बाणासुर और अनिरुद्ध
बाणासुर एक राक्षस-राजा था। बलि का बेटा।
उसके हज़ार हाथ। बहुत powerful। और उसने शिव की तपस्या की थी।
शिव खुश हुए। उसे एक वर दिया, ”मैं ख़ुद तेरी रक्षा करूँगा।”
तो बाणासुर का confidence high।
उसकी एक बेटी थी, उषा। बहुत सुन्दर।
एक रात उषा ने एक स्वप्न देखा। एक नौजवान आदमी। बहुत handsome। उसके साथ romantic।
वो उठी। उसका दिल जल रहा था।
उसने अपनी सहेली चित्रलेखा को बताया।
चित्रलेखा एक clever लड़की थी। वो ख़ुद चित्र बना सकती थी।
”देख, मैं हर powerful पुरुष का चित्र बनाती हूँ। तुम पहचानो।”
उसने कई चित्र बनाए। हर राजकुमार का।
उषा ने सब देखे। ”नहीं। नहीं। नहीं।”
फिर एक चित्र। ”यह!”
वो था अनिरुद्ध। कृष्ण का पोता।
”ठीक है, मैं तुझे उससे मिलाती हूँ।”
चित्रलेखा रात में अपनी योग-शक्ति से द्वारका गई। अनिरुद्ध सो रहा था। उसे उठाकर वापस लाई।
अनिरुद्ध जागा। उसने उषा को देखा। उषा ने उसे।
दोनों एक-दूसरे को पसंद आए। चार दिन साथ रहे, उसी महल के एक secret कमरे में।
बाणासुर को पता चला।
उसने अपनी सेना भेजी। अनिरुद्ध को पकड़ा।
बँदी बनाया।
इधर द्वारका में, अनिरुद्ध missing।
नारद आए। कृष्ण को बताया।
कृष्ण, बलराम, और प्रद्युम्न (अनिरुद्ध के पिता) निकले। बाणासुर के राज्य की तरफ़।
बाणासुर के पास सूचना थी। उसने अपनी पूरी सेना तैयार की। और शिव से प्रार्थना की।
”हे प्रभु, कृष्ण आ रहे हैं। मेरी रक्षा करिए।”
शिव ने अपना वचन याद किया। उन्होंने अपनी सेना भेजी। और ख़ुद भी आए।
और तब एक अद्भुत scene।
कृष्ण और शिव। आमने-सामने।
एकयोर्वत्सलयोरिव सर्वलोकैः समीक्षितम् ॥
हरि और शङ्कर का युद्ध अद्भुत था। दो प्रेमी-भगवान, मगर अपने-अपने भक्तों की रक्षा के लिए, सब के सामने लड़ रहे थे।
दोनों भगवान। दोनों powerful। और दोनों एक-दूसरे को सम्मान करते हैं।
पर अभी, दोनों दो अलग sides पर।
एक लड़ाई शुरू हुई।
कृष्ण की तरफ़ अनिरुद्ध-पक्ष। शिव की तरफ़ बाणासुर-पक्ष।
तीर बरसे। दिव्य अस्त्र चले।
मगर कृष्ण और शिव, एक-दूसरे पर सीधे हमला नहीं कर रहे थे। बस अपनी sides की रक्षा।
ज्वरास्त्र निकला। नारायणास्त्र निकला।
एक पल आया जब लड़ाई बहुत intense हो गई।
शिव अपनी असली शक्ति निकाली।
कृष्ण ने तब एक अनोखा शस्त्र निकाला। ”जृम्भणास्त्र।” यह शिव को नींद देता था।
शिव सो गए।
एक स्ट्रेंज moment। एक भगवान, बीच लड़ाई में, सो गए।
जब वो जागे, उन्होंने एक हलकी मुस्कान दी।
”कृष्ण, अच्छी चाल।”
”क्षमा करिए, प्रभु। यह तो ज़रूरी था।”
अब बाणासुर अकेला। कृष्ण के सामने।
कृष्ण ने सुदर्शन चक्र निकाला। बाणासुर के 996 हाथ काटे। बस चार छोड़े।
बाणासुर ज़मीन पर। मरने वाला।
तभी शिव आए।
”कृष्ण, रुक।”
”हाँ?”
”इसको मार मत। यह मेरा भक्त। इसे जीने दे।”
कृष्ण ने सोचा। ”ठीक है। मगर एक शर्त, यह अनिरुद्ध को छोड़े। और उसके साथ उषा को द्वारका भेजे।”
बाणासुर ने हाँ कहा।
अनिरुद्ध और उषा द्वारका गए। उनका विवाह हुआ।
और बाणासुर, अपने चार हाथों के साथ, शिव का सेवक बनकर रहा।
बाणासुर की कथा भागवतम् का एक बहुत interesting moment है।
दो भगवान, कृष्ण और शिव, आमने-सामने।
क्यों? क्योंकि दोनों के अपने भक्त थे। और दोनों अपने भक्त की रक्षा कर रहे थे।
एक तरफ़, यह scene confuse करता है। कौन सही, कौन ग़लत?
मगर भागवतम् यह सवाल नहीं उठाता।
बल्कि यह कहता है, भगवान के कई रूप हैं। और हर रूप अपने भक्त के साथ है। अगर दो भक्त एक-दूसरे के सामने हो जाएँ, तो उनके भगवान भी होते हैं।
और कथा का सबसे beautiful हिस्सा यह है कि दोनों एक-दूसरे को सीधे नहीं मारते। बस अपनी side पर रहते हैं।
अंत में, शिव ही आते हैं और कृष्ण से बाणासुर को बचाने की request करते हैं। दोनों के बीच कोई permanent enemy नहीं।
एक deeper level पर, यह कथा कह रही है। दिखाई देने वाले conflicts के पीछे, हर एक के अपने reasons हैं। और जो सब के पीछे हैं, वो भगवान, एक ही हैं।
तो अगली बार जब आप किसी से conflict में हों, सोचिए, शायद दोनों side पर भगवान खड़े हैं।