गोवर्धन
वृन्दावन में हर साल एक यज्ञ होता था। इन्द्र-यज्ञ। इन्द्र, स्वर्ग का राजा, बारिश का देवता। ग्वाले मानते थे कि वही बारिश देता है, और बारिश से ही गायें पलती हैं, और गायों से ही उनकी ज़िंदगी चलती है।
हर साल बड़ी तैयारी होती। बड़े-बूढ़े मिलकर planning करते। चावल, दूध, मिठाई, सब इकट्ठा होता। एक बड़ा यज्ञ-कुण्ड बनता। और इन्द्र की पूजा होती।
इस साल भी तैयारी चल रही थी। नंद बाबा घर के बाहर बैठे थे, बुज़ुर्गों के साथ। हिसाब-किताब हो रहा था।
तभी कृष्ण आ गया। सात साल का। शरारत-भरी आँखें।
”बाबा, यह क्या हो रहा है?”
”बेटे, इन्द्र-यज्ञ की तैयारी।”
”इन्द्र-यज्ञ क्यों?”
”इन्द्र बारिश देते हैं। बारिश से हमारी गायें पलती हैं। तो इन्द्र को धन्यवाद देना चाहिए।”
कृष्ण थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला।
”बाबा, मगर एक बात तो पूछूँ। इन्द्र बारिश क्यों देते हैं?”
बाबा सोचने लगे। ”क्योंकि वो ऐसा करते हैं। यह उनका dharma है।”
”अगर dharma है, तो वो वो वैसे भी देंगे न? चाहे हम यज्ञ करें या न करें।”
”बेटे, ऐसा नहीं। उनकी पूजा से वो खुश होते हैं, तो ज़्यादा देते हैं।”
”और हमारी गायें कहाँ चरती हैं?”
”गोवर्धन पर्वत पर।”
”तो गायें वहाँ की घास खाती हैं, उसी पहाड़ से उनका पानी मिलता है, उसी की छाँव में रहती हैं। तो असली देने वाला तो गोवर्धन है। फिर हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? पूजा गोवर्धन की होनी चाहिए।”
बुज़ुर्ग एक-दूसरे को देखने लगे। बच्चा सीधी बात कर रहा था। पर बात क्रांतिकारी थी।
किसी ने कहा, ”तू सही कहता है।” किसी ने कहा, ”परंपरा बदलना ख़तरनाक है।”
नंद बाबा अपने बेटे की बात मान गए।
उस साल का यज्ञ इन्द्र को नहीं, गोवर्धन को होगा।
गाँव वालों ने सब सामान गोवर्धन की तरफ़ ले जाया। पहाड़ की एक खुली जगह पर सजावट हुई। मिठाई, चावल, दूध, सब परोसा गया। पूजा हुई।
और कृष्ण ने ख़ुद, गोवर्धन के रूप में, सब प्रसाद खा लिया। एक विशाल भोजन।
बच्चे ख़ुश। ग्वाले ख़ुश। गायें ख़ुश।
पर एक नाख़ुश था।
इन्द्र, स्वर्ग में बैठा था। उसे पता चला।
”क्या? एक छोटे से गाँव ने मेरी पूजा बंद कर दी? वो भी एक बच्चे के कहने पर?”
इन्द्र का अहंकार चोट खाया। उसने अपनी सब बारिश-शक्ति इकट्ठी की। साम्वर्तक मेघ, जो प्रलय के समय का बादल है। उसे आदेश दिया।
”जा। वृन्दावन को डुबो दे। सात दिन में।”
बादल आए। काले, गहरे। आसमान दिन में रात जैसा हो गया।
बारिश शुरू हुई। पर ऐसी बारिश नहीं जैसी रोज़ होती है। मूसलाधार। एक-एक बूँद पत्थर जैसी। हवा भयानक। बिजली कौंध रही थी।
ग्वाले डर गए। पानी जमा होने लगा। बच्चे रोने लगे। गायें खुले में थीं, बारिश से कांप रही थीं।
वो भागे कृष्ण के पास।
”बेटा! यह क्या किया? इन्द्र ग़ुस्से में है। अब हम क्या करें?”
कृष्ण ने मुस्कुराया। ”चिंता मत करिए। मेरे साथ चलिए।”
वो गोवर्धन पर्वत के पास गए। कृष्ण ने पर्वत की ओर देखा।
और फिर अपनी छोटी सी उँगली, सबसे छोटी उँगली, उठाकर पर्वत के नीचे डाली।
दधार लीलया कृष्ण: छत्राकमिव बालकः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.25.19 का भाव)
एक हाथ से, बहुत आसानी से, कृष्ण ने उस पर्वत को उठा लिया। जैसे एक बच्चा एक छत्राक (छाता) उठाता है।
और उठा लिया।
एक पूरा पर्वत। एक सात साल के बच्चे की एक उँगली पर। जैसे एक छाते की तरह।
”आइए सब। नीचे। अपनी गायों के साथ।”
गाँव वाले हैरान। पर डर इतना था कि सोचने का समय नहीं था। सब के सब, अपनी गायों के साथ, पर्वत के नीचे चले गए।
पर्वत हवा में था। उसके नीचे एक बड़ा सूखा hall। बारिश ऊपर थी, नीचे सूखा।
कृष्ण उँगली से पर्वत को थामे खड़ा था।
एक दिन। दो दिन। तीन।
बच्चा थका नहीं। ना भूखा हुआ, ना प्यासा। पर्वत वही था, बच्चा वही था। बीच में बस ग्वाले-गायें-मादाएँ बैठीं थीं, हैरान।
इन्द्र ऊपर से देख रहा था। उसकी बारिश अपना सब ज़ोर लगा रही थी। पर एक उँगली ने पूरे पर्वत को थामा हुआ था।
सात दिन बीते।
आख़िर इन्द्र समझ गया। यह कोई साधारण बच्चा नहीं था।
उसने बादल वापस बुलाए। बारिश रुक गई।
कृष्ण ने पर्वत वापस ज़मीन पर रखा। ध्यान से। जैसे एक खिलौना।
ग्वाले बाहर निकले। उनके चेहरों पर एक नई समझ। यह बच्चा सिर्फ़ बच्चा नहीं था।
थोड़ी देर बाद इन्द्र ख़ुद आया। अपने ऐरावत हाथी पर। वो उतरा, और कृष्ण के पैरों पर गिर गया।
”क्षमा करो, प्रभु। मैंने आपको पहचाना नहीं।”
कृष्ण ने उसे उठाया। ग़ुस्सा नहीं। बस एक हलकी मुस्कान।
”इन्द्र, तू मेरा बेटा-समान है। तेरी पूजा बंद नहीं हुई। बस यह समझाना था कि असली देने वाला तू नहीं। तू भी सब किसी और से लेकर देता है।”
इन्द्र चला गया। और तब से वृन्दावन में हर साल गोवर्धन-पूजा होती है, इन्द्र-यज्ञ नहीं।
गोवर्धन की कथा सिर्फ़ एक miracle की कथा नहीं है। एक miracle तो सात साल का बच्चा एक पर्वत उठाता है। पर असली कथा उससे पहले है।
कथा का असली turn वहाँ है जहाँ कृष्ण इन्द्र-पूजा को challenge करता है। एक बच्चा परंपरा से पूछता है, ”क्यों?” और जब परंपरा का जवाब satisfying नहीं होता, तो वो नई दिशा देता है।
भागवतम् यहाँ एक अहम बात कह रहा है। पूजा का object वो होना चाहिए जो हमारी ज़िंदगी का सीधा foundation है। दूर के देवता नहीं। पास का पर्वत। पास की नदी। पास का खेत। जो रोज़ हमें खिलाता है।
और जब इन्द्र ग़ुस्से में आता है, तब भी कृष्ण उसे नष्ट नहीं करता। बस उसका अहंकार तोड़ता है। फिर उसे मित्र की तरह स्वीकार करता है। इस tone में एक बहुत मुलायम बात है। power को tame करने का तरीक़ा हिंसा नहीं है। एक quiet authority है।
एक और बात। पूरे सात दिन गोवर्धन उँगली पर था। कृष्ण ने एक बार भी aerobics, मेहनत, स्वेद नहीं दिखाया। उसके लिए वो एक छाते जैसा था। यह एक quiet statement है कि असली शक्ति में effort नहीं होता।