समुद्र मन्थन

कथा 17 · भागवतम् की कथाएँ

समुद्र मन्थन

Churning the Ocean for Nectar
स्कन्ध 8, अध्याय 7-9

देवता हार चुके थे।

एक दिन दुर्वासा मुनि इन्द्र से मिले। एक माला दी। इन्द्र ने उसे अपने ऐरावत हाथी पर डाल दी। हाथी ने उसे ज़मीन पर पटक के कुचल दिया।

दुर्वासा क्रोध में। उन्होंने इन्द्र को शाप दिया। ”तू और तेरे सब देव बिना श्री (लक्ष्मी) के हो जाओगे।”

और हुआ भी ऐसा। लक्ष्मी देवताओं को छोड़ गईं। शक्ति, धन, प्रभा, सब चला गया।

राक्षसों को मौक़ा मिला। उन्होंने युद्ध किया। देवता हार गए।

देवता विष्णु के पास गए।

विष्णु ने एक tricky plan दिया।

”देखो,” वो बोले, ”अकेले तुम राक्षसों से नहीं जीतोगे। और लक्ष्मी वापस नहीं आएगी जब तक तुम क्षीर-सागर का मन्थन नहीं करते।”

”क्षीर-सागर मन्थन?”

”हाँ। समुद्र के अंदर बहुत सी अमूल्य चीज़ें हैं। उन्हें बाहर निकालना है। पर इस मन्थन में राक्षसों की भी मदद लो। उन्हें कहो, हम दोनों मिलकर मन्थन करेंगे, और अमृत निकलेगा। पीकर अमर हो जाएँगे। वो भी, तुम भी।”

”क्या वो हमारी बात मानेंगे?”

”हाँ। अमृत का लालच कौन छोड़ेगा? और अंत में, अमृत मैं तुम्हें ही दिलाऊँगा। राक्षसों को नहीं।”

देवता गए। बलि से बात की। बलि माने। और सब मिलकर क्षीर-सागर के किनारे पहुँचे।

अब मन्थन कैसे करें?

एक पर्वत चाहिए, मथानी के लिए। और एक रस्सी।

मन्दराचल पर्वत चुना। वासुकि नाग रस्सी।

वासुकि का सिर एक तरफ़, पूँछ दूसरी तरफ़। राक्षसों को सिर वाला हिस्सा दिया गया (क्योंकि वो respect का प्रतीक था)। देवताओं को पूँछ।

राक्षसों को पता नहीं था कि सिर वाला हिस्सा ही ज़हर उगलेगा।

मन्थन शुरू हुआ।

पहली समस्या, मन्दराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा। विष्णु ने कूर्म (कछुआ) का रूप लिया, और पर्वत को अपनी पीठ पर उठाया।

मन्थन चला।

और जो निकला, वो दुनिया हैरान कर देने वाला था।

पहले हलाहल विष निकला। काला, गाढ़ा, ज़हरीला। उसकी एक बूँद से पूरा ब्रह्मांड भस्म हो सकता था।

सब डर गए। ”अब क्या करें? यह कौन पिए?”

नीलकण्ठो ऽपि भगवान् पीतवान् हालकं विषम् ।
लोकानां रक्षणार्थाय तत्तीव्रं विषमुग्रमिति ॥

नीलकण्ठ-रूप शिव ने भी, संसारों की रक्षा के लिए, उस तीव्र, उग्र, हालाहल विष को पिया। अपनी हथेली में। शान्ति से।

शिव आगे आए। उन्होंने उस ज़हर को अपनी हथेली में लिया। पी लिया।

पर पार्वती ने तुरंत उनका गला पकड़ लिया। ज़हर नीचे नहीं जाने दिया।

ज़हर शिव के गले में रुक गया। उनका कंठ नीला हो गया। तब से उन्हें ”नीलकंठ” कहते हैं।

मन्थन फिर शुरू।

अब अच्छी चीज़ें निकलने लगीं।

कामधेनु, जो हर इच्छा पूरी करती है। दिव्य गाय।

उच्चैःश्रवा, सात मुखों वाला सफ़ेद घोड़ा।

ऐरावत, चार दाँतों वाला सफ़ेद हाथी।

कौस्तुभ मणि।

पारिजात वृक्ष।

अप्सराएँ।

और तब, लक्ष्मी ख़ुद निकलीं। समुद्र की एक commotion से। एक सुनहरी कमल पर खड़ी। मुस्कुराती हुई।

देव और दानव, दोनों उन्हें देखकर ठहर गए।

हर कोई चाहता था कि लक्ष्मी उसकी तरफ़ आए।

लक्ष्मी ने सब के मुँह देखे। राक्षसों के, देवों के। फिर एक तरफ़ चलीं। जहाँ विष्णु खड़े थे।

उन्होंने विष्णु के गले में अपनी माला डाली।

”आप ही मेरे पति हैं।”

और विष्णु को चुना।

देव खुश। राक्षस मायूस।

मगर असली बात अभी आनी थी।

अंत में, धन्वन्तरि निकले। अमृत का कलश हाथ में लिए।

राक्षस तुरंत आगे आए। ”अमृत हमारा।”

वो कलश छीन के ले गए। उनके बीच में झगड़ा शुरू हो गया, ”पहले मुझे दो,” ”नहीं, पहले मुझे।”

विष्णु ने तब अपना मोहिनी-रूप लिया। पर वो अगली कथा है।

इस कथा में, बस इतना समझिए कि एक समुद्र मन्थन हुआ। ज़हर, फिर अच्छी चीज़ें, फिर लक्ष्मी, फिर अमृत।

हर एक के साथ एक सबक।

मन्थन

समुद्र-मन्थन की कथा का सबसे interesting हिस्सा यह नहीं है कि अमृत निकला, या कि लक्ष्मी निकलीं।

सबसे interesting हिस्सा यह है कि पहले ज़हर निकला।

जब कोई भी मन्थन शुरू होता है, चाहे वो जीवन का हो, चाहे रिश्ते का, चाहे ध्यान का, सबसे पहले ज़हर निकलता है। आप के अंदर का सबसे dark वाला हिस्सा। आपकी सबसे ख़राब memories।

ज़्यादातर लोग वहीं रुक जाते हैं। ज़हर देखकर। ”मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? मैं तो अच्छा बनना चाहता था, फिर यह बुरा क्यों निकल रहा है?”

भागवतम् कह रहा है, रुको मत। ज़हर निकलना ज़रूरी है। और अगर कोई शिव-समान भीतर हो, जो उस ज़हर को सहन कर ले, अपने कंठ में रोक ले, तो आगे अच्छी चीज़ें निकलेंगी।

बिना ज़हर पास हुए कोई अमृत नहीं।

और एक और बात। अमृत निकला तो लड़ाई शुरू हो गई। यानी सबसे क़ीमती चीज़ ही सबसे ज़्यादा conflict लाती है। यह भी मन्थन का एक regular pattern है।