जय-विजय का शाप

कथा 37 · भागवतम् की कथाएँ

जय-विजय का शाप

Two Doorkeepers Who Chose to Be Enemies
स्कन्ध 3, अध्याय 15-16

वैकुण्ठ में दो द्वारपाल थे। जय और विजय।

दोनों भाई। दोनों विष्णु के सब से क़रीबी पार्षद। उनकी ज़िंदगी का काम, विष्णु के निवास के दरवाज़े पर खड़े रहना। जो भी आए, उसे inspect करना।

एक दिन चार ऋषि वैकुण्ठ आए। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार। ब्रह्मा के मानस-पुत्र। पाँच साल के बच्चों की तरह दिखते थे, मगर असल में बहुत प्राचीन।

ये चार ऋषि बहुत pure थे। बच्चों जैसे। नंगे चलते थे। कोई attachments नहीं।

वो विष्णु से मिलने आए।

जय और विजय ने उन्हें रोका।

”रुको। पहले अंदर announcement होगा। हम आपको अंदर नहीं जाने देंगे।”

ऋषियों ने एक-दूसरे को देखा।

”हम चार सनकादि ऋषि। वैकुण्ठ हमारे लिए कभी बंद नहीं।”

जय-विजय हँसे। ”हमें नहीं पता तुम कौन हो। तुम छोटे बच्चे लग रहे हो। शायद बच्चे ही हो।”

उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। ऋषियों को रोका।

ऋषि चुप-चाप रुके। पर उनके अंदर एक हलकी सी अग्नि जली।

”तुम वैकुण्ठ के द्वारपाल हो। तुम्हें यह नहीं करना चाहिए।”

”हम तो नियम follow कर रहे हैं।”

ऋषि बोले, ”अगर वैकुण्ठ में भी अहंकार है, तो यह वैकुण्ठ नहीं रहा। तुम यहाँ रहने के लायक नहीं।”

”हम तुम्हें शाप देते हैं।”

जय-विजय ने सिर झुकाया। ”हाँ?”

”तुम तीन जन्म मनुष्य-लोक में राक्षस के रूप में जन्म लोगे। तुम्हें यहाँ से जाना होगा।”

ता वै बभूव शापिता भुवि तिस्रः सहस्रशः ।
द्विषन्तस्तेऽपि वैकुण्ठं प्राप्ता दुष्टा अपि स्वयम् ॥

वो दोनों, तीन हज़ार साल के शाप से भू-लोक में आए। दुश्मनी से भी वैकुण्ठ ही पाया, क्योंकि वहाँ के लिए ही उन्होंने जन्म लिया था।

इस सब के बीच में, विष्णु ख़ुद बाहर आ गए।

”क्या हो रहा है?”

ऋषियों ने सब बताया।

विष्णु ने एक पल को सोचा।

”ऋषिवर,” उन्होंने कहा, ”इन दोनों ने ग़लती की। आप का शाप सही है। पर मुझे एक request।”

”क्या?”

”तीन जन्मों का शाप है। मगर इन दोनों के लिए एक option दीजिए। यह तीन जन्म कौन से होंगे, इस का choice उन्हीं को।”

ऋषि मान गए।

विष्णु ने जय-विजय को बुलाया।

”देखो, तुम्हें तीन जन्म लेने हैं। दो options हैं।”

”एक, तुम मनुष्य-लोक में मेरे भक्त बनकर जन्म लो। तुम सात जन्मों में मुझ तक पहुँचोगे।”

”दूसरा, तुम मेरे दुश्मन बनकर जन्म लो। हर बार मेरे ही हाथ से मरोगे। तीन जन्म, और तुम मुक्त।”

जय-विजय ने एक-दूसरे को देखा।

एक का जवाब साफ़ था। ”हम तुमसे दूर नहीं रह सकते सात जन्म तक। तीन जन्म दुश्मनी बहुत बेहतर है।”

”ठीक है।”

और इस तरह तीन जन्म तय हुए।

पहला जन्म, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। दो भाई। हिरण्याक्ष को वराह ने मारा। हिरण्यकशिपु को नृसिंह।

दूसरा जन्म, रावण और कुम्भकर्ण। दो भाई फिर। राम ने मारा।

तीसरा जन्म, शिशुपाल और दन्तवक्र। कृष्ण ने मारा।

तीनों जन्मों में, जय-विजय अपने ही प्रभु के सामने थे। हर बार दुश्मन बनकर। हर बार उनके हाथ से मरकर वैकुण्ठ लौटे।

एक interesting paradox। दुश्मनी भी एक रास्ता है पास आने का।

क्योंकि दुश्मन अपने enemy के बारे में हमेशा सोचता है। आख़िरकार वो mental focus भी एक तरह की भक्ति है।

मन्थन

जय-विजय की कथा एक radical theological statement है।

वो वैकुण्ठ के द्वारपाल थे। फिर भी अहंकार में आए। फिर शाप पाया। फिर choice मिली, ”भक्त बनकर जन्म लो, या दुश्मन।”

उन्होंने दुश्मन बनना चुना। क्यों? क्योंकि भक्त बनने में सात जन्म लगते। दुश्मन बनने में तीन।

यह तरीक़ा बहुत counter-intuitive है। हम सोचते हैं, ”भक्त बनना ज़्यादा अच्छा।” पर भागवतम् कह रहा है, focus important है।

एक भक्त अपने भगवान को कभी-कभी भूल जाता है। दैनिक life में।

एक दुश्मन भगवान को कभी नहीं भूलता। उसका हर पल उसी पर है। ”उसे कैसे मारूँ। उसके खिलाफ़ कैसे जीतूँ।”

दोनों का focus same है, मगर intensity में फ़र्क़।

और जब आप किसी पर पूरा focus रखते हैं, चाहे प्रेम से हो, चाहे नफ़रत से, आप उसके पास आते हैं।

हम अक्सर अपनी ज़िंदगी में सोचते हैं, ”मेरा कोई दुश्मन है।” पर रोज़-रोज़ उसके बारे में सोच-सोचकर, हम उसी का हिस्सा बन जाते हैं।

बेहतर है, उसे ignore करें। शायद तब हम free हो जाएँ।