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भृगु की परीक्षा और ब्राह्मण-पुत्रों की वापसी

कथा 56 · भागवतम् की कथाएँ

भृगु की परीक्षा और ब्राह्मण-पुत्रों की वापसी

जब एक लात ने परम शान्ति को पहचाना, और एक रथ अन्धकार के पार गया
स्कन्ध 10, अध्याय 89

परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा और पूछा, ”भगवन्, ऋषि-मुनि बहुधा यह विवाद करते सुने जाते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीनों में परम कौन है। क्या कभी किसी ने इसका निर्णय किया? मेरे पास थोड़े ही दिन बचे हैं, मुनिवर। मैं जानना चाहता हूँ कि जिसमें सर्वाधिक शान्ति है, वही परम कैसे ठहरता है।”

शुकदेव की आँखों में एक शान्त चमक आई। ”राजन्, यही प्रश्न एक बार सरस्वती के पावन तट पर भी उठा था। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि एक यज्ञ में एकत्र हुए थे, और उनके बीच यही वाद-विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मा, शिव और विष्णु में परम कौन है। बहुत सोचकर उन्होंने निश्चय किया कि इस बात की परीक्षा महर्षि भृगु करें, जो ब्रह्मा के ही पुत्र हैं। और भृगु चल पड़े।”

Rich painterly classical Indian color illustration: the sage Bhrigu, a calm bearded rishi, stands silent in the radiant assembly hall of his father Brahma, the four-headed creator god seated on a lotus throne glowing with inner heat as he restrains rising anger; Bhrigu pointedly offers neither bow nor praise; warm golden palace light.

भृगु सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्मा की सभा में गए।

उन्होंने जान-बूझकर न ब्रह्मा को प्रणाम किया, न उनकी स्तुति की, मानो वहाँ कोई बैठा ही न हो। ब्रह्मा अपने तेज से दहक उठे, क्रोध भीतर उमड़ने लगा। पर जब उन्होंने देखा कि यह तो मेरा ही पुत्र है, तो उस उठते हुए क्रोध को विवेक-बुद्धि से भीतर-ही-भीतर दबा लिया, जैसे कोई अरणि-मन्थन से उपजी आग को जल छिड़ककर बुझा दे।

वहाँ से भृगु कैलास गए। देवाधिदेव शंकर ने जब देखा कि मेरे भाई भृगु आए हैं, तो बड़े आनन्द से खड़े होकर उन्हें गले लगाने को बाँहें फैला दीं।

पर भृगु ने आलिंगन स्वीकार नहीं किया। बोले, ”आप लोक और वेद की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, इसलिए मैं आपसे नहीं मिलता।”

Rich painterly classical Indian color illustration on snowy Mount Kailasa: blue-skinned Shiva, eyes blazing with fury, raises his trident to strike the sage Bhrigu, but goddess Sati (Parvati) falls at Shiva's feet pleading to calm his wrath; Bhrigu stands unflinching; icy white peaks and crescent moon in Shiva's hair.

यह सुनकर शंकर क्रोध से तिलमिला उठे। आँखें चढ़ गईं, और उन्होंने त्रिशूल उठाकर भृगु पर चला देना चाहा। पर उसी क्षण भगवती सती उनके चरणों पर गिर पड़ीं और बहुत अनुनय-विनय करके किसी प्रकार उनका क्रोध शान्त किया।

दो परीक्षाएँ हो चुकी थीं। अब भृगु वहाँ गए, जहाँ भगवान् विष्णु का निवास है, वैकुण्ठ।

Rich painterly classical Indian color illustration in Vaikuntha: four-armed dark-blue Vishnu reclining with his head in Lakshmi's lap on a jeweled couch, as the sage Bhrigu steps forward and plants a hard kick squarely on Vishnu's chest; Lakshmi startled, opulent golden celestial hall, lotuses and divine attendants.

उस समय भगवान् विष्णु लक्ष्मी की गोद में अपना सिर रखकर लेटे हुए थे। भृगु ने पास जाकर, बिना कुछ कहे, उनके वक्ष पर एक लात कसकर जमा दी।

सभा सहम गई होगी, पर भगवान् नहीं सहमे।

भक्तवत्सल विष्णु लक्ष्मी के साथ उठ बैठे और झटपट अपनी शय्या से नीचे उतरकर मुनि को सिर झुकाया, प्रणाम किया।

”ब्रह्मन्! आपका स्वागत है। आप भले पधारे। इस आसन पर बैठकर कुछ क्षण विश्राम कीजिए। प्रभो! मुझे आपके शुभागमन का पता न था, इसी से मैं आपकी अगवानी न कर सका। मेरा अपराध क्षमा कीजिए।”

Rich painterly classical Indian color illustration: four-armed Vishnu risen from his couch, bowing humbly and tenderly massaging the soft feet of the sage Bhrigu with his own hands, apologizing; Lakshmi beside him, Bhrigu moved to tears of devotion; serene golden Vaikuntha light, mark of the kick on Vishnu's chest.

और फिर वे झुककर भृगु के चरण अपने हाथों से सहलाने लगे, बोले, ”महामुने! आपके चरणकमल अत्यन्त कोमल हैं। मेरा यह वक्ष कहीं इन्हें चोट तो नहीं दे गया?”

विष्णु ने आगे कहा, ”आपके चरणों का जल तीर्थों को भी तीर्थ बनाने वाला है। आप उससे वैकुण्ठलोक को, मुझे और मेरे भीतर बसने वाले लोकपालों को पवित्र कीजिए। भगवन्! आपके चरणकमल के स्पर्श से आज मेरे सारे पाप धुल गए। आज मैं लक्ष्मी का परम आश्रय हो गया। अब आपके चरण से अंकित यह मेरा वक्ष लक्ष्मी का सदा-सर्वदा का निवास हो गया।”

भृगु यह गम्भीर वाणी सुनकर परम सुखी और तृप्त हो गए। भक्ति के उद्रेक से उनका गला भर आया, आँखों में आँसू छलक आए, और वे चुप हो रहे।

वहाँ से लौटकर भृगु ब्रह्मवादी मुनियों के सत्संग में आए, और उन्हें ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु के यहाँ जो कुछ अनुभव हुआ था, वह सब कह सुनाया।

भृगु का अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनियों का सन्देह दूर हो गया। तब से वे भगवान् विष्णु को ही परम मानने लगे, क्योंकि वे ही शान्ति और अभय के उद्गम-स्थान हैं।

शुकदेव ने ठहरकर कहा, ”देखिए राजन्, यह श्रेष्ठता बल की नहीं, शान्ति की ठहरी। जिसका अपमान हुआ और जो फिर भी न तपा, वही सब में परम निकला। विष्णु से ही साक्षात् धर्म, ज्ञान, वैराग्य, आठ प्रकार के ऐश्वर्य और चित्त को शुद्ध करने वाला यश प्राप्त होता है। शान्त, समचित्त, अकिंचन और सब को अभय देने वाले साधु-मुनियों की वे ही एकमात्र परम गति हैं।”

”उनकी प्रिय मूर्ति है सत्त्व, और इष्टदेव हैं ब्राह्मण। निष्काम, शान्त और विवेकसम्पन्न पुरुष उनका भजन करते हैं। उनकी गुणमयी माया ने राक्षस, असुर और देवता, ये तीन मूर्तियाँ बनाई हैं, और इनमें सत्त्वमयी देवमूर्ति ही उनकी प्राप्ति का साधन है। राजन्, सरस्वती-तट के उन ऋषियों ने अपने लिए नहीं, मनुष्यों का संशय मिटाने के लिए ही यह युक्ति रची थी।”

परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया। ”और दूसरी कथा, भगवन्? वही शान्त विष्णु जब किसी की रक्षा को उठते हैं, तो कहाँ-कहाँ तक जाते हैं?”

शुकदेव मुस्कुराए। ”सुनिए, राजन्। एक दिन की बात है।”

द्वारकापुरी में किसी ब्राह्मणी के गर्भ से एक पुत्र पैदा हुआ। पर वह उसी क्षण, पृथ्वी का स्पर्श होते ही, मर गया।

ब्राह्मण अपने बालक का मृत शरीर लेकर राजमहल के द्वार पर गया, और वहाँ उसे रखकर अत्यन्त आतुर और दुःखी मन से विलाप करता हुआ कहने लगा, ”इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणद्रोही, धूर्त, कृपण और विषयी राजा के कर्मदोष से ही मेरे बालक की मृत्यु हुई है। जो राजा हिंसा में लगा रहता है, दुःशील और अजितेन्द्रिय है, उसकी प्रजा दरिद्र होकर दुःख-पर-दुःख भोगती रहती है।”

इसी प्रकार उसके दूसरे और तीसरे बालक भी पैदा होते ही मर गए। हर बार वह ब्राह्मण लड़के की लाश राजमहल के दरवाजे पर डाल जाता और वही बात कह जाता।

नौ बालक इसी तरह गए।

नवें बालक के मरने पर जब वह वहाँ आया, तब भगवान् श्रीकृष्ण के पास अर्जुन भी बैठे हुए थे। उन्होंने ब्राह्मण की बात सुनकर उससे कहा, ”ब्रह्मन्! आपके निवास-स्थान द्वारका में कोई धनुषधारी क्षत्रिय नहीं है क्या? यहाँ के क्षत्रिय तो जैसे किसी यज्ञ में बैठे हुए हैं! जिनके राज्य में ब्राह्मण धन, स्त्री अथवा पुत्रों से वियुक्त होकर दुःखी होते हैं, वे क्षत्रिय नहीं, क्षत्रिय के वेष में पेट पालने वाले नट हैं।”

Rich painterly classical Indian color illustration in Dwarka's royal court: warrior Arjuna with his Gandiva bow vows aloud to protect the grieving brahmin's children, raising his hand in oath; dark-blue Krishna seated nearby; the sorrowful old brahmin clutching grief, skeptical; richly decorated pillared hall.

फिर अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली, ”भगवन्! मैं आपकी सन्तान की रक्षा करूँगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका, तो आग में कूदकर जल मरूँगा, और इस प्रकार मेरे पाप का प्रायश्चित्त हो जाएगा।”

ब्राह्मण मुस्कुराया, पर उसमें भरोसा नहीं था। ”अर्जुन! यहाँ बलराम, स्वयं श्रीकृष्ण, धनुर्धरों के शिरोमणि प्रद्युम्न और अद्वितीय योद्धा अनिरुद्ध भी जब मेरे बालकों की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं, तो आप इसे कैसे कर सकेंगे? सचमुच यह आपकी मूर्खता है। हम आपकी इस बात पर बिलकुल विश्वास नहीं करते।”

”ब्रह्मन्!” अर्जुन ने कहा, ”मैं न बलराम हूँ, न श्रीकृष्ण, न प्रद्युम्न। मैं हूँ अर्जुन, जिसका गाण्डीव नामक धनुष विश्वविख्यात है। आप मेरे बल-पौरुष का तिरस्कार मत कीजिए। मैं युद्ध में साक्षात् मृत्यु को भी जीतकर आपकी सन्तान ले आऊँगा।”

अर्जुन के इस विश्वास से ब्राह्मण कुछ आश्वस्त होकर अपने घर लौट गया।

प्रसव का समय निकट आने पर ब्राह्मण आतुर होकर अर्जुन के पास आया, ”इस बार आप मेरे बच्चे को मृत्यु से बचा लीजिए।”

अर्जुन ने शुद्ध जल से आचमन किया, भगवान् शंकर को नमस्कार किया, फिर दिव्य अस्त्रों का स्मरण कर गाण्डीव की डोरी चढ़ाकर उसे हाथ में ले लिया। उन्होंने बाणों को नाना प्रकार के अस्त्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर प्रसवगृह को चारों ओर से घेर दिया, ऊपर-नीचे, अगल-बगल, बाणों का एक पिंजड़ा-सा बना दिया।

इसके बाद ब्राह्मणी के गर्भ से एक शिशु पैदा हुआ, जो बार-बार रो रहा था। पर देखते-ही-देखते वह सशरीर आकाश में अन्तर्धान हो गया।

अब वह ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण के सामने ही अर्जुन की निन्दा करने लगा, ”मेरी मूर्खता तो देखो, मैंने इस नपुंसक की डींगभरी बातों पर विश्वास कर लिया। भला जिसे प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, यहाँ तक कि बलराम और श्रीकृष्ण भी न बचा सके, उसकी रक्षा करने में और कौन समर्थ है? धिक्कार है मिथ्यावादी अर्जुन को!”

जब वह ब्राह्मण इस प्रकार उन्हें भला-बुरा कहने लगा, तब अर्जुन योगबल से तत्काल संयमनीपुरी में गए, जहाँ भगवान् यमराज निवास करते हैं। वहाँ उन्हें ब्राह्मण का बालक नहीं मिला। फिर वे शस्त्र लेकर क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदि की पुरियों में, अतल आदि नीचे के लोकों में, स्वर्ग से ऊपर के महलोक आदि में और अन्यान्य स्थानों में गए।

पर कहीं भी उन्हें ब्राह्मण का बालक न मिला। उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी। अब उन्होंने अग्नि में प्रवेश करने का विचार किया।

तभी भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए कहा, ”भाई अर्जुन! आप अपने आप अपना तिरस्कार मत कीजिए। मैं आपको ब्राह्मण के सब बालक अभी दिखाए देता हूँ। आज जो लोग आपकी निन्दा कर रहे हैं, वे ही फिर हम लोगों की निर्मल कीर्ति की स्थापना करेंगे।”

Rich painterly classical Indian color illustration: Krishna and Arjuna ride a celestial chariot drawn by four horses westward, crossing seven island-continents, seven oceans and the great Lokaloka mountain into total darkness; ahead the blazing thousand-sun Sudarshana discus cuts a path of light through the black void.

सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार समझा-बुझाकर अर्जुन के साथ अपने दिव्य रथ पर सवार हुए और पश्चिम दिशा को प्रस्थान किया। उन्होंने सात-सात पर्वतों वाले सात द्वीप, सात समुद्र और लोकालोक-पर्वत को लाँघकर घोर अन्धकार में प्रवेश किया।

वह अन्धकार इतना घोर था कि उसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक चारों घोड़े अपना मार्ग भूलकर इधर-उधर भटकने लगे। योगेश्वरों के भी परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने घोड़ों की यह दशा देखकर अपने सहस्र-सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी चक्र को आगे चलने की आज्ञा दी।

सुदर्शन चक्र अपने ज्योतिर्मय तेज से उस घने अन्धकार को चीरता हुआ मन के समान तीव्र गति से आगे-आगे चला, मानो भगवान् राम का बाण धनुष से छूटकर राक्षसों की सेना में प्रवेश कर रहा हो।

उस मार्ग से चलकर रथ अन्धकार की अन्तिम सीमा पर पहुँचा। उसके पार सर्वश्रेष्ठ पारावाररहित व्यापक परम ज्योति जगमगा रही थी। उसे देखकर अर्जुन की आँखें चौंधिया गईं और उन्होंने विवश होकर अपने नेत्र बन्द कर लिए।

इसके बाद रथ उस दिव्य जलराशि में प्रवेश कर गया, जहाँ बड़ी तेज आँधी से बड़ी-बड़ी तरंगें उठ रही थीं। वहाँ एक बड़ा सुन्दर महल था, जिसमें मणियों के सहस्रों खंभे चमक रहे थे।

उसी महल में भगवान् शेषजी विराजमान थे। उनका शरीर अत्यन्त भयानक और अद्भुत था, सहस्र सिर थे, प्रत्येक फण पर सुन्दर मणियाँ जगमगा रही थीं, हर सिर में दो-दो नेत्र थे, सम्पूर्ण शरीर कैलास के समान श्वेत, और गला तथा जीभ नीले रंग की।

उनकी सुखमयी शय्या पर सर्वव्यापक महान् परम पुरुषोत्तम भगवान् विराजमान थे। उनकी कान्ति वर्षाकालीन मेघ के समान श्यामल थी, वे अत्यन्त सुन्दर पीला वस्त्र धारण किए हुए थे, मुख पर प्रसन्नता खेल रही थी, बहुमूल्य मणियों से जड़ा मुकुट और कुण्डल चमक रहे थे, आठ लंबी सुन्दर भुजाएँ थीं, गले में कौस्तुभ मणि, वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न और वनमाला घुटनों तक लटक रही थी।

अर्जुन ने देखा कि उनके पास नन्द-सुनन्द आदि पार्षद, चक्र-सुदर्शन आदि मूर्तिमान् आयुध, तथा पुष्टि, श्री, कीर्ति और अजा, ये चारों शक्तियाँ और सम्पूर्ण ऋद्धियाँ ब्रह्मा आदि लोकपालों के अधीश्वर भगवान् की सेवा कर रही हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने ही स्वरूप श्रीअनन्त भगवान् को प्रणाम किया। अर्जुन उनके दर्शन से कुछ भयभीत हो गए, और श्रीकृष्ण के पीछे उन्होंने भी प्रणाम किया, और वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

Rich painterly classical Indian color illustration of the supreme Bhuma-Purusha: the vast eight-armed dark cloud-blue Maha-Vishnu in yellow silk, crowned and jeweled with Kaustubha gem and Shrivatsa mark, reclining on the white thousand-headed serpent Shesha amid a jeweled-pillared palace in luminous cosmic waters, smiling as Krishna and Arjuna stand with folded hands; the recovered brahmin children present.

तब लोकपालों के स्वामी भूमा-पुरुष मुसकराते हुए मधुर और गम्भीर वाणी में बोले, ”श्रीकृष्ण और अर्जुन! मैंने आप दोनों को देखने के लिए ही ब्राह्मण के बालक अपने पास मँगा लिए थे। आप दोनों ने धर्म की रक्षा के लिए मेरी कलाओं के साथ पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है। पृथ्वी के भाररूप दैत्यों का संहार करके शीघ्र-से-शीघ्र आप लोग फिर मेरे पास लौट आइए।”

”आप दोनों ऋषिवर नर और नारायण हैं। यद्यपि आप पूर्णकाम और परम हैं, फिर भी जगत् की स्थिति और लोकसंग्रह के लिए धर्म का आचरण कीजिए।”

जब भगवान् भूमा-पुरुष ने यह आदेश दिया, तब उन दोनों ने उसे स्वीकार करके उन्हें नमस्कार किया, और बड़े आनन्द के साथ ब्राह्मण-बालकों को लेकर, जिस रास्ते से, जिस प्रकार आए थे, उसी से वैसे ही द्वारका में लौट आए।

ब्राह्मण के बालक अपनी आयु के अनुसार बड़े-बड़े हो गए थे। उनका रूप और आकृति वैसी ही थी, जैसी उनके जन्म के समय थी। उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन ने उनके पिता को सौंप दिया।

भगवान् विष्णु के उस परमधाम को देखकर अर्जुन के आश्चर्य की सीमा न रही। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि जीवों में जो कुछ बल-पौरुष है, वह सब भगवान् श्रीकृष्ण की ही कृपा का फल है।

मन्थन

परीक्षित् देर तक चुप रहे। फिर बोले, ”मुनिवर, एक बात समझ में नहीं आती। भगवान् को बालक लौटाने ही थे, तो उन्होंने उन्हें पहले ही क्यों नहीं लौटाया? ब्राह्मण को इतना दुःख क्यों सहना पड़ा, अर्जुन को इतनी दौड़ क्यों लगानी पड़ी?”

शुकदेव मुस्कुराए। ”राजन्, भूमा-पुरुष ने स्वयं ही उत्तर दे दिया था, उन्होंने बालक अपने पास इसीलिए मँगाए कि नर और नारायण, दोनों को एक बार अपने पास आते देख सकें। जिस घटना में हमें केवल दुःख और भाग-दौड़ दिखती है, उसके पीछे प्रायः कोई बुलावा छिपा होता है। ब्राह्मण का शोक, अर्जुन की प्रतिज्ञा, सात समुद्रों और लोकालोक के पार की वह यात्रा, सब उसी एक दर्शन तक पहुँचने के बहाने थे।”

”तो क्या अर्जुन की प्रतिज्ञा और पुरुषार्थ व्यर्थ गए, भगवन्?”

”व्यर्थ कहाँ। प्रतिज्ञा करते-करते ही अर्जुन यमलोक से लेकर महलोक तक घूम आए, और अन्त में उस परमधाम तक पहुँचे जहाँ बिना भगवान् के रथ के कोई नहीं पहुँच सकता था। अर्जुन वहाँ से एक सीख लेकर लौटे, राजन्, कि जीवों में जो भी बल और पौरुष है, वह अपना नहीं, भगवान् की कृपा का फल है। पुरुषार्थ तभी पूरा होता है जब वह अपनी सीमा पहचानकर उसी परम शान्त के सामने झुक जाए, उसी विष्णु के, जिन्हें भृगु ने भी सब में परम पाया था।”

परीक्षित् ने धीरे से सिर हिलाया, और मन-ही-मन उस परम ज्योति की ओर देखने लगे, जिसके आगे अर्जुन को भी आँखें मूँद लेनी पड़ी थीं।

साहित्यिक-संदर्भ

यह दोनों प्रसङ्ग श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 89 के हैं। पहले भाग (श्लोक 1 से 20) में सरस्वती-तट के ऋषियों के निर्णय पर महर्षि भृगु ब्रह्मा, शिव और विष्णु की परीक्षा करते हैं, और यह सिद्ध होता है कि सत्त्व, शान्ति और अभय में विष्णु ही परम हैं। दूसरे भाग (श्लोक 22 से 65) में द्वारका के एक ब्राह्मण के पुत्र जन्मते ही लुप्त होते जाते हैं, अर्जुन रक्षा की प्रतिज्ञा करते हैं, और विफल होने पर भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य रथ पर लोकालोक के पार भूमा-पुरुष (महाविष्णु) के परमधाम ले जाकर सब बालकों को लौटा लाते हैं।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

भृगु ने एक लात मारकर परखा कि परम कौन है, और उत्तर बल में नहीं, उस शान्ति में मिला जो अपमान सहकर भी नहीं तपी। अर्जुन ने सात समुद्र लाँघकर जाना कि उसका सारा पौरुष किसी और की कृपा का उधार है। दोनों कथाएँ एक ही ओर इशारा करती हैं, जो भीतर से सब में परम शान्त है, परम वही ठहरता है।