प्रह्लाद का विद्रोह
हिरण्यकशिपु पूरे ब्रह्मांड का सम्राट था।
ब्रह्मा से उसने ऐसे वर माँगे थे कि उसे कोई मार न सके, न दिन, न रात, न अंदर, न बाहर, न मनुष्य, न जानवर, न शस्त्र, न अस्त्र। ब्रह्मा हँसे थे यह सोचकर कि कितनी bargaining है, पर वर दे दिए।
अब हिरण्यकशिपु अमर-समान था। उसने तीनों लोक जीते। इन्द्र को स्वर्ग से निकाला। देवता उसके सामने काँपते थे। ऋषि उसके यज्ञ का प्रसाद उसे देते थे।
और उसका एक बेटा था, प्रह्लाद।
एक राक्षस-राजा का बेटा, मगर वो अलग था। बचपन से अलग।
जब वो माँ के गर्भ में था, उसकी माँ कयाधु को नारद ने भक्ति सिखाई थी। (वो कहानी अलग है, हम बाद में बताएँगे।) तो प्रह्लाद ने गर्भ में ही विष्णु-कथा सुन ली थी।
जन्म लेकर वो भगवान का नाम लेने लगा। कोई सिखाने वाला नहीं। बस अंदर से।
हिरण्यकशिपु को यह बात अजीब लगी। पर पहले-पहले उसने सोचा, बच्चा है, बड़ा होगा तो ठीक हो जाएगा।
जब प्रह्लाद पाँच साल का हुआ, उसे गुरुकुल भेजा गया। राक्षस-गुरु, शुक्राचार्य के दो पुत्र, षण्ड और अमर्क। वो राक्षसों के बच्चों को राज-नीति सिखाते, अर्थ-नीति सिखाते, युद्ध सिखाते।
एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने बेटे को बुलाया। प्यार से गोद में बिठाया।
”बेटा, बताओ, गुरुकुल में क्या सीखा?”
प्रह्लाद की आँखें चमक उठीं।
”पिताजी, मैंने जो सबसे अच्छा सीखा वो यह है। एक भगवान है, जो हर जगह है, हर एक के अंदर है, सब का स्रोत है। उसका नाम विष्णु है। उसी का स्मरण करना सबसे ऊँचा काम है।”
हिरण्यकशिपु ने एक पल को बच्चे को देखा। फिर हँसा। ज़ोर से।
”गुरु को बुलाओ।”
षण्ड और अमर्क डरते हुए आए।
”यह तुम सिखा रहे हो मेरे बेटे को?”
गुरुओं ने सिर झुकाया। ”नहीं, महाराज। हमने सिर्फ़ राज-नीति सिखाई। यह तो वो ख़ुद से कह रहा है। हमने इसे कितनी बार रोका, मगर यह सुनता ही नहीं।”
हिरण्यकशिपु ने बच्चे की तरफ़ देखा।
”बेटा, यह क्या बकवास है? तू मेरा बेटा है। मैंने तीनों लोक जीते। विष्णु मेरा शत्रु है। उसने मेरे भाई हिरण्याक्ष को मारा। और तू उसी का नाम लेता है?”
प्रह्लाद ने सीधे पिता की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था।
”पिताजी, मैं आपका बेटा हूँ, यह सही है। पर एक सच्चा बेटा वो है जो सच कहे। और सच यह है कि आप जिसे शत्रु मानते हैं, वो दुश्मन नहीं। वो हर एक का असली रूप है। आपके अंदर भी वही है।”
हिरण्यकशिपु का चेहरा लाल हो गया।
”गुरुओं, इसे वापस ले जाओ। और इसको ठीक से सिखाओ। समझाओ कि शक्ति ही सब कुछ है। भगवान कोई नहीं। और जो भगवान है, वो मैं हूँ।”
बच्चा फिर गुरुकुल गया।
गुरुओं ने इस बार extra effort लगाया। उन्होंने प्रह्लाद को बिठाया, बार-बार समझाया। शक्ति-नीति, अर्थ-नीति, राज-नीति। हर रोज़ test लिया।
एक दिन प्रह्लाद थक गया। पर दूसरे तरीक़े से।
वो class में बैठा था। गुरु पाठ पढ़ा रहे थे। प्रह्लाद उठा।
”गुरुजी, मेरी एक request है। आप जो कुछ देर रुकेंगे, तो मैं अपने सहपाठियों को कुछ बता दूँ?”
गुरु हैरान। बच्चा बहुत polite तरीक़े से बोल रहा था। उन्होंने सोचा, ”देखें यह क्या कहता है।”
प्रह्लाद अपने दोस्तों की तरफ़ मुड़ा। बीस-तीस राक्षस-बच्चे। उसी की उम्र के।
”भाइयों, सुनो। हम लोग राक्षस हैं, यह सही है। हमारे पिता शक्तिशाली हैं, यह सही है। पर एक बात ध्यान दो। हमारी आयु बहुत लंबी नहीं है। और हम जब बड़े होंगे, राजा बनेंगे, युद्ध करेंगे, और एक दिन मर जाएँगे। फिर?”
बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।
”इस छोटे से जीवन में, सबसे अच्छा क्या करना? सब लोग कहते हैं, धन कमाओ, शक्ति बढ़ाओ, स्त्री पाओ, राज्य जीतो। पर ये सब मरते वक़्त छूट जाएगा। तब क्या साथ चलेगा?”
”एक चीज़। भगवान का स्मरण। उसका नाम। उसकी कथा। उसका प्रेम। यही एक चीज़ है जो मरते वक़्त साथ रहेगी।”
”इसलिए मेरी बात मानो। अभी से शुरू करो। पाँच साल की उम्र से, यह भक्ति शुरू कर लो। बूढ़े होने का इंतज़ार मत करो।”
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥
(श्रीमद्भागवत 7.6.1)
बचपन से ही, बुद्धिमान को भगवान-धर्म (भागवत-धर्म) का अभ्यास करना चाहिए। मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, अनिश्चित है, और बहुत कुछ देने वाला है।
बच्चे चकित। और कुछ-कुछ moved भी।
वो भी राक्षस-बच्चे थे। पर बच्चे थे। बच्चों का दिल अभी भी खुला होता है।
एक-एक करके वो भी ”हरि हरि” बोलने लगे। class में आधे बच्चे प्रह्लाद के साथ हो गए।
गुरु डर गए। ख़बर महल पहुँची।
हिरण्यकशिपु आगबबूला।
”इसने मेरे राज्य के अंदर ही विद्रोह कर दिया!”
उसने प्रह्लाद को बुलाया। अब बात गोद वाली नहीं थी।
”इसको पहाड़ से धक्का दो। साँपों से कटवाओ। हाथी से रौंदवाओ। आग में डालो। कुएँ में फेंको।”
और यह सब हुआ।
पहाड़ से धक्का। प्रह्लाद नीचे गिरा। बीच में विष्णु ने पकड़ लिया। बच नहीं, उसे एक खरोंच भी नहीं आई।
साँप। साँप उसे डँसने आए, पर देखा यह बच्चा हरि-नाम कर रहा है। साँप शान्त होकर पास में बैठ गए।
हाथी। हिरण्यकशिपु का सबसे बड़ा हाथी, कुवलयापीड़। उसने बच्चे को सूँड में लिया, ज़मीन पर पटका। मगर हाथी की सूँड टूट गई, बच्चा खड़ा रहा।
आग। प्रह्लाद की बुआ होलिका को ब्रह्मा का वर था कि आग उसे नहीं जलाएगी। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। आग ने होलिका को जलाया, बच्चा सुरक्षित निकला।
कुआँ। उसे एक गहरे कुएँ में फेंका गया। पानी ख़ुद उठकर उसे ऊपर ले आया।
हर बार यही। हर शस्त्र, हर अस्त्र, हर तरीक़ा fail। और प्रह्लाद हर बार वही, हरि-हरि बोलता हुआ, मुस्कुराता हुआ।
हिरण्यकशिपु की हालत बेहाल। वो जो तीनों लोक जीत चुका था, अपने ही पाँच साल के बेटे को नहीं मार पा रहा था।
एक दिन वो दरबार में बैठा था। प्रह्लाद सामने।
”बता, तेरा यह विष्णु कहाँ है?”
प्रह्लाद ने मुस्कुराकर कहा, ”हर जगह है, पिताजी।”
”हर जगह? तो इस खम्भे में भी है?”
”हाँ, पिताजी।”
हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा उठाई। पूरी ताक़त से खम्भे पर दे मारी।
और तब, उस टूटे हुए खम्भे से, एक रूप निकला। आधा सिंह, आधा मनुष्य। आँखें लाल, गर्जन भयानक।
वो रूप वो थी जो ”न दिन न रात” पूरा करती थी, क्योंकि उसका समय गोधूलि था। ”न मनुष्य न जानवर,” क्योंकि वो आधा-आधा था। ”न अंदर न बाहर,” क्योंकि वो दहलीज़ पर था। ”न शस्त्र न अस्त्र,” क्योंकि उसने नाख़ून से मारा।
नृसिंह।
पर वो कथा अगली है।
प्रह्लाद की कथा हमेशा एक ”चमत्कार” की कथा की तरह कही जाती है। यह बच्चा कैसे बच गया, यह बच्चा कैसे विद्रोह कर पाया। पर असली बात कहीं और है।
इस कथा का असली message भागवतम् के स्कन्ध 7 के एक श्लोक में है, जो प्रह्लाद ख़ुद अपने सहपाठियों से कहता है, ”बचपन से ही, बुद्धिमान को भगवान-धर्म का अभ्यास करना चाहिए।” क्यों बचपन से? क्योंकि मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, और अनिश्चित। कब ख़त्म होगा, पता नहीं।
ज़्यादातर लोग सोचते हैं, ”अभी छोटा हूँ, मस्ती कर लूँ। जब बूढ़ा हो जाऊँगा, तब भगवान का नाम लूँगा।” प्रह्लाद कह रहा है, ”बूढ़े होने का wait क्यों? वो वक़्त आएगा, यह सुनिश्चित कौन है?”
और एक बारीक बात। प्रह्लाद विद्रोह नहीं कर रहा था अपने पिता के ख़िलाफ़। उसने पिता को कुछ नहीं कहा burmh के अलावा। वो सिर्फ़ अपने सहपाठियों से बात कर रहा था। एक बच्चा, दूसरे बच्चों से।
और यही दुनिया को बदलता है। हम सोचते हैं बड़ा परिवर्तन शक्ति से होता है। पर अक्सर वो एक बच्चे की एक quiet बात से शुरू होता है, अपने ही साथियों के बीच।