प्रह्लाद का विद्रोह

परीक्षित् ने मुनिवर शुकदेव की ओर देखा, और उनकी आवाज़ धीमी थी।
”भगवन्, मैं राजा रहा हूँ। मैंने जाना है कि सत्ता के सामने सच कहना कितना कठिन है, और वह भी अपने ही पिता के सामने, जहाँ सच कहो तो प्रेम पर आँच आती है, और न कहो तो अपनी आत्मा पर। एक बालक रहा होगा जिसे उसका अपना पिता आग में डलवा रहा था, और वह बालक उसी पिता से प्रेम भी करता रहा। यह डर और वह स्नेह एक साथ कैसे रहते हैं, भगवन्? मुझे उसकी कथा सुनाइए।”
शुकदेव की आँखों में एक कोमलता उतर आई। ”राजन्, जिसके भीतर श्रीहरि बस जाते हैं, उसके भीतर भय के बैठने की जगह नहीं रहती। पर प्रेम के लिए जगह बहुत रहती है, इतनी कि वह उसी पिता पर भी बरसता है जो उसे मारने पर तुला हो। सुनिए, यह उसी प्रह्लाद की कथा है, जो राक्षस के घर जन्मा, और जिसने राक्षसों को ही भक्ति सिखा दी।”
⁂
हिरण्यकशिपु पूरे ब्रह्मांड का सम्राट था, और उसके भीतर एक काँटा गड़ा रहता था जिसे वह कभी न निकाल सका।

उसका भाई हिरण्याक्ष था, बलवान, उसके साथ का खेला हुआ। उसी हिरण्याक्ष को श्रीविष्णु ने वराह-रूप धरकर समुद्र के भीतर मार डाला था। उस दिन से हिरण्यकशिपु के मन में विष्णु का नाम एक घाव की तरह बैठ गया, जो भरता नहीं था, केवल रिसता रहता था। वह उठते-बैठते, खाते-सोते, उसी एक शत्रु को याद करता। बैर भी एक प्रकार का स्मरण है, और हिरण्यकशिपु जितनी एकाग्रता से विष्णु से घृणा करता था, उतनी एकाग्रता से तो कोई भक्त भी प्रेम नहीं करता।
उसने तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके ऐसे वर पाए कि उसे कोई मार न सके, न दिन में, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न मनुष्य से, न पशु से, न शस्त्र से, न अस्त्र से, न पृथ्वी पर, न आकाश में। हिरण्यकशिपु अब अपने को अमर मान बैठा। उसने तीनों लोक जीते। इन्द्र को स्वर्ग से उतार फेंका। देवता उसके सामने काँपते थे। पर जिस एक की मृत्यु वह सब में अधिक चाहता था, वह उसके किसी वर की पकड़ में न आता था।
और उसका एक बेटा था, प्रह्लाद।
एक राक्षस-राजा का बेटा, मगर वो अलग था। जन्म से ही उसका मन श्रीहरि की ओर झुका हुआ था। जिस नाम से उसका पिता दिन-रात जलता था, उसी नाम को वह बालक अपने भीतर लिए बड़ा हुआ।
हिरण्यकशिपु ने भगवान् शुक्राचार्य को अपना पुरोहित बनाया था। उन्हीं काव्य (शुक्राचार्य) के दो पुत्र थे, षण्ड और अमर्क। वे दोनों राजमहल के पास ही रहते थे, और हिरण्यकशिपु के भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लाद को तथा और राक्षस-बालकों को राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे। प्रह्लाद पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेता, और ज्यों-का-त्यों सुना भी देता। पर मन में उसे वह अच्छा नहीं लगता था, क्योंकि उस सारी पढ़ाई की जड़ में केवल यही था, यह अपना, वह पराया।

एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने बेटे को बड़े प्रेम से गोद में बिठाया। उसी छाती पर, जिसने इन्द्र को सिंहासन से उतारा था, वह छोटा बालक हलका-सा बैठा था।
”बेटा, बताइए तो सही, आपको कौन-सी बात सब में अच्छी लगती है?”
प्रह्लाद ने कहा, ”पिताजी, संसार के प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रह में पड़कर सदा अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियों के लिए मुझे यही ठीक लगता है कि वे अपने अधःपतन के मूल कारण इस घर को, जो घास से ढके अँधेरे कुएँ के समान है, छोड़कर वन में चले जाएँ और भगवान् श्रीहरि की शरण ग्रहण करें।”
शत्रुपक्ष की प्रशंसा से भरी यह बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठट्ठाकर हँस पड़ा, ”दूसरों के बहकाने से बच्चों की बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है।” फिर हँसी रुक गई।
”गुरु को बुलाओ।”

दैत्य-पुरोहित बड़ी मधुर वाणी से प्रह्लाद को पुचकारकर पूछने लगे, ”बेटा प्रह्लाद, आपका कल्याण हो। ठीक-ठीक बतलाइए, झूठ न बोलिए। यह आपकी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी? और किसी बालक की बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई। हम आपके गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि आपकी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी, या किसी ने सचमुच आपको बहका दिया है?”
प्रह्लाद ने कहा, ”जिन मनुष्यों की बुद्धि मोह से ग्रस्त हो रही है, उन्हीं को भगवान् की माया से यह झूठा दुराग्रह होता देखा जाता है कि यह अपना है और यह पराया। उन मायापति भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। वे भगवान् ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्यों की पशु जैसी बुद्धि नष्ट होती है। इस पशुबुद्धि के कारण ही तो यह झूठा भेद-भाव पैदा होता है। आप जिसे शत्रु मानते हैं, वही हर एक की आत्मा है, मेरी भी, आपकी भी।”
यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने बच्चे की ओर देखा। वह चाहता था कि बच्चा कह दे कि वह तो हँसी कर रहा था, पर बच्चा बस उसकी ओर देखता रहा।
”बेटा, यह क्या बक रहे हैं आप? आप मेरे बेटे हैं। मैंने तीनों लोक जीते। विष्णु मेरा शत्रु है। उसी ने आपके चाचा हिरण्याक्ष को समुद्र के भीतर छल से मारा। और आप उसी का नाम लेते हैं?”
प्रह्लाद ने सीधे पिता की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था, कठोरता भी नहीं थी।
”पिताजी, मैं आपका बेटा हूँ, और मैं आपसे प्रेम करता हूँ। शायद इसीलिए मैं आपसे झूठ नहीं बोल सकता। जिस विष्णु को आप बाहर ढूँढ़कर मारना चाहते हैं, वही आपकी अपनी छाती के भीतर भी बसे हैं।”
हिरण्यकशिपु का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

उसने पुरोहितों को झिड़कते हुए कहा, ”अरे, कोई मेरा बेंत तो लाओ। यह बालक हमारी कीर्ति में कलंक लगा रहा है। इस दुर्बुद्धि कुलांगार को ठीक करने के लिए दण्ड ही उपयुक्त उपाय होगा। हमारे दैत्यवंश के चन्दन-वन में यह काँटेदार बबूल कहाँ से पैदा हुआ? जो विष्णु इस वन की जड़ काटने में कुल्हाड़े का काम करते हैं, यह नादान बालक उन्हीं की बेंट बन रहा है, सहायक हो रहा है। इसे ले जाओ, और ठीक से सिखाओ।”
पुरोहित प्रह्लाद को पाठशाला ले गए और तरह-तरह से डाँट-डपटकर धमकाते हुए धर्म, अर्थ और काम की शिक्षा देने लगे। कुछ समय बाद जब उन्हें लगा कि अब बालक साम, दान, भेद और दण्ड की सारी बातें जान गया है, तब वे उसे उसकी माँ के पास ले गए, और अच्छी तरह नहला-धुलाकर, गहने पहनाकर, फिर हिरण्यकशिपु के पास ले गए। प्रह्लाद पिता के चरणों में लोट गया। हिरण्यकशिपु ने उसे आशीर्वाद दिया और दोनों हाथों से उठाकर बहुत देर तक गले से लगाये रखा। उस समय दैत्यराज का हृदय आनन्द से भर रहा था।
”बेटा प्रह्लाद,” उसने प्रसन्न होकर पूछा, ”इतने दिनों में आपने गुरुजी से जो शिक्षा पाई है, उसमें से कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाइए।”

प्रह्लाद ने कहा, ”पिताजी, भगवान् विष्णु की भक्ति के नौ भेद हैं। भगवान् के गुण, लीला और नाम का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दना, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। यदि भगवान् के प्रति समर्पण के भाव से यह नौ प्रकार की भक्ति की जाए, तो मैं उसी को सब में उत्तम अध्ययन समझता हूँ।”
यह सुनते ही क्रोध के मारे हिरण्यकशिपु के ओठ फड़कने लगे। उसने गुरुपुत्र से कहा, ”रे नीच ब्राह्मण, यह आपकी कैसी करतूत है? दुर्बुद्धि, आपने मेरी कुछ भी परवाह न करके इस बच्चे को कैसी निस्सार शिक्षा दे दी? अवश्य ही आप हमारे शत्रुओं के आश्रित हैं।”
गुरुपुत्र ने हाथ जोड़कर कहा, ”इन्द्रशत्रो, आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह मेरे या और किसी के बहकाने से नहीं कह रहा है। राजन्, यह तो इसकी जन्मजात स्वाभाविक बुद्धि है। आप क्रोध शान्त कीजिए। व्यर्थ में हमें दोष न लगाइए।”
हिरण्यकशिपु ने फिर प्रह्लाद से पूछा, ”क्यों, यदि आपको ऐसी अहित करने वाली बुद्धि गुरुमुख से नहीं मिली, तो बताइए, कहाँ से प्राप्त हुई?”
प्रह्लाद ने कहा, ”पिताजी, गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि न अपने-आप, न किसी के सिखाने से, और न अपने ही जैसे लोगों के संग से भगवान् श्रीहरि में लगती है। जो लोग इन्द्रियों से दीखने वाले बाह्य विषयों को ही परम इष्ट समझकर, अन्धे के पीछे अन्धों की तरह गड्ढे में गिरते चले जा रहे हैं, उन्हें यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान् विष्णु ही हैं, उन्हीं की प्राप्ति से हमें सब पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। जिनकी बुद्धि भगवान् के चरणकमलों का स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्यु रूप अनर्थ का सर्वथा नाश हो जाता है। पर जो लोग अकिंचन भगवत्प्रेमी महात्माओं के चरणों की धूल में स्नान नहीं करते, उनकी बुद्धि भगवच्चरणों का स्पर्श कभी नहीं कर सकती।”
इतना कहकर प्रह्लाद चुप हो गया। हिरण्यकशिपु क्रोध के मारे अन्धा हो उठा। उसने उसे अपनी गोद से उठाकर भूमि पर पटक दिया।
”दैत्यो,” वह चिल्लाया, ”इसे यहाँ से बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालने योग्य है। जिसने इसके चाचा को मार डाला, अपने सुहृद्-स्वजनों को छोड़कर यह नीच दास के समान उसी विष्णु के चरणों की पूजा करता है। हो-न-हो, इसके रूप में मेरे भाई को मारने वाला विष्णु ही आ गया है। पाँच बरस की अवस्था में ही जिसने अपने माता-पिता के दुस्त्यज वात्सल्य-स्नेह को भुला दिया, वह कृतघ्न भला विष्णु का क्या हित करेगा।”

हिरण्यकशिपु की आज्ञा पर तीखी दाढ़ों, विकराल मुख और लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ वाले दैत्य हाथों में त्रिशूल लेकर ‘मारो, काटो’ कहते हुए बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठा रहा, और दैत्य उसके सभी मर्मस्थानों में त्रिशूल से घाव करते रहे। पर उस समय बालक का चित्त उस परमात्मा में लगा हुआ था, जो मन और वाणी की पकड़ से परे है, सर्वात्मा है, समस्त शक्तियों का आधार और परब्रह्म है। इसलिए उसके सारे प्रहार वैसे ही निष्फल हो गए, जैसे भाग्यहीनों के बड़े-बड़े उद्योग व्यर्थ हो जाते हैं।
जब त्रिशूल की मार से प्रह्लाद के शरीर पर कोई असर न हुआ, तब हिरण्यकशिपु को बड़ी शंका हुई, और वह उसे मारने के लिए बड़े हठ से भाँति-भाँति के उपाय करने लगा।

उसने उसे बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर साँपों से डँसवाया, पुरोहितों से शम्बरासुर की कृत्या-माया रचवायी, पहाड़ की चोटी से नीचे डलवा दिया, अनेक प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियों में बंद करा दिया, विष पिलाया और खाना-पानी बंद कर दिया। बर्फीली जगह, दहकती आग और समुद्र में बारी-बारी से डलवाया, आँधी में छोड़ दिया, और पर्वतों के नीचे दबवा दिया।
पर इनमें से किसी भी उपाय से वह अपने पुत्र निष्पाप प्रह्लाद का बाल भी बाँका न कर सका। हर बार बालक वहीं का वहीं, साँस लेता हुआ, हरि-नाम लेता हुआ बैठा रह जाता, क्योंकि उसका चित्त उस परमात्मा में टिका था जिसे छूने के लिए कोई शस्त्र नहीं पहुँचता।
अपनी विवशता देखकर हिरण्यकशिपु को बड़ी चिन्ता हुई। उसे प्रह्लाद को मारने का और कोई उपाय न सूझ पड़ा। वह सोचने लगा, ”इसे मैंने बहुत कुछ बुरा-भला कहा, मार डालने के बहुत-से उपाय किए, पर यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता के अपने ही प्रभाव से बचता रहा। यह बालक होने पर भी समझदार है, और मेरे पास निःशंक होकर रहता है। हो-न-हो, इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुनःशेप अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किए अपकारों को न भूलेगा। न तो यह किसी से डरता है, और न इसकी मृत्यु ही होती है। अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी। सम्भव है, न भी हो।”
इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु मुँह लटकाए बैठा है, तब उन्होंने एकांत में जाकर उससे कहा, ”स्वामी, आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय पा ली है। आपके भौंह टेढ़ी करने पर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखने में तो आपके लिए चिन्ता की कोई बात नहीं है। बच्चों के खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है? जब तक हमारे पिता शुक्राचार्यजी नहीं आ जाते, तब तक इसे वरुण के पाशों से बाँध रखिए, जिससे यह डरकर कहीं भाग न जाय। प्रायः अवस्था बढ़ने के साथ, और गुरुजनों की सेवा से, बुद्धि सुधर जाया करती है।”
हिरण्यकशिपु ने उनकी सलाह मान ली, और पुरोहित प्रह्लाद को फिर पाठशाला ले गए, और क्रमशः धर्म, अर्थ और काम की शिक्षा देने लगे। प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवक की भाँति रहता, पर वह शिक्षा उसके मन को अच्छी न लगती, क्योंकि वह केवल उन लोगों के लिए है जो राग-द्वेष और विषयभोग में रस लेते हों।
एक दिन गुरुजी गृहस्थी के किसी काम से कहीं बाहर चले गए। छुट्टी मिल जाने के कारण उसी उम्र के राक्षस-बालकों ने प्रह्लाद को खेलने के लिए पुकारा। प्रह्लाद उठा, पर खेलने नहीं। प्रह्लाद परम ज्ञानी था, उसने उन बालकों को बड़ी मधुर वाणी से पास बुलाया, जैसे कोई बड़ा भाई अपने छोटों को कोई भेद बताने वाला हो।
”भाइयो, सुनिए,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी कोमल थी कि बच्चे खेल भूलकर पास सरक आए। ”इस संसार में मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। इसके द्वारा अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। पर पता नहीं कब इसका अन्त हो जाय। इसलिए बुद्धिमान को बुढ़ापे या जवानी के भरोसे न रहकर इसी बचपन से भगवान् की प्राप्ति कराने वाले साधनों का अनुष्ठान कर लेना चाहिए। इस मनुष्य-जन्म में श्रीभगवान् के चरणों की शरण लेना ही जीवन की एकमात्र सफलता है, क्योंकि भगवान् समस्त प्राणियों के स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं।”
एक बच्चा बोला, अभी तो हम छोटे हैं, अभी से क्यों? प्रह्लाद उसकी ओर मुड़ा।
”देखिए, इन्द्रियों से जो सुख भोगा जाता है, वह तो प्रारब्ध के अनुसार सर्वत्र वैसे ही मिलता रहता है, जैसे बिना प्रयत्न किए भी दुःख मिल जाता है। इसलिए सांसारिक सुख के लिए परिश्रम करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसमें केवल आयु और शक्ति व्यर्थ गँवानी पड़ती है। यह शरीर भगवत्प्राप्ति के लिए पर्याप्त है, इसलिए जब तक यह रोग-शोक से ग्रस्त होकर मृत्यु के मुख में नहीं चला जाता, तभी तक बुद्धिमान को कल्याण के लिए यत्न कर लेना चाहिए।”
बच्चे ध्यान से सुन रहे थे, उनकी मुट्ठियाँ खुली रह गई थीं।
”एक ही चीज़ साथ चलती है। भगवान् का स्मरण। उनके गुणों का, लीला-नाम का श्रवण, फिर उन्हीं को गाना, फिर मन में सदा याद रखना। उनके चरणों की सेवा, पूजा, वन्दना, उनका दास बनकर रहना, उनसे सखा-सा प्रेम करना, और अंत में अपने को पूरा का पूरा उन्हीं के हाथों सौंप देना। इसमें न किसी ऊँची जाति की ज़रूरत है, न धन की, न शक्ति की। हम राक्षस के बेटे हैं तो क्या हुआ। भगवान् तो अपने और पराये का भेद ही नहीं करते। वे तो हम सबके भीतर, हर एक प्राणी के भीतर एक ही रूप में बसे हैं।”
”इसलिए मेरी बात मानिए। अभी से शुरू कीजिए। बूढ़े होने का इंतज़ार मत कीजिए।”

वे सब अभी बालक ही थे, इसलिए राग-द्वेष और विषयभोग से उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी। इसी से, और प्रह्लाद के प्रति आदर-बुद्धि होने से, उन सबने अपनी खेल-कूद की सामग्री एक ओर रख दी और प्रह्लाद के पास जाकर उसके चारों ओर बैठ गए, और उसके उपदेश में मन लगाकर बड़े प्रेम से एकटक उसी की ओर देखने लगे, और भीतर कहीं कुछ पिघल भी गया।
वो भी राक्षस-बच्चे थे, पर बच्चे थे। बच्चों का दिल अभी भी खुला होता है।
भगवान् के परम प्रेमी भक्त प्रह्लाद का हृदय उनके प्रति करुणा और मैत्री के भाव से भर गया, और वे एक-एक करके ‘हरि हरि’ बोलने लगे।
गुरु डर गए। ख़बर महल पहुँची।
हिरण्यकशिपु आगबबूला हुआ। अपने ही बेटे ने, उसके अपने वंश के बालक ने, उसी के राज्य के भीतर उसी शत्रु का नाम गुँजा दिया था। उसने प्रह्लाद को फिर बुलाया।
एक दिन वह दरबार में बैठा था। ऊँचे खम्भों की पाँत, और उनके बीच वही बालक खड़ा था, सामने।
”बताइए, आपका यह विष्णु कहाँ है?” हिरण्यकशिपु की आवाज़ में अब थकान की एक दरार थी।
प्रह्लाद ने धीरे से कहा, ”हर जगह है, पिताजी।”
”हर जगह?” वह उठ खड़ा हुआ। ”तो इस खम्भे में भी है?” उसने पास के एक खम्भे की ओर हाथ उठाया।
”हाँ, पिताजी। इसमें भी।”
बालक की आवाज़ में रत्ती-भर भी हिचक न थी, और यही हिरण्यकशिपु को सब में असह्य लगा। वह जो चाहता था कि बच्चा एक बार काँप जाए, और बच्चा था कि उसकी ओर ऐसे देख रहा था जैसे उसे उसी पिता के भीतर भी वही दिखाई दे रहा हो।
उसने अपनी गदा उठाई और पूरी शक्ति से खम्भे पर दे मारी।
और एक भयंकर गर्जना हुई, ऐसी जैसी आज तक किसी ने न सुनी थी, न देवता ने, न दैत्य ने। फिर खम्भा फट पड़ा।

उसके भीतर से जो प्रकट हुआ, वह न मनुष्य था न पशु। एक विशाल देह, ऊपर सिंह, नीचे पुरुष, तीखी दाढ़ों वाला विकराल मुख, आँखें पिघले सोने-सी दहकती हुई। राक्षस-सेना के हाथों से हथियार गिर पड़े, किसी की चीख गले में ही जम गई।
हिरण्यकशिपु एक पल को वहीं ठहर गया। यह खम्भे में था, इसी सभा में था, उतना ही पास जितना यह बालक कहता रहा। और अब यह सामने था।
और तब भी, उस आधे-सिंह की ओर देखते हुए, हिरण्यकशिपु के भीतर वही पुराना बैर ही उठा, घृणा की वही एकाग्र लौ जिससे वह जीवन-भर जलता आया था। वह डरा नहीं। उसने गदा फिर सँभाली।
नृसिंह।
वह घड़ी न दिन की थी न रात की। वह देह न मनुष्य का था न पशु का। और जो आगे होने वाला था, वह न किसी शस्त्र से होने वाला था, न अस्त्र से। पर वह कथा अगली है।
इतना जान लीजिए, राजन्, कि उस सारी सभा में एक ही प्राणी था जो उस गर्जना से नहीं काँपा। वही बालक, जो अपने पिता और उस भयानक रूप के ठीक बीच खड़ा था, दोनों हाथ जोड़े, दोनों से प्रेम करता हुआ, दोनों के लिए एक-सा निडर।
⁂
शुकदेव कुछ देर मौन रहे।
परीक्षित् ने धीरे से कहा, ”भगवन्, एक बात समझ नहीं आती। हिरण्यकशिपु जीवन-भर उसी एक नाम को कोसता रहा, और अंत में वही नाम उसके सामने प्रकट हुआ। तो क्या बैर भी उन तक पहुँचा देता है?”
”राजन्, जिसे आप क्षण-भर भी नहीं भूलते, चाहे प्रेम से, चाहे घृणा से, वह आपके भीतर बस जाता है। हिरण्यकशिपु ने श्रीहरि को इतनी एकाग्रता से याद किया कि और कुछ याद रखने की उसमें जगह ही न बची। यह स्मरण मैला था, बैर से सना था, फिर भी स्मरण तो था। पर देखिए, उसी सभा में एक और था जो उन्हीं को याद कर रहा था, पर प्रेम से। एक ही नाम, दो छोरों से पुकारा गया, और दोनों ही उस तक पहुँचे।”
परीक्षित् ने इन शब्दों को अपने भीतर उतरने दिया।
”और प्रह्लाद?” उसने पूछा। ”वह तो अपने ही पिता के सामने यह सब देख रहा था।”
शुकदेव की दृष्टि स्थिर रही। ”वही तो उस सभा का परम कठिन हृदय था, राजन्। निडर रहना सहज है जब सामने केवल शत्रु हो। पर वहाँ एक ओर वह भयानक रूप था जिसकी वह जीवन-भर शरण रहा, और दूसरी ओर वह पिता था जिसने उसे आग में डलवाया था, और प्रह्लाद दोनों के बीच खड़ा, दोनों से प्रेम करता हुआ, किसी से नहीं काँपा। जो अपने को इतना दे देता है, उसके भीतर न शत्रु के लिए घृणा बचती है, न मृत्यु के लिए भय। ऐसे हृदय के लिए, राजन्, तक्षक भी केवल एक द्वार है।”
एक पिता था जिसने मृत्यु के हर द्वार पर ताला जड़ दिया था, न दिन, न रात, न भीतर, न बाहर, न शस्त्र, न अस्त्र। और एक उसका बेटा था, जिसके पास एक भी ताला न था, केवल खुली हथेलियाँ।
उस सभा में दोनों एक ही नाम पुकार रहे थे। एक उसे अपनी छाती के बाहर ढूँढ़ता रहा, खम्भों में, साँपों के विष में, हाथियों के पैरों में, और जब वह नाम सचमुच फट पड़ा, तो वह उसके अपने ही दरबार के एक खम्भे से निकला, उतना ही पास जितना बालक कहता रहा था।
प्रह्लाद उस घड़ी अपने साथियों से कह रहा होता तो शायद यही कहता, जो उसने पाठशाला में कहा था, कि बूढ़े होने का इंतज़ार मत कीजिए। पर इस बार वह कुछ नहीं कह रहा था। वह बस दोनों के बीच खड़ा था, हाथ जोड़े।
साहित्यिक-संदर्भ
प्रह्लाद-चरित्र श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 4 से 10 में फैला है। पाठशाला का प्रसंग और गोद का संवाद अध्याय 5 में, राक्षस-बालकों को दिया गया ”कौमार आचरेत्” का उपदेश अध्याय 6 में, और नृसिंह-अवतार आगे अध्याय 8 में हैं। प्रह्लाद की गिनाई हुई नवधा भक्ति (7.5.23-24) पूरे भागवत की रीढ़ मानी जाती है।
एक पंक्ति, ठहरने के लिए
पाँच बरस का एक बच्चा, आग के बीच मुस्कुराता हुआ, यही कहता रहा कि जिसे आप शत्रु मानते हैं, वही हर एक के भीतर बसा है। जिसने अपने को पूरा सौंप दिया, उसके भीतर काँपने की जगह ही नहीं बचती।
यही कथा वहाँ भी
- नृसिंह अवतार
श्रीमद्भागवत (स्कन्ध 7): प्रह्लाद की रक्षा हेतु नृसिंह अवतार - प्रह्लाद का अंतर्ध्यान
योग वासिष्ठ: प्रह्लाद का विष्णु-चिन्तन और आत्म-बोध