गोवर्धन
गंगा की धारा उस सुबह धीमी और भारी बह रही थी। परीक्षित् ने सिर उठाया, जैसे कोई बात कई पहर से भीतर रखे बैठे हों।
”भगवन्, कल रात से एक बात मन में अटकी है। मैंने अपने पुरखों से सुना है कि जब इन्द्र की पूजा बंद हुई, तब सात दिन की प्रलय-वर्षा टूट पड़ी थी, और सात बरस के एक बालक ने पूरा पर्वत एक ही हाथ पर उठा लिया था। मेरे पास भी अब उतने ही दिन बचे हैं, मुनिवर, सात के सात। मुझे यह जानना है, जब इतनी बड़ी आपदा सिर पर आ खड़ी हो, और जिस हाथ ने आपको थाम रखा है उसे आप पहचानते तक न हों, तब डरे हुए लोग किसके भरोसे टिक जाते हैं?”
शुकदेव की आँखों में वह शान्त ज्योति थी जो कृष्ण-कथा छिड़ते ही गरमा उठती है। उन्होंने धीरे से कहा।
”राजन्, उस दिन ब्रज का सारा भरोसा एक ऐसे हाथ पर टिका, जो उन्हीं के बीच मक्खन माँगता घूमता था, और जिसे वे केवल अपना लाला समझते थे। सुनिए।”
वृन्दावन में हर बरस एक यज्ञ होता था। इन्द्र-यज्ञ। इन्द्र स्वर्ग का राजा है, बादलों का स्वामी। ग्वाले मानते थे कि वही पानी बरसाते हैं, और उसी बरसात से घास उगती है, घास से गायें पलती हैं, और गायों से उनका सारा जीवन चलता है।
हर बरस बड़ी तैयारी होती। बड़े-बूढ़े मिल-बैठकर बात करते। चावल, दूध, मिठाई, सब इकट्ठा होता। एक बड़ा यज्ञ-कुण्ड बनता, और इन्द्र की पूजा होती।

इस बरस भी तैयारी चल रही थी। नंद बाबा घर के बाहर बुज़ुर्गों के बीच बैठे थे। हिसाब-किताब हो रहा था, किसके खेत से कितना अन्न आएगा, कितना घी पिघलेगा। बाबा का स्वभाव यही था कि कोई पुरानी रीत बिना सौ बार सोचे न छूटे, और फिर भी, इस एक बेटे की ओर देखते ही उनके भीतर का वह सतर्क बूढ़ा कहीं पिघल जाता था।

तभी कान्हा आ पहुँचे। सात बरस के। पैरों में अब भी सुबह की गीली मिट्टी लगी थी, और आँखों में वही शरारत जो किसी से छिपती न थी।
”बाबा, यह सब क्या हो रहा है?”
”बेटे, इन्द्र-यज्ञ की तैयारी है।”
”इन्द्र-यज्ञ क्यों, बाबा?”
बाबा ने हिसाब का पत्ता एक ओर रखा। बेटे का प्रश्न था, टाला न जा सकता था। ”इन्द्र देवताओं के राजा हैं, मेघों के स्वामी। वही बादलों से पानी बरसाते हैं। उसी पानी से अन्न उपजता है, घास उगती है, गायें पलती हैं, और हमारा जीवन चलता है। यह रीत हमारे कुल में पीढ़ियों से चली आई है। जो मनुष्य काम, लोभ, भय या द्वेष में आकर अपनी कुल-परम्परा का धर्म छोड़ देता है, बेटे, उसका कभी मंगल नहीं होता।”
कान्हा थोड़ी देर चुप रहे। फिर धीरे से बोले।
”बाबा, एक बात पूछूँ। प्राणी तो अपने कर्म से जन्म लेता है और कर्म से ही जाता है। सुख, दुख, भय, मंगल, सब उसे अपने ही कर्म से मिलता है। फिर बीच में इन्द्र क्या कर देते हैं?”
बाबा सोच में पड़ गए। ”ऐसा नहीं बेटे। पूजा से वो प्रसन्न होते हैं, और प्रसन्न होकर और ज़्यादा बरसाते हैं।”
”और हमारी गायें चरती कहाँ हैं, बाबा? हमारे पास न कोई राज्य है, न बड़े नगर, न खेतों की लम्बी मेड़ें। हम तो सदा के वनवासी हैं, वन और पहाड़ ही हमारे घर हैं।”
”गोवर्धन पर्वत पर।”
”तो गायें उसी पहाड़ की घास खाती हैं, उसी के झरनों का पानी पीती हैं, उसी की छाँव में सुस्ताती हैं। बाबा, हम वैश्य हैं, और चार वैश्य-वृत्तियों, खेती, व्यापार, गोरक्षा और ब्याज में से हमने तो सदा एक गोरक्षा ही की है। फिर हमारे यज्ञ का अधिकार तो गायों पर, ब्राह्मणों पर, और इसी गिरिराज पर बनता है। इन्हीं तीनों की पूजा कीजिए।”
बुज़ुर्ग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। बात एक बच्चे के मुँह से निकली थी, पर सीधी थी, और परंपरा को हिला देने वाली।
किसी ने कहा, ”लाला ठीक कह रहे हैं।” किसी ने कहा, ”पुरानी रीत बदलना ख़तरे से खाली नहीं।”
नंद बाबा देर तक चुप रहे। फिर वही हुआ जो हर बार होता था, उनका वह सतर्क बूढ़ा फिर पिघल गया। उन्होंने अपने बेटे की बात मान ली।
तय हुआ, इस बरस यज्ञ गायों का, ब्राह्मणों का, और गिरिराज गोवर्धन का होगा।

ब्रज का सारा दूध एक जगह इकट्ठा हुआ। खीर, हलवा, पूआ, पूरी, और मूँग की दाल तक, अनेकों पकवान बने। ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया गया, उन्हें भर-भर के अन्न और दक्षिणाएँ दी गईं। और कान्हा का कहा कोई न भूला, चाण्डालों को, पतितों को, यहाँ तक कि गाँव के कुत्तों तक को यथायोग्य भोजन बाँटा गया, और गायों के आगे हरी-हरी घास डाली गई। फिर सारा सामान गोवर्धन की एक खुली ढलान पर ले जाकर गिरिराज को भोग लगाया गया। धूप की गंध हवा में फैली, गायों की घंटियाँ बजती रहीं।
उत्तम वस्त्र पहनकर, चन्दन लगाकर, ग्वाले और गोपियाँ बैलों से जुती गाड़ियों पर सवार हुईं, और गायों को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा करने लगीं, कान्हा की लीलाओं के गीत गाती हुईं।

और कान्हा ने स्वयं, गोपों को विश्वास दिलाने के लिए, गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धरकर, ”शैल मैं ही हूँ, गिरिराज मैं ही हूँ” कहते हुए वह सारा भोग ग्रहण कर लिया। एक ऐसा रूप जो पहाड़ जितना बड़ा था, और जिसके आगे रखा ढेर सारा अन्न पल भर में सिमट गया। फिर वे स्वयं भी गोपों के साथ खड़े होकर उसी अपने पर्वत-रूप को प्रणाम करने लगे, ”देखो, गिरिराज ने प्रकट होकर हम पर कितनी कृपा की है।”
बच्चे प्रसन्न। ग्वाले प्रसन्न। गायें तृप्त, घास चरतीं, पूँछ हिलातीं।
पर एक मन में आग सुलग रही थी।
इन्द्र, स्वर्ग में अपने सिंहासन पर बैठे, यह सब देख रहे थे। वही इन्द्र, जो स्वयं को त्रिलोकी का ईश्वर समझते थे, जिनका हाथ वज्र पर तब काँपता नहीं था जब बड़े-बड़े असुर सामने हों, अब एक छोटे-से ग्वालों के गाँव के आगे थरथरा उठा।
”ओह, इन जंगली ग्वालों को इतना घमंड! सचमुच यह धन का ही नशा है। एक साधारण मनुष्य, एक बकवादी, नादान बालक के बल पर इन अहीरों ने मुझ देवराज का अपमान कर डाला।”

अहंकार किसी प्रहार से इतना तिलमिलाता नहीं जितना एक उपेक्षा से, और इन्द्र को उपेक्षा का यह डंक सहा न गया। उन्होंने प्रलय करने वाले मेघों को बुलाया, सांवर्तक नामक वह गण, जो युग के अंत में संसार को डुबोने आते हैं। उनके बन्धन खोल दिए, और क्रोध में भरकर आदेश दिया।
”जाओ। इन गोपों का घमंड धूल में मिला दो, इनके पशुओं तक का संहार कर डालो। मैं भी पीछे-पीछे ऐरावत पर चढ़कर महापराक्रमी मरुद्गणों के साथ आता हूँ।”
बादल उमड़े। काले, भारी, क्षितिज से क्षितिज तक। दिन के पहर में आसमान रात जैसा हो गया।
पानी बरसने लगा, पर वैसा नहीं जैसा हर बरस बरसता था। मूसलाधार। हर बूँद खंभे जितनी मोटी, पत्थर की तरह पीठ पर गिरती। चारों ओर बिजलियाँ चमकतीं, बादल आपस में टकराकर कड़कते, और प्रचण्ड आँधी की प्रेरणा से बड़े-बड़े ओले बरसने लगे। हवा ऐसी कि पेड़ झुक-झुक जाते। थोड़ी ही देर में ब्रजभूमि में कहाँ नीचा है, कहाँ ऊँचा, इसका पता चलना कठिन हो गया, हर ओर पानी की एक अटूट चादर।
ग्वाले सहम गए। एक-एक पशु ठिठुरने और काँपने लगा। बच्चे माँओं से लिपटकर रोने लगे। गायें खुले में खड़ी, भीगती, ठंड से थरथरातीं, रँभातीं, और उनकी रँभाहट आँधी के शोर में डूब-डूब जाती। ओलों की मार से बेहोश होते पशुओं को देखकर ग्वालों और गोपियों के धीरज की डोर टूट गई।
वे सब अपने बच्चों को सीने से चिपकाए, सिर ढाँपे, काँपते-काँपते भागे-भागे कान्हा के पास आए।
”कृष्ण! प्यारे कृष्ण! इस सारे गोकुल के एक आप ही स्वामी हैं, एक आप ही रक्षक। भक्तवत्सल! इन्द्र के इस क्रोध से अब आप ही हमें बचा सकते हैं।”
कान्हा ने एक पल उन भीगे, थरथराते चेहरों को देखा। वे उन्हें त्रिलोकी का स्वामी नहीं, अपना लाला समझकर पुकार रहे थे, और शायद यही पुकार उन्हें परम प्रिय थी। वे हौले से मुस्कुराए। ”घबराइए मत। आप सब मेरे साथ चलिए।”
वे सब गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। कान्हा पर्वत के नीचे जा खड़े हुए। उनके पीछे सारा ब्रज सिमटा था, साँसें फूली हुईं, पलकों पर पानी।

उन्होंने पर्वत की ओर एक बार देखा, जैसे कोई बहुत पुराने मित्र से चुपके से कुछ कहता है। फिर अपना एक हाथ, वही नन्हा हाथ जो कल तक माखन की मटकी में डूबता था, पर्वत की जड़ के नीचे सरका दिया।
उँगलियाँ पत्थर की ठंडी, गीली पसली पर टिकीं। हथेली फैली। और फिर वह हाथ ऊपर उठने लगा।
पहले एक अँगुल। फिर एक बित्ता। ब्रज ने देखा, गोवर्धन की जड़ धरती से अलग होने लगी। गायें ऊपर उठीं तो भी चरती रहीं, झरने ऊपर उठे तो भी बहते रहे। और एक समूचा पर्वत, अपने सारे पेड़ों, गुफाओं, झरनों और चरती गायों समेत, हवा में टिक गया।
नीचे टिका था सात बरस के एक बच्चे का एक हाथ।
पर उस हाथ पर कोई बोझ न था। वज्र की हर बूँद ऊपर उस पथरीली छत पर गिरकर टूट जाती, और वह गड़गड़ाहट भीतर तक उतरती। बालक खड़ा रहा, कोहनी ज़रा भी न झुकी, उँगलियाँ पत्थर पर ज्यों की त्यों फैलीं, और चेहरे पर वही माखन-चोरी वाली हल्की मुस्कान, मानो किसी ने केवल बरसते पानी से बचने को एक छाता तान लिया हो, जैसे कोई नन्हा बच्चा खेल-खेल में बरसाती छत्ता-फूल उखाड़कर अपने सिर पर रख लेता है।
”माताजी, पिताजी, और सब ब्रजवासियो! आइए, सब के सब। अपनी गायों और सारी सामग्री समेत इस पर्वत के गड्ढे में आकर आराम से बैठ जाइए। और देखिए, यह शंका न करना कि मेरे हाथ से यह पर्वत गिर पड़ेगा। तनिक भी मत डरिए।”
गाँव वाले हक्के-बक्के रह गए। पर डर इतना गहरा था कि सोचने का अवकाश न था। सब अपने गोधन, अपनी स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों को साथ लिए, छकड़ों पर सामग्री लादे, एक-एक कर पर्वत के नीचे समा गए।

पर्वत ऊपर अधर में था, और उसके नीचे एक विशाल सूखा आँगन बन गया था। ऊपर पानी की दीवार गिर रही थी, नीचे एक बूँद न आती। भीतर ग्वाले अपनी गायों, स्त्रियों, बच्चों और छकड़ों समेत आराम से बैठ गए, और बाहर बरसते पानी की गूँज दूर किसी समंदर-सी सुनाई देती रही।
कान्हा हाथ पर पर्वत थामे खड़े रहे, चेहरे पर वही हल्की मुस्कान।
एक दिन बीता। दूसरा। तीसरा।
बालक न थका, न उसकी साँस उखड़ी, न उसे भूख-प्यास की कोई याद रही। भूख-प्यास की पीड़ा, आराम की ज़रूरत, ये सब कुछ भुलाकर वह एक डग भी अपनी जगह से इधर-उधर न हुआ। पर्वत जैसा था वैसा रहा, बालक जैसा था वैसा रहा। बीच में ग्वाले, गायें और गोपियाँ बैठीं, उसी छोटे-से मुख की ओर देखतीं, जो अब भी मक्खन माँगने वाले उसी लाला का था। पहले दिन वे डर से उसकी ओर देखते थे, तीसरे दिन प्रेम से, और किसी ने धीरे से कहा, कहाँ तो यह सात बरस का नन्हा-सा बच्चा, और कहाँ इतना बड़ा गिरिराज सात दिन एक हाथ पर। माँएँ बार-बार उठतीं, उस हाथ की ओर बढ़तीं, फिर रुक जातीं, और लौटकर बैठ जातीं, उनकी गोद आप ही फैल जाती और आप ही सिमट जाती।
इन्द्र ऊपर से देख रहे थे। उनकी बरसात अपना सारा ज़ोर लगा रही थी, और नीचे एक हाथ था, जो टस से मस न होता। उनका संकल्प पूरा न हुआ, और उनकी सारी हेकड़ी धीरे-धीरे बंद होती चली गई।
यों सात दिन बीत गए।
आख़िर इन्द्र की समझ में आ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं।
उन्होंने अपने बादल वापस बुला लिए। पानी थम गया, और छँटते बादलों के बीच धूप की एक पतली किरण ब्रजभूमि पर उतरी।
कान्हा ने पर्वत को धीरे से, बहुत संभालकर, उसी की जगह पर रख दिया, जैसे कोई सोए हुए बच्चे को बिछौने पर लिटाता है।
ग्वाले एक-एक कर बाहर निकले। उनके चेहरे भीगे न थे, पर बदले हुए थे। जिस लाला की शरारतों पर वे हँसते थे, उसी के हाथ पर सात दिन उनका सारा संसार टिका रहा था।
थोड़ी देर में इन्द्र स्वयं आए, चुपके से, अकेले। वही इन्द्र जो सात दिन पहले क्रोध में भरकर प्रलय का आदेश दे रहे थे, अब किसी की नज़र से बचते हुए कान्हा के सामने आ खड़े हुए, और उस नन्हे लाला के चरणों पर अपना सूर्य-सा तेजस्वी मुकुट टिका दिया।
”क्षमा कीजिए, प्रभु। मैं आपको पहचान न सका।”
कान्हा ने उन्हें उठाया। चेहरे पर वही हल्की मुस्कान, क्रोध की एक रेखा तक नहीं। मेघ-सी गम्भीर वाणी में, हँसते हुए, वे बोले, ”इन्द्र, आप ऐश्वर्य के मद में चूर हो रहे थे, इसीलिए आप पर अनुग्रह करके मैंने आपका यज्ञ भंग किया, कि आप मुझे सदा स्मरण रखें। अब अपनी अमरावती लौट जाइए, और फिर कभी घमंड न कीजिए।”

और तभी गौओं की माता सुरभि, गोलोक से, इन्द्र के साथ कान्हा के पास आ पहुँचीं। ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्होंने उन्हें अपना इन्द्र मानकर अपने ही दूध की धाराओं से उस बालक का अभिषेक किया, और इन्द्र ने ऐरावत की सूँड में आकाश-गंगा का निर्मल जल भरकर उन पर उँडेल दिया। गायों के स्वामी, गोपों के रक्षक, उस बालक का वहीं एक नाम पड़ा, गोविन्द। ऊपर देवता फूलों की वर्षा करने लगे, और नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व उनके यश का गान करने लगे, और अप्सराएँ आनन्द से भरकर नृत्य करने लगीं।
इन्द्र देवताओं आदि के साथ स्वर्ग को लौट गए, और उनके पीछे आसमान पूरा खुल गया। धुले हुए गोवर्धन पर धूप उतरी, झरने फिर बहने लगे, और भीगी घास में गायें सिर झुकाए चरने लगीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने पूछा, ”मुनिवर, गाँव वालों को तो पता ही न था कि उनके सिर पर कौन-सा हाथ है। वे तो उसे अपना लाला समझकर ही दौड़े चले आए थे। फिर भी वे बच गए।”
शुकदेव हौले से मुस्कुराए। ”राजन्, इन्द्र को सात दिन की प्रलय और एक उठे हुए पर्वत के बाद पहचान हुई। ब्रज के ग्वालों को पहचान कुछ भी नहीं थी, बस एक पुकार थी, कृष्ण, आप ही हमारे रक्षक हैं, अब आप ही बचा सकते हैं। और भगवान् का व्रत यही है, जो केवल एक बार उनकी शरण में आ जाता है और कहता है, मैं आपका हूँ, उसे वे सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देते हैं। पर्वत तो वे पीछे उठाते हैं, राजन्। पहले वे केवल उस पुकार को थाम लेते हैं।”
राजा ने अपनी ओर बढ़ते सात दिनों के बारे में फिर कुछ न पूछा। उन्होंने गंगा की ओर देखा, और देर तक उस पुकार पर मन टिकाए चुप बैठे रहे। एक दिन और बीत चला था।
एक बालक चली आ रही रीत से पूछ बैठता है, क्यों। बाबा का सतर्क बूढ़ा हर बार इसी एक बेटे के आगे पिघल जाता है। पूजा गायों की, ब्राह्मणों की, और उस पास खड़े पर्वत की हो जाती है, जिसकी छाँव में गायें रोज़ सुस्ताती हैं और जिसकी ओर आँख शायद ही उठती है।
फिर सात दिन की प्रलय। खंभे जितनी मोटी धाराएँ, ओले, और एक नन्हा हाथ जो पत्थर की गीली पसली के नीचे सरक जाता है। उँगलियाँ फैलती हैं, और एक समूचा पर्वत हवा में टिक जाता है, उस हाथ पर मानो कोई बोझ ही न हो।
नीचे ग्वाले बैठे हैं। ऊपर उनका सारा संसार अधर में टिका है, उसी छोटे-से मुख के नीचे जो कल तक माखन माँगता घूमता था। माँएँ बार-बार उस हाथ की ओर बढ़ती हैं और लौट आती हैं।
इन्द्र को पहचान सातवें दिन हुई, प्रलय और पर्वत के बाद। और जिन्होंने उसे केवल अपना लाला समझकर पुकारा था, वे पहले दिन ही उसी की छाँव में आ बैठे थे। दोनों एक ही हाथ के नीचे थे। फिर किसकी पहचान सच्ची थी?
साहित्यिक-संदर्भ
गोवर्धन-धारण की कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 24 से 27 में आती है। कृष्ण नंदबाबा से कहते हैं कि यज्ञ गायों, ब्राह्मणों और गिरिराज, तीनों का हो (10.24.25, 28-29), और चाण्डालों, पतितों, कुत्तों तक को अन्न तथा गायों को घास दी जाए। इन्द्र प्रलयकारी सांवर्तक मेघों को आदेश देते हैं, और सात दिन की वर्षा होती है (10.25.23, ”सप्ताहं नाचलत् पदात्”)। बालक की आयु सात वर्ष है (10.24.3)। एक हाथ से पर्वत उठाना बच्चे के बरसाती छत्ते उठाने जैसा बताया गया है (10.25.19, ”छत्राकमिव”)। कृष्ण ”शैल मैं ही हूँ” (शैलोऽस्मि) कहकर भोग ग्रहण करते हैं। इसके बाद सुरभि और इन्द्र मिलकर उनका अभिषेक कर उन्हें ‘गोविन्द’ नाम देते हैं (10.27)। सात दिन की वर्षा का परीक्षित् के अपने सात दिनों के साथ एक मौन अनुनाद है।
यही कथा वहाँ भी
- हरिवंश · गोवर्धन-धारण
हरिवंश का गोवर्धन-धारण