।
सब में पहले निकला हलाहल विष। काला, गाढ़ा, चारों दिशाओं में ऊपर-नीचे फैलता हुआ। उसकी आँच से ही प्राण काँपने लगते थे।
देव हों या दानव, सब भयभीत होकर पीछे हट गए। उस असह्य विष से बचने का कोई उपाय न था। तब समस्त प्रजा और प्रजापति शिव की शरण में गए, क्योंकि संसार की रक्षा का यह भार और कौन उठाता।

शिव सती के साथ कैलास पर विराजमान थे। प्रजापतियों ने उनकी स्तुति की, और प्राणियों की यह विपत्ति सुनाई। शिव का हृदय करुणा से भर आया। उन्होंने सती से कहा, ”देखिए तो सही, मन्थन से निकले इस कालकूट से प्रजा पर कितना बड़ा दुख आ पड़ा है। इन बेचारों की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है।” फिर शान्त भाव से उन्होंने वह हलाहल अपनी हथेली में समेटा, और पी गए, जैसे कोई औषधि का घूँट हो।
विष उनके कंठ में आकर ठहर गया। कंठ नीला पड़ गया, और वही नीलापन उनका आभूषण बन गया। उसी दिन से उन्हें नीलकण्ठ कहा जाने लगा।
उनकी हथेली से जो थोड़ा-सा विष टपका, उसे बिच्छू, साँप और कुछ विषैली ओषधियों ने ग्रहण कर लिया।
मन्थन फिर चल पड़ा।
अब समुद्र अपने रत्न एक-एक करके सौंपने लगा।
पहले निकलीं सुरभि, वह कामधेनु जो हर कामना पूरी करती है। यज्ञ के घृत और दूध के लिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ले लिया।
फिर उच्चैःश्रवा निकला, चन्द्रमा के रंग का उजला अश्व। बलि ने उसे चाहा, पर इन्द्र ने उसे लेना न चाहा।
फिर ऐरावत, चार बड़े दाँतों वाला श्वेत गजराज, जिसकी आभा कैलास की शोभा को भी मात करती थी।
फिर कौस्तुभ मणि उठी, जिसे श्रीहरि ने अपने वक्ष पर धारण किया।
फिर पारिजात वृक्ष, स्वर्गलोक की शोभा बढ़ाने वाला, जो याचक की हर इच्छा पूरी करता।
फिर अप्सराओं का दल, सुन्दर वस्त्रों और स्वर्ण-हार से सजा, घुँघरुओं की झनकार के साथ।

और तब समुद्र की लहरें जैसे एक क्षण को थम गईं। जल के बीच से साक्षात् श्रीलक्ष्मी प्रकट हुईं, अंग-अंग से कान्ति बरसाती हुईं। उनकी बिजली-सी छटा से दिशाएँ जगमगा उठीं।
देव और दानव, दोनों उन्हें देखकर ठिठक गए। मन्थन की रस्सी हाथों में ढीली पड़ गई।
हर एक के मन में एक ही चाह उठी, कि यह श्री उसी की ओर आए।
इन्द्र उनके बैठने के लिए एक सुन्दर आसन ले आए। श्रेष्ठ नदियों ने सोने के घड़ों में पवित्र जल भरकर उनका अभिषेक किया। पृथ्वी ने अभिषेक की ओषधियाँ दीं, गौओं ने पंचगव्य दिया। ऋषियों ने विधिपूर्वक अभिषेक सम्पन्न किया, गन्धर्वों ने मंगल-गान छेड़ा, और बादल मृदंग, ढोल, शंख और वीणा बजाने लगे।
समुद्र ने उन्हें पहनने को पीला रेशमी वस्त्र दिया। वरुण ने वैजयन्ती माला भेंट की, जिसकी मधुर गन्ध से भौंरे मतवाले हो रहे थे। विश्वकर्मा ने भाँति-भाँति के गहने दिए, सरस्वती ने मोतियों का हार, ब्रह्मा ने कमल, और नागों ने दो कुण्डल।
लक्ष्मी ने हाथों में कमलों की एक नवीन माला ले ली, और सबके मुख देखे, राक्षसों के भी, देवों के भी। किसी में लोभ था, किसी में अहंकार, किसी में आयु का ठिकाना न था। समस्त सद्गुणों से नित्ययुक्त, निर्दोष, अविनाशी पुरुष कोई एक ही था।
वे आगे बढ़ीं, और वहाँ जा ठहरीं जहाँ श्रीहरि शान्त खड़े थे, न कुछ माँगते, न कुछ चाहते।
उन्होंने कमलों की वह नवीन माला श्रीहरि के गले में डाल दी, और लज्जा भरी मुस्कान के साथ उनके वक्ष को अपना नित्य निवास बनाकर पास ही खड़ी हो गईं।
श्री ने उन्हीं को वरा, जिन्हें किसी रत्न की चाह न थी।
देव हर्ष से भर उठे, दैत्य मन मसोसकर रह गए। और जिनकी ओर लक्ष्मी ने आँख न उठाई, वे दैत्य और दानव निर्बल, उद्योगहीन और लोभी होते चले गए।
इसके बाद समुद्र से कमलनयनी वारुणी देवी प्रकट हुईं, मदिरा की अधिष्ठात्री। भगवान् की अनुमति से दैत्यों ने उन्हें ले लिया।
पर असली प्रसंग तो अभी बाक़ी था।

सब में अन्त में समुद्र से धन्वन्तरि उठे, श्याम, सुगठित, हाथ में अमृत से भरा कलश लिए हुए, साक्षात् विष्णु के अंशांश अवतार।
कलश देखते ही दैत्य झपट पड़े। ”अमृत हमारा है,” और बलपूर्वक कलश छीनकर भाग चले।
फिर आपस में ही उनमें ठन गई। ”पहले मैं पिऊँगा।” ”नहीं, पहले मैं।” जिनके हाथ कलश न लगा, वे दुहाई देने लगे, ”देवताओं ने भी हमारे बराबर परिश्रम किया है, उन्हें भी भाग मिलना चाहिए, यही सनातन धर्म है।” जिस अमृत के लोभ में उन्होंने समुद्र मथा, वही अब उनके बीच कलह का बीज बन गया।
तब समस्त उपायों के ज्ञाता श्रीहरि ने अत्यन्त अद्भुत मोहिनी का रूप धारण किया। पर वह आगे की कथा है, राजन्, और उसे अपने समय पर सुनिए।
इतना कहकर शुकदेव क्षण भर रुके, और परीक्षित् की ओर देखा।
परीक्षित् देर तक चुप रहे, फिर बोले, ”भगवन्, एक बात मन में रह गई। इतने सुन्दर रत्न जिस समुद्र में थे, उसी में से पहले वह काला विष क्यों उठा?”
शुकदेव ने धीरे से कहा, ”राजन्, यही उस कथा का मर्म है। जो भी गहराई मथी जाती है, वह पहले अपना सब में कड़वा अंश ऊपर फेंकती है। समुद्र हो या मनुष्य का मन, पहले वही उठता है जिससे हम मुँह फेरना चाहते हैं।”
”और तब?”
”तब अधिकांश वहीं रुक जाते हैं। विष देखकर रस्सी छोड़ देते हैं, और सोचते हैं कि यह सब व्यर्थ था। पर देखिए, उस घड़ी एक शिव चाहिए था, जो उस विष को न उगले, न भीतर उतरने दे, केवल अपने कंठ में थामे रखे। जो इतना सह ले, समुद्र अपने रत्न उसी के आगे खोलता है।”
”बिना उस विष के पार हुए अमृत तक कोई नहीं पहुँचता,” परीक्षित् ने धीरे से दोहराया।
”और एक बात और, राजन्,” शुकदेव की वाणी कुछ और कोमल हुई। ”अमृत के निकलते ही कलह छिड़ गई। जो परम मूल्यवान है, उसी के लिए सब में बड़ा संघर्ष होता है। पर लक्ष्मी ने उसे नहीं चुना जो उन्हें पाने को व्याकुल था; उन्होंने उसे वरा जो शान्त खड़ा था, जिसे कुछ चाहिए ही न था। श्री वहीं ठहरती हैं, जहाँ लालसा नहीं रहती।”
परीक्षित् ने सिर झुकाया, और दिन एक और कम हो चला था।
साहित्यिक-संदर्भ
समुद्र-मन्थन का प्रसंग श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 6 से 9 में आता है। यह कथा महाभारत और कई पुराणों में भी मिलती है, पर भागवत का वर्णन अत्यन्त क्रमबद्ध और कथात्मक है। मन्दराचल की मथानी, वासुकि की रस्सी और कूर्म का आधार, तीनों यहाँ एक ही दृश्य में बँधते हैं।
नीलकण्ठ शिव का प्रसंग शिव-कथाओं की एक प्रिय कड़ी रहा है, और भारत भर के मन्दिर-शिल्प में चौदह रत्नों की यह कतार बार-बार उकेरी गई है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
जिस किसी काम में गहराई से उतरते हैं, चाहे वह अपना मन हो, कोई रिश्ता हो, या कोई बड़ा प्रयास, पहले वही ऊपर उठता है जिससे जी चुराते हैं। मन्थन सिखाता है कि उस कड़वे को सहकर ही आगे बढ़ा जाता है, और जो शान्त रहकर थामे रहता है, श्री अन्त में उसी के पास ठहरती है।