सुदामा की यात्रा
गंगा का जल ढलती धूप में ताँबे-सा दहक रहा था। परीक्षित् कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर शुकदेव की ओर देखा। ”भगवन्, कल आपने उस गजराज की बात कही थी, जिसने डूबते-डूबते पुकारा और श्रीहरि दौड़े चले आए। पुकार में तो बल होता ही है। पर मेरे मन में एक और सवाल उठता है। जो पुकारे ही नहीं, जो माँगने में संकोच करे, जिसके होंठ तक न खुलें, उसका क्या? मेरे पास गिनती के दिन बचे हैं, मुनिवर, और मैं सोचता हूँ, भगवान् से पाने के लिए क्या माँगना ज़रूरी है?”
शुकदेव की आँखों में एक हल्की चमक आई, जैसे यह सवाल उन्हें भीतर तक भाया हो। ”राजन्, यह बात एक मुट्ठी चिउड़े में छिपी है,” उन्होंने धीरे से कहा। ”भगवान् श्रीकृष्ण का एक परम मित्र था, एक ब्राह्मण, नाम सुदामा। बड़ा ज्ञानी, विषयों से विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय। सुनिए, उसने कभी कुछ नहीं माँगा।”

एक छोटे से गाँव की बात है। वहाँ यही ब्राह्मण सुदामा रहता था। गृहस्थ था, पर ऐसा कि कभी संग्रह-परिग्रह न रखता, प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता उसी में सन्तुष्ट रहता। इतना दरिद्र कि कई बार घर में चूल्हा ही न जलता। उसकी पत्नी भी पतिव्रता थी, और पति के समान ही भूख से दुबली पड़ी रहती। वे दोनों चुपचाप भूख सह लेते, क्योंकि सुदामा को माँगना नहीं आता था।

सुदामा के भीतर बचपन की एक बात बरसों से सहेजी रखी थी। अवन्तीपुर के सान्दीपनि मुनि के आश्रम में, जहाँ कृष्ण और बलराम ने वेद पढ़े थे, वही सुदामा भी उनका सहपाठी रहा था। (गुरुकुल वह जगह होती थी जहाँ शिष्य गुरु के घर रहकर, सेवा करते हुए, विद्या ग्रहण करते थे।) एक दिन गुरुपत्नी ने दोनों को जंगल भेजा, ईंधन लाने। बिना ऋतु के एक भयंकर आँधी उठ आई, मूसलधार पानी बरसा, और शाम ढलते ही चारों ओर अँधेरा छा गया। कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, कुछ सूझता न था। दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे, भीगते-काँपते, सारी रात जंगल में भटकते रहे।
सूरज निकला तब गुरु सान्दीपनि उन्हें ढूँढ़ते हुए आ पहुँचे। दोनों शिष्यों की यह दशा देखकर उनका मन भर आया। ”आश्चर्य है, पुत्रो,” वो बोले, ”आप लोगों ने मेरे लिए इतना कष्ट सहा। सब प्राणियों को अपना शरीर अत्यन्त प्रिय होता है, पर आप दोनों ने उसकी भी परवा न करके मेरी सेवा में मन लगाया। आपके सब मनोरथ पूरे हों।”
वो रात दोनों के भीतर एक मीठी गाँठ बनकर बैठ गई। और किसी को इसका मोल पता नहीं था, पर सुदामा को एक-एक पल याद था।
बरसों बीते। कृष्ण भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवों के स्वामी होकर द्वारका के अधिपति हो गए। सुदामा उसी भूखे गाँव में रह गया।
एक दिन उसकी पत्नी ने काँपते हुए, मुरझाये मुँह से धीरे से कहा, ”आप तो साक्षात् लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण के सखा हैं। वे ब्राह्मणों के परम भक्त, शरणागत पर वत्सल, साधु-संतों के एकमात्र आश्रय हैं। एक बार द्वारका हो आइए। उनसे मिल लीजिए। जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं और अन्न के बिना दुःखी हैं, तो वे आपको बहुत कुछ देंगे। बच्चे भूखे सो जाते हैं।”
सुदामा कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, ”मैं माँगने नहीं जा सकता।”
”माँगिए मत,” पत्नी ने कहा। ”धन की तो कोई बात नहीं, पर भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन हो जाएँगे, यही तो जीवन का सब में बड़ा लाभ है। बस मिल आइए। आगे जो वो समझें।”

सुदामा मान गया। ”कल्याणी, घर में कुछ भेंट देने योग्य वस्तु भी है क्या?” पत्नी पड़ोस के ब्राह्मणों के घर से चार मुट्ठी चिउड़ा (पृथुक, जिसे पोहा भी कहते हैं) माँग लाई, एक पुराने कपड़े में बाँधा, और सुदामा के हाथ में रख दिया।
”यह उन्हें दे दीजिएगा। मित्र से मिलने ख़ाली हाथ कैसे जाएँ, और हमारे पास है ही क्या?”
सुदामा वही पोटली काँख में दबाकर निकल पड़ा। पैदल, धूल भरे रास्ते पर। द्वारका दूर थी।
रास्ते भर मन में एक ही बात घूमती रही, ”मुझे भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?” और एक डर भी साथ चलता रहा। कृष्ण अब समुद्र के बीच बसी सोने की द्वारका के स्वामी हैं। कहीं पहचानें ही नहीं? और अगर सामना हो भी गया, तो वो कह क्या पाएगा?
पर पैर रुके नहीं।
द्वारका पहुँचा। धूप में महल की दीवारें सोने-सी दमक रही थीं। ब्राह्मणों के साथ-साथ चलते हुए वह सैनिकों की तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार कर गया, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। किसी ने उसे रोका नहीं। तीनों कक्षाएँ लाँघकर वह सीधे उस महल में जा पहुँचा, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार रानियाँ रहती थीं।
उनमें से एक महल में उसने प्रवेश किया। वह महल इतना सजा-सजाया, इतना शोभा-युक्त था कि भीतर पैर रखते ही सुदामा को ऐसा लगा, मानो वह ब्रह्मानन्द के समुद्र में डूब-उतरा रहा हो।
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणी के पलंग पर विराजे हुए थे। दूर से ही ब्राह्मण को देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए।

उठते ही दौड़ पड़े, और पास आकर बड़े आनन्द से सुदामा को अपने भुजपाश में बाँध लिया, कसकर। अपने प्यारे सखा के अंग-स्पर्श से वे ऐसे आनन्दित हुए कि उनके कमल-से नेत्रों से प्रेम के आँसू बरसने लगे।
”सुदामा! आप कब चले? कैसे? इतनी दूर पैदल? एक ख़बर तो भेज देते, मैं रथ न भेज देता?”
सुदामा से कुछ कहते न बना। बस आँसू बहते रहे।

कृष्ण उसका हाथ थामकर भीतर ले गए। अपने ही पलंग पर बिठाया। फिर स्वयं पूजा की सामग्री लाकर उसका सत्कार करने बैठे। प्रिय सखा के पाँव एक पात्र में धोकर वही जल अपने सिर पर धारण किया, और पैरों में चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धों का लेप किया। सुगन्धित धूप और दीपों से अपने मित्र की आरती उतारी। पान और एक गाय देकर, मधुर वचनों से ”भले पधारे” कहकर उसका स्वागत किया। फिर पास ही बैठ गए। स्वयं लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी हाथ में चँवर लेकर उन्हें झलने लगीं। फटे-पुराने वस्त्रों में, मैले-कुचैले, दुबले शरीर वाले इस ब्राह्मण की यह सेवा देखकर अन्तःपुर की स्त्रियाँ चकित रह गईं। किसी की समझ में न आया कि यह फटेहाल आदमी कौन है, जिसके लिए तीनों लोकों के गुरु ख़ुद झुके जा रहे हैं, जिसे उन्होंने अपने पलंग पर बैठाकर, स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणी को छोड़कर, बड़े भाई बलराम के समान हृदय से लगाया है।
कृष्ण ने अपने हाथ से उसे खिलाया। फिर बीते दिनों की बातें छिड़ गईं, आश्रम की, गुरु की, उस बारिश की रात की। एक-एक बात कृष्ण को याद थी।
बातों के बीच कृष्ण ने पूछा, ”मेरे लिए अपने घर से क्या उपहार लाए हैं, सुदामा? मेरा प्रेमी भक्त जब प्रेम से थोड़ी-सी वस्तु भी अर्पित करता है, तो वह मेरे लिए बहुत हो जाती है। पर अभक्त बहुत-सी सामग्री भी भेंट करे, तो उससे मुझे सन्तोष नहीं होता।”
सुदामा का सिर झुक गया। पोटली थी तो सही, पर इतनी छोटी, इतनी मामूली। इस वैभव के सामने वो भला कैसे निकालता? लज्जा से उसने अपना मुँह नीचे कर लिया, चिउड़ा न निकाला।
पर भगवान् तो सबके हृदय की एक-एक बात जानते हैं। वे ताड़ गए कि मेरा यह प्यारा सखा कभी लक्ष्मी की कामना से मेरा भजन करने नहीं आया, आज भी केवल पतिव्रता पत्नी के आग्रह से आया है। ”अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है,” यह सोचते हुए उन्होंने ख़ुद उसकी काँख से वो पोटली खींच ली। गाँठ खोली। भीतर मुट्ठी भर चिउड़ा।
”वाह! यह तो मेरा परम प्रिय है,” कहते हुए उन्होंने एक मुट्ठी उठाई और चाव से मुँह में डाल ली। ”ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसार को तृप्त करने को पर्याप्त हैं।” फिर दूसरी उठाने को हुए।
तभी रुक्मिणी ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया। ”विश्वात्मन्, बस, बस,” उन्होंने कहा। ”मनुष्य को इस लोक में और परलोक में भी समस्त सम्पत्तियों की समृद्धि देने के लिए यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही पर्याप्त है, क्योंकि आपके लिए इतना ही प्रसन्नता का हेतु बन जाता है।”
रात बीती। ब्राह्मणदेवता उस रात बड़े आराम से भगवान् के महल में रहे, खाया-पिया, और ऐसा अनुभव किया मानो वैकुण्ठ में ही पहुँच गए हों। कृष्ण और सुदामा ने पुरानी बातें कीं। पर एक बात सुदामा ने नहीं की।
उसने माँगा कुछ नहीं। श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप में उसे कुछ भी न मिला, फिर भी उसने कुछ माँगा नहीं।
लौटने का वक़्त आया तो सुदामा अपने ही मन की दशा पर कुछ लज्जित-सा होकर, भगवान् के दर्शन के आनन्द में डूबता-उतराता घर की ओर चला। घर पहुँचेगा, वहाँ वही पुरानी ग़रीबी मुँह बाए खड़ी होगी। पत्नी पूछेगी, ”क्या लाए?” और उसके पास एक ही जवाब होगा।
फिर भी पेट भले ख़ाली था, भीतर कहीं कुछ भर-सा गया था।
रास्ते भर मन-ही-मन सोचता रहा, ”अहो, कितने आनन्द और आश्चर्य की बात है! ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति आज मैंने अपनी आँखों देख ली। कहाँ मैं अत्यन्त दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मी के एकमात्र आश्रय श्रीकृष्ण! फिर भी उन्होंने ‘यह ब्राह्मण है’ समझकर मुझे अपनी भुजाओं में भर लिया।” और हर बार एक ही उत्तर लौट आता: मित्रता और याचना के बीच एक रेखा होती है, और वो रेखा सुदामा से पार न हुई।
गाँव की सीमा पर पहुँचा।
और ठिठक गया। उसका गाँव वहाँ था ही नहीं।

उसके पुराने कच्चे झोंपड़े की जगह सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा के समान तेजस्वी रत्ननिर्मित महल खड़े थे। ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान, उनमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे थे, सरोवरों में कमल खिले हुए थे। बाहर बाग़, दूध देती गायें, बँधे हुए घोड़े। उसकी पत्नी, जो अब सोने के हार पहने दासियों के बीच विमानस्थित देवांगना-सी शोभायमान हो रही थी, दरवाज़े पर खड़ी थी, और बच्चे साफ़-सुथरे कपड़ों में, खिलखिलाते हुए।
उसने पलटकर देखा, कहीं भटककर किसी और गाँव तो नहीं आ गया?
गाँव तो वही था। बस उसका सब कुछ बदल गया था।
सुदामा चुपचाप भीतर आया और बैठ गया।
पत्नी पास आकर बोली, ”क्या हुआ?”
उसने सिर्फ़ इतना कहा, ”मैंने उससे कुछ नहीं माँगा। फिर भी उसने सब दे दिया।”
फिर वो कुछ न बोला। वह त्यागपूर्वक, अनासक्त भाव से इन भगवत्प्रसादस्वरूप विषयों को भोगता रहा, और दिनोंदिन उसकी प्रेम-भक्ति बढ़ती गई। उसने मन-ही-मन उस मुट्ठी को देखा, जो कभी ख़ाली थी और जिसने सब कुछ भर दिया था, जैसे उसमें अब भी कुछ बचा हो जो किसी तराज़ू में न तुले।
गंगा-तट पर शुकदेव कुछ पल मौन रहे। दीये जलने का वक़्त हो चला था, और जल पर पहली टिमटिमाहट काँप रही थी।
”राजन्,” उन्होंने आख़िर कहा, ”गजराज ने पुकारकर पाया, सुदामा ने बिना पुकारे। पर एक बात और समझिए। श्रीकृष्ण ने सुदामा को सामने कुछ नहीं दिया, हाथ में कोई दान नहीं थमाया। सोचा कि यह दरिद्र अचानक धन पाकर मतवाला न हो जाए, और मुझे ही न भूल बैठे। इसलिए जो दिया, चुपके से दिया, पीछे से दिया। उन्हें माँगने से नहीं, प्रेम से सरोकार है, राजन्, और प्रेम अक्सर वहीं सब में मुखर होकर बोलता है जहाँ ज़बान चुप रह जाती है।”
परीक्षित् ने कुछ नहीं कहा। उनके भीतर का वो काँपना, जो तक्षक के नाम से अब तक उठ आता था, इस वक़्त कहीं नहीं था। उन्होंने सिर्फ़ बहते जल की ओर देखा, जहाँ एक दीया किसी हाथ से छूटकर धारा में बहता चला जा रहा था, और किसी से कुछ माँगे बिना, अँधेरे को थोड़ा-थोड़ा रोशन करता जा रहा था।
सुदामा की कथा का असली केन्द्र वो बात है जो कही नहीं गई।
सुदामा ने कुछ नहीं माँगा। इसमें कमज़ोरी नहीं थी, यही उसकी मित्रता की मर्यादा थी। मित्र के पास जाकर इस तरह माँगना कि रिश्ते में लेन-देन घुस आए, यह उसे मंज़ूर न था। पोटली में चिउड़ा उसने इसलिए रखा कि देना मित्रता का अंग है। माँगना उसका अंग कभी नहीं रहा।
और कृष्ण ने यह बात बिना कहे पहचान ली। उन्होंने सुदामा को वो दिया जो उसने माँगा ही नहीं। भागवत का एक महीन इशारा यहीं छिपा है: भगवान वही नहीं देते जो हम माँगते हैं, वो वह देते हैं जो हमें चाहिए, और जिसे हम ख़ुद माँग भी नहीं सकते।
और एक बात। इस कथा में कृष्ण ख़ुद एक दरिद्र मित्र के पैर धोते हैं। द्वारका का स्वामी, और एक भिखारी-से ब्राह्मण के चरण। भक्ति के आगे ऊँच-नीच का हिसाब ठहर जाता है। वहाँ कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह सवाल ही नहीं उठता।
साहित्यिक-संदर्भ
सुदामा का यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 10.80-10.81 में आता है, सख्य-भाव की एक अत्यन्त कोमल कथा। द्वारका के वैभव और कुचेला की दरिद्रता के बीच भक्ति ऊँच-नीच को मिटा देती है। सूरदास के ‘सूरसागर’ और नरसी मेहता के पदों में भी यही चरित्र गाया गया है, उसी केन्द्र के साथ: मित्र बिन माँगे पा जाता है, क्योंकि देने वाला स्वयं हरि हैं।
दर्शन-दृष्टि
इस कथा की एक बारीकी यह है कि द्वारका का सारा वैभव सुदामा की आँखों से दिखता है, उसी की विस्मित दृष्टि से। ऐश्वर्य का बखान कभी अपने लिए नहीं आता; वह हर बार उस दरिद्र मित्र के देखने में घुला रहता है, और इसीलिए चुभता नहीं, बल्कि भिगो देता है।