इला और सुद्युम्न
गंगा की लहरें उस सुबह कुछ धीमी बह रही थीं। परीक्षित् ने मुनि की ओर देखा, और जो प्रश्न कई दिनों से मन में करवट ले रहा था, वह आख़िर पूछ ही लिया।
”भगवन्, कल आपने सूर्यवंश के राजाओं की बात कही थी। एक नाम आते-आते रुक गया था, सुद्युम्न का। हमने सुना है कि वह कभी पुरुष रहे, कभी स्त्री। हमारे पास गिनती के दिन बचे हैं, और हम अब भी सोचते हैं कि यह ‘हम’ है कौन, जो इस देह में बैठा है। वह राजा क्या सीख पाया?”
शुकदेव कुछ क्षण गंगा को देखते रहे, फिर बोले।
”राजन्, सूर्यवंश के मूल में एक राजा थे, वैवस्वत मनु। श्रद्धादेव मनु, जिनके दस पुत्र हुए, और जिनमें सब में बड़े इक्ष्वाकु थे। पर एक समय ऐसा भी था जब यही मनु सन्तानहीन थे, और उनका अपना आँगन सूना था।”
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तब सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें सन्तान दिलाने के लिए मित्र और वरुण देवों का एक यज्ञ कराया। मनु की पत्नी का नाम श्रद्धा था। वे उन दिनों पयोव्रत किए हुए थीं, केवल दूध पर, और कुछ नहीं। यज्ञ के आरम्भ में वे होता के पास गईं और प्रणाम करके भीतर ही भीतर एक बात माँग बैठीं, कि मुझे पुत्र नहीं, कन्या मिले। बस इतनी-सी एक माँ की चाह।

तब अध्वर्यु की प्रेरणा से होता बने हुए ब्राह्मण श्रद्धा के उस कथन का स्मरण करके, एकाग्र चित्त से वषट्कार का उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्ड में आहुति देने लगे। होता के इस प्रकार विपरीत कर्म कर बैठने से यज्ञ का फल पुत्र के स्थान पर एक कन्या के रूप में जन्मा। नाम पड़ा, इला।
उसे देखकर मनु प्रसन्न न हुए। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ से कहा, आप तो ब्रह्मवादी हैं, जितेन्द्रिय हैं, तप से निष्पाप हो चुके हैं। आपके संकल्प का फल यों उलटा कैसे पड़ गया। देवताओं में असत्य की प्राप्ति के समान आपके संकल्प का यह विपरीत फल बड़े दुःख की बात है।
वसिष्ठ ने होता के डिगे हुए मन को ताड़ लिया। फिर उन्होंने उस कन्या के लिए पुरुषोत्तम नारायण की स्तुति की, कि अपने तप के प्रभाव से इसे श्रेष्ठ पुत्र बना दूँ। भगवान् प्रसन्न हुए, मुँहमाँगा वर दिया, और वही कन्या इला तरुण राजकुमार बन गई, सुद्युम्न।
एक दिन वीर सुद्युम्न शिकार के लिए सिन्धुदेश के घोड़े पर सवार होकर कुछ मन्त्रियों के साथ वन को निकले।
कवच पहन, हाथ में सुन्दर धनुष और कुछ अत्यन्त अद्भुत बाण लेकर वे हिरनों के पीछे उत्तर दिशा में बहुत आगे, और आगे निकलते चले गए।
पीछा करते-करते वे मेरु पर्वत की तलहटी के एक ऐसे वन में जा घुसे। उन्हें यह पता न था कि उस वन में स्वयं भगवान् शंकर अपनी प्रिया पार्वती के साथ विहार कर रहे थे।

उस वन में प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्न ने देखा कि वे स्त्री हो गए हैं।
उन्होंने नीचे देखा। घोड़े की लगाम थामे जो हाथ था, वह उनका न था। और जिस घोड़े पर वे सवार थे, वह घोड़ी हो गया था।
उन्होंने कुछ कहना चाहा, पर जो स्वर गले से उठा, वह उनका न था। एक नरम, अनजाना सुर हवा में काँप कर रह गया। वे अपनी ही पुकार सुनकर सहम गए।
”यह… हम हैं?” इतना ही, और अपनी ही बदली हुई आवाज़ सुनकर वे चुप रह गईं।
देह वही न रही थी। पर भीतर जो यह पूछ रहा था कि यह हम हैं, वह ज्यों का त्यों खड़ा था, उसी डर के साथ, उसी राजा की स्मृति के साथ। देह छूट गई थी, देखने वाला नहीं छूटा था।
उन्होंने काँपते हुए पीछे मुड़कर देखा। और जो दिखा, उससे साँस और अटक गई।
उनके सब अनुचर भी स्त्रियाँ हो चुके थे। मन्त्री, सैनिक, सब। कोई किसी से कुछ न बोल पाया। सब एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए, और उनका चित्त बहुत उदास हो गया।
तभी उस वन के एक छोर पर, बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेज से दिशाओं का अन्धकार मिटाते हुए भगवान् शंकर का दर्शन करने आ पहुँचे। उस घड़ी भगवती अम्बिका वस्त्रहीन थीं, और भगवान् शंकर की गोद में थीं। इन सबको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो उठीं, झटपट उठीं, और भगवान् की गोद से हटकर वस्त्र सँभाल लिए। ऋषियों ने भी देखा कि भगवान् गौरी-शंकर इस समय विहार कर रहे हैं, सो वहाँ से लौटकर वे भगवान् नर-नारायण के आश्रम को चले गए।
शिव ने अपनी प्रिया का वह संकोच देखा, और उसी प्रिया को प्रसन्न रखने के लिए उन्होंने वह बात कही।
”मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थान पर पैर रखेगा, वह स्त्री हो जाएगा।” शिव की वह वाणी वन में गूँजी।
उस दिन से पुरुष उस स्थान में पाँव नहीं रखते। और सुद्युम्न, अपने स्त्री बने हुए अनुचरों के साथ, एक वन से दूसरे वन में विचरने लगीं।

एक दिन उसी आश्रम के पास, अनेक स्त्रियों से घिरी हुई एक सुन्दरी विचर रही थीं, जब उधर से शक्तिशाली बुध निकले। उनकी दृष्टि उस पर पड़ी और वहीं ठहर गई। मन में उन्होंने चाहा कि यह सुन्दरी मुझे प्राप्त हो जाए। और उस सुन्दरी ने भी चन्द्रकुमार बुध को पति बनाना चाहा। इसी से बुध से उसके गर्भ से पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर एक महान् राजा हुए।
इस प्रकार स्त्री बने हुए मनुपुत्र राजा सुद्युम्न को एक दिन अपने कुलाचार्य वसिष्ठ का स्मरण हो आया।
सुद्युम्न की यह दशा देखकर वसिष्ठ के हृदय में कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्हें फिर से पुरुष बना देने के लिए वे भगवान् शंकर की आराधना में बैठ गए।
भगवान् शंकर वसिष्ठ पर प्रसन्न हुए। पर उन्होंने जो वचन अपनी प्रिया के लिए दिया था, उसे झूठा करना उन्हें स्वीकार न था। सो उन्होंने अपनी वाणी को सत्य रखते हुए ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करने को बीच का एक मार्ग दिया।
”वसिष्ठ, आपका यह यजमान एक मास पुरुष रहेगा और एक मास स्त्री। इसी व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वी का पालन करे।”
अब इला फिर सुद्युम्न हो गईं, पुरुष। परन्तु सदा के लिए नहीं। एक मास पुरुष, एक मास स्त्री, बारी-बारी, जीवन भर।

एक मास पुरुष होकर वे पृथ्वी का पालन करते, राज-काज देखते। फिर एक मास स्त्री होकर अंतःपुर में, मौन-सा जीवन जीतीं।
पर प्रजा इस रूप में उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। राज-काज वे सँभालते रहे, पर उस आदर के साथ नहीं, जो किसी राजा को सहज ही मिलता है।
पुरुष-काल में उनके तीन पुत्र हुए, उत्कल, गय और विमल। ये तीनों आगे चलकर दक्षिणापथ के राजा हुए, और इस प्रकार उनका वंश दक्षिण की धरती पर फैल गया।
फिर वृद्धावस्था आ गई। प्रतिष्ठान नगरी के अधिपति सुद्युम्न ने अपना राज्य पुत्र पुरूरवा को सौंप दिया, और चुपचाप वन की राह पकड़ ली। पीछे एक मास पुरुष का सिंहासन छूट गया, एक मास स्त्री का अंतःपुर छूट गया। आगे केवल वह राह थी, और उस पर चलता हुआ वह, जिसे न कोई मास पुरुष कर पाया था, न स्त्री।
शुकदेव कुछ देर मौन रहे। गंगा का जल आगे बढ़ता रहा।
परीक्षित् ने पहले अपने ही प्रश्न को याद किया, फिर पूछा, ”भगवन्, जिस घड़ी उस राजकुमार ने अपनी हथेली को पहचानना छोड़ दिया, उस घड़ी जो भीतर सहम कर पूछ रहा था कि यह हम हैं, वह कौन था?”
”वही, राजन्, जो हर मास सुद्युम्न को सिंहासन पर बिठाता था, और हर मास इला को अंतःपुर के मौन में ले जाता था। हाथ बदल जाते थे, स्वर बदल जाता था, यहाँ तक कि प्रजा का आदर भी बदल जाता था। पर जिसके लिए ये सब बदलते थे, उसे किसी ने न बदला, न वह कभी एक मास के लिए भी कहीं गया।”
”इसीलिए, राजन्, अंत में वे न पुरुष में अटके, न स्त्री में। प्रतिष्ठान का राज्य पुरूरवा को सौंपकर वे वन की ओर चल दिए, उसी एक की ओर जो आरम्भ से उनके भीतर बैठा देख रहा था।”
शिव का वह वचन, जो ऊपर से एक राजा से सब कुछ छीन ले गया था, भीतर से उसे वहाँ ले आया जहाँ छिनने को कुछ बचा ही न था।
परीक्षित् कुछ न बोले। केवल अपनी ही दोनों हथेलियों को आँखों के सामने उठाकर देर तक देखते रहे, जैसे पहली बार उन्हें किसी और की नज़र से पहचान रहे हों।
साहित्यिक-संदर्भ
इला और सुद्युम्न की यह कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 1 में आती है। वैवस्वत मनु की पत्नी श्रद्धा के पयोव्रत और एक माँ की भीतरी कामना से होता का संकल्प मुड़ जाता है, और पुत्र के स्थान पर कन्या इला जन्मती है। वसिष्ठ की पुरुषोत्तम-स्तुति से इला पुरुष सुद्युम्न बनते हैं, मेरु की तलहटी के उस वन में जाकर पुनः स्त्री हो जाते हैं जहाँ शिव अम्बिका के साथ विहार करते हैं, बुध से उनका पुत्र पुरूरवा होता है, और वसिष्ठ की शिव-आराधना से उन्हें एक मास पुरुष, एक मास स्त्री का जीवन मिलता है। उनके तीन पुत्र उत्कल, गय और विमल दक्षिणापथ के राजा हुए, और अंत में वे प्रतिष्ठान का राज्य पुरूरवा को सौंपकर वन को जाते हैं।
एक राजा, इला और सुद्युम्न
मेरु की तलहटी के एक वन में राजकुमार सुद्युम्न की देह उनकी अपनी न रही, स्वर उनका न रहा, नाम तक बदल गया। एक मास पुरुष, एक मास स्त्री, बारी-बारी जीवन भर। और हर बार, हर बदलते रूप के भीतर, कोई एक था जो अपनी ही हथेली को नए सिरे से पहचानता था।