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बाणासुर और अनिरुद्ध

कथा 55 · भागवतम् की कथाएँ

बाणासुर और अनिरुद्ध

जब दो भक्तों की रक्षा में दो भगवान आमने-सामने आए
स्कन्ध 10, अध्याय 62-63

गंगा की धारा सुबह की रोशनी में काँप रही थी। परीक्षित् कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर बोले, ”भगवन्, कल आपने उन रानियों की बात कही जिन्हें भगवान् ने नरकासुर के बंदीगृह से छुड़ाया। मन में एक बात अटकी रह गई। सुना है कि एक बार स्वयं शंकर भगवान् श्रीकृष्ण के सामने रणभूमि में खड़े हो गए थे, और हरि तथा शंकर का बड़ा घमासान युद्ध हुआ। यह कैसे, मुनिवर? दो ईश्वर आपस में कैसे लड़ें? यह वृत्तान्त विस्तार से सुनाइए।”

शुकदेव की आँखों में एक हल्की चमक आई। ”राजन्, जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान् रुकते नहीं, चाहे रास्ते में दूसरा भगवान् ही क्यों न खड़ा हो। यह कथा प्रेम की है, और रक्षा की भी। सुनिए।”

बाणासुर असुरराज था, बलि का ज्येष्ठ पुत्र, जो शिवभक्ति में सदा रत रहता था। समाज में उसका बड़ा आदर था, उसकी उदारता और बुद्धिमत्ता प्रशंसनीय थी, उसकी प्रतिज्ञा अटल और वह सचमुच बात का धनी था। उन दिनों वह परम रमणीय सोणितपुर में राज्य करता था। उसकी हज़ार भुजाएँ थीं, और उन भुजाओं में इतना बल कि युद्ध की भूख कभी शान्त न होती थी।

A rich classical-Indian color painting: the demon-king Banasura, a powerful crowned asura with one thousand arms fanned out like a peacock's tail, playing many kinds of drums, cymbals and instruments all at once with his hands to accompany the cosmic Tandava dance of Lord Shiva (blue-throated, trident, crescent moon, dancing in fiery aureole) who turns pleased toward him; opulent palace courtyard of Sonitapur.

एक दिन जब भगवान् शंकर ताण्डव-नृत्य कर रहे थे, उसने अपने हज़ार हाथों से अनेकों प्रकार के बाजे बजाकर उन्हें प्रसन्न कर लिया। शिव प्रसन्न हुए, और समस्त भूतों के एकमात्र स्वामी, भक्तवत्सल, शरणागतरक्षक प्रभु ने बाणासुर से कहा, ”आपकी जो इच्छा हो, हमसे माँग लो।” बाणासुर ने कहा, ”भगवन्, आप मेरे नगर की रक्षा करते हुए यहीं रहा करें।” इन्द्रादि देवता भी भगवान् शंकर की कृपा से नौकर-चाकर की तरह उसकी सेवा करते थे।

A classical-Indian color painting: thousand-armed Banasura kneeling and touching the feet of seated Lord Shiva (Nandi nearby, trident, ash-smeared, crescent moon), begging for a worthy opponent; Shiva, faintly angry, gestures a warning, his celestial banner-flag standing tall behind Banasura, hinting it will one day fall; broken mountain rubble visible in the background showing Banasura's restless strength.

पर इस आश्वासन ने बाणासुर को बेचैन कर दिया था। जिसका रक्षक स्वयं महादेव हों, उसके लिए कोई बराबरी का शत्रु ही नहीं बचता। एक दिन उसने शिव के चरण छूकर कहा, ”देवाधिदेव, आप समस्त चराचर जगत् के गुरु और ईश्वर हैं, अधूरे मनोरथ पूरे करने वाले कल्पवृक्ष हैं। आपने मुझे ये एक हज़ार भुजाएँ दी हैं, पर ये मेरे लिए केवल भाररूप हो रही हैं। तीनों लोकों में आपको छोड़कर मुझे अपनी बराबरी का कोई वीर ही नहीं मिलता जो मुझसे लड़ सके। एक बार खुजलाहट हुई तो मैं दिग्गजों की ओर चला, पर वे भी डरकर भाग खड़े हुए। उस समय मैंने अपनी बाहों की चोट से बहुत-से पहाड़ तोड़-फोड़ डाले।” शंकर तनिक क्रोध से बोले, ”रे मूढ़! जिस दिन आपकी ध्वजा टूटकर गिर जाएगी, उस दिन मेरे ही समान योद्धा से आपका युद्ध होगा, और वही आपका घमंड चूर-चूर कर देगा।” बाणासुर की बुद्धि इतनी बिगड़ चुकी थी कि यह सुनकर उसे हर्ष ही हुआ, और वह उसी युद्ध की प्रतीक्षा करने लगा जिसमें उसके बल का नाश होने वाला था।

बाणासुर की एक पुत्री थी, उषा। महल के भीतरी कक्ष में पली, संसार से अनजान।

A tender classical-Indian color painting: princess Usha asleep on a flower-strewn bed inside an inner palace chamber, dreaming; above her, dreamlike and translucent, appears a handsome dark-complexioned youth (prince Aniruddha) with lotus-shaped eyes, long arms and a flowing yellow silk pitambara, leaning close as if sharing the sweetness of his lips; soft moonlit blues and gold.

एक रात उषा ने स्वप्न देखा। एक नौजवान, साँवले रंग का, कमल-सी आँखों वाला, पीताम्बर पहने और मन को खींच लेने वाला, उसके पास आया, और स्वप्न में ही उसके साथ रहा, अपने अधरों का मधुर मधु उसे पिलाया। पर वह उसे भरपेट पी भी न पाई थी कि वह उसे विरह के सागर में छोड़कर न जाने कहाँ चला गया।

आँख खुली तो वह बोल उठी, ”प्राणप्यारे, आप कहाँ हैं?” पर पास कोई न था। वह अत्यन्त विह्वल होकर उठ बैठी, और यह देखकर कि वह सखियों के बीच में है, बहुत ही लज्जित हुई। जिसे वह छू भी न पाई थी, उसके बिना अब रात कटनी कठिन हो गई।

सुबह उसकी सहेली चित्रलेखा आई। मंत्री कुम्भाण्ड की बेटी, और उषा से एक ही उम्र की। उषा का उतरा चेहरा देखकर वह कौतूहल से पास बैठ गई। ”सुन्दरी, राजकुमारी, मैं देखती हूँ कि अब तक किसी ने आपका पाणिग्रहण भी नहीं किया है। फिर आप किसे ढूँढ़ रही हैं, और आपके मनोरथ का क्या स्वरूप है?”

उषा ने धीरे से कहा, ”सखी, स्वप्न में मैंने एक बहुत ही सुन्दर नवयुवक देखा है। उसके शरीर का रंग साँवला-सा है, नेत्र कमलदल के समान हैं, और शरीर पर पीला-पीला पीताम्बर फहरा रहा है। भुजाएँ लम्बी-लम्बी हैं, और वह स्त्रियों का चित्त चुराने वाला है। उसने पहले अपने अधरों का मधुर मधु मुझे पिलाया, पर मैं उसे अघाकर पी ही न पाई थी कि वह मुझे दुःख के सागर में डालकर न जाने कहाँ चला गया। मैं उसी प्राणवल्लभ को ढूँढ़ रही हूँ, पर उसका नाम तक नहीं जानती।”

चित्रलेखा ने कहा, ”सखी, यदि आपका चित्तचोर तीनों लोकों में कहीं भी होगा, और उसे आप पहचान सकेंगी, तो मैं आपकी विरह-व्यथा अवश्य शान्त कर दूँगी। मैं चित्र बनाती हूँ, आप अपने प्राणवल्लभ को पहचानकर बतला दीजिए। फिर वह चाहे कहीं भी हो, मैं उसे आपके पास ले आऊँगी।”

यों कहकर चित्रलेखा ने बहुत-से देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर, यक्ष और मनुष्यों के चित्र बना दिए। एक के बाद एक चेहरे उभरते गए। उषा सिर हिलाती रही, ”नहीं, यह नहीं… यह भी नहीं…”

A classical-Indian color painting: Usha's friend Chitralekha (the minister Kumbhanda's daughter) seated drawing many portraits spread around them on paper, gods, gandharvas and Vrishni princes; Usha, blushing and shy with lowered head and a faint smile, rests her palm on the painted portrait of dark-skinned prince Aniruddha in yellow garment, recognizing her beloved; richly decorated palace interior.

फिर मनुष्यों में उसने वृष्णिवंशी, वसुदेवजी के पिता शूर, स्वयं वसुदेवजी, बलरामजी और भगवान् श्रीकृष्ण आदि के चित्र बनाए। प्रद्युम्न का चित्र देखते ही उषा लज्जित हो गई। और जब अनिरुद्ध का चित्र उभरा, तब लज्जा के मारे उसका सिर नीचा हो गया। हथेली अपने आप उस चित्र पर जा टिकी। मन्द-मन्द मुसकराते हुए वह बोली, ”यही। मेरा वह प्राणवल्लभ यही है, यही।”

चित्रलेखा ने चित्र को गौर से देखा और धीरे से बोली, ”आप जानती हैं यह कौन है? यह अनिरुद्ध है, प्रद्युम्न का पुत्र, श्रीकृष्ण का पौत्र, द्वारका का राजकुमार।” उषा का चेहरा उतर गया, द्वारका कितनी दूर थी। चित्रलेखा ने उसका हाथ थाम लिया, ”आप घबराइए नहीं। आज रात उसे यहीं ले आऊँगी।”

A classical-Indian color painting at night: Chitralekha, using her yogic power, lifting and carrying sleeping prince Aniruddha (dark-skinned youth in yellow silk) upon his beautiful bed through the starry sky, away from guarded Dwarka toward Sonitapur; trailing energy and clouds beneath, distant city ramparts and sea below.

रात गहराई तो चित्रलेखा अपनी योगशक्ति से श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित द्वारका पहुँची। वहाँ अनिरुद्ध बहुत ही सुन्दर पलँग पर सो रहे थे। उसने उन्हें योगसिद्धि के प्रभाव से उठाकर सोणितपुर ला दिया, और अपनी सखी उषा को उसके प्रियतम के दर्शन करा दिए।

अपने परम सुन्दर प्राणवल्लभ को पाकर उषा का मुखकमल आनन्द से प्रफुल्लित हो उठा। दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए, जैसे स्वप्न का धागा अचानक जागते में हाथ आ गया हो।

उषा अनिरुद्ध के साथ अपने भीतरी महल में विहार करने लगी। बहुमूल्य वस्त्र, पुष्पों के हार, इत्र-फुलेल, धूप-दीप, आसन, सुमधुर पेय, भोजन और मनोहर वाणी तथा सेवा-शुश्रूषा से वह अनिरुद्ध का बड़ा सत्कार करती, और अपने प्रेम से उसने उनका मन अपने वश में कर लिया। अनिरुद्ध उस कन्या के अन्तःपुर में छिपे रहकर अपने-आपको भूल गए। उन्हें इस बात का भी पता न चला कि यहाँ आए कितने दिन बीत गए।

उषा का कुआँरापन अब छिपा न रहा। उसके शरीर पर ऐसे चिह्न प्रकट हो गए, जो स्पष्ट कह रहे थे, और जिन्हें किसी प्रकार छिपाया न जा सकता था। पहरेदारों ने समझ लिया कि इसका किसी पुरुष से सम्बन्ध अवश्य हो गया है। उन्होंने जाकर बाणासुर से निवेदन किया, ”राजन्, आपकी अविवाहिता राजकुमारी का रंग-ढंग कुलपर बट्टा लगाने वाला है। हमलोग बिना क्रम टूटे रात-दिन महल का पहरा देते हैं, बाहर का मनुष्य उसे देख भी नहीं सकता। फिर वह कलंकित कैसे हो गई?”

A dramatic classical-Indian color painting: prince Aniruddha, alone in Usha's chamber, swinging a heavy iron club (parigha) to beat back Banasura's rushing soldiers like a boar scattering dogs; behind him, enraged thousand-armed Banasura casts his serpent-noose magic (nagapasha) as living snakes coil and bind the youth; weeping Usha looks on, tears flowing.

क्रोध से तिलमिलाकर बाणासुर स्वयं सैनिकों के साथ कक्ष तक आ धमका, और देखा कि अनिरुद्ध वहाँ बैठे हुए हैं। अनिरुद्ध ने अकेले ही एक लोहे का परिघ उठाकर सैनिकों को रोका, और मानो कालदण्ड लेकर मृत्यु ही खड़ी हो, इस प्रकार जो-जो उन्हें पकड़ने को झपटता, उसे वे मार-मारकर गिराते जाते, जैसे सूअरों के दल का नायक कुत्तों को मार डाले। पर तब बाणासुर ने अपनी नागपाश-विद्या चलाई। साँपों के बंधन ने नौजवान को जकड़ लिया, और वह बंदी होकर रह गया। यह सुनकर उषा शोक और विषाद से विह्वल हो गई, उसके नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी।

उधर द्वारका में हाहाकार था। राजकुमार सोते से गायब, न कोई चिह्न, न कोई सुराग। बरसात के चार महीने बीत गए और किसी को कुछ पता न चला, अनिरुद्ध के घर के लोग बहुत शोकाकुल हो रहे थे।

तभी नारद आ पहुँचे, जैसे संकट के समय वे सदा आ जाते हैं। उन्होंने द्वारका को बताया कि अनिरुद्ध कहाँ है, कैसे उसे सोणितपुर ले जाया गया, और किसके नागपाश में बँधा है।

तब श्रीकृष्ण को ही अपना आराध्यदेव मानने वाले यदुवंशी सोणितपुर की ओर चल पड़े। श्रीकृष्ण और बलराम के साथ अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न, सात्यकि, गद, साम्ब, सारण, नन्द, उपनन्द और भद्र आदि बारह अक्षौहिणी सेना लेकर चले, और चारों ओर से सोणितपुर को घेर लिया।

जब बाणासुर ने देखा कि यदुवंशियों की सेना नगर के उद्यान, परकोटे, बुर्ज और सिंहद्वारों को तोड़-फोड़ रही है, तो उसकी आँखों में चमक आ गई। यही तो वह युद्ध था जिसकी कामना उसने महादेव से की थी। वह भी बारह अक्षौहिणी सेना लेकर नगर से निकल पड़ा, और शिव के मन्दिर में जा गिरा।

”प्रभु, आपका वचन याद है? यदुवंश द्वार पर है। अब अपने सेवक की लाज रखिए।”

शिव अपने वचन से बँधे थे। उन्होंने अपने प्रमथ-गणों की सेना भेजी, अपने पुत्र कार्तिकेय को आगे किया, और स्वयं भी नन्दी पर सवार होकर रणभूमि में आ खड़े हुए।

और तब वह घड़ी आई जिसे देखने तीनों लोकों के देवता आकाश में रुक गए।

श्रीहरि और शंकर, आमने-सामने।

दोनों के भीतर वही एक परम तत्त्व, और दोनों के बीच गहरा आदर। पर इस घड़ी एक एक ओर, दूसरा दूसरी ओर।

युद्ध छिड़ गया। एक ओर यदुवंश और प्रद्युम्न का धनुष, दूसरी ओर शिव के प्रमथगण और कार्तिकेय की शक्ति। श्रीकृष्ण से शंकर का, और प्रद्युम्न से स्वामिकार्तिक का युद्ध हुआ। बलराम से कुम्भाण्ड और कूपकर्ण भिड़े, बाणासुर के पुत्र के साथ साम्ब, और स्वयं बाणासुर के साथ सात्यकि।

बाणों की झड़ी लग गई, आकाश ढक गया। दिव्यास्त्र छूटे और टकराकर बुझते रहे।

श्रीकृष्ण और शिव के बीच अद्भुत और घमासान युद्ध हुआ, ऐसा कि देखने वाले देवता रोमांचित हो उठे। शंकर ने पिनाक से भाँति-भाँति के अस्त्र चलाए, और श्रीहरि बिना किसी विस्मय के हर अस्त्र को उसी के प्रतिपक्षी अस्त्र से शान्त करते रहे। ब्रह्मास्त्र के सामने ब्रह्मास्त्र, वायव्य के सामने पार्वत, आग्नेय के सामने पार्जन्य, पाशुपत के सामने नारायण।

शंकर के अनुचरों ने भी श्रीकृष्ण पर धावा बोला, पर श्रीकृष्ण ने अपने शार्ङ्गधनुष के तीखे बाणों से भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, वेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड और ब्रह्मराक्षसों को मार-मारकर खदेड़ दिया।

A fierce classical-Indian color battle painting: on the battlefield Lord Krishna (dark blue, four-armed, holding the Sharnga bow) faces Lord Shiva (on Nandi, trident Pinaka); between them clash two fever-spirits, the blazing three-headed three-legged Maheshvara-jvara rushing at Krishna and being overpowered by Krishna's released Vaishnava-jvara; scorched Yadu soldiers and crossing divine arrows fill the sky; gods watching above.

शिव की ओर से माहेश्वर-ज्वर दौड़ा, तीन सिर और तीन पैरों वाला धधकता ताप, जो दसों दिशाओं को जलाता हुआ श्रीकृष्ण की ओर बढ़ा; उसके आगे यदुसेना झुलसने लगी। श्रीकृष्ण ने अपना वैष्णव-ज्वर छोड़ा। दोनों ज्वर आपस में भिड़े, और माहेश्वर-ज्वर वैष्णव-ज्वर के तेज से पीड़ित होकर हार गया। कहीं शरण न पाकर वह भयभीत होकर हाथ जोड़े श्रीकृष्ण की शरण में आया और उनकी स्तुति करने लगा। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उसे अभय दे दिया, ”जो हम दोनों के संवाद का स्मरण करेगा, उसे आपसे कोई भय न रहेगा।”

फिर वह क्षण आया जब युद्ध अपने चरम पर चढ़ गया।

श्रीकृष्ण ने एक अनोखा अस्त्र साधा, जृम्भणास्त्र, जो जँभाई और आलस्य ले आता है। उसका स्पर्श होते ही शिव मोहित हो गए, उन्हें जँभाई पर जँभाई आने लगी, और वे नन्दी पर बैठे-बैठे युद्ध से विरत हो गए।

सारी सृष्टि के संहारक, बीच रणभूमि में, ठहर गए। उधर इसी अवसर पर श्रीकृष्ण ने तलवार, गदा और बाणों से बाणासुर की सेना का संहार करना आरम्भ कर दिया। साथ ही प्रद्युम्न ने अपने बाणों की बौछार से स्वामिकार्तिक को घायल कर दिया, उनके अंग-अंग से रक्त की धारा बह चली, और वे रणभूमि छोड़कर अपने वाहन मयूर पर भाग निकले। बलराम ने अपने मूसल की चोट से कुम्भाण्ड और कूपकर्ण को घायल कर दिया, वे रणभूमि में गिर पड़े। अपने सेनापतियों को हताहत देखकर बाणासुर की सारी सेना तितर-बितर हो गई।

कुछ क्षण बाद शिव सँभले। उन्होंने हलकी मुस्कान के साथ श्रीकृष्ण की ओर देखा।

”गोविन्द, चाल अच्छी चली आपने।”

श्रीकृष्ण के होंठों पर भी मुस्कान थी। ”क्षमा करें, प्रभु। आपको रोके बिना अपने पौत्र तक पहुँचने का कोई रास्ता न था।”

जब रथ पर सवार बाणासुर ने देखा कि श्रीकृष्ण आदि के प्रहार से उसकी सेना तितर-बितर हो रही है, तब उसे बड़ा क्रोध आया। वह श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने को दौड़ पड़ा, और रणोन्मत्त होकर अपने एक हज़ार हाथों से एक साथ पाँच सौ धनुष खींचकर एक-एक पर दो-दो बाण चढ़ाने लगा। पर श्रीकृष्ण ने एक साथ ही उसके सारे धनुष काट डाले, सारथि, रथ तथा घोड़ों को भी धराशायी कर दिया, और शंखध्वनि की।

तभी कोटरा सामने आ खड़ी हुई, बाणासुर की धर्ममाता, एक देवी। अपने उपासक पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए वह बाल बिखेरे, निर्वस्त्र होकर श्रीकृष्ण के सामने आ गई। श्रीकृष्ण ने, ताकि उस पर दृष्टि न पड़े, अपना मुख फेर लिया और दूसरी ओर देखने लगे। इसी बीच धनुष कट जाने और रथहीन हो जाने के कारण बाणासुर बचकर अपने नगर में चला गया।

पर वह घमंड भीतर अब भी जीवित था। कुछ देर में बाणासुर फिर रथ पर सवार होकर, तरह-तरह के हथियार लिए, श्रीकृष्ण पर बाणों की झड़ी लगाता हुआ लौट आया।

A classical-Indian color painting: Lord Krishna (dark blue, on his chariot) hurling the spinning, fiery Sudarshana discus, which slices off Banasura's thousand arms one by one like trimming small branches from a tree, leaving only four; the bloodied thousand-armed demon-king bowing low to the ground, severed arms falling around him, battlefield smoke and broken chariots.

श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को छोड़ा। चक्र ने जैसे कोई किसी वृक्ष की छोटी-छोटी डालियाँ काट रहा हो, वैसे ही बाणासुर की भुजाएँ एक-एक कर काट गिराईं, केवल चार छोड़कर। हज़ार भुजाओं का बोझ जिसे संभाले न संभलता था, पल भर में उतर गया।

लहूलुहान बाणासुर भूमि पर झुक गया। चक्र अब भी उसकी शेष भुजाओं को काटने पर तत्पर था।

तभी भक्तवत्सल भगवान् शंकर आगे बढ़े। ”गोविन्द, ठहरिए।”

श्रीकृष्ण ने चक्र को रोक लिया और शिव की ओर देखा।

”प्रभो, आप वेदमन्त्रों में तात्पर्यरूप से छिपे हुए परमज्योतिःस्वरूप परब्रह्म हैं। शुद्धहृदय महात्मा आपके आकाश के समान सर्वव्यापक और निर्विकार स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं। यह बाणासुर मेरा परमप्रिय, कृपापात्र और सेवक है। मैंने इसे अभयदान दिया है। जैसे इसके परदादा दैत्यराज प्रह्लाद पर आपका कृपाप्रसाद है, वैसा ही कृपाप्रसाद आप इस पर भी करें। इसका अभिमान आपने हर लिया, अब इसे जीवन दे दीजिए।”

श्रीकृष्ण क्षण भर ठहरे, फिर कोमल स्वर में बोले, ”भगवन्, जैसा आप चाहते हैं, मैं इसे निर्भय किए देता हूँ। मैं जानता हूँ कि बाणासुर दैत्यराज बलि का पुत्र है। इसलिए मैं इसका वध नहीं करूँगा, क्योंकि मैंने प्रह्लाद को वर दे दिया था कि उसके वंश में पैदा होने वाले किसी भी दैत्य का वध नहीं करूँगा। इसकी हज़ार भुजाओं का गर्व ही इसका शत्रु था, वह कट चुका। अब इसकी चार भुजाएँ बच रही हैं, ये अजर-अमर बनी रहेंगी। यह आपके पार्षदों में मुख्य होगा, और इसको किसी से किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा। बस इतना, कि यह अनिरुद्ध का बंधन खोले, और उसे उषा सहित द्वारका भेजे।”

बाणासुर ने झुके सिर से स्वीकार कर लिया। उसने श्रीकृष्ण के पास आकर धरती में माथा टेका, प्रणाम किया। नागपाश के बंधन खुल गए। अनिरुद्ध, इन महीनों में पहली बार, खुली हवा में साँस ले सका।

A joyful classical-Indian color painting: Lord Krishna leading the procession back to Dwarka, with prince Aniruddha and princess Usha adorned in fine garments and jewels riding ahead with an army; the festively decorated city of Dwarka, streets sprinkled with sandal-scented water, citizens and brahmins welcoming them, conches, kettledrums and dhols sounding; golden festive atmosphere.

तब भगवान् श्रीकृष्ण ने महादेवजी की सम्मति से वस्त्र-अलंकारों से विभूषित उषा और अनिरुद्ध को एक अक्षौहिणी सेना के साथ आगे करके द्वारका के लिए प्रस्थान किया। द्वारका में नगर को कोना-कोना सजा दिया गया, बड़ी-बड़ी सड़कों और चौराहों को चन्दन-मिश्रित जल से सींच दिया गया, और नागरिकों, बन्धु-बान्धवों तथा ब्राह्मणों ने आगे आकर खूब धूमधाम से भगवान् का स्वागत किया। उस समय शंख, नगारों और ढोलों की तुमुल ध्वनि हो रही थी। जिस चेहरे को उषा ने पहले स्वप्न में और फिर चित्र में पहचाना था, वह अब आजीवन उसके साथ था।

और बाणासुर, अपनी चार बची भुजाओं के साथ, महादेव के प्रमथगणों में मुख्य होकर सदा उनके चरणों में रहा।

मन्थन

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा की लहरें किनारे की रेत को छूकर लौट रही थीं।

परीक्षित् ने धीरे से पूछा, ”भगवन्, तो जो प्रश्न मन में अटका था, उसका उत्तर मिल गया। दो ईश्वर सचमुच आमने-सामने भिड़े, घमासान युद्ध हुआ, पर बैर से नहीं। यह कैसा युद्ध था?”

”यही तो भेद है, राजन्,” शुकदेव बोले। ”वह युद्ध शत्रुता का नहीं, भक्तवात्सल्य का था। बाणासुर के अभिमान को टूटना था, सो टूटा। पर जिसने उसे आश्रय दिया था, वह वचन भी निभा। श्रीहरि ने शंकर का मान रखा, और शंकर ने अपने भक्त का प्राण।”

परीक्षित् के मन में अब भी एक रेखा बाक़ी थी। ”पर मुनिवर, देखने वाले को तो भ्रम होगा। कौन सही, कौन ग़लत?”

शुकदेव मुस्कराए। ”भागवत यह प्रश्न उठाता ही नहीं, राजन्। जो दोनों पक्षों के भीतर खड़ा है, वह एक ही है। उसके रूप अनेक हैं, और हर रूप अपने भक्त के साथ है। दो भक्त आमने-सामने आ जाएँ, तो उनके आराध्य भी आमने-सामने आ खड़े होते हैं, पर शत्रु होकर नहीं, रक्षक होकर।”

”इसीलिए वे एक-दूसरे को सीधा प्रहार नहीं करते, और अन्त में शंकर ही श्रीहरि से अपने भक्त का जीवन माँगने आते हैं। उनके बीच कोई स्थायी बैर है ही नहीं।”

परीक्षित् देर तक जल की ओर देखते रहे, फिर बोले, ”तो जो विरोध दिखता है, वह ऊपर-ऊपर है। पीछे एक ही हाथ है।”

शुकदेव ने कुछ नहीं कहा। दूर एक चकवा अपने साथी को पुकारता हुआ जल के ऊपर से उड़ गया, और गंगा पहले की तरह बहती रही।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 62 और 63 में आती है। शिवभक्त बाणासुर और श्रीकृष्ण का यह युद्ध भागवत में भक्तवात्सल्य का अनूठा चित्र है, जहाँ हरि और शंकर परस्पर आदर रखते हुए अपने-अपने भक्त की रक्षा के लिए आमने-सामने आते हैं, और अन्त में शंकर ही श्रीकृष्ण से बाणासुर का प्राण माँगते हैं।

उषा और अनिरुद्ध का प्रेम-प्रसंग इसी कथा का अंग है। परम्परा में बाणासुर की नगरी सोणितपुर को आधुनिक तेज़पुर (असम) माना जाता है, और वहाँ का अग्निगढ़ उषा से जुड़ी लोक-स्मृति का केन्द्र है।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

हज़ार भुजाओं वाला एक प्रतापी राजा, और उसी के बल के घेरे में पली एक बेटी, जो स्वप्न में देखे एक चेहरे के सहारे महल की हर दीवार लाँघ जाती है। बाणासुर का अभिमान और उषा की चुपचाप ठहरी हुई चाह, इन्हीं दोनों के बीच यह सारी कथा बहती है, और अन्त में बल झुकता है, प्रेम बचा रहता है।