अम्बरीष और दुर्वासा

कथा 46 · भागवतम् की कथाएँ

अम्बरीष और दुर्वासा

When the Discus Chased a Sage
स्कन्ध 9, अध्याय 4-5

अम्बरीष एक राजा थे। एक भक्त राजा।

उनकी एक practice थी, हर एकादशी को व्रत रखना। दो दिन का व्रत। बारह घंटे का प्रत्येक दिन। पानी भी नहीं।

बारहवें दिन सुबह, सूर्योदय के तुरंत बाद, वो व्रत खोलते। एक विशेष विधि से।

एक एकादशी थी। अम्बरीष ने व्रत पूरा किया। बारस की सुबह।

वो स्नान कर रहे थे, मन्दिर में जाने वाले थे, व्रत खोलने।

तभी एक मेहमान आया।

दुर्वासा ऋषि।

दुर्वासा ऋषि अपने ग़ुस्से के लिए famous थे। वो जहाँ जाते, सब डरते।

अम्बरीष ने तुरंत उनका सत्कार किया। ”आइए, मुनिवर। मैं आपका स्वागत करता हूँ।”

दुर्वासा बोले, ”मैं भूखा हूँ। तू एक भक्त राजा है। मुझे खाना खिला।”

”ज़रूर। थोड़ी देर रुकिए। मैं भी अभी व्रत खोलूँगा। साथ ही खाना खाएँगे।”

”पहले मैं स्नान कर लूँ। फिर खाने आता हूँ।”

वो नदी की तरफ़ गए।

अम्बरीष इंतज़ार करते रहे।

बारस का दिन गुज़र रहा था।

और एक खास नियम था। बारस के दिन का व्रत-समाप्ति एक specific time पर होनी चाहिए। नहीं तो व्रत बेकार।

वो time आ रहा था।

अम्बरीष ने अपने पुरोहितों से सलाह ली।

”क्या करूँ? दुर्वासा अभी तक नहीं आए। और एक मेहमान के बिना खाना भी नहीं ले सकता। पर व्रत-समाप्ति का समय निकल जाएगा।”

पुरोहितों ने एक middle रास्ता सुझाया।

”राजा, थोड़ा सा पानी पी लीजिए। ताकि व्रत-समाप्ति का नियम पूरा हो। यह formal रूप से भोजन नहीं है। बस अनुष्ठान।”

”ठीक है।”

अम्बरीष ने एक चम्मच पानी लिया।

तभी दुर्वासा वापस आए।

उन्होंने यह देखा।

और एक झटके में ग़ुस्से में।

”अम्बरीष! तू ने मेरे बिना भोजन शुरू किया? यह एक ब्राह्मण का अपमान है। तू एक राक्षस है।”

साधोरापदग्रस्तस्य पाण्डवस्य ।
शस्त्रवीर्यप्रसृज्योद्धरते सहसा सः ॥

अपने भक्त की रक्षा के लिए, संकट में, विष्णु का चक्र अपने आप प्रकट होता है। यह उनकी अपनी इच्छा है, बिना पुकारे।

वो ग़ुस्से में अपने सिर से एक बाल खींचा।

उससे एक भयानक रूप निकला। कृत्या। एक राक्षसी।

”इस अम्बरीष को मार!”

कृत्या अम्बरीष पर टूटी।

अम्बरीष शान्त खड़े थे। बिना हिले।

और तभी विष्णु का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ।

एक चमकता हुआ डिस्क। आसमान से।

वो कृत्या पर गिरा। उसको एक झटके में मारा।

फिर वो दुर्वासा की तरफ़ मुड़ा।

दुर्वासा डर गए। ”यह क्या?”

”भागिए, ऋषिवर!” अम्बरीष ने कहा। ”चक्र आप के पीछे है!”

दुर्वासा भागे।

एक उम्र भर के तपस्वी, ग़ुस्से के मास्टर, अब अपनी जान के लिए भाग रहे थे।

वो पहले ब्रह्मा के पास गए। ”ब्रह्मा! मुझे बचाओ!”

ब्रह्मा बोले, ”मैं नहीं बचा सकता। यह विष्णु का चक्र है।”

शिव के पास। ”शिव! बचाओ!”

शिव बोले, ”मैं नहीं बचा सकता। यह विष्णु का चक्र।”

आख़िर ख़ुद विष्णु के पास। ”प्रभु! मुझे बचाइए!”

विष्णु ने एक हलकी मुस्कान दी।

”मुझे आप का सम्मान है, ऋषिवर। पर एक बात।”

”मेरा चक्र मेरे भक्त की रक्षा कर रहा है। उसका भक्त ख़ुद ही फ़ैसला कर सकता है।”

”आपको मेरा भक्त रोक सकता है। उसी के पास जाइए।”

दुर्वासा वापस अम्बरीष के पास।

एक उम्र भर ग़ुस्सेवाला ऋषि अब एक राजा के पैर छू रहा था।

”हे राजन्! क्षमा करिए। मुझे रोकिए।”

अम्बरीष ने हाथ जोड़े। ”ऋषिवर, उठिए।”

उसने विष्णु से प्रार्थना की। ”हे प्रभु, मैं चाहता हूँ चक्र रुक जाए। ऋषि को क्षमा।”

चक्र रुका। दुर्वासा सुरक्षित।

वो ज़मीन पर बैठे। थके हुए।

”अम्बरीष,” उन्होंने कहा, ”आज मुझे एक सबक मिला। एक भक्त की शक्ति किसी ऋषि से कम नहीं।”

”मैंने तुम्हें छोटा समझा। मैं ग़लत था।”

अम्बरीष ने उन्हें खाना खिलाया। दोनों ने साथ बैठकर खाया।

और दुर्वासा वो आदमी थे ही नहीं, इस के बाद।

मन्थन

अम्बरीष-दुर्वासा कथा एक interesting balance दिखाती है।

एक तरफ़ एक powerful ऋषि। दूसरी तरफ़ एक quiet भक्त।

और एक मुठभेड़।

दुर्वासा ग़ुस्से में थे। उन्होंने एक तकनीकी ग़लती को बड़ी बना लिया। एक चम्मच पानी।

अम्बरीष ने माफ़ी माँगने की कोशिश की। मगर दुर्वासा कब सुनते?

वो अपनी shakti निकाली। एक कृत्या भेजी।

मगर भगवान ने अपना चक्र भेजा। और कथा बदल गई।

इस कथा का एक powerful message है। तपस्या से शक्ति आती है। पर शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी भी।

दुर्वासा सालों से तपस्या कर रहे थे। पर उनका ग़ुस्सा शान्त नहीं हुआ। और अंत में, उनकी अपनी shakti उन्हीं के against चली।

एक राजा, जिसने सिर्फ़ भक्ति की, वो उनसे ऊँचा निकला।

क्यों? क्योंकि भक्ति में surrender है। तपस्या में संकल्प है।

संकल्प के सामने भगवान-सहायता नहीं आती तुरंत। surrender के सामने आती है।

और भागवतम् यहाँ एक quiet statement करता है। भक्त की शक्ति, ऋषि की शक्ति से बड़ी।

क्योंकि भक्त के पास भगवान खुद हैं।