सुदामा की यात्रा
एक छोटे से गाँव की बात है। एक ब्राह्मण रहता था, नाम था सुदामा। पढ़ा-लिखा, सरल, और बहुत ग़रीब। इतना ग़रीब कि कई बार घर में खाना भी नहीं होता था। उसकी पत्नी और बच्चे चुप-चाप भूख सहते थे, क्योंकि सुदामा भी यही करता था।
सुदामा का एक secret था। बचपन में, सांदीपनि मुनि के आश्रम में, वो कृष्ण के साथ पढ़ा था। दोनों एक ही गुरुकुल में थे। एक दिन गुरुपत्नी ने उन्हें जंगल भेजा था लकड़ी लेने। बारिश आ गई। दोनों एक पेड़ के नीचे रात बिताए। गुरु-माँ ने थोड़ी सी चूड़ा (पोहा) दी थी। सुदामा ने वो अकेले ही खा लिया, कृष्ण को नहीं दिया। यह सोचकर कि कृष्ण सो रहा है। ख़ुद की भूख से मजबूर।
कृष्ण उस वक़्त चुप रहे। हँसे भी नहीं, ग़ुस्सा भी नहीं हुए। सिर्फ़ देखा।
वो बात सुदामा के अंदर थी, सालों से। कोई और नहीं जानता था। मगर वो उसे याद थी।
सालों बाद, कृष्ण द्वारका के राजा थे। सुदामा एक भूखे गाँव में रहता था।
एक रात उसकी पत्नी ने कहा, ”आप तो कृष्ण के मित्र हैं। द्वारका जाइए। उनसे मिलिए। शायद वो कुछ मदद कर दें। बच्चे भूखे रहते हैं।”
सुदामा चुप रहा। फिर बोला, ”मैं माँगने नहीं जा सकता।”
पत्नी ने कहा, ”माँगिए मत। बस मिलिए। बाक़ी जो वो समझें।”
सुदामा हाँ कह दिया। पत्नी ने पड़ोस से चार मुट्ठी पोहा माँगा, एक पुराने कपड़े में बाँधा, और सुदामा को दिया।
”यह उन्हें देना। हम क्या लाते मित्र को मिलने के लिए, अगर यही नहीं?”
सुदामा यह पोटली काँख में दबाकर निकला। पैदल। द्वारका दूर थी।
रास्ते में उसे डर लगता रहा। कृष्ण अब राजा हैं। शायद पहचानेंगे ही नहीं। शायद द्वारपाल अंदर ही नहीं घुसने देंगे। शायद वो ख़ुद कुछ बोल नहीं पाएगा।
मगर वो चलता रहा।
द्वारका पहुँचा। महल की दीवारें सोने की। द्वारपाल ने पूछा, ”कौन हो? क्या काम है?”
सुदामा ने अपना नाम बताया। ”कहना, सांदीपनि के आश्रम का सुदामा आया है।”
द्वारपाल अंदर गया। दूत भेजा गया।
और कृष्ण ने जो सुना, वो सुनते ही उठ खड़े हुए।
अपना मुकुट छोड़ा। शेरवानी छोड़ी। नंगे पैर, बिना किसी रिश्ते के show के, वो दौड़े। दरवाज़े पर सुदामा खड़ा था, फटी धोती में, धूल से ढका हुआ।
कृष्ण ने उसे गले लगाया। ज़ोर से। उनकी आँखों में आँसू थे।
”सुदामा! तुम कब आए? कैसे? पैदल? तुम्हें कहना चाहिए था, मैं रथ भेजता।”
सुदामा कुछ कह नहीं पाया। बस रोता रहा।
कृष्ण उसे अंदर ले गए। अपने ही सिंहासन पर बिठाया। ख़ुद उसके पैर धोए। पैरों में चन्दन लगाया। फिर पंखा झलने लगे।
रुक्मिणी पास खड़ी देख रही थीं। आठ रानियाँ चुप थीं। कोई समझ नहीं पा रहा था कि यह कौन है, जिसके लिए राजा ख़ुद यह सब कर रहे हैं।
कृष्ण ने उसे खाना खिलाया। पुराने दिनों की बातें कीं। आश्रम की, गुरु की, बारिश की। हर छोटी बात याद रखी थी।
और बीच में कृष्ण ने पूछा, ”क्या लाए हो मेरे लिए?”
सुदामा ने सिर झुका लिया। पोटली थी, मगर इतनी छोटी, इतनी मामूली। राजा को क्या दिखाता?
कृष्ण ने उसकी काँख से ख़ुद पोटली निकाली। खोली। पोहा।
उन्होंने एक मुट्ठी उठाई। मुँह में डाली। दूसरी उठाई।
तीसरी उठाने वाले थे, तभी रुक्मिणी ने उनकी कलाई पकड़ ली। उसकी आँखों में थोड़ा सा डर था। क्योंकि भागवतम् कहता है, हर मुट्ठी पोहा से कृष्ण ने एक लोक देने का निर्णय किया था। तीन मुट्ठी मतलब तीन लोक। उससे आगे लक्ष्मी के पास भी कम पड़ जाते।
उपहारैरगण्यैस्तं वासुदेवं प्रहर्षयन् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.81 का भाव)
एक ग़रीब का तुच्छ-सा उपहार, अगर प्रेम से दिया हो, तो भगवान के सामने वो अमूल्य हो जाता है। कृष्ण ने सुदामा के पोहे को वैसे ही स्वीकार किया जैसे एक दिव्य भोग।
रात बीती। कई रातें। कृष्ण और सुदामा ने पुरानी बातें कीं। पर एक बात सुदामा ने नहीं की।
उसने माँगा कुछ नहीं।
जब लौटने का वक़्त आया, वो भारी मन से चला। शायद घर पहुँचेगा, वहाँ वही ग़रीबी होगी। शायद पत्नी पूछेगी, ”क्या लाए?” और जवाब होगा ”कुछ नहीं।”
पर इस बार कुछ अलग था। उसे अंदर एक भर जाना सा महसूस हो रहा था। ख़ाली पेट था, मगर भीतर कुछ भर गया था।
रास्ते में सोचता रहा। उसने माँगा क्यों नहीं? पता है क्यों? क्योंकि मित्रता और माँगने की एक सीमा होती है। और सुदामा ने वो सीमा नहीं तोड़ी।
अपने गाँव पहुँचा।
और देखा, कि गाँव वहाँ नहीं था।
उसके पुराने कच्चे झोपड़े की जगह एक भव्य महल खड़ा था। बाहर बाग़, गाय, घोड़े। उसकी पत्नी रेशम की साड़ी में दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके बच्चे साफ़ कपड़ों में, हँसते हुए।
उसने पीछे मुड़कर देखा। कहीं वो ग़लत गाँव तो नहीं आ गया?
नहीं, वही था। बस सब बदल गया था।
सुदामा घर के अंदर गया। चुप-चाप। ज़मीन पर बैठ गया।
उसकी पत्नी पास आई। बोली, ”क्या हुआ?”
उसने सिर्फ़ इतना कहा, ”उसने मुझसे माँगा था। मैंने नहीं माँगा। फिर भी उसने दिया।”
सुदामा की कथा का असली केन्द्र वो बात है जो कही नहीं गई।
सुदामा ने कुछ नहीं माँगा। यह उसकी कमज़ोरी नहीं थी, यह उसकी मित्रता की सीमा थी। एक दोस्त से एक ऐसी जगह पर आकर माँगना, जहाँ रिश्ते में लेन-देन घुस आए, वो उसे मंज़ूर नहीं था। उसने पोटली में पोहा रखा क्योंकि देना मित्रता का हिस्सा है। माँगना उसका हिस्सा नहीं।
और कृष्ण ने यह बात पहचान ली। उन्होंने उसे बिना माँगे दिया। यह भागवतम् का एक बहुत subtle बिंदु है। भगवान वो नहीं देते जो हम माँगते हैं। वो वो देते हैं जो हमें चाहिए, और जो हम ख़ुद नहीं माँग सकते।
एक और बात। कथा में कृष्ण सुदामा के पैर धोते हैं। राजा एक ग़रीब के पैर। उल्टी दुनिया। पर भागवतम् यही दिखाना चाहता है, कि भक्ति के सामने status पीछे हट जाता है। कौन ऊँचा, कौन नीचा, यह बहस वहाँ नहीं चलती।