इला और सुद्युम्न
मनु के एक बेटा था। नाम था सुद्युम्न।
सुद्युम्न एक राजकुमार। बहुत powerful। शिकार पर निकलने में expert।
एक दिन वो शिकार पर निकले। अपनी सेना के साथ।
वो एक नए जंगल में पहुँचे। बहुत dense। पहले कभी नहीं देखा था।
वो उस जंगल में अंदर गए।
और कुछ हुआ।
उन्हें एहसास नहीं हुआ। मगर उनके शरीर में एक धीरे-धीरे बदलाव।
उनके बाल लंबे होने लगे।
उनकी आवाज़ बदलने लगी।
उनकी छाती में curves।
उनके कूल्हे चौड़े।
वो रुक गए। अपने आप को देखा।
”मैं क्या?”
वो एक स्त्री बन चुके थे।
स्वरूपस्य परस्यैव कर्तृत्वं नैव विद्यते ॥
लिङ्ग-भेद (पुरुष-स्त्री का भेद) जीव के लिए नहीं, यह सिर्फ़ शरीर-धर्म है। आत्मा की कोई पहचान नहीं, न पुरुष, न स्त्री।
उनकी सेना के भी सब पुरुष स्त्रियाँ हो गए। सैनिक स्त्रियाँ। घोड़े भी मादा।
और घोड़ियाँ हो गईं।
सब एक-दूसरे को देख रहे थे। यह क्या?
एक स्थानीय ऋषि ने बताया। ”यह वो जंगल है जो शिव-पार्वती ने एक बार दौरा किया था।”
”वो दोनों यहाँ अकेले समय बिताना चाहते थे। तब शिव ने एक regulation लगाया, यहाँ जो भी पुरुष आएगा, वो स्त्री बन जाएगा। ताकि कोई और पुरुष यहाँ न आ सके।”
”अब आप यहाँ हैं। और वो rule काम कर गया।”
”क्या कोई रास्ता है?” सुद्युम्न ने पूछा।
”नहीं। यह स्थायी है।”
सुद्युम्न के पास अब option नहीं था। उन्होंने अपना नाम बदला। इला।
वो एक सुन्दर युवती। जंगल में रहीं।
एक दिन एक देवता उधर से गुज़रा। बुध। (चन्द्रमा का बेटा।)
उसने इला को देखा। उससे प्रेम हो गया।
”तू कौन?” उसने पूछा।
”इला।”
”मेरे साथ चलोगी?”
इला, जिसने अपनी पुरुष-पहचान खो दी थी, उसने हाँ कहा।
बुध और इला विवाह बंधन में बँधे।
एक बच्चा हुआ। पुरूरवा। (बाद में एक महान् राजा।)
मगर इला अपनी पुरानी पहचान को नहीं भूली।
वो अपने पिता मनु के पास गई। मदद माँगी।
मनु ने ऋषियों से सलाह ली। एक उपाय निकाला।
एक यज्ञ हुआ। एक special यज्ञ।
इला वापस सुद्युम्न बने। पुरुष।
मगर एक twist। यह स्थायी नहीं। एक महीने पुरुष, एक महीने स्त्री।
बारी-बारी से।
तो सुद्युम्न ने अपनी ज़िंदगी का बाक़ी हिस्सा बारी-बारी से बिताया।
एक महीने में पुरुष, राज-पाठ करते। फिर एक महीने स्त्री, जंगल में जाते।
एक interesting जीवन।
और एक interesting बात। जब वो पुरुष थे, उनके बेटे थे। जब वो स्त्री थीं, वो दूसरे बच्चे जन्म दिए।
उनसे दो vansh निकले।
अंत में सुद्युम्न ने तपस्या ली। दोनों रूपों से ऊपर उठे। मुक्ति।
इला/सुद्युम्न की कथा एक unusual और subversive कथा है।
एक राजकुमार जो एक जंगल में जाता है और स्त्री बन जाता है।
एक solution मिलता है, पर permanent नहीं। बारी-बारी पुरुष-स्त्री।
क्यों भागवतम् यह कथा सुनाता है?
एक तरह से यह कह रहा है, gender एक deeper sense में temporary है। यह शरीर का feature है, आत्मा का नहीं।
सुद्युम्न पुरुष था। पर वो खुद नहीं बदला, उसका शरीर बदला। और वो ने notice किया, ”मैं स्त्री भी हो सकता हूँ। मैं पुरुष भी।”
और दोनों में, एक ही ”मैं।”
यह एक deep insight है। हम अपनी पहचान बहुत strong रखते हैं। ”मैं पुरुष। मैं ऐसा। मैं वैसा।”
मगर अगर शरीर बदले, हम बदल जाएँगे? या वही ”मैं” बना रहेगा?
इला/सुद्युम्न ने यह सीखा। और तब वो उन दोनों से ऊपर उठे, तपस्या में।
यह कथा आज के gender-related conversations में भी relevant है। हिन्दू-परंपरा में gender fluidity एक नई बात नहीं। यह कथा हज़ारों साल पुरानी है।
और भागवतम् इसे judgement के बिना कहता है। बस एक कथा। एक realization।