Lulla Family

अम्बरीष और दुर्वासा

कथा 46 · भागवतम् की कथाएँ

अम्बरीष और दुर्वासा

जहाँ चक्र भक्त के एक इशारे पर रुक गया
स्कन्ध 9, अध्याय 4-5
Rich painterly classical-Indian color illustration: on the sunlit bank of the slow-flowing Ganga, aged sage Shukadeva (radiant, ascetic, seated cross-legged) discourses to King Parikshit (crowned, seated humbly before him); the river's gentle morning ripples and soft golden light, a calm frame-story scene of storyteller and listener.

गंगा का जल उस सुबह कुछ धीमे बह रहा था, जैसे वह भी सुनने को ठहर गया हो। परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा। छह दिन अब बीत चुके थे।

”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”कल आपने उस गजराज की बात कही थी, जिसकी पुकार पर श्रीहरि गरुड़ पर चढ़कर दौड़े चले आए। मैं राजा रहा हूँ। मैंने सेनाएँ देखी हैं, अस्त्र देखे हैं, तपस्वियों के शाप का बल भी देखा है। पर यह बात मेरे भीतर बैठती नहीं। एक निहत्था भक्त, जिसके पास न सेना है न तप, वह किस बल पर खड़ा रहता है?”

शुकदेव मुस्कुराए, और उनकी वाणी में वह गरमाहट आ गई जो हरि-कथा पर आती है।

”राजन्, बल भक्त का अपना नहीं होता। वह उसका होता है जिसके चरणों में भक्त ने अपने को रख दिया है। एक राजा थे, अम्बरीष। सुनिए, उस दिन एक क्रोधी मुनि उनकी परीक्षा लेने आए थे, और अंत में उन्हीं मुनि को उन्हीं राजा के चरणों में शरण लेनी पड़ी।”

Rich painterly classical-Indian color illustration: the devout King Ambarisha, a richly robed emperor whose crown and jewels seem light as dust to him, absorbed in devotion inside a temple of Vishnu, hands serving at the altar, lips singing Hari's glory, eyes turned toward the four-armed Lord; an aura of single-minded bhakti, lamps and flowers around the shrine.

अम्बरीष राजा थे, और इतने बड़े राज्य के स्वामी थे कि सात द्वीपों की धरती उनके अधीन कही जाती। पर जिस घड़ी वे श्रीहरि का स्मरण करते, राजपाट उन्हें मुट्ठी भर धूल जैसा लगता। उनका मन गोविन्द के चरणों में रहता, वाणी में उनका यश, हाथ मन्दिर की सेवा में, और कान केवल हरि-कथा सुनने को तरसते।

एक व्रत उन्होंने धारण किया था। पूरे एक बरस का। हर एकादशी को निर्जल उपवास, और बारस की सुबह विधि से पारण। न अन्न, न जल, जब तक वह घड़ी न आ जाए।

बरस पूरा होने को था। कार्तिक की वह अंतिम एकादशी बीती। अम्बरीष ने तीन रात जल तक नहीं छुआ था। बारस की सुबह वे यमुना के तट पर स्नान कर, पारण की तैयारी में थे, कि एक अतिथि आ पहुँचे।

दुर्वासा मुनि। जिनके नाम से इन्द्रलोक तक काँप जाता था। जिनका क्रोध जटाओं में आग की तरह सोया रहता और किसी भी पल जाग सकता था।

Rich painterly classical-Indian color illustration: at the courtyard near the Yamuna on the Dvadashi morning, King Ambarisha bows with folded hands welcoming the formidable sage Durvasa (matted-haired, fiery-eyed ascetic) as an honored guest; a freshly laid feast for the vow-breaking parana waits behind them, the river glinting nearby.

अम्बरीष आगे बढ़कर झुके, हाथ जोड़े। ”आइए, मुनिवर। आपके चरण इस आँगन में पड़े, यह मेरा सौभाग्य है। भोजन तैयार है। आज पारण का दिन है, हम साथ बैठेंगे।”

दुर्वासा प्रसन्न हुए। ”ठीक है, राजन्। पहले हम स्नान-आह्निक कर लें, फिर आते हैं। हमारे आने तक रुकिएगा।”

वे यमुना की ओर चले गए।

अम्बरीष प्रतीक्षा करते रहे। घड़ी सरकती रही। बारस का वह संधि-क्षण पास आ रहा था, जिसके भीतर पारण न हो तो बरस भर का व्रत अधूरा रह जाता। दुर्वासा का कहीं पता नहीं था।

अम्बरीष ने अपने आचार्य-ब्राह्मणों की ओर देखा। ”क्या करूँ? अतिथि से पहले भोजन करना ब्राह्मण का अनादर है, और मुनि लौटे नहीं। पर पारण की घड़ी निकल गई तो बरस भर की तपस्या मिट्टी हो जाएगी। दोनों ओर धर्म है, और दोनों मुझसे टूटते दिख रहे हैं।”

धर्म के जानकार उन ब्राह्मणों ने सिर जोड़कर विचार किया।

”महाराज, शास्त्र में इसका एक मार्ग है। केवल थोड़ा जल ग्रहण कर लीजिए। श्रुति में आया है कि जल पीना भोजन करना भी है, और नहीं भी। इससे पारण की मर्यादा भी रह जाएगी, और अतिथि के साथ भोजन का नियम भी नहीं टूटेगा।”

अम्बरीष ने श्रीहरि का स्मरण किया, और चुल्लू भर जल अपने होंठों से लगा लिया। फिर भी हाथ जोड़े मुनि की राह देखते बैठ गए।

उसी क्षण दुर्वासा लौटे।

उन्होंने दूर से ही भाँप लिया कि राजा जल ग्रहण कर चुके हैं। और जो आग जटाओं में सोई थी, वह एक झटके में जाग उठी। उनका सारा शरीर काँपने लगा, भौंहें तन गईं।

”अम्बरीष! हमारे रहते, हमें बुलाकर, हमारे बिना आपने भोजन आरम्भ कर दिया? अपने ऐश्वर्य के मद में आप भूल गए कि ब्राह्मण क्या होता है। आज आपको अपने इस अपमान का फल मिलेगा।”

अम्बरीष ने हाथ जोड़े, सिर झुका लिया, पर कुछ कहा नहीं। जो धर्म की मर्यादा रखने को किया था, उसकी सफाई वे क्रोधित मुनि के सामने देना नहीं चाहते थे।

दुर्वासा ने अपनी जटा से एक लट उखाड़ी और क्रोध से धरती पर दे मारी। उससे प्रलयकाल की आग जैसी दहकती एक भयंकर कृत्या प्रकट हुई, हाथ में जलती तलवार।

”इस राजा को भस्म कर डाल!”

कृत्या तलवार उठाए अम्बरीष पर टूट पड़ी, उसके पैरों की धमक से धरती काँप उठी।

अम्बरीष टस से मस न हुए। उन्होंने न अस्त्र उठाया, न पीछे हटे। बस श्रीहरि का स्मरण करते, हाथ जोड़े, खड़े रहे। उनके भीतर डर की एक रेखा भी न थी, क्योंकि जिसने अपने को गोविन्द को सौंप दिया हो, उसके पास खोने को बचता ही क्या है।

Rich painterly classical-Indian color illustration: a blazing demoness Kritya wielding a flaming sword rushes at the calm, folded-handed King Ambarisha, while Vishnu's brilliant Sudarshana chakra, a whirling disc of fire bright as a thousand suns, manifests to guard the devoted king; the demoness's fiery form paling before the radiant wheel.

और तभी, जिस श्रीहरि का वे निरंतर स्मरण करते थे, उन्हीं का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ। उसे पहले ही भगवान् ने अपने सेवक की रक्षा में नियुक्त कर रखा था।

एक घूमता हुआ अग्नि-मण्डल, सहस्र सूर्यों-सा तपता। उसकी तपन से कृत्या का जलता रूप भी फीका पड़ गया।

जैसे क्रोध से फुफकारते साँप को आग भस्म कर देती है, वैसे ही चक्र ने एक ही पल में कृत्या को जलाकर राख कर दिया।

फिर सुदर्शन उस ओर मुड़ा जिसने कृत्या को भेजा था।

दुर्वासा की आँखों के सामने अपनी ही भेजी मृत्यु अब उन्हीं की ओर लौट रही थी। उनके मुख से निकला, ”यह क्या!”

अम्बरीष कुछ न बोले। हाथ जोड़े, सिर झुकाए, वहीं खड़े रहे। न उन्होंने चक्र को रोका, न उकसाया। उस घड़ी भी उनके मन में मुनि के लिए बैर की एक रेखा तक न थी।

दुर्वासा अपने प्राण बचाने को जी छोड़कर भागे।

एक उम्र तप में बिताने वाले मुनि, जिनके क्रोध से लोक काँपते थे, अब अपने प्राणों के लिए दौड़ रहे थे। चक्र उनके पीछे, उतनी ही दूरी पर, उतनी ही तपन के साथ।

Rich painterly classical-Indian color illustration: the terrified sage Durvasa fleeing in panic across the cosmos, through the sky, over the earth, into the nether worlds and ocean, hiding in a cave of Mount Sumeru, while the unbearable burning Sudarshana chakra pursues him relentlessly at a fixed distance, blazing close behind.

वे दिशाओं में, आकाश में, धरती पर, अतल-वितल आदि नीचे के लोकों में, समुद्र में, लोकपालों के रक्षित लोकों और स्वर्ग तक भागते फिरे। सुमेरु की एक गुफा में जा छिपे। पर जहाँ-जहाँ वे गए, वहीं-वहीं उन्होंने उस असह्य तेज वाले सुदर्शन को अपने पीछे लगा देखा।

हारकर वे ब्रह्मा के पास पहुँचे। ”पितामह! मुझे शरण दीजिए, मुझे बचाइए!”

ब्रह्मा ने हाथ खड़े कर दिए। ”यह श्रीहरि का सुदर्शन है। मैं, शंकरजी, दक्ष, भृगु आदि प्रजापति, देवेश्वर, सब उन्हीं के बनाए नियमों में बँधे हैं। जहाँ वह भक्त की रक्षा में चला हो, वहाँ उनके भक्त के द्रोही को बचाने का बल मुझमें नहीं।”

दुर्वासा कैलास भागे, शिव के चरणों में गिरे। ”महादेव! बचाइए!”

शिव ने करुणा से देखा। ”मुनि, यह विश्वेश्वर का शस्त्र है, हम सबके लिए असह्य है। हम सनकादि, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिल, सब उसी एक की माया के घेरे में हैं। इसे रोकने का सामर्थ्य न हममें है, न किसी और में। जिसने इसे चलाया है, उसी एक की शरण में जाइए, वही आपका मंगल करेंगे।”

अंत में दुर्वासा सीधे वैकुण्ठ पहुँचे, श्रीहरि के चरणों में गिर पड़े। ”प्रभु! मैं आपकी शरण में हूँ। आपका परम प्रभाव न जानने के कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्त का अपराध किया है। मुझे इस चक्र से बचाइए! आपके तो नाम का उच्चारण करने से नरकी जीव भी मुक्त हो जाता है।”

श्रीहरि के मुख पर एक हलकी-सी मुस्कान थी, उसमें न उपहास था, न क्रोध।

”मुनिवर, हम आपका आदर करते हैं। पर एक बात सुनिए। हम सर्वथा अपने भक्तों के अधीन हैं, हममें तनिक भी स्वतंत्रता नहीं। हमारे सीधे-सादे सरल भक्तों ने हमारे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत से सदाचारी पति को वश में कर लेती है, वैसे ही हमारे संत भक्तों ने हमें अपने प्रेम से अपने वश में कर रखा है।”

”यह चक्र हमारे भक्त की रक्षा में चला है। हम इसे अपनी ओर से नहीं रोक सकते। जिसके लिए यह चला है, उसी के पास लौटिए। अम्बरीष से क्षमा माँगिए। वही आपको शान्ति दे सकता है।”

दुर्वासा को अपना सारा तप उस घड़ी छोटा जान पड़ा। एक बरस से वे भाग रहे थे, और जो आश्रय वे तीनों लोकों में ढूँढ़ते फिरे, वह उसी राजा के चरणों में था जिसे उन्होंने जलाना चाहा था।

वे लौटकर अम्बरीष के पास आए। उम्र भर जिस मुख से शाप झरते थे, वह अब एक राजा के पैरों पर झुका था।

”हे राजन्! मुझे क्षमा कर दीजिए। मेरे अपराध को भूल जाइए। केवल आप ही मुझे रोक सकते हैं।”

अम्बरीष का हृदय काँप उठा। एक ब्राह्मण, एक मुनि, उनके चरणों में। उन्होंने झपटकर दुर्वासा के चरण थाम लिए।

”मुनिवर, यह क्या करते हैं! उठिए। मैं तो आपका सेवक हूँ।” राजा का यह बरस भी कम कठिन न बीता था, वे इसी द्वार पर मुनि की राह देखते, बिना अन्न-जल के खड़े रहे थे, इस आस में कि अतिथि लौटें तो भोजन कराएँ।

Rich painterly classical-Indian color illustration: King Ambarisha standing with folded hands turned toward the flaming Sudarshana chakra, offering heartfelt praise to pacify it, while the humbled sage Durvasa kneels at the king's feet begging forgiveness; the fierce fiery disc beginning to soften, divine compassion in the scene.

फिर अम्बरीष ने हाथ जोड़कर सुदर्शन की ओर मुख किया, और उसकी वही स्तुति की जो हृदय से उठती है। ”हे अग्नि-रूप सुदर्शन, आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं, आप समस्त यज्ञों के अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं। आप समस्त लोकों के रक्षक और परमपुरुष के श्रेष्ठ तेज हैं। यदि मैंने कभी सच्चे मन से हरि की सेवा की हो, यदि मेरे प्राणों में उन्हीं का वास हो, तो शान्त हो जाइए। इन मुनि पर कृपा कीजिए। इनका कल्याण हो।”

चक्र की तपन शान्त पड़ गई, और वह श्रीहरि के पास लौट गया। दुर्वासा का प्राण लौटा।

वे थककर वहीं धरती पर बैठ गए, जैसे किसी ने भीतर से सारा अहंकार निचोड़ लिया हो।

”राजन्,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, ”आज मैंने वह देखा जो उम्र भर के तप में न देख पाया। भगवान् के प्रेमी भक्तों की महिमा कितनी बड़ी है। आपने अपने ऊपर चले अपराध को भुलाकर उसी की रक्षा की प्रार्थना की, जिसने आपको मारना चाहा।”

”मैंने आपको एक साधारण राजा समझा था। मैं नहीं जानता था कि श्रीहरि अपने भक्त के हृदय में स्वयं बैठे हैं।”

अम्बरीष ने उन्हें आदर से बैठाया, अपने हाथों से भोजन परोसा। एक बरस की प्रतीक्षा के बाद राजा ने उस दिन अतिथि के साथ ही अपना पारण किया।

मन्थन

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा की लहरों पर सुबह की धूप काँप रही थी।

”देखिए, राजन्। दुर्वासा ने उम्र भर तप किया था। उस तप से उन्होंने इतनी शक्ति पाई कि एक लट से कृत्या रच दी। पर वह शक्ति उन्हीं के पीछे दौड़ी, क्योंकि वह उनकी अपनी अर्जित की हुई थी, उसे सँभालने का भार भी उन्हीं पर था।”

”अम्बरीष के पास कोई अर्जित शक्ति न थी। उन्होंने केवल इतना किया था कि अपने को पूरी तरह श्रीहरि के हाथ में रख दिया। जो जल उन्होंने पिया, वह भी अपने लिए नहीं, धर्म की मर्यादा के लिए था। और जो रक्षा हुई, उसके लिए उन्होंने हाथ तक नहीं उठाया।”

परीक्षित् ने धीरे से पूछा, ”तो भगवन्, श्रीहरि ने स्वयं कहा कि वे अपने भक्त के अधीन हैं। वे, जो सबके स्वामी हैं, एक राजा के एक इशारे के बन्धन में कैसे?”

”यही तो प्रेम का रहस्य है, राजन्।” शुकदेव की वाणी और कोमल हो गई। ”श्रीहरि किसी से नहीं हारते, पर अपने भक्त के प्रेम से वे स्वयं हार जाना चाहते हैं। बल से उन्हें कोई नहीं बाँध सकता। पर जो अपना सब कुछ उन्हें सौंप दे, उस भक्त की एक प्रार्थना पर वे अपना चक्र तक लौटा लेते हैं।”

”दुर्वासा सोचते थे कि वे राजा से बड़े हैं। एक बरस तीनों लोकों में दौड़ने के बाद उन्होंने जाना, जिसके हृदय में श्रीहरि बसें, वह सब में ऊँचा है, चाहे वह सिंहासन पर बैठा हो या वन में।”

परीक्षित् कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, ”भगवन्, मेरे पास अब एक दिन है। मेरे हाथ में न चक्र है, न तप। पर शायद यही मेरे लिए अच्छा है।”

शुकदेव ने स्नेह से उनकी ओर देखा, और कुछ नहीं कहा। दूर एक चकवा जल पर से उड़ा, और उसकी छाया गंगा की धारा पर एक पल ठहरकर बह गई।

साहित्यिक-संदर्भ

अम्बरीष और दुर्वासा का प्रसङ्ग श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 4 और 5 में आता है। कथा में अम्बरीष का चरित (9.4.18-20) परम प्रिय है, जहाँ उनका मन हरि के चरणों में, वाणी उनके यश में, और सब इन्द्रियाँ उनकी सेवा में लगी बताई गई हैं। सुदर्शन-चक्र का दुर्वासा को एक वर्ष तक तीनों लोकों में खदेड़ना (9.4.46-52) इसी स्कन्ध का है।

यहाँ श्रीहरि का वह वचन (9.4.63-68) इस संग्रह की अत्यन्त गहरी पंक्तियों में है, कि वे अपने अनन्य भक्तों के अधीन हैं, जैसे सती स्त्री के वश में पति। दास्य-भक्ति का यह आदर्श गजेन्द्र की पुकार और प्रह्लाद की निर्भयता से जुड़ता है।

कथा का मर्म

अम्बरीष का बल उनके राजपाट में नहीं था, न किसी अस्त्र में। एक बरस का कठोर व्रत भी उन्होंने अपने नाम के लिए नहीं रखा था। जो शक्ति अपने तप से अर्जित की जाती है, वह सँभालनी भी अपने ही बल पर पड़ती है, और दुर्वासा ने यही जाना। जिसने अपना सब कुछ श्रीहरि के चरणों में रख दिया, उसके पीछे स्वयं उनका चक्र खड़ा रहता है, बिना पुकारे।