जय-विजय का शाप
गंगा का जल उस सुबह बहुत धीमे बह रहा था, जैसे वह भी सुनने को ठहर गया हो। परीक्षित् ने रात भर आँख नहीं झपकाई थी। आज उन्होंने शुकदेव की ओर देखा और कुछ देर चुप रहे, फिर पूछा।
”भगवन्, आपने उस वराह की बात कही थी, जिसने धरती को उठाया, और उस हिरण्याक्ष की, जो उसी के हाथ से मरा। एक बात मन में बैठ गई है। ऐसे जीव, जो भगवान् से बैर रखते हैं, जो उन्हें मारने पर तुले रहते हैं, उनकी मृत्यु को आप मुक्ति क्यों कहते हैं? मेरे पास गिनती के दिन बचे हैं, और मैं यह समझना चाहता हूँ, कि क्या द्वेष भी कोई द्वार है।”
शुकदेव की दृष्टि कुछ पल जल पर ठहरी। फिर वे मुसकराए, जैसे यह प्रश्न उन्हें भीतर तक भाया हो।
”राजन्, जिसे आप शत्रु कहते हैं, वह कभी श्रीहरि का अपना भी रहा होता है। सुनिए, यह कथा उन्हीं दो की है, जिनसे आपके वराह और नृसिंह, दोनों आरम्भ होते हैं।”
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”आपको स्मरण होगा, राजन्, कि दिति ने अपने पतिदेव कश्यप के तेज को सौ वर्ष तक अपने गर्भ में धारण किए रखा था। उसी गर्भ के तेज से सब लोकों का प्रकाश मन्द पड़ने लगा, और इन्द्रादि लोकपाल भी तेजहीन हो उठे। तब देवता घबराकर ब्रह्माजी के पास गए कि सारी दिशाओं में अन्धकार छा रहा है। ब्रह्माजी ने उन्हें ढाढ़स बँधाते हुए जो कथा सुनाई, वह वैकुण्ठ के द्वार की है।”
वैकुण्ठ में दो द्वारपाल रहते थे। जय और विजय।
दोनों भगवान् विष्णु के अत्यन्त निकट के पार्षद। जीवन भर का काम एक ही था, श्रीहरि के निवास के द्वार पर खड़े रहना, और जो भी भीतर जाना चाहे, उसे पहले परखना।
एक दिन चार ऋषि वैकुण्ठ की ओर चले आए। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। ब्रह्मा के मानस-पुत्र। ब्रह्मा की सृष्टि में आयु में सब में बड़े होने पर भी देखने में पाँच बरस के बालकों जैसे, और दिगम्बर, नग्न-धड़ंग चलने वाले।
इन चारों के मन पर कोई परत न थी। किसी वस्तु से कोई मोह नहीं, किसी द्वार पर कोई झिझक नहीं। वे श्रीहरि के दर्शन को भीतर जाना चाहते थे।

सोने और रत्नजटित किवाड़ों वाली छह ड्योढ़ियाँ उन्होंने बिना रोक-टोक के लाँघ लीं। सातवीं ड्योढ़ी पर जय और विजय ने बेंत अड़ाकर उन्हें रोक दिया।
दोनों ने उनकी निःसंकोच चाल देखकर श्रीहरि के स्वभाव के विपरीत हँसी उड़ाई। ”ठहरिए। भीतर जाने का यह ढंग नहीं।”
चारों ने एक-दूसरे को देखा। उनकी दृष्टि तो सर्वत्र समान थी, वे निःशंक होकर सब जगह बिना किसी रोक-टोक के विचरते थे। पर अपने प्रियतम प्रभु के दर्शन में विघ्न पड़ते देख उनके नेत्र कुछ-कुछ क्रोध से लाल हो उठे।
”अरे द्वारपालो,” वे बोले, ”जो लोग भगवान् की महती सेवा के प्रभाव से इस लोक में निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही समदर्शी होते हैं। आप दोनों भी उन्हीं में से हैं, फिर आपके स्वभाव में यह विषमता क्यों? भगवान् तो परम शान्तस्वभाव हैं, उनका किसी से विरोध भी नहीं। आप स्वयं कपटी हैं, इसी से अपने ही समान दूसरों पर शंका करते हैं।”

”आप हैं तो श्रीहरि के पार्षद, किन्तु आपकी बुद्धि बहुत मन्द है। अतएव आपका कल्याण करने के लिए हम आपके अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते हैं। आप इस वैकुण्ठ को छोड़कर उन पापमय योनियों में जाइए, जहाँ काम, क्रोध और लोभ, ये तीन शत्रु निवास करते हैं।”
उस एक वाक्य पर जय और विजय के हाथ नीचे झुक गए।
ऋषियों का यह कठोर वचन सुनकर दोनों समझ गए कि यह शाप किसी भी शस्त्र से नहीं टल सकता। वे अत्यन्त दीन होकर उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर लोट गए।
”भगवन्,” उन्होंने काँपते स्वर में कहा, ”हम अवश्य अपराधी हैं। आपने जो दण्ड दिया, वह उचित ही है, और हमें मिलना ही चाहिए। हमने प्रभु का अभिप्राय न समझकर उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया। इस पाप से यह दण्ड हमें धो ही देगा। पर हमारी दुर्दशा पर थोड़ी करुणा करके इतनी कृपा कीजिए, कि उन अधम योनियों में जाने पर भी हमें भगवान् की स्मृति को मिटाने वाला मोह न घेरे।”
इसी बीच श्रीहरि स्वयं द्वार पर चले आए, अपने सेवकों के अनादर की आहट पर, लक्ष्मीजी के सहित।

उनका श्रीविग्रह बड़ा ही सौन्दर्यशाली था। श्याम वक्षस्थल पर स्वर्णरेखा के रूप में साक्षात् लक्ष्मी विराज रही थीं, गले में कौस्तुभमणि, चारों भुजाओं के बीच मनोहर हार। ऋषियों के नेत्र उनकी छवि निहारते-निहारते तृप्त ही न होते थे। उन्होंने प्रभु को सिर झुकाकर प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।
श्रीहरि एक पल मौन रहे, और उनकी दृष्टि में अपने ही दोनों सेवकों के लिए करुणा थी।
”ऋषिवर,” उन्होंने कहा, ”ये जय और विजय मेरे पार्षद हैं। इन्होंने मेरी परवाह न करके आप लोगों का बड़ा अपराध किया है। आप लोग भी मेरे अनुगत भक्त हैं, इसलिए मेरी ही अवज्ञा के कारण आपने जो दण्ड दिया, वह मुझे भी अभिमत है। ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं। मेरे अनुचरों के द्वारा आप लोगों का जो तिरस्कार हुआ, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिए मैं आप लोगों से प्रसन्नता की भिक्षा माँगता हूँ।”
”मेरे इन सेवकों ने मेरा अभिप्राय न समझकर ही आप लोगों का अपमान किया है। इसलिए मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिए, कि इनका यह निर्वासनकाल शीघ्र ही समाप्त हो जाय, और ये अपने अपराध के अनुरूप अधम गति को भोगकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आएँ।”
ऋषि मान गए।
तब श्रीहरि ने अपने इन सेवकों की ओर देखा।

”आप दोनों को मृत्यु-लोक में जन्म लेना ही है। यह शाप भी मेरी ही प्रेरणा से हुआ है, सुन लीजिए। अब आप दैत्य-योनि को प्राप्त होंगे, और वहाँ बैर के क्रोधावेश में भी आपका मन एकाग्र होकर मुझ में ही टिका रहेगा। उसी सुदृढ़ योग के बल से आप फिर शीघ्र मेरे पास लौट आएँगे।”
जय और विजय ने सिर झुका लिया।
उनकी आँखों में अपने स्वामी से इस बिछोह की पीड़ा थी, और उस लौटने की आस भी।
इस तरह उनका मार्ग तय हुआ।

वे ही दोनों पार्षद वैकुण्ठ से गिरकर दिति के उसी गर्भ में पहुँचे, जिसमें कश्यप का उग्र तेज भरा था। और जब वे जन्मे, तो दो भाई हुए, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु।
हिरण्याक्ष को आगे चलकर वराह रूप ने मारा, और हिरण्यकशिपु को नृसिंह ने। हर बार वे अपने उसी प्रभु के सामने आ खड़े हुए, जिनके द्वार पर कभी पहरा देते थे। हर बार द्वेषी बनकर। और हर बार उन्हीं के हाथों मरकर वैकुण्ठ लौट आए।
शुकदेव क्षण भर रुके। ”राजन्, भागवत आगे बतलाता है, कि यही दो पार्षद इस लोक में फिर भी आए, रावण और कुम्भकर्ण बनकर, और एक बार और, शिशुपाल और दन्तवक्र बनकर। पर वह आगे की कथा है। यहाँ तो बस इतना, कि वैकुण्ठ का द्वार छोड़कर वे दिति के गर्भ में उतरे।”
कथा यहीं ठहर गई। गंगा का जल बहता रहा, और परीक्षित् कुछ देर कुछ न बोले।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, ”भगवन्, मुझे यह अब भी अचरज में डालता है। वैकुण्ठ के द्वारपाल थे, श्रीहरि के अपने। फिर भी द्वेष का वेश धरकर लौटे, प्रेम का नहीं।”
शुकदेव बोले, ”राजन्, सोचिए, वे प्रभु से एक पल की भी दूरी न सह सके। शाप तो दूर ले गया, पर भीतर वही तड़प बनी रही। जो प्रेम इतना अधीर हो, उसके लिए बैर का वेश भी केवल एक वेश है, भीतर तो वही प्रीति बहती रहती है।”
”देखिए, राजन्। एक साधारण भक्त दिन-भर के कामों में अपने प्रभु को घड़ी-घड़ी भुला बैठता है। पर जो प्रभु को अपना शत्रु मान बैठा, वह एक पल को भी उन्हें मन से नहीं हटा पाता। उठते-बैठते, सोते-जागते वही एक चिन्ता, उन्हें कैसे जीतूँ, कैसे मिटाऊँ। उसका सारा ध्यान, बिना टूटे, उन्हीं पर टिका रहता है।”
”तो भगवन्,” परीक्षित् ने पूछा, ”क्या द्वेष भी भक्ति के बराबर हुआ?”
”नहीं, राजन्। द्वेष का यह द्वार उन्हीं के लिए खुलता है जिनका मन पहले से प्रभु में बँधा हो, जैसे जय और विजय का था। साधारण जीव के लिए तो द्वेष केवल जलन है, और कुछ नहीं। पर इतना सच है, कि जिस ओर मन निरन्तर लगा रहता है, मनुष्य धीरे-धीरे उसी का हो जाता है। हम जिसे शत्रु कहकर दिन-रात स्मरण करते हैं, उसी की ओर अनजाने खिंचते चले जाते हैं।”
परीक्षित् ने आँखें मूँद लीं। तक्षक का भय, जो कल तक छाया की तरह उनके साथ चलता था, आज कुछ हलका जान पड़ा।
गंगा पर एक बगुला धीरे से उतरा, जल को छुआ, और फिर ऊपर उठ गया। एक दिन और बीत चला था।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 15 और 16 में आती है। वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय छह ड्योढ़ियाँ बेरोक पार करने वाले सनकादि ऋषियों को सातवीं ड्योढ़ी पर रोक बैठे, और उन्हें शाप मिला। प्रभु ने स्वयं आकर शाप तो स्वीकार किया, पर यह वर भी जोड़ दिया कि ये दैत्य-योनि में जाकर भी मुझ में ही मन टिकाए रखें और शीघ्र लौट आएँ। इन्हीं दोनों ने पहले जन्म में दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का रूप धारण किया।
आगे सप्तम स्कन्ध में भागवत बतलाता है कि यही दो पार्षद रावण-कुम्भकर्ण और फिर शिशुपाल-दन्तवक्र बनकर भी आए, और इस तरह एक ही शाप से तीन युगों की असुर-कथाएँ एक सूत्र में बँध जाती हैं। भागवत में बार-बार यही धागा दिखता है, कि भगवान् के द्वेषी भी अन्ततः उन्हीं में लौटते हैं।
दर्शन-दृष्टि
इस कथा का मर्म इसी विरोधाभास में छिपा है। जो प्रभु के अत्यन्त निकट थे, वे ही द्वेष के वेश में आए, और उसी वेश में होकर लौट भी गए। भागवत यहाँ चेताता नहीं, केवल दिखा देता है, कि मन जिस ओर निरन्तर बँधा रहे, गति उसी ओर हो जाती है।
जय और विजय के बैर के नीचे वही पुरानी प्रीति बहती रही, जो एक पल की दूरी भी न सह पाती थी, और उसी अधीरता ने इस वेश को धर लिया। जब प्रभु के द्वेषी का मन तक उन्हीं में इस तरह डूबा रह सकता है, तो भक्त के मन की डोर कितनी गहरी बँधी होगी।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
जय और विजय, श्रीहरि के दो द्वारपाल। एक चूक, सनकादि बालकों का शाप, और दैत्य-योनि में प्रभु के द्वेषी बनकर लौटना। उनका बैर हमें यह दिखाता है, कि मन जिस ओर बँधा रहता है, चाहे प्रेम से चाहे द्वेष से, अन्त में वहीं पहुँचता है।