कुरु-सभा में विश्वरूप

कथा 56 · भागवतम् की कथाएँ

कुरु-सभा में विश्वरूप

When Krishna Showed His Universal Form to Duryodhana
स्कन्ध 10, अध्याय 89 (और महाभारत 5.130)

महाभारत के युद्ध से पहले एक last try।

पाण्डव चाहते थे शान्ति। उन्होंने बस पाँच गाँव माँगे थे। दुर्योधन ने मना कर दिया, ”एक सूई की नोक भर ज़मीन भी नहीं।”

कृष्ण ने एक last मिशन पर जाने का फ़ैसला किया।

”मैं हस्तिनापुर जाऊँगा। दुर्योधन से एक बार बात करूँगा। शायद वो माने।”

पाण्डव डर गए।

”कृष्ण, यह risk है। दुर्योधन तुम्हें भी बँदी बनाने की कोशिश करेगा।”

”शायद। पर एक बार try करूँगा।”

कृष्ण अकेले निकले। एक रथ में।

हस्तिनापुर पहुँचे। दरबार में बुलाए गए।

वहाँ धृतराष्ट्र। भीष्म। द्रोण। कर्ण। दुर्योधन। शकुनि। सब।

कृष्ण ने अपनी बात कही।

”दुर्योधन, बस पाँच गाँव। पाण्डव युद्ध नहीं चाहते। उनका हिस्सा दो।”

दुर्योधन ने मुस्कुराकर मना कर दिया।

”पाँच गाँव क्या, मैं उन्हें एक सूई की नोक भर भी नहीं देता।”

कृष्ण ने सब को देखा।

”ठीक है। तो युद्ध तय।”

उन्होंने सभा से उठने का इरादा बनाया।

तभी दुर्योधन ने इशारा किया अपने सैनिकों को।

”इसे पकड़ो। यह दूत है, मगर हमारे दुश्मनों का सहायक। इसे क़ैद करो।”

सैनिक आगे आए। कृष्ण को घेरने लगे।

कृष्ण ने मुस्कुराया।

”दुर्योधन, यह क्या कर रहा है? दूत को क़ैद? यह तो धर्म-विरुद्ध।”

”मुझे धर्म की कोई परवाह नहीं।”

”तो ठीक है।”

और तब कृष्ण ने एक काम किया।

ततो दृष्ट्वैव भगवान् स्वाकाशं रूपमास्थितः ।
विभूतिमुग्रदशवक्त्रस्वरूपं चकार ह ॥

तब भगवान ने अपना आकाश-समान रूप धारण किया। दस मुख, अनेक हाथ, अनेक नेत्र। एक भयानक विभूति।

उन्होंने अपना विश्व-रूप दिखाया।

वही रूप जो उन्होंने अर्जुन को गीता में दिखाया था। पर इस बार पूरी कुरु-सभा को।

कृष्ण का शरीर बढ़ने लगा।

उनके दो आँखें हज़ार। उनके दो हाथ हज़ार। उनके मुँह में सब ब्रह्मांड दिखता।

हर दिशा में फैले हुए।

उनकी छाती में सब लोक। उनके पाँव में पाताल।

उनके मुख से ज्वालाएँ।

और सबसे important, उनके मुख में सब कुरु-योद्धा। दुर्योधन, कर्ण, द्रोण, भीष्म, सब के सब चबाए जा रहे थे।

यह एक तरह की prophecy थी। ”युद्ध में तुम सब मेरे मुख में जाओगे।”

सभा में सब घबराए।

धृतराष्ट्र अंधे थे, मगर उस moment में उन्हें दृष्टि मिली। वो रूप देखा। ज़मीन पर बैठ गए।

”हे कृष्ण! मुझे क्षमा।”

भीष्म, द्रोण, सब ने सिर झुकाए।

बस दुर्योधन, कर्ण, और शकुनि, खड़े रहे। दुर्योधन की आँखें ज़मीन पर।

”मैं नहीं पहचानता। तू एक चाल कर रहा है।”

कृष्ण ने एक हलकी मुस्कान दी।

”ठीक है, दुर्योधन। तू नहीं माना। तो युद्ध तय।”

उन्होंने अपना विश्व-रूप वापस लिया। साधारण कृष्ण-रूप।

सभा से बाहर निकल गए।

महाभारत का युद्ध अब तय था।

और कुछ हफ़्ते बाद, कुरुक्षेत्र में, वो विश्व-रूप एक बार और दिखा, अर्जुन को। मगर उस वक़्त बहुत देर हो चुकी थी।

मन्थन

विश्व-रूप का यह scene भागवतम् में बहुत intense है।

एक राजा। अहंकार में। एक भगवान को क़ैद करने की कोशिश।

और भगवान का जवाब, एक रूप जिसके सामने पूरी कुरु-सभा हिल गई।

मगर एक interesting बात। दुर्योधन रुका नहीं। उसने नहीं माना।

क्यों?

क्योंकि अहंकार एक ऐसी चीज़ है जो सीधे evidence से भी नहीं टूटती। वो आपको blind कर देती है।

धृतराष्ट्र, जो physically अंधे थे, उन्हें दृष्टि मिली। भगवान दिखा।

दुर्योधन, जो दिखाई से देखता था, मगर अंदर से blind था, उसको कुछ नहीं दिखा।

यह एक deeper blindness है।

और भागवतम् कह रहा है, हम सब अपने अंदर कुछ-न-कुछ Duryodhana रखते हैं। एक specific area जहाँ हमारा अहंकार हमें blind कर रखा है।

वहाँ भगवान कितना भी evidence दे, हम मानेंगे नहीं।

जब तक हम अपनी इस blind spot को identify नहीं करते, हम अपने जीवन में बहुत सी opportunities miss करते रहेंगे।